प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 441–450
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 441–450
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-यदा तस्यावयवान्तराद् विभाग करोति, न तदाकाशादिदेशात्; यदा वाकाशादिदेशाद् विभागं करोति, न तदावयवान्तरादिति स्थितिः । अतो-इनमें कारण मात्र के विभाग से उत्पन्न होनेवाले विभाग कर निरूपण करते हैं । वस्तुस्थिति यह है कि कार्य से सम्बद्ध अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय अपने आश्रयरूप अवयव द्रव्य में दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय विभक्त अवयवों में आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न नहीं करती, एवं जिस समय ( वही क्रिया ) अवयवों में आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय एक अवयव में न्यायकन्दली तत्र तेषु मध्येऽन्यतरकर्मजोभयकर्मजौ संयोगवत् । यथा क्रियावता निष्क्रियस्य संयोगोऽन्यतरकर्मजस्तथा विभागोऽपि । यथोभयकर्मजः संयोगो मल्लयो मेंषयोर्वा तथा विभागोऽपि । विभागजस्तु द्विविध इति । तुशब्देनास्य पूर्वाभ्यां विशेषकथ-नम् । कारणयोविभागादेको विभागो भवति । अपरस्तु कारणाकारणयोविभागा-दिति द्वैविध्यम् । कारणविभागाच्च विभागः कथ्यते - कार्याविष्ट इत्यादिना । कार्येणाविष्टे व्याप्ते अवरुद्धे कारणे कर्मोत्पन्नं यदा तस्यावयवस्या-वयवान्तराद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशकं विभागं करोति, न तदा द्रव्यावरुद्धा-' तत्र ' अर्थात् उनमें अभ्यंतरकर्मज और उभयकर्मज ये दोनों ' संयोगवत् ' हैं, अर्थात् जिस प्रकार क्रिया से युक्त एक द्रव्य का और क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य का संयोग अन्य-तरकमंज है उसी प्रकार ( निष्क्रिय एक द्रव्य के साथ क्रिया से युक्त दूसरे द्रव्य का ) विभाग भी ( अन्यतरकर्मज ) है । एवं जिस प्रकार ( लड़ते हुए ) दो भेड़ों का ( या ) पहलवानों का संयोग उभयकर्मज है, उसी प्रकार उनका विभाग भी ( उभयकर्मज ) है । ' विभागजस्तु द्विविध: ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द से विभागजविभाग में कथित दोनों विभागों से भेद सूचित किया गया है । एक प्रकार का विभागजविभागकारणी-भूत दोनों द्रव्यों के ही विभाग से उत्पन्न होता है, और दूसरे प्रकार का विभागजविभाग-कारणीभूत एक द्रव्य, और दूसरा अकारणीभूत द्रव्य, इन दोनों द्रव्यों के विभाग से उत्पन्न होता है । विभागजविभाग के ये ही दो भेद हैं । ' कार्याविष्टे कारणं ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कारण ( मात्र ) के विभाग से उत्पन्न विभागज ) विभाग का निरूपण किया गया है । वस्तुस्थिति यह है कि कार्य से ' आविष्ट ' अर्थात् नियत रूप से सम्बद्ध ( अवयव रूप ) कारण में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय अवयवी द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाशक विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय ( वह क्रिया ) उस द्रव्य के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली ३६७ दाकाशादिदेशाद् विभागं करोति । यदा चाकाशादिदेशात्, न तदावयवान्तरादिति स्थितिनियमः । अतोऽवयवकर्मावययान्तरादेव विभागमारभते । यत आकाश-विभागकारणं कर्म अवयवान्तराद् विभागं न करोतीति नियमः, अतोऽवयवान्तर-विभागारम्भकं कर्म अवयवान्तरादेव विभागं करोति, नाकाशादिदेशात् । अयमभिसन्धिः - आकाशविभागकर्तृत्वं कर्मणो द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधि-विभागानारम्भकत्वेन व्याप्तम्, द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागानारम्भकत्व-विरुद्धं च द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागोत्पादकत्वम् । अतो यत्रेदमुपलभ्यते तत्र द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागानुत्पादकत्वे निवर्तमाने तद्व्याप्तमाकाशविभाग-कर्तृत्वमपि निवर्तते । यथा वह्निव्यावृत्तौ धूमव्यावृत्तिः । आकाशविभागकर्तृत्वस्य द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागानारम्भ-कत्वस्य च सहभावमात्रं न व्याप्तिरिति चेत्? न, व्यभिचारानुपलब्धेः । ययोः क्वचिद्वयभिचारो दृश्यते तयोः सहभावमात्रम्, यथा वत्रे पार्थिवत्व लोह-साथ सम्बद्ध आकाशादि देशों के साथ विभाग को उत्पन्न नहीं करती, अतः अवयव उत्पन्न करती है । चूंकि यह नियम विभाग उत्पन्न होगा उस कारण की क्रिया दूसरे अवयव से ( अपने ) विभाग को ही है कि जिस कारण से आकाश के साथ अवयवों का से एक अवयव के दूसरे अवयव का विभाग उत्पन्न नहीं होगा, अत: एक अवयव में रहनेवाले जिस विभाग की उत्पत्ति जिस क्रिया से होगी, वह क्रिया ( एक अवयव में ) दूसरे अवयव से विभाग की ही उत्पादिका होगी, आकाशादि देशों के साथ विभाग की नहीं । अभिप्राय यह है कि जिस क्रिया में आकाशविभाग का कर्तृत्व है, उसमें विभाग का कर्तृत्व नहीं है ' यह उत्पादक संयोग ( अवयवद्वयसंयोग ) के विरोधी विभाग का उत्पादक संयोग के द्रव्य के उत्पादक संयोग के विरोधी अव्यभिचरित नियम है । सुतराम् द्रव्य के विरोधी विभाग का अनुत्पादकत्व, एवं द्रव्य के अनुत्पादक संयोग के उत्पादकत्व, ये दोनों परस्पर विरोधी धर्म हैं । अतः जहाँ द्रव्य के विरोधी विभाग का उत्पादकत्व उपलब्ध होता है, वहाँ द्रव्य के विरोधी विभाग का अनारम्भकत्व ( उससे स्वयं ) दूर हटते आरम्भक संयोग के हुए अपने से व्याप्त आकाश विभागकर्तृत्व को भी दूर हटा देता है । जैसे कि ( जलादि में ) वह्नि के प्रतिक्षिप्त होने के कारण धूम ( स्वयं ही जल से हट जाता है ) । ( प्र ० ) आकाश विभाग का कर्तृस, एवं द्रव्य के उत्पादक संयोग के विरोधी विभाग का अनारम्भकत्व, ये दोनों एक आश्रय में केवल रहते भर हैं, ( इसका यह अर्थ नहीं कि ) दोनों में परस्पर व्याप्ति सम्बन्ध भी है । ( उ ० ) ( यह कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि उक्त दोनों धर्मों में कहीं व्यभिचार उपलब्ध नहीं है, ( समानाधिकरण ) जिन दो धर्मों में से एक दूसरे के बिना भी उपलब्ध होता हैं, उन दोनों धर्मों के लिए कह सकते हैं कि वे केवल एक आश्रय में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-sara कर्मावयवान्तरादेव विभागमारभते, ततो विभागाच्च द्रव्यारम्भक-संयोगविनाशः । तस्मिन् विनष्टे कारणाभावात् कार्याभाव इत्यवयवि-दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न नहीं करती, अतः अवयव में रहने-वाली क्रिया उसमें दूसरे अवयव से ही विभाग को उत्पन्न करती है । इसके बाद ( अवयवी ) द्रव्य के उत्पादक संयोग का नाश होता है । उसके विनष्ट हो जानेपर ( असमवायि ) कारण के अभाव से ( अवयवी द्रव्य न्यायकन्दली लेख्यत्वयोः, सत्यपि पार्थिवत्वे काष्ठादिषु लोहलेख्यत्वात् । न तु व्योमविभाग-कर्तृत्वस्य विशिष्ट विभागानुत्पादकत्वस्य च व्यभिचारो दृश्यते । अदृश्यमानोऽपि कदाचिदयं भविष्यतीत्याशङ्कयेत यद्यनयोः शिष्याचार्ययोरिवोपाधिकृतः सहभावः प्रतीयेत । न चैवमप्यस्ति, उपाधीनामनुपलम्भात् । यद्यप्रतीतव्यभिचारो निरुपाधिकः सहभावो न व्याप्तिहेतुरित्यग्निधूमयोरपि व्याप्तिर्न स्यादित्यु -च्छिन्नदानों जगत्यनुमान वार्ता । यद्यवयवकर्मणावयवान्तराद् विभागः क्रियते नाकाशादिदेशात्, ततः किं सिद्धम्? तत्राह - विभागाच्च द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः । आकाश-रहते हैं, उनमें परस्पर व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है । जैसे कि काष्ठादि ( रूप एक आश्रय ) में पार्थिवत्व और लोहलेख्यत्व ( लोहे से लिखने पर चिह्न पड़ जाना ) दोनों के रहते हुए भी वज्रादि पत्थरों में ( पार्थिवत्व के रहते हुए भी ) लौहलेख्यत्व के न रहने के कारण, उन दोनों धर्मों के प्रसङ्ग में यह कहा जाता है कि पार्थिवत्व और लौहलेख्यत्व दोनों धर्म एक आश्रय में केवल रहते हैं, किन्तु उन दोनों में व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है | किन्तु आकाशविभाग का कर्तृत्व तथा द्रव्य के उत्पादक संयोग के विरोधी विभाग का अनुत्पादकत्व इन दोनों में से कोई एक को छोड़कर कहीं नहीं देखा जाता है । व्यभिचार के उपलब्ध न होने पर भी उक्त दोनों धर्मों में इस प्रकार के व्यभिचार की शङ्का हो सकती थी कि कदाचित् ये दोनों भी व्यभिचरित हों, अगर शिष्य और आचार्य सम्बन्ध की तरह उनमें भी उपाधिमूलकत्व की उपलब्धि होती । किन्तु वह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रकृत में कोई उपाधि भी उपलब्ध नहीं है, अगर उपाधि से रहित जिस सामानाधिकरण्य में व्यभिचार उपलब्ध न हो, वह भी अगर व्याप्ति का प्रयोजक न हो तो फिर वह्नि और धूम में भी व्याप्ति नहीं होगी । इस प्रकार संसार से अनुमान की बात ही उठ जाएगी । अगर अवयव की क्रिया से दूसरे अवयव से ही उसका विभाग उत्पन्न हो, आका-शादि देशों से नहीं, तो फिर इससे क्या सिद्ध होता है? इसी प्रश्न के उत्तर में यह वाक्य लिखा गया है कि ' विभागाच्च पूर्व संयोगनाशः । अभिप्राय यह है कि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ४७ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३६६ प्रशस्तपादभाष्यम् , न्यायकन्दली For Private And Personal विनाशः । यदा कारणयोर्वर्तमानो विभागः कार्य विनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्र वावयवमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्ता -दाकाशादिदेशाद् विभागमारभते न निष्क्रियस्य, कारणाभावादुत्तरसंयोगा-रूप ) कार्य का ( अभाव ) नाश होता है । उस समय ( विभाग के आश्रय और विभाग के अवधि रूप ) दोनों अवयवों में विद्यमान क्रिया कार्य से संयुक्त आकाशादि देशों के साथ क्रिया से युक्त अवयवों के ही विभाग को उत्पन्न करती है । ( यह दूसरी बात है कि ) उसे इस विभाग के उत्पादन में कार्य के नाश से युक्त काल या आश्रयीभूत अवयव के साहाय्य की भी विभागकर्तृत्वे विशिष्टविभागानुत्पादाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशो न भवे-दित्यर्थः । संयोगविनाशे किं स्यादत आह- तस्मिन्निति । संयोगेऽसमवायि-कारणे तस्मिन्नष्टे कारणस्याभावात् कार्याभाव इति न्यायादवयविनो विनाशः। अवयविद्रव्ये नष्टे कि स्यादत आह - तदेति । द्रव्ये विनष्टे तत्कारणयोरवयवयोर्वर्तमानो विभाग: कार्यविनाशेन विशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वा अवयवमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्तादा-काशादिदेशाद् विभागमारभते । यावत् कार्यद्रव्यं न विनश्यति, तावदवयवस्य स्वातन्त्र्यम् । पृथग्देशगमने योग्यता नास्तीत्यवयवदेशाद् विभागो न घटते, तदर्थमुक्तं कार्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वावयवमपेक्षते । कारणयोर्वर्त-( अवयव की क्रिया में ) आकाश विभाग का भी कर्तृत्व अगर मान ले तो फिर उससे ( अवयवी के नाशजनक ) विशेष प्रकार के विभाग की उत्पत्ति नहीं होगी । फलतः ( अवयवी ) द्रश्य के उत्पादक संयोग का विनाश नहीं होगा । दोनों अवयवों के संयोग के विनाश से कौन सा कार्य होगा? ( जिसके न होने का आपने भय दिखलाया है ) । इसी प्रश्न का समाधान ' तस्मिन् ' इत्यादि से कहा गया है । ' तस्मिन्नष्टे ' अर्थात् ( अवयवी के ) असमवायिकारण रूप उस संयोग के नष्ट होनेपर ' कारण के अभाव से कार्य का अभाव ' इस न्याय से अवयवो का नाश होगा | अवयवी रूप द्रव्य के नाश होनेपर क्या होगा? इस प्रश्न का समाधान ' तदा ' इत्यादि पङ्क्ति से कहा गया है । अर्थात् ( अवयव-रूप द्रव्य के नष्ट हो जाने पर उसके कारणीभूत दोनों अवयवों में रहनेवाला विभाग ) क्रिया से युक्त अवयवों का ही आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करता है । उस विभाग ) को इस विभाग के उत्पादन में ( अवयविरूप ) कार्य के नाश से युक्त काल, स्वतन्त्र रूप से केवल अवयव, इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य अपेक्षित होता 1 अवयवरूप कार्यद्रव्य के विनष्ट हुए बिना उसके अवयवों में स्वतन्त्र रूप से दूसरे देश में जाने की योग्यता नहीं आती ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-नुत्पत्तावनुपभोग्यत्वप्रसङ्गः । न तु तदवयवकर्माकाशादिदेशाद् विभागं अपेक्षा होती है, अथवा स्वतन्त्ररूप से ही वह उक्त विभाग को उत्पन्न करती है । निष्क्रिय अवयवों में वह विभागों को उत्पन्न नहीं कर सकती, क्योंकि ( उसके बाद ) कारण के न रहने से उत्तर देश के साथ संयोग की न्यायकन्दली मानो विभागः सक्रियस्यैव विभागं करोतीत्यत्र को हेतुरिति चेत्? अत आह— न निष्क्रियस्य कारणाभावादिति । विभागाद् विभागोत्पत्तौ कर्मापि निमित्त -कारणम्, तस्याभावान्न निष्क्रियस्य विभागः । अत्रैवार्थे युक्त्यन्तरमाह-उत्तरसंयोगानुत्पत्तावनुपभोग्यत्वप्रसङ्ग इति । क्रिया हि प्राधान्येन उत्तर-संयोगार्थमुपजाता, देशान्तरप्राप्तेन द्रव्येण कस्यचित् पुरुषार्थस्य सम्पादनात् । तत्र यदि सक्रियस्यावयवस्य कार्यसंयुक्तादाकाशादिदेशाद् विभागो न भवति, तदा पूर्वसंयोगस्य प्रतिबन्धकस्यानिवृत्तेरुत्तरसंयोगानुत्पत्तौ सानुपभोग्या निष्प्रयोजना स्यात् । न चैतद्युक्तम् । तस्मात् सक्रियस्यैव विभाग इत्यर्थः । अ ara क्रिययोः अवयवविभागसमकालमाकाशादिविभागकर्तृत्वं नोपपद्यत इति । मा कार्षीदियं युगपद्विभागद्वयम् क्रमकरणे तु को विरोधो येन विभाग-अत: ( दूसरे ) अत्रयव देश से ( उस समय तक ) विभाग नहीं हो सकता । इसीलिए कहा गया है कि ' काल ' ( काल और अवयव ) अथवा स्वतन्त्र रूप से ( केवल ) अवयव की अपेक्षा रखता है । इसमें क्या कारण है कि कारणीभूत दोनों अवयवों में रहनेवाला विभाग, क्रिया से युक्त द्रव्य के ही विभाग को उत्पन्न करता है? इस प्रश्न के समाधान के लिए ही ' न निष्क्रियस्य कारणाभावात् ' यह वाक्य लिखा गया है । विभाग से जो विभाग की उत्पत्ति होती है, उसमें क्रिया भी निमित्तकारण है । क्रिया के न रहने से ही निष्क्रिय द्रव्य में विभाग नहीं होता । इसी में दूसरी युक्ति उत्तरसंयोगानुत्सत्तावनु-पभोग्यत्वप्रसङ्गः ' इस वाक्य के द्वारा दिखायी गयी है । उत्तर देश के साथ संयोग ही क्रिया की उत्पत्ति का मुख्य प्रयोजन है, क्योंकि दूसरे ( उत्तर ) देश में प्राप्त द्रव्य के द्वारा ही वह पुरुष के किसी प्रयोजन का सम्पादन करतो | अभिप्राय यह है कि अगर क्रिया के द्वारा उससे युक्त अवयवरूप द्रव्य का कार्य ( अवयवी ) द्रव्य से संयुक्त आकाशादि देशों से विभाग उत्पन्न न हो, एवं ( अवयवी के ) प्रतिबन्धक पहिले ( दोनों अवयवों के ) संयोग का विनाश भी न हो तो फिर क्रिया ' अनुपभोग्या ' अर्थात् प्रयोजन से रहित ( व्यर्थ ) हो जाएगी । किन्तु सो उचित नहीं है, अतः सक्रिय द्रव्य का ही विभाग होता है । अर्थात् दोनों अवयवों की दोनों क्रियाओं सेजिस समय दोनों अवयवों का विभाग उत्पन्न होगा, उसी समय क्रियाओं से अवयवों के आकाशादि देशों के साथ विभाग की उत्पत्ति उचित नहीं है । ( प्र ० ) अवयवों की वे दोनों क्रियाये For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] " भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३७१ करोति, तदारम्भकालातीतत्वात् । प्रदेशान्तरसंयोगं तु करोत्येव, उत्पत्ति नहीं होगी, जिससे विभाग की उत्पत्ति ' अनुपभोग्य ' अर्थात् निष्प्र-योजन हो जाएगी । अवयव की क्रिया आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न नहीं करती, क्योंकि उसके उत्पादन का काल ही बीत गया रहता है । किन्तु दूसरे प्रदेशों के साथ संयोग को अवश्य उत्पन्न करती है, क्योंकि न्यायकन्दली जनने दृष्टसामर्थ्यामिमां परित्यज्यादृष्टसामर्थ्यस्य विभागस्य विभागहेतुत्व-माश्रीयते? इत्यत्राह - न तु तदवयवकर्माकाशादिदेशाद् विभागं करोति, तदा-रम्भककालातीतत्वात् । एवं हि कर्मणः स्वभावो यत् तदसमवायिकारणतया विभागमारभमाणं स्वोत्पत्त्यनन्तरक्षण एवारभते, न क्षणान्तरे, स च तस्य विभागारम्भकालो द्वितीयभागोत्पत्तिकालेऽतीत इति न तस्मादस्योत्पत्तिः । नन्वेवमुत्तरसंयोगमपि कुतः करोति? अनेकक्षणव्यवधानात्, अत आह— प्रदेशान्तरसंयोगं करोतीति । यथा कर्मणः स्वोत्पादानन्तरक्षणो विभागारम्भ-कालस्तथा पूर्वसंयोगनिवृत्त्यनन्तरक्षण: प्रदेशान्तरसंयोगारम्भकालः पूर्वदेशाव एक ही समय ( अवयवों के परस्पर विभाग और अवयवों का आकाशादि देशों के साथ विभाग इन ) दोनों विभागों को उत्पन्न न भी कर सकें, फिर भी वे ही क्रियायें क्रमशः उन दोनों विभागों को उत्पन्न कर सकती हैं. इसमें तो कोई विरोध नहीं है । चूंकि जिस ( क्रिया ) में विभाग को उत्पन्न करने का सामर्थ्य उपलब्ध है, उसे छोड़कर जिस ( विभाग ) में विभाग को उत्पन्न करने का सामर्थ्य दीख नहीं पड़ता है, उसमें विभाग की कारणता स्वीकार करते हैं? इसी प्रश्न का उत्तर न तु तदवयवकर्माकाशादिदेशा-द्विभागं करोति तदारम्भकालातीतत्वात् इस वाक्य से दिया गया है । क्रिया का यह स्वभाव है कि जिस विभाग का वह असमवायिकारण होगी, उसे अपनी उत्पत्ति के अव्यवहित उत्तर क्षण में ही उत्पन्न करेगी, आगे के क्षणों में नहीं । वही ( उक्त अव्यव-हितोत्तर ) क्षण इसका आरम्भकाल है । यह काल द्वितीय विभाग ( विभागजविभाग ) की उत्पत्ति के समय बीत जाता है, अतः क्रिया से इस ( विभागजविभाग ) की उत्पत्ति नहीं होती । ( अगर दोनों अवयवों की क्रिया का आरम्भकाल उसका अव्यवहित उत्तर क्षण हौ है तो फिर ) कुछ क्षणों के बाद वही क्रिया उत्तर संयोग को कैसे उत्पन्न करती है? इसी प्रश्न का समाधान ' प्रदेशान्तरसंयोगं करोति ' इस वाक्य से दिया है । अर्थात् जिस प्रकार क्रिया का अव्यवहित उत्तर क्षण विभाग के उत्पादन का उपयुक्त समय है, उसी प्रकार पूर्वसंयोग ( दोनों अवयवों के संयोग ) के नाश का अव्य-वहित उत्तर क्षण ही उस दूसरे प्रदेशों के साथ संयोग ( उत्तरसंयोग ) के उत्पादन का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् अकृतसंयोगस्य कर्मणः कालात्ययाभावादिति । [ गुणे विभाग-कारणाकारण विभागादपि कथम् १ यदा हस्ते कर्मोत्पन्न -संयोग को उत्पन्न करनेवाली क्रिया का काल तब तक नहीं बीता रहता है, जब तक कि वह संयोग को उत्पन्न न कर दे । ( प्र ० ) कारण और अकारण के विभाग से ( कारणाकारण विभाग-जनित ) विभाग की उत्पत्ति कैसे होती है? ( उ ० ) जिस समय हाथ में उत्पन्न न्यायकन्दली स्थितस्य द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तेरसम्भवात् । तस्य च संयोगारम्भकालस्यात्ययोऽति-क्रमोन भूतः, तदानों हि कालोऽयमतिक्रान्तः स्याद् यदि कर्मणा प्रदेशान्तरसंयोगः कृतो भवेन्न त्वेवम्; तस्मादकृतसंयोगस्य कर्मणो यः संयोगारम्भकालस्तस्यात्ययाभावात् कर्म संयोगं करोति, न विभागम् । तेन चेदयं न कृतोऽन्यस्यासम्भवादसमवायि-कारणेन विना च वस्तुनोऽनुत्पादादेकार्थसमवेतो विभागोऽस्य कारणमित्य-वतिष्ठते । इतिशब्दः प्रक्रमसमाप्तौ विभागं एवं कारणविभागपूर्वकं विभागं प्रतीत्य कारणाकारणविभागपूर्वकं प्रत्येतुमिच्छन् पृच्छति - कारणाकारण विभागादपि! कथमिति उपयुक्त समय है, एक देश में रहते हुए द्रव्य का दूसरे देश के है | ( अतः ) इस ( उत्तर ) संयोगोत्पादन के समय का नहीं हुआ है । इस संयोग के काल का अतिक्रमण तब होता उत्तर देश संयोग का उत्पादन हो गया होता । किन्तु सो नहीं साथ संयोग सम्भव नहीं अत्यय ' अर्थात् अतिक्रम जब कि उस क्रिया से हुआ है, अतः जिस क्रिया ने जिस संयोग को जब तक उत्पन्न नहीं किया है तब तक उस क्रिया से उस संयोग के उत्पादन का काल नहीं बीता है । अत: क्रिया उत्तरदेश संयोग को उत्पन्न करने पर भी ( विभागज ) विभाग को उत्पन्न नहीं करती है । दोनों अवयवों के विभाग से अगर ( विभाग ) विभाग की उत्पत्ति न मानें, तो फिर उस ( विभागज ) विभाग का कोई दूसरा असमवायिकारण नहीं हो सकता । असमवायिकारण के न रहने पर ( सम-वेत ) कार्य की उत्पत्ति ही नहीं होती है । इससे सिद्ध होता है कि विभागजविभाग के आश्रयीभूत एक द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला ( दोनों अवयवों का ) विभाग ही उस ( पूर्व देश के साथ अवयवों के ) विभाग का असमवायि ) कारण है । ' इति ' शब्द प्रसङ्ग की समाप्ति का बोधक है । इस प्रकार कारण ( मात्र ) के विभाग से उत्पन्न विभाग ( विभागजविभाग ) को समझा कर कारण और अकारण के विभाग से उत्पन्न होने वाले ( विभागज ) विभाग को समझाने के अभिप्राय से ' कारणाकारण विभागादपि कथम्? ' इस वाक्य के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३७३ मवयवान्तराद् विभागम कुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरे संयोगानारभते, तदा ते कारणाकारणविभागाः, कर्मयां कर्म दिशं प्रति कार्यारम्भाभिमुखं तामपेक्ष्य कार्याकार्य विभागानारभन्ते तदनन्तरं कारणाकारणसंयोगाच्च कार्याकार्य संयोगानिति । हुई क्रिया शरीर के दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करती हुई आकाशादि देशों के साथ विभागों को उत्पन्न करने के बाद ( उत्तर देश ) उत्पन्न करती संयोगों को है, उस समय के वे विभाग ( शरीर के ) कारण ( अवयव ) और ( शरीर के ) अकारण के विभाग हैं । क्रिया जिस दिशा में ( उत्तरसंयोगरूप ) कार्य को करने के लिए उत्सुक रहती है, उसी दिशा के साहाय्य से वे ( कारण और अकारण के विभाग ) कार्य और अकार्य के विभागों को उत्पन्न करते हैं । इसके बाद ( वे ही कारण और अकारण के विभाग ) कारणों और अकारणों के संयोगों के साहाय्य से उन कारणों से उत्पन्न कार्य द्रव्यों और उनसे अनुत्पन्न अकार्य द्रव्यों में संयोगों को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली उत्तरमाह - यदेत्यादिना । हस्ते कुतश्चित् कारणात् कर्मोत्पन्नं तस्य हस्तस्या-वयवान्तराद् विभागमकुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरैः सह यदा संयोगानारभते तदा ते कारणाकारणविभागाः शरीरकारणस्य हस्तस्याकारणा-नामाकाशादिदेशानां विभागाः कर्म च यस्यां दिशि कार्यारम्भाभिमुखं कर्मणा यत्रोत्तरसंयोगो जनयितव्यः, तां दिशमपेक्ष्य, कार्याकार्यविभागान् हस्तकार्यस्य शरीरस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां विभागानारभन्ते । यतः कुड्यादि-देशाद्धस्तस्य विभागः, ततः शरीरस्यापि विभागो दृश्यते । न चायं शरीरक्रियाकार्यः, द्वारा प्रश्न किया गया है । ' यदा ' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं । हाथ में जिस किसी कारण से उत्पन्न हुई क्रिया शरीर के अवयवों में विभागों को उत्पन्न न कर, जिस समय हाथ में आकाशादि ( पूर्व ) देशों के साथ विभागों को उत्पन्न कर, उत्तर प्रदेशों के साथ हाथ के संयोग का उत्पादन करती है, उस समय के वे ( हाथ का आकाशादि पूर्व देशों से ) विभाग ' कारणाकारणविभाग ' हैं, अर्थात् शरीर के ' कारण ' हाथ और ' अकारणीभूत ' आकाशादि प्रदेश, इन दोनों के विभाग हैं । क्रिया जिस दिशा में कार्य को उत्पन्न करने को उत्सुक रहती है, अर्थात् क्रिया से जिस देश में उत्तर संयोग उत्पन्न होता उस दिशा के साहाय्य से ही क्रिया, कार्य और अकार्य के, अर्थात् हाथ के कार्य शरीर का उसके अकार्य आकाशादि प्रदेशों के साथ विभागों को उत्पन्न करती है । चूंकि दीवाल प्रभृति देशों से हाथ का विभाग होने पर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे विभाग-तदानीं शरीरस्य निष्क्रियत्वात् । नापि हस्तक्रियाकार्यो भवितुमर्हति व्यधिकरणस्य कर्मणो विभागहेतुत्वादर्शनात् । अतः कारणाकारण विभागस्तस्य कारण-मिति कल्प्यते । आकाशादावित्यादिपदं समस्त विभुद्रव्यावरोधार्थम् । अत एव विभागानिति बहुवचनम्, तद्विभागानां बहुत्वात् । अत्राहुरेके - कुड्यादिदेशाद्धस्तशरीरविभागयोर्युगपद्भावप्रतीतेस्तयोः कार्य-कारणभावाभिधानं प्रत्यक्षविरुद्धमिति 1 तदसङ्गतम्, हस्तविभागका शरीरविभागोत्पत्तिकारणाभावात् । न चासति कारणे कार्योत्पत्तिरस्ति, हस्तक्रिया च न कारणमित्युक्तम् । तस्मात् तयोर्युगपदभिमानो स्रान्तः । अनुमानगम्यः क्रमभावः, प्रत्यक्षसिद्धं च यौगपद्यम्, प्रत्यक्षे च परिपन्थि -न्यनुमानस्योत्पत्तिरेव नास्ति, अबाधितविषयत्वाभावात् । कथं तदनुरोधात् प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमिति चेत्? उत्पलपत्रशतव्यतिभेदेऽपि कुतोऽनुमानप्रवृत्तिः? प्रत्यक्षविरोधात् । अथ मन्यसे तत्र प्रत्यक्षविरोधादनुमानं नोदेति, यत्रानेन शरीर का भी उससे विभाग देखा जाता है । यह ( शरीर और दीवाल का विभाग शरीर की ) क्रिया से उत्पन्न नहीं होता है, क्योंकि शरीर उस समय निष्क्रिय रहता है । हाथ की क्रिया से वह ( शरीर और दीवाल का ) विभाग उत्पन्न नही हो सकता, क्योंकि एक आश्रय में रहने-वाली क्रिया से उस आश्रय रूप देश से भिन्न देशों में विभाग की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है । अतः यह कल्पना करते हैं । ( शरीर के ) कारण हाथ और अकारणीभूत प्रदेशों का विभाग ही उस विभाग का कारण है । ' आकाशादि ' शब्द में प्रयुक्त ' आदि ' शब्द सभी विभु द्रव्यों का संग्राहक है । इसी कारण ' विभागान् ' यह बहुवचनान्त प्रयोग भी है, क्योंकि उनके विभाग भी बहुत हैं । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि ( ५० शरीर दोनों के साथ, दोनों विभागों की दोनों विभागों में से एक को कारण मानना है | ( उ ० ) किन्तु यह ठीक नहीं है, उत्पन्न होता है उस समय दीवाल से नहीं रहता है । कारणों के न रहने से कार्यों की उत्पत्ति ) दीवाल प्रभृति देशों का, हाथ और प्रतीति एक ही समय होती है । अतः उन और दूसरे को कार्य मानना प्रत्यक्ष के विरुद्ध क्योंकि जिस समय दीवाल से हाथ का विभाग शरीर के विभाग की उत्पत्ति होने का कारण सम्भव नहीं है । पहिले विभाग ) का कारण नहीं कह चुके हैं कि हाथ की क्रिया उस ( दीवाल और शरीर के है । अतः यह कहना भ्रान्त, अभिमान ( मूलक ) ही है कि हाथ एवं शरीर दोनों से ( दीवाल प्रभृति का ) एक ही समय दो विभाग उत्पन्न होते हैं । ( ० ) उक्त दोनों विभागों का एक समय में उत्पन्न होना प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है एवं उन दोनों विभागों का क्रमशः उत्पन्न होना अनुमान से सिद्ध होता है । प्रत्यक्ष से विरुद्ध अनुमान की उत्पत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि अनुमान के विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा बाधित न होना आवश्यक है । तो फिर अयोगपद्य के अनुमान से यौगपद्य के प्रत्यक्ष For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ३७५ विषयस्य बाधो निश्चितः स्यात् । इह त्वसौ सन्दिग्धः, पत्रशतव्यतिभेदस्याशु-भावित्वेनापि निमित्तेन atra ग्राहकस्य प्रत्यक्षस्य प्रवृत्तेः सम्भवात् । अस्ति च सर्वलोकप्रसिद्धम् ' अतिदृढमव्यवहिता सूची भिनत्ति, न व्यवहितम् ' इति व्याप्तिग्राहकं प्रमाणम् । अतस्तत्सामर्थ्यात् प्रत्यक्षे संभवत्यपि भवत्य-नुमानस्योदय इति । एवं चेदत्र व्यधिकरणा क्रिया विभागं न करोतीति व्याप्तिग्राहकस्य प्रमाणस्यातिदृढत्वात् प्रत्यक्षस्य चान्यथाप्युपपत्तेः सुस्थितं क्रमानुमानम् । अत एव चानेन प्रत्यक्षस्य बाधः । इदं हि सविषयम् । निर्विषयं च प्रत्यक्षम्, आशुभावित्वमात्रेण प्रवृत्तेः । यच्च सविषयं तत् तथात्वेनावस्थितस्य विषयस्य साहाय्यप्राप्त्या सबलम्, दुर्बलं च निर्विषयमसहायत्वात् । व्याप्ति-ग्राहकेणैव प्रत्यक्षेण हि बाधो यदनुमानेन प्रत्यक्षस्य बाधः । तथा च दिङ्-मोहादिष्वनुमानमेव बलवदिति मन्यन्ते वृद्धाः भवति वै प्रत्यक्षादप्यनुमानं बलीय: ' इति वदन्तः । वह्नावुष्णत्वग्ग्राहिणः प्रत्यक्षस्य तु नान्यथोपपत्तिरस्तीति का भ्रान्तिरूप होना किस प्रकार सम्भव है? | ( उ ० ) तो फिर ' कमल के सौ पत्तों का छेदन क्रमशः ही होता है ' इस क्रमानुमान को निष्पत्ति किस प्रकार होगी? क्योंकि वहाँ भी तो प्रत्यक्ष का विरोध है । अगर यह मानें कि ( प्र ० ) वहीं प्रत्यक्ष के विरोध से अनुमान की प्रवृत्ति रोकी जाती है, जहाँ उनके विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा बाधित होना निश्चित हो । अनुमान के विषय कमल के पत्तों के क्रमशः छेदन का प्रत्यक्ष के द्वारा बाध सन्दिग्ध है, क्योंकि सौ पत्तों का छेदन अतिशीघ्रता से क्रमशः होने से भी योगपद्य ( एक ही समय उत्पन्न होने ) के ग्राहक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति हो सकती है । ' सूई अगर किसी से व्यवहित न रहे तो अतिदृढ़ वस्तु का भी भेदन करती है, एवं व्यवहित होने पर नहीं ' यह सर्वजनीन अनुभव ही उक्त क्रमानुमान के कारणी-भूत ) व्याप्ति का निश्चायक है । अतः इस व्याप्ति के बल से विरोधी प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति रहने पर भी अनुमान का उदय होता है । ( उ ० ) तो फिर प्रकृत में भी ' एक अधिकरण में रहनेवाली क्रिया दूसरे अधिकरण में विभाग को उत्पन्न नहीं करती है ' व्याप्ति का यह प्रमाण अत्यन्त दृढ़ है | एवं उक्त योगपद्य प्रत्यक्ष को उपपत्ति और प्रकार से भी हो सकती है । अतः ( दीवाल से हाथ का विभाग एवं दीवाल से शरीर का विभाग इन दोनों के ) क्रमशः होने का अनुमान सुस्थिर है । अत एव इस अनुमान से प्रत्यक्ष का बाध होता है, क्योंकि यह ( अनुमान ) सविषयक i यथार्थ ) है, और प्रत्यक्ष निर्विषयक ( भ्रम ) है । केवल दोनों के अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण ही यौगपद्य में प्रवृत्ति है । सविषयक ( यथार्थ ) ज्ञान उस ( ज्ञान के द्वारा प्रकाशित ) रूप से यथार्थतः विद्यमान वस्तु की सहायता प्राप्त होने के कारण बलवान् है । निर्विषयक ( अयथार्थ ) ज्ञान उससे दुर्बल है, क्योंकि वह असहाय है । अनुमान से प्रत्यक्ष का यह बाध वस्तुतः व्याप्ति के ग्राहक प्रत्यक्ष के द्वारा ही किया जाता है । अत एव ' कहीं For Private And Personal