प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 451–460
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 451–460
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३७६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे विभाग-तेनावधारित विषयस्य बाधे नास्त्यनुमानस्य प्रवृत्तिः । किमर्थं पुनर्ज्ञानयो-बध्यबाधकभावः कल्प्यते, समाने विषये तयोंविरोधात् । एकमेव तद्वस्तु किञ्चिद्रजतमित्येवं बोधयति शुक्तिकेयमिति चापरम् । शुक्तिकात्वरजतत्वयोश्च नैकत्र संभवः, सर्वदा तयोः परस्परपरिहारेणावस्थानोपलम्भात् । अतो विषय-विरोधात् तद्विज्ञानयोरपि विरोधे सति बाध्यबाधकभावकल्पनम् । को बाधः? विषयापहारः । ननु रजतज्ञानावभासितो धर्मी तावदुत्पन्नेऽपि ज्ञानान्तरे तदवस्थ एव प्रतिभाति, रजतत्वं नास्त्येव, किमपह्रियते? सम्बन्ध-वियोजनस्यापहारार्थत्वात् । विज्ञाने प्रतिभातं तदिति चेत्? सत्यं प्रतिभातं न तु प्रतिभातं शक्यापहारम् भूतत्वादेव । नहि प्रतिभासितोऽर्थोऽप्रतिभासितो भवति, वस्तुवृत्या रजतमविद्यमानमपि ज्ञानेन तत्र विद्यमानवदुपदशतम् । तस्य अनुमान से भी प्रत्यक्ष दुर्बल होता है ' यह कहते हुए वृद्ध लोग दिग्भ्रम स्थल में प्रत्यक्ष से अनुमान को ही बलबान् मानते हैं । वह्नि में उष्णत्व के ग्राहक प्रत्यक्ष प्रमाण से अनुमान को दुर्बल मानते हैं । चूंकि वह्नि में उष्णत्व के ग्राहक प्रत्यक्ष प्रमाण की किसी और प्रकार से उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः प्रत्यक्ष से निश्चित उष्णत्व रूप विषय का बाध रहने के कारण ( वह्नि में अनुष्णत्व विषयक ) अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है | ( प्र ० ) यह कल्पना ही क्योंकरते हैं कि एक ज्ञान बाध्यहै और दूसरा एक ही वस्तु बाधक? ( उ ० ) चूँकि समान विषय के दो ज्ञानों में विरोध रहता है । को कोई रजत समझता है कोई सीप, किन्तु शुक्तिकात्व और रजतत्व दोनों एक आश्रय मैं नहीं रह सकते, क्योंकि दोनों की प्रतीति बराबर एक को छोड़कर ही होती है, ( कभी समानाधिकरण रूप से नहीं ), अतः दोनों विषयों में विरोध ( सहानवस्थान ) के कारण दोनों के ज्ञानों में भी विरोध होता है । इसीसे एक में बाधकत्व और दूसरे में बाध्यत्व की कल्पना भी की जाती है । ( प्र ० ) बाध कौन सी वस्तु है? ( उ ० ) विषयों का अपहरण ही ज्ञानों का बाघ है | ( प्र ० ) ( शुक्तिका में ) यह रजत है ' इस आकार के ज्ञान से प्रकाशित होनेवाली शुक्तिका रूप धर्मी, शुक्तिका में ' यह शुक्तिका है ' इस आकार के बाधक ज्ञान के उत्पन्न होनेपर भी ज्यों का त्यों प्रतिभासित होता है, और रजतत्व तो शुक्तिका में है ही नहीं, तो फिर ( ' यह शुक्तिका है, रजत नहीं ' इत्यादि आकार के ) बाधक ज्ञान किन विषयों का अपहरण करते हैं । ( उ ० ) बाधक ज्ञान से ( ज्ञान में भासित होनेवाले धर्मी और धर्म के ) सम्बन्ध का अपहरण होता है । ( प्र ० ) वह ( सम्बन्ध ) भी तो ( शुक्तिका में ' यह रजत है ' इस ) विज्ञान में प्रतिभासित है ही । ( उ ० ) अवश्य ही सम्बन्ध भी उक्त ज्ञान में प्रतिभासित होता है, क्योंकि प्रतिभान ( ज्ञान ) का तो अपहरण हो नहीं सकता, क्योंकि ज्ञान की यथार्व में सत्ता है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ४८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३७७ न्यायकन्दली For Private And Personal ज्ञानप्रसञ्जितस्य साक्षाद्विरोधिप्रतिपादनमेव वियोजनमिति चेद्रजताभावे प्रति-पादिते रजतज्ञानस्य का क्षतिरभूत्? न ह्यस्य रजतस्थितिकरणे व्यापारः, अपि त्वस्य-प्रकाशने, तच्चानेन जायमानेन कृतमिति पर्यवसितमिदं किं बाध्यते? रजताभाव-प्रतीत पूर्वोपजातस्य रजतज्ञानस्य अयथार्थतास्वरूपं प्रतीयते इत्येषा क्षतिरभूत् । नन्वेवं फलाहार एव बाधः, अयथार्थतावगमे सति ज्ञानस्य व्यवहारानङ्ग-त्वात् । मैवम् । फलापहारस्य विषयापहारनान्तरीयकत्वात् । न तावज् ज्ञानस्य सर्वत्र फलनिष्ठता, तस्य पुरुषेच्छाधीनस्यानुपजननेऽप्युपेक्षासंवित्तः पर्यवसानात् । यत्रापि फलार्थिता, तत्रापि फलस्य विषयप्रतिबद्धत्वाद्विषयस्य ज्ञानप्रतिबद्धत्वा-द्विषयापहार एव ज्ञानस्य बाधो न फलापहार:, तस्य विषयापहारनान्तरीय-कत्वादिति कृतं ग्रन्थविस्तरेण संग्रहटीकायाम् । विभागजविभागानन्तरभावित्वात् पूर्वं प्रतिज्ञातं चिरोत्पन्नस्य च संयोगज-संयोगं प्रतिपादयति - तदनन्तरमिति । तस्माद्विभागजविभागादनन्तरं शरीर-प्रतिभासित विषय अप्रतिभासित नहीं हो सकते । ( प्र ० ) वस्तुओं के स्वभाव के कारण ( शुक्तिका स्थल में ) अविद्यमान रजत भी शुक्तिका के अधिकरण में ( इदं रजतम् ) इस ज्ञान के द्वारा विद्यमान के समान दिखाई देता है । अगर ज्ञान से उत्थापित रजत के साक्षात् विरोध के प्रतिपादन को ही उक्त ' विरोध ' कहें तो फिर शुक्तिका के अधिकरण में रजत का अभाव प्रतिपादित होने पर भी उक्त ( भ्रमात्मक ) रजतज्ञान की क्या क्षति हुई? इस ज्ञान का इतना ही काम है कि वह रजत को प्रकाशित करे, रजत की स्थिति का ज्ञान उसका काम नहीं है । रजत के प्रकाशन का अपना काम तो वह उत्पन्न होते ही कर दिया है, तो फिर उस ज्ञान से बाध किसका होता है? ( उ ० ) रजत के अभाव की प्रतीति होने पर पहिले शक्तिका के अधिकरण में रजत के ) ज्ञान में जो अयथार्थत्व की प्रतीति होती है, बाधक ज्ञान से बाध्यज्ञान की यही क्षति है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो ' फल ' का अपहरण ही बाघ है, क्योंकि अयथार्थता का ज्ञान होने पर, वह ज्ञान फिर वह व्यवहार का अङ्ग नहीं रह जाता । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योकि विषयापहरण के विना फल का अपहरण हो ही नहीं सकता । सभी जगह ज्ञान ' फलनिष्ठ ' अर्थात् फल का उत्पादक नहीं होता, क्योंकि पुरुष की इच्छा के अनुसार फल की उत्पत्ति न होने पर वह ( ज्ञान ) उपेक्षाज्ञान में परिणत हो जाता है । जहाँ पर ज्ञान फल का उत्पादक होता भी है, वहाँ भी फल का सम्बन्ध विषय के साथ ही रहता है और विषय का सम्बन्ध ज्ञान के साथ रहता है, अतः विषय का अपहरण ही बाध है, फल का अपहरण नहीं, क्योंकि फल का अपहरण विषय के अपहरण के साथ नियमित है । ( इससे अधिक ) संग्रह रूप टीका ग्रन्थ में विस्तार करना व्यर्थ है । विभागजविभाग के बाद उत्पन्न होने के कारण एवं पूर्व में प्रतिज्ञात होने के कारण चिरकाल से उत्पन्न द्रव्यों के संयोगजसंयोग का प्रतिपादन ' तदनन्तरम् ' इत्यादि
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३७८ यदि न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् कारण विभागानन्तरं [ गुणे विभाग-कार्य विभागोत्पत्तिः, कारणसंयोगानन्तरं कार्य संयोगोत्पत्तिः । नन्वेवमवयवावयविनोर्युत-सिद्धिदोषप्रसङ्ग इति । न, युत सिद्ध्यपरिज्ञानात् । सा पुनर्द्वयो-( प्र ० ) अगर कारण विभाग की उत्पत्ति के बाद कार्य विभाग की उत्पत्ति होती है, एवं कारण संयोग के बाद कार्य संयोग की उत्पत्ति होती है, तो फिर अव-यव और अवयवी के युतसिद्धि की आपत्ति होगी? ( उ ० ) ( यह आपत्ति ) नहीं है, युतसिद्धि को न समझने के कारण ही ( आपने उक्त आपत्ति दी है ) न्यायकन्दली कारणस्य हस्तस्याकारणानामाकाशादिदेशानां संयोगात् कर्मजाद् हस्तकार्यस्य शरीरस्य निष्क्रियस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां संयोगानारभन्ते न हस्तक्रिया, तस्याः स्वाश्रयस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुत्वात् । इतिशब्दः प्रक्रमसमाप्ती । अत्र चोदयति - यदीति । कारणस्य हस्तस्य विभागानन्तरं यदि कार्यस्य शरीरस्य विभागस्तथा कारणस्य संयोगानन्तरं कार्यस्य संयोगो न तत्समकालम् । नन्वेवं सत्यवयवावयविनोर्युतसिद्धिः, पृथक्सिद्धिः परस्पर-स्वातन्त्र्यं स्यात् । एतदुक्तं भवति । यदि हस्ताश्रितं शरीरं तदा हस्ते गच्छति तदपि सहैव गच्छेत्, तथा सति च संयोगविभागक्रमो न स्यात्, क्रमेण चेदनयोः संयोगविभागौ न तदा हस्तगमने शरीरस्य गमनमिति तस्य स्वातन्त्र्यप्रसक्तिः । ग्रन्थ से किया जाता है । ( तत् ) ' तस्मात् ' अर्थात् विभागजविभाग के बाद, शरीर के ( समवायि ) कारणीभूत सक्रिय हाथ का आकाशादि देशों के साथ ( कर्मज ) संयोग से ही हाथ के कार्य शरीर का ( हाथ के ) अकार्य आकाशादि देशों के साथ संयोग उत्पन्न होता है, क्रिया से नहीं । क्योंकि क्रिया अपने आश्रय का किसी दूसरे के साथ संयोग काही कारण हो सकती है । यहाँ भी ' इति ' शब्द प्रसङ्ग की समाप्ति का ही बोधक है । ' यदि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा फिर से प्रश्न करते हैं कि अगर ' कारण ' अर्थात् हाथ के विभाग के बाद ' कार्य ' का अर्थात् शरीर का विभाग मानें, एवं कारण ( हाथ ) के संयोग के बाद कार्य ( शरीर ) का संयोग मानें ( अर्थात् एक ही समय कार्य और कारण के दूसरे देशों के साथ संयोग या विभाग न मानें क्रमश: हो मानें तो फिर अवयव और अवयवी इन दोनों की सिद्धि अर्थात् अलग अलग सिद्धियाँ माननी होंगी, फलतः दोनों की स्वतन्त्रता की आपत्ति होगी । अभिप्राय यह है कि अगर शरीर हाथ में आश्रित है, तो फिर हाथ के चलने पर शरीर भी उसके साथ ही चले, किन्तु तब संयोग और विभाग का कथित क्रम ठीक नहीं होगा । अर्थात् इन में अगर क्रमशः संयोग और विभाग हो, तो फिर हाथ के चलने से शरीर का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३७ ९ रन्यतरस्य वा पृथग्गतिमवमियन्तु नित्यानाम्, अनित्यानां तु तेष्वायेषु समवायो युतसिद्धिरिति । त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथग्गति-मत्त्वं नास्ति, युतेष्वाश्रयेषु समवायोऽस्तीति परस्परेण संयोगः दोनों में से एक की गतिशीलता नित्यों की युतसिद्धि है | पृथक् आश्रयों में समवाय का रहना अनित्यों की युतसिद्धि है । त्वगिन्द्रिय और शरीर दोनों यद्यपि स्वतन्त्र रूप से गतिशील नहीं हैं, फिर भी दोनों भिन्न आश्रयों में रहते हैं, अत: सिद्ध होता है कि शरीर और त्वगिन्द्रिय में संयोग ( ही ) न्यायकन्दली परिहरति - नेति । युतसिद्धिप्रसङ्ग इति न कुतः? युतसिद्धेरपरिज्ञानात् । यादृशं तसिद्धेर्लक्षणं तादृशं त्वया न ज्ञातमित्यर्थः । कीदृशं तस्या लक्षणं तत्राह-सा पुनर्द्वयोरिति । द्वयोरेकस्य वा परस्परसंयोगविभागहेतु भूतकर्म समवाय-योग्यता युतसिद्धिः । द्वयोः परमाण्वोः पृथग्गमनमाकाशपरमाण्वोश्चान्यतरस्य पृथग्गमनमियं तु नित्यानाम् । तुशब्दोऽवधारणे, नित्यानामित्यस्मात् परो द्रष्टव्यः नित्यानामेवेयं युतसिद्धिरित्यर्थः । अनित्यानां तु युतेष्वाश्रयेषु समवायो युतसिद्धिः । द्वयोरन्यतरस्य वा परस्परपरिहारेणान्यत्राश्रये समवायो युतसिद्धिरनित्यानां द्वयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं समवायः । शकुन्याकाशयो-चलना सिद्ध नहीं होगा, इस प्रकार अवयव और अवयवी दोनों में ( युतसिद्धि रूप ) स्वतन्त्रता की आपत्ति होगी । ' न ' इत्यादि से इसका परिहार करते हैं । अर्थात् ' युतसिद्धि ' की जो आपत्ति दो गई है, वह ठीक नहीं है. क्योंकि ( आपत्ति देनेवाले ) को युतसिद्धि ' का यथार्थज्ञान नहीं है । अर्थात् तसिद्धि का जो लक्षण है, उसका तुम्हें ज्ञान ही नहीं है । युतसिद्धि का क्या लक्षण है? इस प्रश्न के उत्तर में ' सा पुनर्द्वयोः ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् परस्पर के संयोग और विभाग के प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों में, या दोनों में से एक में, उक्त संयोग और विभाग के कारणीभूत क्रिया के समवाय की योग्यता ही ' युतसिद्धि ' है । द्वणुक समवाय के दोनों ही अनुयोगी ( दोनों ही परमाणु ) गतिशील हैं, आकाश और परमाणु इन दोनों में से एक गतिशील है । यह नित्यों की युतसिद्धि है ( अतः दोनों परमाणुओं में या परमाणु और आकाश में संयोग ही होते हैं, समवाय नहीं, ( क्योंकि समवाय आयुक्त सिद्धों में ही होता है ) । ' तु ' शब्द अवधारण का बोधक है । अर्थात् युतसिद्धि का कथित लक्षण नित्य के युतसिद्ध का ही है । अनित्य युतसिद्धों के लिए युतसिद्धि का दूसरा लक्षण खोजना चाहिए । ' युत ' आश्रयों में समवाय ही अनित्यों की युतसिद्धि है । अर्थात् दोनों का, अथवा दोनों में से एक का परस्पर एक को छोड़कर दूसरे आश्रय में समवाय ही ( अनि-त्यों की ) तसिद्धि है । फलतः दोनों का अथवा दोनों में से एक का पृथक् आश्रयाश्रयित्व For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३८० सिद्धः । न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् अण्वाकाशयोस्त्वाश्रयान्तराभावेऽप्यन्यतरस्य [ गुणे विभाग-पृथग्गति-भवात् संयोगविभागौ सिद्धौ । तन्तुपटयोरनित्ययोराश्रयान्तराभा-है ( समवाय नहीं ) | परमाणु और आकाश इन दोनों में से कोई भी पृथक् आश्रय में नहीं रहता, ( क्योंकि दोनों का कोई आश्रय ही नहीं है ) फिर भी दोनों में से एक ( परमाणु ) में स्वतन्त्र गति है, अतः आकाश और परमाणु इन दोनों में संयोग की सिद्धि ( और संयोगसिद्धि के कारण ही ) विभाग की भी सिद्धि समझनी चाहिये । चूँकि अनित्य तन्तु और अनित्य न्यायकन्दली इचान्यतरस्य शकुने: पृथगाश्रयाश्रयित्वम् । यद्यप्यन्यतरस्य पृथग्गमनमप्यस्ति, तथापि तस्य पृथग्गमनस्य ग्रहणं तस्य नित्यविषयत्वेन व्याख्यानात् । अनित्यानामपि पृथग्गमनमेव युतसिद्धिः किं नोच्यते? तदाह - त्वगिन्द्रिय-शरीरयोः पृथग्गमनं नास्ति, युतेष्वाश्रयेषु समायोऽस्तीति परस्परेण संयोगः सिद्ध: । यदि त्वनित्यानामपि पृथग्गमनं युतसिद्धिरुच्यते त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथग्गमनाभावादयुत सिद्धता स्थात् । ततश्च तयोः परस्परसंयोगो न प्राप्नोति तस्य युतसिद्धचैव व्याप्तत्वात् । तस्मादनित्यानां न पृथग्गमनं नास्ति तसिद्धिरित्यर्थः । आश्रयाभावादेव पृथगाश्रयाश्रयित्वं नित्येषु । तेषां च पृथग्गतिमत्त्वात् परस्परसंयोगविभागौ सिद्धौ तेनैषां पृथगमनमेव युत-सिद्धिरित्यभिप्रायेणाह - अण्वाकाशयोस्त्वाश्रयान्तराभावेऽप्यन्यतरस्य पृथग्गति-अर्थात समवाय ही अनित्यों की ' युतसिद्धि ' है । बाज पक्षी और आकाश इन दोनों में से एक में बाज पक्षी में पृथक ' आश्रयाश्रयित्व ' है । यद्यपि दोनों में से एक ( बाज पक्षी ) में पृथक् गतिशीलता भी है, किन्तु उस पृथक् गमन का यहाँ ग्रहण नहीं है, क्योंकि नित्यों की युत सिद्धि के लिए उसका उपादान किया गया है । ( ० ) पृथक् गमन - शीलता को ही अनित्यों की भी युतसिद्धि का लक्षण क्यों नहीं मानते? इसी प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि त्वगिन्द्रय और शरीर ये दोनों यद्यपि स्वतन्त्र रूप से गतिशील है, फिर भी युत आश्रयों में इन दोनों का समवाय है, अतः सिद्ध होता है कि दोनों में संयोग ही है ( अयुत सिद्धों में रहनेवाला समवाय नहीं ) । अभिप्राय यह है कि अनित्यों को तसिद्धि भी अगर ' पृथग् गमन ' रूप ही कही जाय, तो त्वगिन्द्रिय और शरीर इन दानों में से किसी में भी पृथक् गतिशीलता न रहने के कारण वे दोनों भी अयुतसिद्ध होंगे । इससे उन दोनों में संयोग असम्भव हो जाएगा, क्योंकि यह नियम है कि संयोग युद्धों में ही होता है । अत: ' पृथग् गमनशीलत्व ' अनित्यों की युतसिद्धिनहीं है । नित्य द्रव्यों का कोई आश्रय नहीं होता, अत: ' पृथगाश्रयाश्रयित्व ' नित्यों की युतसिद्धि नहीं हो सकती । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३८१ वात् परस्परतः संयोगविभागाभाव इति । दिगादीनां तु पृथग्गति-मत्वाभावादिति परस्परेण संयोगविभागाभाव इति । पट के अलग से स्वतन्त्र आश्रय नहीं रहते, अतः यह सिद्ध होता है कि इन दोनों में संयोग और ( तन्मूलक ) विभाग नहीं होते । दिगादि ( विभु -द्रव्यों में ) स्वतन्त्र गति न रहने के कारण ही उनमें परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही नहीं होते । न्यायकन्दली मत्त्वात् संयोगविभाग सिद्धाविति । पूर्वमत्यपि त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वे सति संयोगसंभवादनित्यानां पृथगा-श्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिर्न पृथग्गमनमित्युक्तम् । सम्प्रत्येनमेवार्थं समर्थयितुं तन्तुपटयोरन्यतरस्य पृथग्गतिमत्त्वासंभवेऽपि पृथगाश्रयत्वाभावात् संयोगविभागाभावं दर्शयति -- तन्तुपटयोरित्यादिना । विभूनां तु द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गमनाभावाश परस्परेण संयोगः, नापि विभागः, तस्य संयोगपूर्वकत्वात् । किं तु स्वरूपस्थितिमात्रमित्याह -- दिगादीना-मिति । एतावता सन्दर्भेणेतदुपपादितम् हस्ते गच्छति शरीरं न गच्छतीति, एतावता न युतसिद्धिः । यदि तु हस्तशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं स्यात्, तदा भवेदनयोर्युतसिद्धता । तत्तु नास्ति, शरीरस्य हस्ते समवेतत्वात् । अनित्य द्रव्य पृथक् गतिशील हैं, एवं इनमें परस्पर संयोग और विभाग भी होते हैं । अतः पृथक् गमनशीलता ही अनित्यों को युतसिद्धि है । इसी अभिप्राय से ' अणु ' इत्यादि सन्दर्भ लिखे गये हैं । अर्थात् परमाणु और आकाश इन दोनों का दूसरा कोई आश्रय न रहने पर भी चूंकि दोनों में से एक ( अर्थात् परमाणु ) स्वतन्त्र रूप से गतिशील है । अतः आकाश और परमाणु दोनों के युद्धसिद्ध होने के कारण ) इन दोनों में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । पहिले पृथक् गति न रहने पर भी त्वगिन्द्रिय और शरीर में पृथगाश्रयाश्रयित्व के रहने के कारण दोनों में संयोग सम्भव होता है । इसी लिए कहा गया है कि पृथगाश्रयाश्रयित्व ही अनित्यों की युतसिद्धि है, पृथक् गमन नहीं । तन्तुऔर पट इन दोनों में से एक में पृथक् गति की सम्भावना न रहने पर भी, पृथक् आश्रयत्व के न रहने से ही दोनों में संयोग और विभाग नहीं होते, यही बात ' तन्तुपटयो: ' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलाया गया है । ' दिगादीनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से यह प्रतिपादित हुआ है कि दो विभुद्रव्यों में या दो में से किसी एक विभुद्रव्य में भी पृथक् गति नहीं है । अत: दो विभुद्रव्यों में परस्पर संयोग नहीं होता । संयोग के न होने के कारण हो दोनों में विभाग भी नहीं होता, क्योंकि संयुक्तद्रव्यों में ही विभाग भी होता है । इन पक्तियों के द्वारा यही कहा गया है कि हाथ के चलने पर भी शरीर नहीं चलता, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३८२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशस्तु सर्वस्य विभागस्य क्षणिकत्वात् उत्तरसंयोगावधि-सद्भावात् क्षणिक इति । न तु संयोगवद्ययोरेव विभागस्तयोरेव चूँकि विभाग क्षणिक है, अतः उत्पत्ति के तृतीय क्षण में उसका विनाश हो जाता है । सभी विभाग क्षणिक इस हेतु से हैं कि उत्तर देश के साथ ( विभाग के दोनों अवधि द्रव्यों के ) संयोग पर्यन्त ही उनकी सत्ता रहती है । जिस प्रकार संयोग का विनाश उसके दोनों आश्रयों के विभाग से ही होता है, उसी प्रकार विभाग न्यायकन्दली विनाशस्तु सर्वस्य विभागस्य, क्षणिकत्वात् । कर्मजस्य विभागजस्य च कारणवृत्तेः कारणाकारणवृत्तेश्च विभागस्य सर्वस्य क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वं कुतः सिद्धमित्यत्राह — उत्तरसंयोगार्वाधसद्भावादिति । उत्तरसंयोगोऽवधिः सोमा, तस्य सद्भावात् क्षणिको विभागः । किमुक्तं स्यान्न विभागो निरवधिः, किं त्वस्योत्तरसंयोगोऽवधिरस्ति, उत्तरसंयोगश्चानन्तरमेव जायते, तस्मादाशु विनाश्युत्तरसंयोगो विभागस्यावधिरित्येतदेव तु कुतस्तत्राह - न संयोगवदिति । यथा संयोगः स्वाश्रययोरेव परस्परविभागाद्विनश्यति, नैवं विभागः इस लिए वे दोनों युतसिद्ध नहीं हो सकते, अगर हाथ और शरीर दोनों पृथगाश्रयाश्रयी होते तो वे दोनों युतसिद्ध होते, सो नहीं हैं, अतः हाथ में शरीर ( अयुत सिद्ध होने के कारण ) समवाय सम्बन्ध से है ( हाथ और शरीर दोनों में संयोग सम्बन्ध नहीं है । ) । सभी विभाग के क्षणिक होने के कारण अपनी उत्पत्ति के तीसरे ही क्षण में विनष्ट हो जाते हैं । कारण ( मात्र ) में रहनेवाले एवं कारण और अकारण दोनों में रहनेवाले क्रिया से उत्पन्न और विभाग से उत्पन्न दोनों ही प्रकार के विभागों में क्षणिकत्व अर्थात् अति-शीघ्र विनष्ट होने का स्वभाव किस हेतु से है? इसी प्रश्न का उत्तर ' उत्तर-संयोगावधिसद्भावात् ' इस वाक्य से दिया गया । अर्थात् उत्तर संयोग ही उसकी अवधि अर्थात् सीमा है, इसी अवधि के कारण विभाग क्षणिक है । इससे क्या तात्पर्य निकला? ( यही कि ) विभाग निरवधि ( नित्य ) नहीं है, एवं उत्तर संयोग ही उसकी अवधि है । क्योंकि विभाग के बाद ही उत्तरसंयोग की उत्पत्ति होती है । अतः शीघ्रतर विनाशी उत्तरसंयोग ही उसकी अवधि है । ( प्र ० ) यही ( उत्तर देश का संयोग ) क्यों? ( विभाग का विनाशक है? केवल अपने दोनों अवययियों का संयोग ही क्यों नहीं विभाग का विनाशक है? ) इसी प्रश्न का उत्तर ' न तु संयोगवत् ' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । अर्थात् For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३८३ संयोगाद्विनाशो भवति । कस्मात् १ संयुक्तप्रत्ययवद्विभक्त-प्रत्ययानुवृत्यभावात् । तस्मादुत्तरसंयोगावधिसद्भावात् क्षणिक इति । का विनाश विभाग की दोनों अवधियों के संयोग से ही नहीं होता, किन्तु विभाग के एक अवधि के उत्तर देश के साथ संयोग से भी होता है । ( उत्तर संयोग होते ही विभाग का नाश हो जाता है, किन्तु ) संयोग से युक्त दो द्रव्यों में ये दोनों संयुक्त हैं ' इस प्रकार की प्रतीति की तरह विभक्त हो जानेवाले दो द्रव्यों में ये दोनों विभक्त हैं ' इस आकार की प्रतीति चिरकाल तक नहीं होती । इससे सिद्ध होता है, उत्तर देश संयोग तक ही विभाग की सत्ताहै, अतः विभाग क्षणिक है । न्यायकन्दली स्वाश्रययोरेव परस्परसंयोगाद् विनश्यति, किं तु स्वाश्रयस्यान्येनापि संयोगात् । तथा हि वृक्षस्य मूले पुरुषेण विभागस्तयोः परस्परसंयोगाद्विनश्यति, पुरुषस्य प्रदेशान्तरसंयोगाद्वा । एवं चेत् सिद्धमुत्तरसंयोगावधित्वं विभागस्य, तदारम्भ-कस्य कर्मणः स्वाश्रयस्य देशान्तरप्राप्तिमकृत्वा पर्यवसानाभावात् । नन्वेतदपि साध्यसमं संयोगमात्रेण विभागनिवृत्तिरिति? तत्राह - संयुक्तप्रत्ययवदिति । यथा संयुक्तप्रत्ययश्चिरमनुवर्तते, नैवं स्वाश्रयस्य देशान्तरसंयोगे भूते विभक्तप्रत्ययानुवृत्तिरस्ति । अतस्तस्य संयोगमात्रेणैव निवृत्तिः । उपसंहरति-तस्मादिति । जिस प्रकार अपने आश्रयों के विभाग से हो संयोग का नाश होता है, उसी प्रकार विभाग का विनाश केवल अपने आश्रयों के संयोग से ही नहीं होता है, किन्तु अपने आश्रय का दूसरे देश के ( उत्तरदेश के ) साथ संयोग से भी ( विभाग का नाश होता है ) क्योंकि वृक्ष के मूल के साथ पुरुष का विभाग, उन दोनों के परस्पर संयोग से विनष्ट होता है, अथवा पुरुष का दूसरे प्रदेश के साथ संयोग से भी ( उक्त विभाग विनष्ट होता है ) अगर ऐसी बात है तो फिर यह सिद्ध है कि उत्तर देश का संयोग ही विभाग की अवधि है । विभाग के आश्रय का दूसरे देश के साथ संयोग को उत्पन्न किये विना विभाग के कारणीभूत क्रिया का नाश नहीं होता, अतः यह सिद्ध होता है कि उत्तर देश का संयोग विभाग की अवधि है । ( प्र ० ) संयोग ( की उत्पत्ति ) होते ही विभाग का नाश हो जाता है, यह भी तो ' वाध्यसम ' ही है अर्थात् सिद्ध नहीं है, किन्तु इसे भी सिद्ध ही करना है? इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' संयुक्तप्रत्ययवत् ' यह वाक्य लिखा गया है । जिस प्रकार ' ये संयुक्त हैं ' इत्यादि आकार के संयोग वैशिष्ट्य की प्रतीतियाँ चिरकाल तक रहती हैं, उसी प्रकार ' ये विभक्त हैं ' इत्यादि आकार के विभागवैशिष्टय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३८८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-क्वचिच्चाश्रय विनाशादेव विनश्यतीति । कथम् १ यदा द्विन्तु कारणा ara शौ कर्मोत्पन्नमश्वन्तराद् विभागमारभते तदैव तन्त्वन्तरेऽपि कर्मोत्पद्यते विभागाच्च तत्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तुकर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले विभागात् तन्तुसंयोगविनाशः तस्मिन्नेव काले संयोगविनाशात् तन्तुविनाशस्तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाश कहीं आश्रय के विनाश से भी विभाग का नाश होता है । ( प्र ० ) किस प्रकार? ( आश्रय के नाश से विभाग का नाश होता है? ) ( उ ० ) ( जहाँ ) जिस समय दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु अवयवरूप एक अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय उक्त पट के अवयवरूप दूसरे तन्तु में भी क्रिया उत्पन्न होती है, इस विभाग से दोनों तन्तुओं के उत्पादक अंशुओं में रहने-वाले संयोग का नाश होता है । एवं तन्तु की क्रिया से इस तन्तु का दूसरे तन्तु से विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय दोनों तन्तुओं के विभाग से ( पट के आरम्भक दोनों ) तन्तुओं के संयोग का नाश होता है उसी समय ( अंशुओं के ) संयोग के विनाश से तन्तु का भी विनाश होता है । तन्तु का विनाश हो जानेपर उसमें न्यायकन्दली क्वचिदाश्रयविनाशादपि विनाशः । कथमित्यज्ञस्य प्रश्नः । उत्तरम् -यदेति । द्वितन्तुककारणस्य तन्तोरवयवे अंशौ कर्मोत्पन्नमश्वन्तरस्यांशोविभाग-मारभते यदा तदैव तन्त्वन्तरेऽपि कर्म, विभागाच्चांशोस्तत्त्वारम्भकसंयोग-विनाशो यदा तदा तन्तुकर्मणा तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियत इत्येकः कालः । की प्रतीतियाँ चिरकाल तक नहीं होती रहतीं, अतः संयोग से ही विभाग का नाश होता है । ' तस्मात् ' इत्यादि वाक्य से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ' कहीं आश्रय के विनाश से भी ( विभाग का ) विनाश होता है ' । ' कथम् ' इत्यादि वाक्य से इस विषय में अनभिज्ञ का प्रश्न सूचित किया गया है, और ' यदा ' इत्यादि से इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जहाँ दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के अवयवी-भूत एक तन्तु के समवायिकारण अंशु में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय उस अंशु का दूसरे अंशु से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय दूसरे तन्तु में भी क्रिया For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] YE www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ३८५ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal इति । एवं तर्ह्यत्तरविभागानुत्पत्तिप्रसङ्गः कारणविभागाभावात् । ततः प्रदेशान्तरसंयोगवति संयोगाभाव इत्यतो विरोधिगुणासम्भवात्, रहनेवाले दूसरे तन्तु के विभाग का विनाश होता है । इस प्रकार यहाँ आश्रय के विनाश से ही विभाग का विनाश होता है, उत्तर देश के संयोग से नहीं । ( प्र ० ) अगर उक्त स्थल में उक्त प्रकार से आश्रय नाश के द्वारा ही विभाग का नाश मानें, तो फिर तन्तु का आकाशादि देशों के साथ जो ( विभागज ) विभाग उत्पन्न होता है, वह न हो सकेगा, क्योंकि इस ततो यस्मिन् काले विभागात् तन्त्वो: संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले sat: संयोगविनाशात् तदारब्धस्य तन्तोविनाशः तस्मिंस्तन्तौ विनष्टे तदाश्रितस्य तन्त्वन्तरविभागस्य विनाशः, तदाऽश्रयविनाशः, कारणमन्यस्य विनाशहेतोरभावात् । अत्र पुनः प्रत्यवतिष्ठते - एवं तति । द्विन्तुकविनाश-समकालमेव तन्तुविभागस्य विनाशः । उत्तरो विभाग: सक्रियस्य तन्तोराकाशादिवेशेन समं विभागजविभागेनोत्पद्यते, कारणस्य तन्त्वोविभागस्याभावात् । यद्युत्तरो विभागो न संवृत्तः, ततः किं तत्राह -तत इति । तत उत्तरविभागानुत्पादात् प्राक्तनस्य तन्त्वाकाशसंयोगस्य उत्पन्न होती है । जिस समय विभाग के द्वारा तन्तु के उत्पादक ( दोनों अंशुओं के ) संयोग का विनाश होता है, उसी समय एक तन्तु की क्रिया से उसका दूसरे तन्तु से विभाग भी उत्पन्न होता । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय विभाग से दोनों तन्तुओं के संयोग का नाश होता है, उसी समय विभागजनित दोनों अंशुओं के संयोग के नाश के द्वारा उन दोनों अंशुओं से उत्पन्न तन्तु का भी विनाश होता है । इस लिए ( इस विभाग के विनाश का ) आश्रयविनाश ही कारण है, क्योंकि किसी दूसरे कारण से उसके विनष्ट होने की सम्भावना नहीं है । ' एवं तर्हि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में फिर आक्षेप करते हैं । अगर दो तन्तुओं से निष्पन्न पट के विनाश के समय में ही तन्तुविभाग का भी विनाश हो जाता है, तो फिर उत्तरविभाग की अर्थात् क्रिया से युक्त तन्तु का आकाशादि देशों के साथ विभागजविभाग की उत्पत्ति न हो सकेगी, क्योंकि ( इस विभागज विभाग के कारण अर्थात् दोनों तन्तुओं का विभाग वहाँ नहीं है | ( प्र ० ) अगर ' उत्तरविभाग ' ( अर्थात् उक्त विभागज विभाग ) की उत्पत्ति न हो सकेगी तो क्या हानि होगी? इसी प्रश्न के समाधान के लिए ' ततः ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । ' ततः ' अर्थात् उत्तर विभाग की उत्पत्ति न होने के कारण, तन्तु