प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 501–510
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 501–510
पृष्ठ 501
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२६ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय-वाश्व इति । असत्यपि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षाभिमानो भवति, यथा व्यपगत-अभाव, आत्मा और मन के संयोग एवं अधर्म इन तीन हेतुओं से होती है । ( इन कारणों में से ) आत्ममनः संयोग को उक्त दोनों विषयों के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । यह ( विपर्यय ) कफ, पित्त और वायु के प्रकोप से बिगड़ी हुई इन्द्रियवाले पुरुष को ही होती है । जैसे गो में अश्व का ज्ञान ( विपर्यय है ) । ( विपर्यय के और उदाहरण न्यायकन्दली व्याप्रियमाणे चक्षुषि तत्संयुक्क्तमेव तु गोपिण्डमश्वात्मना गृह्णती यदीयं नेन्द्रियजा का तहन्द्रियजा भविष्यति विपरीतख्याति:? अत एवान्य-स्यान्यारोपेण प्रतिभासनाद् योऽपि निरधिष्ठाने विपर्ययस्तत्राप्यवर्तमा नोऽर्थः स्वरूपविपरीतेन वर्तमानाकारेण प्रतीयत इति विपरीतख्यातिरेव, न त्वसत्ख्यातिः, स्वरूपतोऽर्थस्य सम्भवादसतो वावभासनायोगात् । यत्र सदृशमर्थमधिष्ठाय विपर्यय: प्रवर्तते, तत्र सादृश्यं कारणम्, निरधिष्ठाने तु विभ्रमे मनोदोषमात्रानुबन्धिनि नास्य सम्भवः, यथा हि कामातुरस्येत-स्ततो भाविनि स्त्रीनिर्भासे विज्ञाने । संस्कारोऽपि तत्रैव कारणं यत्र सविकल्पको सादृश्य के अनुरोध से अश्व का अनुभव रूप ही ज्ञान होता है । अतः सभी जगह सभी का प्रतिभास ( विपर्यय भी ) नहीं होता, क्योंकि कथित सादृश्य और संस्कार ये दोनों ही उसको नियमित करते है । अत एव ' गुरु ' इसे ' इन्द्रियजनित भ्रान्ति ' कहते हैं । यह भ्रान्ति अगर इन्द्रिय से उत्पन्न न हो, केवल संस्कार के सामर्थ्य से ही उत्पन्न हो तो फिर गोरूप आश्रय से दूर रहनेवाले एवं अभय में न रहनेवाले अश्वस्व को ही प्रकाशित करेगी । अथवा जिस पुरुष की इन्द्रियों का व्यापार निरुद्ध है उसे भी उक्त आकार की भ्रान्ति होगी । व्यापार से युक्त चक्षु के साथ संयुक्त गोपिण्ड को अश्वरूप से ग्रहण करती हुई भी अगर यह अनुभूति भ्रान्ति नहीं है तो फिर कौन सी विपरीतख्याति इन्द्रियजनित होगी? अत एव विपर्यय विपरीतख्याति ही है असत्ख्याति नहीं, क्योंकि विपर्यय में एक का ही दूसरे रूप से भान होता है । एवं जहाँ बिना अधिष्ठान के भी विपर्यय होता है, वहाँ भी अवर्तमान अर्थ ही अपने विरुद्ध वर्त्तमान की तरह प्रतिभासित होता है । चूंकि स्वरूपतः वस्तु की सम्भावना है, एवं सर्वथा अविद्यमान वस्तु का भान असम्भव है । जहाँ सदृश वस्तु को अधिष्ठान बनाकर विपर्यय की प्रवृत्ति होती है, वहाँ सारश्यज्ञान ही विपर्यय का कारण है । जहाँ केवल मन के दोष से बिना अधिष्ठान का ही विपर्यय होता है, जैसे कि कामातुर पुरुष को चारों तरफ की सभी वस्तुएँ स्त्रीमय दीखती है, वहाँ सादृश्य का ज्ञान कारण नहीं हो सकता । संस्कार For Private And Personal
पृष्ठ 502
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४२७ घनपटलमचलजलनिधिसदृशमम्बरमञ्जनचूर्णपुञ्जश्यामं शार्वरं तम इति । ये भी हैं ) जहाँ वस्तुतः प्रत्यक्ष के न रहने पर भी प्रत्यक्ष के ये अभिमान होते है । ' मेघ से रहित यह प्रकाश बिना तरङ्ग के समुद्र की तरह है ' एवं ' रात का यह अन्धकार अञ्जन के चूर्ण की तरह कृष्ण वर्ण का है '; न्यायकन्दली भ्रमः, निर्विकल्प विन्द्रियदोषस्यैव सामर्थ्यं तद्भावभावित्वात् । यथा शङ्ख पोतज्ञानोत्पत्तौ । विपर्ययस्योदाहरणान्तरमाह - असत्यपि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षाभिमान इत्यादिना गगनावलोकन कुतूहलादूर्ध्वमनुप्रेषिता नयनरश्मयो दूरगमनान्मन्दवेगाः प्रतिमुखैः सूर्य रश्मिभिरतिप्रबल वेगैराहताः प्रतिनिवर्तमानाः स्वगोलकस्य गुणं देशान्तरे निरालम्बं नीलिमानमाभासयन्तो जलधरपटलनिर्मुक्त-निस्तरङ्गमहोदधिकल्पमम्बरमिति प्रत्यक्षमिव रूपज्ञानमप्रत्यक्षे नभसि जनयन्ति । स्वगोलक गुणं व्योमाधिकरणत्वेनेन्द्रियमाभासयतीत्यत्र तद्गुणानुवि-धानेन प्रतीतिनियमः प्रमाणम् । तथा हि- कामलाधिष्ठितेन्द्रियाधिष्ठानो विद्रुत-कलधौतरसविलुप्तमिवान्तरिक्षमीक्षते । कफाधिकतया धवलगोलको रजत-सच्छायं पश्यति । शर्वर्यां भवं शार्वरं तमोऽञ्जनपुञ्ज इव श्याममिति केवल-भी केवल सविकल्पक भ्रम का ही कारण है । निर्विकल्पक भ्रम का इन्द्रियदोष ही कारण है, क्योंकि उसके रहने से ही उसकी उत्पत्ति होती है । जैसे कि शंख में पीत ज्ञान की उत्पत्ति होती है । ' असत्यपि प्रत्यक्षे ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा विपर्यय का दूसरा उदाहरण दिखलाया गया है । आकाश को देखने के कुतूहल से ऊपर की ओर प्रेषित आँख की रश्मियों को गति दूर जाकर धीमी हो जाती है । फिर नीचे की ओर जाती हुई प्रबल गति से युक्त सूर्य की रश्मियों से बाधा पाकर वे ही रश्मियाँ नीचे की ओर लोटती हैं । तब ( ये ही चक्षु की रश्मियाँ ) अपने गोलक के ही गुण नीलवर्ण को बिना अधिष्ठान के ही प्रतिभास कराती हुई अप्रत्यक्ष आकाश में प्रत्यक्ष की इस आकार के ज्ञान को उत्पन्न करती है कि ' यह मेघों से रहित आकाश तरङ्गों से शून्य समुद्र के समान है ' ( कथित स्थल में ) ' नयन की रश्मियाँ अपने अधिष्ठानभूत गोलक के गुण के ही आकाश में प्रतिभासित कराती हैं ' इस अवधारण में यह प्रतीति ही प्रमाण है कि सदा से गोलक के गुण का ही प्रतिभास आकाश में नियमतः होता है, जैसे कि कमल नाम की व्याधि से दूषित चक्षुगोलक वाले पुरुष को आकाश पिघले हुए सुवर्ण रस से लिपा हुआ सा दीखता है । वही आकाश कफ के अधिक्य से स्वच्छ गोलकवाले पुरुष को चाँदी की तरह दीखता हैं । ' शर्वय भवं शार्वरम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार रात For Private And Personal
पृष्ठ 503
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४२८ अनुमान विषयेऽपि न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् वाष्पादिभिर्धूमाभिमतैर्वह्वथनुमानम्, दर्शनाच्च गौरिति । त्रयीदर्शनविपरीतेषु [ गुणे विपर्यय-गवय-शाक्यादिदर्शनेष्विदं बाप क धूम समझकर उसके द्वारा ( जल में ) वह्नि का अनुमान, अनुमान के विषय में विपर्ययका उदाहरण है । अथवा गवय के सींग को देखकर गो का अनुमान भी ( इसका उदाहरण है ) । ऋग्वेद, सामवेद न्यायकन्दली ज्ञानमत्यन्ततेजोऽभावे सति सर्वत्रारोपितरूपमात्रविषयम प्रत्यक्षमपि प्रत्यक्षमिव पश्यति । अनुमानविषये s पि वाष्पादिभिर्बाष्पधू लिपताका दिभिर्धूमाभिमतैर्धूम इति ज्ञातैरनग्निके देशेऽग्न्यनुमानम् । तथा गवयविषाणदर्शनाद् गौरिति ज्ञान-मनुमानविपर्ययः । अत्यन्त दुर्दर्शनाभ्यासाच्च विपर्ययो भवतीत्याह - त्रयीदर्शन विपरीतेष्विति । त्रयाणां वेदानामृग्यजुः साम्नां समाहारः त्रयी, अथर्ववेदस्तु येकदेश एव । दृश्यते स्वर्गापवर्गसाधनभूतोऽर्थोऽनयेति दर्शनम्, त्रय्येव दर्शनं त्रयी-दर्शनम्, तद्विपरीतेषु शाक्यादिदर्शनेषु शाक्य भिन्नकनिग्रन्थकसंसारमोच-कादिशास्त्रेष्विदं श्रेय इति यदुपदिशन्ति तत् प्रमाणमिति ज्ञानं मिथ्याप्रत्ययः, तेषु कश्चिदेवोपगृहीतेषु सर्वेषां वर्णाश्रमिणां विगानात् प्रमाणविरोधाच्च । तथा शरीरेन्द्रियमनः स्वात्माभिमानो विपर्ययस्तेभ्यो व्यतिरिक्तस्य ज्ञातुः प्रतिपादनात् । का अन्धकार ही ' शार्श्वर्य ' शब्द का अर्थ है । ' रात में उत्पन्न यह अन्धकार अञ्जन समूह की तरह श्याम है ' यह ज्ञान यद्यपि तेज का अत्यन्त अभाव होने पर सभी स्थानों में आरोपित रूपविषयक होने पर भी अप्रत्यक्ष विषयक ही है फिर भी प्रत्यक्ष की तरह दीखता है । अनुमान रूप विपर्यय वह है जहाँ ' वाष्पादि से ' अर्थात् धूम समझे जानेवाले वाष्प धूल और पताकादि से अग्निरहित देशों में जो वह्नि का ज्ञान होता है ( वही अनुमानरूप विपर्यय हैं ) । इसी तरह गवय के सींग को देखने से जो गो का ज्ञान होता है, वह भी विपर्यय-रूप अनुमान ही है । ' त्रयीदर्शन विपरीतेषु ' इत्यादि से यह दिखलाया गया है कि कुत्सित दर्शनों के अभ्यास से भी विपर्ययरूप अविद्या की उत्पत्ति होती है । ' त्रयाणां समाहारः त्रयी ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीनों के समुदाय का नाम ही ' त्रयी ' है । अथर्ववेद त्रयी का ही एकदेश है । ' दृश्यते स्वर्गापवर्गसाधनभूतोऽर्थोऽनया इति दर्शनम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस दृष्टि से स्वर्ग और मोक्ष इन दोनों के कारणी-भूत वस्तु देखो जाँय वही दृष्टि प्रकृत ' दर्शन ' शब्द का अर्थ है । ' त्रय्येव दर्शनम् त्रयोदर्शनम् ' For Private And Personal
पृष्ठ 504
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् III प्रशस्तपादभाष्यम् श्रेय इति मिध्याप्रत्ययः विपर्ययः शरीरेन्द्रिय मनः स्वात्माभिमानः, कृतकेषु नित्यस्वदर्शनम्, कारणवैकल्ये कार्योत्पत्तिज्ञानम् • हितमुपदिशत्स्व-हितमिति ज्ञानम्, अहितमुपदिशत्सु हितमिति ज्ञानम् । और यजुर्वेद इन तीनों के समूह रूप ) त्रयी के विरुद्ध मतवाले बौद्धादि दर्शनों में ' यही मोक्ष का कारण है ' इस प्रकार का अभिमान भी विपर्यय है । शरीर अथवा इन्द्रिय या मन को आत्मा समझना भी विपर्यय है । उत्पत्तिशील वस्तुओं, कारणों में नित्यत्व का ज्ञान के न रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति का ज्ञान, हित उपदेश करनेवालों में ' यह मेरा हितू नहीं है ' इस प्रकार का ज्ञान, अनिष्ट उपदेश करनेवालों में ' यही मेरा हित है ' इस प्रकार का ज्ञान, ये सभी ज्ञान विपर्यय हैं । न्यायकन्दली कृतकेषु वेदेषु नित्यत्वाभिमानो विपर्ययो मीमांसकानाम् । कारण-वैकल्ये धर्माधर्मयोरभावे कार्योत्पत्तिज्ञानं सुखदुःखादिवैचित्र्यज्ञानं तच्छ-t याणां विपर्ययो लौकायतिकानाम् । प्राणिनो न हिंसितव्या मलपङ्कादिकम-शुचि न धारयितव्यमित्यादिकं हितमुपदिशत्सु वेदवृद्धेषु अहितमिति विज्ञानं प्राणिहिंसापरो धर्मो मलपङ्कादिधारणमेव श्रेयस इत्यहितमुपदिशत्सु क्षपणक-संसारमोचकादिषु हितमिति विज्ञानं तच्छिष्याणां विपर्ययः । इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित श्रथी से अभिन्न दर्शन ही प्रकृत ' त्रयीदर्शन ' शब्द का अर्थ है 1 । त्रयी के विरुद्ध जो शाक्यादि के दर्शन हैं उनमें अर्थात् बौद्ध भिन्नक, निर्ग्रन्थक और ससारमोचकादि के शास्त्रों में से किसी में ' यह कल्याण का कारण है ' ऐसा जो कोई उपदेश करते हैं, उस उपदेश में प्रामाण्य का ज्ञान भी ( विपर्यय रूप ) मिथ्या-प्रत्यय ही है । क्योंकि वे शास्त्र किसी अतिसाधारण व्यक्ति के द्वारा ही परिगृहीत है । एवं उनमें सभी बातें वर्णाश्रमियों के विरुद्ध ही हैं, और उनकी बातें प्रमाणों से भी बहिर्भूत हैं । इसी प्रकार शरीर, इन्द्रिय और मन में से प्रत्येक में आत्मा का अभिमान भी विपर्यय है, क्योंकि इन सबों से भिन्न रूप में आत्मा का अस्तित्व प्रमाणों से सिद्ध है । प्रयत्न से उत्पन्न शब्दरूप वेदों में नित्यत्व का अभिमान भी मीमांसकों का विपर्यय हो है । ' कारणों के वैकल्य ' से अर्थात् धर्म और अधर्म के न रहने पर भी कार्योत्पत्ति का ज्ञान अर्थात् सुख - दुःखादि वैचित्र्य का लौकायतिकों और उनके शिष्यों का ज्ञान भी विपर्यय हो है । प्राणियों की हिंसा न करनी चाहिए, मलपङ्कादि अशुचि वस्तुओं को धारण न करना चाहिए इत्यादि प्रकार के ' हित ' उपदेश करनेवाले वेदज्ञ वृद्धों के प्रति ये ' मेरे हित नहीं हैं, इस आकार का ज्ञान एवं ' प्राणियों की हिंसा ही परम For Private And Personal
पृष्ठ 505
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४३० म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे विपर्यय-अत्र केचिद् वदन्ति -- विपर्ययो नास्ति, कारणाभावात् । तदभावश्चेन्द्रि-याणां यथार्थज्ञानजननस्वभावत्वात् । दोषवशादयथार्थमपि ज्ञानमिन्द्रियाणि जनयन्तीति चेन्न शक्तिविघातमात्र हेतुत्वाद् दोषाणाम् । शुक्तिसंयुक्तमिन्द्रियं दोषोपहतशक्तिकं शुक्तिकात्वं न गृह्णाति न त्वसन्निहितं रजतं प्रकाशयति दोषाणां संस्कारकत्वप्रसङ्गात् । यदि चाप्रत्यक्षमपि चक्षुरध्यक्षयति? सर्वस्य सर्ववित्वं केन वार्येत? इदं रजतमिति ज्ञानस्य शुक्तिकालम्बनमिति हि संविद्वि-रुद्धम् । यस्यां हि संविदि योऽर्थोऽवभासते स तस्या आलम्बनम् । रजतज्ञाने च रजतं प्रतिभाति न शुक्तिका । न चागृहीतरजतस्य शुक्तौ तद्द्भ्रमः । तस्मादिदमिति शुक्तिकाविषयोऽनुभवो रजतमिति सदृशावबोधप्रबोधितसंस्कारमात्रजं दोषकृतं तदित्यंशप्रमोषं रजतस्मरणमिति द्वे इमे संवित्ती भिन्नविषये । धर्म है, मलपङ्कादिका धारण करना ही परमश्रेय है, इत्यादि उपदेश करनेवाले क्षपणक संसारमोचकादि में ' ये ही मेरे हितु है ' इत्यादि आकार के उनके शिष्यों के ज्ञान भी विपर्यय हैं । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि ( प्र ० ) विपर्यय नाम का कोई ज्ञान ही नहीं हैं, क्योंकि उसका कोई कारण नहीं है । इन्द्रियाँ चूँकि यथार्थ ज्ञान को ही उत्पन्न कर सकती हैं, अतः सिद्ध होता है कि विपर्यय ( या मिथ्याज्ञान ) नाम की कोई वस्तु नहीं है । अगर कहें कि ( उ ० ) दोष के साहाय्य से इन्द्रियाँ अययार्थ ज्ञान को भी उत्पन्न कर सकती हैं? ( प्र ० ) ( किन्तु यह कहना भी सम्भव ) नहीं है, क्योंकि दोष कारणों की शक्ति को केवल विघटित ही कर सकते हैं, जिस पुरुष के चक्षु की शक्ति दोष के द्वारा विघटित हो गयी है उस चक्षु का यदि शुक्तिका के साथ संयोग भी होता है, तो भी वह चक्षु शुक्तिकात्व को ग्रहण नहीं कर सकती, एवं न दूरस्थ रजत को ही प्रकाशित कर सकती है, यदि ऐसी बात हो तो फिर दोषों में संस्कार की जनता माननी पड़ेगी, फिर सभी जीवों में आनेवाली सर्वज्ञता की आपत्ति का निवारण किस प्रकार होगा? एवं यह अनुभव के भी विरुद्ध है कि ' इदं रजतम् ' इस ज्ञान का विषय शुक्तिका है, क्योंकि जिस ज्ञान में जो भासित होता है वही उसका विषय होता | ' इदं रजतम् ' इस ज्ञान में रजत ही भासित होता है, शुक्तिका नहीं । अज्ञात रजत का शुक्तिका में भ्रम भी नहीं हो सकता । अतः प्रकृत ' इदं रजतम् ' इस ज्ञान में ' इदम् ' यह अंश शुक्तिकाविषयक अनुभव है एवं रजतम् ' यह अंश रजत विषयक स्मृति है, जिसमें कारणीभूत अनुभव के विषय में का ' तत्ता ' का अंश हट गया है । उस स्मृति की उत्पत्ति ( रजत में रहनेवाली शुक्तिका के ) सादृश्य से उबुद्ध संस्कार से होती है । तस्मात् ' इदम् ' यह अनुभवरूप और ' रजतम् ' यह स्मृति रूप फलत: दो विभिन्न विषयक ज्ञान है । ( ' इदं रजतम् ' यह एक अखण्ड विशिष्ट ज्ञान नहीं है ) । For Private And Personal
पृष्ठ 506
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४३१ अत्रोच्यते - यदि रजतज्ञानं न शुक्तिकाविषयं किं त्वेषा रजतस्मृतिः, तदा तस्मिन् ज्ञाने रजतार्थी पूर्वानुभूते एव रजते प्रवर्तत न शुक्तिकायाम्, स्मृतेरनुभव देशे प्रवर्तकत्वात् । अथ मन्यसे - इन्द्रियेण रजतस्य साधारणं रूपं शुक्तिकायां गृहीतम्, न शुक्तिकात्वं विशेषः, रजतस्मरणेन च तदित्युल्लेख-शून्येनानिर्धारितदिग्देशं रजतमात्रमुपस्थापितम्, तत्रानयोर्गृह्यमाणस्मर्यमाणयो-ग्रहणस्मरणयोश्च सादृश्याद् विशेषाग्रहणाच्च विवेकमनवधारयन् शुक्तिकादेशे प्रवर्तते, सामानाधिकरण्यं शुक्तिकारजतयोरध्यवस्यति रजतमेतदिति । तदप्ययुक्तम्, अविवेकस्याप्यग्रहणात् । रजताभेदग्रहो हि रजतार्थिनः शुक्तिकायां प्रवृत्तिकारणं न सादृश्यम्, भेदग्रहणं च ततो निवृत्तिकारणम्, तदुभयोरभावान्न प्रवर्त्तते न निवर्त्तत इति स्यात्, न तु नियमेन प्रवर्तत, विशेषाभावात् । एवं सामानाधिकरण्यमपि न स्यादभेदाग्रहणस्यापि वैयधि-करण्यहेतोः सम्भवात् । तथा च प्रवृत्त्युत्तरकालीनो नेदं रजतमिति बाधकप्रत्ययो s पि न घटते, शुक्तिकारजतयोर्भेदो न गृहीतो न तु तादात्म्य-मध्यवसितं येनेदं प्रतिषिध्यते, भेदाग्रहणप्रसञ्जितस्य शुक्तिकायां रजत-( उ ० ) इस प्रसङ्ग में हमलोग कहते हैं कि उक्त रजतविषयक ज्ञान में अगर शुक्ति विषय न हो, वह केवल रजत की स्मृति ही हो तो फिर इस ज्ञान के बाद रजत को प्राप्त करने की इच्छा रखनेवाला पुरुष पहिले से अनुभूत रजत में ही प्रवृत्त होता शुक्तिका में नहीं, क्योंकि स्मृति ( अपने कारणीभूत ) पूर्वानुभव के विषय रूप देश में हो प्रवृत्ति का उत्पादन कर सकती है । ( प्र ० ) प्रकृत में रजत का साधारण रूप ( इदन्त्व ) ही इन्द्रिय से शुक्तिका में गृहीत होता है, शुक्तिका का विशेष धर्म शुक्ति-काव नहीं । पूर्वानुभव की विषय तत्ता ' के सम्बन्ध से सर्वथा रहित रजत की स्मृति से अनिश्चित केवल रजत ही जिस किसी देश में उपस्थित किया जाता है । अनुभूत एवं स्मृत दोनों विषयों के एवं अनुभव और स्मृति दोनों ज्ञानों के सादृश्य, एवं दोनों विषयों के असाधारण धर्मों का अज्ञान, इन दोनों से रजत की इच्छा रखनेवाले पुरुष को शुक्तिका और रजत के भेद का निश्चय नहीं हो पाता । अतः वह पुरुष शुक्ति रूप देश में ही रजत के लिए प्रवृत्त हो जाता है । एवं शुक्तिका और रजत इन दोनों में अभेद को यह निश्चय करता है कि ' यह रजत है ' । ( उ ० ) किन्तु उक्त कथन असङ्गत है, क्योंकि ( उक्त स्थल में ) अभेद का ज्ञान नहीं होता, एवं शुक्तिका में रजत के अभेद का ज्ञान प्रवृत्ति का कारण है, दोनों का साक्ष्य नहीं । एवं रजत और शुक्ति भेद का ज्ञान ( शुक्तिका में रजतार्थी की ) निवृत्ति का कारण है इस प्रकार ( शुक्तिका में ' इदं रजतम् ' इत्यादि स्थलों में ) प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में से एक भी नहीं बनेगी, क्योंकि न वहाँ अभेद का ज्ञान है न भेद का । एवं उक्त ज्ञान For Private And Personal
पृष्ठ 507
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे विषय-व्यवहारस्यायं प्रतिषेध इति चेन्न, अभेदाग्रहणादतद्वयवहारप्रवृत्तेरपि सम्भवात् । अस्ति च शुक्तिकादेशे रजतार्थिनः प्रवृत्तिः अस्ति च सामानाधिकरण्य-प्रत्ययो रजतमेतदिति अस्ति , च बाधकप्रत्यय इदन्ताधिकरणस्य रजता-त्मतानिषेधपरः । तेनावगच्छामः शुक्तिसंयुक्तेनेन्द्रियेण दोषसहकारिणा रजतसंस्कारसचिवेन सादृश्यमनुरुन्धता शुक्तिकाविषयो रजताध्यवसायः कृतः । यच्चेदमुक्तं शुक्तिकालम्बनत्वमनुभवविरुद्धमिति, तदसारम् । इदन्तया नियत देशाधिकरणस्य चाकचिक्यविशिष्टस्य शुक्तिकाशकलस्यापि प्रतिभा-सनात् । हानादिव्यवहारयोग्यता चालम्बनार्थः, स चात्रैव सम्भवति । योऽपि भेदाग्रहाच्छुक्तौ रजतव्यवहारप्रवृत्तिमिच्छति, तेनापि विपर्ययोऽङ्गीकृतः, अतस्मिंस्तदिति व्यवहारप्रवृत्तेरेव विपर्ययत्वात् । यच्च शक्तिव्याघातहेतुत्वं के बाद नियम पूर्वक होनेवाली प्रवृत्ति की भी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि प्रकृत में कोई अन्तर नहीं है । इसी प्रकार अभेद का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि भेद के ज्ञान के कारण अभेद के अग्रहण की भी वहाँ सम्भावना है । एवं यहाँ प्रवृत्ति के बाद जो ' नेदं रजतम् ' इत्यादि आकार की बाधक प्रतीति होती है, वह भी नहीं बन सकेगी, क्योंकि शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद ज्ञात ही नहीं हैं, एवं दोनों का अभेद भी गृहीत नहीं है, फिर किससे उक्त प्रतिषेध की उपपत्ति होगी? ( प्र ० ) शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद के अज्ञान से शुक्तिका में रजतव्यवहार की जो सम्भावना होती है, उसी का निषेध ' नेदं रजतम् ' इत्यादि से होता है । ( इस प्रकार से उपपत्ति ) नहीं की जा सकती, क्योंकि उक्त अभेद के अग्रहण मात्र से तो रजत से भिन्न ( घटादि ) व्यवहार भी हो सकता है । किन्तु शुक्तिका के प्रदेश में ही रजत की इच्छा करनेवालों की प्रवृत्ति होती है, एवं अभेद की यह प्रतीति होती है कि यह रजत है | एवं इदन्त्व के आश्रय शुक्तिका में रजतस्वरूपत्व का निषेध करनेवाला ( नेदं रजतम् ) यह बाघक प्रत्यय भी है । इससे यह निश्चित रूप से समझते हैं कि शुक्तिका से संयुक्त इन्द्रिय ही शुक्तिका में रजत विषयक निश्चय को उत्पन्न करती है । यह अवश्य है कि इन्द्रिय को इस विशेष कार्य के लिए दोष रूप सहकारी की, रजतसंस्कार से सहायता की और सादृश्य के अनुरोध की आवश्यकता होती है । यह जो कहा जाता है कि शुक्तिका रजतज्ञान का विषय हो, यह अनुभव से बाहर की बात है ' उसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि इदन्त्व का नियत अधिकरण एवं चाकचिक्य से युक्त शुक्तिका खण्ड, ये दोनों भी तो उस प्रतीति में विषय हैं ही । जिस प्रतीति से जिसमें ग्रहण या त्याग की योग्यता आवे वही उस प्रतीति का विषय है यह योग्यता ( इस ' इदं रजतम् ' इस ज्ञान में भासित होनेवाले रजत में भी ) है ही । जिनकी यह अभिलाषा है कि भेद के अज्ञान से हो शुक्ति में रजत का व्यवहार और प्रवृत्ति दोनों की उपपत्ति For Private And Personal
पृष्ठ 508
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४३३ दोषाणामिति, तदपि न किञ्चित्, वातादिदोषदुष्टानां धातूनां रोगान्तर-जननोपलम्भात् । सर्वस्य सर्ववित्त्वं च दोषाणां शक्तिनियमादेव पराहतम् । न च ज्ञानस्यार्थव्यभिचारे सर्वत्रानाश्वासः, यत्नेनान्विष्यमाणानां बाधकारण-दोषाणामनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्वयाप्तस्य विपर्ययस्याभावावगमादेव विश्वा-सोपपत्तेः । विपर्ययानभ्युपगमे च द्विचन्द्रज्ञानस्य का गतिः? दोषव्यतिभिन्नानां चक्षू-रम्यवयवानां च पृथङ् निर्गत्य पतितानां चन्द्रमसि जनितस्य ज्ञानद्वयस्यायं द्वित्वावभास इति चेन्न, ज्ञानधर्मस्य चक्षुषा ग्रहणाभावात् । ज्ञानधर्मो ज्ञेयगतत्वेन गृह्यमाणो ज्ञेयग्राहकेणैवेन्द्रियेण गृह्यत इत्यभ्युपगमे तु भ्रान्तिः समर्थितास्यात्, अन्यधर्मस्यान्यत्र ग्रहणात् । इत्यलमतिप्रकोपितैः श्रोत्रियद्वि-जन्मभिरित्युपरम्यते । ये तु शुक्तिकायां रजतप्रतीतावलौकिकं रजतं वस्तुभूतमेव प्रतीयत इति हो, वे भी वस्तुतः ' विपर्यय ' को स्वीकार ही करते हैं, उसके व्यवहार की क्योंकि जहाँ जो नहीं है वहाँ दोष केवल शक्ति का व्याघात नहीं है, क्योंकि वायु प्रभृति दोषों प्रवृत्ति ही वस्तुतः ' विपर्यय ' है । इस कथन में भी कुछ सार रोग नाम की दूसरी वस्तु की सर्वज्ञता को ही कर सकता है ' से युक्त धातुओं से उत्पत्ति होती है । शक्ति के नियमन से ही सभी जनों में आपत्ति खण्डित हो जाती है । किसी स्थान में ज्ञान का अर्थव्यभिचारी होना ज्ञान में सभी व्यवहारों के विश्वास को डिगा नहीं सकता, क्योंकि यत्न पूर्वक अन्वेषण करने पर बाध के कारणीभूत दोष की अनुपलब्धि से दोष के अभाव का निश्चय हो जाएगा । फिर दोष के अभाव के साथ अवश्य रहने-वाले विपर्ययाभाव की सिद्धि ( सुलभ ) होगी । इस अभाव- निश्चयं के द्वारा ही ( यथार्थ ) ज्ञान में विश्वास की उपपत्ति होगी । विपर्यय को यदि न मानें तो चन्द्रों के ज्ञान की क्या गति होगी? ( प्र ० ) दोष से युक्त चक्षु की रश्मियों के अवयव अलग २ निकल कर चन्द्रमा के ऊपर जाते हैं, अतः एक ही चन्द्र के दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं । दोनों ज्ञानों में रहनेवाले द्वित्व काही चन्द्रमा में भान होता है । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान में रहनेवाले धर्म का चक्षु से भान होना सम्भव नहीं है । यदि यह मान भी लें कि ( प्र ० ) ज्ञान का धर्मं जब ज्ञेय में गृहीत होता है, तब ज्ञेय का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है उसीसे ज्ञानगत धर्म भी गृहीत होता है । ( उ ० ) तो फिर इससे भी विपर्यय या भ्रान्ति ही समर्थित होती है, क्योंकि ( आप के कथनानुसार भी ) अन्य ( ज्ञान ) का धर्म द्वित्व अन्यत्र ( विषय चन्द्रमा में ) ही गृहीत होता है । अत्यन्त क्रुद्ध श्रोत्रिय ब्राह्मणों को इससे अधिक कहना व्यर्थ समझकर मैं इससे विरत होता हूँ । जो कोई इस रीति से विपर्यय का खण्डन करते हैं कि ( शुक्ति में ) वस्तुतः ५५ For Private And Personal
पृष्ठ 509
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४३४ अध्यवसाय sfu न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् प्रत्यक्षानुमानविषय एव [ गुणे विपर्यय-सञ्जायते । तत्र प्रयक्षविषये तावत् प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थि-त्वाद्वा किमित्यालोचन मात्र मनध्यवसायः । यथा वाहीकस्य पन-प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही अनध्यवसाय भी होता है । इनमें पहले से ज्ञात अथवा अज्ञात किसी अन्य विषय में मग्न, अथवा किसी विशेष प्रकार की प्रतीति की इच्छा या किसी प्रयोजन से अभिभूत पुरुष का ( ' यह क्या है? ' इस आकार का ) केवल आलोचन ज्ञान ही प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषय का अनध्यवसाय है । जैसे कि भार ढोने-वाले पुरुष को कटहल प्रभृति फलों को देखने के बाद यह अनिश्चयात्मक ( अनध्यवसाय ) होता है ( कि, यह क्या है? ) उस ( भारवाही पुरुष ) को न्यायकन्दली वदन्तो विपर्ययाभावं समर्थयन्ति, तेषामस्मिञ्ज्ञाने प्रवृत्तिर्न स्यादलौकि-कस्यार्थक्रिया हेतुत्वानवगमात् । अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषये सञ्जायते । प्रत्यक्षानुमानविषये विपर्ययस्तावद्भवति, अनध्यवसायोऽपि भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षविषये तावदनुमानविषये क्रमेणानध्यवसायो वक्तव्य इत्यभिप्रायेण क्रमवाचिनं ताव-च्छब्दमाह - प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थित्वाद्वा किमित्यालोचन-मात्रमनध्यवसायः । प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च प्रसिद्धार्थाः येऽर्था; पूर्व ज्ञातास्तेषु व्यासङ्गादन्यत्रासक्तचित्तत्वाद् विशेषप्रतीत्यर्थत्वाद् वा किमित्यालोचनमात्रम् । गते विद्यमान रजत का ही भान होता है, किन्तु वह रजत अलोकिक है । उनके मत से इस ज्ञान के बाद प्रवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि अलौकिरू वस्तु से किसी भी कार्य की उत्पत्ति कहीं भी किसी को ज्ञात नहीं है । ' अध्यवसायोऽपि ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ' अपि ' शब्द का यह अभिप्राय है । कि जिस प्रकार विपर्यय प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता है, उसी प्रकार ' अनध्यवसाय ' भी उन दोनों प्रकार के विषयों का ही होता है । प्रकृत वाक्य में क्रम के वाचक ' तावत् ' शब्द का प्रयोग इस अभिप्राय से किया गया है कि प्रत्यक्ष के विषय और अनुमान के विषय क्रमशः दोनों में ही अध्यवसाय भी समझना चाहिए । ' प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' प्रसिद्धार्थेषु ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ' प्रसिद्धार्थ ' शब्द से वह अर्थ लेना चाहिए जो पहिले से ज्ञात हो । ' तेषु व्यासङ्गात् ' अर्थात् उनसे भिन्न विषयों में चित्त के लगे रहने के कारण अथवा किसी के विशेष प्रकार से प्रतीति के ' अथित्व ' अर्थात् प्राप्ति की इच्छा से For Private And Personal
पृष्ठ 510
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४३५ सादिष्वनध्यवसायो भवति । तत्र सत्ताद्रव्यत्वपृथिवीत्ववृक्षत्व-रूपवच्वादिशाखाद्यपेक्षोऽध्यवसायो भवति । नसत्वमपि पनसेष्व-नुवत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं प्रत्यक्षमेव केवलं तूपदेशाभावाद विशेष-संज्ञाप्रतिपत्तिर्न भवति । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलजीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात को नु खन्वयं प्राणी स्यादित्यनध्यवसायो भवति । भी सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, वृक्षत्व, रूपवत्त्व एवं शाखा प्रभृति धर्मों के साथ वह वृक्ष निश्चित ही है । एवं विभिन्न सभी पनसों ( कटहल ) को एक रूप से समझानेवाली एवं पनस को आम्रादि फलों से भिन्न रूप में समझानेवाली पनसत्व जाति का भी निश्चय है ही । केवल उसे यह विशेष रूप से ज्ञात नहीं रहता है कि इसका नाम क्या है? ' नारिकेल द्वीप में रहनेवालेको केवल सास्ना को देखने से जो ' यह कौन सा प्राणी होगा ' इस आकार का अनध्यवसाय होता है, वह आनुमानिक विषय का अनध्यवसाय है । न्यायकन्दली प्रसिद्धे राजनि कोऽप्यनेन पथा गत इति ज्ञानमात्रमनवधारितविशेषमनध्य-वसायः । अप्रसिद्धेष्वपरिज्ञानादेवानध्यवसायो यथा वाहीकस्य पनसा-दिष्वनध्यवसायो भवति, दक्षदेशोद्भवस्य पनसादिष्वनध्यवसाय इत्यर्थः । तत्रापि पनसे सत्वद्रव्यत्वपृथिवीत्ववृक्षत्व रूपत्वादिशाखाद्यपेक्षोऽध्यवसाय एव द्रव्यमेतत् पार्थिवोऽयं वृक्षोऽयं रूपादिमान् शाखादिमांश्चेत्यवधारणात् । पनसत्वमपि पनसेष्वनुवृत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं निर्विकल्पक प्रत्यक्षमेव । केवलं त्वस्य पनसशब्दो नामधेयमित्युपदेशाभावाद् विशेषसंज्ञाप्रतिपत्तिर्न भवति पनसशब्दवाच्योऽयमिति प्रतिपत्तिर्न भवति, किन्तु किमप्यस्य नामधेयं ' किमित्यालोचनमात्रम् ' अर्थात् किसी प्रसिद्ध राजा के जाने पर भी कोई इस रास्ते से गया है ' इस प्रकार का ( अनवधारणात्मक ) ज्ञान - जिससे के असा-किसी धारण धर्म का निर्धारण नहीं होता ' अनध्यवसाय ' है । अभिप्राय यह है कि ' अप्रसिद्धों में ' अर्थात् पहिले से बिलकुल अज्ञात विषयों में ' अपरिज्ञान से ' अर्थात् वस्तुओं के सामान्य विषयक यथार्थ ज्ञान के न रहने से ' अनध्यवसाय ' होता है । जैसे कि पालको ढोनेवाले को एवं दक्षिण देश में रहनेवालों को पनस के ( कटहल ) वृक्ष अनध्यवसाय होता है । यद्यपि वहाँ भी सभी वृक्षों में रहनेवाले शाखादि के ज्ञान से पनस में मत्ता. द्रव्यत्व, पृथिवील वृक्षत्व एवं रूपवत्त्वादि विषयक ( यह सत् है ) यह द्रव्य है, यह पार्थिव है, यह वृक्ष है, यह रूपवाला है, यह शाखा से युक्त है इत्यादि प्रतीतियाँ उन ( दक्ष देश के वासियों ) को भी होती ही हैं, एवं सभी पनसों में रहनेवाले एवं आम प्रभृति में न रहनेवाले पनसत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भो होना ही है For Private And Personal