प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 461–470

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३८६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मणश्चिरकालावस्थायित्वं नित्यद्रव्यसमवेतस्य च [ गुणे विभाग-नित्यत्वमिति दोषः । कथम्? यदाप्यद्व्यणुकारम्भकपरमाणौ कर्मोत्पन्नमण्वन्तराद् ( विभागज ) विभाग के कारणीभूत दोनों तन्तुओं का विभाग विनष्ट हो चुकाहै । इससे ( १ ) जहाँ आश्रय के नाश से विभाग उत्पन्न होगा, उस विभाग के अवधिभूत अनित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया चिरकाल-स्थायिनी होगी ( तीन क्षणों से अधिक समय तक रहेगी ) ( २ ) एवं नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी, क्योंकि ( उक्त उत्तर-देश विभागरूप विभागज विभाग के उत्पन्न न होने के कारण तन्तु का उत्तरदेश के साथ संयोग रहेगा ही, एवं ) एक प्रदेश में एक संयोग के रहते दूसरे संयोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः क्रिया के विरोधी ( दूसरे ) न्यायकन्दली प्रतिबन्धकस्यानिवृत्तेः प्रदेशान्तरेण सह संयोगो न भवति, अतः कारणाद् विरोधिनो गुणस्योत्तरसंयोगस्याभावात् कर्मणः कालान्तरावस्थायित्वं स्यात्, यावदाश्रयविनाशो विनाशहेतुर्नोपनिपतति - नित्यद्रव्यसमवेतस्य नित्यत्वमिति दोषः । कथमिति प्रश्नः । उत्तरमाह - यदेति । आप्यद्वयणुकस्यारम्भके परमाणौ कर्मोत्पन्नमण्वन्तराद विभागं करोति यदा तदैव द्वयणुकसंयोगिन्य-नारम्भकपरमाण्वन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले परमाणु संयोग-और आकाश के संयोग की भी निवृत्ति नहीं होगी, जो कि पूर्ववर्ती संयोग का प्रतिबन्धक है । जिससे दूसरे प्रदेशों का संयोग रुक जाएगा । अतः विरोधी संयोग रूप गुण के न रहने से क्रिया में से स्थायित्व की आपत्ति होगी । क्योंकि ( उत्तरदेश संयोग को छोड़-कर केवल ) आश्रय का विनाश ही क्रिया के नाश का कारण है, सो जबतक नहीं होता, तब तक क्रिया की सत्ता रहेगी हो । फलतः, नित्यद्रव्यों ( परमाणुओं ) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया नित्य हो जाएगी । उक्त क्रिया के आश्रय परमाणु नित्य होने के कारण विनष्ट नहीं हो सकते, अतः विभागज विभाग के न मानने से किया में नित्यत्व रूप दोष की आपत्ति होगी । ' कथम् ' यह पद प्रश्न का बोधक है । ' यदा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जिस समय जलीय द्वयणुक के एक परमाणु में उत्पन्न हुई क्रिया, उसका दूसरे जलीय परमाणु के साथ विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है, जो जलीय द्वणुक का उत्पादक तो नहीं है, किन्तु उसमें जलीय द्वघणुक का संयोग है । इसके बाद जिस समय ( जली दोनों ) परमाणुओं के संयोग के विनाश से, उन परमाणुओं For Private And Personal

पृष्ठ 462

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३८७ विभागं करोति, तदैवाण्वन्तरेऽपि कर्म । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तदैवाण्वन्तरकर्मणा द्वयणुकाण्वोविं भागः क्रियते । ततो यस्मिन्नेव काले विभागाद् द्वयणुकाणुसंयोगस्य विनाशः, तस्मिन्नेव काले संयोगविनाशाद् द्वयणुकस्य विनाशः । उत्तर देश के साथ तन्तु का संयोग भी उक्त स्थल में नहीं है, ( अतः कथित युक्ति से ) तन्तु प्रभृति अनित्य द्रव्यों में रहनेवाली उक्त क्रिया क्षणिक न होकर अधिक समय तक रहेगी एवं परमाणु प्रभृति नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया तो नित्य ही हो जाएगी । ( प्र ० ) कैसे? ( अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व की आपत्ति किस प्रकार किस स्थिति में और किस स्थल में होगी? ( उ ० ) जिस समय ( जहाँ ) जलीय द्वयणुक उत्पादक जलीय परमाणु में उत्पन्न क्रिया ( जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक ) दूसरे परमाणु के साथ ( जलीय द्वयणुक के ) विभाग को उत्पन्न करती है, उसी क्षण में ( जलीय द्वणुक ) के उत्पादक निष्क्रिय दूसरे परमाणु में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस क्षण में विभाग के द्वारा द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी क्षण ( जलीय द्वयणुक के अनुत्पादक ) दूसरे परमाणु की क्रिया से जलीयद्व्यणुक और ( उदासीन ) परमाणु इन दोनों में भी विभाग उत्पन्न होता है । इसके अनन्तर जिस क्षण में ( इस जलीय द्वणुक और उदासीन परमाणु के ) विभाग से जलीय द्वयणुक और ( उदा -सीन ) परमाणु इन दोनों के संयोग का नाश होता है, उसी क्षण ( द्व्यणुक के उत्पादक जलीय दोनों परमाणुओं के ) संयोग के नाश से जलीय न्यायकन्दली विनाशात् तदारब्धस्य द्व्यणुकस्य विनाशः तस्मिन् द्व्यणुके विनष्टे तदाश्रि-तस्य द्वणुकाणुविभागस्य विनाशः, ततो विभागस्य कारणस्याभावात् परमाणो-राकाशदेशविभागानुत्पादे पूर्वसंयोगानिवृत्तावुत्तरसंयोगस्य विरोध yuta के द्वारा उत्पन्न द्वथणुक का विनाश होता है, उसी समय द्वयणुक विनाश के कारण उसमें रहने-वाले विभाग का भी नाश हो जाता है । इसके बाद विभाग रूप कारण के न रहने से परमाणु का आकाशादि देशों के साथ विभाग उत्पन्न न हो सकेगा, जिससे कि पहिले संयोग का विनाश भी रूक जाएगा । ( इस विनाश के रुक जाने पर ) उत्तर संयोग रूप For Private And Personal

पृष्ठ 463

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३८८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-प्रशस्तपादभाष्यम तस्मिन् विनष्टे तदाश्रितस्य णुकाणुविभागस्य विनाशः । ततश्च विरोधिगुणासम्भवान्नित्यद्रव्यसमवेतकर्मणो नित्यत्वमिति । द्वणुक का भी नाश हो जाता है । जलीय द्वयणुक के विनष्ट हो जाने पर उसमें रहनेवाले जलीय द्वयणुक और उदासींन परमाणु के विभाग का भी नाश होता है । अत ( उत्तरसंयोग रूप ) विरोधी गुण की उत्पत्ति की सम्भा-वना नहीं रहती, क्योंकि उत्तरदेश संयोग के लिए पूर्वदेश के संयोग का विनाश भी आवश्यक है । एवं पूर्वदेश के संयोग का विनाश तभी होगा, जबकि उससे अव्यवहित पूर्व काल में जलीय द्वयणुक और उदासीन परमाणु के विभाग की सत्ता रहे, ( क्योंकि वही वह विरोधी गुण है, जिससे यहाँ उस पूर्वदेश के संयोग का नाश होगा । विरोधी गुण की इस असम्भावना से ) परमाणु-रूप नित्य द्रव्य में रहनेवाली क्रिया में नित्यत्व की आपत्ति होगी । न्यायकन्दली विनाशहेतोरसम्भवान्नित्यपरमाणुसमवेतस्य कर्मणो नित्यत्वं स्यात् । पूर्वोक्तं तावत्परिहरति - तन्त्वंश्वन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः । कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तरेण समं स्वाश्रयस्य विभागं कुर्वदाकाशादिदेशाद्विभागं न करोतीति नियमः, कर्तृत्वस्य विशिष्ट विभागानारम्भकत्वेन व्याप्तत्वात् । आकाशादिदेश विभाग-अवयवान्तरस्यावयवेन स्वाश्रयसंयोगिता समं तु करोत्येव, विरोधाभावात् । अतो द्वितन्तुककारणे ( क्रिया का ) विरोधी गुण के विनाश का कोई कारण ही नहीं रह पाएगा । अतः पर-माणु में रहनेवाली क्रिया ( परमाणु की नित्यता के कारण ) नित्य जाएगी । ' तन्त्वं श्वन्तर विभागाद्विभागः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्व कथित दोष का परिहार करते हैं । यह नियम है कि कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया अपने आश्रय का दूसरे अवयव के साथ विभाग को उत्पन्न करने के समय अपने आश्रय का आकाशादि देशों के साथ विभागों को उत्पन्न नहीं करती, क्योंकि यह व्याप्ति है कि जो अपने आश्रय का आकाशादि देशों के साथ विभाग का उत्पादक होगा, वह कभी भी विशिष्ट विभाग का ( अर्थात् क्रिया के आश्रयीभुत एक अवयव का दूसरे अवयव के साथ विभाग ) का उत्पादक नहीं हो सकता । ( किन्तु उक्त क्रिया ) अपने आश्रय के संयोग से युक्त अवयव के साथ तो विभाग को अवश्य ही उत्पन्न करती है क्योंकि इसमें कोई विरोध नहीं है । दो तन्तुओं से बने हुए पट के कारणीभूत एक तन्तु में उत्पन्न हुई क्रिया, For Private And Personal

पृष्ठ 464

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम्म् ] ३८६ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् तन्त्वंश्वन्तर विभागाद् विभाग इत्यदोषः । आश्रयविनाशात् तत्वोरेव विभागो विनष्टो न तन्त्वंश्वन्तरविभाग इति । एतस्मादुत्तरो विभागो जायते, अगुल्या काशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्, तस्मिन्नेव काले कर्म संयोगं कृत्वा विनश्यतीत्यदोषः । ( उ ० ) ( आश्रय के विनाश से विभागनाश के प्रसङ्ग में जो उत्तरविभाग की अनुत्पत्ति का अतिप्रसङ्ग दिया गया है, उसका यह समाधान है कि उत्तर विभाग आकाशादि देशों के साथ तन्तु के ( विभागज ) विभाग, एवं तन्तु और तन्तु के अनारम्भक दूसरे अंशु, इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होता है, ( अत: प्रकृत में उक्त विभागानुत्पत्ति रूप ) दोष नहीं है, क्योंकि आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं का विभाग ही नष्ट होता है, इससे तन्तु और ( उसके अनुत्पादक ) दूसरे तन्तु, इन दोनों के विभाग का नाश नहीं होता । इसी विभाग से आकाशादि देशों के साथ तन्तु के इस उत्तर विभाग की उत्पत्ति होती है जेसे कि अङ्गुलि और आकाश के विभाग से शरीर और आकाश के विभाग की उत्पत्ति होती है । उसी समय क्रिया उत्तर ( देश ) संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है । इस प्रकार अनित्य द्रव्यों की क्रिया में चिरस्थायित्व और परमाणुओं में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व रूप दोनों दोषों का निराकरण हो जाता है । न्यायकन्दली तन्तौ कर्मोत्पन्नं तन्त्वन्तराद् विभागसमकालं तदंशुनापि तन्तुसंयुक्तेन समं विभाग-मारभते । स च विभागस्तन्तोरंशोश्चावस्थानादवस्थित इत्याह - आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो विनष्टः, तन्त्वंश्वन्तरविभागस्त्ववस्थित इति । किमतो यद्येवमित्यत आह - एतस्मादिति । अङ्गुल्याकाश-विभागाच्छरीराकाशविभागवत् । यथा कर्मजादगुल्याकाश विभागाच्छरीरा-दूसरे तन्तु के साथ विभाग की उत्पत्ति के समय ही तन्तु के साथ संयुक्त अंशु के साथ भी विभाग को उत्पन्न करती है । वह विभाग ( अपने आश्रय ) तन्तु और अंशु के विद्यमान रहने के कारण रहता ही है । यही बात आश्रयविनाशात्तन्त्वोरेव विभागो विनष्ट: ' इत्यादि सन्दर्भ से कहा गया है । अर्थात् आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं के विभाग का ही विनाश होता है, तन्तु और दूसरे अंशु का विभाग तो रहता ही है । अगर ऐसी बात है तो इससे प्रकृत में क्या? इसी प्रश्न का समाधान ' एतस्मात् इत्यादि से दिया गया है । ' अङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीराकाशविभागवत् ' इस उदाहरण वाक्य का यह तात्पर्य है कि जैसे अंगुलि और आकाश के विभाग से शरीर और For Private And Personal

पृष्ठ 465

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-अथवा अंश्वन्तर विभागोत्पत्तिसमकालं तस्मिन्नेव तन्तौ कर्मोत्पद्यते, ततऽश्वन्तरविभागात् तन्त्वारम्भकसंयोगविनाशः, तन्तु-अथवा ( इस प्रकार से भी आश्रय के विनाश से विभाग का विनाश हो सकता है ) जिस समय ( तन्तु के उत्पादक एक अंशु का ) दूसरे अंशु के साथ विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय उन्हीं अंशुओं से आरब्ध ) उसी तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद एक अंशु का दूसरे अंशु के विभाग से तन्तु के उत्पादक ( दोनों अंशुओं ) संयोग का विनाश होता न्यायकन्दली काशविभागः, एवं कर्मजादंशुतन्तुविभागात् तन्त्वाकाशविभाग इत्युदाहरणार्थः । हस्ताकाशविभागाच्छरीराकाशविभागो युक्तो न त्वङ्गुल्या काशविभागात्, अङ्गुलेः शरीरं प्रत्यकारणत्वादिति चेत्? हस्तोऽपि बाराश्रयो न शरीरस्य, कुतस्तद्विभागादपि शरीरविभागादपि शरीरविभागः । अथ समस्तावयवव्यापित्वाच्छरीरस्य हस्तोऽप्याश्रयः, एवमङ्गुल्यप्याश्रयो हस्ता-गुल्याद्यवयवसमुदाये शरीरप्रत्यभिज्ञानात् । तस्मिंस्तन्त्वाकाशविभागे जाते पूर्वसंयोगस्य प्रतिबन्धकस्य निवृत्तौ तन्तुसमवेतं कर्मोत्तरसंयोगं कृत्वा ततो विनश्यतीत्याह - तस्मिन्निति । प्रकारान्तरेणाप्याश्रय विनाशाद् विनाशं कथयति – अथवेति । अंश्वन्तर-विभागोत्पत्तिसगकालं तस्मिन्नेव तन्तौ विभज्यमानावयवे कर्मोत्पद्यते, आकाश का विभाग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार क्रिपाजनित अंशु और तन्तु के विभाग से तन्तु और आकाश का विभाग भी उत्पन्न होता है । ( प्र ० ) शरीर और आकाश का विभाग तो हाथ और आकाश के विभाग से होना चाहिए, अंगुलि और आकाश के विभाग से नहीं, क्योंकि अंगुलि शरीर का कारण नहीं है । ( उ ० ) हाथ भी तो बाँह का आश्रय ( अवयव ) है, शरीर का नही, तो फिर हाथ और आकाश के विभाग से ही शरीर और आकाश का विभाग कैसे उत्पन्न होगा? अगर शरीर सभी अवयवों में व्याप्त है, तो फिर हाथ की तरह अंगुलि भी शरीर का आश्रय है हो, क्योंकि हाथ अंगुलि प्रभृति सभी समुदायों में शरीर की प्रत्यभिज्ञा होती है । ' तस्मिन् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि तन्तु और आकाश के विभाग की उत्पत्ति हो जाने के बाद, प्रतिबन्धकीभूत पूर्वसंयोग के विनष्ट हो जाने पर, तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली क्रिया उत्तर संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है । ' अथवा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आश्रय के नाग़ से विभागनाश की दूसरी रीति दिखलाई गई है । जहाँ दूसरे अंशु में विभाग की उत्पत्ति के समय ही विभक्त अवयव रूप ( अंशु विभाग के आश्रय ) तन्तु में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद विभाग For Private And Personal

पृष्ठ 466

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ३६१ कर्मणा च तन्त्वन्तराद् विभागः क्रियते इत्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् तन्तु विनाश:, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोर्विभागकर्मणो-युगपद्विनाश: । है और तन्तु की क्रिया से एक तन्तु का दूसरे तन्तु क साथ विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद कथित दोनों अंशुओं के विभाग के द्वारा उत्पन्न दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश से तन्तु का विनाश होता है, एवं तन्तु के विनाश से उसमें रहनेवाले विभाग और क्रिया, इन दोनों का एक ही समय विनाश हो जाता है । अत: इस पक्ष में क्रिया में चिरकालस्थायित्व की आपत्ति भी नहीं है । न्यायकन्दली ततो विभागात् तन्त्वारम्भकस्यांशु संयोगस्य विनाशः, तन्तुकर्मणा च तस्य तन्तोस्तन्त्वन्तराद् विभाग इत्येकः कालः । तदनन्तरं संयोगस्य विनाशात् तदा-रन्धस्य तन्तोविनाश:, तद्विनाशाच्च तदाश्रितयोविभाग कर्मणोर्युगपद्विनाशः । यच्च नित्यसमवेतस्य नित्यत्वमिति चोदितम्, तत्र प्रतिसमाधानं नोक्तम्, तस्यात्यन्तमसङ्गतार्थत्वात् । कार्याविष्टे हि कारणे कर्मोत्पन्नमवयवान्तर-विभागसमकालमाकाशादिदेशेन समं विभागं न करोति, आकाशादिविभागकर्तृ-त्वस्य द्रव्यारम्भकसंयोग विरोधिविभागोत्पादकत्वस्य च विरोधात् । अनारम्भके तु द्वघणुकसंयोगिनि परमाणौ कर्म द्वणुक विभागसमकालं तस्याकारादेशेन के द्वारा तन्तु के उत्पादक अंशु के संयोग का विनाश होता है, एवं तन्तु की क्रिया से उस तन्तु का दूसरे तन्तु से विभाग उत्पन्न होता है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद संयोग के विनाश से उस संयोग के द्वारा उत्पन्न तन्तु का विनाश होता है । तन्तु के विनष्ट हो जाने से उसमें रहनेवाले विभाग और कर्म दोनों ही एक ही समय नष्ट हो जाते हैं । नित्य द्रव्य में रहनेवाले कर्म में नित्यत्व की जो शङ्का की गई है, उसका उत्तर इस कारण से नहीं दिया गया, चूँकि वह अत्यन्त ही निःसार है । कार्य के साथ सम्बद्ध कारण में उत्पन्न हुई क्रिया दूसरे अवयव के साथ विभाग के उत्पत्तिक्षण में आकाशादि देशों के साथ ( अपने आश्रय के ) विभाग को नहीं उत्पन्न करती, क्योंकि आकाशादि देशों के साथ विभाग का कर्तत्व • एवं द्रव्य के उत्पादक संयोग के विभाग का कर्त्तत्व, ये दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं ( अतः एक समय एक अभय में दोनों नहीं रह सकते ) द्वणुक के संयोग से युक्त ( उस द्वणुक के ) अनुत्पादक परमाणु में ( विद्यमान ) क्रिया द्वयणुक की उत्पत्ति के समय ही आकाशादि देशों के साथ भी विभाग For Private And Personal

पृष्ठ 467

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे [ गुणे विभाग-द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधानेनाश्रयविनाशसंयोगाभ्यां तन्तुवीरणविभागविनाश इति । अथवा ( इस स्थिति में भी आश्रय के नाश से विभाग का नाश हो सकता है, जहाँ ) तन्तु और वीरण ( तृणविशेष ) में संयोग होता है । इस संयोग से किसी द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि यह विजातीय दो द्रव्यों का संयोग है । पहिले कथित रीति के अनुसार आश्रय का विनाश और संयोग इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का नाश होता है । न्यायकन्दली समं विभागं करोत्येव ततो विभागाच्च परमाणोराकाशसंयोगनिवृत्तावुत्तर-संयोगे सति तदाश्रितस्य कर्मणो विनाशो भवत्येव । समानजातीयसंयोगे सति द्रव्योत्पत्तावाश्रयविनाशाद् विभागकर्मणोविनाशः कथितः सम्प्रति विजातीयसंयोगे द्रव्यानुत्पत्तौ संयोगाश्रयविनाशाभ्यां विभागविनाशं कथयति - तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन विधाने-नेति । तन्त्वारम्भकांशौ कर्मोत्पत्तिसमकालं वीरणे कर्म, ततोऽशुक्रियया अंश्वन्तराद् विभागो वीरणकर्मणा च तस्य विभज्यमानावयवेन तन्तुना आकाशदेशेन च समं विभागः क्रियते, ततोऽशुविभागादंशुसंयोगविनाशो वीरणविभागाच्च को अवश्य ही उत्पन्न करती है । इसके बाद विभाग के द्वारा परमाणु और आकाश के संयोग के नष्ट हो जाने पर उत्तर संयोग के बाद परमाणु में रननेवाली क्रिया का भी अवश्य विनाश होता है । ( समानजातीयद्रव्यों के संयोग के रहने पर ) द्रव्य की उत्पति के बाद आश्रय के विनाश से विभाग और क्रिया दोनों का ही नाश अभी कहा गया है । अब विजातीय द्रव्यों के संयोग के रहने के कारण द्रव्य की उत्पत्ति न होने पर भी संयोग और आश्रय के विनाश, इन दोनों से विभाग काविनाश तन्तुवीरणयोर्वा संयोगे सति द्रव्यानुत्पत्तौ पूर्वोक्तेन प्रक्रिया है कि तन्तु के विधानेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहागया है । इसकी यही उत्पादक अंश में क्रिया की उत्पत्ति के समय हीवीरण ( तृण विशेष ) में भी क्रियाउत्पन्न होती है । इसके बाद अंशु कीक्रिया से दूसरे अंशु के साथ उसका विभाग उत्पन्न होता है । वीरण की क्रिया से अवयव से विभक्त होते हुए तन्तु के साथ वीरण का, एवं आकाशादि देशों के साथ भी विभाग उत्पन्न होते हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 468

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् च ३ ९ ३ परत्वमपरत्वं परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तम् । तत्तु द्विविधं दिक्कृतं कालकृतं च । तत्र दिक्कृतं दिग्विशेषप्रत्यायकम् । “ यह इससे पर ( दूर अथवा ज्येष्ठ ) है ', ' यह इससे अपर ( समीप अथवा कनिष्ठ ) है ' इन शब्दों के प्रयोगों और इन आकार के ज्ञानों का ( असाधारण ) कारण ही ( क्रमशः ) परत्व और अपरत्व है ( १ ) दिक्कृत ( दिशामूलक ) और ( २ ) कालकृत ( कालमूलक ) भेद से वे दोनों ही दो - दो प्रकार के हैं । इनमें दिक्कृत ( परत्व और अपरत्व ) दिशाओं की न्यायकन्दली तन्तुवीरणसंयोगस्याकाशवीरणसंयोगस्य च विनाशः, ततींऽशुसंयोगविनाशात् तन्तुविनाशो वीरणस्य चोत्तरसंयोगोऽत उत्तरसंयोगाश्रयविनाशाभ्यां तन्तुवीरण-विभागस्य विनाश इति प्रक्रिया || परत्वमपरत्वं च परापराभिधानप्रत्ययनिमित्तमिति । नस्य प्रत्ययस्य च निमित्तं परत्वम् । मपरत्वमिति कार्येण सत्तां प्रतिपादयति । यद्यप्याकाशं कारणं भवति, स्यात्, तथापि अपरमित्यभिधानप्रत्यययोनिमित्त-कण्ठाद्याकाशसंयोगादिकं च परमित्यभिधा-परापराभिधानयोः यद्यप्यात्ममन: संयोगादिकं च परापरप्रतीतिकारणं निमित्तान्तरसिद्धि:, विशिष्टप्रत्ययस्य कारणविशेष-इसके बाद दोनों अंशुओं के विभाग से दोनों अंशुओं के ( तन्तु के का विनाश होता है । एवं वीरण के विभाग से तन्तु आकाश और वीरण के संयोग का भी विनाश होता है । और वीरण के उत्पादक ) संयोग संयोग का, एवं इसके बाद दोनों अंशुओं के संयोग के विनाश से तन्तु का विनाश होता है, एवं वीरण और उत्तरदेश, इन दोनों के संयोग की उत्पत्ति होती है । अतः उत्तरदेशसंयोग और आश्रय के विनाश इन दोनों से तन्तु और वीरण के विभाग का विनाश होता है । ' परत्वमपरत्वञ्च परापराभिधान प्रत्ययनिमित्तम् ' इस सन्दर्भ के द्वारा यह उप-पादन किया गया है कि ' यह इससे पर है ' इत्यादि आकार के ज्ञान और शब्द के प्रयोग इन दोनों का कारणीभूत गुण ही ' परत्व ' है, एवं ' यह इससे अपर है ' इस आकार के ज्ञान और शब्द के प्रयोग, इन दोनों का कारणीभूत गुण ही ' अपरत्व ' है । इस प्रकार कार्य से कारण के प्रतिपादन की रीति से परत्व और अपरत्व को सत्ता दिखलायी गयी है । यद्यपि यह पर है ' एवं ' यह अपर हैं इत्यादि शब्दों के प्रयोगों के आकाश, कण्ठ, एवं आकाश के संयोगादि भी कारण है, एवं उक्त आकार की प्रतीतियों के आत्मा एवं मन के संयोगादि भी करण हैं, फिर भी ( ये सब सामान्य कारण हैं, उन विशिष्ट ५० For Private And Personal

पृष्ठ 469

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३ ९ ४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-कालकृतं च वयोभेदप्रत्ययकम् । तत्र दिक्कृतस्योत्पत्तिरभिधीयते । कथम्? एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोः संयुक्त संयोगबह्वल्प-विशिष्टिता को समझाते हैं । एवं कालकृत ( परत्व और अवरत्व वस्तुओं के ) वयस् के भेद को समझाते हैं । इनमें दिक्कृत ( परत्व और अपरत्व ) की उत्पत्ति बतलाते हैं । ( प्र ० ) किस प्रकार ( इनकी उत्पत्ति होती है? ) ( उ ० ) एक दिशा में अवस्थित दो कार्य द्रव्यों में ( इन द्रव्यों के आश्रयी-भूत प्रदेश के साथ ) संयुक्त ( प्रदेशों के ) संयोग की अधिकता और अल्पता न्यायकन्दली मन्तरेणोत्पत्त्यभावात् । एकत्र द्वयोरुपन्यासस्तयोरितरेतरसापेक्षत्वात् । ' तद् द्विविधम् ', ' तत् ' परत्वमपरत्वं च ' द्विविधम् ' द्विप्रकारमिति भेदनिरूपणम् । किंकृत-स्तयोर्भेद इत्याशङ्कय कारणभेदाद् भेदमाह — दिक्कृतं कालकृतं चेति । दिक्पिण्ड-संयोगकृतं दिक्कृतम् । कालपिण्डसंयोगकृतं कालकृतम् । कुतः अनयोर्भेदः प्रत्येतव्यः? कार्यभेदादित्याह - दिक्कृतं दिग्विशेषप्रत्यायकम्, कालकृतं तु वयोभेद-प्रत्यायकम् । दिक्कृतं परत्वं देशविप्रकृष्टत्वं प्रत्याययति, अपरत्वं च देशसन्नि-कृष्टत्वम् । कालकृतं तु परत्वं पिण्डस्य कालविप्रकृष्टत्वं प्रतिपादयति, अपरत्वं च शब्द प्रयोगों के एवं उक्त प्रतीतियों के लिए विशेष कारणों की सिद्धि आवश्यक है, क्योंकि विशेष कारण के बिना विशेष प्रकार के शब्दों का प्रयोग, या विशेष प्रकार की प्रतीतियाँ नहीं हो सकतीं । चूँकि परत्व और अपरत्य दोनों ही परस्पर सापेक्ष हैं, अतः दोनों का एक साथ निरूपण किया गया है । ' द्विविधं तत् ' यह वाक्य उनके भेद को दिखलाने के लिए लिखा गया है । किस हेतु से दोनों में भेद है? यह प्रश्न करके कारण के भेद से उनका भेद दिक्कृतं कालकृतञ्च ' इत्यादि से दिखलाया गया है । दिक्कृत ( परत्व और अपरत्व ) काल और पिण्ड ( अर्थात् परत्वादि के आश्रयीभूत द्रव्य ) के संयोग से होता है । इसी प्रकार काल और पिण्ड के संयोग से ' कालकृत परत्व और अपरत्व ' उत्पन्न होता है । इन दोनों का भेद किससे समझेंगे? इसी प्रश्न का उत्तर ' दिक्कृतम् ' इत्यादि से देते हैं कि कार्य की विभिन्नता से ही उन दोनों का भेद समझेंगे । विशेष प्रकार की दिशा के ज्ञान का कारण ही दिक्कृत परत्व और अपरत्व है । एवं वय के भेद के ज्ञान का कारण ही कालकृत ' परत्वापरत्व ' है । अर्थात् दिक्कृत ( परत्व और अपरत्व ) दिशा विशेष की प्रतीति के कारण हैं । एवं कालकृत ( परत्व और अपरत्व ) वयोभेद के ज्ञान के कारण हैं । इनमें ' दिक्कृत परत्व ' देश विप्रकृष्टत्व अर्थात् देश की दूरी का ज्ञापक है । ' दिक्कृत अपरत्व ' देश के सामीप्य का बोधक है | एवं ' कालकृत परत्व ' पिण्ड ( आश्रयभूत द्रव्य ) के कालविप्रकृष्टत्व अर्थात् ज्येष्ठत्व का For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 470 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादमाष्यम् ३६५ भावे सत्येकस्य द्रष्टुः सन्निकृष्टमवधिं कृत्वा एतस्माद् विप्रकृष्टोऽयमिति परत्वाधारेस निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण के रहने पर देखनेवाले एक पुरुष के समीप ( प्रदेश ) को अवधि मानकर ' इससे यह दूर है ' इस प्रकार की दूरत्वविषयक बुद्धि परत्व के आधारद्रव्य में उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के सहयोग से दूर दिशा के न्यायकन्दली कालसन्निकृष्टत्वमिति विशेषः । तत्र तयोदिक्कृतकालकृतयोर्मध्ये दिक्कृत-स्योत्पत्तिरभिधीयते । कथमिति प्रश्ने सत्युत्तरमाह — एकस्यामिति । पूर्वापर दिग्व्यव स्थितयोः पिण्डयोः परापरप्रत्ययौ न सम्भवतः, तदर्थमेकस्यां feoraf स्थतयोरित्युक्तम् । एकस्यां दिशि प्राच्यां वा प्रतीच्यां वाड-वस्थितयोः पिण्डयोर्मध्ये एकस्य द्रष्टुः संयुक्तेन भूदेशेन सहापरस्य प्रदेशस्य संयोग:, तेनापि सममपरस्येति संयुक्तसंयोगानां बहुत्वे सत्यल्प-संयोगवन्तं पिण्डं सन्निकृष्टमवधिं कृत्वैतस्मात् पिण्डाद् विप्रकृष्टोऽयमिति संयोग-भूयस्त्ववति भविष्यतः परत्वस्याधारे पिण्डे विप्रकृष्टा बुद्धिरुदेति । ततो प्रतिपादन करता है ' कालकृत अपरत्व ' काल के संनिकृष्टत्व का, अर्थात् कनिष्ठत्व का ज्ञापक है । यही इनमें विशेष है । ' तत्र ' अर्थात् दिक्कृत परत्वापरत्व और कालकृत परत्वा-परत्व इन दोनों में दिक्कृत परत्वापरत्व का निरूपण करते हैं । ( इसी प्रसङ्ग में ) ' कथम् ' इस वाक्य से प्रश्न किये जाने पर ' एकस्याम् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा उत्तर देते हैं । पूर्व और पश्चिमादि विरुद्ध दिशाओं में स्थित दो पिण्डों में परत्व और अपरत्व की प्रतीति नही हो सकती, अतः ' एकस्यां दिश्यवस्थितयोः ' यह वाक्य लिखा गया है । ' एक ही ' अर्थात् पूर्व या पश्चिमादि किसी एक दिशा में अवस्थित दो पिण्डों में से किसी एक पिण्ड और देखनेवाले पुरुष, इन दोनों से संयुक्त भूप्रदेश के साथ दूसरे भूप्रदेश का संयोग है, उसके साथ फिर तीसरे भूप्रदेश का संयोग हैं, इस प्रकार संयुक्त प्रदेशों के बहुत से संयोगों के रहने पर, संयुक्त प्रदेशों के संयोगों की अधिकता के कारण, उन भूप्रदेशों के संयोगों से अल्प संयोग से युक्त अत एव समीपस्थ पिण्ड को अवधि मानकर उत्पन्न होनेवाले परत्व के आधारभूत एवं उक्त बहुत से संयोगों से युक्त पिण्ड में ' इससे यह दूर है ' इस प्रकार की विप्रकृष्टा बुद्धि अर्थात् दूरत्व की बुद्धि उत्पन्न होती है । ' तत ' अर्थात् उस दूरत्व की बुद्धि के बाद उसी विप्रकृष्ट द्रव्य को For Private And Personal