प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 521–530
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 521–530
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्याय कन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-चक्षुरवयविना भूयोभिश्च तदवयवैः सह सन्निकर्षमपेक्षत इति न सहोपल-म्भनियमः, सामग्रीभेदात् । अत एव दूरादव्यक्तग्रहणम्, गच्छतश्चक्षूरइमे-रन्तराले प्रकीर्णानामवयवानामर्थ प्राप्त्यभावात् । केचित् सविकल्पकमेवैकं प्रत्यक्षमाचक्षते, व्यवसायात्मकत्वेन सर्वस्य व्यवहारयोग्यत्वात्, शब्दव्युत्पत्तिरहितानामपि तिरश्चामर्थविकल्पात् प्रवृत्तेः, तान् प्रत्याह-स्वरूपालोचनमात्रमिति । स्वरूपस्यालोचनमात्रं ग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रत्यक्षमात्रमिति यावत् । यदि हि वस्तुस्वरूपस्य निर्विकल्प-केन ग्रहणं नेष्यते, तदा तद्वाचकशब्दस्य स्मृत्यभावात् सविकल्पकमपि न स्यात् । अतः सविकल्पकमिच्छता निर्विकल्पकमप्येषितव्यम्, तच्च न सामान्यमात्रं गृह्णाति भेदस्यापि प्रतिभासनात् । नापि स्वलक्षणमात्रम्, सामान्याकारस्य संवेदनात्, व्यक्तयन्तरदर्शने प्रतिसन्धानाच्च । किन्तु सामान्यं विशेषं चोभयमपि गृह्णाति यदि परमिदं सामान्यमयं विशेष इत्येवं विविच्य न प्रत्येति, वस्त्व-न्तरानुसन्धानविरहात् । पिण्डान्तरानुवृत्तिग्रहणाद्धि सामान्यं विविच्यते स्थान में रहता है, अतः उसके प्रत्यक्ष के लिए उसके आश्रय एवं आश्रय के अवयवों के साथ चक्षुरिन्द्रियरूप अवयवी और उसके अवयवों का भी संनिकर्ष आवश्यक है । इस प्रकार सामान्य और विशेष दोनों के ' सहोपलम्भनियम ' अर्थात् दोनों साथ ही उपलब्ध हों यह नियम नहीं है । क्योंकि दोनों के प्रत्यक्ष के कारण भिन्न हैं । यही कारण है कि दूर से वस्तुओं का अस्फुट ग्रहण होता है । चूंकि जाती हुई चक्षु की रश्मियों के बीच में बिखरे हुए कुछ अवयवों के साथ अर्थ का सम्बन्ध नहीं हो पाता । कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष केवल सविकल्पक ही होता है, क्योंकि वही निश्चयात्मक होने के कारण सभी तरह के व्यवहार की योग्यता रखता है । जिसके द्वारा शब्दों की व्युत्पत्ति से सर्वथा रहित सर्पादि तिर्यक् योनियों के प्राणियों की भी विशेष अर्थ के ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ उपपन्न होती हैं । उन्हीं को लक्ष्य कर ' स्वरूपालोचनमात्रम् ' यह पद लिखा गया है । ' स्वरूपालोचन ' शब्द का ग्रहणमात्र अर्थात् विकल्प रहित केवल प्रत्यक्ष अर्थ है । निर्विकल्पक ज्ञान से यदि वस्तु के स्वरूप का ज्ञान न मानें तो फिर उस वस्तुस्वरूप के वाचक शब्द की स्मृति न हो सकेगी । उस स्मृति के न होने से सविकल्पक ज्ञान भी न हो सकेगा । अतः सविकल्पक ज्ञान को माननेवालों को निर्विकल्पक ज्ञान भी मानना ही पड़ेगा । निर्विकल्पक ज्ञान केवल सामान्य को ही नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसमें ' भेद ' ( विशेष अर्थात् व्यक्ति ) का भी भान होता है । एवं निर्विकल्पक ज्ञान में केवल भेद ( व्यक्ति ) भी भासित नहीं होता । क्योंकि अनुभव के द्वारा यह सिद्ध है कि उसमें सामान्य भी भासित होता । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) ' यह सामान्य है ' ' यह विशेष है ' इस प्रकार अलग २ दोनों का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि ( निर्विकल्पक ज्ञान में ) दूसरी वस्तु का ( अर्थात् ज्ञात वस्तु के सजातीय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्य विशेषद्रव्यगुणकर्म विशेषणापेक्षादात्ममनः सन्निकर्षात् II प्रत्यक्ष-( २ ) उद्भूत रूप ( ३ ) प्रकाश एवं ( आत्मा, मन, चक्षुरादि इन्द्रियाँ और घटादि अर्थ इन ) चार वस्तुओं के ( तीन ) संनिकर्ष, इन सबों के द्वारा धर्मादि ( साधारण ) सामग्रियों ह द्रव्य के का केवल स्वरूप आलोचन ( निर्विकल्पक ) ज्ञान होता है । आत्मा और मन के संनिकर्ष से ही ( उक्त कारणों के रहते हुए ) द्रव्य का सविकल्पक प्रत्यक्ष होता है, ( किन्तु ) उसे ( आत्ममनः संनिकर्ष को ) इस कार्य के लिए ( द्रव्य के सामान्यधर्म, विशेष धर्म, द्रव्य, गुण, कर्म, प्रभृति विशेषणों की भी अपेक्षा होती है । ( जिससे द्रव्य के सविकल्पक ज्ञान के " यह द्रव्य सत् है, यह पृथिवी है, गाय सींगवाली है, गाय शुक्ल है, गाय जाती है, इत्यादि आकार होते हैं । न्यायकन्दली व्यावृत्तिग्रहणाद् विशेषोऽयमिति विवेकः । पिण्डान्तरानुसन्धानाभावात् न गृह्येते ग्रहणं तु भवत्येव विशेषस्वलक्षणानां न निर्विकल्पकदशायां च धम सामान्यविशेषयोरनुवृत्तिव्यावृत्ती तयोरग्रहणान्न विविच्य ग्रहणम् । स्वरूप-तस्यान्यानपेक्षत्वात् । अत एव निर्विकल्पेन सामान्य-विशेषणविशेष्यभावानुगमः, तस्य भेदावगतिपूर्व-कत्वानिविकल्पेन च सामान्यादीनां परस्परभेदानध्यवसायात् । अतः परं से भिन्न वस्तु का भान नहीं होता । ( 3०, इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि ) दूसरे पिण्डों में अनुवृत्ति के ग्रहण से सामान्य का ज्ञान होता है और व्यावृत्ति के ग्रहण से विशेष का भान होता है । जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान होता है उस समय दूसरे व्यक्ति का अनुसन्धान नहीं रहता है, अतः सामान्य की अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों में से किसी का भी ज्ञान सम्भव नहीं है, अतः अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों के अज्ञान के कारण सामान्य और विशेष के विवेक का ज्ञान नहीं हो पाता है । ( व्यक्ति के ) स्वरूप का ग्रहण तो होता ही है, क्योंकि स्वरूपग्रहण में दूसरे की अपेक्षा नहीं है । यही कारण है कि जाति, व्यक्ति एवं स्वलक्षण ( व्यक्तिगत असाधारणधर्म तद्वयक्तित्वादि ) ये सभी निर्विकल्पक-ज्ञान में भासित होने पर भी विशेष्यविशेषणभावापन्न होकर भासित नहीं होते, क्योंकि विशेष्य विशेषणभाव के लिए दोनों में भेद का ज्ञान आवश्यक है । निर्विकल्पक ज्ञान से सामान्यादि के भेद का भान नहीं होता । निर्विकल्पक ज्ञान के बाद ' यह इसका विशेषण है ' एवं ' यह इसका विशेष्य है ' इत्यादि आकार का बोध सविकल्पक ज्ञान से होता है, क्योंकि विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति इन्द्रिय के द्वारा उसी पुरुष को हो For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४४८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-न्यायकन्दली सविकल्पकं सामान्यविशेषरूपतां प्रत्येति भूतप्रतित्युपपत्तेः । सौगताः पिण्डान्तरमनुसन्दधान. तथा-स्यात्मनोऽनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मो प्रतिपद्यमानस्येन्द्रियद्वारेण पुनरेवमाहुः - स्वलक्षणान्वयव्यतिरेकानुविधायिप्रतिभासं निर्विकल्पकं वस्तुन्यस्रान्तम्, अतस्तदेव प्रत्यक्षं न सविकल्पकम्, तस्य वासनाधीनजन्मनो वस्त्वननुरोधिप्रतिभासस्य केशादिज्ञानवद् वस्तुनि भ्रान्तत्वादिति । तेषां मतं निराकतु सविकल्पकस्यापि प्रत्यक्षतामाह-सामन्येत्यादि । सामान्यं च विशेषश्च द्रव्यं च गुणश्च कर्म च सामान्यविशेषद्रव्य. गुणकर्माणि, सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेष-द्रव्यगुणकर्म विशेषणानि, तान्यपेक्षते य आत्ममनः सन्निकर्षः, तस्मात् सद्रव्यमिति सामान्यविशिष्टम् । पृथिवीति पृथिवीत्वविशिष्टम्, विषाणीत द्रव्यविशिष्टम् शुक्लो गौरिति गुणविशिष्टम् गच्छतीति कर्मविशिष्ट प्रत्यक्षं स्थात् । चतुष्टयसन्निकर्षादित्यनेनैवात्ममनः संयोगे सकती है जिसे निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होनेवाले उसके सजातीय पिण्डों का अनुसन्धान रहे एवं ( जिसका निर्विकल्पक ज्ञान हो एवं जिसका उक्त अनुसन्धान हो इन ) दोनों में अनुवृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत सामान्य और व्यावृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत विशेष दोनों का ज्ञान भी रहे । बौद्धों का कहना है कि निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है सविकल्पक ज्ञान नहीं, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान के ही साथ विषय के स्वलक्षण ( असाधारणधर्म ) का अन्वय और व्यतिरेक है, अतः वही अपने विषय में अभ्रान्त है । चूंकि सविकल्पक ज्ञान वासना के अधीन हैं. वह अपनी उत्पत्ति के लिए विषयवस्तु का अनुरोध नहीं रखता । अतः केशराशि के ज्ञान की तरह सविकल्पक ज्ञान अपने विषयवस्तु में भ्रान्त है । बौद्धों के इस मत को खण्डित करने के लिए ही ' सामान्य ' इत्यादि ग्रन्थ से ' सविकल्पक-ज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है ' यह उपपादन किया गया है । सामान्यश्च " विशेषश्च द्रव्यश्च गुणश्च कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि, ( द्वन्द्व ) सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्म-विशेषणानि ( कर्मधारय ), तान्यपेक्षते यः आत्ममनः संनिकर्षः, तस्मात् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, और कर्म स्वरूप विशेषणों के साहाय्य से आत्मा और मन के संनिकर्ष के द्वारा ' सद् द्रव्यम् ' इस आकार का सत्ता ( सामान्य ) विशिष्ट द्रव्य काज्ञान, ' इयं पृथिवी ' इस आकार का पृथिवीत्व रूप विशेष प्रकारक ज्ञान, ' अयं विषाणी ' इस आकार का द्रव्य विशेषणक ज्ञान, ' शुक्लो गो: ' इस आकार का गुणविशेषणक ज्ञान, ' गौर्गच्छति ' इस आकार का कर्मप्रकारक ज्ञान, ये जितने भी ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सभी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम न्यायकन्दली III पुनरस्योपादानं पूर्वस्मान्निर्विकल्पक प्रक्रमादिदं प्रक्रमान्तरमित्यवद्योतनार्थम् । सविकल्पकमर्थे न प्रमाणमिति कथमुच्यते? प्रतीयते हि घटोऽयमिति ज्ञाने विच्छिन्नः कम्बुग्रीवात्मा सर्वतो व्यावृत्तः पदार्थः । अनर्थजप्रतिभासो विकल्पस्तस्मादर्थाध्यवसायो भ्रान्त इति चेत्? यथोक्तम्-" विकल्पो वस्तुनिर्भासाद् विसंवादादुपप्लवः " इति । न प्रवृत्तौ संवादात् । अथानुभवजन्मा विकल्पोऽर्थात्मतयारोपित-स्वप्रतिभासः स्वलक्षणस्वप्रतिभासयोर्भेदं तिरोधाय स्वलक्षणदेशे पुरुषं प्रवर्तयति संवादयति च मणिप्रभायां मणिबुद्धिवत् पारम्पर्येणार्थ प्रतिबन्धादर्थप्राप्तेरिति चेत्? यदि विकल्पो वस्तु न संस्पृशति, कथं तदात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयेत्? नह्यप्रतीते मरुमरीचिनिचये तदधिकरणो जलसमारोपो दृष्टः । अथ प्रत्यक्षपृष्ठभावी विकल्पः करणव्यापारमुपाददानोऽर्थक्रियासमर्थं वस्तु साक्षात्करोति, अन्यथार्थक्रियार्थिनो विकल्पतः प्रवृत्त्ययोगात् । यथाह--" ततोऽपि विकल्पाद् वस्तुन्येव प्रवृत्तिः " इति । एवं तहि वस्तुनि प्रमाणम्, सत्राविसंवादिप्रतीतिहेतुत्वात् । अथ मन्यसे यः क्षण: प्रत्यक्षेण गृह्यते प्रत्यक्ष हैं । ( निर्विकल्पक ज्ञान के प्रसङ्ग में कथित ) चतुष्टय संनिकर्ष से ही यद्यपि आत्मा और मन के संनिकर्ष का लाभ हो जाता है फिर भी ' यह आरम्भ निर्विकल्पक ज्ञान के उपक्रम से सर्वथा भिन्न है ' यह दिखलाने के लिए ही अलग से यहाँ भी आत्मा और मन के संनिकर्ष का उपादान किया गया है । ( उ ० ) किस युक्ति के द्वारा यह कहते हैं कि सविकल्पक ज्ञान अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण नहीं है? क्योंकि ' घटोऽयम् ' इस सविकल्पक ज्ञान में पटादि अन्य सभी पदार्थों से भिन्न कम्बुग्रीवादिमत् स्वरूप एक विलक्षण वस्तु भासित होता है । ( प्र ० ) जो ज्ञान बिना अर्थ के भी उत्पन्न हो उसे विकल्प ' कहते हैं । उनसे जो ( सविकल्पक नाम का ) अध्यवसाय उत्पन्न होगा, वह भी अवश्य ही भ्रान्त होगा । जैसा कहा गया है कि विशिष्ट वस्तु को समझाने के कारण ही ज्ञान सविकल्पक होता है । किन्तु उससे होनेवाली प्रवृत्तियाँ विफल होती हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भ्रान्तिरूप है । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ सफल ( भी ) होती हैं । ( प्र ० ) पहिले ( निवि-कल्पक ) अनुभव से उत्पन्न होनेवाले सविकल्पक अनुभव में उसके विषय के अभेद का आरोप होता है, इसके बाद इस आरोप के कारण उसका घटादि विषय रूप से ही प्रतिभास होता है । इस प्रकार सविकल्पक अनुभव में भासित होनेवाले विषयों की प्रवृत्ति सफल होती है किन्तु प्रवृत्ति की इस सफलता से सविकल्पक ज्ञान में प्रामाण्य की सिद्धि नहीं की जा सकती ) | ( उ ० ) ( इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि ) अगर सविकल्पक ज्ञान का अपने विषय के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है तो फिर वह विषय में अपने प्रतिभास का आरोप ही कैसे कर सकता है? क्योंकि अज्ञान मरु - मरीचिका में तो जल का ५.७ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४५० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-नासौ विकल्पेनाध्यवसीयते, यश्च विकल्पेनाध्यवसीयते, न स प्रवृत्त्या लभ्यत इति क्षणापेक्षया न संवादः, तेषां क्षणिकत्वात् । किन्तु यादृशः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते तादृशो विकल्पेनाध्यवसीयते, यादृशश्च विकल्पेनाध्यवसी-यते तादृशश्च प्रवृत्त्या लभ्यत इत्यनाकलितक्षणभेदस्यातद्वयावृत्तवस्तु-मात्रापेक्षया संवादः । तत्र च विकल्पो गृहीतग्राहित्वादप्रमाणम्, तथाभूतस्या-र्थस्य प्रत्यक्षेणैव गृहीतत्वात् । लिङ्गजस्तु विकल्पः प्रमाणान्तराप्राप्त-स्वलक्षणप्रापकतया प्रमाणमिति । तदप्यसारम्, नहि क्षणस्यान्यव्यावृत्तिर-भावरूपान्यव्यावृत्यपेक्षया वा तस्यारोपितं साधारणं रूपमवस्तुभूतं आरोप देखा नहीं जाता । जैसा कहा गया है कि ' अप्रमा ज्ञान से भी यथार्थवस्तु में ही प्रवृत्ति होती है ' अगर ऐसी बात है तो फिर सविकल्पक ज्ञान अवश्य ही अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण है, क्योंकि अपने विषय की सफल प्रवृति का वह कारण है । यदि यह मानते हैं कि ( प्र ० ) जो क्षण ( वृत्ति घटादि ) प्रत्यक्ष ( निर्विकल्पकज्ञान ) से गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान के द्वारा निर्णीत नहीं होता क्योंकि प्रत्येक क्षण वृत्ति घटादि भिन्न हैं ) एवं जिसका निर्णय सविकल्पक ज्ञान के द्वारा होता है, प्रवृत्ति के द्वारा उसी का लाभ नहीं होता है । ' अतः प्रवृत्ति और सविकल्पक ज्ञान में एक ही विषय भासित होते हैं इस प्रकार दोनों में एक विषयत्व का सामञ्जस्य नहीं स्थापित किया जा सकता । क्योंकि ( निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति ये ) सभी क्षणिक हैं ( अतः भिन्न हैं ) । ( वस्तुस्थिति यह है कि ) जिस प्रकार का क्षण ( वृत्ति पदार्थ ) ( निर्विकल्पक ) प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होता है उसी के जैसा क्षण ( वृत्ति पदार्थ ) विकल्प ( सविकल्पक प्रत्यक्ष ) के द्वारा भी निश्चित होता है । एवं जिस प्रकार की वस्तु सविकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होती है उसी प्रकार की वस्तु का लाभ प्रवृत्ति से भी होता | किन्तु ( निर्विकल्पक ज्ञान, सविकल्पक ज्ञान एवं प्रवृत्ति ) इनके विषयों का भेद गृहोत नहीं होता है, और यह भान होता है कि सविकल्पक ज्ञान के विषय की ही प्राप्ति प्रवृत्ति से हुई हैं । वस्तुतः प्रवृत्ति की सफलता का यह व्यवहार केवल इतने ही अंश में पर्यवसित है कि सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में ' अतद्वयावृत्त ' या ' अपोह ' ( रूप घटभिन्नभिन्नत्वादि धर्म ) एक हैं । वह व्यवहार दोनों के विषयों के ऐक्य मूलक नही है. ( क्योंकि दोनों के विषय भिन्न हैं ) इनमें प्रत्यक्षात्मक सविकल्पक ज्ञान ( निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा गृहीत ) विषय का ही ज्ञापक है, अतः वह प्रमाण नहीं है । किन्तु लिङ्ग ( हेतु ) जनित ( स ) विकल्पक ज्ञान प्रमाण है, क्योंकि वह किसी दूसरे प्रमाण से सर्वथा अज्ञात असाधारण विषय का बोधक है । ( उ ० ) इस उपपत्ति में भी कुछ सार नहीं है । ( घटादि वस्तुओं में क्षण - भेद के कारण भेद होते हुए भी जो तत्तत्क्षणों में रहनेवाले घटादि वस्तुओं के ही अन्यव्यावृत्ति रूप अपोह के कारण क्रमशः उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में ऐक्य व्यवहार का समर्थन किया है वह सम्भव नहीं है ) क्योंकि प्रत्येक क्षण ( वृत्ति घटादि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् । भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४५१ प्रत्यक्षेण गृह्यते, हेतुत्वस्य ग्राह्यलक्षणत्वादवस्तुनश्च समस्तार्थक्रियाविरहात् । क्षणस्तु परमार्थसन्नर्थक्रियासमर्थत्वात् प्रत्यक्षस्य विषयः । स च विकल्प -कालानुपातीत्युक्तम्, कुतो विषयैकता? अस्तु वा विकल्पप्रत्यक्षयोरनिरू-पितरूपः कश्चिदेकः प्रवृत्तिसंवादयोग्यो विषयः, तथापि विकल्पः प्रमाणत्वं नातिवर्त्तते धारावाहिकबुद्धिवदर्थपरिच्छेदे पूर्वानपेक्षत्वात्, अध्यवसितप्रापण-योग्यत्वाच्च । प्रमाणत्वे चावस्थिते प्रत्यक्षमेव स्याल्लिङ्गाद्यभावादर्थे न्द्रिया-न्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाच्च । यत् पुनरयमर्थजो भवन्नपि निर्विकल्पकवदि-न्द्रियापातमात्रेण न भवति, तदिन्द्रियार्थ सहकारिणो वाचकशब्दस्मरणस्या-वस्तुओं में रहनेवाले अपोह या अन्य व्यावृत्ति ) अभाव रूप है, अतः क्षणों का साधारण रूप हो या सभी क्षणिक वस्तुओं में समारोपित ही हो - किसी भी स्थिति में उसका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि अवस्तु ( अभाव ) से कोई काम नहीं हो सकता ( अतः उससे प्रत्यक्ष रूप कार्य भी नहीं हो सकता, किन्तु प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण है ) चूँकि क्षण ( वृत्ति घटादि वस्तुओं ) की परमार्थसत्ता है, अतः वे ही अर्थक्रियाकारी होने से अपने निर्विकल्पक प्रत्यक्ष रूप कार्य का उत्पादन कर सकते हैं । किन्तु निर्विकल्पक प्रत्यक्ष काल में रहनेवाले विषय सविकल्पक प्रत्यक्ष के समय तक ( आप के मत से ) रह नहीं सकते, अतः ( आपके मत से ) ( निर्विकल्पक ज्ञान और सविकल्पक ज्ञान दोनों एक की जा सकती है? यदि यह मान भी विषयक इसकी उपपत्ति किस प्रकार लें ( कि उक्त ऐक्य व्यवहार में समर्थ ) दोनों प्रत्यक्षों का एक ही कोई अनिर्वचनीय विषय है तब भी सविकल्पक प्रत्यक्ष के प्रमाणत्व को कोई हटा नहीं सकता, क्योंकि धारावाहिक बुद्धि को तरह इसमें विषय के निर्द्धारण के लिए पहिले किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं है, एवं अपने द्वारा निश्चित विषय को प्राप्त कराने की योग्यता भी है । इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान में प्रमाणत्व के निश्चित हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण ही होगा, क्योंकि अनुमान प्रमाण मानने के प्रयोजक लिङ्गादिज्ञान वहाँ नहीं है, एवं ( प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक ) इन्द्रिय का अन्वय और व्यतिरेक भी है । निर्विकल्पक ज्ञान की तरह अर्थजनित होने पर भी जो विषयों के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध होते ही सविकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं होती है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं रहता है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान के उत्पादन में वाचक शब्द का स्मरण भी इन्द्रिय और अर्थ का सहकारी है ( अर्थात् वाचक शब्द का स्मरण भी सविकल्पक ज्ञान का सहकारि कारण है ) | ( प्र ० ) तो फिर स्मृति के बाद उत्पन्न होनेवाला यह विकल्प स्मृति से ही उत्पन्न होता है, इन्द्रिय और अर्थ से नहीं, क्योंकि इन्द्रिय, अर्थ एवं सविकल्पक ज्ञान इनके मध्य में स्मृति आ जाती है | ( उ ० ) क्या सहकारी कारण मुख्य कारण में जो काय करने की शक्ति है उसे रोक देता है? तो फिर बीज भी अङ्कुर का कारण नहीं होगा, क्योंकि बीज और अङ्कुर के बीच में पृथिवी और जल भी आ जाता है । ( जिससे For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४५२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-भावात् । स्मृत्यनन्तरभावी विकल्पः स्मृतिज एव नेन्द्रियार्थजः, तयोः स्मृत्या व्यवहितत्वादिति चेत्? किं भोः सहकारी भावस्य स्वरूपशक्तिं तिरोधत्ते? क्षित्युदकतिरोहितस्य बीजस्याङ्कुरजननं प्रति का वार्ता? शब्दस्मरणेनेन्द्रि-यार्थयोः क उपकारो येनेदं तयो: सहकारि भवतीति चेत्? यथा विकल्पः स्वोत्पत्तावर्थेन्द्रिययोरन्दयव्यतिरेकावनुकरोति तथा स्मृतेरपि । ततश्चेन्द्रियार्थ-योरयमेव स्मरणेनोपकारो यदेता केवलो कार्यमकुर्वन्तौ स्मृतिसहकारिलाभात् कुरुतः । स्वरूपातिशयानाधायिनो न सहकारिण इति क्षणभङ्गप्रतिषेधावसरे प्रतिषिद्धम् । स्यादेतत्- कल्पनारहितं प्रत्यक्षम् । कल्पनाज्ञानं तु सविकल्पकम्, तस्मादर्थे न प्रमाणमिति । अथ केयं कल्पना? शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिरेका, अर्थसंयोजनात्मिका चापरा विशिष्टग्राहिणी कल्पना । तदयुक्तम्, विकल्पानुपपत्तेः । शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः किमर्थे शब्द संयोजयति? किं वा स्वयं व्यवहित होने के कारण बीज में भी कारणता कुण्ठित हो जाएगी ) । ( प्र ० ) ( मुख्य कारण को कार्य के उत्पादन में उपकार करनेवाला ही सहकारि कारण है तदनुसार ) वाचक-शब्द का स्मरण इन्द्रिय और अर्थ का क्या उपकार करता है जिससे शब्द के स्मरण को सविकल्पक प्रत्यक्ष का सहकारि कारण मानें? ( उ ० ) जिस प्रकार सवि-कल्पक प्रत्यक्ष अपनी उत्पत्ति के लिए इन्द्रिय और अर्थ का अनुगमन करता है, उसी प्रकार वह स्मृति के अन्वय और व्यतिरेक के अनुगमन की भी अपेक्षा रखता है । इन्द्रिय और अर्थ को वाचक शब्द को स्मृति से यही उपकार होता हैं कि इसके बिना वे दोनों सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप अपना काम नहीं कर पाते और स्मृति रूप सहकारी के रहने से कर पाते हैं । ' मुख्य कारण के स्वरूप में किसी विशेष का सम्पादन न करनेवाला सहकारी ही नहीं है ' इस आक्षेप का हम क्षणभङ्गवाद के खण्डन के अवसर पर निराकरण कर चुके हैं ( देखिए पृ ० १८५ १८६ ) ( ० ) ' कल्पना ' से भिन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, किन्तु सविकल्पक ज्ञान तो ' कल्पना ' रूप है, अत: वह अपने अर्थ का ज्ञापक प्रमाण नहीं है । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि यह ' कल्पना ' कौन सी वस्तु है? ( १ ) ( निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात ) अर्थ को ( उसके बोधक शब्द के साथ सम्बद्ध करने-वाली ( शब्द संयोजनात्मिका ) प्रतीति ' कल्पना ' है ( २ ) अथवा उसी अर्थ को विशेषण के साथ सम्बद्ध करनेवाली ( विशिष्ट विषयक ) अर्थ संयोजनात्मिका प्रतीति ही ' कल्पना ' है? किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं, क्योंकि इन दोनों पक्षों के सभी सम्भावित विकल्प अनुपपन्न ठहरते हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४५३ शब्देन संयुज्यते? यदि तावदर्थे शब्द संयोजयति? तत्रापि किं शब्दात्म-कमर्थं करोति? किं वा शब्दकापरक्तं गृह्णाति? आहोस्विच्छब्देन व्यपदिशति? स्वरूपेण न तावत्प्रतीतिरर्थं शब्दात्मकं करोति, अर्थस्य निर्विकल्पक गृहीतेनैव विकल्पज्ञानेऽपि प्रतिभासनात्, अर्थक्रियाकरणाच्च । अन्यथा व्युत्पन्नाव्युत्पन्नयोर्युगपदेकार्थव्यवसायायोगात् । अथ शब्दाकारोवरवतमर्थं गृह्णाति? तदप्ययुक्तम्, अप्रीतीतेः । निर्विकल्पक ज्ञानेनार्थे गृहीते प्रागनुभूतस्तद्वाचकः शब्दः स्मर्यते, प्रतियोगि-दर्शनात् । स्मृत्या रूढश्चासौ तदर्थे एवार्थं परिच्छिनत्ति, न तु स्फटिक इव नीलोपरक्तः शब्दाकारोपरवतो s र्थो गृह्यते, शब्दस्याचाक्षुषत्वात्, केवलस्यैवार्थस्येदन्तया निर्विकल्पकवत् प्रतिभासनाच्च । न च वाचके स्मर्यमाणे वाच्यस्य काचित् स्वरूपक्षतिरस्ति, येनायं सत्यपीन्द्रियसंयोगे प्रत्यक्षतां न लभते । यथोक्तम् -( १ ) शब्द संयोजनात्मिका प्रतीति ही ' कल्पना ' है, इस पक्ष के प्रसङ्ग में यह पूछना है कि यह प्रतीति क्या अर्थ के साथ शब्द को सम्बद्ध करती है या वह स्वयं ही शब्द साथ सम्बद्ध होती है? यदि यह कहें कि ' अर्थ में ही शब्द को सम्बद्ध करती है तो फिर इस पक्ष में पूछना है कि वह प्रतीति शब्द स्वरूप अर्थ को ग्रहण करती है ( अर्थात् अर्थ में शब्द को अभेद सम्बन्ध से सम्बद्ध करती है ) अथवा शब्दाकार से अर्थ को ग्रहण करती है? अथवा शब्द के द्वारा अर्थ का व्यवहार करती है? ( इन तीनों पक्षों में से पहिले पक्ष के अनुसार यह कहना अयुक्त है कि उक्त कल्पना रूप प्रतीति ) अर्थ को शब्द से अभिन्न रूप में ग्रहण करती है, क्योंकि जिस रूप से अर्थ निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है. उसी रूप से सविकल्पक ज्ञान से भी गृहीत होता है । एवं ( सविकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात ) अर्थ ही ' अर्थक्रियाकारी ' अर्थात् कार्योत्पादक भी है ( क्योंकि अर्थ में शब्द का अभेद समारोपित ही है स्वाभाविक नहीं, समारोपित अर्थ से किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है ) । अन्यथा ( यदि सविकल्पक प्रत्यक्ष शब्द विशिष्ट अर्थ विषयक ही हो तो फिर ) व्युत्पन्न ( शब्द अर्थ के वाच्य वाचकभाव सम्बन्ध से अभिज्ञ ) पुरुष एवं ' अव्युत्पन्न ( उक्त सम्बन्ध से अनभिज्ञ ) पुरुष दोनों को एक ही समय एक ही विषयक सविकल्पक ज्ञान नहीं होंगे । शब्द से उपरक्त अर्थ को ही ' सविकल्पक ज्ञान ग्रहण करता है ' यह पक्ष भी अनुभव से विरुद्ध होने के कारण अयुक्त हैं, क्योंकि अर्थ ( शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का ) प्रतियोगी है, उसी के निर्विकल्पक ज्ञान रूप ' दर्शन ' से पूर्वानुभूत उस अर्थ के वाचक शब्द का स्मरण होता है । उस स्मृति का विषय होकर ही वाचक शब्द उस अर्थ के साथ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४५४ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-चेतनः संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते । संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥ इति । प्रतीतिः शब्देन संसृष्टार्थं व्यपदिशतीत्यपि न सुप्रतीतम् । आत्मा हि प्रतिसन्धानादिसामर्थ्यात् सङ्केतकालानुभूतं वाचकशब्द स्मृत्वा तेनार्थं व्यपदिशति । घटोऽयमिति न प्रतीतिः, तस्याः प्रतिसन्धानादिसामर्थ्या-भावात् । एवं तावत्प्रतीतिर्न शब्द संयोजयति । नापि स्वयं शब्देन संयुज्यते, ज्ञानस्य तदव्यतिरिक्तस्य चाकारस्य सम्बद्ध होकर निश्चित होता है । जिस प्रकार नीलवर्ण के द्रव्य के साथ सम्बद्ध होने पर वह स्फटिक नीलवर्ण से युक्त सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार शब्द से युक्त होकर अर्थ की प्रतीति नहीं होती है, क्योंकि ( घटादि अर्थ चक्षु से गृहीत होते हैं किन्तु ) शब्द का चक्षु से ग्रहण नहीं होता । दूसरी यह भी बात है कि ( ग्रह नियम नहीं है कि सभी सविकल्पक ज्ञान शब्द से युक्त अर्थ को ही ग्रहण करें ) केवल अपने इदन्त्वादि असाधारण रूप से भी वह निर्विकलक ज्ञान की तरह अर्थ को ग्रहण करता है ( अर्थात् जिस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान में अर्थ इदन्त्वादि अपने असाधारण रूपों से भासित होता है उसी प्रकार कुछ सवि-कल्पक ज्ञानों में भी होता है, अन्तर केवल इतना होता है कि निर्विकल्पक ज्ञान में विशेष्य और विशेषण दोनों ही विश्लिष्ट ही भासित होते हैं । किन्तु सविकल्पक ज्ञान में दोनों संश्लिष्ट ही भासित होते हैं ) वाचक शब्द की स्मृति हो जाने से वाच्य अर्थ के स्वरूप में ऐसी कोई विच्युति नहीं आती कि इन्द्रियसंयोग के रहने पर भी ( इदन्त्वादि असा-धारण रूप से ) उसका प्रत्यक्ष न हो सके । जैसा कहा गया है कि-संज्ञा की स्मृति होने पर भी वह अपने वाच्य अर्थ के प्रत्यक्ष में कोई बाधा नहीं लां सकती, क्योंकि अपने अर्थ के प्रसङ्ग में उदासीन होने कारण उसके अर्थ में प्रत्यक्ष होने की जो योग्यता है - उसे तिरोहित करने का सामर्थ्य उसमें नहीं है । यह पक्ष भी ठीक नहीं जँचता कि ' प्रतीति ( सविकल्पक प्रत्यक्ष ) शब्द से सम्बद्ध अर्थ का व्यवहार करती है ' क्योंकि प्रतीति अचेतन है, उसमें स्मरण करने का सामर्थ्यं नहीं है; चेतन आत्मा में ही स्मरणादि का ऐसा सामर्थ्य है कि शब्दार्थ सङ्केत के समय अनुभूत वाचक शब्द को स्मरण कर उससे ' घटोऽयम् ' इत्यादि व्यवहार का सम्पा दन कर सकती है । इस प्रकार ' प्रतीति शब्द को अर्थ के साथ सम्बद्ध करती हैं ' यह पक्ष ( अपने सभी विकल्पों के अनुपपन्न होने के कारण ) अयुक्त है । ( सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप प्रतीति स्वयं शब्द के साथ सम्बद्ध होती है ) यह पक्ष मी अयुक्त है, क्योंकि ज्ञान एवं उसके आकार दोनों ही ' क्षणिक ' होने के कारण असा-धारण हैं ( अर्थात् एक ज्ञान और उसका आकार एक ही पुरुष के द्वारा ज्ञात होता है ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली I क्षणिकत्वेनासाधारणतया चाशक्य सङ्केतयोः शब्देन संस्रष्टुमयोग्यत्वात्, विषयवाचिना शब्देन विषयिणो ज्ञानस्य तद्वयतिरिक्तस्य व्यपदेशाभावाच्च । अथ मन्यसे विकल्पः दसंसृष्टार्थविषयः, स चार्थः संसृज्य शब्देन व्यपदि-श्यते च । ( यत्र शब्दस्य सङ्केत: ) तत्र च शब्दस्य सङ्केत यदक्षणिकं साधारणं च न च स्वलक्षणं स्वलक्षणविषयो वा बोधो बोधविषयश्चाकारः साधारणोऽक्षणिकश्च भवति । बोधाकारस्य बाह्यत्वमपि बोधाकारादनन्यदसा-धारणमेव । सामान्यं च वस्तुभूतं नास्ति, विचारासहत्वात् । तस्मात् प्रत्येकं विकल्पैर्बाह्यत्वेनारोपितेषु स्वाकारेषु परस्परभेदानध्यवसायादन्यव्यावृत्ततयै-कत्वे समारोपिते शब्दस्य सङ्केत इति प्रमाणबलादाघातमवर्जनीयम् । तत्र चालोके शब्दसंसर्गवति विकल्प: प्रवर्तमानोऽसन्तमर्थं विकल्पयतीति कल्पनाज्ञानमिति । यथोक्तम्-अतः प्रतीति और उसका आकार दोनों का शब्द के साथ सङ्केत नहीं हो सकता । अतः प्रतीति में ( सङ्केत सम्बन्ध से ) शब्द में सम्बद्ध होने की योग्यता नहीं है । एवं घटादि विषयों के वाचक घटादि शब्द के द्वारा घटादि विषयों से भिन्न घटादि अर्थविषयक ज्ञान का प्रतिपादन भी सम्भव नहीं है ( क्योंकि विषय और विषयों दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव के हैं ) । यदि यह मानते हों कि ( प्र ० ) शब्द से सम्बद्ध अर्थ ही सविकल्पक ज्ञान का विषय है और वह अर्थ शब्द के साथ सम्बद्ध होकर ही व्यवहार में आता है । ( उ ० ) शब्द का सङ्केत ( रूप सम्बन्ध ) उसी के साथ होता है जो अक्षणिक ( अनेक क्षणों तक रहने वाला ) तथा साधारण ( अनेक पुरुषों से गृहीत होनेवाला ) हो । कोई भी स्वलक्षण ( अर्थात् विज्ञान ) अथवा स्वलक्षण का विषय या उसका आकार बौद्धों के मत से अक्षणिक और साधारण नहीं है । बोध क आकार में ( बाह्यत्व की कल्पना कर उस कल्पित आकार को साधारण मान कर भी काम नहीं चलाया जा सकता क्योंकि ) वह कल्पित बाह्यत्व भी बोध के आकार से अभिन्न होने के कारण असाधारण ही होगा ( साधारण नहीं ) सामान्य नाम का कोई भाव पदार्थ विचार से बहिभूर्त होने के कारण है ही नहीं । अतः यही मानना पड़ेगा कि विकल्प ( विज्ञान ) के द्वारा उसके आकारों में बाह्यत्व की कल्पना की जाती है, किन्तु परस्पर विभिन्न उन आकारों का भेद अज्ञात ही रहता है, इस अज्ञान के कारण ही उन आकारों में एकत्र का आरोप होता है । इन प्रमाणों के बल पर यही कहना पड़ता है कि इसी एकत्व के अधिष्ठानभूत वस्तु में शब्द है, फलतः जिसमें शब्द का सङ्के ज्ञान प्रवृत्त होकर उसे निश्चित रूप है । जैसा कहा गया है कि है वह अलोक है, और उसी असत् अर्थ में सविकल्पक करता है । इस प्रकार ( सविकल्पक ) ज्ञान कल्पना ' कल्पना रूप ज्ञान में जो रूप बाह्य एक वस्तु की तरह एवं दूसरों से भिन्न की तरह भासित होता है, वह परीक्षा करने पर उन रूपों For Private And Personal