प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 481–490
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 481–490
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-बुद्धेश्चापेक्षायुद्धिविनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षा बुद्धयो-विनाशात् परत्वस्य विनाशः । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथम् १ यदा परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्न-मवयवान्तराद् विभागं करोति तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षा बुद्धयोर्युग-पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले विभा-द्रव्य का नाश एवं उक्त सामान्यविषयक बुद्धि और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों का भी नाश होता है । इसके बाद उक्त द्रव्यनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है । ( ५ ) ( प्र ० ) द्रव्यनाश और संयोगनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश ( कहाँ और ) किस स्थिति म होता है? ( उ ० ( जहाँ ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत द्रव्य के अवयव में उत्पन्न क्रिया उसके दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय परत्वादि के आधार-भूत ( अवयव ) द्रव्य में भी क्रिया एवं अपेक्षाबुद्धि दोनों की उत्पत्ति पहिले की तरह होती है, इसके बाद जिस समय परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी न्यायकन्दली द्रव्यसंयोगविनाशादपीत्यादि । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथं? विनाश:? यदा परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद् विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षा बुद्धयोर्युगपदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्यो -त्पत्तिस्तस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा च दिपिण्डस्य च विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्ड-( ५ ) ' द्रव्यसंयोगादपि ' इत्यादि भाष्यग्रन्थ के द्वारा यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य का विनाश और संयोग का विनाश इन दोनों से परत्वादि का विनाश कैसे होता है? ( उ ० ) ( जहाँ ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत अवयव में कर्म उत्पन्न होकर अपने आश्रयरूप अवयव का दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करता है, उसी समय एक साथ ही अवयवी में क्रिया और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय परस्व की उत्पत्ति होती है, उसी समय अवयवों के विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का भी विनाश होता है । एवं अवयवी की क्रिया के द्वारा दिशा से अवयव का विभाग भी उत्पन्न होता है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय: परस्व गुण में रहने वाले ) सामान्य का ज्ञान होता है, उसी समय द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश से अवयवी का विनाश भी उत्पन्न होता For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०७ प्रशस्तपादभाष्यम् गाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा दिकपिण्डस्य च विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, पिण्ड-समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का नाश और ( उक्त अवयवि-रूप ) पिण्ड की क्रिया से पिण्ड का पूर्वदिक् प्रदेश से विभाग, ये दोनों काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय सामान्य विषयक बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी समय ( अवयवि ) द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश से ( परत्वादि के आधारभूत अवयवि ) पिण्डद्रव्य का विनाश, और पिण्ड के विनाश से ( पूर्वदिक् प्रदेश के साथ ) पिण्डसंयोग का विनाश भी होता विनाशः, पिण्डविनाशाच्च पिण्डदिपिण्डसंयोगविनाशात् न्यायकन्दली पिण्डसंयोग विनाशः, परत्वस्य विनाशः । न कारणम्, तदानीमेव सामान्यबुद्ध स्तस्य सम्भवात् । ततो गुणबुद्धिसमकालं अपेक्षा बुद्धिविनाशस्तु संयोगापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदा परत्वमुत्पद्यते तदा परत्वस्याधारे द्रव्ये कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यबुद्धिरुत्पद्यते परत्वस्याधारे, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिपिण्डविभागः क्रियते । ततः सामान्यबुद्धितोऽपेक्षा बुद्धिविनाशो दिपिण्डविभागाच्च दिपिण्डसंयोग-है । एवं अवयवी के विनाश से उसमें रहनेवाले संयोग का भी विनाश होता जाता है । इसके बाद जिस समय परत्व गुण ( विशिष्टद्रव्य ) की बुद्धि उत्पन्न होती हैं, उसी समय परत्व का विनाश भी होता है । अपेक्षाबुद्धि का विनाश यहाँ परत्व के विनाश का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि परस्त्र के विनाश के काल में ही परत्व में रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से वह उत्पन्न होती है । ( ६ ) ( प्र ० ) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से परत्व का विनाश किस प्रकार होता है? ( उ ० ) ( इस प्रकार होता है कि ) जिस समय परत्व उत्पन्न होता है उसी समय परत्व के आधारभूत द्रव्य में क्रिया भी उत्पन्न होती । इसके बाद जिस समय परत्व में रहनेवाले सामान्य का ज्ञान उत्पन्न होता है, उसी समय परत्व के आधारभूत द्रव्य में उसी में रहनेवाली क्रिया से दिशा के साथ उसका विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद परत्व में रहनेवाले सामान्य विषयक बुद्धि के विनाश से अपेक्षा बुद्धि का विनाश उत्पन्न होता है, एवं दिशा और ( परत्व के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४०८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-विनाशाच्च पिण्डसंयोगविनाशः । ततो गुणबुद्धिसमकालं पिण्ड-दिपिण्डसंयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः । संयोगापेक्षा बुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम्? यदा परत्वमुत्पद्यते तदा परत्वाधारे कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्य बुद्धिरुत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिपिण्डविभागः क्रियते, ततः सामान्य-है । इसके बाद ( परत्वादि ) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति के समय ( परत्वादि के आधारभूत ) पिण्ड के नाश और पिण्ड का ( पूर्वदिक् प्रदेश के साथ ) संयोग के नाश, इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है । ( ६ ) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से ( कहाँ और ) किस स्थिति में परत्वादिगुणों का विनाश होता है? ( उ ० ) ( जहाँ ) जिस समय परत्वादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय उनके आधार-भूत द्रव्यों में क्रिया भी उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय परत्वादि गुणों में रहनेवाले ( परत्वत्वादि ) सामान्यविषयक बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी समय पिण्ड ( द्रव्य ) की क्रिया से पूर्वदिप्रदेश के साथ पिण्ड ( द्रव्य ) का विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद उक्त सामान्यविषयक ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का विनाश और उक्त विभाग से पूर्वदिक्प्रदेश के साथ पिण्ड के संयोग का विनाश इतने कार्य एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त संयोगनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है । न्यायकन्दली विनाश इत्येकः कालः । ततः संयोगापेक्षा बुद्धिविनाशात् परत्वस्य विनाशः । द्रव्यविनाशस्तु तदानीं नास्त्येवेति न तस्य हेतुत्वम् । त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशादपि कथम्? इतने सारे काम आधारभूत ) द्रव्य के विभाग से उन दोनों के संयोग का नाश होता है एक ही समय होते हैं । इसके बाद कथित ( दिपिण्ड ) संयोग और दोनों के विनाश से परत्व का विनाश होता है । उस समय द्रव्य का अत: वह ( उस समय के परत्व विनाश का ) कारण नहीं हो सकता ॥ अपेक्षाबुद्धि इन विनाश नहीं है, ( ७ ) ' त्रयाणाम् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा ( समवायि चासमवायि च निमित्तच समवायसमवायिनिमित्तानि तानि च कारणानि चेति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानि ) इस विग्रह के अनुसार यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य या रूप समवायिकारण, दिपिण्ड For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् III बुद्धितोऽपेक्षा बुद्धिविनाशः, विभागाच्च दिपिण्डसंयोगविनाश इत्येकः कालः । ततः संयोगापेक्षा बुद्धिविनाशात् परत्वस्य विनाशः । त्रयाणां समवाय्य समवायिनिमित्तकारणानां युगपद् विनाशादपि कथम्? यदा-पेक्षा बुद्धिरुत्पद्यते तदा पिण्डावयवे कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले कर्मणा -वयवान्तराद् विभागः क्रियतेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वस्य चोत्पत्तिस्त-स्मिन्नेव काले पिण्डेऽपि कर्म, ततोऽवयवविभागात् पिण्डारम्भकसंयोग-( ७ ) ( प्र. ) समवायिकारण ( परत्वादि के आधारभूत द्रव्य ) असमवायिकारण ( दिकूप्रदेशसंयोग ) और निमित्तकारण ( अपेक्षाबुद्धि ) इन तीनों के नाश से परत्वादि गुणों का नाश ( कहाँ और ) किस स्थिति में होता है? ( उ ) जहाँ जिस समय अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय ( परत्वादि के समवायिकारण ) पिण्ड के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय उक्त क्रिया से ( एक अवयव का ) दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि और परत्वादि गुण इन दोनों की उत्पत्ति होती है । एवं पिण्ड ( अवयवि ) में भी क्रिया उसी समय उत्पन्न होती है । इसके बाद अवयवों के उक्त विभाग से पिण्ड के न्यायकन्दली समवायि चासमवायि च निमित्तं च समवाय्यसमवायिनिमित्तानि तानि च कारणानि चेति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानि द्रव्यसंयोगापेक्षा-ज्ञानानि तेषां त्रयाणां युगपद् विनाशात् कथं परत्वस्य विनाश इति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरमाह - यदेति । इत्येतत् सर्वं युगपद् भवति कारणयौगपद्यात्, ततश्च त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति । परत्वस्य विनाश इत्युपलक्षणमिदम् । दर्शयितव्यः । अपरत्वस्याप्ययमेव विनाशक्रमो संयोग रूप असमवायिकारण, एवं अपेक्षाबुद्धि रूप निमित्तकारण, इन तीनों कारणों के एक ही समय विनाश के कारण परत्व का विनाश किस प्रकार होता है? इसी प्रश्न के उत्तर में ' यदा ' इत्यादि भाष्य सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जब एक ही समय उक्त तीनों कारणों के विनाश कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं, तो फिर तीनों का एक ही समय विनाश हो जाता है । इसके बाद परत्व के तीनों कारणों के विनाश से परत्व का विनाश होता । इस प्रकरण में ' परत्वविनाश ' शब्द उपलक्षणमात्र है ( नियामक नहीं ), अतः इसीसे अपरत्व नाश का भी यही क्रम जानना चाहिए । ५२ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-विनाशः, पिण्डकर्मणा च दिकूपिण्डविभागः क्रियते, सामान्य बुद्धेश्चोत्प-तिरित्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, विभागाच्च दिपिण्डसंयोगविनाशः ", सामान्यज्ञानादपेक्षा बुद्धेविनाश इत्येतत् सर्व युगपत् त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ॥ बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । सा चानेकप्रकारा, अर्था-प्रत्यर्थनियतत्वाच्च । नन्त्यात् उत्पादक संयोग का विनाश, और अवयवी ( पिण्ड ) की क्रिया, उसका पूर्वदिक् प्रदेश के साथ विभाग और सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद उक्त संयोग के विनाश से पिण्ड का विनाश एवं पूर्वदिशा और पिण्ड के विभाग से इन दोनों के संयोग का नाश. एवं सामान्य ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है । इस प्रकार एक ही समय समवायिकारण ( परत्वादि के आधारभूत पिण्डद्रव्य ), असम-वायिकारण ( उक्त पिण्ड का पूर्वादि दिक्प्रदेशों के साथ संयोग ) और निमित्त-कारण ( अपेक्षा बुद्धि ) इन तीनों के विनाश से ( भी ) परत्वादि गुणों का विनाश होता है । बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय ( ये सभी ) शब्द अभिधावृत्ति के द्वारा एक ही अर्थ के बोधक हैं । यह अनेक ( अनन्त ) हैं और यह प्रत्येक विषय में प्रकार की है, क्योंकि इसके विषय अनन्त स्वतन्त्र रूप से ( भी ) अवश्य ही सम्बन्ध है । न्यायकन्दली समर्थिते । अथ केयं बुद्धिरित्याह-बुद्धिजे परत्वापरत्वे इति प्रधानस्य विकारो महदाख्यमन्तःकरणं बुद्धिरित्यादि । A चित्तापरपर्यायं बुद्धिः । बुद्धी-यह समर्थन कर चुके है कि परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धि से उत्पन्न होते हैं । किन्तु ' यह बुद्धि कौन - सी वस्तु है? ' ( इस स्वाभावाविक प्रश्न का उत्तर ) ' बुद्धि: ' इत्यादि पक्ति से देते हैं । सांख्याचार्यों का कहना है कि प्रकृति ( प्रधान ) का महत् नाम का विकाररूप अन्तःकरण ही ' बुद्धि ' है, जिसे ' चित्त ' भी कहते हैं । इस बुद्धि की वह विषयाकार की For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४११ तस्याः सत्यप्यनेकविधत्वे समासतो द्वे विधे - विद्या चाविद्या चेति । तत्राविद्या चतुर्विधा - संशय विपर्ययानध्यवसायस्वप्नलक्षणा । संशयस्तावत् प्रसिद्धानेक विशेषयोः विशेषानुस्मरणादधर्माच्च सादृश्य मात्रदर्शनादुभय-विमर्शः किंस्विदित्युभयावलम्बी यह ( बुद्धि व्यक्तिश: ) अनन्त प्रकार की होने पर भी संक्षेप में ( १ ) विद्या ( यथार्थज्ञान ) और अविद्या ( अयथार्थ ज्ञान ) भेद से दो प्रकार की है । इनमें अविद्या के ( १ ) संशय ( २ ) विपर्यय ( ३ ) अनध्यवसाय और ( ४ ) स्वप्न, ये चार भेद हैं । जिन दो वस्तुओं के साधारण धर्म पहिले से ज्ञात हैं, उन दोनों के केवल साधारण धर्म रूप सादृश्य के ज्ञान एवं पश्चात् दोनों के असा-धारण धर्मों के स्मरण और अधर्म इन ( तीनों हेतुओं ) " यह अमुक वस्तु है? या उससे भिन्न? ' इस प्रकार के दो विरुद्ध विषयों का ज्ञान ही ' संशय ' है । यह ( १ ) अन्तःसंशय और ( २ ) बहिःसंशय भेद से दो प्रकार का न्द्रियप्रणालिकया न्यायकन्दली बाह्यविषयोपरक्तायास्तदाकारोपग्रहवती सत्वगुणा-श्रया वृत्तिर्ज्ञानम्, प्राप्त विषयाकारोपग्रहायां बुद्धौ प्रतिबिम्बितायाश्चेतना-शक्तेस्तद्वृत्त्यनुकार उपलब्धिः । तथा चाह स्म भगवान् पतञ्जलिः-" अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसङ्क्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्दृत्तिमनुभवतीति " इति । भोक्तृशक्तिरिति चितिशक्तिरुच्यते सा चात्मैव । परिणामित्यर्थं इति बुद्धितत्त्वे प्रतिसङ्क्रान्तेवेति प्रतिबिम्बितेवेत्यर्थः । तद्वृत्तिमनुभवति बुद्धौ प्रतिबिम्बिता सती बुद्धिच्छायापत्त्या बुद्धिवृत्त्यनुकारिणी वृत्ति ही ज्ञान है, जिसमें सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है, एवं जो ज्ञानेन्द्रिय के मार्ग से बुद्धि के निकलने पर विषयों के साथ उसके सम्बद्ध होने के कारण उत्पन्न होती है । एवं विषय के आकार में परिणत बुद्धि ( ज्ञान में ) प्रतिबिम्बित पुरुष के उस वृत्ति के अनुकरण को ही ' उपलब्धि ' कहते हैं । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि भोक्तृशक्ति अपरिणामिनी, एवं किसी में प्रतिबिम्बित होनेवाली नहीं है, किन्तु ( बुद्धिरूप ) परिणामी अर्थ में प्रतिबिम्बित की तरह उसकी वृत्तियों का अनुभव करती है । अभिप्राय यह है कि चितिशक्ति को हो भोक्तृशक्ति कहते हैं जो वस्तुतः आत्मा ही है | परिणामी अर्थ में - अर्थात् बुद्धितत्व में ' प्रतिसंक्रान्तेव ' अर्थात् प्रतिबिम्बित की तरह ' तद्वृत्तिमनुभवति ' अर्थात् बुद्धि को छाया पड़ने के कारण वह ( चितिशक्ति ) बुद्धि की वृत्तियों का अनुकरण करने सी लगती है । सुखादि आकार के ( अहं सुखी — इत्यादि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् संशयः । स च द्विविधः - अन्तर्बहिश्च । [ गुणे बुद्धि-अन्तस्तावद् आदेशिकस्य संशयो भवति --सम्यङ् मिथ्या चोद्दिश्य पुनरादिशतस्त्रिषु कालेषु ' किन्नु सम्यङ् मिथ्या वा ' इति । है । ( १ ) अन्तः संशय ( का उदाहरण यह है कि जहाँ ) किसी ज्योतिषी ने ( एक समय एक व्यक्ति के ग्रहस्थिति को देखकर उसे ) कहा कि तुम्हें अमुक इष्ट या अनिष्ट फल ) भूत काल में मिल चुका है, या भविष्य में मिलनेवाला है ( या ) वर्तमान में भी है । उनका यह फलादेश सत्य हुआ । किन्तु उनके ही अन्य निर्देश मिथ्या सिद्ध हुए । ( ऐसी स्थिति में वही यदि ) पुनः फलादेश करते हैं तो उस व्यक्ति को ज्योतिषी के इस आदेश से उत्पन्न अपने ज्ञान में संशय होता है कि ' यह सत्य है या मिथ्या? ' भवतीत्यर्थः । बुद्धेविषयः न्यायकन्दली सुखाद्याकारः प्रत्ययः । तथा चाह स एव भगवान् - " शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति, अनुपश्यन्नतदात्मापि तदा-त्मक इव प्रत्यवभासते " इति । . एतत् सांख्यमतं निराकर्तुमाह- बुद्धिरित्यादि । यस्याअमी पर्यायशब्दाः सा बुद्धिः । या पुनरियं प्रक्रियोपदर्शिता सा प्रतीत्यभावादेव पराणुद्यते । विषयहानोपादानानुगुणमुत्पादव्ययधर्मकमेकम्, तदधिकरणं चापरम्, यस्य तदुत्पादात् प्रवृत्तिनिवृत्तो स्याताम् इत्युभयं प्रत्यात्म-मनुभूयते, न प्रकारान्तरम् । या चास्या बुद्धेर्वृत्तिः सा कि बुद्धेरन्याऽनन्या वा? न तावदन्या, वृत्तिवृत्तिमतोरैकान्तिकतादात्म्याभ्युपगमात् । अथानन्या, तदा आकार के ) प्रत्यय ही बुद्धि के विषय हैं । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि पुरुष शुद्ध ( अपरिणामी ) होने पर भी बुद्धि को देखो हुई वस्तुओं को ही उसके पीछे देखता है । उसके बाद देखने ही के कारण विषय स्वरूप न होने पर भी विषय रूप से प्रतिभासित होता है । इसी सांख्यमत का खण्डन करने के लिए ' बुद्धि: ' इत्यादि पङ्क्ति लिखी गई है । अर्थात् अभिधावृत्ति के द्वारा इन सभी शब्दों से जिसका बोध हो वही ' बुद्धि ' है । सांख्य के अनुयायियों को जो रीति ऊपर लिखी गयी है वह साधारण प्रतीति के विरुद्ध होने के कारण ही खण्डित हो जाती है । बुद्धि एक ऐसी वस्तु है जिसके द्वारा ( अभि-मत ) विषयों को ग्रहण और ( प्रतिकूल विषयों का ) त्याग होता हैं । एवं जिसकी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४१३ बहिद्विविधः - प्रत्यक्षविषये चाप्रत्यक्षविषये च । तत्राप्रत्यक्षविषये तावत् साधारण लिङ्गदर्शनादुभय विशेषानुस्मरणादधर्माच्च संशयो भवति । वेति । यथाऽटव्यां प्रत्यक्षविषयेऽपि विषाणमात्रदर्शनादू गौर्गत्रयो स्थाणुपुरुषयोरुतामात्र सादृश्यदर्शनाद् बहिः संशय दो प्रकार का है ( १ ) जिसके विषय प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा गृहीत हों एवं ( २ ) जिसके विषय प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत न हो सकें । इनमें अप्रत्यक्षविपय का बहिःसंशय वह है जो दोनों कोटियों में रहनेवाले ( साधारण ) धर्म के ज्ञान, एवं दोनों कोटियों में से प्रत्येक के असाधारण धर्म की अनुस्मृति ( पश्चात्स्मरण ) और अधर्म इन कारणों से उत्पन्न होता है । जैसे जङ्गल में ( जाने पर ) केवल सींग के देखने पर यह संशय होता है कि यह ( सींगवाला ) गो है या गवय? प्रत्यक्षं के द्वारा गृहीत होनेवाले विषयों के संशय ( का यह उदाहरण है कि ) स्थाणु और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाली उच्चता ( ऊँचाई ) रूप से सादृश्य का ज्ञान, दोनों में से प्रत्येक में रहनेवाली वक्रता न्यायकन्दली बुद्धेरेकत्वे विषयाकारवतीनां तद्वृत्तीनामप्येकत्वात् त्रिचतुरादिप्रत्ययो दुर्लभः, परस्परविलक्षणाकारसंवेदनाभावाद् बुद्धयारूढाकारमात्रवेदित्वाच्च पुरुषस्य । यथोक्तम्- ' बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः ' इति । वृत्तीनां वा नानात्वे बुद्धेरपि नानात्वा-देकत्वव्याघात इत्यादि दूषणमूह्यम् । बुद्धेर्भेदं निरूपयति - सा चानेकप्रकारेति । अत्र कारणमाह - अर्था-उत्पत्ति और विनाश दोनों ही होते हैं । एवं जिसका कोई दूसरा आश्रय है । जिसमें उसकी उत्पत्ति से प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही उपपन्न होती हैं । ( बुद्धि के प्रसङ्ग में ) इन्हीं दोनों प्रकारों का प्रत्येक आत्मा अनुभव करता है, दूसरे का नहीं । ( इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न भी उठता है कि ) बुद्धि की यह कथित ' वृत्ति ' बुद्धि से भिन्न है या अभिन्न? साख्याचार्यगण वृत्ति और उसके श्राश्रय दोनों में अत्यन्त अभेद मानते हैं, अत: ( उनके मत से ) ये दोनों भिन्न तो हो नहीं सकते । यदि वृत्ति और वृत्तिमान में भेद मानें तो ये तीन हैं, ये चार है ' इत्यादि विभिन्न प्रकार की प्रतीतियाँ दुर्लभ होंगी, क्योंकि बुद्धि के एक होने के कारण उसकी वृत्ति भी एक ही होगी, अतः वृत्तियों में परस्पर विशेष नहीं हो सकता, क्योंकि सभी आकार एक ही बुद्धि में आरूढ हैं । जैसा कि ( भगवान् पतञ्जलि ने ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि -प्रशस्तपादभाष्यम् वक्रादिविशेषानुपलब्धितः स्थाणुत्वादिसामान्य विशेषानभिव्यक्तावु-भयविशेषानुस्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्यात्मनः प्रत्ययो दोलायते - किं नु खल्वयं स्थाणुः स्यात् पुरुषो वेति । ( टेढ़ापन ) और हस्तपादादि असाधारण धर्मों का अज्ञान, दोनों कोटियों में से प्रत्येक में रहनेवाले स्थाणुत्वपुरुषत्वादि जाति रूप विशेषधर्मों का अप्रत्यक्ष, एवं इन दोनों जातियों की पश्चात्स्मृति, इन सभी कारणों से पुरुष का चित्त झूले की तरह स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ डोलता है और उसे संशय होता है कि यह ( सामने दीखनेवाला ) स्थाणु है? या पुरुष? न्यायकन्दली नन्त्यादिति । यदि नामार्थस्य विषयस्यानन्तत्वं बुद्धेरनेकविधत्वे किमायातम्? तत्राह — प्रत्यर्थनियतत्वाच्चेति । प्रत्यर्थं प्रतिविषयमस्मदादिबुद्धयो नियताः, अर्थाश्चानन्ता इति प्रत्येकं तत्र बुद्धयोऽप्यनन्ताः । यदि क्वचिदनेकविषयमेकं विज्ञानं तदपि तावदर्थनियतत्वात् तदर्थाद् विज्ञानान्तराद् विलक्षणमेवेत्यदोषः । बुद्धेविषयभेदेन सत्यपि भेदे संक्षेपतो द्वैविध्यमाह - तस्या इति । निः-सन्दिग्धाबाधिताध्यवसायात्मिका प्रतीतिविद्या, तद्विपरीता चाविद्येति । अत्र प्रतिपादन मात्रस्य विवक्षितत्वात् पश्चादुद्दिष्टामप्यविद्यां प्रथमं कथयति-कहा है कि ' बुद्धे: प्रतिसंवेदी पुरुषः । ' अर्थात् बुद्धि में आरूढ़ आकारों को ही पुरुष अनुभव करता है । वृत्ति को यदि अनेक मानें तो फिर बुद्धि को भी नाना मानना पड़ेगा ही, जिनसे बुद्धि को एकता खतरे में पड़ जाएगी, इन सभी दोषों की भी कल्पना करनी चाहिए । ‘ सा चानेकप्रकारा ' इत्यादि सन्दर्भ से बुद्धि के भेदों का निरूपण करते हैं । ' अर्थानन्त्यात् ' इस पद के द्वारा इसमें हेतु दिखलाया गया है ( कि बुद्धि अनेक प्रकार की क्यों हैं? ) यदि अर्थ या विषय अनन्य है, तो फिर इसलिए बुद्धियाँ क्यों अनेक हों? इसी प्रश्न का समाधान ' प्रत्यर्थनियतत्वाच्च ' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । ' प्रति अर्थ ' अर्थात् प्रत्येक विषय में हमलोगों की बुद्धियाँ नियत रूप से अलग हैं । ये ' अर्थ ' या विषय असंख्य हैं, फिर बुद्धियाँ भी अवश्य ही अनन्त होंगी । जहाँ कहीं अनेक विषयक एक ज्ञान उपलब्ध भी होता है, वह भी उतने अर्थों में नियत तो है ही, किन्तु जो अपने विषयों से भिन्न-विषयक या अल्पाधिक - विषयक ज्ञानों से भिन्न भी हैं । इस प्रकार ( विषयभेद से ज्ञानभेद For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् ४१५ न्यायकन्दली तत्रेति । तयोविद्याविद्ययोर्मध्ये अविद्या चतुविधा चतुष्प्रकारा संशय विपर्यया-नध्यवसायस्वप्नलक्षणा । नवविद्या चतुविधेति परिसंख्यानानुपपत्तिः, रूढस्य तर्कज्ञानस्यापि सम्भवात् । अनुभूयते ह्यन्तरा संशयं निर्णयं च तर्कः । तथा हि - उत्पत्तिधर्मक आत्मेत्येके । अनुत्पत्तिधर्मक इत्यपरे । ततो विप्रतिपत्तेः किंस्विदयमुत्पत्तिधर्मा आहोस्विदेवं न भवतीति संशये विचारात्मकस्तर्कः प्रवर्तते । यद्ययमुत्पत्ति-धर्मकः, तकस्यानेकशरीरादिसंयोगलक्षणः संसारस्तदत्यन्तविमोक्षलक्षण-चापवर्गो नोपपद्यते । अनुत्पत्तिधर्मके तु ज्ञातरि स्यातां संसारापवर्गावित्य-नुत्पत्तिधर्मकेणानेन भवितव्यमिति । किमस्य सम्भावनाप्रत्ययस्य प्रयोजनम्? तत्त्वज्ञानमेव, प्रतिपक्षनिश्चय-वत् प्रतिपक्षसंशयेऽपि हि हेतोरप्रवृत्तिरेव वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । यथाहुर्भट्ट-मिश्रा: -यावच्चाव्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्कयते । विपक्षस्य कुतस्तावद्धेतोर्गमनिकाबलम् ॥ इति । के मानने में ) कोई दोष नहीं है । ' तस्याः ' इत्यादि से कहते हैं कि विषयों के भेद से बुद्धियों के असंख्य भेद होने पर भी संक्षेपतः उसके दो ही प्रकार हैं । सन्देह से भिन्न वह निश्चयात्मक ज्ञान ही ' विद्या ' है, जिसके विषय बाधित न हों । यहाँ जिस किसी प्रकार से विषयों का प्रतिपादन ही इष्ट है अतः पीछे कही गयी अविद्या का भी ' तंत्र ' इत्यादि से पहिले ही निरूपण करते हैं । ' तयो: ' अर्थात् विद्या और अविद्या इन दोनों में अविद्या चतुविधा ' अर्थात् ( १ ) संशय ( २ ) विपर्यय ( ३ ) अनध्यवसाय और ( ४ ) स्वप्न भेद से चार प्रकार की हैं । ( प्र ० ) ' अविद्या चार ही प्रकार की है ' संख्या का यह नियम ठीक नहीं है क्योंकि अविद्या के अन्तर्गत इनसे भिन्न तर्क रूप पाँचवें ज्ञान की भी सम्भावना है । क्योंकि संशय और विपर्यय के मध्यवर्ती तर्क का भी अनुभव होता है । जैसे कि कोई कहता है कि आत्मा की उत्पत्ति होती है । दूसरे उसे अनुत्पत्तिशील कहते हैं । इस विप्रतिपत्ति से यह संशय होता है कि ' आत्मा उत्पत्तिशील है या नहीं? " इस संशय के बाद यह विचार रूप तर्क उपस्थित होता है कि अगर आत्मा उत्पत्तिशील वस्तु हो तो फिर अनेक शरीरों के साथ इसका सम्बन्ध रूप संसार, और उस सम्बन्ध के अत्यन्त विनाश रूप अपवर्गं ये दोनों ही अनुपपन्न होंगे । यदि इसे अनुत्पत्तिधर्मक मान लेते हैं, तो फिर कथित संसार और अपवर्ग दोनों ही उपपन्न हो जाते हैं । अतः इसे अनु-त्पत्तिधर्मक ही होना चाहिए । For Private And Personal