प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 471–480
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 471–480
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ३ ९ ६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् दिक्प्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः । तथा विप्रकृष्टं चावधिं कृत्वा एतस्मात् सन्निकृष्टोऽयमित्यपरत्वाधारे इतरस्मिन् सन्निकृष्टा बुद्धि-रुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्यापरेण दिक्प्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिः । प्रदेशों के संयोग के द्वारा ( दिक्कृत ) परत्व विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होता है । इसके बाद इसी परत्व विषयक को अवलम्बन बना कर दूर के दिक् प्रदशों के संयोग से दिक्कृत परत्व ( गुण ) की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार दूर दिशा के द्रव्य को अवधि मानकर ' इससे यह समीप है ' इस प्रकार का बुद्धि अपरत्व गुण के आधारभूत द्रव्य में उत्पन्न होती है । इसके बाद इस बुद्धि को अवलम्बन मानकर ' अपर ' अर्थात् समीपवाले प्रदेशों के संयोग से दिक्कृत अपरत्व गुण की उत्पत्ति होती हैं । न्यायकन्दली विप्रकृष्टबुद्धयुत्पत्त्यनन्तरं विप्रकृष्टां बुद्धिमपेक्ष्य परेण संयोगभूयस्त्ववता दिक्प्रदेशेन संयोगादसमवायिकारणाद् विप्रकृष्टे पिण्डे समवायिकारणभूते परत्वस्योत्पत्तिः । द्रष्टुः स्वशरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगभूयस्त्ववन्तं विप्रकृष्टं चावधि कृत्वेतरस्मिन् संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टा बुद्धि-रुदेति । तां सन्निकृष्टां बुद्धि निमित्तकारणीकृत्यापरेण संयुक्त संयोगाल्पीय-स्त्वविशिष्टेन दिक्प्रदेशेन सह संयोगादसमवायिकारणात् पिण्डे समवायिकारणं परत्वस्योत्पत्तिः । सन्निकृष्ट विप्रकृष्टबुद्धयोः परस्परापेक्षित्वादुभयाभावप्रसङ्ग इति चेत्? न, अनभ्युपगमातं । न सन्निकृष्टोऽयमित्येवं प्रतीत्यैव तदपेक्षया विप्रकृष्टबुद्धिः, अवधि मानकर बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे देश की अपेक्षा परत्व की उत्पत्ति उस पिण्ड ( द्रव्य ) में होती है । इस परत्व का उक्त द्रव्य समवायिकारण है, पिण्ड में रहनेवाले कथित संयोग उसके असमवायिकारण हैं । अर्थात् देखनेवाले को अपने शरीर की अपेक्षा अधिक संयोगवाले दूर देश के द्रव्य को अवधि मानकर उससे भिन्न एवं उससे अल्प संयोगवाले देश के द्रव्य में ' सन्निकृष्ट बुद्धि ' अर्थात् ' इससे यह समीप है ' इस आकार को थुद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार समीप के पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति का उक्त पिण्ड समवायिकारण है, अल्प संयोग से युक्त दिक् प्रदेशों के साथ उक्त पिण्ड का संयोग निमित्तकारण है । एवं उक्त संनिकृष्टबुद्धि निमित्तकारण है । ( प्र ० ) किसी के संनिकृष्ट समझे जाने पर उसकी अपेक्षा कोई विप्रकृष्ट समझा जाता है । एवं किसी के विप्रकृष्ट समझे जाने पर ही उसकी अपेक्षा कोई संनिकृष्ट समझा जाता 1 इन प्रकार दोनों बुद्धियाँ अगर परस्पर सापेक्ष हैं, तो फिर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] कालकृतयोरपि ३१७ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् कथम? वर्तमानकालयोरनियत दिग्देश-संयुक्तयोर्युवस्थविरयो रूढरम कार्कश्यव लिपलितादिसान्निध्ये सत्येकस्य ( प्र ० ) कालिक ( कालकृत ) परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है? ( उ ० ) वर्त्तमान काल में अवस्थित किसी भी दिक्प्रदेश साथ संयुक्त युवा पुरुष में कड़ी मूछ और गठित शरीर ( प्रभृति असा-धारण स्थिति, और किसी भी दिक् प्रदेश से संयुक्त वृद्ध पुरुष में पके न्यायकन्दली नापि विप्रकृष्टोऽयमिति प्रतीत्यैव तदपेक्षया सन्निकृष्टबुद्धयुदयः, किन्तु संयोगापीयस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगभूयस्त्ववति विप्रकृष्टबुद्धिः । एवं संयोग भूयस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगाल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टबुद्धयुत्पत्तिरिति न परस्परापेक्षित्वमनयोः । दिक्कृतयोस्तावत्परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः परत्व और अपरस्व इन दोनों की सत्ता ही उठ जाएगी कालकृतयोरपि कथम्? दोनों बुद्धियों के कारणीभूत ( उ ० ) दोनों की सत्ता के उठ जाने को आपत्ति नहीं है, क्योंकि हम ऐसा नहीं मानते, क्योंकि ' ततः ' अर्थात् इस विप्रकृष्ट बुद्धि के बाद उसी के साहाय्य से बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे उस पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति होती है । इस परत्व का समवायिकारण उक्त पिण्ड ही है, एवं उन दिशाओं के साथ उस पिण्ड का संयोग ही उसका असमवायि-कारण है । अभिप्राय यह है कि द्रष्टा पुरुष के शरीर के मध्यवर्ती बहुत से दिग्देशों के संयोग से युक्त होने के कारण ' विप्रकृष्ट ' अर्थात् दूर देश को अवधि मानकर, उससे अल्प संयोग से युक्त मध्यवर्त्ती देश में ' संनिकृष्ट बुद्धि ' अर्थात् ' उससे यह समीप है ' इस आकार की बुद्धि उक्त द्रष्टा पुरुष को होती है । इस संनिकृष्ट बुद्धिरूप निमित्त-कारण से उक्त पिण्डरूप समावायिकारण में परत्व की उत्पत्ति होती है, जिसका अल्प संयोग से युक्त दिक्प्रदेश और पिण्ड का संयोग असमवायिकारण है । ' संनिकृष्टोऽ-यम् ' अर्थात् ' यह समीप ' है इस प्रकार की संनिकृष्ट बुद्धि से ही उसकी अपेक्षा ' यह दूर है ' इस आकार की विप्रकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । एवं ' विप्रकृष्टोऽयम् ' इस बुद्धि से ही इसकी अपेक्षा ' यह समीप है ' इस आकार की संनिकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । किन्तु उक्त प्रदेशों के संयोगों की अल्पता के साथ ज्ञात द्रव्य ( पिण्ड ) की प्रतीति से ही ( इस पिण्ड की ) अपेक्षा अधिक दिक्प्रदेशों के संयोगों से युक्त पिण्ड में विप्रकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी प्रकार दिक्प्रदेशों के अधिक संयोगों के साथ ज्ञात द्रव्य की प्रतीति से ही उसकी अपेक्षा अल्प दिक्प्रदेशों के संयोगवाले पिण्ड में संनिकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है । अत: परस्परापेक्ष होने के कारण परत्व और अपरत्व दोनों की असत्ता की आपत्ति नहीं है । ' कालकृतयोरपिकथम्? अर्थात् ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ से प्रश्न करते हैं कि दिक्कृत परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति तो उपपादित हुई, किन्तु कालिक परत्व और For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-द्रष्टुर्युवानमवधिं कृत्वा स्थविरे विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण कालप्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्यापरेण कालप्रदेशेन संयो-गादपरत्वस्योत्पत्तिरिति । हुए केश और शरीर की शिथिलता ( प्रभृति ) की स्थिति, इन दोनों स्थितियों के रहते हुए दोनों को देखनेवाले पुरुष को उक्त युवा पुरुष की अपेक्षा उक्त वृद्ध पुरुष में ' विप्रकृष्ट ' बुद्धि अर्थात् कालकृत परत्व ( ज्येष्ठत्व ) की बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे काल-प्रदेश के साथ के संयोग से ( वृद्ध पुरुष ) में कालकृत परत्व ( ज्येष्ठत्व ) की उत्पत्ति होती है । एवं इसी वृद्ध पुरुष की अपेक्षा युवा पुरुष में ' संनिकृष्ट ' बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे कालप्रदेश के साथ ( युवा ) पुरुष के संयोग से कालकृत अपरत्व ( कनिष्ठत्व ) की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कथिता, कालकृतयोरपि तयोरुत्पत्तिः कथमिति प्रश्नः । समाधानं वर्तमानकालयोरिति । कस्मिन् वा पिण्डे s विद्यमाने परत्वापरत्वे न भवतः, तदर्थं वर्तमानकालयोरित्युक्तम् । अनियत दिग्देशयोरित्येकदिश्यव-स्थितयोभिन्नदिगवस्थितयोर्वा युवस्थविरयो रूढश्मश्रु च कार्कश्यं च बलिश्च पलितं च चेषां कालविप्रकर्षलिङ्गानां सान्निध्ये सत्येकस्य द्रष्टुर्युवानं रूढ-अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है? इसी प्रश्न का समाधान ' वर्तमानकालयोः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । इस समाधान वाक्य में ' वर्तमानकालयोः ' यह पद इस लिए दिया गया है कि चूंकि दोनों ही पिण्डो के न रहने पर, या दोनों में से किसी एक के न रहने पर भी ( उनमें से किसी में ) परत्व या अपरत्व की उत्पत्ति नहीं होती है । ' अनियतदिग्देशयोः ' अर्थात् एक दिशा में अथवा विभिन्न दिशाओं में स्थित्त युवक और वृद्ध पुरुष में ( से युवा पुरुष में रहनेवाले ) मूँछों का कड़ापन और देह का कड़ा गठन एवं ( वृद्ध पुरुष की ) झुर्री और पके केश प्रभृति काल के ज्ञापक हेतुओं का सामीप्य रहने पर दोनों को देखनेवाले किसी एक पुरुष को मूँछों की कड़ाई और देह के काठिन्य से युवा पुरुष में अल्पकाल सम्बन्धरूप कनिष्ठत्व या संनिकृष्ट-बुद्धिरूप ज्येष्ठत्व की अनुमिति होती है । इस अल्पकाल को अवधि मानकर झुर्री और पके केश वाले वृद्ध पुरुष में अधिककाल सम्बन्ध रूप ज्येष्ठत्व या कालविप्रकृष्टत्व की वृद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार उस वृद्ध पुरुष में कालिक परत्व ( ज्येष्ठत्व ) की उत्पत्ति For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशस्त्वपेक्षा बुद्धिसंयोगद्रव्य विनाशात् । REE अपेक्षाबुद्धिविनाशात् तावदुत्पन्ने परत्वे यस्मिन् काले सामान्य-बुद्धिरुत्पन्ना भवति, ततोऽपेक्षा बुद्धेर्विनश्यत्ता, सामान्यज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः ( परत्व और अपरत्व इन दोनों का ) विनाश ( इन सात ) रीतियों में से किसी रीति से होता है - ( १ ) अपेक्षा बुद्धि के विनाश से, ( २ ) संयोग के विनाश से, ( ३ ) द्रव्य विनाश से, ( ४ ) द्रव्य और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों के विनाश से, ( ५ ) द्रव्य और संयोग इन दोनों के विनाश से ( ६ ) संयोग और अपेक्षा बुद्धि इन दोनों के विनाश से, ( ७ ) एवं अपेक्षाबुद्धि द्रव्य एवं संयोग इन तीनों के विनाश से । ( १ ) अपेक्षाबुद्धि के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश इस प्रकार होता है कि परत्व ( या अपरत्व ) की उत्पत्ति के बाद जिस समय ( परत्व या अपरत्व में रहनेवाले ) सामान्य ( परत्वत्वादि जातियों ) की न्यायकन्दली श्मश्रुका कश्याद्यभावानुमितमल्पोत्पत्तिकालमर्वाध कृत्वा रूढश्मश्रुबलिपलिता-दिमति स्थविरे विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धिमपेक्ष्य परेणादित्य-परिवर्तनभूयस्त्ववता कालप्रदेशेन संयोगादसमवायिकारणात् तस्मिन्नेव स्थविरे परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धि-मपेक्ष्यापरेणाल्पादित्यपरिवर्तनोपलक्षितेन कालप्रदेशेन संयोगादपरत्वस्यो-त्पत्तिः । युवस्थविरशरीरयोः कालसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वे शरीरसन्ताना-पेक्षया, न तु व्यक्तिविषयत्वेन तयोः प्रतिक्षणं विनाशात् । होती है, जिसमें वह पुरुष समवायिकारण है, एवं सूर्य को अधिक क्रियावाले काल प्रदेश के साथ उस पुरुष का संयोग असवायिकारण है, एवं उक्त विप्रकृष्ट बुद्धि निमित्तकारण हैं । ( इसी प्रकार ) वृद्ध पुरुष को अवधि मानकर युवा पुरुष में अल्प-काल सम्बन्ध रूप संनिकृष्ट बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसी बुद्धिरूप निमित्तकारण से ' युवा पुरुषरूप समवायिकारण में कालिक अपरत्व ( कनिष्ठत्व ) की उत्पत्ति होती है, जिसका असमवायिकारण आदित्य की अल्पगति से परिमित कालप्रदेश और उस युवा पुरुष का संयोग है । यद्यपि युवा शरीर और वृद्ध शरीर दोनों ही क्षणिक है, ( अतः दोनों ही के एक एक शरीर में समान ही काल का सम्बन्ध है ), अतः दोनों में अधिककाल सम्बन्ध और अल्पकाल सम्बन्ध वर्त्तमान काल के दोनों शरीर के समुदायों को दृष्टि में रखकर कहा गया है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४०० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । ततोऽपेक्षा बुद्धे विनाशो गुणबुद्धे-श्चोत्पत्तिः, ततोऽपेक्षा बुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता, गुणज्ञान-बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि को विनष्ट करनेवाले कारण-समूह एकत्र हो जाते हैं, एवं ( परत्वादि में रहनेवाले उक्त ) सामान्य, एवं सामान्य के ज्ञान और परत्वादि गुणों के साथ उक्त सामान्य का सम्बन्ध इन सबों से परत्वादि गुणविषयक बुद्धि के उत्पादक कारणसमूह भी एकत्र हो जाते हैं । ये सभी कार्य एक समय में होते हैं । उसके बाद ( एक ही समय ) अपेक्षाबुद्धि का विनाश और ( परत्वादि ) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, इसके बाद अपेक्षा बुद्धि के विनाश से परत्वादि गुणों के विनाशक कारणसमूह का एकत्र होना, परत्वादि गुण, उसके ज्ञान, एवं द्रव्य के साथ परस्वादि न्यायकन्दली कृतकस्यावश्यं विनाशः, स च निर्हेतुको न भवतीति परत्वापरत्वयो-विनाशहेतुमाह - विनाशस्त्विति । परत्वापरत्वयोविनाशोऽपेक्षाबुद्धिविनाशात्, संयोगविनाशात्, द्रव्यविनाशात्, द्रव्यापेक्षाबुद्धयोविनाशात्, द्रव्यसंयोगयो-अपेक्षा बुद्धिसंयोग द्रव्याणां विनाशात्, संयोगापेक्षा बुद्धविनाशात्. विनाशादिति सप्तविधो विनाशक्रमः । ( १ ) अपेक्षा बुद्धिविनाशात् तावद्विनाशः कथ्यते । उत्पन्ने परत्वे यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्ये बुद्धिरुत्पन्ना भवति । तत इति सप्तम्यर्थे सार्व-जिसकी उत्पत्ति होती है उसका विनाश भीअवश्य ही होता है । एवं विनाश भी बिना कारणों के नहीं होता । अतः ( परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति के निरूपण के बाद ) परत्व और अपरत्व के विनाश के हेतुओं का निरूपण ' विनाशस्तु ' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विनाश इन सात प्रकार के विनाशक्रमों में से ही किसी से होता है -- ( परत्व और अपरत्व का विनाश ( १ ) अपेअ बुद्धि के नाश से, २ ) संयोग के विनाश से, ( ३ ) द्रव्य के विनाश से, ( ४ ) द्रव्य और अपेक्षा बुद्धि दोनों के विनाश से, ( ५ ) द्रव्य और संयोग इन दोनों के विनाश से ( ६ ) संयोग और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों के विनाश से, एवं ( ७ ) अपेक्षाबुद्धि, संयोग, और द्रव्य, इन तीनों के विनाश से । इनमें क्रमप्राप्त सबसे पहिले ( १ ) अपेक्षा बुद्धि के विनाश से होनेवाले परत्व और अपरत्व के विनाश का क्रम ' अपेक्षाबुद्धिविनाशासात्रत् ' इत्यादि सन्दर्भ से उप-पादित हुआ है । ' तत: ' इस पद में सप्तमी विभक्ति के अर्थ में ' तसिल् ' प्रत्यय है । इसी समय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ५१ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ४०१ प्रशस्तपादभाष्यम् ततो द्रव्यबुद्धे-For Private And Personal तत्सम्बन्धेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । रुत्पत्तिर्गुणस्य विनाश इति । संयोगविनाशादपि कथम् १ अपेक्षा बुद्धिसमकालमेव परत्वाधारे कर्मोत्पद्यते । तेन कर्मणा दिपिण्डविभागः क्रियते । अपेक्षाबुद्धितः गुणों का सम्बन्ध इन सबों से ( परत्वादि गुण से युक्त ) द्रव्यविषयक बुद्धि उत्पादक कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद ( परत्वादि गुणविशिष्ट ) द्रव्य विषयक ( विशिष्ट ) बुद्धि की उत्पत्ति और परत्वादि गुणों का विनाश ये दोनों काम एक ही समय होते हैं । ( २ ) ( प्र ० ) केवल संयोग के विनाश से ( परत्व और अपरत्व का विनाश ) किस प्रकार होता है? ( उ ० ) ( जहाँ ) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही परत्वादि गुणों के आधारभूत द्रव्य में क्रिया होती है, एवं उस क्रिया के द्वारा उस द्रव्य और दिक्प्रदेश इन दोनों का विभाग उत्पन्न होता है, और अपेक्षा -न्यायकन्दली विभक्तिकस्त सिलिति तसिल् । एतस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेविनश्यत्ता विनाश-कारणसान्निध्यम् । सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः परत्वसामान्यं च, परत्व-सामान्यज्ञानं च परत्वगुणसम्बन्धश्च तेभ्यः परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । परत्वसामान्यज्ञानमेवापेक्षाबुद्धिविनाशकारणम्, गुणबुद्धेश्चोत्पत्ति-कारणम्, अतस्तदुत्पाद एवापेक्षा बुद्धेविनश्यत्ता गुणबुद्धेश्चोत्पद्यमानता स्यात् । ततः क्षणान्तरेऽपेक्षाबुद्धेविनाशः, परत्वगुणबुद्धेश्चोत्पादः । तत-स्तस्मादपेक्षाबुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता । गुणश्व गुणज्ञानं च तत्सम्ब-न्धश्च तेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । अपेक्षा बुद्धिविनाशो ( अर्थात् परत्व की उत्पत्ति हो जाने पर जिस समय परत्व गुण में रहनेवाले सामान्य का ज्ञान होता है, उसके बाद ) अपेक्षा बुद्धि की ' विनश्यत्ता ' अर्थात् विनाश के सभी कारणों का समावेश होता है । ' सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः ' ( इस भाष्य सन्दर्भ का ) ‘ परत्वसामान्यच परत्वसामान्यज्ञानश्च परत्वगुण सम्बन्धश्च तेभ्यः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह अभिप्राय है कि परत्वसामान्य एवं परत्वसामान्य का ज्ञान और परत्वगुण का सम्बन्ध, इन तीन कारणों से ' परत्वगुण की उत्पद्यमानता ' अर्थात् परत्वगुण के उत्पादक काम एक ही समय सभी कारणों का संनिवेश होता है, ये सभी होते हैं । परत्वसामान्य का ज्ञान ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश एवं गुणबुद्धि की उत्पत्ति इन दोनों का कारण है | अतः अपेक्षाबुद्धि की विनश्यत्ता और गुणबुद्धि की उत्पद्य-मानता दोनों ही वस्तुतः परत्वसामान्य बुद्धि की उत्पत्ति स्वरूप ही है । इसके बाद दूसरे क्षण में अपेक्षाबुद्धि का विनाश होगा, एवं परत्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति होगी । ' ततः '
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततः सामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः, दिकूपिण्ड-संयोगस्य च विनाशः । ततो यस्मिन् काले गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव बुद्धि के द्वारा परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है । उसके बाद ( परत्वादि गुणों में रहनेवाले ) सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, उक्त द्रव्य और पूर्व दिक्-प्रदेश इन दोनों के संयोग का नाश, ये दोनों काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय परत्वादिगुणविषयक ( विशिष्ट ) बुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय ( कथित ) दिक्प्रदेश और ( परत्वादि गुणों के आधार-न्यायकन्दली गुणविनाशस्य कारणम् गुणबुद्धिस्च द्रव्यबुद्धेः कारणम्, अपेक्षाबुद्धिविनाश-गुणबुद्धत्पादौ च युगपत् स्याताम्, अतो गुणस्य विनश्यत्ता द्रव्यबुद्धे-श्चोत्पद्यमानतापि युगपत् । ततः परत्वविशिष्टद्रव्य बुद्धेरुत्पादः स्यात् परत्वगुणस्य च विनाशः । संयोगविनाशादपि कथं सत्याह- अपेक्षा बुद्धिसमकालमेव परत्वापरत्वयोविनाश इति प्रश्ने कृते परत्वस्याधारे पिण्डे कर्मोत्पद्यते, क्षणान्तरे तेन कर्मणा दिशः परत्वाधार पिण्डस्य च विभागः क्रियते, अपेक्षा-इसके बाद, अपेक्षा बुद्धि के विनाश से गुण की विनश्यत्ता उत्पन्न होती है ) । ' गुणज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः ' ( इस भाष्यपङ्क्ति का ) ( गुणश्च गुणज्ञानञ्च तत्सम्बन्धश्च तेभ्यः ' ( इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह अभिप्राय है कि ) गुण एवं गुण का ज्ञान और गुण का सम्बन्ध इन तीनों से द्रव्य बुद्धि ( अर्थात् परत्व गुणविशिष्ट द्रव्य बुद्धि की ) उत्पद्य-मानता निष्पन्न होती है । ये सभी काम एक ही समय होते हैं । अपेक्षाबुद्धि का विनाश ( परत्वादि ) गुणों के विनाश का कारण है । गुणबुद्धि ( गुणविशिष्ट ) द्रव्यबुद्धि का कारण है! अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और गुणबुद्धि का उत्पादन दोनों एक ही समय होते हैं । इसीलिए गुण की विनश्यत्ता और द्रव्यबुद्धि को उत्पद्यमानता ये दोनों भी एक ही समय होंगी । एवं इसी कारण ( परत्व ) गुण की विनश्यत्ता और ( परत्व-गुण विशिष्ट ) द्रव्य बुद्धि की उत्पद्यमानता ये दोनों भी एक ही समय होंगी । इसके बाद परत्वगुण विशिष्ट द्रव्य बुद्धि की उत्पत्ति एवं परत्व गुण का विनाश होगा । ( २ ) केवल संयोग के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश किस रीति से ( किस स्थिति में ) होता है? यह प्रश्न किये जाने पर ' अपेक्षा बुद्धिसमकालमेव ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । | अर्थात् जहाँ निम्निलिखित स्थिति होती है, वहाँ संयोग के विनाश से परत्व का विनाश होता है । ( जैसे ) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही पिण्ड ( परत्वादि के आधार भूत द्रव्य ) में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के द्वारा आगे दूसरे क्षण में उक्त पिण्ड का पूर्व दिशा के साथ विभाग उत्पन्न होता है, एवं For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४०३ काले दिपिण्डसंयोगविनाशाद् गुणस्य विनाशः । द्रव्यविनाशादपि कथम्? परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्नं यस्मिन्नेव कालेऽवयवान्तराद विभागं करोति तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षा-भूत द्रव्य इन दोनों के ) संयोग के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश होता है । ( ३ ) ( प्र ० ) ( आधारभूत ) द्रव्य के विनाश से ( परत्वादि गुणों का ) विनाश किस प्रकार किस स्थिति में ) होता है? ( उ ० ) ( जहाँ ) परत्वादि गुणों के आधारभूत द्रव्य ( के एक अवयव ) में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय एक अवयव का दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, न्यायकन्दली बुद्धेश्च परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । तत उत्पन्ने परत्वे परत्व-सामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः दिपिण्डसंयोगस्य च विभागाद् विनाश इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यज्ञानाद् गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव काले दिपिण्डसंयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशो नापेक्षा बुद्धिविनाशात्, अपेक्षा-बुद्धेरपि तदानीमेव विनाशात् । द्रव्यविनाशादपि कथं विनाश इत्याह- परत्वाधारावयव इति । भविष्यतः परत्वस्याधारो द्रव्यम्, तस्यावयवे कर्मोत्पन्नं यदाऽवयवान्तराद् विभागं करोति, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षा बुद्धिरुत्पद्यते । ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वमुत्पद्यते । ततः अपेक्षा बुद्धि के द्वारा परत्व की उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय ( परत्व गत जातिरूप ) सामान्य के ज्ञान से गुणविशिष्टद्रव्य विषयक बुद्ध की उत्पत्ति होती है, उसी समय दिशा और ( परत्व के आधारभूत द्रव्य रूप ) पिण्ड इन दोनों के संयोग के विनाश से परत्व का भी विनाश होता है । ( यहाँ ) परत्व का विनाश अपेक्षाबुद्धि के विनाश से सम्भव नहीं है, क्योंकि उसी समय ( परत्वनाश के समय ही ) अपेक्षाबुद्धि का भी विनाश होता है । ( ३ ) ( आधारभूत ) द्रव्य के विनाश से परत्वादि का बिनाश किस प्रकार होता है? इस प्रश्न का उत्तर परत्वाधारावयवे ' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । उत्पन्न होनेवाले परत्व के आधारभूत अवर्याय प्रव्य ही ( प्रकृत में ' परत्वाधार शब्द से इष्ट है ) इस ( द्रव्य ) के अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय ( अपने आधारभूत एक अवयव द्रव्य का ) दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि भी उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir Yax न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धिरुत्पद्यते । ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले परत्वमुत्पद्यते । ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितस्य गुणस्य विनाशः! द्रव्यापेक्षा बुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् यदा परत्वाधारावयवे इसके बाद जिस समय उक्त विभाग के द्वारा परत्वादि के आधारभूत द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों के संयोग का नाश होता है, उसी समय परत्वादिगुणों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद ( उक्त ) संयोग के विनाश से ( परत्वादि के आधारभूत ) द्रव्य का नाश होता है, एवं द्रव्य के विनाश से उसमें रहनेवाले परत्वादि गुणों का भी नाश हो जाता है । ( ४ ) एक ही समय ( परत्वादि के आधारभूत ) द्रव्य और अपेक्षा बुद्धि इन दोनों के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश ( कहाँ और किस न्यायकन्दली संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः । ततो द्रव्यविनाशात् तदाश्रितस्य गुणस्य विनाशः । तदानीमेव परत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेविनाशः, आश्रयविनाशाच्च दिपिण्ड-संयोगविनाश इत्यनयोर्न हेतुत्वं सहभावित्वात् । परत्वाधारावयवे द्रव्यापेक्षा बुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् । कर्मोत्पद्यते तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद् विभागः क्रियते, परत्व-स्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्यारम्भक-होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इसके बाद उक्त संयोग के विनाश से ( अवयवि ) द्रव्य का विनाश होता है । चूँकि परत्वगुण में रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का विनाश एवं ( उक्त अवयवी रूप ) अभय के विनाश से दिशा और पिण्ड के संयोग का विनाश, ये दोनों भी उसी समय उत्पन्न होते हैं, अतः ( परत्व के विनाशक रूप में कथित होने पर भी ) ये दोनों प्रकृत में परत्वादि के विनाशक नहीं हो सकते । ( ४ ) एक ही समय उत्पन्न होनेवाले द्रव्य का विनाश और अपेक्षा बुद्धि का विनाश इन दोनों से किस प्रकार परत्वादि का विनाश होता? ' द्रव्यापेक्षा बुद्धयोः ' इत्यादि से इस प्रश्न का उपपादन किया गया है, एवं ' यदेव परत्वाधारावयबे ' इत्यादि से उसके समाधान का उपपादन हुआ है । ( जहाँ ) जिस समय परत्व के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०५ प्रशस्तपादभाष्यम् कर्मोत्पद्यते तदैवापेक्षा बुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद् विभागः क्रियते, परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयव-विभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोग विनाशस्तस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धि-रुत्पद्यते, तदनन्तरं संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, सामान्य-क्रिया ) और अपेक्षाबुद्धि दोनों एक ही समय उत्पन्न होती हैं, एवं क्रिया उसी समय दोनों अवयवों में विभाग को उत्पन्न करती है, एवं ( अपेक्षा बुद्धि ) परत्वादि गुणों को उत्पन्न करती है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय उक्त विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय ( परत्वादिगुणों में रहनेवाली ) सामान्य ( जाति ) विषयक बुद्धि मी उत्पन्न होती है । इसके बाद ( उक्त संयोग के नाश से ) न्यायकन्दली संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तदनन्तरं संयोग-विनाशाद् द्रव्यविनाशः, सामान्यबुद्धेश्चापेक्षाबुद्धेरपि विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षाबुद्धयोविनाशात् परत्वस्य विनाशः, प्रत्येकमन्यत्रो भयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वप्रतीतेः । इह चान्यतरविशेषानवधारणादुभयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वम् । आधारभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय क्रिया से उसके आधारभूत अवयव द्रव्य का दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, एवं ( उक्त अवयवी द्रव्य में ) परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय अवयवों के विभाग से द्रव्य ( अवयवि ) के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय परत्व ( में रहनेवाले ) सामान्य का ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसके बाद ( अवयवों के ) संयोग के विनाश से द्रव्य का विनाश होता है, एवं कथित सामान्य विषयक ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का भी विनाश होता है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जो परत्व का विनाश होता है वह द्रव्य विनाश और अपेक्षा बुद्धि का विनाश इन दोनों से ही होता है । क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में परत्व विनाश की कारणता स्वीकृत हो चुकी है । एवं दोनों में से किसीएक में किसी विशिष्टता की प्रतीति नहीं होती, जिससे कि किसी एक को ही कारण मानें दूसरे को नहीं, अतः ( समानयुक्ति रहने के कारण ) दोनों को ही परस्व - विनाश का कारण मानना पड़ता है । For Private And Personal