प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 541–550

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 541–550

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-स्वात्मान्तरेषु स्वात्मन आत्मान्तरेषु परकीयेषु, आकाशे दिशि काले वायौ परमाणुमनस्सु तत्समवेतेषु गुणादिषु समवाये चावितथमविपर्यस्तं स्वरूप-दर्शनं भवति । अस्मदादिभिरात्मा सर्वदेवाहं ममेति कर्तृत्वस्वामित्वरूपसंभिन्नः प्रतीयते, उभयं चैतच्छरीराद्युपाधिकृतं रूपं न स्वाभाविकमत एव अहं ममेति, प्रत्ययो मिथ्यादृष्टिरिति गीयते सर्वप्रवादेषु विपरीतरूपग्राहकत्वात् ' । स्वाभाविकं तु यदस्य स्वरूपं तद्योगिभिरालोक्यते, यदा हि योगी वेदान्त-प्रवेदितमात्मस्वरूप महं तत्त्वतोऽनुजानीयामित्यभिसन्धानाद् बहिरिन्द्रियेभ्यो मनः प्रत्याहृत्य क्वचिदात्मदेशे नियम्यैकाग्रतयात्मानुचिन्तनमभ्यस्यति, तदास्य तत्त्वज्ञानसंवर्तकधर्माधानक्रमेणाहङ्कारममकारविनिर्मुक्तमात्मतत्त्वं स्फुटीभवति । यदा तु परात्माकाशकालादिबुभुत्सया तदनुचिन्तनप्रवाह -मभ्यस्यति, तदास्य परात्मादितत्त्वज्ञानानुगुणोऽचिन्त्यप्रभावो धर्म उपचीयते, तद्बलाच्चान्तःकरणं बहिः शरीरान्निर्गत्य परात्मादिभिः संयुज्यते । तेषु संयोगात्, संयुक्तसमवायात् तद्गुणादिषु, संयुक्तसमवेतसमवायात् योगी ( अपने लक्ष्य असम्प्रज्ञात से ) च्युत होने पर भी ' योग ' को अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की योग्यता के कारण ' योगी ' कहलाते हैं । सम्प्रज्ञात समाधि के समय योगियों के ( तत्त्व के ) आवरक मल की सत्ता सर्वथा क्षीण नहीं रहती है, अतः उन्हें अतीन्द्रिय अर्थों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । यही बात ' युक्तानाम् ' इत्यादि से कहा गया है । ' युक्तों ' को अर्थात् ' सम्प्रज्ञात ' समाधि से युक्त योगियों को इस योग से उत्पन्न धर्मं के अनुग्रह से युक्त मन के द्वारा अपनी आत्मा और अपनी आत्मा से भिन्न आत्माओं का अर्थात् अपनी आत्मा से भिन्न दूसरों की आत्माओं का, आकाश, काल, वायु, परमाणु और मन इन सबों का और इन सबों में रहनेवाले गुणादि और समवाय का ' अवितथ ' अर्थात् विपर्ययरहित ( यथार्थ ) ज्ञान होता है । अस्मदादि को आत्मा की प्रतीति कर्तृत्व एवं स्वामित्व रूप से ही बराबर होती है । म दोनों ही शरीर रूप उपाधि मूलक होने के कारण आत्मा के स्वाभाविक धर्म नहीं हैं । अत तन्मूलक ' अहम, मम ' इत्यादि आकार की आत्मा की सभी प्रतीतियाँ सभी मतों के अनुसार आत्मा के स्वरूप के विरुद्ध धर्मविषयक होने के कारण ' मिथ्यादृष्टि ' कही जाती हैं । आत्मा के स्वाभाविक स्वरूप को केवल योगिगण ही देख पाते हैं । जिस समय योगिगण उपनिषदों में कथित आत्मा के स्वरूप को ' मैं यथार्थ रूप से जानू " इस संकल्प के द्वारा बाह्य विषयों से मन को खींचकर आत्मा के किसी भी प्रदेश में लगाकर आत्मचिन्तन का अभ्यास करते हैं, उस समय तत्त्वज्ञान के सम्पादक धर्म के उत्पादन के क्रम से अहङ्कार और ममकार से विनिर्मुक्त आत्मा को तत्व प्रकाशित होता है । जिस समय दूसरे की आत्मा एवं कलादि वस्तुओं को जानने की इच्छा से उनके चिन्तन के प्रयास का अभ्यास योगिगण करते हैं, उस समय योगियों में वह उत्कृष्ट धर्म बढ़ने लगता है, जिसका प्रभाव हम For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम्! भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४६७ तद्गुणत्वादिषु सम्बद्धविशेषणभावेन समवायाभावयोर्ज्ञानं जनयति । दृष्टं तावत् समाहितेन मनसाऽभ्यस्यमानस्य विद्याशिल्पादेरज्ञातस्यापि ज्ञानम् । तदितरत्रानुमानम् । आत्माकाशादिष्वभ्यासप्रचयस्तत्त्वज्ञानहेतुः, विशिष्टाभ्या-सत्वात् विद्याशिल्पाद्यभ्यासवत् । तथा बुद्धेस्तारतम्यं क्वचिन्निरतिशयं सातिश-यत्वात् परिमाणतारतम्यवत् । ननु सन्ताप्यमानस्योदकस्यौष्ण्ये तारतम्यमस्ति न च तस्य सर्वातिशायो वह्निरूपतापत्तिलक्षण: प्रकर्षो दृश्यते । नापि लङ्घनाभ्यासस्य क्वचिद् विश्रान्तिर-वगता, न सोऽस्ति पुरुषो यः समुत्प्लवेन भुवनत्रयं लङ्घयति । उच्यते - यः स्थिरायो धर्मः स्वाश्रये च विशेषमारभते सोऽभ्यासः क्रमेण प्रकर्षपर्यन्तमासा-दयति । यथा कलधौतस्य पुटपाकप्रबन्धाहिता शुद्धिः परां रक्तसारताम् । न चोदकतापस्य स्थिर आश्रयो यत्रायमभ्यस्यमानः परां काष्ठां गच्छेत्, साधारण जनों की चिन्ता के भी बाहर है । उस धर्म के बल से अन्तःकरण उनके शरीर से बाहर होकर दूसरों की आत्मा प्रभृति वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होता है । ( दूसरों की आत्मा में ) अन्तःकरण के संयोग से दूसरी आत्मा का एवं ( उसी सयोग से युक्त ) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उस आत्मा में समवाय सम्बन्ध स रहनेवाले गुणादि का, एव संयुक्त - समवेतसमवाय सम्बन्ध से उन गुणादि में समवाय सम्बन्ध से रहनवाले गुणत्वादि धर्मा का एवं परात्मसम्बद्ध विशेषणतासम्बन्ध से उस आत्मा में रहनेवाले समवाय और अभाव का प्रत्यक्ष योगियों को होता है । क्योंकि पूर्व से सर्वथा अज्ञात विद्या एवं शिल्पादि ज्ञान का भी समाधि युक्त मन के द्वारा अभ्यास करने पर योगियों को होता है । इस प्रसङ्ग में इससे यह अनुमान फलित होता है कि जिस प्रकार विशेष प्रकार के अभ्यास से योगियों को विद्या शिल्पादि का ज्ञान देखा जाता है, उसी प्रकार विशेष प्रकार के अभ्यास के कारण उनको आकाश एवं दूसरे की आत्मा प्रभृति अतीन्द्रिय विषयों को भी प्रत्यक्ष होता है । एवं इसी प्रसङ्ग में यह दूसरा अनुमान प्रयोग भी है कि जैसे परिमाण के आधिक्य का विश्राम आकाश में एवं परिमाण की न्यूनता का विश्राम परमाणुओं में होता है, उसी प्रकार बुद्धि की विशदता का भी कहीं विश्राम अवश्य होगा ( वह आश्रय योगियों और परमेश्वर की बुद्धि ही है ) । ( १० ) आग पर चढ़े हुए जल की गर्मी में न्यूनाधिक भाव देखा जाता है, किन्तु उसके आधिक्य की पराकाष्ठा - जो प्रकृत में जल का आग में परिवर्तित हो जाना ही है- नहीं देखा जाता । एवं यह भी नियम नहीं है कि सभी की चरम विभान्ति हो ही, क्योंकि लङ्घन ( कुदना ) के अभ्यास की चरम परिणति नहीं देखी जाती । कोई भी पुरुष ऐसा उपलब्ध नही है जो कूदकर तीनों भुवनों को लाँघ सके । ( अतः उक्त अनुमान ठीक नहीं है ) । ( उ ० ) इसके उत्तर में कहना है कि स्थिर आश्रय में रहनेवाला जो धर्म है, वही अपन आश्रय में वैशिष्ट्यका सम्पादन कर सकता है, और उसी का अभ्यास क्रमशः चरम सीमा For Private And Personal

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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्य न्यायकन्दली ४६८ For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir गुण प्रत्यक्ष-ज्ञानों में छोड़े हुए अत्यन्ततापे सत्युदकपरिक्षयात् । नापि लङ्घनाभ्यासस्य स्वाश्रये विशेषा-धायकत्वमस्ति, निरन्वयविनष्टे पूर्वलङ्घने लङ्घनान्तरस्य बलान्तरात् प्रयत्ना-न्तरादध्यपूर्ववदुत्पत्तेः । अत एव त्रिचतुरोत्प्लवपरिश्रान्तस्य लङ्घनं पूर्वस्मादपचीयते, सामर्थ्य परिक्षयात् । बुद्धिस्तु स्थिराश्रया स्वाश्रये विशेष-माधत्ते, प्रथममगृहीतार्थस्य पुनः पुनरभ्यस्यमानस्य ग्रहणदर्शनात् । तस्याः पूर्वपूर्वाभ्यासाहिताधिकाधिकोत्तरोत्तरविशेषाधानक्रमेण दीर्घकालादरनंरन्तर्येण सेविताया योगजधर्मानुग्रहसमासादितशक्तेः प्रकर्षपर्यन्त प्राप्तिर्नानुपपत्तिमती । यत् पुनरत्रोक्तम्, योगिनोऽतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति, प्राणित्वात्, अस्मदादिवत् तद्यदि पुरुषमात्र पक्षीकृत्योक्तं तदा सिद्धसाधनम्, पुरुष-विशेषश्च परस्यासिद्धः, सिद्धश्चेद्धभिग्राहकप्रमाणविरुद्धमनुमानम् । अथोच्यते — प्रसङ्गसाधनमिदम्, प्रसङ्गसाधनं च न स्वपक्षसाधनायोपादीयते, किन्तु परस्यानिष्टापादनार्थम् । परानिष्टं च तदभ्युपगमसिद्धैरेव धर्मादिभिः तक हो सकता है । जैसे सुवर्ण में पुटपाक से आनेवाली शुद्धता स्वर्ण के पूर्ण रक्त वर्ण होने तक जाती हैं । जल की गर्मी का कोई स्थिर आश्रय नहीं है जहाँ किया गया उसका अभ्यास चरम सीमा तक हो सके क्योंकि अत्यन्त ताप के बाद तो जल का नाश ही हो जाता है । इसी तरह लङ्घन के अभ्यास में भी वह सामर्थ्य नहीं है, जिससे कि कूदने वाले में कूदने की विशेष क्षमता को उत्पन्न कर सके, क्योंकि एक लङ्घन के पूर्ण विनष्ट हो जाने पर ही पूर्ण दूसरे लङ्घन की उत्पत्ति दूसरे बल और प्रयत्न से होती है । यही कारण है कि तीन चार बार कुदने के बाद कूदनेवाले का सामर्थ्यं घट जाने कै कारण आगे का कूदना कुछ न्यून ही हो जाता है । किन्तु बुद्धि का आश्रय तो स्थिर है, अतः अभ्यास के द्वारा अपने आश्रय में वह ' विशेष ' का आधान कर सकती है, क्योंकि देखा जाता है कि जो विषय पूर्ण अज्ञात रहता है, अभ्यास से उसका भी विशेष प्रकार का ज्ञान होता है । अतः योगजनित धर्म के अनुग्रह प्रकर्ष की अत्यन्त उत्कृष्ट परिणति होने में कोई बाधा से विशेष शक्तिशालिनी बुद्धि के नहीं है । क्योंकि वह उसके पहिले पहिले के अभ्यास से आगे आगे के विशेष का आधान करती रहती है, यदि बहुत दिनों तक बिना बीच में आदर पूर्वक उसकी सेवा की जाय । जो सम्प्रदाय ( मीमांसक लोग ) यह अनुमान उपस्थित करते हैं कि ( प्र ० ) योगीगण भी हमलोगों की तरह प्राणी हैं, अतः वे भी अतीन्द्रिय विषयों को नहीं देख सकते । ( उ ० ) उनसे इस प्रसङ्ग में पूछना है कि इस अनुमान में सभी पुरुष पक्ष हैं या विशेष प्रकार के पुरुष? यदि सभी पुरुषों को पक्ष करें तो उक्त अनुमान में सिद्धसाधन

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली II शक्यमापादयितुम् । तत्र प्रमाणेन स्वप्रतीतिरनपेक्षणीया, नह्येवं परः प्रत्यवस्था-तुमर्हति ' तवा सिद्धा धर्मादयो नाहं स्वसिद्धेष्वपि तेषु प्रतिपद्ये, इति । अन ब्रूमः - किं प्रसङ्गसाधनमनुमानं तदन्यद्वा? यद्यन्यत् क्वाप्युक्तलक्षणेषु प्रमाणेष्वन्तर्भावो वर्णनीयः, वक्तव्यं वा लक्षणान्तरम् । यदि त्वनुमानमेव, तदा स्वप्रतीतिपूर्वकमेव प्रवर्त्तते, स्वनिश्चयवदन्येषां निश्वयोत्पिपादयिषया सर्वस्य परार्थानुमानस्य प्रवृत्तेः । अन्यथा गगनकमलं सुरभि, कमलत्वात्, क्रीडासरः कमलव-दोष होगा, क्योंकि सभी पुरुषों को अतीन्द्रिय अर्थों का द्रष्टा तो कोई भी नहीं मानता । यदि विशेष प्रकार के पुरुष में अतीन्द्रियार्थ दर्शन के अभाव की सिद्धि करना चाहते हैं तो फिर इसमें आपके मत से पक्षासिद्धि होगी, क्योंकि पक्ष का उसके असाधारण धर्म के साथ निश्चित रहना अनुमान के लिए आवश्यक है । मीमांसकों के मत में ' विशेष प्रकार के पुरुष सिद्ध नहीं हैं । यदि उनकी सिद्धि करना चाहेंगे तो उस ( धर्मितावच्छेदकविशिष्ट ) धर्मी के ग्राहक प्रमाण से हो योगियों में अतीन्द्रियार्थं दर्शनरूप ' विशेष ' की भी सिद्धि हो जाएगी, जिससे उक्त अनुमान बाधित हो जाएगा । यदि यह कहें कि ( ० ) ( उक्त अनुमान तो ) प्रसङ्ग ( आपत्ति ) साधन के लिए है । प्रसङ्ग के साधन का उपन्यास तो दूसरों के मत के खण्डन के लिए ही किया जाता है, अपने मत के साधन के लिए नहीं, दूसरों ( प्रतिपक्षी ) के अनभिमत धर्मों की आपत्ति तो उनके मत से सिद्ध धर्मादि के द्वारा भी दी जा सकती है । यह आवश्यक नहीं है कि जिसकी आपत्ति देनी है उसके विषयों को अपने मत के अनुसार प्रमाणों के द्वारा भी सिद्ध होना ही चाहिए क्योंकि प्रतिपक्षी यह आरोप कर ही नहीं सकते कि तुम्हारे मत के अनुसार जिन धर्मों की उपपत्ति नहीं हो सकती, उन धर्मों की केवल अपने मत से सिद्ध पदार्थों में प्रतीति मुझे नहीं होती । ( उ ) इस प्रसङ्ग में हम ( सिद्धान्तियों ) लोगों का कहना है कि जिसे आप ' प्रसङ्गसाधन ' कहते हैं, वह अनुमान ही है या और कुछ? यदि अनुमान नहीं है, तो फिर कथित प्रमाणों में ही उसका अन्तर्भाव करना होगा या फिर इसके लिए कोई दूसरा ही लक्षण करना पड़ेगा? यदि अनुमान ही है तो फिर पहिले उसके विषयों का ज्ञान अवश्य चाहिए | क्योंकि इस स्वज्ञान के द्वारा हो अनुमान की उत्पत्ति होती है । सभी परार्थानुमानों में इच्छा से ही प्रवृत्ति होती है । जो कोई भी परार्थानुमान में प्रवृत्त होता है, सबकी यही इच्छा रहती है कि मेरे सदृश ज्ञान का उत्पादन बोद्धा में हो । अन्यथा ( यदि पक्षतावच्छेदक रूप से पक्ष का उभय-सिद्ध ज्ञान न रहने पर भी अनुमान प्रमाण हो तो ) यदि कोई परार्थानुमान का प्रयोग करनेवाला पुरुष कमल की उत्पत्ति गगन में मानकर इस अनुमान का प्रयोग करे कि गगन का कमल सरोवर के कमल की तरह ही सुगन्धित है, क्योंकि वह भी कमल है ', तो इसे भी प्रमाण मानना पड़ेगा । ( अतः ' योगिनो अतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति For Private And Personal

पृष्ठ 545

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे प्रत्यक्ष-दित्यस्यापि प्रतिपादकाभ्युपगत सिद्धाश्र प्रामाण्योपपत्तिः । सन्दिग्ध-व्याप्तयश्च प्राणित्वादयः । यदि विवादाध्यासितस्य पुरुषधौरेयस्य प्राणित्वा-दिकमपि भवेत् सर्वज्ञत्वमपि स्यात्, कैवात्रानुपपत्तिः? नहि तयोः कश्चिद् विरोधः प्रतीक्षितः, सर्वज्ञताया प्रमाणान्तरागोचरत्वात् । प्राणित्वादेरसर्वज्ञतया सहभा वस्तु सन्दिग्धः किमस्मदादीनां प्राणित्वाद्यनुबन्धिनीयम सर्वज्ञता? कि वा सर्वज्ञानकारणत्वेनावगतस्य योगजधर्मस्याभावकृतेति न शक्यते निर्धारयितुम् । अतोऽनवधारितव्याप्तिकं प्राणित्वादिकम्, न तदनुमानसमर्थम् । अतीन्द्रियज्ञान-कारणं योगजो धर्म इति न सिद्धम्, कुतस्तदभावादस्मदादीनाम सर्वज्ञताशङ्कयेत, अस्माकं तावत्सिद्धं तेनेदमाशङ्कयते ततश्च नोभयसिद्धा व्याप्तिः, कुतोऽनुमानम्? युक्तानां प्रत्यक्षं व्याख्याय वियुक्तानां व्याचष्टे - वियुक्तानां पुनरिति । अत्यन्त योगाभ्यासोपचितधर्मातिशया असमाध्यवस्थिता अपि येऽतीन्द्रियं इत्यादि अनुमान प्रमाण नहीं हो सकते ) । दूसरी बात यह है कि इस अनुमान के प्राणि-त्वादि हेतु में व्याप्ति सन्दिग्ध है ( निश्चित नहीं, प्राणी सर्वज्ञ न हो, इसका कोई निश्चय नहीं है ) । अतः पुरुष श्रेष्ठ ( योगी ) प्राणी भी हो सकते हैं और सर्वज्ञ भी हो सकते हैं, इसमें कौन सी अनुपपत्ति है? क्योंकि प्राणित्व और सवज्ञत्व इन दोनों में कोई परस्पर विरोध पहिले से निश्चित नहीं है । ( आपके मत से ) सर्वज्ञता किसी दूसरे प्रमाण से सिद्ध नहीं है । हम लोगों की तरह प्राणियों में जो प्राणित्व और असर्व-ज्ञत्व दोनों का सहभाव देखा जाता है, उससे यह निश्चय नहीं कर सकते कि हम लोग प्राणी हैं, इसीलिए असर्वज्ञ हैं या हम लोगों में योग से उत्पन्न होनेवाला और सर्व-ज्ञता को उत्पन्न करनेवाला वह उत्कृष्ट धर्म नहीं है, इस कारण असर्वज्ञ हैं । अतः कथित प्राणित्व हेतु — जिसमें कि असर्वज्ञता की व्याप्ति निश्चित नहीं है -- उक्त अनुमान का सम्पादन नहीं कर सकता । ' योग से उत्पन्न धर्म के द्वारा अतीन्द्रिय विषयों का ज्ञान उत्पन्न होता है ' यह आपके मत से निश्चित नहीं है, अतः आप किस प्रकार यह आशङ्का करते हैं कि हमलोगों में चूंकि योगज धर्म नहीं है, अतः हम लोग असवंज्ञ हैं । एवं हम लोगों को यह निश्चित है कि ' योग - जनित धर्म के ज्ञान से अतीन्द्रिय ज्ञान की उत्पत्ति होती है ' अतः हम लोगों की यह शङ्का ठीक है कि ' हम लोगों में चूंकि योगज उत्कृष्ट धर्म नहीं है, अतः हम लोग असर्वज्ञ हैं ' अतः आपके हेतु में अन्वय और व्यतिरेक दोनों से हो व्याप्ति असिद्ध है, अतः उससे अनुमान किस प्रकार हो सकता है? युक्त योगियों के प्रत्यक्ष के बाद ' वियुक्त ' योगियों के प्रत्यक्ष की व्याख्या ' वियुक्तानां पुनः ' इत्यादि ग्रन्थ से की गयी है । वे ही ' वियुक्तयोगी ' हैं जो समाधि अवस्था में न होते हुए भी अत्यन्त योगाभ्यास के कारण अतीन्द्रिय वस्तुओं को भी देख सकते हैं । उन्हें ' चतुष्टयसंनिकर्ष ' अर्थात् आत्मा, मन इन्द्रिय और विषय इन चार वस्तुओं के संनिकर्ष से योगजधर्म के अनुग्रह से प्राप्त विशेष सामर्थ्य के द्वारा For Private And Personal

पृष्ठ 546

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४७१ तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपालोचनमात्रं प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रमेया पदार्थाः, प्रमितिर्द्रव्यादिविषयं द्रव्यादयः प्रमतित्मा, ज्ञानम् । जिस समय सत्तारूप ( सामान्य ) एवं ( द्रव्यत्वादिरूप ) विशेष विषयों का स्वरूपालोचन ( निर्विकल्पक ) ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण है ( उस समय ) द्रव्यादि पदार्थ प्रमेय हैं । आत्मा प्रमाता है । द्रव्यादि विषयक न्यायकन्दली पश्यन्ति ते वियुक्ताः तेषामभिमुखीभूतनिखिलविषयग्रामाणामप्रतिहतकारण-गणानां चतुष्टयसन्निकर्षादात्ममन इन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् योगजधर्मानुग्रहसह-कारितात् तत्सामर्थ्यात् सूक्ष्मेषु मनःपरमाणुप्रभृतिषु व्यवहितेषु नागभुवनादिषु विप्रकृष्टेषु ब्रह्मभुवनादिषु प्रत्यक्षमुत्पद्यते ज्ञानम् । एवं तावद्वयाख्यातं प्रत्यक्षम्, सम्प्रति प्रमाणफलं विभजते - तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपालोचनमात्रं प्रत्यक्षमिति । सामान्यं सत्ता, द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादिकं विशेषा व्यक्तयः, तेषु स्वरूपालोचनमात्रं स्वरूपग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रमाणम्, प्रमायां साधकतमत्वात् । साधकतमत्वं च तस्मिन् सति प्रमित्सोर्भवत्येवेत्यतिशयः, प्रमातरि प्रमेये च सति प्रमा भवति, न तु भवत्येव प्रमाणे तु निर्विकल्पके अपने सामने के सभी वस्तुओं और उनके सभी कारणों का एवं सूक्ष्म विपयों " का अर्थात् मन एवं परमाणु प्रभृति विषयों का, एवं ' व्यवहित विषयों ' का अर्थात् नागलोकादि का, एवं ' विप्रकृष्ट ' विषयों का अर्थात् ब्रह्मलोक प्रभृति का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । इस प्रकार प्रत्यक्ष की व्याख्या हो गयी । अब ' तत्र सामान्यविशेषेषु स्वरूपा -लोचनमा प्रत्यक्षम् ' इत्यादि से प्रत्यक्ष प्रमाण कौन है? और उस ( करण ) का फल कौन है? इसका विभाग करते हैं । ( उक्त वाक्य के ) ' सामान्य ' शब्द से सत्ता, द्रव्यत्व, कर्मव प्रभृति को समझना चाहिए । ' विशेष ' शब्द से ( उक्त सामान्य के आश्रय ) व्यक्तियों को समझना चाहिए । इन सत्रों में ' स्वरूपालोचनमात्र, अर्थात् स्वरूप का ग्रहणमात्र फलतः निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि प्रकृति मे वही ( उन विषयों के सविकल्पक ज्ञानरूप ) प्रमा का सबसे निकट साधक ( साधकतम ) है । वह साधकतम इस लिए है कि उसके रहने पर उक्त प्रमाज्ञान के इच्छुक पुरुष को उक्त सविकल्पक ज्ञानरूप प्रमा अवश्य होती है । प्रमा के और करणों से उसमें यही ' विशेष ' है । प्रमाता, प्रमेय प्रभृति साधनों के रहते हुए भी प्रमाज्ञान की उत्पत्ति For Private And Personal

पृष्ठ 547

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्य विशेषज्ञानोत्पत्तावविभक्तमालोचनमात्रं प्रत्यक्षं [ गुणे प्रत्यक्ष-प्रमाणम्, प्रत्यक्षात्मक ज्ञान ही ( उक्त प्रत्यक्ष प्रमाण की फलरूप ) प्रमिति है । जिस समय उक्त ( सत्तारूप ) सामान्य और ( द्रव्यत्वादि ) विशेष विषयक निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रमितिरूप से ( फलरूप ) इष्ट हो, उस समय अर्थोऽनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) केवल ' आलोचन ( आलोच्यते ज्ञायते अर्थात् ( ज्ञान से न्यायकन्दली विशेषणज्ञानादिलक्षणे विशेष्यज्ञानादिलक्षणा प्रमा भवत्येवेत्यतिशयः । प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः, द्रव्यादयश्चत्वारः पदार्थाः प्रमेयाः प्रमितिविषयाः प्रमितौ जातायां तेषु हानादिव्यवहारः प्रवर्त्तत इत्यर्थः । प्रमाता आत्मा, बोधाश्रयत्वात् । प्रमितिद्रव्यादिविषयं ज्ञानम्, यदा निर्विकल्पकं सामान्य-विशेषज्ञानं प्रमाणम्, तदा द्रव्यादिविषयं विशिष्टं ज्ञानं प्रमितिरित्यर्थः । यदा निर्विकल्पकं सामान्य विशेषज्ञानमपि प्रमारूपमर्थप्रतीतिरूपत्वात्, तदा तदुत्पत्तावविभक्तमालोचनमात्रं प्रत्यक्षम् । आलोच्यतेऽनेनेत्यालोचन-मिन्द्रियार्थसन्निकर्षस्तन्मात्रम् | अविभक्तं केवलं ज्ञानानपेक्षमिति यावत् । सामान्यविशेषज्ञानोत्पत्तौ प्रमाणम्, विशेष्यज्ञानोत्पत्तावपीन्द्रियार्थसन्निकर्षः यद्यपि होती है, किन्तु होती ही नहीं है । विशेषणज्ञान रूप निर्विकल्पक ज्ञान के रहने पर ( विशेषणविशिष्ट ) विशेष्य ज्ञानरूप प्रमा अवश्य होती है, अतः वही प्रमाण ( अर्थात् प्रमा का साधकतम ) है । यही और कारणों से इसमें ' विशेष ' है । ' प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः ' अर्थात् द्रव्यादि ( द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य ये ) चार पदार्थ प्रत्यक्ष के ' प्रमेय ' हैं, अर्थात् प्रमाज्ञान के विषय हैं । अभिप्राय यह है कि ( उक्त विशिष्ट ) प्रमाज्ञान के होने पर ही हानोपानादि के व्यवहार होते हैं । आत्मा प्रमा ज्ञान का आश्रय है, अतः वह ' प्रमाता ' है । प्रमिति है द्रव्यादिविषयक ज्ञान । अभिप्राय यह है कि जिस समय सामान्य और विशेष का निर्विकल्पक ज्ञान प्रमाण है, उस समय द्रव्यादि विषयक विशिष्ट ( सविकल्पक ) ज्ञान ही फलरूपा प्रमिति है । जिस सामान्य और विशेष विषयक निर्विकल्पक ज्ञान को ही अर्थ की प्रतीति रूप होने के कारण ( फलरूप प्रमा मानते हैं, उस समय उस प्रमा ज्ञान की उत्पत्ति में अविभक्त आलोचन मात्र ' हो प्रत्यक्ष प्रमाण है । ' आलोच्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इस वाक्य के ' आलोचन ' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष । ' तन्मात्रमविभक्तम् ' अर्थात् ज्ञान से अनपेक्ष केवल इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही सामान्य विशेष विषयक ( निर्विकल्पक ) ज्ञान का ( उत्पा-For Private And Personal

पृष्ठ 548

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६० www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ४७३ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal अस्मिन्नान्यत् प्रमाणान्तरमस्ति, अफलरूपत्वात् । अनपेक्ष ) इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि वहाँ ज्ञानादि कोई दूसरा प्रमाण उपस्थित नहीं है । एवं यह ज्ञान निर्विकल्पक होने के कारण किसी ज्ञानरूप प्रमाण का फल भी नहीं है, इस हेतु से भी उक्त निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमिति के पक्ष में उक्त आलोचनरूप इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्रमाणं भवत्येव प्रमाहेतुत्वात्, किन्तु विशेषणज्ञानसहकारितया न केवलः, सामान्यविशेषज्ञानोत्पत्तौ तु ज्ञानानपेक्षः केवल एवेत्यभिप्रायः । सन्निकर्षमात्रमिह प्रमाणं न ज्ञानमित्यत्रोपपत्तिमाह - न तस्मिन्निति सामान्यविशेषज्ञाने नान्यत् प्रमाणं ज्ञानरूपमस्ति सामान्यविशेषज्ञानस्या-फलरूपत्वात् ज्ञानफलत्वाभावात् । विशेष्यज्ञानं हि विशेषणज्ञानस्य फलम्, विशेषण-ज्ञानं न ज्ञानान्तरफलम्, अनवस्थाप्रसङ्गात् । अतो विशेषणज्ञाने इन्द्रियार्थसन्नि-कर्षमात्रमेव प्रमाणमित्यर्थः । यदा निर्विकल्पकं सामान्यविशेषज्ञानं फलं तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रमाणम्, यदा विशेष्यज्ञानं फलं तदा सामान्यविशेषालोचनं दक करण ) प्रमाण है ( अर्थात् जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान फल रूप है उस समय इन्द्रियार्थ संनिकर्ष प्रमाण है ) । विशेष्य ( विशिष्ट ) ज्ञान की उत्पत्ति में भी इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष उक्त ज्ञान का कारण होने से ( यद्यपि ) प्रमाण है ही, फिर भी विशिष्ट ज्ञानरूप कार्य के उत्पादन के लिए उसे विशेषण ज्ञान ( निर्विकल्पक ज्ञान ) की भी अपेक्षा होती है, अतः केवल वही विशिष्ट ज्ञान का करण ( प्रमाण ) नहीं है । किन्तु सामान्य विशेषज्ञान ( निर्विकल्पक ज्ञान ) के उत्पादन में उसे दूसरे किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अतः वहाँ वह ' केवल ' अर्थात् ज्ञान से अनपेक्ष होकर ( प्रमा का उत्पादक करण ) प्रमाण है । ' न तस्मिन् ' इत्यादि ग्रन्थ से यह उपपादन करते हैं कि निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा के उत्पादन में केवल इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही क्यों करण है? कोई ज्ञान उसका करण क्यों नहीं है? अभिप्राय यह है कि कोई ज्ञान निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा का उत्पादक करण ( प्रमाण ) नहीं है, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान ' अफल रूप हैं ' अर्थात् किसी ज्ञान का फल नहीं है । विशिष्ट ज्ञान ( विशेष्य ज्ञान ) तो विशेषण ज्ञान ( निर्विकल्पक ज्ञान ) का फल है, किन्तु निर्विकल्पक ज्ञान ( विशेषण ज्ञान ) किसी ज्ञानरूप करण का फल नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर अनवस्था हो जाएगी । यही कारण है निर्विकल्पक ( विशेषण ) प्रमा का, इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल करण है । फलितार्थ यह है कि जिस समय निर्विकल्पकरूप सामान्य और विशेष का ज्ञान फल है, उस समय इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल प्रमाण है. एवं जिस समय विशेष्य

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ४७४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-प्रशस्तपादभाष्यम् अथवा सर्वेषु पदार्थेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षादवितथमव्यपदेश्यं अथवा आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन चारों के ( तीन ) सम्प्रयोग से जिस किसी भी वस्तु विषयक अव्यपदेश्य अर्थात् शब्दाजन्य यथार्थ ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । एवं द्रव्यादि पदार्थ ( इस प्रमाण के ) प्रमेय हैं । एवं आत्मा प्रमाता है । न्यायकन्दली प्रमाणमित्युक्तं तावत् । सम्प्रति हानादिबुद्धीनां फलत्वे विशेष्यज्ञानं प्रमाण-मित्याह – अथवेति । सर्वेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षात् चतुष्टयग्रहण-मुदाहरणार्थम् । द्वयसन्निकर्षात् त्र्यसन्निकर्षादवितथं संशयविपर्ययरहितमव्यपदेश्यं व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यं न व्यपदेश्यमव्यपदेश्यं शब्दाजन्यं यद् विज्ञानं जायते तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम् । संशयो ह्यनवस्थितोभयधर्मतया पदार्थमुपद व्यवस्थि-तैकधर्माणं प्रापयति, अन्यथाध्यवसायो वितथ एवेत्यवितथपदेन व्युदस्यन्ति । अव्युत्पन्नस्य सन्निहितेऽर्थे व्याप्रियमाणे चक्षुषि शब्दश्रवणानन्तरं यद् गौरिति ज्ञानं जायते तत्राक्षमपि कारणम्, अन्यथा रेखोपरेखत्वादिविशेषप्रतीत्ययोगात् । ( विशिष्ट ) ज्ञान ही फलरूप से अभिप्रेत है, उस समय सामान्य और विशेष का आलोचन ( निर्विकल्पक ) ज्ञान ही प्रमाण है । ' अथवा ' इत्यादि ग्रन्थ से अब यह कहते हैं कि हानादि बुद्धि को अगर फल मानें तो विशिष्ट ज्ञान ही प्रमाण है । ' सर्वपदार्थेषु चतुष्टयसंनिकर्षात् ' इस वाक्य में ' चतुष्टय ' पद का प्रयोग केवल उदाहरण दिखाने के लिए है, अतः दो के संनिकर्ष से या तीन के संनिकर्ष से भी उत्पन्न ' अवितथ ' अर्थात् संशय और विपर्यय से भिन्न ' अव्यपदेश्य ' ( अर्थात् ' व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यम्, न व्यपदेश्यमव्यपदेश्यम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) शब्द से अनुत्पन्न उक्त प्रकार का ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । जिन दो रूपों से संशय के द्वारा एक ही विषय उपस्थित होता है, बाद में उनमें से एक रूप से निश्चित अर्थ की प्राप्ति का प्रयोजक होने से उपादान बुद्धिरूप प्रमिति के करणरूप संशय प्रमाण कोटि में यद्यपि आ सकता है, किन्तु संशय उस एक वस्तु को भी अनिश्चितरूप से ही उपस्थित करता है, इस प्रकार संशय ' वितथ ' ही है, अवितथ नहीं । ' अन्यथाध्यवसाय ' अर्थात् विपर्यय तो ' वितथ ' है ही । इस प्रकार ' अवितथ ' पद से संशय और विपर्ययरूप सभी मिथ्या ज्ञानों की व्यावृत्ति होती है । ( गो में गोशब्दवाच्यत्व विषयक ज्ञानरूप ) व्युत्पत्तिजिस पुरुष को नहीं है, उसका चक्षु जिस समय गोरूप पिण्ड में व्याप्त रहता है उसी समय ' अयं गो: ' इस वाक्य के द्वारा जो उसे ' गौ: ' इस प्रकार का शाब्द ज्ञान होता है, उसकी व्यावृत्ति के लिए ही ' अव्यपदेश्य ' पद दिया गया है । इस ज्ञान के प्रति यद्यपि चक्षु भी कारण है, उस व्यक्ति को गो की छोटी बड़ी रेखाओं का ज्ञान न हो सकेगा, यदि ऐसा न हो तो फिर भी वह ज्ञान For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४७५ यज्ज्ञानमुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम्, प्रमेया द्रव्यादयः पदार्थाः, प्रमातात्मा, प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनमिति ॥ एवं उन विषयों में उपादेयत्व या हेयत्व अथवा उपेक्षा की बुद्धि ही प्रमिति है । न्यायकन्दली न च तत् प्रत्यक्षम्, अनन्तरभाविनः शब्दस्यैव तदुत्पत्तौ साधकतमत्वादिन्द्रि यस्यापि तत्सहकारितामात्रत्वात् । तथापि पृष्टो व्यपदिशति -- अनेन समाख्यातम्, न पुनरेवमभिधत्ते - - प्रत्यक्षो मया प्रतीतं गौरयमिति तस्य व्यवच्छेदार्थ मुक्त-मव्यपदेश्यमिति । प्रमितिर्गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् । गुणदर्शनमुपादेयत्वज्ञानम्, दोषदर्शनं हेयत्वज्ञानम्ः माध्यस्थ्यदर्शनं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः, पदार्थस्वरूपबोधे सत्युपकारादिस्मरणात् । सुखसाधनत्वादिविनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवत् पदार्थस्वरूपबोधस्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामवान्तरव्यापार-त्वात् । यथोक्तम्--" अन्तराले तु यस्तत्र व्यापारः कारकस्य सः " इति । प्रत्यक्षरूप नहीं है, क्योंकि शब्द ही उस प्रमा का ' साधकतम ' करण है, इतना ही विशेष है । कि इन्द्रिय भी उस ज्ञान का सहकारिकारण है । इसीलिए पूछने पर वह व्यक्ति यह कहता है कि ' उसने कहा है कि यह गो है ' वह यह नहीं कहता, मैंने प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है कि ' यह गो है ' । ' प्रमितिगुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् ' | ' यह ग्रहण के योग्य है ' इस आकार का ( उपा देयत्व ) ज्ञान हो ' गुणदर्शन ' है । ' यह त्याग के योग्य है ' इस प्रकार का ( हेयत्व ) ज्ञान ही ' दोषदर्शन ' है । ' न इसके लेने से कुछ होगा न छोड़ने से ' इस प्रकार का ज्ञान हो ' माध्यस्थ्यदर्शन ' है । ये ज्ञान ही ( विशिष्ट ज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमाण से उत्पन्न होने-वाली ) प्रमितियाँ हैं, क्योंकि उक्त हेयत्व या उपादेयत्व का ज्ञान पदार्थ के स्वरूप विषयक बोध ( विशिष्टज्ञान ) का ही फल है, सुख के स्मरण का नहीं, क्योंकि सुखादि की स्मृतियाँ तो बीच के व्यापार हैं । ( विशिष्ट ज्ञान से हेयत्वादि ज्ञान के उत्पादन का यह क्रम है कि ) पदार्थों के स्वरूप का ज्ञान ( विशिष्ट ज्ञान ) होने पर उस ज्ञान के विषय में ' यह सुख ( या दुःख ) का साधन है ' इस आकार का निश्चय उत्पन्न होता है । इसके बाद उन विषयों में उपादेयत्व ( या हेयत्व ) की बुद्धि उत्पन्न होती है । ( उपादेयत्वादि का ज्ञान उक्त विशिष्ट ज्ञान का ही फल है, सुखादि स्मरण का नहीं ) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि ( कार्य के लिए करण की प्रवृत्ति के बाद और कार्य की उत्पत्ति से पहिले इस ) मध्य में जो उत्पन्न होता है, वह तो कारक ( करण ) का ( कार्योत्पादन में सहायक ) व्यापार है ( स्वयं कारक नहीं है, अतः करण भी नहीं है ) । For Private And Personal