प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 551–560

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 551–560

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४७६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् ' लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । [ गुणे अनुमान-हेतु के ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान ही ' लैङ्गिक ' ज्ञान ( अनुमिति ) है | न्यायकन्दली अन्ये त्वेवमाहुः -- यदर्थस्य सुखसाधनत्वज्ञानं तद् गुणदर्शनम्, उपादेयत्व-ज्ञानमपि तदेव । यद् दुःखसाधनत्वज्ञानं तद् दोषदर्शनं हेयत्वज्ञानमपि तदेव । यच्च न सुखसाधनं न च दुःखसाधनमेतदिति ज्ञानं तन्माध्यस्थ्यं न हेयं नोपादेयमिति ज्ञानं प्रमितिः । पदार्थस्वरूपबोधे सत्युपकारादिस्मरणात् सुखसाधनत्वादिविनिश्चये सत्युपादेयादिज्ञानं भवत् पदार्थस्वरूपबोधस्यैव फलं भवति, सुखस्मरणादीनामु-पेक्षाज्ञानमपि तदेव । सर्व चैतदभ्यासपाटवोपेतस्य व्याप्तिस्मरणमनपेक्ष-माणस्य वस्तुस्वरूपग्रहणमात्रा देवाननुसंहितलिङ्गस्यापरोक्षावभासितयोत्पादा-दभ्यासपाटवसहकारिणः प्रत्यक्षस्य फलमिति । लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न चाक्षुषप्रतीतिवचनः अनुमितानुमानस्यापि सम्भवात् । लिङ्गदर्शनालिङ्ग-विषयः संस्कारो जायते किन्त्वस्य न परिग्रहः, बुद्धघधिकारेण विशेषित-त्वात् । संशब्देन सम्यगर्थवाचिना संशयविपर्ययस्मृतीनां व्युदासः । लिङ्गस्य कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि ( घटादि ) अर्थों का ' इससे सुख मिलता है ' इस आकार का जो ( सुखसाधनत्व ) का ज्ञान होता है, वही गुणदर्शन है, एवं ' उपादेयत्व का ज्ञान ' भी वही है । एवं ( कण्टकादि ) विषयों का जो ' इससे दुःख मिलता है, इस आकार का ( दुःखसाधनत्व ) का ज्ञान होता है, वही ' दोषदर्शन ' है, एवं ' हेयत्वज्ञान ' भी वही है । हवामें उड़ते हुए पत्ते प्रभृति ) विषयों में जो ' इससे न सुख ही मिलेगा न दुःख ही ' इस आकार का ज्ञान होता है, उसी को ' माध्यस्थ्य दर्शन ' कहते हैं । ( उपादेयत्वादि के ) ये सभी ज्ञान चूंकि अपने विषयों को अपरोक्षरूप से ही प्रकाशित करते हैं और इनकी उत्पत्ति में ( अनुमिति के प्रयोजक ) लिङ्गदर्शन एवं व्याप्ति स्मरणादि की भी अपेक्षा नहीं होती है, अतः ये ( सविकल्पक ) प्रत्यक्षरूप प्रत्यक्ष प्रमाण के ही फल हैं । इतना अवश्य है कि इन ज्ञानों के उत्पन्न होने में अभ्यास जनित पटुता भी अपेक्षित होती है, अतः वह भी उन प्रमितियों का सहकारिकारण है । लिङ्गदर्शनात् सञ्जायमानं लैङ्गिकम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' दर्शन ' शब्द का अर्थ केवल चक्षु से उत्पन्न ज्ञान ही नहीं है, किन्तु सभी ज्ञान या उपलब्धि उसके अर्थ हैं, क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात हेतु से भी अनुमान होता है ( अर्थात् अनुमितानुमान भी होता है ) । यद्यपि ( कथित ) लिङ्गदर्शन से लिङ्गविषयक संस्कार भी उत्पन्न होता है, ( जिससे लिङ्ग की स्मृति उत्पन्न होती है, अतः उसमें अनुमिति का लक्षण अति-व्याप्त हो जाएगा, किन्तु यह बुद्धि ( अनुभव ) का प्रकरण है, अतः ' प्रकरण ' के द्वारा For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III दर्शनाज्ज्ञानात् सम्यग् जायमानं लैङ्गिकमिति वाक्यार्थः । तस्य च ज्ञानस्य सम्यग्जातीयस्य यथार्थपरिच्छेदकतयोत्पाद:, सर्वधियां यथार्थपरिच्छेदकत्वस्य कुलधर्मत्वात् । संशयविपर्ययौ तावद्यथा सावर्थो न तथा परिच्छिन्तः । स्मृतिरप्यर्थपरिच्छेदिका न भवति, अनुभवपारतन्त्र्यादिति वक्ष्यामः । अन्ये तु विद्याधिकारेण संशय विपर्ययौ व्युदयन्ति । अनर्थजायाश्च स्मृतेव्युदासार्थं तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते ' इत्यावर्त्तयन्ति । तदयुक्तम्, वाक्यलभ्येऽर्थे प्रकरणस्यानपेक्षणात्, अनर्थजत्वात् स्मृतिव्युदासे चातीतानागत-विषयस्य लैङ्गिकज्ञानस्यापि व्युदासप्रसङ्गात् । ' लिङ्गदर्शनात् संजायमानम् ' के बाद ' ज्ञानम् ' पद का अध्याहार स्वभावतः प्राप्त है । ( अतः संस्कार को ज्ञानरूप न होने के कारण अतिव्याप्ति दोष नहीं है ) । ( ' सञ्जायमानम् ' इस पद में प्रयुक्त ) ' सम् ' शब्द ' सम्यक् ' अर्थ में प्रयुक्त है, ( अतः ' लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ' सम्यक् ' ज्ञान ही अनुमान है ' ऐसा लक्षण निष्पन्न होने के कारण ) संशय, विपर्यय एवं स्मृति इन तीनों की अनुमान से व्यावृत्ति हो जाती है । क्योंकि ये ( ज्ञान होते हुए भी ) सम्यग् ज्ञान अर्थात् यथार्थ ज्ञान नही हैं | सभी सम्यग् ज्ञानों का यह स्वभाव है कि अपने विषयों को उनके यथार्थ स्वरूप में उपस्थित करें, चूँकि अपने विषयों को यथार्थरूप में उपस्थित करना सभी ( यथार्थ ) ज्ञानों का मौलिक धर्म है । संशय और विपर्यय तो अपने विषयों को उसी रूप में उपस्थित नहीं करते जो कि उनका यथार्थ स्वरूप है । स्मृति के प्रसङ्ग में हम आगे कहेंगे कि स्मृति चूँकि अनुभव के अधीन है अतः वह अपने विषयों की परिच्छेदिका नहीं है । ( पूर्वानुभव ही स्मृति के विषयों का परिच्छेदक है ) । कोई कहते हैं कि यह विद्या ( यथार्थ ज्ञान ) का प्रकरण है, अतः प्रकरण के बल से बुद्धि विद्या रूप ही होगी, इसी से संशय और विपर्यय इन दोनों की अनुमिति से स्मृति में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति के लिए वे में पठित ) ' तद्धि द्रव्यादिषु पदार्थेषूत्पद्यते ' इस वाक्य की यहाँ स्मृति अर्थजनित न होने के ( दोनों ही बातें ) असङ्गत हैं, उसे प्रकरण की अपेक्षा नहीं व्यावृत्ति हो जाएगी । लोग ( प्रत्यक्ष प्रकरण आवृत्ति करते हैं । अतः कारण अनुमिति के अन्तर्गत नहीं आती । किन्तु ये क्योंकि वाक्य के द्वारा जिस अर्थ का लाभ हो सकता है, होती । एवं अर्थजनित न होने के कारण यदि स्मृति की व्यावृत्ति करें, तो फिर भूत और - भविष्य विषयक अनुमान की भी अनुमिति से व्यावृत्ति हो जायगी । १- अभिप्राय यह है कि संशय और विपर्यय में अनुमिति लक्षण की अतिव्याप्ति हटानी है । ' सञ्जायमानम् ' पद घटक ' सम ' शब्द को सम्यगर्थक मान लेने से भी उक्त For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४७८ लिङ्ग पुनः-न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम्

[ गुणे अनुमान-यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्विते ।

तदभावे च नास्त्येव तल्लिङ्गमनुमापकम् ॥

जो अनुमिति में प्रधानरूप से विषय होनेवाली वस्तु के साथ अर्थात् पक्ष के साथ सम्बद्ध हो ( इसे पक्षसत्त्व कहते हैं ), एवं जो साध्यरूप धर्म से युक्त ( दृष्टान्त ) में यथार्थरूप से ज्ञात हो ( इसे सपक्षसत्त्व कहते हैं ), साध्य का न रहना जिसमें निश्चित न्यायकन्दली लिङ्गस्य लक्षणमाह - लिङ्गं पुनरिति । यिषितधर्मविशिष्टो धर्मी, तेन यत् सम्बद्धं अनुमेय: प्रतिपिपाद-तस्मिन् वर्तत इत्यर्थः । यथा विपक्षैकदेशे वर्तमानमपि च लिङ्ग विपक्षवृत्ति भवति, एवं पक्षैकदेशे वर्तमानमनुमेयेन सम्बद्धमेव । ततश्चतुविधाः परमाण-वो s नित्या गन्धवत्त्वादित्यस्यापि भागासिद्धस्य हेतुत्वं प्राप्नोतीति चेत् न, वैधर्म्यात् । यः साध्यसाधनव्यावृत्तिविषयोऽर्थः स विपक्षः । साध्यसाधनयो-वृत्तिर्न समुदितेभ्यः, किन्तु प्रत्येकमेव सभ्भवतीति प्रत्येकमेव विपक्षता । पक्षस्तु स भवति यत्र वादिना साध्यो धर्मः प्रतिपादयितुमिष्यते । न च वादिना ' लिङ्ग पुनः ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा ' लिङ्ग ' का लक्षण कहा गया है । ( ' यदनुमेयेन ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ) ' अनुमेय ' शब्द का अर्थ वह ' धर्मी ' है जिसमें ( अनुमान प्रयोग करनेवाले को अपने अभीष्ट वस्तु अर्थात् साध्यरूप ) धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो । ( फलत: प्रकृत में ' अनुमेय ' शब्द से पक्ष अभिप्रेत है ) ' तेन यत् सम्बद्धम् ' उस ( पक्ष ) में जो विद्यमान रहे ( वह हेतु है ) | ( प्र ० ) जिस प्रकार विपक्षीभूत किसी एक वस्तु में यदि ( हेतु ) रहता है तो वह हेतु ' विपक्षवृत्ति ' ( हेत्वाभास ) हो जाता है, उसी प्रकार किसी एक पक्ष में भी यदि हेतु की सत्ता है, तो फिर वह हेतु ' अनुमेय सम्बद्ध ' ( पक्षवृत्ति ) होगा । ( इस वस्तु स्थिति के अनुसार यदि कोई इस अनुमान का प्रयोग करे कि ) चारों प्रकार के ( अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों द्रव्यों के ) परमाणु नित्य हैं, क्योंकि उन सभी में गन्ध है, तो फिर इस अनुमान का उक्त गन्ध दोनों अतिव्याप्तियाँ हट सकती हैं । एवं अनुमिति चूँकि विद्यारूप सम्यग्ज्ञान के प्रकरण में पठित है, अतः लिङ्गदर्शन से उत्पन्न ज्ञान में सम्यक्त्व का लाभ प्रकरण से भी हो सकता है । फलतः अनुमिति लक्षणघटक ज्ञान में सम्यक्त्व विशेषण देने से ही दोनों मतों में संशय और विपर्यय में अतिव्याप्ति का वारण हो जाता है । यह सम्यक्त्व प्रथम पक्ष में वाक्य लभ्य है, दूसरे पक्ष में प्रकरण लभ्य है । प्रकरण की अपेक्षा वाक्य बलवान् है । ( देखिए बलाबलाधिकरण ) । अतः प्रकरणापेक्षी द्वितीय पक्ष असङ्गत है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली ve पार्थिवपरमाणावेकस्मिन्ननित्यत्वं प्रतिपादयितुमिष्यते, किन्तु चतुर्ष्वपि परमा-विति समुदितानामेव पक्षत्वे स्थितेऽसिद्धवद् भागासिद्धस्यापि व्युदासः, अनुमेयसम्बन्धाभावात् । प्रसिद्धं च तदन्वित इति । तदिति योग्यत्वात् साध्यधर्मः परामृश्यते । तदन्वि साध्यधर्मान्विते सपक्षे प्रसिद्धं परिज्ञातमिति विरुद्धासाधारणयोर्व्यवच्छेदः । तदभावे च नास्त्येवेति । अत्रापि तदिति हेतु भी पक्षवृत्ति होगा, क्योंकि उन चारों प्रकार के परमाणुओं में से एक पार्थिव पर-माणु में वह विद्यमान है, किन्तु वह हेतु तो भागासिद्ध हेत्वाभास है, ( अतः ' हेतु ' का वह ' अनुमेयसम्बद्धत्व ' रूप लक्षण ठीक नहीं है ) | ( उ ० ) जिसमें साध्य और हेतु दोनों का अभाव निश्चित हो वही ' विपक्ष ' है । यह विपक्षता ( विपक्षतावच्छेद-काश्रयीभूत ) प्रत्येक विपक्ष व्यक्ति में है ( विपक्षतावच्छेदकाश्रयीभूत ) सभी विपक्ष व्यक्ति समूह में ही नहीं, ( अतः किसी भी विपक्ष व्यक्ति में रहनेवाला हेतु विपक्षवृत्ति होने के कारण भागासिद्ध हेत्वाभास होता है ) ' पक्ष ' के प्रसङ्ग में सो बात नहीं है, क्योंकि पक्ष वही है जिसमें वादी को साध्य सिद्धि की इच्छा हो, प्रकृत में वादी की यह इच्छा नहीं है कि केवल पार्थिव परमाणु में ही अनित्यत्व की सिद्धि करे, किन्तु वादो की यह इच्छा है कि चारों प्रकार के परमाणुओं में ही अनित्यत्व की सिद्धि करे । तदनुसार उक्त चारों परमाणुओं का समूह हो पक्ष है, तदन्तर्गत एक पार्थिव परमाणु नहीं, अत: जिस प्रकार पक्षाभिमत सभी वस्तुओं में हेतु के न रहने से हेतु ( हेतु नहीं रह जाता स्वरूपासिद्ध या ) असिद्ध नाम का हेत्वाभास हो जाता है. उसी प्रकार ( पक्षान्तर्गत पार्थिव परमाणुरूप पक्ष में गन्धरूप हेतु के रहने पर भी पक्षान्तर्गत जलादि के तीनों परमाणुओं में गन्ध के न रहने से वह हेतु न होकर ) भागासिद्ध नाम का हेत्वाभास ही होगा, क्योंकि उसमें पक्षान्तर्गत जलादि परमाणुओं का सम्बन्ध न रहने के कारण पक्षान्तर्गत ही पार्थिव परमाणु का सम्बन्ध रहते हुए भी अनुमेय स्वरूव चारों परमाणुओं के साथ सम्बन्ध नहीं है । इस प्रकार हेतु के लक्षण में ' अनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस विशेषण से स्पष्ट ही पक्ष में कहीं भी न रहनेवाला हेतु स्वरूपासिद्ध या भागासिद्ध हेत्वाभास होगा । ' प्रसिद्धच तदविते ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तत् ' शब्द से साध्यरूप धर्म ही गृहीत होता है, क्योंकि उसी का ग्रहण प्रकृत में उपयोगी है । ' तदन्विते ' अर्थात् साध्यरूप धर्म से युक्त अर्थात् ' पक्ष ' में ' प्रसिद्ध ' अर्थात् अच्छी तरह से ज्ञात ( होना हेतु के लिए आवश्यक है ) | ( हेतु के इस सपक्षवृत्तित्व रूप लक्षण से ) विरुद्ध और असाधारण नाम के हेत्वाभासों में हेतुत्व का व्यवच्छेद होता है, अर्थात् उनमें हेतु लक्षण की अति-व्याप्त नहीं हो पाती । ' तदभावे च नास्त्येव ' इस वाक्य के ' तत् ' शब्द से साध्यरूप धर्म का ही ग्रहण करना चाहिए | ( तदनुसार ) इस वाक्य का यह अर्थ है कि साध्यरूप धर्म का अर्थात् साध्य का अभाव जिन आश्रयों में रहे उन सभी आश्रयों में जो कदापि न रहे वही ( सपक्षवृत्ति For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४८० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम्

विपरीतमतो यत् स्यादेकेन द्वितयेन वा ।

विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ॥

यदनुमेयेनार्थेन देशविशेषे कालविशेषे बा [ गुणे अनुमान-सहचरितम हो, ऐसे आश्रयों में जो कदापि न रहे ( इसे विपक्षासत्त्व कहते हैं ), वही ( पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व से युक्त ) हेतु साध्य का ज्ञापक है । ( सपक्षसत्त्वादि इन तीन ) लक्षणों में से एक या दो लक्षणों से भी रहित हेतु को काश्यप ने असिद्ध, विरुद्ध और सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास कहा है । ( लिङ्ग के लक्षण बोधक कथित पहिले श्लोक का यह अभिप्राय है कि ) जो साध्य के साथ किसी समयविशेष में एवं देशविशेष में सम्बद्ध न्यायकन्दली साध्यधर्मस्यैव परामर्शः, तस्य साध्यधर्मस्याभावे नास्त्येव न पुनरेकदेशेऽस्त्यपीत्यनं-कान्तिकव्यवच्छेदः । तल्लिङ्गमनुमापकम् अनुमेयस्य ज्ञापकम् । लिङ्गं व्याख्याय लिङ्गाभासं व्याचष्टे - विपरीतमतो यत् स्यादिति । अत उक्तलक्षणाल्लिङ्गाद् यदेकेन द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतं रहितं विरुद्ध-सिर्द्ध सन्दिग्धम्, तत् कश्यपात्मजोऽलिङ्गमनुमेयाप्रतिपादकमब्रवीत् । असिद्धमनुमेये नास्ति, अनैकान्तिकं विपक्षादव्यावृत्तमित्यनयोरेकेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतत्वम् । और पक्षवृत्ति ) ' हेतु ' है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' एवं ' शब्द के द्वारा यह सूचित किया गया है कि ऐसे किसी भी आश्रय में हेतु को न रहना चाहिए जिसमें कि साध्य न रहे । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा अनैकान्तिक नाम के हेत्वाभास में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण होता हैं । ' तल्लिङ्गमनुमापकम् ' ( अर्थात् उक्त पक्षवृत्तित्व, सपक्षवृत्तित्व और विपक्षावृत्तित्व इन ) तीनों लक्षणों से युक्त हेतु ही साध्य का ज्ञापक है । लिङ्ग के लक्षण के कहने के बाद अब ' विपरीतमतो यत् स्यात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा लिङ्गाभास ( हेत्वाभास ) का लक्षण कहते हैं । ' अत. ' अर्थात् हेतु के कथित तीनों लक्षणों में से हेतु के एक या दो लक्षणों से ' विपरीत ' अर्थात् शून्य हेतु को ' काश्यप ' ने अर्थात् कश्यप के पुत्र ने क्रमशः विरुद्ध, असिद्ध और सन्दिग्ध नाम का ' अलिङ्ग ' ( हेत्वाभास ) कहा है, क्योंकि ये अनुमेय के ज्ञापक नहीं हैं । इनमें ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास अनुमेय ( पक्ष ) में रहीं रहता, ( अर्थात् उसमें पक्षवृत्तित्व रूप एक धर्म का अभाव है ), ' अनैकान्तिक ' नाम का हेत्वाभास विपक्ष से अव्यावृत्त है, अर्थात् विप-क्षावृत्तित्वरूप हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण हेत्वाभास है ( इस प्रकार असिद्ध और अनैकान्तिक ये दोनों हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण For Private And Personal

पृष्ठ 556

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६१ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ' ४८१ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दलो For Private And Personal नुमेयधर्मान्विते चान्यत्र सर्वस्मिनेकदेशे वा प्रसिद्धमनुमेयविपरीते च सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव, तदप्रसिद्धार्थस्यानुमापकं लिङ्गं भवतीति । रहे, अनुमेयरूप धर्म के किसी ( निश्चित ) अधिकरण में या सभी अधि-करणों में जिसकी सत्ता प्रमाण के द्वारा सिद्ध रहे, एवं साध्य अभाव के निर्णीत अधिकरण में जिसकी असत्ता भी प्रमाण के द्वारा निश्चित ही हो, वही वस्तु पूर्व में अज्ञात साध्य के अनुमिति का लिङ्ग है । विरुद्धं सपक्षे नास्ति, विपक्षादव्यावृत्तमिति तस्य द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन रहितत्वम् । यदनुमेयेन सम्बद्धमिति श्लोकार्थं विवृणोति - यदनुमेयेनेति । अनु-मेयेनार्थेन साध्यधर्मिणा सह यद्देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितं सम्बद्धम्, अनु-धर्मान्विते चान्यत्र सपक्षे सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धं प्रमाणेन प्रतीतम्, अनु-मेयविपरीते च साध्यव्यावृत्तिविषये चार्थे सर्वस्मिन् प्रमाणतोऽसदेव तदप्रसिद्धा-र्थस्य साध्यधर्मिणोऽप्रतीतस्यार्थस्य साध्यधर्मस्यानुमापकं लिङ्ग भवति । यावति देशे काले वा दृष्टान्तधर्मणि लिङ्गस्य साध्यधर्मेणाविनाभावो निद-शितस्तावत्येव देशे काले वा साध्यर्धामणि प्रतीयमानस्य गमकमिति प्रति-पादनार्थमुक्तम् - देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितमिति । सर्वसपक्षव्यापकवत् पक्षैकदेशवृत्तेरपि हेतुत्वार्थं सर्वस्मिन्नेकदेशे वा प्रसिद्धमित्युक्तम् । समस्त-हेत्वाभास है ) । विरुद्ध नाम का हेत्वाभास सपक्ष में नहीं रहता और विपक्ष में रहता है, अतः विरुद्ध सपक्षवृत्तित्व और विपक्षव्यावृत्तत्व हेतु के इन दोनों लक्षणों से रहित हेत्वाभास है । ' यदनुमेयेनार्थेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि श्लोक की व्याख्या करते हैं । पहिले से अज्ञात अर्थ स्वरूप साध्य ( धर्म ) की अनुमिति का जनक वह ' लिङ्ग ' है, जो अनुमेव अर्थ के साथ अर्थात् साध्य के धर्मी ( पक्ष ) के साथ किसी देश विशेष में एवं कालविशेष मे ' सहचरित ' अर्थात् सम्बद्ध हो, एवं अनुमेय ( साध्य ) रूप धर्म से युक्त( पक्ष से भिन्न ) किसी आश्रयरूप सपक्ष के.... किसी एक देश में या उसके सभी देशों में ' प्रसिद्ध ' हो, अर्थात् प्रमाण के द्वारा निश्चित हो, एवं अनुमेय के विपरीत अर्थात् साध्य का अभाव जिनमें निश्चित हो उन सभी आश्रयों में प्रमाण के द्वारा जिसको असत्ता भी निश्चित ही हो ( वहाँ लिङ्ग है ) । ' देशविशेषे काल-विशेषे वा सहचरितम् ' यह वाक्य इस लिए लिखा गया है कि दृष्टान्तरूप धर्मी के जितने देश में एवं जितने काल में हेतु का साध्यरूप धर्म के साथ ' अविनाभाव ' ( व्याप्ति ) देखा जाय, उन्हीं देशों में और उन्हीं कालों में साध्य के धर्मी ( अ ) में जाते हुए साध्य का वह हेतु ज्ञापक होता है I । ' सर्वस्मिन्नकदेशे या प्रसिद्धम् ' यह वाक्य इस

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४८२ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-विपक्षव्यापक द्विपक्षैकदेशवृत्तेरप्यहेतुत्वावद्योतनार्थं सर्वस्मिन्नसदेवेति पदम् । केचित् प्रवादुका एवं वदन्ति - नावश्यं प्रमाणसिद्धो वैधर्म्यदृष्टान्त एव द्रष्टव्यः ", यत्रेदं नास्ति तत्रेदमपि नास्ति इति वचनादपि साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्तिप्रतीतिसम्भवात् । तथा च तेषां ग्रन्थः-तस्माद् वैधर्म्यदृष्टान्तोऽनिष्टोऽवश्यमिहाश्रयः । तदभावेऽपि तन्नेति वचनादपि तद्गतेः ॥ इति । तन्निवृत्त्यर्थं प्रमाणत इति । साध्यविपरीते यत् प्रमाणतोऽसल्लिङ्ग न तु वाङ्मात्रेणेत्यर्थः । प्रमाणशून्यस्य वचनमात्रस्य सर्वत्र सम्भवे हेतुहेत्वा-भासव्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गः । अतिव्यापकमिदं लिङ्गलक्षणम्, प्रकरणसमे कालात्य-यापदिष्टे च भावादिति चेत्? अत्राह कश्चित् - प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टा-वनैकान्तिक एवान्तर्भवतः, संदिग्धविपक्षे साध्यधर्मिणि प्रकरणसमस्य भावान्नि-ferfar च कालात्ययापदिष्टस्य वृत्तेः । तथा च प्रकरणसमः ' यतः प्रकरण-लिए लिखा गया है कि जिस प्रकार सभी सपक्षों ( दृष्टान्तों ) में रहनेवाली वस्तु में ( साध्य के ज्ञापन करने का सामर्थ्यरूप ) हेतुत्व है उसी प्रकार कुछ ही सपक्षों में रहनेवाली वस्तु में भी उक्त हेतुत्व है । ' सर्वस्मिन्नसदेव ' यह वाक्य इसलिए दिया गया है । कि जिस प्रकार सभी विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता, उसी प्रकार कुछ थोड़े से विपक्षों में रहनेवाला पदार्थ भी साध्य का ज्ञापक हेतु नहीं हो सकता । किसी सम्प्रदाय के लोगों ( बौद्धों ) का कहना है कि ' वैधर्म्यं दृष्टान्त में प्रमाण के द्वारा हेतु की असत्ता सिद्ध ही हो ' यह कोई आवश्यक नहीं है, क्योंकि ' जहाँ साध्य नहीं है, वहाँ हेतु भी नहीं है ' इस प्रकार के साधारण वाक्य से ही साध्य से शून्य सभी आश्रयों ( सभी विपक्षों ) में हेतु की असत्ता की प्रतीति हो सकती है । जैसा कि उन लोगों का ( उक्त सिद्धान्त का समर्थक ) यह वचन है कि ' तस्मात् अनुमान के लिए वैधम्यं दृष्टान्तरूप आश्रय ( प्रयोजक ) का मानना आवश्यक नहीं है, क्योंकि ' जहाँ साध्य नहीं है वहीं हेतु भी नहीं है ' इस वाक्य से भी उस ( साध्यशून्य आश्रय में हेतु अभाव ) की प्रतीति हो जाएगी ' इस सिद्धान्त के खण्डन के लिए ही प्रकृत वाक्य में ' प्रमाणतः ' पद दिया गया है । अर्थात् विपक्ष में हेतु की असत्ता प्रमाण से ही सिद्ध होनी चाहिए, प्रमाणशून्य केवल वचन मात्र के प्रयोग से प्रकृत में समाधान नहीं होगा, क्योंकि प्रमाणशून्य वचनों का प्रयोग तो सभी जगह सम्भव है, इससे ' यह हेतु है और हेत्वा-भास है ' इस प्रकार की व्यवस्था ही नहीं रह जाएगी । ( प्र ० ) हेतु का यह लक्षण तो ' प्रकरणसम ' और ' कालात्ययापदिष्ट ' नाम के हेत्वाभासों में भी रहने के कारण अतिव्यापक ( अतिव्याप्त ) है । इसके उत्तर कोई कहते हैं कि ( उ ० ) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों का अन्तर्भाव भी ' अनैकान्तिक ' नाम के हेत्वाभास में ही हो जाता है, क्योंकि सन्दिग्धविपक्ष रूप साध्य के धर्मी में ( अर्थात् पक्ष में ) For Private And Personal

पृष्ठ 558

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४८३ चिन्ता स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ' प्रक्रियते प्रस्तूयत इति प्रकरणं पक्षप्रतिपक्षौ तयोश्चिन्ता विचारः, सा यत्कृता स निर्णयार्थमुपदिष्ट उभयपक्ष-साम्यान्न प्रकरणसाम्येऽन्यतरपक्षनिर्णयाय कल्पते । यथा नित्यः शब्दो-नित्यधर्मानुपलब्ध:, अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुलब्धेरिति शब्दे नित्यानित्यधर्म योरनुपलम्भान्नित्यानित्यत्वसंशये सति तद्विचारोऽभूत्, अन्यतरधर्मग्रहणे तत्त्वनिश्चयाद् विचारस्याप्रवृत्तेः । तत्रानित्यधर्मानुपलम्भो नित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानुपलम्भोऽनित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानुपलम्भं प्रतिपक्षमनतिवर्तमानो न निर्णयाय कल्पते, तत्प्रतिबन्धात् । स चायं संभवत्प्रतिपक्षे धर्मिणि वर्तमान एकस्मिन्नन्ते नियतो न भवतीत्यनै-प्रकरणसम हेत्वाभास की सत्ता रहती है । एवं निश्चित विपक्ष में ' कालात्ययापदिष्ट ' हेत्वाभास की सत्ता रहती है । अभिप्राय यह है कि ( न्यायसूत्र में ) प्रकरणसम के लक्षण के लिए यह सूत्र निर्दिष्ट है कि ' यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रक-रणसमः । ' ' प्रक्रियते प्रस्तूयते इति प्रकरणम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उपस्थित किये जानेवाले पक्ष और प्रतिपक्ष ये दोनों ही इस सूत्र में प्रयुक्त ' प्रकरण ' शब्द के अर्थ हैं । ' तयोश्चिन्ता प्रकरणचिन्ता ' अर्थात् कथित पक्ष और प्रतिपक्ष की जो ' चिन्ता ' अर्थात् विचार, फलतः संशय जिससे उत्पन्न हो, उन दोनों में से किसी एक पक्ष के निश्चय के लिए प्रयुक्त हेतु ही प्रकरणसम नाम का हेत्वाभास है, क्योंकि वह हेतु दोनों पक्षों के साधन के लिए समान ही है, ( अतः प्रकरणसम है ) । उन दोनों में से कोई एक हेतु एक पक्ष का निर्णायक नहीं हो सकता । जैसे कि एक ने यह पक्ष उपस्थित किया कि ' शब्द नित्य है, क्योंकि अनित्य वस्तुओं में रहनेवाले धर्मों की उपलब्धि शब्द में नहीं होती है । दूसरा पक्ष उपस्थित हुआ कि ' शब्द अनित्य है, क्योंकि नित्य पदार्थों में रहनेवाले धर्म की उपलब्धि उसमें नहीं होती । इस प्रकार नित्यों में रहनेवाले धर्म को ज्ञापन करने का सामर्थ्य मान लिया जाय तो फिर साध्य के धर्मी पक्ष में साध्य के अभाव रूप धर्मों एवं अनित्यों में रहनेवाले धर्मों की अनुपलब्धि से शब्द में नित्यस्व और अनित्वका संशय उपस्थित होगा । इस संशय के कारण ही ' प्रकरण ' का उक्त ' चिन्ता ' रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से एक ( नित्य या अनित्य ) धर्म का निर्णय रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से एक ( नित्य या अनित्य ) धर्म का निर्णय हो जाने पर तो उक्त विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । इन दोनों में शब्द में नित्यत्व के निश्चय के लिए अनित्य धर्म के अनुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है, एवं शब्द में अनित्यत्व के निश्चय के लिए नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है । इनमें अनित्यधर्मानुपलब्धि रूप हेतु नित्यधर्म के अनुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को पराजित नहीं कर सकता, ( इसी प्रकार नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु अनित्यधर्मानुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को भी पराजित नहीं कर सकता ), अतः शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व का निर्णय नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों ही अपने प्रतिपक्ष के द्वारा प्रतिहत हैं । अतः यह हेतु For Private And Personal

पृष्ठ 559

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-न्यायकन्दली कान्तिक: । एवं कालात्ययापदिष्टोऽप्यनैकान्तिकः, प्रत्यक्षनिश्चितोष्णत्वे वह्नौ विपक्षे कृतकत्वस्य भावात् । एतदयुक्तम् । यदि पक्षव्यापकत्वे सति सपक्षे सद्भावो विपक्षाच्च व्यावृत्तिरित्येतावतैव हेतोर्गमकत्वम्, तदास्तु नाम साध्य-धर्मिणि प्रतिपक्षसम्भावना, तथापि प्रकरणसमेन स्वसामर्थ्यात् साध्यं साधयित-व्यमेव । अथ न शक्नोति साधयितुं प्रतिपक्षसंशयाक्रान्तत्वात्? न तहिं रूप्यमा त्रेण गमकत्वमिति असत्प्रतिपक्षत्वमपि रूपान्तरमास्थेयम्, सति प्रतिपक्षे हेतु-त्वाभावादसति तद्भावात् । एवं कालात्ययापदिष्टेऽपि वाच्यम् । यदि त्रैरूप्य मात्रेण लिङ्गत्वं कृतकत्वाद् वह्नावनुष्णत्वमस्त्येवेति कथमनैकान्तिकत्वम्? अथ सत्यपि कृतकत्वे वह्नावनुष्णत्वं न भवति प्रत्यक्षेणोष्णताप्रतीतेः, तदा प्रत्यक्षा-विरोधे सति प्रतिपादनं न तद्विरोध इत्यबाधितविषयत्वमपि रूपान्तरमनु-( अर्थात् शब्द में नित्यत्व का साधक और अनित्यत्व का साधक हेतु ) साध्य संशयवाले पक्ष में विद्यमान होने के कारण एक अन्त में, किसी एक कोटि के निश्चय के लिए नियत नहीं है, अतः ' प्रकरणसम ' अनैकान्तिक ही है । इसी प्रकार ' कालात्ययापदिष्ट ' अर्थात् बाधित हेत्वाभास भी अनैकान्तिक ही है, क्योंकि ' वह्निरनुष्णः कृतकत्वात् ' इत्यादि अनुमान का कृतकत्व रूप कालात्ययापदिष्ट हेतु बह्निरूप उस विपक्ष में ही विद्यमान है, जिसमें कि ( अनुमान से बलवान् ) प्रतिपक्ष के द्वारा ( अनुष्णत्वरूप साध्य के अभावरूप ) उष्णत्व की सत्ता निर्णीत है । ( उ ० ) ( किन्तु प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट का इस प्रकार अनैकान्तिक में अन्तर्भाव करना ) अयुक्त है, क्योंकि यदि सभी पक्षों में रहने से, एवं सपक्षों में रहने से, और विपक्षों में न रहने से हो हेतु में साध्य की अनुमिति का सामर्थ्य मान लिया जाय तो साध्य की सम्भावना रहने पर भी प्रकरणसम हेत्वाभास से साध्य का साधन होगा ही, क्योंकि उसमें साध्य को ज्ञापन करने का ( पक्षसत्त्वादि ) उक्त सामर्थ्य तो है ही । यदि प्रतिपक्ष संशय के कारण वह अपने साध्य का साधन नहीं कर सकता, तो फिर यह कहना ठीक नहीं है कि ( पक्षसत्त्वादि ) तीनों धर्मों का रहना ही हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य है, इसके लिए ' असत्प्रतिपक्षितत्व ' नाम का एक और प्रयोजक हेतु में साध्य साधन के लिए मानना पड़ेगा । क्योंकि प्रतिपक्ष के रहने पर हेतु में साध्य साधन की क्षमता नहीं रहती है, और उसके न रहने से हेतु में वह क्षमता रहती है । इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट के प्रसङ्ग में भी कहना चाहिए कि यदि पक्षसत्वादि तीनों रूपों के रहने से ही हेतु साध्य का साधन कर सके तो फिर कृतकत्व के रहने के कारण वह्नि में अनुष्णता का अनुमान भी हो सकता है सुतराम् यह प्रश्न रह जाता है कि वह्नि में अनुष्णता का साधक कृतकत्व हेतु अनैकान्तिक ' कैसे है? यदि वह्नि में कृतकत्व के रहने पर भी उष्णता की प्रत्यक्ष प्रतीति वह्नि में होती है, अतः अनुष्णत्व को उक्त अनुमति नहीं होती है, तो यह कहना पड़ेगा कि पक्ष सत्त्वादि की तरह ( अबाधितविषयत्व या ) साध्य हेतु में अबाधितत्व का रहना भी ज्ञान के लिए आवश्यक है । For Private And Personal

पृष्ठ 560

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ४८५ सरणीयम् । तस्मादन्यथोच्यते, पक्षो नाम साध्यपर्यायः, साध्यं च तद् भवति यत् साधनमर्हति सम्भाव्यमानप्रतिपक्षश्चार्थो न साधन मर्हति वस्तुनो द्वैरूप्याभावा-दित्ययमपक्षधर्म एव । तथा प्रत्यक्षादिविरुद्धोऽपि पक्षो न भवति, रूपा-न्तरेण सिद्धस्य रूपान्तरेण साधनानर्हत्वात् । अतः प्रकरणसमकालात्ययापदि-ष्टावुभौ ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यन्तेनैव निराकृतौ अनुमेयाभासाश्रयत्वात् । अतः ( अर्थात् पक्षसत्त्वादि तीनों रूपों को ही हेतुत्व का प्रयोजक मानें तो प्रकरणमम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में हेतुत्व का वारण किस प्रकार होगा? अतः इस प्रश्न का हम लोग ( सिद्धान्ती ) दूसरा समाधान कहते हैं कि ( हेतु के बल रूप ) पक्षवृत्तित्यादि के घटकीभूत ' पक्ष ' शब्द और ' साध्य ' शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं । साध्य वह है जिसका कि साधन हो सके । किन्तु जिस साध्य के प्रतिपक्ष की सम्भावना रहती है, उसका साधन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वस्तुओं के ( परस्पर विरुद्ध ) दो रूप नहीं हो सकते.१ । अतः प्रकरणसम हेतु ' पक्षधर्म ' ही नहीं है, अर्थात् साध्य से युक्त पक्षरूप अनुमेय से अभिन्न साध्य के साथ सम्बद्ध ही नहीं है, इसी प्रकार कालात्ययापदिष्ट हेतु भी ' पद्मधर्म ' न होने के ही कारण ' हेतु ' नहीं है, क्योंकि वह्नि की अनुष्णता प्रत्यक्ष से विरुद्ध है, एक प्रकार से सिद्ध वस्तु का दूसरे ( विरुद्ध ) रूप से साधन करना सम्भव नहीं है, अतः प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट इन दोनों हेत्वाभासों में हेतु का ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस वाक्य के द्वारा निर्दिष्ट विशेषण ही नहीं है । अत: ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इसके उपादान से ही प्रकरण म और कालात्ययापदिष्ट दोनों हेत्वाभासों में हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति हट जाती है । १. अभिप्राय यह है कि ' शब्दो नित्योऽनित्यधर्मानुपलब्धेः ' एवं ' शब्दोऽनित्यो नित्यधर्मानुपलब्धे: ' इत्यादि प्रकरणसम के स्थल में नित्यत्वविशिष्ट शब्द और अनित्यत्व-विशिष्ट शब्द हो ' साध्य ' है । शब्दरूप पक्ष का नित्यत्व या अनित्यत्व दो में से कोई एक ही स्वरूप सत्य हो सकता है. अर्थात् शब्द नित्य ही हो सकता है या अनित्य हो, वह नित्य और अनित्य दोनों नहीं हो सकता । चूंकि अनुमान के समय शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व कोई भी सिद्ध नहीं है, अतः नित्यधर्मानुपलब्धि या अनित्यधर्मानुपलब्धि इन दोनों में से कोई भी हेतु ' अनुमेय ' अर्थात् नित्यत्व या अनित्यत्वविशिष्ट शब्दरूप ' पक्ष ' में विद्यमान नहीं है । अतः प्रकरणसम हेतु में हतुत्व का प्रयोजक ' पक्षवृत्तित्व ' रूप धर्म ही नहीं है । सुतराम् ' अपक्षधर्म ' होने के कारण ही प्रकरणसम ' असिद्ध ' ( स्वरूपासिद्ध ) हेत्वाभास है, जिसकी सूचना ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इस वाक्य से ही दे दी गयी है । इसी प्रकार बाधित ( कालात्ययापदिष्ट ) हेतु भी ' असिद्ध ' हेत्वाभास में ही अन्तभूत हो जाता है, क्योंकि वह्निरनुष्णी द्रव्यत्वात् ' इत्यादि स्थलों में वह्नि में यद्यपि द्रव्यत्व है, किन्तु उसमें अनुष्णत्व के विरुद्ध उष्णत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है, अतः अनु-ष्णत्व बाधित है । अनुष्णस्वविशिष्ट वह्निरूप पक्ष में द्रव्यत्व की सत्ता नहीं है, क्योंकि अनुष्णत्व विशिष्ट वह्नि नाम की कोई वस्तु ही नहीं है । इसको भी सूचना ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इसी वाक्य से दे दी गयी है । For Private And Personal