प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 491–500
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 491–500
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली अनेन तुत्पत्तिधर्मकत्वं व्युदस्यानुत्पत्तिधर्मकत्वं [ गुणे बुद्धि-सम्भावयिताविषये विवेचिते सत्यसत्प्रतिपक्षत्वादनुमानं प्रवर्तते इ विषयविवेचनद्वारेण प्रमाणानुग्राहकतया तर्कस्तत्त्वज्ञानाय घटते प्रमाणस्य करणत्वेनेतिकर्तव्य-तास्थानीयतर्कस हायस्यैव स्वकायें पर्यवसानात् । ननपेक्षित दृढमुष्टिनि-पीडितो जाल्मकरपञ्जरोदरे विलुठन्नपि कठोरधारः कुठारः प्रतितिष्ठति निष्ठुरस्यापि काष्ठस्य छेदाय । तथा चोक्तम् ----नहि तत्करणं लोके वेदे वा किञ्चिदीदृशम् । इतिकर्तव्यतासाध्ये यस्य नानुग्रथिता ॥ इति । यदि पुनरेवं तर्कों नेष्यते परस्यानिष्टापादनरूपः प्रसङ्गोऽपि नाभ्युपग-न्तव्यः स्यात्? स हि तर्कादनतिरिच्यमानात्मा, अस्ति च वैशेषिकाणामपि प्रसङ्गः, न प्रसङ्गो हेतुराश्रयासिद्धतादिदोषात् । ( प्र ० ) इस ' सम्भावना प्रत्यय ' रूप तर्क का प्रयोजन क्या है? ( उ ० ) तत्व का ज्ञान ही इसका भी प्रयोजन है । क्योंकि प्रतिपक्ष ( बाध ) निश्चय की तरह प्रतिपक्ष संशय के रहने पर भी हेतु की प्रवृत्ति नहीं होती है । क्योंकि कोई भी वस्तु ( परस्पर विरुद्ध ) दो रूपों का नहीं होता । जैसा कि भट्टमिश्र ने कहा है कि ' जब तक विपक्ष में अव्यति-रेकित्व अर्थात् बाधाभाव का संशय ( भी ) रहेगा, तब तक हेतु में साध्य की सिद्धि करने का सामर्थ्य कहाँ से आएगा? ' इस प्रकार आत्मा से उत्पत्तिधर्मकत्व को हटा कर विषय के विवेचित होने पर सत्प्रतिपक्ष दोष के हट जाने के कारण सम्भावयिता ( तर्क करने-वाला पुरुष ) अनुमान में प्रवृत्त होता है । इस रीति से विषय विवेचन के द्वारा प्रमाण का सहायक होने के कारण तर्क भी तत्त्वज्ञान का सम्पादकहोता है । प्रमाण करण रूप है । ' इतिकर्त्तव्यता ' ( करण से कार्य सम्पादन की रीति ) के साहाय्य के बिना कोई करण अपना कार्य नहीं कर सकता । प्रमाण रूप करण का तर्क ही ' इतिकर्तव्यता ' की जगह है । अतः इसके साहाय्य से ही प्रमाण अपने कार्य में सफल हो सकता है । कैसा हो तीखे धार की कुल्हाड़ी हो, उसको पकड़नेवाला चाहे जितना बलवान् हो यदि वह गलत ढंग से उसको पकड़ता है, तो फिर उससे कठोर काठ का छेदन नहीं हो सकता, ( अतः इतिकर्त्तव्यता का साहाय्य आवश्यक है ) । जैसा कहा भी गया है कि लौकिक ( कुठारादि ) या वैदिक ( यागादि ) कोई भी ऐसा करण नहीं है, जिसे अपने कार्य के सम्पादन में इतिकर्त्तव्यता के साहाय्य की अपेक्षा न हो । दश प्रकार तत्त्वज्ञान के लिए उपयोगी तर्क को यदि स्वीकार नहीं करेंगे तो फिर ( प्रसङ्ग ) को भी मानना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि वह भी प्रतिपक्षी के अनभीष्ट पक्ष का उपस्थापन स्वरूप ही है । इस प्रकार तर्क से प्रसङ्ग में कोई अन्तर नहीं है । किन्तु वैशेषिक लोग भी प्रसङ्ग की सत्ता मानते ही हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ५३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४१७ For Private And Personal अत्रोच्यते - किं परपक्षाभावप्रतीतिस्तर्कः? किं वा स्वपक्षसम्भावना? आद्ये पक्षे प्रमाणमेवेदम्, ज्ञातुरनित्यत्वे संसारापवर्गयोरसंभव इति ज्ञानं यद्य-प्रमाणम्, नास्माद् विपक्षाभावसिद्धिः, अप्रमाणेन कस्यचिदर्थस्य सिद्धेरयोगादित्य-त्रास्याप्रवृत्तिरेव विषयविवेकाभावात् । अथ सिद्धयत्यस्माद् विपक्षाभा-वस्तदा प्रमाणमिदं प्रत्यक्षादिषु कस्मिश्चिदन्तर्भविष्यति, तद्व्यतिरेके-णान्यस्य प्रतीति साधनाभावादित्यकामेनाभ्युपगन्तव्यम् । प्रसङ्गोऽपि विरोधो-द्भावनम्, तच्च कस्यचिद् बलीयसो विपरीतप्रमाणस्योपदर्शनम् । कस्तत्र विप-रीतात् प्रमाणात् तदुपदर्शकाच्च वचनादन्यस्तर्कः? अथ स्वपक्षसम्भावनात्मकः प्रत्ययस्तर्कः? अस्योत्पत्तौ किं कारणम्? न तावत्स्वपक्षसाधकं प्रमाणम्, तस्याप्रवृत्तेः । तर्केण विवेचिते विषये स्वपक्षसाधकं प्रवर्तते । तदेव यदि तस्य कारणम्, मुव्यक्तमन्योन्याश्रयत्वम् । विपक्षाभावे प्रतीते स्वपक्षसम्भावनोपजायत इति विपक्षाभावप्रतीति-रस्य कारणमिति चेत्? तहि विपक्षाभावलिङ्गकमनुमानमेवैतत् परस्पर-विरुद्धयोरेकप्रतिषेधस्येतरविधिनान्तरीयकत्वात् । भवत्येवं यदि विषयमवधार-( उ ० ) इस प्रसङ्ग में हम ( सिद्धान्तियों ) का कहना है कि तर्क ( १ ) प्रतिपक्षी से माने हुए सिद्धान्त के अभाव का प्रतीतिरूप है? अथवा ( २ ) अपने सिद्धान्तपक्ष का सम्भावनारूप है? यदि इनमें पहिला पक्ष मानें, तब तो तर्क का प्रमाण ही मानना पड़ेगा ( जिससे तर्क विद्यारूप ज्ञान में हो अन्तर्भूत हो जाएगा ) क्योंकि ' ज्ञाता ' ( आत्मा ) को यदि अनित्य मानेंगे तो संसार और अपवर्गं दोनों ही अनुपपन्न होंगे. यह ज्ञान यदि अप्रमाण है, तो इससे विपक्षाभाव ( अर्थात् आत्मा में नित्यत्व ) की सिद्धि न हो सकेगी, क्योंकि अप्रमाणभूत ज्ञान से किसी भी विषय की सिद्धि सम्भव नहीं है । अतः प्रकृत में विपक्ष के अभाव की सिद्धि के लिए उक्त तर्करूप ज्ञान प्रवृत्त ही नहीं होगा, क्योंकि उसका विषय हो निद्दिष्ट नहीं है । यदि तर्क से विपक्षाभाव की सिद्धि होती है, तो फिर यह प्रमाण ही है । अतः प्रत्यक्षादि किसी प्रमाण में ही अन्तर्भूत हो जाएगा । क्योंकि इच्छा न रहने पर भी यह मानना ही पड़ेगा कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों को छोड़कर प्रतीति का कोई दूसरा साधन नहीं है । ' प्रसङ्ग ' भी विरोध के उद्भावन को छोड़कर और कुछ नहीं है । विरोध का यह उद्भावन बलिष्ठ विरोधी प्रमाण का प्रदर्शन ही है । तर्क भी विरोधी प्रमाणों और उनके प्रतिपादक वाक्यों से भिन्न और कुछ नहीं है । यदि तर्क को अपने पक्ष के सम्भावनात्मक ज्ञान रूप द्वितीय पक्ष मानें, तो फिर पूछना है कि इसका कारण कौन है? अपने पक्ष का साधक प्रमाण तो उसका कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह इस ज्ञान के उत्पादन के लिए प्रवृत्त ही नहीं होगा, क्योंकि तर्क के द्वारा विचार किये हुए विषयों में ही अपने पक्ष का साधक प्रमाण प्रवृत्त होता है, यही प्रमाण अगर तर्क का भी कारण हो तो इस पक्ष में अन्योन्याभय दोष स्पष्ट
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४१५ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे बुद्धि-यत्येदमेवेदमिति । अनुजानात्ययमेकतरधर्मं न त्ववधारयति । न चायं संशयोऽपि, उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । किन्तु संशयात् प्रच्युतो निर्णयं चाप्राप्तः सम्भावना-प्रत्ययो s न्य एव । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति - एवमहं तर्कयामीति । न, यो-ग्यतावधारणाद् यत्र विपक्षाभावस्तत्रान्यतरपक्षोपपत्तिः, यत्र तु तस्य सम्भव-स्तत्रानुपपत्तिरित्यन्वयव्यतिरेकदर्शी विपक्षाभावं प्रतिपद्यमानः सभ्भाव-यत्ययमनुत्पत्तिधर्मको भविष्यतीत्यस्मिन्नर्थे प्रमाणमेतत्प्रतिपादनाय योग्योऽयमर्थ इति प्रमाणयोग्यतां विषयस्याध्यवस्यतीति अनुमानमेव । इत्थमेव च प्रमाणमनुगृह्णाति योग्यताप्रतीतेः प्रमाणप्रवृत्तिहेतुत्वात् । अन्यथा पुनरिदं सम्भावनामात्रमनर्थकमेव स्वयमप्रमाणस्य सिद्धयुपलम्भयोर-नङ्गत्वाद् विषयविवेकस्यापि विपक्षाभावं प्रतिपादयता बाधकप्रमाणेनैव कृतत्वात् । है । ( प्र ० ) विपक्ष के अभाव की प्रतीति से अपने पक्ष की सम्भावना उत्पन्न होती है, इस प्रकार विपक्षाभाव की प्रतीति स्वपक्षसम्भावना का कारण है । ( उ ० ) तो फिर स्वपक्ष की सम्भावना परपक्षाभावहेतुक अनुमान ही है, क्योंकि परस्पर विरुद्ध दो पक्षों में से एक का प्रतिषेध तबतक नहीं किया जा सकता जबतक दूसरे की विधि न हो । ( प्र ० ) किन्तु इस प्रकार की प्रतीतियाँ भी तो होती हैं कि ' यह इसी प्रकार है ' या ' इन दोनों में से एक को जानते तो हैं, किन्तु निश्चय नहीं कर सकते ' । यह दूसरा ज्ञान संशयरूप नहीं है, क्योंकि इसमें दो कोटि विषय नहीं है । किन्तु संशय से आगे बढ़ा हुआ, एवं निश्चय स्वरूप को अप्राप्त यह सम्भावनाप्रत्यय, प्रत्यक्ष संशय और निश्चय से भिन्न एक अलग ही ज्ञान है । साधारण जन भी ऐसा कहते हैं कि ' मैं ऐसा तर्क करता हूँ '! ( उ ० ) उक्त कथन ठीक नहीं है । क्योंकि योग्यता निश्चित रहने के कारण जहाँ कोई विपक्ष नहीं रहता है, वहाँ दो में से एक पक्ष की उपपत्ति ही होती है, जहाँ योग्यता की सम्भावना भर होती है, वहाँ एक पक्ष की अनुपपत्ति होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक का ज्ञान जिस पुरुष को है, वह विपक्ष के अभाव को समझता हुआ यह सम्भावना करता है कि आत्मा अनुत्पत्तिधर्मक ही होगी, इस विषय को समझाने के लिए ( उक्त सम्भावना प्रत्यय का विषय ) आत्मा का यह अनुत्पत्तिधर्मकत्व सर्वथा उपयुक्त है । एवं इस अर्थ को समझाने के लिए उक्त विगय सर्वथा उपयुक्त है । इस प्रकार आत्मा के अनुत्पत्तिधर्मकत्व के विषय में प्रमाण से उत्पन्न होने की योग्यता निश्चित होती है । अतः यह अनुमान ही है । उक्त रीति से ही तर्क प्रमाण का सहायक भी होता है । प्रमाण में विषय को उचित रूप में समझाने की योग्यता की प्रतीति तर्क से ही होती है, यह योग्यता की प्रतीति हो प्रमाण की प्रवृत्ति का कारण है । यदि ऐसी बात न हो तो फिर यह सम्भावनाप्रत्ययरूप तर्क व्यर्थ ही होगा, क्योंकि तर्क स्वयं अप्रमाण है, वह न किसी के स्थापन में न किसी के खण्डन में ही सहायक हो सकता है । विषय के विवेक का ज्ञान तो विपक्षाभाव के प्रतिपादक बाधक प्रमाण से ही हो जाएगा । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४१ ९ अन्ये तु संशयप्रभेद एव तर्कोऽनवधारणात्मकत्वादित्याहुः । संशयस्तावत् । तावच्छन्दः क्रमार्थः । संशयस्तावत् कथ्यते इत्यर्थः । प्रसिद्धानेकविशेषयोरिति । प्रसिद्धाः पूर्वं प्रतीता अनेकविशेषा असाधारण-धर्मा चक्रकोटरादयः शिरः पाण्यादयश्च ययो: स्थाणुपुरुषयोस्तयोः सादृश्य-मात्रस्य साधारणधर्ममात्रस्य क्वचिदेकत्र दर्शनादुभयो: स्थाणुपुरुषयोविशेषाणां वक्रकोटरादीनां शिरः पाण्यादीनां च पूर्वं प्रतीतानां स्मरणादधर्माच्च fatafat संशयः विमर्शः । कि स्थाणु:? कि वा पुरुष:? इति अनवस्थितोभयरूपेणोभय विशेषसंस्पर्शी विमर्शो विरुद्धार्थावमर्शो ज्ञानविशेषः संशयः । सादृश्यमात्रदर्शनादिति । मात्र ग्रहण सामर्थ्याद् विशेषाणामनुपलम्भो गम्यते । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न प्रत्यक्षप्रतीतिवचनोऽनुमेयस्यापि सामान्यस्य संशयहेतुत्वात् । सादृश्योपलम्भाभिधानाद्धर्म्यू पलम्भोऽपि लभ्यते । अस्यानुपलम्भे तद्धर्मस्य सादृश्यस्योपलम्भाभावात् संशयोऽपि धर्मिण्येव न सादृश्ये, तस्य निश्चि-तत्वात् । सादृश्यमिति च साधारणधर्ममात्रं कथ्यते, नानेकार्थंसमवेतं सादृश्यम्, कोई सम्प्रदाय तर्क को निश्चयात्मक न होने के कारण संशय रूप ही मानते हैं । ' संशयस्तावत् ' इत्यादि सन्दर्भ का ' तावत् ' शब्द ' क्रम ' का बोधक है, तदनुसार इसका यही अर्थ है कि क्रमप्राप्त संशय का निरूपण करते हैं । ( प्रसिद्ध ) ' अनेक विशेषयोः ' ( इत्यादि सन्दर्भ का ) " प्रसिद्धा अनेकविशेषा ययोः, तयोः सादृश्यमात्रस्य दर्शनादुभययोः स्मरणाद-धर्माच्च किस्विदित्युभयालम्बी विमर्शः संशय. " इस विवरण के अनुसार स्थाणु एवं पुरुष रूप जिन दो धर्मियों में से स्थाणु की वक्रता एवं कोटर प्रभृति एवं पुरुष के शिर पैर प्रभृति पहिले से ज्ञात हैं, इन पूर्वज्ञात विषयों के स्मरण और अधर्म इन दोनों से ' किस्वित् ' अर्थात् यह स्थाणु है या पुरुष ' इत्यादि आकार के दोनों विषयों को ग्रहण करने-वाला ' विमर्श ' अर्थात् विरुद्ध दो विषयों का विशेष प्रकार का ज्ञान ही ' संशय ' है । ' सादृश्य-मात्रदर्शनात् ' इस वाक्य में ' मात्र ' पद के उपादान से उन दोनों विषयों ( स्थाणु और पुरुष ) के असाधारण धर्म की अनुपलब्धि का आक्षेप होता है ( अर्थात् दोनों के सादृश्य ज्ञान की तरह दोनों के विशेष घर्मो का अज्ञान भी संशय के लिए आवश्यक है ) । उक्त वाक्य के ' दर्शन ' शब्द से सभी प्रकार के ज्ञान अभिप्रेत हैं, केवल प्रत्यक्ष ही नहीं । क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात साधारण धर्म से भी संशय होता है । सादृश्य को धर्मज्ञान का कारण कहने से धर्मी के ज्ञान में संशय की कारणता स्वयं कथित हो जाती है । क्योंकि धर्मी के ज्ञान के बिना सादृश्य रूप धर्म का ज्ञान सम्भव ही नहीं हैं । धर्मो में ही संशय होता है, सादृश्यादि ( उभय साधारण ) धर्मों में नहीं, क्योंकि तो निश्चित हैं । ' सादृश्य ' शब्द से ( संशय के दोनों कोटियों में रहनेवाले ) सभी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२० अस्पर्शवत्त्वस्य संशयदर्शनात् । न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली स्पर्शाभावस्थाकाशान्तःकरणगतस्य [ गुणे संशय--प्रतीत्यात्मन्यणुत्वमहत्त्व-तदयं संक्षेपार्थ: - यदायं प्रतिपत्तोभयसाधारणं धर्मं क्वचिदेकत्र धर्मिण्युपलभते, कुतश्चिन्निमित्तात् तस्य धर्मिणो विशेषं नोपलभते, पूर्व प्रतीतयोः स्मरति विरुद्ध विशेषयोः, न चोभयोरेकत्र सम्भावयति सद्भावम् विरुद्धत्वात् । नाप्यभावं तदविनाभूतस्य साधारणधर्मस्य दर्शनात् । तदास्य साधारणधर्म-विषयत्वेनावधारिते धर्मिणि विशेषविषयत्वेनानवधारणात्मकः प्रत्ययः संशयो भवति । नन्वनवधारणात्मकः प्रत्ययश्चेति प्रतिषिद्धम् । इदं हि प्रत्ययस्य प्रत्ययत्वं यद्विषयमवधारयति? न, उभयस्यापि सम्भवात् । अयं हि सामान्य विशिष्ट धर्म्युपलम्भेन धर्मविशेषानुपलम्भविरुद्धो भय विशेषस्मरण-सहकारिणा जन्यमान इति सामान्यविशिष्टं धर्मिणमवधारयन् स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विशेषमनवधारयन्ननवधारणात्मकः प्रत्ययश्च स्यात् । दृष्टं साधारण धर्मों को समझना चाहिए | अनेक वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध से २६ नेवाली ' सादृश्य ' नाम की कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि आकाश और अन्तःकरण ( मन ) इन दोनों में रहनेवाले स्पर्शाभाव से आत्मा में अणुत्व और महत्त्व दोनों का संशय होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि जिस समय किसी ज्ञाता को किसी धर्मी में दो वस्तुओं में समान रूप से रहनेवाले धर्म का ज्ञान होता है एवं उन दोनों वस्तुओं के असाधारण धर्मों का अनुभव नहीं हो पाता । एवं दोनों धर्मियों के पहिले से ज्ञात विशेष धर्मो का स्मरण भी रहता है । उस समय वह यह समझता है कि इन दोनों विशेष धर्मों का एक धर्मी में रहना सम्भव नहीं है, क्योंकि ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं, इन दोनों विशेष धर्मों का अभाव भी निश्चित नहीं है, क्योंकि उनके साथ अवश्य रहनेवाले साधारण धर्म तो देखे ही जाते हैं । उस समय साधारण धर्मों के आश्रयरूप से निश्चित उस धर्मी में विशेष धर्मों का जो अनिश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है वही ' संशय ' है । ( प्र ० ) यह अनिश्चयात्मक है, एवं प्रतीति भी है, ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं, क्योंकि सभी प्रतीतियों का यही काम है कि अपने विषयों को निश्चित रूप में समझातें । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं हैं, क्योंकि दोनों ही बातें हो सकती हैं, चूंकि यह संशयरूप ज्ञान सामान्य धर्म से युक्त धर्मी के ज्ञान, विशेष धर्मों की अनुपलब्धि, एवं विशेष धर्मों के स्मरण, इन तीनों से उत्पन्न होता है, अतः सामान्य धर्म विशिष्ट धर्मों का तो वह अवधारण कर सकता है, क्योंकि केवल धर्मी के अंश में वह अवधारणात्मक है ही, किन्तु ' स्थाणु है या पुरुष ' यह ज्ञान इन ( स्थाणुत्व और पुरुषत्व ) दोनों का निश्चायक न होने के कारण ' अयं स्थाणुर्वा पुरुषः ' तह संशयज्ञान रूप अनवधारणात्मक भी है, अतः अनवधारण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४२१ हि यत्र विलक्षणसामग्री, तत्र कार्यमपि विलक्षणमेव यथा प्रत्यभिज्ञानम् । संशयोऽप्यविद्या । सा चानिष्टा पुरुषस्येत्यधर्मकार्यत्वं तस्य दर्शितम् । अधर्माच्चेति । सामान्य दृष्ट्वा यदेकं विशेषमनुस्मृत्य विशेष-मनुस्मरति तदा सामान्यदर्शनस्य विनष्टत्वात् संशयहेतुत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, उभयविशेषविषयाभ्यां संस्काराभ्यां युगपत्प्रबुद्धाभ्यामुभय-विशेषविषये कस्मरणजननात्, तत्काले च सामान्य-ज्ञानस्य सम्भवात् । स च द्विविध इति भेदकथनम् । समानधर्मोपपत्तेरनेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यव्यव-हिचेति । यः स्थातोऽनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च स सर्वो द्वैविध्येनैव संगृहीतः । समानतान्त्रिकैः रूपेणेत्यत आह- अन्त-पञ्चविधः संशयो दर्शितः, अन्तस्तावद् आदेशिकस्येति । आदेशिको ज्योतिर्वित् तेनैकदा किञ्चिद् ग्रहसञ्चारादिनिमित्तमुपलभ्यादिष्टं किञ्चिदिष्टमनिष्टं वात्राभूद्वर्त्तते भविष्यति और प्रत्यय दोनों ही हो सकता है । जहाँ की सामग्री ( कारणसमूह ) विशेष रूप की होगी, वहाँ का कार्य भी विशेष प्रकार का ही होगा, जैसे कि ' प्रत्यभिज्ञा ' ( अनुभवात्मक और स्मरणात्मक दोनों हैं ) । संशय भी अविद्या ही है, अविद्या पुरुष का अनिष्ट करनेवाली है । इसीलिए कहा गया है कि ' संशय अधर्म से उत्पन्न होता है ' | ( प्र ० ) सामान्य ज्ञान के बाद एक विशेष धर्म का स्मरण कर अगर दूसरे विशेष धर्म का स्मरण होता है, तो फिर उस समय कथित सामान्य ज्ञान का ही विनाश हो जाएगा । अत: सामान्य दर्शन संशय का कारण नहीं हो सकता । ( उ ० ) एक ही समय दोनों विशेष धर्मो के एक ही उद्बुद्ध संस्कार से दोनों विशेष धर्म विषयक एक ही ( समूहालम्बन ) स्मरण की उत्पत्ति हो सकती है, उस समय आगे क्षण में ही विनष्ट होनेवाले ( विनश्यदवस्थ ) सामान्य धर्म के ज्ञान की सम्भावना है । ' स च द्विविध: ' इस वाक्य के द्वारा संशय के दो भेद कहे गये हैं । कौन से उसके दोनों प्रकार हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' सच द्विविध: ' इत्यादि से दिया गया है । समानतन्त्र ( न्याय ) के आचार्यों ने जो ( १ ) साधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न ( २ ) अनाधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न ( ३ ) विप्रतिपत्ति वाक्य से उत्पन्न ( ४ ) उपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न एवं ( ५ ) अनुपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न इत्यादि संशय के जो पाँच भेद गिनाये गये हैं, वे सभी इन्हीं दो प्रकारों में अन्तर्भूत हो जाते हैं । ' आदेशिकस्य ' इत्यादि से कहा गया है कि कथित संशय ' अन्तः संशय ' का उदाहरण है । ' आदेशिक ' शब्द का यहाँ ' ज्योतिषशास्त्रवेत्ता ' अर्थ है । उन्होंने एक समय किसी पुरुष को उसके ग्रहसञ्चारादि निमित्त को देखकर ' आदेश ' किया कि ' यहाँ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे संशय-चेति, तत् तथैव तदा संवृत्तम् । अन्यदादिष्टं तद्वितथमभूत् । पुनरिदानीं तस्योत्पन्नं तथाभूतमेव निमित्तं दृष्ट्वा दिशतोऽन्तः स्वज्ञाने संशयो भवति यदेतन्मम नैमित्तिकं ज्ञानमभूत् तत्कि सत्यमसत्यं वेति । विषये भवति । बहिद्विविधः - प्रत्यक्षविषये अप्रत्यक्षविषये च । तत्र तयोर्मध्येऽप्रत्यक्ष-तावत् साधारणलिङ्गदर्शनादुभयविशेषानुस्मरणादधर्माच्च संशयो यथा sari विषाणमात्रदर्शनाद गौर्गवयो वेति । वाटान्तरितस्य पिण्डस्याप्रत्यक्षस्य सामान्येन विषाणमात्रदर्शनानुमितस्य संशयविषयत्वाद-प्रत्यक्षविषयोऽयं संशयः । प्रत्यक्षविषयेऽपि कथयति - स्थाणुपुरुषयोरित्यादिना । स्थाणुपुरुषयोः सम्बन्धिनी योर्ध्वता तन्मात्रस्य प्रत्यक्षविषये पुरोवर्तिनि धर्मिणि दर्शनात् । वक्रादिविशेषानुपलब्धित इत्यादिपदेन शिरः पाण्यादिपरिग्रहः । वक्रकोटरादेः कुछ इष्ट या अनिष्ट था, या है अथवा होगा ' और वे उस प्रकार सङ्घटित भी हुए । फिर उसी प्रकार का निमित्त उपस्थित होते देखकर उस आदेशिक पुरुष को अपने ज्ञान में यह संशय होता है कि मेरा दह नैमित्तिक ज्ञान सत्य था या मिथ्या? ( १ ) प्रत्यक्ष के द्वारा जानने योग्य विषयों का और ( २ ) अप्रत्यक्ष विषयों का बाह्य संशय के ये दो भेद हैं । ( गो और गवय ) दोनों में साधारण रूप से रहने वाले धर्मों के ज्ञान से एवं पोछे दोनों के असाधारण धर्मो के स्मरण और अधर्म से जङ्गल में केवल सींग देखने से जो पुरुष को ' यह गो है अथवा गवय ' इस आकार का संशय होता है वह ' अप्रत्यक्ष विषयक संशय ' है । यह अप्रत्यक्ष विषयक इसलिए है कि विषाणरूप साधारण हेतु से अनुमित एवं रास्ते में छिपा हुआ अप्रत्यक्ष पिण्ड ( गो और गवय ) उसका विषय है । ' स्थाणुपुरुषयोः ' इत्यादि ग्रन्थ से उस संशय का निरूपण किया है जिसका विषय प्रत्यक्ष के द्वारा जाना जाता है । स्थाणु और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाली जो ऊँचाई ( ऊर्ध्वता ) है, आगे स्थित एवं प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धर्मी में उसके प्रत्यक्ष से ' स्थाणुर्वा पुरुषः ' यह संशय उत्पन्न होता है । एवं ' वक्रादिविशेषानुपलब्धित: ' इस वाक्य में ' आदि ' पद से ( पुरुष में रहनेवाले ) शिर एवं हाथ पैर प्रभृति धर्मों का ग्रहण समझना चाहिए । अर्थात् बक्रता और कोटर प्रभृति स्थाणु के विशेष धर्मों की अनुपलब्धि तथा शिर एवं पैर प्रभृति पुरुष के विशेष धर्मों को अनुपलब्धि से प्रकृत में प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का संशय होता है । ' स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानभिव्यक्तो ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' आदि ' पद से ' पुरुषत्वादि ' धर्मों का संग्रह अभीष्ट है । वक्रता और कोटर प्रभृति धर्म स्थाणुत्व की अभिव्यक्ति के कारण हैं । शिर और पैर प्रभृति धर्म पुरुषत्व की अभिव्यक्ति के कारण हैं । इन ( स्थाणुत्व और पुरुषत्व के अभिव्यञ्जक ) धर्मों की अनुपलब्धि के कारण For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४२३ विपर्ययोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवति । प्रत्यक्ष-विषये तावत् प्रसिद्धानेकविशेषयोः पित्तकफानिलोपहतेन्द्रिय-स्यायथार्थालोचनाद् असन्निहित विषयज्ञानज संस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगादधर्माच्चातस्मिंस्तदिति प्रत्ययो विपर्ययः । यथा गव्ये-विपर्यय भी प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता है । विभिन्न जिन दो वस्तुओं के असाधारण धर्म ज्ञात हैं, उन दोनों में से ( विद्यमान ) एक वस्तु में ( अविद्यमान ) दूसरे वस्तु का ज्ञान ही ' विपर्यय ' है । इसकी उत्पत्ति उक्त विषयों के यथार्थ ज्ञान का न्यायकन्दली स्थाणुधर्मस्य शिरः पाण्यादेविशेषस्य पुरुषधर्मस्यानुपलब्धितः । स्थाणु-त्वादिसामान्यविशेषानभिव्यक्तावित्यादिपदेन पुरुषत्वाद्यवरोधः । वक्रकोटरादयः स्थाणुत्वाभिव्यक्तिहेतवः, शिरः पाण्यादयः पुरुषत्वाभिव्यक्तिहेतवः, तेषामनुपलम्भात् । स्थाणुत्व पुरुषत्वयोरनभिव्यक्तौ सत्यामुभयो: स्थाणुपुरुषयोः प्रत्येकमुपलब्धानां विशेषाणामनुस्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्य उभयत्र स्थाणौ पुरुषे वाकृष्यमाणस्य प्रतिपत्तुर्यदोर्ध्वतादर्शनात् स्थाणुरयमिति निश्चेतुमिच्छति तदा पुरुष विशेषानुस्मरणेन पुरुषे समाकृष्यत इत्युभयत्राकृष्यमाणः, अत एवास्य प्रत्ययो दोलायते, नेकत्र नियमेनावतिष्ठते । दोला साधर्म्यमनवस्थित रूपत्वमेव प्रत्ययस्य दर्शयति - किन्नु खल्वयं स्थाणुः स्यात् पुरुषो वेति । संशयानन्तरं विपर्ययं निरूपयति- विपर्ययो s पि प्रत्यक्षानुमानविषय जब स्थाणुत्व और पुरुषत्व का अनुभव नहीं हो पाता, किन्तु स्थाणु और पुरुष दोनों में से प्रत्येक के विशेष धर्मों का पीछे स्मरण होता है तब ' उभयत्राकृष्यमाणस्य ' ' उभयत्र ' अर्थात् स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ आकृष्ट ज्ञाता जिस समय ऊँचाई के देखने से ' यह स्थाणु ही है ' यह निश्चय करने के लिए इच्छुक होता है, उसी की स्मृति से पुरुष की तरफ भी आकृष्ट होता है । इस प्रकार ( स्थाणु और पुरुष ) दोनों में आकृष्यमाण पुरुष का प्रत्यय दोलायित होता है, अर्थात् नियमपूर्वक एक ही स्थान में नहीं ठहरता । दोला ( झूला ) के साधर्म्य के द्वारा प्रत्यय में जो अनिश्चय स्वरूपता सूचित होती है, उसके स्वरूप का निर्देश ' किं नु खल्वयं स्थाणुः स्यात् पुरुषो वेति ' इस वाक्य के द्वारा दिखलाया गया है । संशय के बाद ' विपर्ययोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा विपर्यय का निरूपण करते हैं । इस वाक्य के ' अपि ' शब्द के द्वारा यह प्रतिपादित For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२४ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे विपर्यय-एव भवतीति । संशयस्तावत् प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवतीति विपर्ययोऽपि तद्विषये भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवतीति प्रत्यक्षानु-मानव्यतिरेकेण प्रमाणान्तराभावात् । प्रत्यक्षविषये तावत् प्रसिद्धानेकविशेष-योरपि प्रसिद्धाः पूर्वं प्रतीता अनेके विशेषाः सास्नादयः केसरादयश्च ययोस्तौ प्रसिद्धानेकविशेषौ गवाश्वौ तयोर्मध्ये योऽतस्मिन्ननश्वे गवि तदिति प्रत्ययोऽश्व इति प्रत्ययः स विपर्ययः । ननु यदि गवि गोत्वसास्नादयश्च विशेषाः परिगृह्यन्ते, तदा विपर्ययो न भवति । भवति चेदस्यानुपरमप्रसङ्गस्तत्राह - अयथार्थालोचनादिति । अयथार्थालोचनं यथार्थालोचनस्याभावो गौः सास्नादि-मांस्तथाग्रहणाभाव इति यावत् । तस्मादर्तास्मस्तदिति प्रत्ययो भवतीति । अनेन विशेषानुपलम्भस्य कारणत्वमुक्तम् । सन्निहिते पिण्डे गोत्वस्याग्रहणे को हेतुः को वा हेतुरसन्निहितस्याश्वत्वस्य प्रतीतावित्याह-- पित्तकफानि-लोपहतेन्द्रियस्येति । पित्तं च कफश्चानिलश्च तैरुपहतं दूषितमिन्द्रियं यस्य, तस्यायं विपर्यय इति। वातपित्तश्लेष्मादिदोषाणामसन्निहितप्रतिभासे सन्निहितार्थाप्रतिभासे च सामर्थ्यं समर्थितम् । यदि दोषसामर्थ्यादेवासन्निहितं हुआ है कि जिस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात विषयों का हो संशय होता है, उसी प्रकार ' विपर्यय ' भी प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों से ज्ञात विषयों का ही होता है, क्योंकि इन दोनों से भिन्न कोई प्रमाण ही नहीं है । ' प्रत्यक्षविषये तावत् ' इत्यादि से प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषय का विपर्यय दिखलाया गया है । ' प्रसिद्धा अनेके विशेषा ययोः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पूर्व में ज्ञात ( गाय ) सास्नादि विशेष धर्म एवं ( अश्व के ) केसरादि विशेष धर्म जिन दो वस्तुओं के हैं, वे दोनों ही अर्थात् गो और अश्व ही लिखित प्रसिद्धानेकविशेषयोः ' इस पद के अर्थ हैं । इन दोनों में से ' अतस्मिन् ' अर्थात् जो तत्स्वरूप नहीं है उसमें अर्थात् अश्व से भिन्न गो में ' तत् ’ अर्थात् ' यह अश्व है ' इस आकार का जो प्रत्यय वही विपर्यय ' है । ( प्र ० ) यदि गो के गोरख और सास्ना प्रभृति असाधारण धर्म गृहीत होते हैं तो फिर उक्त ज्ञान विपर्यय ही नहीं होगा । यदि उन असाधारण धर्मों के ज्ञान के रहते हुए भी उक्त विपर्ययरूप ज्ञान हो सकता है तो फिर उसकी विरति ही नहीं होगी । इसी प्रश्न के उत्तर के लिए ' अयथार्थालोचनात् यह पद लिखा गया है । ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' अयथार्थालोचन ' शब्द का अर्थ है ' यथार्थालोचन ' ( यथार्थ ज्ञान ) का अभाव, अर्थात् गोरूप अर्थ जिस प्रकार का है ( गोत्व एवं सास्नादि से युक्त है ) उस प्रकार से अर्थात् गोत्वरूप से एवं सास्नादिमत्त्वरूप से गो के ज्ञान का अभाव ( भी विपर्यय का कारण है ) । उक्त यथार्थ ज्ञान के अभाव के द्वारा जो जिस रूप का नहीं है उसका उस रूप से ज्ञान ( रूप विपर्यय ) की उत्पत्ति होती है । इससे गवादि के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली II प्रतिभाति सर्वं सर्वत्र प्रतिभासेत, नियमहेतोरभावादित्यत्राह -- असन्निहित-विषयज्ञानजसंस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगादिति । असन्निहितो विषयोऽश्वादिस्ततः पूर्वोत्पन्नाज्ज्ञानाज्जातो यः संस्कार-स्तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगाद् विपर्यय इति । अयमस्यार्थः -- गोपिण्ड-संयुक्तमिन्द्रियं गोत्वमगृहृदपि तं पिण्डं गोसादृश्य विशिष्टं गृह्णाति, सांशत्वाद् वस्तुनः । तेन च सादृश्यग्रहणेनाश्वविषयः संस्कारः प्रबोध्यते । स च प्रबुद्धोऽश्वस्मृतिजनने प्राप्ते मनोदोषादिन्द्रियसंयुक्ते गव्यश्वसादृश्या-नुरोधादनुभवाका रामश्वप्रतीतिं करोति, अतो न सर्वस्य सर्वत्रावभासः, सादृश्यसंस्कारयोः प्रतिनियमहेतुत्वात् । अत एव चेयं गुरुभिरिन्द्रियजा भ्रान्तिरुच्यते । एवं हीन्द्रियजा न स्याद् यदीयं संस्कारकसामर्थ्यादसन्निहित-मनधिकरणमश्वत्वमात्रमेव गृह्णीयान्निरुद्धेन्द्रियव्यापारस्य वा भवेत्, गोत्वादि ) विशेष धर्मों की अनुपलब्धि को ( गो में ' यह अश्व है ' इस आकार के ) विपर्यय का कारण माना गया है । ( प्र ० ) गो ( ज्ञाता पुरुष के ) समीप में है, उसके गोत्वादि विशेष धर्म तो ज्ञात नहीं हो पाते, किन्तु जो अश्व उसके अप्रत्यक्ष एवं दूर है उसके अश्व-त्वादि विशेष धर्मों का ज्ञान होता है, इसमें क्या हेतु है? इसी प्रश्न का समाधान ' पित्तकफानिलोपहितेन्द्रियस्य ' इस वाक्य से दिया गया है । पित्तञ्च, कफश्च, अनि-लव पित्तकफानिलाः, तैरुपहतमिन्द्रियं यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पित्त कफ और वायु से जिस पुरुष की इन्द्रिय दूषित हो गयी है वही पुरुष ' पित्तकफानिलोपहतेन्द्रिय ' शब्द का अर्थ है | अभिप्राय यह है कि इस प्रकार से दूषित इन्द्रियवाले पुरुष को ही यह विपर्यय ज्ञान होता है । इससे कफ, पित्त, वायु प्रभृति दोषों में समीप को वस्तुओं के अज्ञान एवं दूर की वस्तुओं के ज्ञान इन दोनों के उत्पादन की शक्ति समर्थित होती है | ( प्र ० ) अगर केवल दोष के सामर्थ्य से ही दूर के विषय प्रतिभासित होते हैं, तो फिर सभी विषयों का प्रतिभास ( विपर्यय ) सर्वत्र हो, क्योंकि ( अमुक स्थान में ही अमुक वस्तु का प्रतिभास हो इस ) नियम का कोई कारण नहीं है? इसी प्रश्न के समाधान में ' असं निहित विषयज्ञानसंस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगात् ' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् अश्वादि असंनिहित विषयों का बहुत पहिले से जो ज्ञान हो चुका है, उस ज्ञान से उत्पन्न संस्कार की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा विपर्यय की उत्पत्ति होती है । अभिप्राय यह है कि कथित रूप से गोरूप पिण्ड में संयुक्त रहने पर भी उसमें रहनेवाले गोत्व का ग्रहण ( फलतः गोत्व रूप से गो का ग्रहण नहीं ( अश्वादि ) अर्थों का ही ग्रहण सादृश्य के द्वारा अश्वविषयक द्वारा यद्यपि अश्व को स्मृति ही II दूषित इन्द्रिय नहीं करती है, गोमाश्य से युक्त करती है ) किन्तु करती है, क्योंकि वस्तुओं के अनेक रूप हैं । इस संस्कार प्रबुद्ध हो जाता है । इस प्रबुद्ध संस्कार के उचित है, फिर भी मन के दोष से गो में अश्व के For Private And Personal