प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 511–520
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 511–520
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४३६ उपरतेन्द्रियग्रामस्य न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेणैव [ गुणे स्वप्न-यदनुभवनं जिस व्यक्ति के सभी इन्द्रिय मन के प्रलीन होने के कारण न्यायकन्दली भविष्यतीत्येतावन्मात्रप्रतीतिः स्यात् । सेयं सञ्ज्ञाविशेषानवधारणात्मिका प्रतीतिरनध्यवसायः । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलद्वीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात् को नु खल्वत्र प्रदेशे प्राणी स्यादित्यनध्यवसायः । नारिकेलद्वीपे गवामभावात् तत्रत्यो लोकोऽप्रसिद्धगोजातीयः, तस्य देशान्तरमागतस्य वने सास्नामात्रदर्शनात् सामान्येन पिण्डमात्रमनुमाय तत्र जातिविशेषविषयत्वेन को नु खल्वत्र प्राणी स्यादित्यनवधारणात्मकं ज्ञानमनध्यवसायः, अध्यवसायविशेषाव-धारणज्ञानादन्यदिति व्युत्पत्त्या । नन्वयं संशय एव, अनवधारणात्मकत्वात् । न, कारणभेदात्, स्वरूपभेदाच्च । किञ्च उभयविशेषानुस्मरणात् संशयो न त्वनध्यवसायः, प्रतीतिविशेषविषयत्वेनाप्यस्य सम्भवात् । तथानवस्थितोभय-किन्तु ' इसका नाम पनस है ' इस आकार के उपदेश के अभाव से ' पनस ' रूप विशेष का ज्ञान नहीं हो पाता अर्थात् ' यह पनस शब्द का अभिधेय अर्थ है ' इस प्रकार का ज्ञान नहीं हो पाता । केवल ' इसका भी कोई नाम होगा ' इतनी ही प्रतीति होती है । संज्ञा विशेष की यही अवधारणात्मक ' प्रतीति ' अनध्यवसाय ' ( रूप अविद्या ) है । नारिकेल - द्वीपवासियों को इस देश में केवल सास्ना के देखने से गाय के विषय में ' यह कौन प्राणी है? यह ज्ञान अनुमान के द्वारा जानने योग्य विषय का अनध्यवसाय है । अभिप्राय यह है कि नारिकेल द्वीप में गायें नहीं होतीं, अतः उस देश के निवासियों को गायों का ज्ञान नहीं रहता । उस देश का कोई व्यक्ति दूसरे देश के बन में जाकर केवल सास्ना को देखने के बाद केवल पिण्ड का अनुमान करता है । इसके बाद उसे विशेष जाति के उस सास्नावाले व्यक्ति का ' यह कौन सा प्राणी ' इस आकार का ओ जान होता है वह अनुमान विषयविषयक अनध्यवसाय है । ' विशेषावधारणादन्यत् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विशेषधर्म पूर्वक निश्चय रूप अवधारणात्मक न होने के कारण ही उक्त ज्ञान ' अनध्यवसाय ' है । ( प्र ० ) तो फिर यह संशय ही है, क्योंकि निश्चयात्मक नहीं है । ( उ ० ) यह संशय नहीं हो सकता, क्योंकि इसका स्वरूप और इसके कारण दोनों ही संशय से दूसरे प्रकार के 1 और भी बात है, दोनों कोटियों के असाधारण धर्मों के पश्चात् स्मरण से संशय होता है अनध्यवसाय नहीं, क्योंकि अनध्यवसाय में विषय होने-वाले पदार्थों के असाधारण धर्म यदि अज्ञात भी रहें तब भी अनव्यवसाय रूप ज्ञान हो सकता है । संशय और अनध्यवसाय इन दोनों में यही भेद है कि संशय में अनिश्चित दो कोटियों का सम्बन्ध रहता है, अनध्यवसाय में नहीं । चूँकि अनध्यवसाय रूप ज्ञान For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७ मानसं तत् शरीरव्यापारादहनि प्रशस्तपादभाष्यम् स्वप्नज्ञानम् । कथम्? यदा खिन्नानां प्राणिनां बुद्धिपूर्वादात्मनः निशि विश्रामार्थ-केवल मन रूप इन्द्रिय विषयों के ग्रहण से विमुख रहते हैं, उस व्यक्ति को से जो ज्ञान होता है वही स्वप्न ज्ञान ' है । ( प्र ० ) यह किस प्रकार उत्पन्न न्यायकन्दली कोटिसंस्पर्शी संशयो न त्वयमिति भेद: । विद्या त्वयं न भवति, व्यवहारा-नङ्गत्वादिति । स्वप्ननिरूपणार्थमाह- उपरतेन्द्रियग्रामस्येत्यादि । उपरतः स्वविषय-ग्रहणाद् विरत इन्द्रियग्रामो यस्य असावुपरतेन्द्रियग्रामः । प्रकषेण सर्वात्मना लीनं मनो यस्यासौ प्रलीनमनस्क इति । तस्योपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्ये-न्द्रियद्वारेण यदनुभवनं पूर्वाधिगमानपेक्षं परिच्छेदस्वभावं मानसं मनोमात्रप्रभवं तत् स्वप्नज्ञानम् । यदा यथा पुरुषस्य मनः प्रलीयते इन्द्रियाणि च विरमन्ति तद्दर्शयति - कथमित्यादिना । आत्मनः शरीरव्यापाराद् गमनागमनादहनि खिन्नस्य परिश्रान्तस्य प्राणिनो निशि रात्रौ विश्रामार्थं श्रमोपशमार्थं भुक्त-पीतस्याहारस्य रसादिभावेन परिणामार्थं चादृष्टेन कारितं प्रयत्नमपेक्षमाणा-दात्मान्तःकरणसंयोगान्मनसि यः क्रियाप्रबन्धः क्रियासन्तानो जातस्तस्मादन्त-हृदये निरिन्द्रिये बाह्येन्द्रियसम्बन्धशून्ये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति यदा, तदा पुरुषः प्रलीनमनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन् मनस्युपरतेन्द्रि-स व्यवहार नहीं चल पाता अतः यह ज्ञान ' अविद्या ' रूप ही है, यह विद्या के अन्तर्गत नहीं आ सकता । ' उपरतेन्द्रियग्रामस्य ' इत्यादि वाक्य स्वप्न के निरूपण के लिए लिखे गये हैं । ' उपरतः इन्द्रियग्रामो यस्य असौ उपरतेन्द्रियग्रामः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष की इन्द्रियाँ अपने २ विषयों के ग्रहण से उपरत ' अर्थात् अपने विषयों को ग्रहण करना छोड़ दी हैं वही पुरुष उपरतेन्द्रियग्राम ' शब्द का अर्थ है ' प्रकर्षेण लीनं मनो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' प्रकर्षेण ' अर्थात् पूर्ण रूप से ( किसी विषय में ) लीन है मन जिसका वही पुरुष ' प्रलीनमनस्क ' शब्द का अर्थ है । ( इस प्रकार के ) उपरवेन्द्रिय ग्राम और प्रलीन मनस्क पुरुष को इन्द्रिय के द्वारा जो विचार रूप एवं मानस अर्थात् मनोमात्रजन्य पहिले के ज्ञानों से सर्वथा अनपेक्ष अनुभव होता है वही ' स्वप्न ' है । ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह दिखलाया गया है कि किस समय और किस प्रकार से मन प्रलीन होता है एवं इन्द्रियाँ विषयों के ग्रहण से उपरत होती हैं । शरीर के व्यापार अर्थात् गमन और आगमन के द्वारा खिन्न ' ' अर्थात् थके हुए प्राणियों को निशा अर्थात् रात में ' विश्राम ' अर्थात् थकावट को मिटाने के लिए एवं खाये और पिये हुए द्रव्य को रसादि रूप में परिणत करने के लिए आत्मा और अन्तःकरण के संयोग से मन For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra II www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न-माहारपरिणामार्थं वादृष्टकारित प्रयत्नापेक्षादात्मान्तःकरणसम्बन्धा-न्मनसि क्रियाप्रबन्धादन्तर्हृदये निरिन्द्रिये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति, तदा प्रलीनमनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन्नुपरतेन्द्रियग्रामो भवति, तस्यामवस्थायां प्रबन्धेन प्राणापान-सन्तानप्रवृत्तावात्ममन: संयोगविशेषात् राच्चेन्द्रियद्वारेणैवासत्सु स्वापाख्यात् संस्का-विषयेषु प्रत्यक्षाकारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते । होता है? ( उ ० ) शरीर के अति सञ्चालन से श्रान्त प्राणियों को विश्राम देने के लिए एवं भोजन के परिपाक के लिए हृदय के बीच वाह्य इन्द्रियों से रहित आत्मा के प्रदेश में जिस समय जिस पुरुष का मन ( इष्ट प्राप्ति या अनिष्ट की निवृत्ति के लिए ) आत्मा के द्वारा जानबूझ कर निष्क्रिय होकर बैठ जाता है, उस समय उस व्यक्ति को ' प्रलीनमनस्क ' कहते हैं । ( बाह्येन्द्रिय प्रदेश में मन की यह निष्क्रिय स्थिति ) मन की उन क्रियाओं से होती है जो अदृष्ट युक्त आत्मा और अन्तःकरण ( मन ) के सम्बन्ध से उत्पन्न होती है । इस प्रकार मन के निष्किय होकर बंठ जाने के कारण बाह्य इन्द्रियां अपने कामों को करने में ( उस समय ' असमर्थ हो जाती हैं । ऐसी अवस्था में प्राणवायु और अपान वायु की प्रवृत्तियां अधिक हो जाती हैं । ऐसी स्थिति में ' स्वाप ' नाम के आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग, एवं संस्कार इन दोनों से ( मन रूप ) इन्द्रिय के द्वारा ही अविद्यमान विषयक प्रत्यक्षाकारक ( प्रत्यक्ष नहीं ) जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' स्वप्नज्ञान ' कहते हैं । न्यायकन्दली ग्रामो भवति, अन्तःकरणानधिष्ठितानामिन्द्रियाणां विषयग्रहणाभावात् । तस्यां प्रलीनमनोऽवस्थायां प्रबन्धेन बाहुल्येन प्राणापानवायुसन्तान निर्गमप्रवेशलक्षणायां प्रवृत्तौ सम्भवन्त्यामात्ममनः संयोगात् स्वापाख्यात् स्वाप इति नामधेयात् में ' क्रिया सन्तान ' अर्थात् क्रियाओं के समूह की उत्पत्ति होती है । उस संयोग को इस काम के लिए अदृष्ट से प्रेरित प्रयत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । पुरुष के हृदय के बीच ' निरिन्द्रिय ' अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के सम्बन्ध से रहित आत्मा के एक प्रदेश में जिस समय मन निश्चल रहता है, उसी समय वह पुरुष ' प्रलीनमनस्क ' कहलाता है । उसके अर्थात् मन के प्रलीन होने पर पुरुष ' उपरतेन्द्रियग्राम ' होता है, ( अर्थात् उसके इन्द्रिय विषयों को ग्रहण करने से विमुख हो जाती हैं ) क्योंकि अन्तःकरण ( मन ) प्राण और अपान वायुओं के समुदाय के गमनागमन रूप प्रलीन वृत्ति के उत्पन्न होने पर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् III तत्तु त्रिविधम् - संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाच्च । तत्र संस्कार-पाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थमादृतश्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः प्रत्यक्षाकारा सज्जायते । धातुदोषाद् वातप्रकृतिस्तद्-वह तीन प्रकार का है, ( १ ) संस्कार की पटुता से उत्पन्न ( २ ) धातु के दोष से उत्पन्न एवं ( ३ ) अदृष्ट से उत्पन्न । इनमें संस्कार की पटुता से उत्पन्न स्वप्न का उदाहरण यह है कि जिस समय कामी अथवा क्रुद्ध पुरुष जिस वस्तु की बराबर चिन्ता करते हुए सोता है, उस समय वही चिन्तासमूह प्रत्यक्ष का रूप ले लेती है । न्यायकन्दली संस्काराच्च पूर्वानुभूतविषयादसत्सु देशकालव्यवहितेषु विषयेषु प्रत्यक्षाकार-मपरोक्ष संवेदनाकारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते । तत्तु त्रिविधम् । कुत इत्याह - संस्कारपाटवादिति । संस्कारपाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थं प्रियतमां शत्रुं वादृतोऽनुमन्यमान श्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः स्मृतिसन्ततिः संस्कारातिशयात् प्रत्यक्षाकारा साक्षादर्थावभासिनी सञ्जायते । शरीरधारणाद् धातवो बसासृङ्गांसमेदो-मज्जास्थिशुक्रात्मानः, तेषां दोषाद् वातादिदूषितत्वाद् विपर्ययो भवतीत्याह-वात प्रकृतिर्यदि वा कुतश्चिन्निमित्तादुपचितेन वातेन दूषितः स्वात्मन आकाश-गमनमितस्ततो धावनमित्यादिकं पश्यति । पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वा अग्नि-प्रवेशकनकपर्वताभ्युदितार्कमण्डलादिकं पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्म-दूषितो वा सरित्समुद्रप्रतरण हिमपर्वतादीत् पश्यति । स्वयमनुभूतेषु परत्रा-प्रायः विभिन्न काल के और विभिन्न देश के विषयों में भी ' प्रत्यक्षाकार ' अर्थात् अपरोक्ष आकार के ' स्वप्न ' ज्ञान की उत्पत्ति होती है । ( इस स्वप्न ज्ञान के ) ' स्वाप ' अर्थात् निद्रा नाम का आत्मा और मन का संयोग और पहिले के अनुभव के द्वारा ज्ञात विषयक संस्कार भी कारण हैं । ( प्र ० ) यह तीन प्रकार का क्यों है? इस प्रश्न का उत्तर संस्कारपाटवात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । कामी अथवा क्रुद्ध व्यक्ति संस्कार की पटुता से जिस समय ' जिस अर्थ को अर्थात् प्रियतमा अथवा शत्रु को आदर से ' अर्थात् अनन्यचित्त होकर चिन्तन करते हुए सोता है, उस समय उसी ' चिन्तन ' का अर्थात् स्मृति का समुदाय संस्कार की विलक्षणता से प्रत्यक्षाकार अर्थात् अर्थों को साक्षात् प्रकाशित करने वाला हो जाता है । शरीर को ' धारण ' करने के हेतु से वसा, मांस, शोणित, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र इन सातों का समुदाय ' धातु ' कहलाता है । इनके दूषित हो जाने पर वायु प्रभृति दूषित हो जाते हैं । दूषित वायु प्रभृति के द्वारा ' विपर्यय रूप ' स्वप्नज्ञान की For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III दूषितो न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् वा आकाशगमनादीन् पश्यति । [ गुणे त्वप्न-पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वाग्निप्रवेशकनकपर्वतादीन् पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्म-दूषितो वा सरित्समुद्रप्रतरणहिमपर्वतादीन् पश्यति । यत् स्वयमनु-भूतेष्वननुभूतेषु वा प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा यच्छुभावेदकं गजारोह-गच्छत्र लाभादि, तत् सर्व संस्कारधर्माभ्यां भवति । विपरीतं च तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणादि तत् सर्वमधर्म संस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धाऽर्थेष्वदृष्टादेवेति । स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य धातु दोष से उत्पन्न स्वप्नज्ञान के उदाहरण ये हैं - वायुप्रकृति के पुरुष अथवा प्रकुपित वायु के पुरुष को आकाश गमनादि के प्रत्यक्ष सदृश ज्ञान होते हैं । पित्तप्रकृति के अथवा कुपित पित्त के पुरुष को अग्निप्रवेश, स्वर्णमय पर्वतादि का प्रत्यक्ष सा होता है । कफ प्रकृतिक अथवा दूषित कफवाले पुरुष को नदी समुद्रादि में तैरने का एवं वर्फ से भरे पर्वत का प्रत्यक्ष सा होता है । ( अदृष्टजनित स्वप्न के ये उदाहरण हैं ) स्वयं ज्ञात एवं दूसरों के लिए अज्ञात, एवं स्वयं अज्ञात दूसरों से ज्ञात और विषयों के जितने स्वप्नज्ञान शुभ के सूचक हैं, वे सभी संस्कार और धर्म ( रूप अदृष्ट ) से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि गजारोहण, छत्रलाभादि के स्वप्न ज्ञान । एवं उन्हीं विषयों के जितने स्वप्नज्ञान अशुभ के सूचक हैं, वे सभी अधर्म ( रूप अदृष्ट ) और संस्कार से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि तेल का मालिश, खरारोहण, उष्ट्रा-रोहण आदि के स्वप्न ज्ञान । स्वयं भी अज्ञात एवं दूसरे से भी अज्ञात ( सर्वथा अप्रसिद्ध ) विषयों के दर्शन रूप स्वप्नज्ञान केवल अदृष्ट से ही होते हैं । यद्यपि ( उक्त प्रकार से ) जिनकी इन्द्रियाँ अपने कार्य से विमुख हो गयी हैं उन्हें ' स्वप्नान्तिक ' नाम का एक पाँचवाँ ( स्वप्न से भिन्न ) भी एक न्यायकन्दली प्रसिद्धषु स्वयमननुभूतेषु वा परत्र प्रसिद्धेषु सत्सु यद् गजारोहणच्छत्रलाभादिकं शुभावेदकं स्वप्ने दृश्यते, तत् सर्वं संस्कारधर्माभ्यां भवति । शुभावेदक विपरीतं उत्पत्ति होती है । यही विषय ' वातप्रकृतिः ' इत्यादि वाक्य के द्वारा कहा गया है । ' वातप्रकृति ' अर्थात् किसी कारण से जिस पुरुष की वायु दूषित हो चुकी है, वह पुरुष अपना ' आकाशगमन ' अर्थात् आकाश में इधर उधर दौड़ना प्रभृति ( स्वप्न ) देखता है । एवं जिस पुरुष में पित्त प्रधान है अथवा जिसका पित्त दूषित हो चला है वह अग्नि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] त्येषा चतुर्विधाऽविद्येति । ५६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ४४१ प्रशस्तपादभाष्यम् स्मृतिरेवेति भव-न्यायकन्दली For Private And Personal भवति, तथाप्यतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणात् विद्यापि चतुर्विधा - प्रत्यक्ष लैङ्गिकस्मृत्यार्पलक्षणा । ज्ञान होता है, किन्तु वह अतीत के किसी ज्ञान के सदृश ही दूसरा ज्ञान है, अत: स्मृति ही है, तस्मात् कथित रीति से ' अविद्या ' रूप ज्ञान के कथित चार ही प्रकार हैं । ६७. ( अविद्या की तरह ) विद्या भी चार प्रकार की है, उसके ( १ ) प्रत्यक्ष ( २ ) लैङ्गिक ( ३ ) स्मृति और ( ४ ) आर्ष ( ये चार ) भेद हैं । तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रा रोहणाद्यधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धेषु स्वतः परतश्चाप्रतीतेषु चन्द्रादित्यभक्षणादिषु ज्ञानं तददृष्टादेव, अननुभूतेषु संस्का-राभावात् । यद्यपि संस्कार पाटवाद्धातुदोषाददृष्टाद् वा समारोपितबाह्यस्वरूपः स्वप्नप्रत्ययो भवन्नर्तास्मस्तदिति भावाद् विपर्ययः, तथाप्यवस्थाविशेषभावित्वात् पृथगुक्तः । कदाचित् स्वप्नदृष्टस्यार्थस्य स्वप्नावस्थायामेव प्रतिसन्धानं भवति - अयं मया दृष्ट इति, तच्च पूर्वानुभूतस्य स्वप्नस्यान्तेऽवसाने भवतीति प्रवेश, सोने का पर्वत, उदित सूर्यमण्डल प्रभृति वस्तुओं को स्वप्न में देखता है । जिस पुरुष में कफ की प्रधानता रहती है या जिसका कफ दूषित रहता है वह नदी और समुद्रों में तैरने का एवं बरफ के पर्वतादि का स्वप्न देखता है । स्वयं अनुभूत किन्तु और स्थानों में अप्रसिद्ध, अथवा अपने से अननुभूत किन्तु और स्थानों में प्रसिद्ध वर्त्तमान वस्तुओं के जो स्वप्न शुभ के ज्ञापक होते हैं, जैसे कि हाथी पर चढ़ना, छत्र का लाभ प्रभृति -- ये सभी स्वप्न, पुण्य और संस्कार से होते हैं । शुभ के ज्ञापकों से विरुद्ध जितने भी स्वप्न हैं, जैसे कि तेल का मालिश, गदहे पर चढ़ना, ऊँट पर चढ़ना - ये सभी स्वप्न अधर्म और संस्कार इन दोनों से होते हैं । ' अत्यन्त अप्रसिद्ध ' अर्थात् अपने से या दूसरों से सर्वथा ' अज्ञात ' चन्द्र सूर्यादि के भोजन का स्वप्नात्मक ज्ञान केवल अदृट से ही होता है, क्योंकि बिना अनुभव किये हुए किसी वस्तु का संस्कार नहीं होता । यद्यपि संस्कार की पटुता, धातु के दोष, अथवा अदृष्ट से उत्पन्न स्वप्नज्ञान में चूंकि बाह्य विषयों का ही समारोप होता है अतः तदभाव युक्त आश्रय में तत्प्रकारक होने के कारण बह विषय ही है, तथापि ( और विपर्ययों से ) विशेष अवस्था के कारण ( विपर्यय से ) अलग कहा गया है | कभी कभी स्वप्न में देखी हुई वस्तु का स्वप्न में ही इस प्रकार से अनुसन्धान होता है कि ' इसको मैंने देखा । यह ( अनुव्यवसाय पहिले अनुभूत स्वप्न के अन्त में होने के कारण ' स्वप्नान्तिक ' कहलाता है । किसी का यह भी आक्षेप है
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ver न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत [ गुणे प्रत्यक्ष-इति प्रत्यक्षम् | अक्षाणीन्द्रि याणि, घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्छ्रोत्रमनांसि पद् । तद्धि द्रव्यादिषु इनमें ' अक्षम् अक्षम् प्रतीत्योत्पद्यते यज्ज्ञानम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है । ( इस ) ' अक्ष ' शब्द के अर्थ हैं ' इन्द्रिय ' ( १ ) घ्राण ( २ ) रसना ( ३ ) चक्षु ( ४ ) त्वचा ( ५ ) श्रोत्र एवं ( ६ ) मन ये छ: इन्द्रियाँ हैं । न्यायकन्दली स्वप्नान्तिकमुच्यते । तदप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भावात् स्वप्नज्ञानमिति कस्यचिदा-शङ्कामपनेतुमाह – स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भवति, तथाप्यतीतस्य पूर्वानुभूतस्य स्वप्नज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणादनुसन्धानात् स्मृतिरेवेति । उपसंहरति-- भवत्येषा चतुर्विधाऽविद्येति । सम्प्रति विद्यां विभजते-- विद्यापीति । न केवलमविद्या चतुविधा, विद्या-पि चतुविधेति । प्रत्यक्षेति । आदौ प्रत्यक्षस्य निर्देश: कारणत्वात्, तदनन्तरमनु-मानस्य तत्पूर्वकत्वात्, तदनन्तरं स्मृतेः प्रत्यक्षानुमितेष्वर्थेषु भावात्, steentured संकीर्तनमार्षस्य लोकोत्तराणां पुरुषाणां तद्भावात् । प्रत्यक्षस्य लक्षणं तावत्कथयति - तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्ष-कि यह ज्ञान भी कथित ' उपरतेन्द्रियग्राम ' पुरुष को ही होता है, अतः यह भी ' स्वप्न ' ही है ( स्वप्नान्तिक नहीं ) इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' स्वप्नान्तिकम् ' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । कहने का तात्पर्य है कि यह स्वप्नान्तिकज्ञान यद्यपि ' उपर-सेन्द्रियग्राम ' पुरुष को ही होता है फिर भी यह ' अतीत ' अर्थात् पूर्वानुभूत स्वप्नज्ञानों के ' प्रत्यवेक्षण ' अर्थात् अनुसन्धान से उत्पन्न होने के कारण स्मृति ही है । ' भवत्येषा ' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ' विद्यापि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब ' विद्या ' ( यथार्थज्ञान- प्रमा ) का विभाग करते हैं । ( इस ' अपि ' शब्द का यह अभिप्राय है कि ) केवल अविद्या ही चार प्रकार की नहीं है, किन्तु विद्या भी चार प्रकार की है । प्रत्यक्ष का निरूपण सबसे पहिले इस हेतु से किया गया है कि वह ( अन्य सभी ज्ञानों का ) कारण हैं । प्रत्यक्ष के बाद अनुमान का निरूपण इसलिए किया गया है कि वह सीधे प्रत्यक्ष से उत्पन्न होता है । प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों को ही स्मृति होती है, अतः इन दोनों के निरूपण के बाद स्मृति का निरूपण हुआ है । आषंज्ञान लोकोत्तर पुरुषों को ही होता है, अतः उसका निरुपण लौकिक प्रमाणों के निरूपण के बाद अन्त में किया गया है । ' तत्राक्षमक्षम् ' इत्यादि ग्रन्थ से क्रम के द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं । ' अक्षमक्ष प्रतीत्योत्पद्यते तत्प्रत्यक्षं प्रमाणम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्ति ( सम्बन्ध ) से जितने भी ज्ञान उत्पन्न हों वे सभी ' प्रत्यक्ष प्रमाण ' हैं । इस प्रकार विशेष For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् III प्रशस्तपादभाष्यम् पदार्थेषुत्पद्यते । द्रव्ये तावद् द्विविधे महत्यनेकद्रव्यवश्वोभूत-रूपप्रकाशचतुष्टयसन्निकर्षाद् धर्मादिसामग्रये च स्वरूपालोचनमात्रम्, यह ( प्रत्यक्ष ) द्रव्यादि पदार्थों का होता है । इनमें द्रव्य का प्रत्यक्ष दो प्रकार का है ( १ ) निर्विकल्पक और ( २ ) सविकल्पक ( द्रव्य के निर्विकल्पक और सविकल्पक ) दोनों ही प्रकार के प्रत्यक्ष होते हैं । ( १ ) अनेक द्रव्यवत्त्व न्यायकन्दली मिति । अक्षमक्षं प्रतीत्य प्राप्य यदुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । कारण-विशेषजत्वमपि कार्यस्य समानासमानजातीयव्यवच्छेदसमर्थत्वाल्लक्षणं भव-ति । यथा यवबीजप्रभवत्वं यवाङ्कुरस्य, अत एव यवाङ्कुर इति व्यपदिश्यते । सुखदुःखसंस्काराणामपीन्द्रियजत्वात् प्रत्यक्षप्रमाणत्वप्रसङ्गः इति चेन्न, बुद्धय-धिकारेण विशेषितत्वात् । अक्षमक्षं प्रतीत्य या बुद्धिरुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षम् । सुखादयश्च न बुद्धिस्वभावाः कुतस्तेषु प्रसक्तिः? यद्येवं सन्निकर्षस्य प्रामाण्यं न लभ्यते? सत्यम् । इतो वाक्यान्न लभ्यते, यदि तु करणव्युत्पत्त्या तस्यापि कारणों से उत्पन्न होना भी लक्ष्य को समानजातियों और असमानजातियों से भिन्न रूप से समझाने में समर्थ होने के कारण लक्षण हो सकता है । ( जैसे कि ) यव के अङ्कुर से उत्पन्न होना हो व का लक्षण है, अत एव वह ' यवाङ्कुर ' कहलाता है । ( प्र ० ) सुख, दुःख और संस्कार ये सभी भी तो इन्द्रिय से उत्पन्न होते हैं, अतः इन सबों में प्रत्यक्षलक्षण की आपत्ति होगी । ( उ ० ) यह आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि प्रत्यक्ष का लक्षण बुद्धि निरूपण को आरम्भ करने के बाद कहा गया है ( तदनुसार ) प्रत्यक्ष का यह लक्षण निष्पन्न होता है कि इन्द्रिय के सम्बन्ध से उत्पन्न ओ ज्ञान वही प्रत्यक्ष प्रमाण है | ( प्र ० ) यदि यह बात है तो फिर यह उपपन्न नहीं होगा कि ' इन्द्रिय का सम्बन्ध प्रमाण है ' | ( उ ) यह ठीक है कि उक्त लक्षण वाक्य के द्वारा इन्द्रियसम्बन्ध में प्रामाण्य का लाभ नहीं होगा, किन्तु ' परिच्छेद ' अर्थात् प्रमिति के कारण होने से इन्द्रियसम्बन्ध का प्रमाण होना भी अभीष्ट है । प्रकरण से यह समझा जाता है कि ' यह विद्या का निरूपण है ' । अतः विद्या से बहिर्भूत संशय और विपर्यय में प्रामाण्य स्वतः खण्डित हो जाता है । ' अक्षम्प्रतीत्य यदुत्पद्यते ज्ञानम् ' केवल ऐसी ही व्युत्पत्ति मानें ( अर्थात् अक्षम् अक्षम् यह वीप्सा न मानें ) तो फिर अतिप्रसिद्ध होने के कारण कभी किसी को यह भ्रान्ति भी हो सकती है कि ' बाह्येन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है ' इस भ्रान्ति की सम्भावना को हटाने के लिए ही ' अक्षम् अक्षम् ' वीप्सा से युक्त इस व्युत्पत्ति का आश्रय लिया गया है । ' प्रत्यक्ष ' शब्द ' कुगतिप्रादय: ' इस सूत्र के द्वारा विहित ' प्रादिसमास ' के द्वारा सिद्ध है । ' प्रतिगतमक्षम् ' इस समास के कारण विशेष्य वाचक पद के अनुसार ' प्रत्यक्ष ' पद में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-प्रामाण्यमभिमतम्, परिच्छेदहेतुत्वात् । संशयविपर्ययव्युदासो विद्यानिरूपणस्य प्रकृतत्वात् । अक्षं प्रतीत्य यदुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षमित्युक्तेऽतिप्रसिद्धत्वाद् बाह्येन्द्रियजमेव प्रत्यक्षमिति कस्यचिद् भ्रान्तिः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थमक्षमक्षमिति वीप्सा समस्ते-न्द्रियावरोधार्थाकृता । कुगतिप्रादय इति प्रादिसमासः । प्रतिगतमक्षं प्रत्यक्षमित्यनेनास्याभिधेयलिङ्गता, प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्षः प्रत्यय इति । अक्षशब्दस्य बहुष्वर्थेषु निरूढत्वाद् विशिनष्टि - अक्षाणीन्द्रियाणि । तानि च सांख्यैरेकादशविधान्युक्तानि तन्निवृत्त्यर्थं परिसंख्यां करोति-घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्छोत्रमनांसीति अक्षजं विज्ञानं प्रत्यक्षमित्युक्त स्मृतिरपि प्रत्यक्षा स्यात्, अतस्तामसद्विषयां दर्शयितुं प्रत्यक्षविषयं निर्दिशति - तद्धीति । हिशब्दोऽवधारणे । तत् प्रत्यक्षं द्रव्यादिष्वेव द्रव्यगुणकर्मसामान्येष्वेवोत्पद्यते, न विशेषसमवाययोरित्यर्थः । द्रव्यस्य प्राधान्यात् प्रथमं तत्प्रत्यक्षोत्पत्तिमाह-द्रव्ये तावदिति । तावच्छब्दः क्रमार्थः । महति द्रव्ये पृथिव्यप्तेजो लक्षणे प्रत्यक्षं भवति, कुतः कारणादित्यत्राह - अनेकद्रव्यवत्त्वादिति । अनेकद्रव्यवत्त्वं भूयोऽवयवाश्रितत्वम् । रूपस्य प्रकाश उद्भवसमाख्यातो रूपस्य धर्मः, यदभावाद् after तेजसि प्रत्यक्षाभावः । चतुष्टयसन्निकर्षादात्मनो मनसा संयोगो मनस इन्द्रियेण इन्द्रियस्यार्थेन तस्मात् कारणकलापाद्धर्मादिसामग्रये च सति धर्माधर्म-दिक्कालादीनां समग्राणां भावे सति प्रत्यक्षं स्यात् । परमाणौ द्वयणुके च प्रत्यक्षाभावान्महतीत्युक्तम् । अवयवभूयस्त्वप्रकर्षाप्रकर्षाभ्यामवयविनि लिङ्ग परिवर्तित होता रहता है, जैसे कि ' प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षा बुद्धि:, प्रत्यक्षः प्रत्ययः ' इत्यादि । ' अक्ष ' शब्द अनेक अर्थों में अनादि काल से प्रसिद्ध ( निरूढ़ ) है, अतः लिखते हैं कि ' अक्षाणि इन्द्रियाणि ' । सांख्यदर्शन के आचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियों कही हैं, उसी पक्ष को खण्डन करने के लिए ' घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्छ्रोत्रमनांसि ' इत्यादि वाक्य के द्वारा इन्द्रियों की संख्या का निर्द्धारण करते हैं । ' इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष है ' ( प्रत्यक्ष लक्षण के लिए ) केवल इतना कहने से स्मृति भी प्रत्यक्ष कहलाएगी अतः स्मृति के विषयों को विद्यमान रहना आवश्यक नहीं है ' यह समझाने के लिए ' तद्धि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्ष के विषयों का निर्देश करते हैं । ( ' तद्धि ' इस शब्द में प्रयुक्त ) ' हि ' शब्द ' इस अवधारण ' का बोधक है, कि यह ( उक्त लक्षण से लक्षित ) प्रत्यक्ष द्रव्यादि विषयों का हो होता है | अभिप्राय यह है कि यह प्रत्यक्ष ज्ञान द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य इन चार पदार्थों का ही होता है, विशेष एवं समवाय इन दोनों विषयों का नहीं । इन सबों में द्रव्य ही प्रधान है, अतः ' द्रव्ये तावत् ' इत्यादि वाक्य के द्वारा द्रव्य के प्रत्यक्ष की उत्पत्ति ही सबसे पहिले कही गया है । इस वाक्य का ' तावत् ' शब्द ' क्रम ' का बोधक है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III स्फुटत्वास्फुटत्वातिशयानतिशयदर्शनादनेकद्रव्यवत्त्वं कारणम् । सत्यपि महत्त्वे-S नेकद्रव्यवत्त्वे च वायोरनुपलम्भाद् रूपप्रकाशो हेतुः । सर्वस्यैव ज्ञानस्य सुखदुः-खादिहेतुत्वाद् देशकालादिनियमेनोत्पादाच्च धर्माधर्मदिक्कालजन्यत्वम् । अन्तरे-णात्ममनः संयोगं मनइन्द्रियसंयोग मिन्द्रियार्थसंयोगं च प्रत्यक्षाभावाच्चतु-ष्टयसन्निकर्षः कारणम् । इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य हेतुत्वे सामान्योपलम्भवद् विशेषोपलम्भस्यावश्यं-भावितया संशयविपर्ययानुत्पत्तिरिति चेन्न, अनियमात् । सामान्यं हि बहुविषयत्वात् स्वाश्रयस्य चक्षुः सन्निकर्षमात्रेणो-पलभ्यते, विशेषस्तु स्वल्पविषयत्वात् स्वाश्रयस्य च तदवयवानां च भूयसां महत् परिमाण से युक्त पृथिवी, जल और तेज का ही प्रत्यक्ष क्यों होता है? इसी प्रश्न का समाधान ‘ द्रव्ये तावत् ' इत्यादि ग्रन्थ से कहते हैं । ( १ ) ' अनेकद्रव्यवत्त्व ' शब्द का अर्थ है अनेक द्रव्यों में आश्रित होना । ( २ ) ' रूप का प्रकाश ' रूप में रहनेवाला ' उद्भू-तत्व ' नाम का एक विशेष प्रकार का धर्म है, जिसके न रहने से ही जल में रहते हुए भी तेज का प्रत्यक्ष नहीं होता । ( ३ ) ' चतुष्टयसंनिकर्ष ' से अर्थात् आत्मा का मन के साथ संयोग, मन का इन्द्रिय के साथ और इन्द्रिय का अर्थ के साथ संयोग इन तीन संयोग रूप कारणों के द्वारा ' धर्मादि सामग्रियों के रहने पर ' अर्थात् धर्म, अधर्म और दिशा, काल प्रभृति ( सामान्य ) कारणों के रहने पर प्रत्यक्ष होता है । ' महति ' शब्द इसलिए रखा गया है कि परमाणु और द्वयणुक इन दोनों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्रत्यक्ष के प्रति ' अनेकद्रव्यवत्त्व ' को इसलिए कारण मानते हैं कि अवयवों के न्यूनाधिकभाव से अवयवियों में स्फुटत्व रूप विशेष और अस्फुटत्व रूप अविशेष दोनों ही देखे जाते हैं । अनेकद्रव्यवत्त्व और महत्त्व के रहते हुए भी वायु का प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः कथित ' रूपप्रकाश ' को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । सभी ज्ञान सुख या दुःख के कारण हैं, एवं सभी ज्ञान किसी नियमित देश और नियमित काल में ही उत्पन्न होते हैं, अतः धर्म, अधर्म, दिशा और काल इन सबों को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । आत्मा और मन के संयोग के न रहने पर मन और इन्द्रिय के संयोग एवं इन्द्रिय और अर्थ के संयोग के रहने पर भी प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः इन चारों का संनिकर्ष भी प्रत्यक्ष का कारण है । ( प्र ० ) प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय और अर्थ के संनिकर्ष को यदि कारण मानें तो फिर ( अर्थगत ) सामान्य की तरह ( अर्थ के असाधारण धर्म या व्यक्तिगत धर्म ) रूप विशेषों का भी सभी प्रत्यक्षों में भान मानना पड़ेगा, जिससे संशय और विपर्यय दोनों ही अनुपपन्न होंगे । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि सामान्य की तरह प्रत्यक्ष में विशेष का भी अवश्य ही भान हो, ( सामान्य के अवश्य भासित होने में यह युक्ति है कि ) सामान्य बहुत से विषयों के साथ सम्बद्ध रहता है, उनमें से कहीं संनिकर्ष होते ही उसकी भी उपलब्धि हो जाती है । विशेष ( असाधारण ) धर्म अल्प For Private And Personal