प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 431–440
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 431–440
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३५६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-प्रशस्तपादभाष्यम् करणगतात् संयोगादितरेतर कार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । रूपादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दोनों द्वयणुकों के कारण और अकारण ( अर्थात् जलीय द्वयणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु एवं पार्थिव द्वणुक के कारण पार्थिव परमाणु एवं अकारण जलीय परमाणु इन ) दोनों में रहनेवाले एक ही संयोग से एक ही समय कार्य और अकार्य ( अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्व्यणुक, और पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्वणुक इन दोनों के ) संयोग एवं जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्वयक एवं अकार्य पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग, इन दोनों संयोगों की उत्पत्ति होती है । ( इस प्रकार एक संयोग से दो संयोगों न्यायकन्दली दितरेतरकार्याकार्यगतौ संयोगौ युगपदुत्पद्येते । इतरेतरे पार्थिवाप्ये द्वणु, तयोः कारणाकारणे परस्परसंयुक्तौ पार्थिवाप्यपरमाणू पार्थिवः परमाणुरितरस्य पार्थिवणुकस्य कारणमितरस्याप्यस्य द्वयणुकस्याकारणम् । एवमाप्यपरमाणु-तिरस्याप्यद्वय कस्य कारणमितरस्य पार्थिवद्व्यणुकस्याकारणम् । तयोः संयोगाद् इतरस्य पार्थिवपरमाणोर्यत् कार्यं पार्थिवं द्वयणुकमकार्यश्चाप्यः परमाणुः, तयोः संयोगो भवति । एवमितरस्याप्यपरमाणोर्यत् कार्यमाप्यं द्व्यणुकमकार्यस्तु पार्थिवः परमाणुस्तयोरपि संयोगो भवतीत्येकस्माद् द्वयोरुत्पत्तिः । से दोनों के कार्य ( अर्थात् ) पार्थिव परमाणु के कार्यं पार्थिव द्वणुक और जलीय परमाणु के कार्य ( जलीय द्वणुक ) एवं दोनों परमाणुओं के अकार्य ( अर्थात् पार्थिव परमाणु के अकार्य जलीय द्वणुक एवं जलीय परमाणु के अकार्य पार्थिव द्वणुक ) इन दोनों के एक ही संयोग की उत्पत्ति होती है । ' इतरेतर ' शब्द से परस्पर सम्बद्ध पार्थिव द्वणुक और जलीय द्वणुक, ये ही दोनों अभिप्रेत हैं । इन दोनों के कारण और अकारण अर्थात् पार्थिव द्वणुक के कारण पार्थिवपरमाणु और अकारण जलीय परमाणु एवं जलीय द्वयणुक के कारण जलीय परमाणु और अकारण पार्थिव परमाणु, कथित कारण और अकारण इन दोनों के संयोग से ' इतर ' अर्थात् पार्थिव परमाणु के कार्य पार्थिव द्वथणुक, और अकार्य जो जलीय परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । एवं ' इतर ' जो जलीय परमाणु के कार्य जलीय द्वणुक, एवं अकार्य जो पार्थिव परमाणु, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार एक ही संयोग से ( संयोगज ) संयोगों की उत्पत्ति होती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५७ प्रशस्तपादभाष्यम् किं कारणम् ९ कारणसंयोगिना कारणेन कार्यमवश्यं संयुज्यत इति न्यायः । अतः पार्थिवं द्वयणकं कारण संयोगिनायेनाणुना सम्बद्धयते । आप्यमपि द्रयणुकं कारणसंयोगिना पार्थिवेनेति । अथ धणुकयोरितरेतर कारणा कारण सम्बद्धयोः कथं परस्परतः की एक ही समय उत्पत्ति होती है ) ( प्र ० ) ( एक कारण से दो कार्यों की उत्पत्ति ) क्यों होती है? ( उ ० ) चूँकि यह नियम है कि समवायिकारण के संयोग से युक्त अकारण ( द्रव्य ) के साथ ( उस समवायिकारण का ) कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है, अतः पार्थिव द्वयणुक उस जलीय परमाणु के साथ भी संयुक्त होता है, जिसका संयोग उक्त पार्थिव परमाणु के साथ है । ( प्र ० ) एक दूसरे के कारण और अकारण के साथ सम्बद्ध इन दोनों द्व्यणुकों में परस्पर संयोग न्यायकन्दली किं कारणम्? पार्थिवाप्ययोद्वर्यणुकयविजातीयपरमाणु संयोगे किं प्रमाणम्? इति पृष्टः सन् प्रमाणमाह- कारणसंयोगिनेति । पार्थिवपरमाणु राप्यद्वयणुके सह सम्बद्धयते, तत्कारणसंयोगित्वात् पटसंयुक्ततुरीवत् । एवमाप्यं परमाणुमपि पक्षीकृत्य वक्तव्यम् । यतः कारणसंयोगिता कार्यं संयुज्यते, अतः पार्थिवं द्व्यणुकं कारणसंयोगिनाप्येन परमाणुना सम्बध्यते, आप्यं च द्वयणुकं तस्य कारणसंयोगिना पार्थिवपरमाणु-नेत्युपसंहारः । अथ पार्थिवाप्यद्वयणुकयोरितरेतर कारणाकारणसम्बद्धयोः कथं सम्बन्धः? पार्थिवद्व्यणुकस्य स्वकीयाकारणेनाप्यद्वयणुक कारणेनाप्यपरमाणुना ' किंकारणम्? ' इत्यादि से प्रश्न करते हैं कि क्या कारण है? अर्थात् पार्थिव a णुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों का अपने से भिन्न जाति के परमाणुओं के ( पार्थिव-द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ एवं जलीय द्वणुक का पार्थिव परमाणु के साथ ) जो संयोग की उत्पत्ति होती है, इसमें क्या कारण है? इसी प्रश्न का उत्तर ' कारणसंयोगिता ' इत्यादि सन्दर्भ से देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार तन्तु में संयुक्त तुरी के साथ पट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार पार्थिव परमाणु भी जलीय द्वयणुक के साथ संयुक्त होता है, क्योंकि जलीय द्वयक के कारणीभूत जलीय परमाणु के साथ वह ( पार्थिव परमाणु ) संयुक्त है । इसी प्रकार जलीयपरमाणु को भी पक्ष बनाकर अनुमान करना चाहिए । ( अर्थात् जिस प्रकार कपाल में संयुक्त दण्ड के साथ घट भी संयुक्त होता है, उसी प्रकार जलीय परमाणु भी पार्थिव द्वयक के साथ संयुक्त होता है, क्योंकि पार्थिव द्वणूक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ उसका संयोग है ) । इस प्रसङ्ग का सारमर्म यह है कि जिस द्रव्य के साथ कारण का संयोग रहता है, उस द्रव्य के साथ कार्य भी अवश्य ही संयुक्त होता है । अतः प्रकृत में पार्थिव द्वयणुक जलीय परमाणु के साथ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २५८ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-सम्बन्धः? तयोरपि संयोगजाभ्यां संयोगाभ्यां सम्बन्ध इति । नास्त्यजः संयोगो नित्यपरिमण्डलवत् पृथगनभिधानात् । यथा चतुर्विधं परिमाणमुत्पाद्यमुक्त्वाह नित्यं परिमण्डलमित्येवमन्यतरकर्मजा-किस कारण से उत्पन्न होता है? ( उ ० ) इन दोनों द्वयणुकों में भी दोनों संयोगज ' संयोगों से ही उक्त संयोग की उत्पत्ति होती है । अनुत्पत्तिशील संयोग कोई है ही नहीं । क्योंकि सूत्रकार ने नित्य परिमण्डल ( नित्य अणुपरिमाण ) की तरह नित्य संयोग का उल्लेख नहीं किया है, अर्थात् सूत्रकार ने जिस प्रकार उत्पत्तिशील चार परमाणुओं के उल्लेख के बाद ' नित्यं परिमण्डलम् ' इत्यादि से नित्य अणुपरिमाण का उल्लेख किया है, न्यायकन्दली सम्बद्धस्याप्यद्वयणुकस्यापि स्वकीयाकारणेन पार्थिवद्वद्यणुककारणेन पार्थिव. परमाणुना सम्बद्धस्य कथं सम्बन्धः? इति पृच्छति । उत्तरमाह - तयोरपीति । पार्थिवद्वयणुकस्याप्येन परमाणुना यः संयोगजः संयोगो यश्चाप्यद्वयणुकस्य पार्थिवपरमाणुना संयोगजः संयोगस्ताभ्यां पार्थिवाप्यपरमाणु संयोगाभ्यां द्वयणुकयोः परस्परसंयोगः । अत्रापि पूर्वोक्त एव न्यायः, कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगि कार्यमिति । संयुक्त होता है, क्योंकि उसके कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ जलीय परमाणु संयुक्त है । इसी तरह जलीय द्वयणुक भी अपने कारणीभूत जलीय परमाणु से संयुक्त पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त होता है । ( प्र ० ) इतरेतर कारणों और अकारणों में परस्पर असम्बद्ध पार्थिव द्वणुक और जलीय द्वद्यणुकों में परस्पर संयोग कैसे होता है? अर्थात् यह पूछते हैं कि के पार्थिवणुक अपने अकारणीभूत और जलीय के कारणीभूत जलीय परमाणु साथ संयुक्त है, एवं जलीय द्वयणुक अपने अकारणीभूत और पार्थिव द्वणक के कारणीभूत पार्थिव परमाणु के साथ संयुक्त है, फिर इससे पार्थिव और जलीय दोनों द्वणुकों में परस्पर संयोग कैसे होता है? ' तयो: ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । अभिप्राय यह है कि पार्थिव द्वणुक का जलीय परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है, एवं जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ जो संयोगज संयोग है, इन दोनों संयोगज संयोगों से ही कथित पार्थिव द्वणुक और जलीय द्वयणुक इन दोनों में परस्पर संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग के प्रसङ्ग में भी पूर्व कथित वही न्याय लागू होता है कि जिस कार्य के कारण का जिस अकारण के साथ संयोग होगा, उस अकारण के साथ उस कार्य का भी संयोग अवश्य ही होगा । १. अर्थात् पार्थिव परमाणु और जलीय परमाणु के संयोग से उत्पन्न पार्थिव द्वयणुक का जलीय परमाणु के साथ संयोग, और जलीय द्वयणुक का पार्थिव परमाणु के साथ संयोग, इन दोनों संयोगज संयोगों से पार्थिव द्वयक और जलीय द्वघणुक इन दोनों में संयोग की उत्पत्ति होती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३५६ दिसंयोगमुत्पाद्यमुक्त्वा पृथङ् नित्यं ब्रूयात्, न त्वेवमत्रवीत्, तस्मान्नास्त्यजः संयोगः । परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः संयोगः । उसी प्रकार ( अगर नित्य संयोग भी होता तो ) उत्पत्तिशील अन्यतर कर्मजादि संयोगों को कहने के बाद नित्य संयोग का भी अलग से उल्लेख अवश्य ही करते, सो नहीं किया है, अत: संयोग नित्य नहीं है । परमाणुओं के साथ अकाशादि के संयोग न्यायकन्दली त्रिविध एव संयोग इत्युक्तम् । नित्यस्यापि संयोगस्य सम्भवादिति केचित् तत्प्रतिषेधार्थमाह - नास्त्यजः संयोगः, परिमण्डलवत् पृथगनभिधानात् । सर्वज्ञेन महर्षिणा सर्वार्थोपदेशाय प्रवृत्तेन पृथगनभिधानात्, अजः संयोगो नास्ति, खपुष्पवत् । एतदेव विवृणोति -- यथेत्यादिना । संयोगोऽजो न भवतीति प्रतिज्ञार्थो न पुनरजः संयोगो नास्तीति, आश्रयासिद्धत्वात् । ननु परमाण्वाकाशयोः संयोगो नित्य एव, तयोर्नित्यत्वादप्राप्त्यभावाच्च । यत् पुनरयं कणादेन नोक्तः, तद् भ्रान्तेः पुरुषधर्मत्वात्, अत आह - परमाणुभिराकाशादानामिति । यथा महतो न्यग्रोधस्य मूलाग्रावयवव्यापिन एकस्य मूलादग्रमग्रा-न्मूलं गच्छता पुरुषेण संयोगविभागावन्यतरकर्मजौ युगपत्प्रतीयेते, तथा व्यापि -' संयोग तीन ही प्रकार के हैं ' इस अवधारण के प्रसङ्ग में किसी को आपत्ति है कि उक्त अवधारण ठीक नहीं है, क्योंकि नित्य भी संयोग हो सकता है । इसी पूर्वपक्ष का खण्डन ' नास्त्यजः संयोगः ' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् सभी विषयों के ज्ञाता महर्षि कणाद सभी वस्तुओं के उपदेश देने के लिए प्रवृत्त हुए थे । अत: अगर नित्य परि-मण्डल की तरह नित्य संयोग की भी सत्ता रहती तो नित्य परिमण्डल की तरह उसका भी उल्लेख अवश्य ही करते । किन्तु गगनकुसुम की तरह नित्यसंयोग का भी उल्लेख महर्षि ने नहीं किया है, अतः नित्यसंयोग नहीं है । ' यथा ' इत्यादि से इसी का विवरण देते हैं । ' संयोग नित्य नहीं है ' प्रकृत में इसी आकार की प्रतिज्ञा है ' नित्यसंयोग नहीं है ' इस प्रकार की नहीं, क्योंकि इस ( दूसरी ) प्रतिज्ञा का आश्रय ( पक्ष ) नित्यसंयोग ( आकाशकुसुम की तरह अप्रसिद्ध है ) अतः इसके लिए प्रयुक्त हेतु आश्रयासिद्ध हेत्वाभास होगा । ( प्र ० ) परमाणु और आकाश का संयोग तो नित्य है, क्योंकि वे दोनों ही नित्य हैं और वे दोनों कभी अप्राप्त ( असम्बद्ध ) भी नहीं रहते । ( इस वस्तुस्थिति के अनुसार यह कहना ही पड़ेगा कि ) कणाद ने जो नित्य संयोग का निरूपण नहीं किया है, इसका कारण उनकी भ्रान्ति हैं, चूंकि भ्रान्ति पुरुष का धर्म है । इसी पूर्व पक्ष के समाधान के लिए ' परमाणुभिराकाशादीनाम् ' इत्यादि पक्ति लिखते हैं । जैसे कि एक महान वटवृक्ष के मूल से ऊपर की तरफ जाते हुए पुरुष का, एवं ' अग्रभागसे मूल की तरफ आते हुए पुरुष का एक ही समय उस वृक्ष के साथ अन्यतरकर्मज संयोग और अन्यतरकर्मज विभाग दोनों प्रतीत होते हैं. क्योंकि वे दोनों अव्याप्यवृत्ति हैं, उसी प्रकार परमाणु और आकाश का भी अन्यतरकर्मजसंयोग ( आकाश के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति, युतसिद्ध्यभावात् । सा पुनर्द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गतिमच्चं पृथगाश्रयाश्रयित्वं चेति । अव्याप्यवृत्ति एवं अन्यतरकर्मज ही हैं । आकाशादि विभु द्रव्यों में परस्पर संयोग हैं । ही नहीं, क्योंकि उन सवों की युतसिद्धि नहीं है । दोनों ( प्रतियोगी और अनुयोगी ) में एक को स्वतन्त्र गतिशीलता और दोनों में से प्रत्येक में स्वतन्त्र रूप से किसी के आश्रय होने की या कहीं आश्रित होने की योग्यता ही ' युतसिद्धि ' है । न्यायकन्दली नो s व्याकस्य परमाणुना सह संयोगविभागौं परमाणुकर्मजौ भवतः, तयोर-व्याप्यवृत्तित्वादिति न परमाण्वाकाशसंयोगस्य नित्यता । इदं तावदित्थं परिहृतम्, विभूनां परस्परतः संयोगे का प्रतिक्रिया? न ह्यसावन्यतर-कर्मजः, नाप्युभयकर्मज:, तेषां निष्क्रियत्वात् । नापि संयोगजः कार्यस्य ि कारणसंयोगिना अकारणेन संयोगजः संयोगो भवति । न चायं विभूनामुप-पद्यते, नित्यत्वात् । अस्ति च तेषां संयोग आकाशममूर्तेनापि द्रव्येण समं संयुज्यते मूर्तद्रव्यसंयोगित्वात् पटवदित्यनुमानात् प्रतीतः । स चाकारण-वनित्यं तस्मादनुपपन्नमिदम्, अजः संयोगो नास्तीति । तत्राह - विभूनामिति । निष्क्रिय होने पर भी, परमाणु के क्रियाशील होने के कारण ) हो सकता है, क्योंकि संयोग और विभाग दोनों ही अव्याप्यवृत्ति हैं । अतः परमाणु और आकाश का संयोग ( दोनों के नित्य होने पर भी परमाणुगत क्रिया के अनित्य होने कारण ) नित्य नहीं है । संयोग के नित्यत्व के पक्ष में आयी हुई आपत्ति का उद्धार उसके समर्थक इस प्रकार करते हैं कि ( परमाणु और आकाश के संयोग में नित्यत्व अनिवार्य न होने पर भी ) विभु द्रव्यों के परस्पर संयोग में ( नित्यत्व मानने के सिवाय ) क्या समाधान करेंगे? क्योंकि विभु द्रव्यों के संयोग न अन्यतरकमंज हो सकते हैं, न उभयकर्मज, क्योंकि वे सभी क्रिया से रहित हैं । संयोग से भी ( विभु द्रव्य का दूसरे विभु द्रव्य के साथ संयोग ) नहीं उत्पन्न हो सकता, क्योंकि सयोगजसंयोग किसी कार्य द्रव्य का उसके अकारणीभूत द्रव्य के ही साथ होता है जिसमें उस कार्य द्रव्य के कारणीभूत द्रव्य का संयोग रहता है । विभु द्रव्य तो नित्य हो होते हैं, अतः उनका कोई कारण ही नही है, तस्मात् उनका परस्पर संयोगजसंयोग नहीं हो सकता । किन्तु विभु द्रव्यों में परस्पर संयोग अवश्य ही होता है, क्योंकि इस प्रसङ्ग में यह अनुमान प्रमाण है कि जिस प्रकार पटादि द्रव्य घटादि मूर्त द्रव्यों के साथ संयुक्त होने पर आकाशादि अमूर्त द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होते हैं, उसी प्रकार आकाशादि विभु द्रव्य भी दिगादि अमूत्तं ( विभु ) द्रव्यों के साथ भी अवश्य ही संयुक्त होते हैं, क्योंकि उनमें घटादि मूर्तं द्रव्यों का संयोग है ( जो मूर्त द्रव्यों के साथ संयुक्त होगा, वह अभूतं द्रव्यों के साथ भी संयुक्त होगा हो ), किन्तु ( इस प्रकार से For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] विनाशस्तु ४६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३६१ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगस्यैकार्थसमवेताद्विभागात्, सर्वस्य न्यायकन्दली For Private And Personal क्वचिदाश्रय विनाशादपि । कथम्? यथा तन्त्वोः संयोगे सत्यन्यतर-संयोग के आश्रयरूप एक अधिकरण में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले विभाग से ही सभी संयोगों का विनाश होता है, किन्तु कहीं कहीं आश्रय के विनाश से भी संयोग का विनाश होता है । ( प्र ० ) कैसे? ( उ ० ) जब दो तन्तुओं के यत्र युतसिद्धस्तत्रैव दृष्टः । नास्ति, संयोगो युतसिद्धिश्चाकाशादिषु अतो व्यापकाभावात् संयोगोऽपि तेषु न भवति । यच्च संयोग प्रतिपादकमनुमान-मुक्तम्, तदसाधनम्, उभयपक्षसमत्वात् । यथेदं विभूनां संयोगं शास्ति, तथा ताभ्यामेव हेतुदृष्टान्ताभ्यां विभागमपि । अस्तु द्वयोरप्युपपत्तिः प्रमाणेन तथाभावप्रतीतेरिति चेन्न, संयोगविभागयोरेकस्य नित्यत्वेऽन्यतरस्यासम्भवादिति द्वयोरप्यसिद्धिः, परस्परप्रतिबन्धात् । अथ केयं तसिद्धिर्यस्या अभावाद्विभूनां संयोगो न सिद्ध्यति? अत्राह - सा पुनरिति । द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गमनं युतसिद्धिनित्यानाम्, द्वयोरन्यतरस्य परस्पर-निष्पन्न विभु द्रव्यों के ) संयोग का कोई कारण नहीं है, अतः वह नित्य है । सुतराम् यह कहना ठीक नहीं है कि ' ( नित्य ) संयोग नहीं है ' इसी आक्षेप का खण्डन ' विभूनाम् ' इत्यादि से करते है । संयोग उन्हीं दो द्रव्यों में देखा जाता है, जिनमें ' युत सिद्धि ' रहती हैं । आकाशदिगादि विभु द्रव्यों में ' युत सिद्धि ' नहीं है, अत: ( युतसिद्धि रूप ) व्यापक के अभाव से समझते हैं कि ( व्याप्य ) संयोग भी उनमें नहीं है । आका-शादि विभु द्रव्यों में परस्परं संयोग के साधन के लिए जिस अनुमान का प्रयोग किया गया है, वह ( विभु द्रव्य कै ) नित्यसंयोग का ही साधक नहीं है, क्योंकि वह ( विभुद्वय के नित्य संयोग और नित्य विभाग ) दोनों पक्षों में समान रूप से लागू हो सकता है । जिस हेतु से और जिस दृष्टान्त से वह विभुओं में संयोग का साधन कर सकता है, उसी हेतु से और उसी दृष्टान्त से वह विभुओं में विभाग का भी साधन कर सकता है । ( प्र ० ) विभुओं में परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही अगर प्रामाणिक हों, तो दोनों ही मान लिये जायें । ( उ ० ) विभुओं के संयोग और विभाग दोनों में से किसी एक में नित्यत्व की सिद्धि हो जाने पर दूसरे में नित्यत्व को सिद्धि असम्भव है, क्योंकि वे दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । यह ' युत सिद्धि ' कौन सी वस्तु है! जिसके न रहने से विभु द्रव्यों में संयोग नहीं हो पाता? ' सा पुनः ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर देते हैं । दोनों में से किसी एक में गति का रहना दो निश्य वस्तुओं की युतसिद्धि है । अनित्य दो वस्तुओं की सिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि वे दोनों या दोनों में से एक भी कहीं
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग-तन्त्वारम्भके अंचौ कर्मोत्पद्यते, तेन कर्मणा अंश्वन्तराद् विभागः क्रियते, विभागाच्च तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, संयोगविनाशात् तन्तु-विनाशः, तद्विनाशे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरसंयोगस्य विनाश इति ॥ , संयुक्त होने पर उन दोनों तन्तुओं में से एक तन्तु के उत्पादक अंशु ( तन्तु के अवयव ) में क्रिया उत्पन्न होती है, एवं उसी क्रिया से उस अंशु का दूसरे अंशु से विभाग उत्पन्न होता है, इस विभाग से तन्तु के उत्पादक उन दोनों अंशुओं के संयोग का विनाश होता है, संयोग के इस विनाश से उस तन्तु का नाश हो जाता है, तब उस तन्तु में रहनेवाल दूसरे ( उक्त पट के अनारम्भक ) तन्तु के संयोग का भी नाश होता है । न्यायकन्दली परिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिरनित्यानाम् । इयं द्विधाप्याकाशादिषु नास्तीत्यभिप्रायः । विनाशस्तु सर्वस्य संयोगस्य एकार्थसमवेताद् विभागातू । अन्यतरकर्मजस्योभयकर्मजस्य संयोगजस्यैकार्थसमवेताद् विभागात् । ययोर्द्रव्ययोः संयोगो वर्तते, तयोः परस्परं विभागादस्य विनाशः । यद्यपि विभागकाले संयोगो विद्यत एव तथापि तयोः सहभावो न लक्ष्यते, विनाशस्याशुभावाद् विभागेन वा तदुपलम्भप्रतिबन्धात् । क्वचिदाश्रय विनाशादपि संयोगस्य विनाशः । संयोगे सत्यन्यतरतन्त्वारम्भकेंऽशौ कर्मोत्पद्यते, कथम्? तन्त्वोः कुतश्चित् कारणात् । तेन दूसरी जगह आभित हों या कोई दूसरी वस्तु ही इन दोनों में, यां इन दोनों में से एक में भी आश्रित हो । अभिप्राय यह है कि इन दोनों प्रकार की युतसिद्धियों में आकाशकालादि विभु द्रव्यों में एक भी नहीं है । ( संयोग के आश्रय रूप ) एक अर्थ नाश होता है, अर्थात् अन्यतरकर्मज, संयोगों का एक अर्थ में समवाय आश्रयीभूत दो द्रव्यों में समवाय ( द्रव्य ) में रहनेवाले विभाग से हो सभी संयोगों का उभयकर्मज और संयोगज इन तीनों प्रकार के सम्बन्ध से रहनेवाले विभाग से, अर्थात् संयोग के सम्बन्ध से रहनेवाले उनके परस्पर विभाग से ही उन ( सभी संयोगों का नाश होता है ) । यद्यपि विभाग के उत्पत्तिक्षण में संयोग रहता ही है, फिर भी दोनों में सामाना-धिकरण्य ( एक अधिकरण में रहने की ) प्रतीति नहीं होती है, क्योंकि अतिशीघ्रता से ( विभाग की उत्पत्ति के अगले क्षण में हो ) संयोग का विनाश हो जाता है । अथवा विभाग के द्वारा ही दोनों के सामानाधिकरण्य की प्रतीति प्रतिरुद्ध हो जाती है! कहीं आश्रय के विनाश से आश्रय के ( किस स्थिति में कहीं भी संयोग का नाश होता है । ( प्र ० ) किस प्रकार? नाश से संयोग का नाश होता है? ) ( उ ० ) जहाँ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६३ विभागो विभक्तप्रत्ययनिमित्तम् । ' इससे यह विभक्त है ' इस आकार की शब्द विभागहेतुश्च । प्रतीति का कारण ही ' विभाग ' ' है । वह शब्द एवं विभाग का कारण है । प्राप्ति ( संयोग ) न्यायकन्दली कर्मणा अश्वन्तराद् विभागः क्रियते, विभागादंश्वोः संयोगविनाशात् तन्तुविनाशे तदाश्रितस्य संयोगस्य विनाशः, उभयाश्रयस्य तस्यैकाश्रयावस्थानेऽनुपलम्भादिति ॥ संयोगपूर्वकत्वाद् विभागस्य तदनन्तरं निरूपणार्थमाह - विभागा विभक्त-प्रत्ययनिमित्तमिति । अत्रापि व्याख्यानं पूर्ववत् । संयोगाभावे विभक्त-प्रत्यय इति चेत्? असति विभागे संयोगाभावस्य कस्मादुत्पादः? कर्मणा क्रियत इति चेत्? न, कर्मणो गुणविनाशे सामर्थ्यादर्शनात् । दृष्टं च गुणविनाशे गुणानां हेतुत्वम् तेनात्रापि गुणान्तरकल्पना । किश्व संयोगाभावेऽसंयुक्ता-दिमाविति प्रत्यय: स्यान्न विभक्ताविति, अभावस्य विधिमुखेन ग्रहणाभावात् । ( दो द्वितन्तुक पट की उत्पत्ति के लिए ) दोनों तन्तुओं में संयोग के उत्पन्न होने पर उन दोनों में से एक तन्तु के उत्पादक अंशु ( तन्तु के अवयत्र ) में किसी कारण से क्रिया उत्पन्न होती है । एवं इस क्रिया से दूसरे अंशु का पहिले अंशु से विभांग उत्पन्न होता है । इस विभाग से ( तन्तु के उत्पादक ) दोनों अंशुओं के संयोग का विनाश होता है । इस संयोग के नाश से तत्तु का विनाश होता है । ( उस एक ही ) तन्तु के निष्ठ हो जाने पर ( भी ) उसमें रहने वाले संयोग का नाश हो जाता है. क्कोंकि ( नियमतः ) दो आश्रयों में रहनेवाली वस्तु की ( उसके केवल ) एक आश्रय के न रहने पर ( भी ) उपलब्धि नहीं होती है । ( किन्हीं दो द्रव्यों में ) पहिले संयोग के होने पर ही ( उन दोनों द्रव्यों में ) विभाग उत्पन्न होता है । अतः संयोग के निरूपण के बाद विभाग का उपपादन ' विभागो विभक्तप्रत्ययनिमित्तम् ' इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । इस वाक्य की व्याख्या पहिले की ( अर्थात् ' संयोगः संयुक्त प्रत्ययनिमित्तम् ' इस वाक्य की व्याख्या की ) तरह करनी चाहिए | ( प्र ० ) संयोग के न रहने पर ही विभाग की प्रतीति होती है ( विभाग नाम का कोई स्वतन्त्र गुण नहीं है ) | ( उ ० ) विभाग के न माननेपर संयोग के अभाव की उत्पत्ति किससे होती है? क्रिया से उसकी उत्पत्ति मानना सम्भव नहीं है, क्योंकि कर्म से गुण का नाश कहीं नहीं देखा जाता । एवं एक गुण से दूतरे गुण का नाश देखा जाता है । अत: ( संयोगनाश के लिए ) स्वतन्त्र विभाग नाम के ) गुण की कल्पना ही उचित है । ( संयोग की तरह विभाग भी स्वतन्त्र गुण ही है, संयोग का अभाव नहीं ) । इसमें दूसरी युक्ति यह भी है कि तब ' इन दोनों में संयोग नहीं है ' इस आकार की प्रतीति होती, ' ये दोनों विभक्त है ' इस आकार की नहीं, क्योंकि अभाव की प्रतीति भाव के बोधक शब्द से नहीं होती है | ( प्र ० ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम [ गुणे विभाग-प्राप्तिपूर्विकाऽप्राप्तिर्विभागः । स च त्रिविधः - अन्यतरकर्मजः, उभय-कर्मज:, विभागजश्च विभाग इति । तत्रान्यतरकम जोगय कर्मजौ बाद उत्पन्न अप्राप्ति का नाम ही ' विभाग ' है । वह ( १ ) अन्यतरकर्मज, ( २ ) उभयकर्मज और ( ३ ) विभागज विभाग भेद से तीन प्रकार का है । इनमें अन्यतरकर्मज विभाग और उभयकर्मज विभाग इन दोनों की सभी बातें न्यायकन्दली भाक्तः प्रत्ययोऽयमिति चेत्? तहि विभागस्याप्रत्याख्यानम्, निष्प्रधानस्य भाक्त-स्याभावात् । तस्य कार्यं दर्शयति - शब्दविभागहेतुश्चेति । न केवलं विभक्त-प्रत्ययनिमित्तं शब्दविभागहेतुश्चेति चार्थः । वंशदले पाट्यमाने योऽयमाद्यः शब्दः, स तावद् गुणान्तरनिमित्तः, शब्दत्वात्, भेरीदण्डसंयोगजशब्दवत् । न चायं संयोगजः, तस्याभावात् । तस्माद् वंशदलमिभागज एवायम्, तद्भावभावित्वात् । विभागस्य विभागहेतुत्वं चानन्तरं वक्ष्यामः । प्राप्तिपूर्विका प्राप्तिरिति तस्य लक्षणकथनम् । अधर्म इति नञ् यथा धर्मविरोधिनि गुणान्तरे, न तु धर्माभावे, तथा अप्राप्तिरिति नञ् प्राप्ति-विरोधिनि गुणान्तरे, न तु प्राप्तेरभावे । प्राप्तौ पूर्वस्थितायां या s प्राप्तिः ( ' ये दोनों विभक्त हैं ' इत्यादि ) प्रतीतियाँ तो गौण हैं? ( उ ० ) इस गोणता की प्रतीति से भी विभाग का मानना आवश्यक है, क्योंकि प्रधान के बिना गौण नहीं होता है । ' शब्दविभागहेतुश्च ' इस वाक्य से विभाग के द्वारा उत्पन्न होने वाले कार्य दिखलाये गये हैं । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' च ' शब्द से यह सूचित होता है कि विभाग केवल विभक्त प्रत्यय का ही कारण नहीं है, किन्तु शब्द और ( विभागज ) विभाग का भी कारण है । ( ' विभाग से शब्द उत्पन्न होता है ' इसमें यह अनुमान प्रमाण है कि ) जिस प्रकार भेरी और दण्ड के संयोग से उत्पन्न शब्द का शब्द से भिन्न उक्त संयोग कारण है, उसी प्रकार बाँस का दो भाग करने पर जो पहिला शब्द होता है, उसका भी स्व ( शब्द ) से भिन्न कोई दूसरा ही गुण कारण है । एवं इस शब्द का ( भेरी के उक्त शब्द की तरह ) संयोग भी कारण नहीं है अतः चूंकि बाँस के दोनों दलों की सत्ता के बाद ही उक्त शब्द की उत्पत्ति होती है, अतः बांस के दोनों दलों का विभाग ही उस शब्द का कारण है । विभाग से ( दूसरे ) विभाग की उत्पत्ति का विवरण हम आगे देंगे । ' प्रतिपूर्विकाप्राप्ति: ' इस वाक्य से विभाग का लक्षण कहा गया है । जिस प्रकार ' अधर्म ' शब्द में प्रयुक्त नन् शब्द धर्म के विरोधी पाप रूप दूसरे गुण का बोधक है, उसी प्रकार प्रकृत ' अप्राप्ति ' शब्द में प्रयुक्त ' नन् ' शब्द भी प्राप्ति ( संयोग ) रूप For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६५ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगवत् । विभागजस्तु द्विविध: - कारणविभागात्, कारणाकारण-विभागाच्च । तत्र कारणविभागात् तावत् कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नं ( उक्त नाम के दोनों ) संयोगों की तरह हैं । ( किन्तु ) विभागज विभाग दो प्रकार का है - ( १ ) केवल कारणों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला, एवं ( २ ) कारण और अकारण इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला । न्यायकन्दली प्राप्तिविरोधी गुणविशेषः, स विभाग इति वाक्यार्थः । किं प्राप्तेः पूर्वा-वस्थानमात्रम्? किंवा विभागं प्रति हेतुत्वमप्यस्ति? अवस्थितिमात्रमिति ब्रूमहे, संयोगस्य विभागहेतुत्वेऽवयवसंयोगानन्तरमेव तद्विभागस्योत्पत्तौ द्रव्यानु-त्पत्तिप्रसङ्गात् । कर्म सहकारी संयोगः कारणमिति चेत्? अन्वयव्यतिरेकाव-घृतसामर्थ्यं कर्मैव कारणमस्तु न संयोगः, तस्मिन् सत्यप्यभावात्: प्रध्वंसोत्पत्ता-विव भावस्य । विभागोत्पत्तौ संयोगस्य पूर्वकालतानियमः, विभागस्य तद्विरोधि-स्वभावत्वात् । स च त्रिविध इति भेदकथनम् । अत्रापि चशब्दोऽवधारणे, त्रिविध एव । अन्यतरकर्मज उभयकर्मजो विभागजश्च विभाग इति । गुणक विरोधी विभाग नाम के गुण का ही बोधक है ( संयोग के अभाव का नहीं ) । ' प्राप्ति ' ( संयोग ) के रहने पर जो ' अप्राप्ति ' अर्थात् प्राप्ति का विरोधी गुणविशेष वही ' विभाग ' है । ( प्र ० ) विभाग के उत्पन्न होने से पहिले संयोग ( प्राप्ति ) केवल रहता है, मा वह उसका उत्पादक भी है? ( उ ० ) हम तो कहते हैं कि विभाग की उत्पत्ति के पूर्व ( नियमतः ) संयोग केवल विद्यमान रहता है, ( वह विभाग का कारण नहीं है ), क्योंकि संयोग अगर विभाग का कारण हो, तो फिर द्रव्यों की उत्पत्ति ही रुक जाएगी क्योंकि अवयवों में संयोग के होने के बाद उस संयोग से अवयवों के विभाग उत्पन्न होंगे । अगर कहें कि ( प्र ० ) ( केवल ) संयोग ही विभाग का कारण नहीं है क्रिया भी उसकी सहायिका हैं? ( उ ० ) तो फिर अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा जिस क्रिया मे विभाग का सामर्थ्य निश्चित है, वह क्रिया ही विभाग का कारण है, संयोग नहीं । क्योंकि संयोग होती है । अतः जिस प्रकार के रहते हुए भी बिना क्रिया के विभाग की उत्पत्ति नहीं वंस की उत्पत्ति से पहिले ( उसके प्रतियोगी ) भाव की नियमतः सक्षा ( ही ) रहती है, ( एवं वह ध्वंस का कारण नहीं होता ), उसी प्रकार संयोग भी विभाग से पहिले नियमतः केवल रहता है, वह उसका उत्पादक नहीं है । क्योंकि विभाग स्वभावतः संयोग का विरोधी है । ' स च त्रिविधः ' इस वाक्य द्वारा विभाग के भेद कहे गये हैं । यहाँ भी ' च ' शब्द का अवधारण ही अर्थ है, ( तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ कि ) विभाग के ये तीनही प्रकार हैं- ( १ ) अन्यतरकर्मज ( २ ) उभयकमंज और ( ३ ) विभागज । For Private And Personal