प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 531–540
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 531–540
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४५६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली तस्यां यद्रूपमाभाति बाह्यमेकमिवान्यतः । व्यावृत्तमिव निस्तत्त्वं परीक्षानङ्गभावतः ॥ इति । [ गुणे प्रत्यक्ष-अत्रोच्यते यदि सामान्यस्य वस्तुभूतस्याभावात् तद्विशिष्टग्राहिता कल्पनात्वम् तर्ह्यसदर्थतैव कल्पनात्वं न शब्दसंसृष्टार्थग्राहिता । तत्र यदि शक्ष्यामः प्रमाणेन सामान्यमुपपादयितुं तदा सत्यपि शब्दसंसृष्टग्राहकत्वे तद्विषयं विकल्पज्ञानमिन्द्रियार्थजत्वात् प्रत्यक्षमेव स्यात् । यदपरोक्षावभासि तत् प्रत्यक्षं यथा निर्विकल्पकम्, अपरोक्षावभासि च विकल्पज्ञानम् । इह ज्ञानानां परोक्षत्वमनिन्द्रियार्थ जत्वेन व्याप्तं यथानुमाने, अनिन्द्रियार्थजत्वविरुद्ध चेन्द्रि से भिन्न ठहरता है, अत: ( कल्पना ज्ञान में विषयभूत वह विशेष प्रकार का ) अर्थ निस्तत्त्व है ( असत् ) है । ( उ ० ) ( सविकल्पक ज्ञान कल्पना रूप होने के कारण प्रमाण नहीं हैं ) इस प्रसङ्ग सिद्धान्तियों का कहना है कि सामान्य ( जाति ) नाम का कोई भाव पदार्थ बौद्धों के मत में नहीं है और सामान्य से युक्त अर्थ का ग्राहक होने के कारण ही सविकल्पक ज्ञान कल्पना ( भ्रम ) है तो फिर यही कहिये कि असत् अर्थ को ग्रहण करने के कारण ही सविकल्पक ज्ञान कल्पना ( भ्रम ) है | यह क्यों कहते हैं कि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का ग्राहक होने के कारण सविकल्पक ज्ञान भ्रम है । इस प्रकार यह निश्चित होता है कि सविकल्पक ज्ञान चूंकि असत् अर्थ का प्रकाशक है इसीलिए वह कल्पना ' है । इसलिए वह ' कल्पना ' नहीं है कि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का प्रकाशक है । ( ऐसी स्थिति में ) यदि प्रमाण के द्वारा सामान्य नाम के भाव पदार्थ की सत्ता का हम लोग प्रमाण के द्वारा प्रतिपादन कर सकें, एवं सविकल्पक ज्ञान यदि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का प्रकाशक भी हो किन्तु इन्द्रिय और अर्थ ( के संनिकर्ष ) से उसकी उत्पत्ति हो, तो फिर इस इन्द्रियार्थं जत्व रूप हेतु से उसमें प्रत्यक्षत्व की सिद्धि की जा सकती है । ( इस प्रसङ्ग के दृष्टान्त में साध्य का साधक यह अनुमान है ) कि निर्विकल्पक ज्ञान की तरह जितने भी अपरोक्ष की तरह विषयों के भासक ज्ञान हैं, वे सभी प्रत्यक्ष होते हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भी अपरोक्षावभासि होने के कारण प्रत्यक्ष है । ( इस अनुमान में ) यह ' व्यापकविरुद्धोपलब्धि ' अर्थात् व्यतिरेकव्याप्ति भी हेतु है कि अनुमान की तरह जितने भी ज्ञान बिना इन्द्रिय के उत्पन्न होते हैं वे सभी परोक्ष ही होते हैं । इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होना ( इन्द्रियार्थ जत्व ) एवं इन्द्रिय से भिन्न करणों से उत्पन्न होना ( अनिन्द्रियार्थजन्यत्व ) ये दोनों परस्पर विरोधी हैं । अनिन्द्रियार्थजत्व का विरोधी यह इन्द्रियाथंजत्व निर्विकल्पक ज्ञान में है ( जो कि दोनों के मत से प्रत्यक्ष है, अतः इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न सविकल्पक ज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है ) । ( प्र ० ) ( उक्त अनुमान के ) विपक्ष में यह विरोधी अनुमान भी प्रस्तुत किया जा सकता है कि जिस प्रकार अनुमान रूप ज्ञान की उत्पत्ति में स्मृति की अपेक्षा For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ५८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भावानुवादसहितम् ४५७ न्यायकन्दली For Private And Personal यार्थजत्वं तद्भावभावित्वान्निविकल्प ज्ञाने प्रतीयत इति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । विपक्षे यत् स्मृतिपूर्वकं तदप्रत्यक्षं यथानुमानज्ञानम्, स्मृतिपूर्वकं च सविकल्पक -ज्ञानमिति प्रतिपक्षानुमानमप्यस्तीति चेत्? प्रत्यक्षत्वं यदि क्वचिदवगतम्, तदा सविकल्पके तस्य न प्रतिषेधः, प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य । अथ निर्विकल्पके प्रतीतम्, तत् कथं प्रतीतम्? इन्द्रियार्थतद्भावभावित्वानुमानेनेति चेत्? हि प्रत्यक्षत्वप्रसाधकस्य तद्भावभावित्वानुमानस्य प्रामाण्याभ्युपगमे सति प्रत्यक्षत्व-प्रतिषेधकानुमानं प्रवृत्तं तद्विपरीतवृत्ति अश्रावण: शब्द इतिवत् तेनैव बाध्यते । एवं तावच्छब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः कल्पना न भवतीति । अर्थसंयोजनात्मिकापि विशिष्टग्राहिणी न कल्पना, विशेषणस्य विशेष्यस्य च तयोः सम्बन्धस्य च व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकभावस्य वास्तवत्वात् । अर्थावग्रहं विज्ञानम्, तदर्थेन्द्रियसन्निकर्षाद् यथाभूतोऽर्थस्तथोपजायते न त्वर्थे होती है एवं प्रत्यक्ष में नहीं होती है, उसी प्रकार और भी जिन ज्ञानों में स्मृति की अपेक्षा होगी वे प्रत्यक्ष नहीं हो सकते । सविकल्पक ज्ञान में भी ( वाचक शब्द की ) स्मृति अपेक्षित होती है, अतः वह भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । ( उ ० ) जिसका प्रतिषेध सविकल्पक ज्ञान में करते हैं वह प्रत्यक्षत्व कहीं पर ज्ञात है, या नहीं? यदि नहीं, तो फिर सविकल्पक ज्ञान में भी उसका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता ज्ञात रहती है उसी का कहीं प्रतिषेध भी किया जाता है । यदि इसका यह उत्तर देंगे कि ' यह प्रत्यक्षत्व निर्विकल्पक ज्ञान में ही ज्ञात है ' तो फिर यह पूछेंगे कि किस हेतु से आपने निर्विकल्पक ज्ञान में प्रत्यक्षत्व को समझा? यदि उसका यह उत्तर देंगे कि ' चूंकि निर्विकल्पक ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होता है अतः प्रत्यक्ष है ' तो फिर यह स्वीकृत ही हो जाता है कि ' इन्द्रियार्थजत्व हेतु से जो प्रत्यक्षत्व का अनुमान होता है वह प्रमाण है ' इसके बाद यदि कोई यह अनुमान करेगा कि ' इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न भी सविकल्पक ज्ञान प्रमाण नहीं है ' तो यह ' अभावणः शब्द ' इस अनुमान की तरह धर्मिग्राहक प्रमाण से ही बाधित हो जाएगा । अतः कल्पना ' शब्दसंयोजनात्मिका ' है इस पक्ष में भी सविकल्पक ज्ञान का प्रामाण्य खण्डित नहीं हो सकता । यदि कल्पना को अर्थ संयोजन रूप विशिष्ट विषयक ज्ञान से अभिन्न मानें तो भी सविकल्पक ज्ञान इस प्रकार की कल्पना रूप होने पर भी प्रमाण होगा ही, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान में विशेष्य, विशेषण और दोनों का व्यवच्छेद्य - व्यवच्छेदकभाव सम्बन्ध ये तीन वस्तुएँ भासित होती हैं, विशिष्ट ज्ञान के विषय ये तीनों हो विषय वास्तव हैं, आरोपित नहीं ( अतः सविकल्पक ज्ञान केवल विशिष्ट विषयक होने से ही अप्रमाण नहीं हो
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ४५८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-विचार्य प्रवर्त्तते । विशिष्टज्ञानं तु विचार इति । इदं विशेषणमिदं विशेष्यमय-मनयोः सम्बन्ध एषा च लोकस्थितिः । दण्डी पुरुषो न तु पुरुषी दण्ड इति विचार्य च प्रत्येकमेतानि पश्चादेकीकृत्य गृह्णाति दण्डी पुरुष इति । यद्यर्थस्य विशिष्टता वास्तवी प्रथममेव विशिष्टज्ञानं जायेत । न भवति चेत्? नास्य स्वरूपतो विशिष्टता, किं तूपाधिकृतेति विशिष्टताज्ञानं कल्पनेति चेत्? दुरूहितमिदमायुष्मता, आत्मा हि प्रत्येकं विशेषणादीन् गृहीत्वा ताननुसन्दधान इन्द्रियेणार्थस्य विशिष्टतां प्रत्येति न ज्ञानमचेतनम्, तस्य प्रतिसन्धानाशक्तेः, विरम्य व्यापराभावाच्च । अर्थो विशेषणसम्बन्धाद् विशिष्ट एव विशेषणादिग्रहणस्य सहकारिणोऽभावात् । प्रथममिन्द्रियेण न तथा गृह्यते, गृहीतेषु विशेषणादिषु गृह्यत इत्यर्थेन्द्रियजं तावद्विशिष्टज्ञानम् । यदि सकता ) | ( प्र ० ) इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान में अर्थ अपने वास्तविक रूप में ही भासित होता है । किन्तु वह विचार पूर्वक अपने विषय को प्रकाशित करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता । ' यह विशेषण है, यह विशेष्य है, यह उन दोनों का सम्बन्ध है ' इस प्रकार के विचार से ही तो ' विशिष्ट ज्ञान ' की उत्पत्ति होती है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान के सम्बन्ध में साधारण जनों की स्थिति इस प्रकार है कि ' दण्ड ही विशेषण है और पुरुष हो विशेष्य है, किन्तु इसके विपरीत लोक में यह व्यवहार नहीं है कि ' पुरुष ही विशेषण है और दण्ड ही विशेष्य है ' इस प्रकार के विचार के बाद दण्ड, पुरुष एवं दोनों के सम्बन्ध इन तीनों को एक ज्ञान में आरूढ़ कर ' दण्डी पुरुष: ' इत्यादि आकार की विशिष्ट प्रतीतियाँ होती हैं । ऐसी स्थिति में पुरुष की दण्डविशिष्टता अर्थात् अर्थ को विशिष्टता यदि वास्तव वस्तु हो तो फिर पहिले ही इन्द्रियपात होते ही ' विशिष्टबोध ' की ही उत्पत्ति होती, सो नहीं होती है, अतः समझना चाहिए कि विशेषण विशिष्टता अर्थ का स्वाभाविक धर्म नहीं है, किन्तु औपाधिक धर्म है ( जैसे कि जत्राकुमुम संनिहित स्फटिक का लौहित्य ) अतः विशिष्ट विषयक ज्ञान ( अर्थात् सविकल्पक ज्ञान ) प्रमा रूप नहीं है । ( उ ० ) यह तो आप की बड़ी ही विचित्र कल्पना है, क्योंकि आत्मा पहिले विशेषणादि को जानकर फिर उनकी स्मृति की सहायता से इन्द्रिय के द्वारा अर्थ की विशिष्टता का भी अनुभव करता है । यह सब काम ज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता क्योंकि वह अचेतन है एवं ( क्षणिक होने के कारण ) एक व्यापार के बाद दूसरे व्यापार की क्षमता भी ज्ञान में नहीं है । विशेषण से युक्त होने के कारण ही अर्थ ' विशिष्ट ' कहलाता है ( विशिष्ट रूप से गृहीत होने के कारण नहीं ) इन्द्रिय के प्रथम सम्पात के बाद ही जो विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती है । उसका कारण है विशेषण ज्ञान रूप सहकारि कारण का अभाव । इस स्थिति में यदि विशिष्ट बुद्धि रूप होने के अपराध से ही विशिष्ट ज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४५६ मुत्पद्यते, सद् द्रव्यं पृथिवी विषाणी शुक्लो गौर्गच्छतीति । रूपरसगन्धस्पर्शेष्वनेकद्रव्यसमवायात् स्वगतविशेषात् स्वाश्रयसन्नि इन्द्रियों के द्वारा रूप, रस, गन्ध और स्पर्श विषयक प्रत्यक्ष के उत्पादन के लिए इनमें से प्रत्येक के लिए नियमित चक्षुरादि तत्तत् इन्द्रिय, अनेक अवयवों से बने हुए द्रव्य में समवाय, रूपादि प्रत्येक में रहनेवाले रूपत्वादि असाधारण धर्म, एवं कथित रूपादि विषयों के आश्रयीभूत न्यायकन्दली विशिष्दज्ञानत्वादेवापराधात् प्रत्यक्षं न भवति दुःसमाधेयमित्युपरम्यते । रूपादिषु प्रत्यक्षोत्पत्तिकारणमाह - रूपरसेत्यादि । haara समवेतं द्रव्यमनेकद्रव्यम्, तत्र समवायात् । स्वगतो विशेषो रूपे रूपत्वं रसे रसत्वं गन्धे गन्धत्वं स्पर्श स्पर्शत्वं तस्मात् स्वाश्रयसन्निकर्षाद् रूपादीनां य आश्रयस्तस्य ग्राहकैरिन्द्रियैः सन्निकर्षान्नियतेन्द्रियनिमित्तं चक्षुर्निमित्तं रूपे, रसननिमित्तं रसे, घ्राणनिमित्तं गन्धे, त्वगिन्द्रियनिमित्तं स्पर्शे ज्ञानमुत्पद्यते । प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है तो फिर इस प्रश्न का समाधान कठिन है, अतः हम इससे विरत होते हैं । ' रूपरस ' इत्यादि पङ्क्ति के द्वारा रूपादि विषयों के प्रत्यक्ष के कारण कहे गये हैं । ( इस वाक्य के अनेकद्रव्यसमवायात् ' इस पद का ) ' अनेकेष्ववयवेषु समवेतं द्रव्यमनेकद्रव्यं तत्र समवायात् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनेक अवयवों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला ( द्रव्य ही ' अनेकद्रव्य ' शब्द का ) अर्थ है उसमें रूपादि का समवाय रूपादि के प्रत्यक्ष का कारण है | ( अर्थात् कथित ' अनेकद्रव्य ' में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले रूपादि का ही प्रत्यक्ष होता है अन्य रूपादि का नहीं ) रूप में रूपत्व, रस में रसत्व, गन्ध में गन्धत्व और स्पर्श में स्पर्शत्व ही प्रकृत ' स्वगतविशेष ' शब्द से अभि-प्रेत हैं, ये भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं । ' स्वाश्रयसंनिकर्ष ' से अर्थात् रूपादि के जो आश्रयद्रव्य हैं उनका अपने अपने ग्राहक इन्द्रियों के साथ जो संनिकर्ष उससे रूपादिका ) ' नियतेन्द्रियनिमित्त ' अर्थात् रूप में चक्षु स्वरूप निमित्त से, रस में रसने-न्द्रिय निमित्त से, गन्ध में घ्राण रूप निमित्त से, एवं स्पर्श में स्वक् रूप निमित्त से प्रत्यक्ष की उत्पत्ति होती है । चूंकि ' स्वगतविशेष ' अर्थात् रूपत्वादि धर्म भी क्रमशः रूपादि प्रत्यक्ष के कारण हैं, अतः ( रूप का प्रत्यक्ष चक्षु से ही हो, रस का प्रत्यक्ष रसनेन्द्रिय से ही हो इत्यादि प्रकार की ) व्यवच्छेदक न रहने के कारण व्यवस्थायें उपपन्न होती हैं । इन्द्रियों के साङ्कर्य की आपत्ति ऐसा न मानने पर कोई होगी । ' शब्दस्य त्रय-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४६० न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-कर्षान्नियतेन्द्रियनिमित्तमुत्पद्यते । शब्दस्य त्रयसन्निकर्षाच्छोत्रसमवेतस्य तेनैवोपलब्धिः । संख्यापरिमाणपृथक्त्व संयोगविभागपरत्वापरत्वस्नेह-तत्तत् द्रव्य में चक्षुरादि तत्तद् इन्द्रिय का सन्निकर्ष, इन तीन कारणों की और अपेक्षा होती है । श्रोत्र ( रूप आकाश ) में रहनेवाले शब्द का ही श्रोत्र रूप इन्द्रिय से प्रत्यक्ष होता है ( किन्तु ) इसमें आत्मा, मन और श्रोत्र रूप इन्द्रिय इन तीनों के ( दो ) सन्निकर्षों की भी अपेक्षा होती है । ( रूपादि प्रत्यक्ष में कांग्रेत आत्मादि चार वस्तुओं के तीन सन्निकर्षों की नहीं ) । संख्या परिमाण, पृथक्त्व, अपरत्व, स्नेह संयोग, विभाग, परत्व, न्यायकन्दली स्वगतविशेषाणां हेतुत्वाद् रूपादिष्विन्द्रियव्यवस्था, अन्यथा परिप्लवः स्याद् विशेषाभावात् । शब्दस्य त्रयराशिकर्षाच्छोत्रसमवेतस्य तेनैवोपलब्धिः । त्र्यसन्नि-कर्षादिति आत्ममनइन्द्रियाणां सत्रिकर्षो दशितः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षः श्रोत्रसमवेतस्येत्यनेनोक्तः । तेनैवोपलब्धिरिति श्रोत्रेणैवोपलब्यिरित्यर्थः । संख्यादीनां कर्मान्तानां प्रत्यक्षद्रव्यसमवेतानामाश्रयवच्चक्षुः स्पर्शनाभ्यां ग्रहणम् । कर्म प्रत्यक्षमिति न मृष्यामहे, गच्छति द्रव्ये संयोगदिभागातिरिक्तपदार्था-न्तरानुपलब्धेः । यस्त्वयं चलतीति प्रत्ययः स संयोगविभागानुमितक्रियालम्बन इति । तदसारम्, यदि कर्माप्रत्यक्ष विभागसंयोगाभ्यामनुभोयते तदा विभाग-संयोगोरुभयवृत्तित्वादाश्रयान्तरेऽपि कर्मानुमीयेत । न च मूलादग्रमग्राच्च मूलं गच्छति शाखामृगे तरावप्यनारतसंयोगविभागाधिकरणे चलतीति प्रत्यय उदयते । संनिकर्षात् ' इत्यादि वाक्य के ' त्रयसंनिकर्षात् ' इस पद के द्वारा आत्मा, मन और इन्द्रियों के संनिकर्ष ( प्रत्यक्ष के कारण रूप में ) दिखलाये गये हैं । एवं ' श्रोत्रसमवेतस्य ' इस पद के द्वारा ( शब्द प्रत्यक्ष के कारणीभूत ) इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष दिखलाया गया है । ‘ तेनैवोपलब्धि: ' अर्थात् श्रोत्र में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले शब्द का श्रोत्रे-न्द्रिय से ही प्रत्यक्ष होता है । प्रत्यक्ष के विषय द्रव्यों में रहनेवाले ' संख्यादीनां कर्मा-न्तानाम् ' अर्थात् संख्या से लेकर कर्मपर्यन्त ( संख्या परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, स्नेह, द्रवत्व, वेग और कर्म इन ग्यारह वस्तुओं का ) चक्षु और त्वचा इन दोनों इन्द्रियों से ग्रहण होता है । ( प्र ० ) हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि कर्म का भी प्रत्यक्ष होता है, क्योंकि द्रव्य के चलने पर ( उत्तर देश के साथ ) संयोग और ( पूर्व देश से ) विभाग इन दोनों से भिन्न किसी वस्तु की प्रतीति द्रव्य में नहीं होती है । द्रव्य में जो ' चलति ' इस प्रकार की For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४६१ यदि मतं योऽयं तरुमृगस्याकाशादिनापि संयोगस्तस्य तरुसमवेतात् कर्मणी निष्पत्त्यनवकल्पनान्न तरौ कर्मानुमानमिति कल्प्यताम्: तहि देशान्तरसंयोगार्थं तरुमृगेऽपि कर्मान्तरम्, तरौ तु कर्मकल्पना न निवर्तत एव । यदधिकरण कार्य तदधिकरणं कारणमित्युत्सर्गस्तस्यैकत्र व्यभिचारेऽन्यत्र क आश्वासः? शाखामृगसमवेतेन कर्मणा कल्पितेन शाखामृपस्य तरुणा देशान्तरेणापि रामं संयोगविभागयोरुत्पत्तेरुभयकर्म कल्पनानुपयोग इति चेत्? नैवम् प्रतिद्धं हि लिङ्ग यत्रोपलभ्यते तत्र प्रतिबन्धकमुपस्थापयतीत्येतावत्येवानुमानस्य सामग्री । प्रतीति होती है, वह कर्म विषयक अनुमिति रूप है, जिसकी उत्पत्ति उक्त संयोग और विभाग रूप हेतुओं से होती है । ( उ ० ) उक्त कथन में कुछ सार नहीं है, क्योंकि यदि कर्म का प्रत्यक्ष नहीं होता है एवं संयोग और विभाग से उसका अनुमान ही होता है तो फिर ( संयोग और विभाग तो उभयाश्रयी हैं ) वतः उनके दूसरे आश्रयों ( पूर्वदेश और उत्तर देशों ) में भी कर्म को अनुमिति होनी चाहिए ( मो नहीं होती है ), किन्तु वृक्ष में जिस समय मूलभाग से अग्रभाग की तरफ और अग्रभाग से मूलभाग की तरफ बन्दर दौड़ लगाता रहता है, उस समय ( संयोग और विभाग के दूसरे आश्रय ) वृक्ष में ' चलति ' यह प्रतीति भी नहीं होती । यदि यह कहें कि ( वृक्ष के साथ संयुक्त ) बन्दर का आकाशादि द्रव्यों के साथ भी तो संयोग है, सुतराम् वृक्ष में रहनेवाली क्रिया से उस संयोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, अतः वृक्ष में क्रिया का अनुमान नहीं हो सकता । ( प्र ० ) तो फिर आकाशादि दूसरे देशों के साथ वानर के संयोग और विभाग के लिए बन्दर में ही ( वृक्ष में कपि के संयोगादि के उत्पादक कर्म से भिन्न ) दूसरे कर्म की ही कल्पना कीजिए, ( उ ० ) इससे तो वृक्ष में क्रिया के अनुमान की निवृत्ति नहीं हो सकती । यह औत्सर्गिक नियम है कि कार्य के आश्रय में कारण को अवश्य ही रहना चाहिए । इस नियम में यदि यहाँ व्यभिचार हो ( अर्थात् कार्य के अधिकरण में कारण के न रहने पर या अन्यत्र रहने पर भी उस अधिकरण में कार्य की उत्पत्ति हो ) तो फिर दूसरे स्थानों में ( कार्य के अधिकरण में कारण के नियमतः रहने के नियम में ) कौन सा विश्वास रह जाएगा? ( प्र ० ) वानर में समवाय सम्बन्ध से अनुमित होनेवाली फिया के द्वारा ही वानर का पृक्ष के साथ एवं आकाशादि दूसरे देशों के साथ भी संयोग और विभाग दोनों की उत्पत्ति हो सकती है, अतः वानर में ( वृक्षगत संयोगादि-जनक एवं आकाशादिगत संयोगादि के जनक ) दो क्रियाओं की कल्पना का कोई उपयोग नहीं है । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं हो सकती, क्योंकि प्रतिबद्ध ( अर्थात् साध्य की व्याप्ति से युक्त ) जिस हेतु की उपलब्धि जिस पक्ष में होती है, उस पक्ष में वह हेतु ' प्रतिबन्धक ' को ( अर्थात् जिसका प्रतिबन्ध हेतु में है उस साध्य को ) अवश्य ही उपस्थित करेगा! उसमें साध्य की दूसरे प्रकार से उपपत्ति के द्वारा For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४६२ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्य म् न्यायकन्दली गुणे प्रत्यक्ष-तस्यार्थापत्तिवदन्यथोपपत्त्या कः परिभवः? न चेदं पुरुष इव चेतनं यत् प्रयो-जनानुरोधात् प्रवर्तते । यदि त्वेकस्य व्योमप्रदेशस्य संयोगविभागाः क्रियानु-मितिहेतवः कल्प्यन्ते? न शक्यं कल्पयितुम्, अतीन्द्रियव्योमाश्रयाणां विभाग-संयोगानामप्रत्यक्षत्वात् । भूगोलकप्रदेशविभागसंयोगसन्तानानुमेयत्वं गच्छतो वियति विहङ्गमस्य कर्म दुरधिगमं स्यात् । वियद्विततालोकनिवहविभागसंयोग-प्रवाहो यदि तस्य लिङ्गमिष्यते? अनिच्छतोऽप्यन्धकारे वायुदोषादेकस्मादुप-जातावयवकम्पस्य भुजाग्रं मे कम्पते भ्रूश्चलतीत्यदृष्टान्तः करणा-धिष्ठितत्वगिन्द्रियजा कर्मबुद्धिरनिबन्धना स्यात् । रात्रौ महामेघान्धकारे क्षणमात्रस्थायिन्यां विद्युति चलतीति प्रत्ययस्य का गतिः? बुद्धीत्यादि । आत्मसमवेतानां संयुक्तसमवायाद् ग्रहणम् । भावेति । कौन सी बाधा आएगी? जैसे कि अर्थापत्ति में साध्य की अन्यथा उपपत्ति के द्वारा बाधा आती है । क्योंकि पुरुष की तरह प्रमाण चेतन तो है नहीं कि वह प्रयोजन के अनुसार काम करेगा ( अचेतन वस्तु तो स्वभाव के अनुसार ही काम कर सकती है, अतः साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु पक्ष में साध्य को अवश्य ही उपस्थित करेगा, चाहे उस साध्य का उस पक्ष में दूसरे प्रकार से भी उपपत्ति सम्भव हो ) । यदि आकाश प्रदेश के संयोगों और विभागों को ही सभी क्रियाओं की अनुमिति का कारण मानें ( तो कदाचित् उपपत्ति हो सकती है, क्योंकि सभी मूर्त्त द्रव्यों का संयोग और विभाग आकाशादि मित्यद्रव्यों के साथ अवश्य रहता है ) । किन्तु यह कल्पना सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) आकाशादि अतीन्द्रिय हैं अतः उनमें रहनेवाले संयोग और विभाग भी अतीन्द्रिय हो होंगे, अतः उनके द्वारा कर्म का अनुमान यद्यपि नहीं हो सकता, फिर भी भूगोलक में विद्यमान संयोग और विभाग को ही कर्म का अनुमापक लिङ्ग मान सकते हैं ( इससे कर्म की अनुमिति उपपन्न होगी ) | ( उ ० ) इस हेतु के द्वारा आकाश में उड़ती हुई पक्षियों में विद्यमान क्रिया की अनुमिति न हो सकेगी, जिससे उक्त पक्षियों की क्रियाओं का ज्ञान ही कठिन हो जाएगा । यदि आकाश में फैले हुए आलोक रूप तेज ( द्रव्य ) में रहनेवाले संयोग को पक्षियों में रहनेवाले कर्म का अनुमापक हेतु मानेंगे तो भी रात में बिना इच्छा के भी वायु के दोष से उत्पन्न होनेवाले कम्प रूप कर्म की ' भुजानं मे कम्पते, भ्रूश्चलति ' इत्यादि आकार की जितनी भी प्रतीतियां अदृष्ट एवं अन्त: करण ( मन ) से अधिष्ठित त्वगिन्द्रिय से ( प्रत्यक्ष रूप ) उत्पन्न होती हैं, उनको विना कारण के ही स्वीकार करना पड़ेगा । एवं रात को बादल घिर जाने के कारण गाढ़ अन्धकार में जब बिजली कौंधती है उस समय उस क्षणिक विद्युत् में जो ' बिजली चलती ' है ' इत्यादि आकार की प्रतीतियाँ होती हैं उनके प्रसङ्ग में ही ( कर्म को प्रत्यक्ष न माननेवाले ) क्या उपाय करेंगे? ' बुद्धि ' इत्यादि पङ्क्ति का सार यह है कि आत्मा में समवाय सम्बन्ध से रहने-वालों का संयुक्तसमवाय सम्बन्ध के द्वारा प्रत्यक्ष होता है । ' भाव ' इत्यादि पङ्क्ति का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] द्रवत्ववेगकर्मणां भाषानुवादसहितत् प्रशस्तपादभाष्यम् प्रत्यक्षद्रव्यसमवायाच्चक्षुःस्पर्शनाभ्यां ४६३ ग्रहणम् । बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नानां द्वयोरात्ममनसोः संयोगादुपलब्धिः । द्रवत्व, वेग और क्रिया इन ग्यारह वस्तुओं का चक्षु और त्वचा इन दोनों इन्द्रियों से ग्रहण हो सकता है, ( किन्तु इनके उक्त प्रत्यक्ष के लिए ) प्रत्यक्ष हो सकनेधाले द्रव्यों में इनके समवाय का रहना भी आवश्यक है ( अर्थात् प्रत्यक्ष होनेवाले द्रव्य में रहनेवाले संख्यादि गुणों के ही प्रत्यक्ष हो सकते हैं, प्रत्यक्ष न होनेवाले द्रव्यों के संख्यादि के नहीं ) | बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष और प्रयत्न इन छः गुणों का आत्मा और मन इन दोनों के ही न्यायकन्दली सत्ताद्रव्यत्वादीनां सामान्यानामाश्रयो येनेन्द्रियेण गृह्यते तेनैव तानि गृह्यन्ते । तत्र संयोगाद् द्रव्यग्रहणम्, संयुक्तसमवायाद् गुणादिप्रतीतिः, संयुक्तसमवेतसमवा. याद् गुणत्वादिज्ञानम्, समवायाच्छब्दग्रहणम्, समवेतसमवायाच्छन्दत्वग्रहणम्, सम्बद्धविशेषणतया चाभावग्रहणमिति षोढा सन्निकर्षः । यत् संयुक्तसमवेतविशेष-णत्वेन रूपे रसाद्यभावग्रहणम्, या च संयुक्तसमवेतविशेषणविशेषणत्वेन रूपत्वे रसत्वाद्यभावप्रतीतिः, यश्च समवेतविशेषणतया ककारे खकाराद्यभावावगमः, यच्च समवेतसमवेतविशेषणतया गत्वे खत्वाद्य भादसंवेदनम्, तत् सर्वं सम्बद्ध-विशेषणभावेन संगृहीतम् । यह अभिप्राय है कि सत्ता द्रव्यत्व प्रभृति सामान्यों का प्रत्यक्ष उसी इन्द्रिय से होता है जिससे उनके आश्रयों का प्रत्यक्ष होता है । ( इन्द्रियों के निम्नलिखित छः संनिकर्षं प्रत्यक्ष के सम्पादक हैं ) जिनमें ( १ ) संयोग के द्वारा द्रव्य का प्रत्यक्ष होता है । ( २ ) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से गुणादि का ( अर्थात् द्रव्यसमवेत वस्तुओं का ) प्रत्यक्ष होता है । ( ३ ) गुणत्वादि का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेतसमवाय सम्बन्ध से होता है । केवल ( ४ ) समवाय सम्बन्ध से शब्द का प्रत्यक्ष होता है । ( ५ ) शब्दत्व का प्रत्यक्ष समवेत -समवाय सम्बन्ध से निष्पन्न होता है और ( ६ ) सम्बद्ध विशेषणता सम्बन्ध से अभाव का प्रत्यक्ष होता है । रूप में रसाभाव का प्रत्यक्ष ' संयुक्तसमवेतविशेषणता ' सम्बन्ध से, रूपत्व में रसत्वाभाव का प्रत्यक्ष ' संयुक्तसमवेत विशेषण ( समवेत ) विशेषणता सम्बन्ध से, ' क ' वर्ण में ' ख ' वर्ण के अभाव का प्रत्यक्ष ' समवेतविशेषणता ' से, एवं गत्व में खत्वाभाव का प्रत्यक्ष ' समवेतसमवेतविशेषणता ' सम्बन्ध से होता है, ये सभी विशेषणतायें कथित ' सम्बद्धविशेषणता ' शब्द के द्वारा संगृहीत होती हैं । For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् III प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir [ गुणे प्रत्यक्ष-योग्य हों । प्रत्यक्ष का ) उप-योगियों से भिन्न भाद्रव्यत्वगुणत्व कर्मत्वादीनामुपलभ्याधारसमवेतानामाश्रयग्राहकैरिन्द्रियै-र्ग्रहणमित्येतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम् । अस्मद्विशिष्टानां तु योगिनां संयोग से प्रत्यक्ष होता है । ( उन्हीं ) भाव ( सत्ता ) द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्म-त्वादि का प्रत्यक्ष उनके आश्रयीभूत वस्तुओं के ग्राहक इन्द्रियों से होता है, जिनके आश्रय प्रत्यक्ष के द्वारा ग्रहण के अपरे तु सर्वत्र यथासम्भवं संयोगसमवाययोरेव हेतुत्वादवान्तरसम्बन्ध-कल्पनां नेच्छन्ति, ईदृशो हि तेषां भावानां स्वभावो यदेषामन्यसन्निकर्षादेव ग्रहणम् । अतिप्रसङ्गश्च नास्ति, स्वाश्रयप्रत्यासत्ते नियामकत्वात । उपसंहरति- एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षमिति । अस्मदादीनामयोगिना-मित्यर्थः । योगिप्रत्यक्षमाह --- अस्मद्विशिष्टानां त्विति । योगः समाधिः । स द्विविध: -- सम्प्रज्ञातोऽसम्प्रज्ञातश्च । सम्प्रज्ञातो धारकेण प्रयत्नेन किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष के लिए ( १ ) संयोग और ( २ ) समवाय इन दो ही सम्बन्ध को आवश्यक मानते हैं एवं ( संयुक्त समवायादि ) अवान्तर सम्बन्ध की कल्पना को निरर्थक समझते हैं अर्थात् द्रव्य में चक्षु का जो संयोग है, उसीसे द्रव्य की तरह उसमें रहनेवाले सामान्य गुण एवं कर्मादि के भी बोध होंगे, एवं समवाय सम्बन्ध से शब्द एवं उसमें रहने वाले शब्दत्वादि सामान्यों का भी बोध होगा । कुछ वस्तुओं का यह स्वभाव स्वीकार करेंगे कि दूसरे के साथ के संनिकर्ष से भी उनका प्रत्यक्ष होता है । संयोग संनिकर्ष से यदि घटत्व या घट रूप का प्रत्यक्ष हो सकता है, तो फिर उसी सम्बन्ध से शब्द का भी प्रत्यक्ष हो ( क्योंकि दोनों में ही संयोग संनिकर्ष की असत्ता समान रूप से है ) इस पक्ष में उक्त अतिप्रसङ्गों की भी सम्भावना नहीं है, क्योंकि आश्रय में संनिकर्ष का रहना नियामक होगा ( अर्थात् इस पक्ष में ऐसा नियम है कि इन्द्रिय का संयोग संविक जिस द्रव्य के साथ रहेगा उसमें रहनेवाले सामान्य, गुण या कर्म का हो उस संयोग संनिकर्ष से भान होगा | शब्द के आश्रय आकाश रूप द्रव्य में चक्षु का प्रत्यक्षजनक सीनकर्ष नहीं है । इसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए ) । ' एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम् इस वाक्य के द्वारा ( अस्मदादि के संहार करते हैं । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' अस्मदादि ' शब्द का अर्थ है जीव | ' अस्मद्रिशिलानाम् ' इत्यादि संदर्भ के द्वारा योगियों के प्रत्यक्ष का निरूपण करते हैं । ' योग ' शब्द का अर्थ है समाधि । यह योग ( १ ) सम्प्रज्ञात और ( २ ) असम्प्रज्ञात भेद से दो प्रकार का है । धारक प्रयत्न के द्वारा आत्मा के किसी प्रदेश में नियोजित मन का और तत्वज्ञान की इच्छा से युक्त आत्मा का संयोग ही ' सम्प्रज्ञातयोग, है । वश किए हुए मन का बिना किसी विशेष अभिलाषा के पहिले ही विना विचारे हुए
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ५१ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४६५ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal युक्तानां योगजधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मान्तराकाशदिक्कालपरमाणु-वायुमनस्सु तत्समवेत गुणकर्मसामान्यविशेषेषु समवाये चावितथं स्वरूप-दर्शनमुत्पद्यते । वियुक्तानां पुनश्चतुष्टयसन्निकर्षाद् योगजधर्मानुग्रह-सामर्थ्यात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टेषु प्रत्यक्षमुत्पद्यते । ( १ ) युक्त और ( २ ) वियुक्त भेद से योगी दो प्रकार के हैं, उनमें ( हम लोग जैसे साधारण जनों से विलक्षण ) ' युक्तयोगियों ' को योगाभ्यास के द्वारा विशेष बलशाली मन से अपनी आत्मा, आकाश, दिक्, काल, परमाणु, वायु और मन एवं इन सबों में रहनेवाले गुण, कर्म, सामान्य, विशेष एवं समवाय प्रभृति पदार्थों के भी यथार्थ स्वरूप का प्रत्यक्ष होता है । किन्तु ( वियुक्त योगियों को ) आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन ( चारों के ) तीन संयोग से ही योग जनित धर्मरूप विशेष बल के कारण सूक्ष्म ( परमाण्वादि ), व्यवहित ( दीवाल प्रभृति से घिरे हुए वस्तु ) और बहुत दूर की वस्तुओं का भी प्रत्यक्ष होता है । क्वचिदात्मप्रदेशे वशीकृतस्य मनसस्तत्त्वबुभुत्साविशिष्टेनात्मना संयोगः । असम्प्रज्ञातश्च वशीकृतस्य मनसो निरभिसन्धिनिरभ्युत्थानात् क्वचिदात्मप्रदेशे संयोगः । तत्रायमुत्तरो मुमुक्षूणामविद्यासंस्कारविलयार्थमन्त्ये जन्मनि परिपच्यते, न धर्ममुपचिनोति, अभिसन्धिसहकारिविरहात् । नापि बाह्यं विषयमभिमुखी-करोति, आत्मन्येव परिणामात् । पूर्वस्तु योगोऽभिसन्धिसहायः प्रतनोति धर्मम् । यदर्थं तत्त्वबुभुत्साविशिष्टश्च तदर्थमुद्द्द्योतयति, इति तेन योगेन योगिनः च्युतयोगा अपि योग्यतया योगिन उच्यन्ते । न च तेषामप्रक्षीणमलावरणानां तदानीमतीन्द्रियार्थदर्शनमस्त्यत आह- युक्तानामिति । युक्तानां समाध्यवस्थितानां योगजधर्मानुगृहीतेन मनसा स्वात्मनि, किसी द्रव्य के साथ संयोग ही ' असम्प्रज्ञात ' योग है । इन दोनों योगों में अन्तिम योग अर्थात् असम्प्रज्ञात समधि का परिपाक मुमुक्षुओं को अन्तिम जन्म में होता है, जिससे संस्कार सहित अविद्या का विनाश हो जाता है । असम्प्रज्ञात समाधि से धर्म की उत्पत्ति नहीं होती है, क्योंकि धर्म का सहकारिकारण अभिलाषा या एषणा उस समय नहीं रहती है । उस समय किसी बाह्य विषय का भान भी नहीं होता है, क्योंकि उस समय अन्तःकरण केवल अपने स्वरूप से ही परिणत होता है । पहिला योग अर्थात् सम्प्रज्ञातयोग विषयों की अभिलाषा की सहायता से धर्म को उत्पन्न करता है, जिससे तत्त्वज्ञान की इच्छा से युक्त योगी को सभी विषय प्रतिभात होते हैं । अतः सम्प्रज्ञात समाधि से युक्त