प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 561–570
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 561–570
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४८६ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान -नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः - अन्वयी, व्यतिरेकी, अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः, प्रमेयत्वात्, सामान्यवत् । अस्य हि पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः, प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रा-पेक्षयाऽनभिधेयस्याप्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्थानभिधेयोऽप्रमेयश्च स वाजिविषाणवदसन्नेव, न वा सपक्षो विपक्षो वा स स्यात्, निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम्, व्यतिरेकाभावात् । अगमकमेव तदिति चेन्न, अन्वयाव्यभिचारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम्, तस्य तु व्यभिचारप्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः, सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति, यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरी-( प्र ० ) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने पर भी हेतु का यह लक्षण ' तदभावे च नास्त्येव ' इस विशेषण के कारण केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त अव्यापक है ही । अभिप्राय यह है कि ( १ ) अन्वयी ( केवलान्वयी ), ( २ ) ( केवल ) व्यतिरेकी, एवं ( ३ ) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु तीन प्रकार के हैं । इनमें ' विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत् ' ' इस अनुमान का हेतु अन्वयी ( केवलान्वयी ) । इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव और अभाव पदार्थ हैं, वे सभी सपक्ष हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है ( अर्थात् प्रमेय नहीं है ) और किसी ( शब्द ) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है, वह घोड़े के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है न विपक्ष ही, क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता । जितने भी पदार्थ ' सत् ' हैं वे सभी इस अनुमान के सपक्ष हो हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है, अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् ' तदभावे च नास्त्येव ' हेतु लक्षण का यह अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति से दुष्ट हूँ । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं । ( उ ० ) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि होती है, इसमें ' अन्वय ' ही कारण है, चूंकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार उपलब्ध नहीं है, ( अतः ' केवलान्वयि हेतु से अनुमिति नहीं होती ' यह नहीं कहा जा १. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होते के कारण अभिधेय है, उसी प्रकार ' विशेष ' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषांनुवादसहितम् न्यायकन्दली ४८७ करोति परस्य च वक्तुमिच्छति तस्य सर्वस्य प्रमेयत्वाभिधेयत्वप्राप्तेः । न चास्ति विशेषो विपक्षे सत्यव्यभिचारः कारणं न विपक्षाभावादिति । तेन प्रमेयत्वमभि-धेयत्वं गमयति । व्यतिरेकी च सात्मकं जीवच्छरीरं प्राणादिमत्त्वादिति । अस्य पक्षादन्यः सर्व एव विपक्ष:, तथापि हेतुत्वं विपर्यय सम्बन्धाव्यभिचारात् । घटादि-प्राणादिमत्त्वेन निरात्मकत्वस्य व्याप्तिरवगता, अप्राणादिमत्त्वस्य न जीवच्छ-रे निवृत्तिः प्रतीयते । तत्प्रतीत्या व्याप्तस्य निरात्मकत्वस्य निवृत्त्यनुमाम् । अथ मन्यसे योऽर्थो नवागतस्तद्वय तिरेकोऽपि न शक्यते प्रत्येतुम्, प्रतिषे-धस्य विधिविषयत्वात् । आत्मा च न क्वचिदवगतः, कथं तस्य घटादिभ्यो सकता ), क्योंकि व्यभिचार की प्रतीति ही अन्वयी हेतु से साध्य की अनुमिति होने में बाधक है, सो प्रकृत में नहीं है । प्रमेयत्व और अभिधेयत्व दोनों में अन्वय या सामानाधिकरण्य अवश्य है क्योंकि सभी प्रमेयों में अभिधेयत्व को प्रतीति होती है । इन दोनों में व्यभि चार ( एक को छोड़कर दूसरे का रहना ) कहीं नहीं देखा जाता । एवं उन दोनों में कहीं व्यभिचार की शङ्का भी नहीं है, क्योंकि जो कोई भी स्थल व्यभिचार के लिए कोई सोचेगा या दूसरे को कहना चाहेगा, उन सभी स्थलों में अभिधेयत्व और प्रमेयत्व दोनों ही देखे जाते हैं ( अत: इस अनुमान में कोई विपक्ष है ही नहीं ) । जिस प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष प्रसिद्ध है, उन सब स्थलों में यदि व्यभिचार नहीं है, तो वह हेतु अनुमिति का कारण होता है । उसी प्रकार जिन सब स्थलों में विपक्ष की सत्ता ही नहीं है, उन सब स्थलों में भी यदि व्यभिचार की उपलब्धि नहीं होती है तो वह हेतु साध्य का साधक क्यों नहीं होगा? क्योंकि दोनों स्थितियों में कोई तास्विक अन्तर नहीं है । अतः प्रमेयत्व अवश्य ही अभिधेयत्व का ज्ञापक हेतु है । ' जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्वात् ' इस अनुमान का हेतु ( केवल ) व्यतिरेकी है, क्योंकि पक्ष को छोड़कर और सभी पदार्थ इसके ' विपक्ष ' हैं, फिर भी यह ' हेतु ' है ही, क्योंकि ( साध्य के ) विपर्यय ( अर्थात् अभाव का हेत्वभाव के साथ ) व्यभि-चार नहीं हैं । ( साध्य का निरात्मकत्वरूप अभाव घटादि में है, उनमें हेतु का अप्राणादिमत्त्वरूप अभाव भी अवश्य हा है, इस प्रकार ) अप्राणादिमस्वरूप हेत्वभाव के साथ निरात्मकत्वरूप साध्याभाव की व्याप्ति गृहीत है । इससे जीवित शरीर रूप ( प्रकृत पक्ष में ) अप्राणादिमत्त्वरूप ( हेत्वभाव की ) निवृत्ति अर्थात् अभाव का बोध होता है । जीवित शरीर में ( अप्राणादिमत्त्वाभाव की ) इस प्रतीति से उसमें निरा-त्मकत्व रूप साध्याभाव की निवृत्ति का अनुमान होता है । अगर यह समझते हों कि ( प्र ० ) जिस वस्तु का ज्ञान नहीं होता है, उसके अभाव का भी ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता रहती है, उसी का कहीं प्रतिषेध भी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-व्यावृत्तिप्रतीतिरिति । तदयुक्तम् । परस्य तावत् समस्तवस्तुविषयं नैरात्म्य-मिच्छतो घटादिभ्यः सिद्धैवात्मव्यावृत्तिः । स्वस्यापि जीवच्छरीरेष्वेवात्मनो बुद्धघादिभिः कार्यैः सह कार्यकारणभावे सिद्धे घटादिभ्यो बुद्धयादिव्यावृत्त्या तदुत्पादनसमर्थस्य विशिष्टात्मसम्बन्धस्याभावसिद्धिः । यथा धूमाभावे क्वचित् तदुत्पादनयोग्यस्य वह्नेरभावसिद्धिः । यद्येवमात्मापि जीवच्छरीरेषु सिद्ध एव सम्बन्धिप्रतीतिमन्तरेण सम्बन्धप्रतीतेरसम्भवात् । ततश्च व्यतिरेक्यनुमानवैयर्थ्यम्, निष्पादितक्रिये कर्मणि साधनस्य साधनन्यायातिपातात् । नेवम्, स्वसिद्ध-स्यात्मनः परं प्रत्यसिद्धस्य साध्यत्वात् । न चान्वयाव्यभिचारः प्रतिपादको न व्यतिरेकाव्यभिचार इत्यस्ति नियमहेतुः । तस्माद् व्यतिरेकिणोऽपि हेतुत्वात् तेन हो सकता है । आत्मा कहीं पर ज्ञात नहीं है, अतः घटादि पदार्थों में भी उसके अभाव कीप्रतीति क्यों होगी? ( उ ० ) तो यह समझना भूल होगी, क्योंकि ( बौद्धादि ) परमत के अनुसार भी तो घटादि में नैरात्म्य सिद्ध ही है, क्योंकि वे तो सभी वस्तुओं में नैरात्म्य की अभिलाषा करते हैं । स्वमत ' वैशेषिकादिमत ) में भी जीवित शरीर में ही आत्मा का सम्बन्ध बुद्धि प्रभृति का कारण है, अतः ( अवच्छेदकत्व सम्बन्ध ) से शरीर में बुद्धियादि कार्यों की उत्पत्ति होती है ( मृत शरीर एवं घटादि में नहीं ), इस प्रकार आत्मा से सम्बद्ध जीवित शरीर और बुद्धि प्रभृति में कार्यकारण भाव की सिद्धि हो जाने पर घटादि में बुद्धि का अभाव सिद्ध हो जाएगा, क्योंकि आत्मा का उक्त विशेष प्रकार का सम्बन्ध ही बुद्धि की उत्पत्ति का कारण है, सो घटादि में नहीं है, अतः उसमें कथित सात्मकत्व भी नहीं है । इस ' स्व ' मत में भी निरात्मकत्वरूप साध्या-भाव का ज्ञान सम्भावित है । जैसे कि धूम के न रहने पर कहीं पर धूम को उत्पादन करनेवाले वह्नि के अभाव की सिद्धि होती है । ( प्र ० ) ( जीवित शरीर में जिस सात्म-कत्व की सिद्धि करना चाहते हैं, वह सात्मकत्व आत्मा का सम्बन्ध ही है ) सम्बन्व का ज्ञान बिना प्रतियोगी और अनुयोगी रूप दोनों सम्बन्धियों के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है । अतः जौवित शरीर में आत्मा तो सिद्ध ही है । तस्मात् उक्त व्यतिरेकी अनुमान व्यर्थ है, क्योंकि निष्पन्न कामों में साधन अपना साधनत्व छोड़ बैठता है ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अपने मत से जीवित शरीर में आत्मा के सिद्ध रहने पर भी नास्तिकों के मत में वह सिद्ध नहीं है । अतः परमत से असिद्ध आत्मा के सम्बन्ध का अनुमान ही प्रकृत में व्यतिरेकी हेतु से किया गया है । यह नियम मान लेने में कोई युक्ति नहीं है कि अन्वय का अव्यभिचार ( अन्वयव्याप्ति ) हो साध्य का ज्ञापक है और व्यतिरेक का अव्यभिचार ( व्यतिरेक ) व्याप्ति नहीं । अतः ( केवल ) व्यतिरेकी भी हेतु अवश्य है । तस्मात् ' प्रसिद्धञ्च तदन्विते ' इत्यादि से कथित सपक्षवृत्तित्व रूप For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६२ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली II For Private And Personal प्रसिद्धं च तदन्विते इत्यव्यापकम् । अत्रैके समानतन्त्रप्रसिद्धया केवलान्वयिनः केवलव्यतिरेकिणश्च परिग्रह इति वदन्ति अपरे व्यस्तसमस्तं लक्षणं । तु वदन्ति । अनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्वित इति अन्वयिनो लक्षणम् । अनुमेयेन सम्बद्धं तद्विपरीते च नास्त्येवेति व्यतिरेकिण इति । समस्तं लक्षणमन्वय-व्यतिरेकिण इति । साध्यसाधनत्वं सामान्यलक्षणं त्रयाणाम् । यथा प्रमाणानां यथार्थपरिच्छेदकत्वं सामान्यलक्षणम् । विशेषण के न रहने से हेतु का प्रकृतलक्षण ( केवल ) व्यतिरेकी हेतु में अव्याप्त है । केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में कथित अव्याप्ति का समा-धान कोई इस प्रकार करते हैं कि केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में हेतुत्व का व्यवहार समानतन्त्र ( न्याय दर्शन ) के अनुसार समझना चाहिए ( सिद्धान्ततः वैशेषिक मत से वे दोनों हेतु नहीं है ) । कोई ( इन दोनों को वैशेषिक मत से भी हेतु मानते हुए ) हेतु के लक्षणवाक्य को सम्पूर्ण और खण्डशः दोनों प्रकार से लक्षण का बोधक मान कर उनमें अव्याप्ति दोष का परिहार करते हैं । तदनुसार ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि श्लोक से निम्न लिखित तीन लक्षणवाक्य निष्पन्न होते हैं-( १ ) यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धञ्च तदन्विते । ( अर्थात् जो पक्ष और सपक्ष दोनों में ही रहे वही हेतु है ) । हेतु का यह लक्षण ( केवल ) अन्वयी ( ' विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् ' इस अनुमान के प्रमेयत्व ) हेतु का है ( अर्थात् हेतु के इस लक्षण में ' तदभावे च नास्त्येव ' इस वाक्य से कथित विपक्षावृत्तित्व का प्रवेश नहीं है, अतः केवलान्वयि स्थल में विपक्ष की अप्रसिद्धि से हेतु लक्षण की अव्याप्ति नहीं है ) । ( २ ) यदनुमेयेन सम्बद्धं तदभावे च नास्त्येव । अर्थात् पक्ष में रहे और विपक्ष में न रहे वही ' हेतु ' है । हेतु का यह लक्षण ( केवल ) व्यतिरेकी हेतु के लिए है । अतः ' जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात् ' इत्यादि व्यतिरेकी हेतु में सपक्ष की अप्रसिद्धि के कारण अव्याप्ति नहीं है । क्योंकि हेतु के इस लक्षण में ' प्रसिद्धश्च तदन्विते ' इस वाक्य के द्वारा कथित ' सपक्षसत्त्व ' का निवेश नहीं है ) । ( ३ ) ' यदनुमेयेन सम्बद्धम् ' इत्यादि संपूर्ण श्लोक के द्वारा कथित लक्षण अन्वय-व्यतिरेकी हेतु का है, क्योंकि इसमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व एवं विपक्ष सत्त्व हेतु के ये तीनों ही लक्षण विद्यमान रहते हैं । कथित तीनों हेतुओं में समान रूप से रहनेवाला लक्षण यही है कि ' जो साध्य का साधन करे वही हेतु हैं ' जैसे ' जो यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करे वही प्रमाण है ' यह सभी प्रमाणों का साधारण लक्षण है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान -यत्तु यथोक्तात् त्रिरूपान्लिङ्गादेकेन धर्मेण द्वाभ्यां वा विपरीतं तदनुमेयस्याधिगमे लिङ्गं न भवतीति । एतदेवाह सूत्रकारः-" अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च " ( अ. ३ आ. १ सू. १५ ) इति । उक्त प्रकार से कहे गये ( ( पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व रूप हेतुत्व के सम्पादक ) तीनों धर्मों में से एक या दो धर्मों से रहित कोई वस्तु साध्य क अनुमिति का नहीं ( किन्तु हेत्वाभास ) है । बात ( उनका हेत्वाभासत्व! सूत्रकार ने ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च ' इस सूत्र के द्वारा कही है । न्यायकन्दली विपरीतमतो यत् स्यादिति द्वितीयश्लोकस्यार्थं विवृणोति - यत्त्विति । अनपदेश इति । अपदेशो हेतुर्न भवतीत्यपदेशोऽहेतुरित्यर्थः । अप्रसिद्ध इति विरुद्धासाधारणयोः परिग्रहः, तयोः साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धय-हि सपक्षे साध्यधर्मेण सह भावादहेतुत्वम् । असन्नित्यसिद्धस्यावरोधः, स प्रसिद्धोऽपि धर्मिणि वृत्त्यभावादहेतुः । सन्दिग्धश्चेत्यनैकान्तिकाभिधानम् । स हि धर्मिणि दृश्यमानः किं साध्यधर्मसहचरितः किं वा तद्रहित इति सन्दिग्धो भवति, न पुमरेकं धर्ममुपस्थापयितुं शक्नोति । उभयथा दृष्टत्वादहेतुः । ' यत्तु ' इत्यादि से ' विपरीतमतो यत् स्यात् ' इस दूसरे श्लोक की व्याख्या करते हैं । कथित ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च ' इस सूत्र में प्रयुक्त ' अनपदेश ' शब्द का ' अपदेशो हेतुर्न भवति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' अहेतु ' ( अर्थात् हेत्वाभास ) अर्थ है । उक्त सूत्र के ' अप्रसिद्ध ' शब्द से विरुद्ध और असाधारण इन दोनों को ( ' हेत्वाभास के अन्तर्गत ) समझना चाहिए । ये दोनों इस लिए अहेतु हैं कि साध्य रूप धर्म के साथ इनकी ' प्रसिद्धि ' नहीं है, अर्थात् निश्चय नहीं है, फलतः सपक्षसत्त्व नहीं है । ' असन् ' शब्द से ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास अभिप्रेत है, क्योंकि असिद्ध हेत्वाभास सपक्ष में साध्य धर्म के साथ रहते हुए भी अर्थात् सपक्षवृत्ति होते हुए भी ' धर्मी ' में अर्थात् पक्ष में ही नहीं रहता है, अतः वह हेतु न होकर हेत्वाभास है । ' सन्दिग्धश्च ' इस पद से ' अनैकान्तिक ' को हेत्वाभास कहा गया है । अनैकान्तिक यद्यपि पक्ष में देखा जाता है, किन्तु यह सन्देह बना ही रहता है कि वह साध्य के साथ रहनेवाला है? या साध्याभाव के साथ? इसी सन्देह के कारण वह साध्या साध्याभाव रूप किसी एक धर्म को निश्चितरूप से उपस्थित नहीं कर सकता, क्योंकि वह दोनों के साथ देखा जाता है. अतः वह हेतु नहीं है । धर्मी ( हेतु ) में धर्म ( साध्य ) की अन्वयव्याप्ति एवं व्यतिरेकव्याप्ति इन दोनों के रहने पर भी बोद्धा पुरुष को यदि ' यह हेतु इस साध्य से व्याप्त है ' इस प्रकार For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ४६१ विधिस्तु यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमोऽपि न भवतीत्येवं प्रसिद्धसमयस्यासन्दिग्धधूमदर्शनात् साहचर्यानुस्मरणात् तदनन्तरमग्न्य-व्यवसायो भवतीति । ( अनुमिति की उत्पत्ति को यह ) रीति है कि ' जहाँ जहाँ धूम है, उन सभी स्थानों में वह्नि भी अवश्य ही है, एवं जहाँ जहाँ अग्नि नहीं है, उन सभी स्थानों में घूम भी नहीं है ' इस प्रकार से ' समय ' अर्थात् व्याप्ति का निश्चय जिस पुरुष को है, उसी पुरुष को धूम के असन्दिग्ध दर्शन अर्थात् निश्चय, और उसके बाद उत्पन्न घूम और वह्नि के सामानाधिकरण्य ( एके अधिकरण में रहने ) के स्मरण के बाद अग्नि का ( अनुमिति रूप ) निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है । न्यायकन्दली इदमनेनाविनाभूतमिति ज्ञानं यस्य नास्ति तं प्रति धर्मिणि धर्मस्यान्वय-व्यतिरेकवतोऽपि लिङ्गत्वं न विद्यते, तदर्थमविनाभावस्मरणमनुमेयप्रतीतावनुमाना-ङ्गमिति दर्शयति - विधिस्त्विति । विधिस्तु अनुमेयप्रतीतिप्रकारस्तु, यत्र धूमस्तत्राग्निरग्न्यभावे धूमो न भवतीति । एवं प्रसिद्धसमयस्य प्रसिद्धाविनाभावस्य पुरुषस्या सन्दिग्धधूम-दर्शनाद् धूम एवायम्, न बाष्पादिकमिति ज्ञानात् साहचर्यांनुस्मरणाद् यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येवमनुस्मरणात्, तदनन्तरमग्न्यनुमानं भवति । नन्वेवं द्वितीयो लिङ्गपरामर्शो न लभ्यते? मालम्भि नहि नस्तेन प्रयोजनम्, लिङ्ग-दर्शनव्याप्तिस्मरणाभ्यामेवानुमेयप्रतीत्युपपत्तेः । न च स्मृत्यनन्तरभावित्वादनु-मेयप्रतीतिरनियतदिग्देशा स्यात्? लिङ्गदर्शनस्य नियामकत्वात् । नाप्युपनय से ' अविनाभाव ' रूप व्याप्ति का भान नहीं रहता है, तो फिर उस हेतु में उस साध्य का हेतुत्व ( अर्थात् ज्ञापकत्व ) नहीं रहता है । अतः अविनाभाव ( व्याप्ति ) का स्मरण भी अनुमेय की प्रतीति ( अनुमिति ) का सहकारिकारण है । यही बात विधिस्तु ' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलायी गयी है । ' विधि ' अर्थात् अनुमिति की उत्पत्ति की रोति यह है कि ' जहाँ धूम है वहाँ अग्नि है, एवं जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ धूम भी नहीं है ' इस प्रकार से ' समय ' अर्थात् अविनाभाव ( व्याप्ति ) की प्रतीति जिस पुरुष को है, उसे जब धूम का ' असन्दिग्ध ' ज्ञान अर्थात् ' यह धूम ही है, बाष्पादि नहीं ' इस आकार का ज्ञान होता है, तब ' साहचर्य के अनुस्मरण से ' अर्थात् जहाँ धूम है वहाँ वह्नि है ' इस प्रकार के स्मरण के बाद अग्नि की अनुमिति होती है | ( प्र ० ) यदि अनुमिति का यही क्रम निर्धारित हो जाता है तो फिर ' द्वितीय लिङ्गपरामर्श ' में ( अर्थात् ' साध्यव्याप्तिविशिष्ट-हेतुमान् पक्षः ' इस आकार के परामर्श में ) अनुमिति की कारणता का लाभ न होगा? ( उ ० ) न हो, क्योंकि व्याप्ति का स्मरण और पक्षधर्मता का ज्ञान, इन दोनों से ही अनुमिति की उत्पत्ति हो जाएगी । ( प्र ० ) अनुमिति यदि ( व्याप्ति ) स्मरण के अव्य-वहित उत्तर काल में ही उत्पन्न हो तो फिर वह कब किस देश ( पक्ष में उत्पन्न होगी - इसका कोई नियामक नही होगा? ( उ ० ) ' लिङ्गदर्शन ' ही उसका नियामक होगा For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-वयर्थ्यम्, अवयवान्तरैरप्रतिपादितस्य पक्षधर्मत्वस्य प्रतिपादनार्थ परार्थानुमा तस्योपन्यासात् । अपि भोः । कोऽयमविनाभावो नाम? अव्यभिचारः । स कस्माद्भवति? तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्यामिति सौगताः । यादृच्छिकः सम्बन्धो यथैव भवति, न भवत्यपि तथा च नियमहेतोरभावः । तत्र यदि नाम सपक्षे दर्शनमदर्शनं च विपक्षे, तथाप्यव्यभिचारो न शक्यते ज्ञातुम्, विपक्षवृत्तिशङ्काया अनि-वारणात् । तदुत्पत्तिविनिश्चये तु शङ्का निवार्यते, कारणेन विना कार्यस्या-त्मलाभासंभवात् । तदुत्पत्तिविनिश्चयोऽपि कार्यहेतुः पञ्चप्रत्यक्षोपलम्भानुपलम्भ-साधनः । कार्यस्योत्पत्तेः प्रागनुपलम्भः, कारणोपलम्भे सत्युपलम्भः, उपलब्धस्य ( अर्थात् अनुमिति का पक्षधर्मताज्ञान रूप लिङ्गदर्शन ) जिस पक्ष में होगा, अनुमिति भी नियमतः उसी पक्ष में होगी । एवं उपनय रूप अवयव वाक्य के वैयर्थ्य की आपत्ति भी नहीं होगी, क्योंकि पक्षमता का प्रतिपादन अन्य अवयव वाक्यों से सम्भव नहीं है, अतः पक्षधर्मता का प्रतिपादन करने के लिए ही उपनय वाक्य का परार्थानुमान में प्रयोग होता है । ( प्र ० ) यह ' अविनाभाव ' क्या वस्तु है? यदि यह कहें कि ( उ ० ) अव्यभिचार अविनाभाव है | ( प्र ० ) तो फिर यह पूछना है कि यह अव्यभिचार किससे ज्ञात ) होता है? इस प्रसङ्ग में बौद्धों का कहना है कि ( १ ) तादात्म्य और ( २ ) कार्य की उत्पत्ति इन दोनों से ही अव्यभिचार ( व्याप्ति ) गृहीत होती है । ( १ ) ( तदुत्पत्ति-मूलक व्याप्ति के मानने में यह युक्ति है कि ) दो वस्तुओं का आकस्मिक ( यादृच्छिक ) सम्बन्ध जिस प्रकार कभी होता है । उसी प्रकार कभी नहीं भी होता है । अतः यह सम्बन्ध व्याप्ति का नियामक नहीं हो सकता । ( २ ) यदि उसी हेतु में साध्य की व्याप्ति मानें, जिसकी प्रतीति सपक्ष ( दृष्टान्त ) में हो और विपक्ष में उसकी प्रतीति न हो तो यह भी सम्भव नहीं होगा, क्योंकि इस ( सपक्षदर्शन और विपक्षादर्शन ) के बाद भी हेतु के विपक्ष में होने की सम्भावना का निराकरण नहीं हो सकता । किन्तु जब यह निश्चय हो जाता है कि ' इस हेतु की उत्पत्ति उस साध्य से हुई है ' तो फिर उक्त शङ्का, ( सम्भावना ) का निराकरण हो जाता है, क्योंकि कारण के बिना कार्य की स्वरूपस्थिति ही नहीं हो सकती । ' हेतु रूप कार्यं साध्य रूप कारण से उत्पन्न होता है ' इस प्रकार का निर्णय रूप ' तदुत्पत्ति विनिश्चय ' प्रत्यक्ष रूप उपलम्भ और अनुपलम्भ को मिला कर पांच कारणों से उत्पन्न होता है | ( इनमें तीन कार्य सम्बन्धी हैं ) । ( १ ) उत्पत्ति से पहिले कार्य की अनु-पलब्धि, ( २ ) कारण के उपलब्ध होने पर कार्य की उपलब्धि, एवं ( ३ ) उपलब्ध For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III पश्चात् कारणानुपलम्भादनुपलम्भ इति कार्यस्य द्वावनुपलम्भावेक उपलम्भः, कारणस्य चोपलम्भानुपलम्भाविति । एवमुपलम्भानुपलम्भैः पञ्चभिः सत्ये -वाग्नौ धूमस्य भावोऽसत्यभाव इति निश्चीयते । कार्यस्यैतदेव कार्यत्वं यत् तस्मिन् सत्येव भावोऽसत्यभाव इति तादात्म्यप्रतीत्याप्यविनामावो निश्चीयते । भावस्य न स्वभावव्यभिचारः, निःस्वभावत्वप्रसङ्गात् । तादात्म्यनिश्चयो विपक्षे बाधकस्य प्रमाणप्रवृत्त्या सिद्धयति । अप्रवृत्ते तु बाधके शतशः सहभावदर्शनेऽपि कदाचिदेत द्विपक्षे स्यादिति शङ्कायाः को निवारयिता प्रभवति? तदुक्तम्-कार्यकारणभावाद् वा स्वभावाद् वा नियामकात् । अविनाभावनियमोऽदर्शनान्न तु दर्शनात् ॥ इति । कार्यकारणभावान्नियामकात् स्वभावाद् वा नियामकादविनाभावनियमः, न सपक्षे दर्शनाद् विपक्षे चादर्शनादिति । होने के बाद भी कारण की अनुपलब्धि से कार्य की ( पुन: ) अनुपलब्धि, इस प्रकार कार्य का एक उपलम्भ और दो अनुपलम्भ ये तीन होते हैं । एवं कारण का ( १ ) उपलम्भ और ( २ ) कारण का अनुपलम्भ ये दो हैं । इन उपलम्भों और अनुपलम्भों को मिला-कर इन्हीं पाँच कारणों के रहने पर यह निश्चय होता है कि वह्नि के रहने से ही धूम की सत्ता है, और वह्नि के न रहने से धूम की सत्ता नहीं रहती है । कोई भी वस्तु ' कार्य ' नाम से इसी लिए अभिहित होती है कि कारण के रहने से ही उसकी सत्ता होती है, और कारण के न रहने से उसकी सत्ता नहीं रहती है ( अर्थात् ' कार्य ' वही है जिसकी सत्ता कारण को सत्ता के अधीन हो, और कारण को सत्ता न रहने पर जो सत्ता का लाभ न कर सके ) हेतु में साध्य की तादात्म्य प्रतीति से भी अविनाभाव ( या व्याप्ति ) का निश्चय होता है । यह नहीं हो सकता कि वस्तुओं का स्वभाव उनमें कभी रहे और कभी नहीं, ऐसा मानने पर तो वस्तुओं का कोई स्वभाव हो नहीं रह जाएगा । जिस धर्म के बिना भी धर्मी रह सके वह धर्म उस धर्मी का ' स्वभाव ' कैसे होगा? विपक्ष में बाधकप्रमाण की प्रवृत्ति से ही हेतु में साध्य का तादात्म्य निश्चित्त होता है । यदि विपक्ष में बाधक प्रमाण की प्रवृत्ति न हो तो फिर सैकड़ों स्थानों में साध्य और हेतु दोनों को साथ देखने पर भी ' जहाँ साध्य नहीं है, वहां भी यह हेतु कभी रह सकता है इस शङ्का का निवारण कौन करेगा? यही बात ' कार्यकारणभावाद्वा ' इत्यादि श्लोक के द्वारा इस प्रकार कही गयी है । कि कार्यकारणभाव रूप नियामक और स्वभाव ( तादात्म्य ) रूप नियामक इन दोनों से ही अविनाभाव का निश्चय होता है, हेतु का सपक्ष में दर्शन और विपक्ष में अदर्शन से ( अविनाभाव का निश्चय नहीं होता है ) । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ४ ९ ४ म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली अत्रोच्यते - किं यत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती [ गुणे अनुमान -तत्राव्यभिचारः? कि वा यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्यतदुत्पत्ती? न तावदाद्यः कल्पः, सत्यपि तदुत्पादे धूमधर्मस्य पार्थिवत्वादेरग्निव्यभिचारात् । सत्यपि तादात्म्ये वृक्षत्वस्य विशेषाद् व्यभिचारात् । अथ यत्राव्यभिचारस्तत्र तादात्म्य-तदुत्पत्ती, तर्ह्यव्यभिचारसत्त्वे तयोर्गमकत्वम् । एवं चेत्, अव्यभिचार एवास्तु गमकः, किं तादात्म्यतदुत्पत्तिभ्याम्? कार्यमपि हि न कार्यमित्येव गमयतीति, नापि स्वभावः स्वभाव इति, किं तर्हि? तदव्यभिचारीति, अव्यभिचार एव गमकत्वे कारणं न तादात्म्यतदुत्पत्ती, व्यभिचारात् । न चैवमुपपत्तिमारोहति धूमो वह्निना क्रियते न पार्थिवत्वादयस्तद्धर्मा इति वस्तुनो निर्भागत्वात् । नान्येतदुपलब्धं शिशपा वृक्षात्मिका न वृक्ष: शिशपात्मकः, धवखदिरादिसाधारणत्वादिति, तयोरभेदात् । इस प्रसङ्ग में हम ( वैशेषिक ) लोग पूछते हैं कि ( १ ) क्या जिस साध्य का तादात्म्य जिस हेतु में रहता है, उसी हेतु उस साध्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) रहता है? एवं जिस साध्य से जिस हेतु की उत्पत्ति होती है, उसी हेतु में उस साध्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) रहता है? ( २ ) अथवा जिस हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है, उसी हेतु में उस साध्य का तादात्म्य या जन्यत्व रहता है? इन दोनों में प्रथम कल्प इस लिए ठीक नहीं है कि वह्नि से धूम की उत्पत्ति होने पर भी धूम के पार्थिवत्वादि धर्मों के साथ वह्नि का व्यभिचार है ( अतः पार्थिवत्वादि धर्म से अभिन्न धूम के साथ वह्नि का व्यभिचार भी है ही, क्योंकि धर्म और धर्मी आपके मत से एक हैं ) । एवं ( ' वृक्षः शिशपाया: ' इत्यादि स्थलों में ) शिशपा में यद्यपि वृक्ष का तादात्म्य है, फिर भी वृक्षत्व में ' विशेष ' का अर्थात् शिशपा का व्यभिचार है ( क्योंकि विल्वादि वृक्ष होने पर भी शिशपा नहीं है | ) यदि उसका यह अर्थ करें कि जिस हेतु में साध्य का अव्यभिचार है, वहाँ साध्य निरूपित उत्पत्ति ( साध्य रूप कारण जन्यत्व ) या साध्य का तादात्म्य अवश्य है । तो फिर इसका अभिप्राय यह हुआ कि हेतु में साध्य के अव्यभिचार के रहने के कारण ही उस हेतु में रहनेवाले साध्य के तादात्म्य या साध्य रूप कारणजन्यत्व दोनों में साध्य की ज्ञापकता है । यदि यह स्थिति है तो फिर अव्यभिचार को ही साध्य का ज्ञापक मानिए? साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति को इन सबों को बीच लाने का क्या प्रयोजन है? क्योंकि हेतु अभिन्न है, इन दोनों में से किसी भी कारण से ज्ञापक है कि उसमें किन्तु हेतु इस लिए साध्य का से होती है किन्तु धूम के ) धूम की उत्पत्ति तो वह्नि उत्पन्न नहीं होते । ( उ ० साध्य से उत्पन्न होता है या साध्य से हेतु में साध्य की ज्ञापकता नहीं है, साध्य का अव्यभिचार है । ( प्र ० पार्थिवत्वादि धर्म तो वह्नि से यह कहना भी ठीक नहीं है, I ) क्योंकि वस्तु का एक ही स्वरूप होता है ( अतः धूम को यदि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली YEL यदि धवादिसाधारणी वृक्षता न शिशपात्वम्, तदा नानयोरेकत्वं स्वभाव-मेदस्य मेदलक्षणत्वात् । अभेदे तु यथा वृक्षत्वं सर्ववृक्षसाधारणं तथा शिशपात्व-मपि स्यात् । न च तादात्म्ये गम्यगमकभावे व्यवस्था युक्ता, तस्याभेदाश्रयत्वात् । यदि शिशपात्वे गृह्यमाणे वृक्षत्वमगृहीतम्, क्व तादात्म्यम्? गृहीतं चेत्? ( तत् ) क्वानुमानम्? अथोच्यते - यथावस्थितो धर्मी, शिशपात्वं वृक्षत्वं च त्रयमेकात्मकमेव, तत्र धर्मिणि गृह्यमाणे शिशपात्वं वृक्षत्वमपि गृहीतमेव । यथोक्तम्-तस्माद् दृष्टस्य भावस्य दृष्ट एवाखिलो गुणः । भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्याद् यः प्रमाणैः परीक्ष्यते ॥ इति । वह्नि जन्य मानना है, तो उसमें रहनेवाले वस्तुतः तदभिन्न पार्थिवत्वादि को भी वह्नि जन्य मानना ही होगा ) अतः कथित व्यभिचार है ही । यह भी निश्चय नहीं है कि शिशपा तो वृक्ष रूप है, किन्तु ( वृक्षत्व के आश्रय खदिरादि अन्य वृक्षों में भी नहीं है क्योंकि वृक्ष और शिशपा साधारण रूप से दोनों अभिन्न हैं । रहने के कारण वृक्षत्व शिशपा स्वरूप यदि ( प्र ० ) यह कहें कि वृक्षत्व ( शिशपा की तरह उससे भिन्न ) धवादि में भी है किन्तु शिशपात्व तो केवल शिशपा में ही है, धवादि में नहीं । ( उ ० ) तो फिर वृक्षत्व और शिशपात्व दोनों एक नहीं हो सकते, क्योंकि स्वभावों की विभिन्नता ही वस्तुओं की विभिन्नता है । यदि शिशपात्व और वृक्षत्व को अभिन्न मानें तो फिर जिस प्रकार वृक्षत्व सभी वृक्षों में रहता है, उसी प्रकार ( वृक्षत्व से अभिन्न ) शिशपास्व की सत्ता भी सभी वृक्षों में माननी ही पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि यदि वृक्षत्व और शिशपात्व में अभेद मानें तो यह निर्द्धारण नहीं हो सकता कि शिशपात्व ही वृक्षत्व का ज्ञापक है, वृक्षत्व शिशपात्व का ज्ञापक नहीं । क्योंकि ज्ञाप्यज्ञापकभाव भेदों के अधीन है ( अर्थात् ज्ञाप्य और ज्ञापक को परस्पर भिन्न ही होना चाहिए ) । शिशपात्व का ज्ञान हो जाने पर भी यदि वृक्षत्व अज्ञात ही रहता है, तो फिर शिशपात्व और वृक्षत्व में तादात्म्य कहाँ? यदि शिशपात्व के गृहीत होने पर उसी ज्ञान से वृक्षत्व भी गृहीत हो जाता है, तो फिर वृक्षत्व के अनुमान की ही कौन सी सम्भावना है? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अपने स्वरूप में अवस्थित शिशपावृक्ष रूप धर्मी एवं वृक्षत्व और शिशपात्व रूप दोनों धर्मं, ये तीनों वस्तुतः एक ही हैं । अतः धर्मी के गृहीत होने पर वृक्षत्व और शिशपात्व रूप उसके धर्म भी उसी ज्ञान से गृहीत हो जाते हैं । जैसा कहा गया है कि " तस्मात् किसी भी धर्मी के प्रत्यक्ष होने पर १. अर्थात् वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में अगर अभेद है एवं इस कारण शिंशपा वृक्षात्मक है तो फिर यह कैसे कह सकते हैं वृक्ष शिंशपात्मक नहीं है । For Private And Personal