प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 571–580
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 571–580
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir YEL न्यायकन्दलो संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान -यदेवं शिशपाविकल्पो जातो न वृक्षविकल्पः, स वृक्षशब्दस्मृत्यभावापरा-धात् शिशपाशब्दसंस्कारप्रबोधजन्मना शिशपाविकल्पेन चाशिशपाव्यावृत्तिपर्यव सितेन नावृक्षव्यावृत्तिरुपनीयते, सर्वविकल्पानां पर्यायत्वप्रसङ्गात् । गम्यगमक-भावश्च व्यावृत्त्योरेव नानयोर्न वस्तुनः, तस्यान्वयाभावात् । अवृक्षव्यावृत्यशिश-पाव्यावृत्ती च परस्परं भिन्ने, व्यावर्त्यभेदात् । अतो यथोक्तदोषानुपपत्तिरिति । अहो पूर्वापरानुसन्धाने परं कौशलं पण्डितानाम्? तादात्म्यमनुमानबीजम्, साध्यसाधन-भूतयोर्व्यावृत्त्योः परस्परं भेद इति किमिदमिन्द्रजालम्? वृक्षशशपयोस्तादात्म्यं उसी प्रत्यक्ष के द्वारा उसके सभी धर्मों का भी प्रत्यक्ष हो जाता है । अतः उसका कौन सा अंश देखने से बच जाता है, जिसकी परीक्षा अन्य प्रमाणों से की जाय । " तब यह बात रही कि ( उस ज्ञान में शिवपात्व की तरह वृक्षत्व भी यदि भासित होता है तो फिर ) उस विकल्प ( विशिष्ट ज्ञान ) का अभिलाप ' यह शिशपा है ' इस शब्द के द्वारा क्यों होता है? ' यह वृक्ष है ' इस प्रकार के शब्दों के द्वारा क्यों नहीं? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि उस समय वृक्ष शब्द की स्मृति नहीं रहती है । इसी स्मृति के न रहने के ' अपराध ' से हो वृक्ष शब्द से उसका अभिलाप नहीं हो पाता । शिशपा शब्द की स्मृति से जिस शिशपा विषयक विकल्प ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसका पर्य-वसान ' अशिशपाव्यावृत्ति ' रूप ' अपोह ' में हो होता है, उससे ' अवृक्षव्यावृत्ति ' रूप ' अपोह ' का ज्ञान नहीं होता । यदि ऐसा हो तो सभी विशिष्ट ज्ञानों के बोधक शब्द एकार्थक हो जएँगे ( अर्थात् सभी ज्ञान एक विषयक हो जाएँगे ) । एक की व्यावृत्ति ( अपोह ) ही दूसरी व्यावृत्ति की ज्ञापिका हो सकती है ( फलतः ज्ञाप्यज्ञापकभावसम्बन्ध दो अपोहो में ही हो सकता है ) किन्तु व्यावृत्ति के आश्रयों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव नहीं हो सकता, क्योंकि ( क्षणिक होने के कारण उनमें परस्पर सामानाधिकरण्य रूप ) अन्वय हो सम्भव नहीं है । ( वृक्ष और शिशपा इन दोनों के अभिन्न होने पर भी ) अवृक्षव्यावृत्ति और अशिंशपाव्यावृत्ति ये दोनों अपोह तो भिन्न हैं क्योंकि दोनों अपोहों के व्यवच्छेद्य भिन्न हैं अतः कथित ( सभी ज्ञानों में एक विषयत्व की ) आपत्ति नहीं है । ( उ ० ) यह तो आप जैसे पण्डितों का आगे और पीछे अनुसन्धान करने की अपूर्व ही चतुरता है, जिससे यह इन्द्रजाल सम्भव होता है कि तादात्म्य ( अभेद ) को तो अनुमान का प्रयोजक मानते हैं, और कहते हैं कि साध्य और साध्य से अभिन्न हेतु इन दोनों की व्यावृत्तियाँ ( अपोह ) भिन्न १. उक्त विवरण के अनुसार शिंशपात्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह केवल शिशपा में ही रहे, और वृक्षत्व का यह स्वभाव निष्पन्न होता है कि वह शिंशपा में रहे और उससे भिन्न धवखदिरादि सभी वृक्षों में भी रहे, तो फिर विभिन्न स्वभाव की ये दोनों वस्तुएँ एक कैसे हो सकतीं हैं? For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] काल्पनिकः । कश्चिदहेतुर्नाम । ६३ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् III न्यायकन्दली For Private And Personal तदात्मतया च व्यवस्थितयोरवृक्षव्यावृत्यशिशपाव्यावृत्त्योः सत्यपि भेदे यथाध्यवसायं तादात्म्यमिति चेत्? सिद्धे तादात्म्ये सत्यशिशपाव्यावृत्त्या धर्मिण्यवृक्षव्यावृत्तिरध्यवसेया, तत्राध्यवसितायामवृक्षव्यावृत्तौ यथाध्यवसायं तादात्म्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषः 1 व्याप्तिग्रहणवेलायामेकात्मतया-ध्यवसितयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यसिद्धिरिति चेत्? तथाध्यवसितयोरभेद: यद्यनुमानं कल्पनासमारोपेणापि प्रवर्त्तेत, न प्रमेयत्वानित्यत्वयोरप्येकात्मतयाध्यवसितयोर्यथाध्यवसायं हैं । ( प्र ० ) वृक्ष और शिशपा इन दोनों में यद्यपि तादात्म्य है, किन्तु वृक्ष और शिशपा इन दोनों से क्रमशः अभिन्न रूप से निश्चित अवृक्षव्यावृत्ति ( वृक्षभिन्न-भिन्नत्व ) और अशिशपाव्यावृत्ति ( शिशपा- भिन्नभिन्नत्व ) ये दोनों व्यावृत्तियाँ परस्पर भिन्न हैं । अतः दोनों व्यावृत्तियों में वास्तविक भेद रहते हुए भी ज्ञानीय अभेद ( अर्थात् ' दोनों अभिन्न हैं ' इस आकार के भ्रमात्मक ज्ञान के द्वारा गृहीत अभेद ) है, और इसी अभेद के कारण अशिशपाव्यावृत्ति रूप हेतु के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होता है | ( उ ० ) यह कहना भी सम्भव नहीं है ( क्योंकि इससे अन्योन्याश्रय दोष होगा ) चूँकि तादात्म्य के रहने पर अशिशपाव्यावृत्ति के द्वारा वृक्ष रूप धर्मी में अवृक्ष-व्यावृत्ति का अनुमान होगा, कथित साध्य साधनभूत दोनों व्यावृत्तियों में तादात्म्य तब होगा जब कि पक्ष रूप शिशपा में अनुमान के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति की प्रतीति हो जाएगी, अतः अन्योन्याश्रय दोष होगा । ( प्र ० ) व्याप्ति ज्ञान के समय में ही जो दोनों व्यावृत्तियों का अभेद गृहीत होता है, उसी से तादात्म्य की सिद्धि होती है अतः ( अनुमिति-मूलक उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है ) | ( उ ० ) तो फिर यह कहिए कि अभिन्न रूप से ज्ञायमान दोनों व्यावृत्तियों का अभेद काल्पनिक है, वास्तविक नहीं । यदि हेतु प्रभृति के काल्पनिक ज्ञान से भी अनुमान को प्रवृत्ति मानें तो हेत्वाभास नाम की कोई ही नहीं रह जाएगी । इस प्रकार तो प्रमेयत्व एवं अनित्यत्व इन दोनों में भी वस्तु एकात्मता ( अभेद ) का विपर्यय हो ही सकता है, और इस विपर्यय रूप अध्यवसाय के द्वारा प्रमेयत्व और अनित्यत्व में भी काल्पनिक अभेद रहेगा ही । ( प्र ० ) ( जहाँ अनित्यत्वं नहीं है, वहाँ भी प्रमेयत्व है, इस प्रकार ) विपक्षव्यावृत्ति के न रहने के कारण प्रमेयत्व १. अवृक्षव्यावृत्त हैं वृक्ष से भिन्न सभी पदार्थों के भेदों का समूह एवं अशिंशपा-व्यावृत्त है शिंशपावृक्षमात्र को छोड़ और सभी पदार्थों के भेदों का समूह, इन दोनों भेदों के समूह भिन्न हैं, क्योंकि दोनों भेदों के प्रतियोगी समूह अलग अलग हैं, पहले प्रतियोगि समूह में शिंशपा नहीं है, क्योंकि शिंशपा भी वृक्ष ही है । दूसरे समूह में शिंशपा को छोड़-कर और सभी वृक्ष भी हैं क्योंकि सभी वृक्ष शिंशपा नहीं हैं ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir YL न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-तादात्म्यसंभवात् । विपक्षव्यावृत्त्यभावात् प्रमेयत्वस्यानित्यत्वेन सह तादात्म्या-भाव इति चेत्? सत्यम्, वास्तवं तादात्म्यं नास्ति, कल्पनासमारोपितं तावदस्त्येव, तदेवानुमानोदयबान्धवं समर्थितवन्तो यूयमिति विपक्षादव्यावृत्तिरसत्समा । अपि च तादात्म्ये तदुत्पादे च यस्य प्रतीतिविपक्षे हेत्वभावप्रतीत्या, तदभावप्रतीतिरपि दृश्यानुपलब्धेः, अनुपलब्धिश्चानुमानभूतत्वात् स्वसाध्येन विपक्षे हेत्वभावेन सह तादात्म्यप्रतीत्या तदुत्पादप्रतीत्या वा प्रवर्तते, तस्या अपि स्वसाध्येन तादात्म्यतदुत्पादनिश्चयो विपक्षे वृत्त्यभावप्रतीत्या, तदभावप्रतीतिश्चानुपल-बध्यन्तरसापेक्षा यावान् प्रतिषेधः स सर्वोऽप्यनुपलब्धिविषय इत्यभ्युपगमात् । ततश्चानवस्थापाताद् व्यतिरेकासिद्धौ तादात्म्यतदुत्पादासिद्धेर्न स्वभावः कार्य वा हेतुः । किञ्च तादात्म्यतदुत्पत्त्योरभावेऽपि कृत्तिकोदयरोहिण्यस्तङ्गमनयो-गम्यगमकभावः प्रतीयते । तस्मात् कार्यकारणभावाद वा नियमः स्वभावाद् वेत्यनालोचिताभिधानम् । के साथ अनित्यत्व का तादात्म्य नहीं है । ( उ ० ) यह सत्य है कि उन दोनों में प्रामा-णिक तादात्म्य नहीं है, किन्तु काल्पनिक तादात्म्य तो है, तुम लोगों ने काल्पनिक तादात्म्य को ही तो अनुमानोदय के परम सहायक रूप में समर्थन किया है? अतः प्रकृत में विपक्षव्यावृत्ति का रहना और न रहना दोनों ही बराबर हैं । और भी बात है कि व्याप्ति के प्रयोजक तादात्म्य और उत्पत्ति के रहने पर विपक्ष में हेतु के जिस अभेद की प्रतीति से जिसकी प्रतीति होगी, उस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए भी श्यानुपलब्धि की आवश्यकता होगी, क्योंकि अभाव विषयक सभी प्रतीतियों के लिए दृश्यानु-पलब्धि को कारण माना गया है । दृश्यानुपलब्धि भी कोई अतिरिक्त प्रमाण नहीं है, किन्तु अनुमान ही है । अत: इस दृश्यानुपलब्धि रूप अनुमान प्रमाण के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव के साथ - साथ हेतु में साध्य के तादात्म्य या उत्पत्ति की प्रतीति आवश्यक होगी । इस तादात्म्य और उत्पत्ति की प्रतीति के लिए भी विपक्ष में हेत्वभाव की प्रतीति आवश्यक होगी । एवं इस हेत्वभाव की प्रतीति के लिए फिर दूसरी दृश्यानुपलब्धि आवश्यक होगी, क्योंकि जितने भी प्रतिषेध हैं, सभी को अनुपलब्धि प्रमाण का विषय माना गया है । इस अनवस्था दोष के कारण विपक्ष में हेतुव्यतिरेक ( हेत्वभाव ) की सिद्धि सम्भव न होने के कारण कथित तादात्म्य एवं उत्पत्ति की सिद्धि हो सम्भव नहीं है, अतः हेतु में साध्य का तादात्म्य या हेतु का साध्य से उत्पन्न होना ही हेतु में साध्य की व्याप्ति का कारण नहीं हो सकता । दूसरी बात यह है कि कृत्तिका नक्षत्र का उदय एवं रोहिणी नक्षत्र का अस्त इन दोनों में ज्ञाप्यज्ञापकभाव की प्रतीति होती है, किन्तु इन दोनों में से न किसी का किसी में तादात्म्य है और न किसी की उत्पत्ति ही किसी से होती है । तस्मात् बिना पूर्ण आलोचन के ही यह कह दिया गया है कि ' नियम ' अर्थात् व्याप्ति की प्रतीति हेतु में साध्य की जन्यता या तादात्म्य की प्रतीति से ही होती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III स्वभावेन हि कस्यचित् केनचित् सह सम्बन्धो नियतो निरुपाधि-कत्वात् उपाधिकृतो हि सम्बन्धः तदपगमार्थं निवर्तते, न स्वाभाविकः । यदि धूमस्योपाधिकृतो वह्निसम्बन्ध:? उपाधय उपलब्धाः स्युः, शिष्या. चार्ययोरिव प्रत्यासत्तावध्ययनम् । नहि वह्निधूमयोरसकृदुपलभ्यमानयोस्त-दुपाधीनामनुपलम्भे किञ्चिद् बीजमस्ति । न चोपलभ्यमानस्य नियमेनानुपलम्या भवन्त्युपाधयः, ते हि यदि स्वरूपमात्रानुबन्धिनस्तथाप्यव्यभिचारसिद्धिः, तत्कृ-तस्यापि सम्बन्धस्य यावद्द्रव्यभावित्वात् । अथागन्तवः? तत्कारणान्यपि प्रती. येरन् । उपाधयस्तत्कारणानि च सर्वाण्यतीन्द्रियाणीति गुर्वीयं कल्पना । यस्य चोपाधयो न सन्ति स धूमः कदाचित् स्वतन्त्रोऽप्युपलभ्येत, यथेन्धनोपाधिकृत-धूमसम्बन्धो वह्निः शुष्केन्धनकृताधिपत्यो विधूमः प्रत्यवमृश्यते । न च तथा संविदन्तरे धूमः कदाचिन्निरग्निराभाति । तस्मादुपलब्धिलक्षणप्राप्ताना-अभिप्राय यह है कि स्वभाव के द्वारा ही किसी भी वस्तु का किसी वस्तु के साथ जो सम्बन्ध स्थापित होता है वही उपाधि से शून्य होने के कारण ' नियम ' कहलाता है । उपाधिमूलक सम्बन्ध हो उपाधि के हटने पर टूटता है, स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं 1 । यदि धूम में वह्नि का सम्बन्ध भी उपाधिमूलक ही हो तो फिर उन उपाधियों की उपलब्धि उसी प्रकार होनो उचित है, जिस प्रकार कि शिष्य और आचार्य की उपलब्धि के बाद अध्ययन रूप उपाधि की उपलब्धि होती है । इसका कोई हेतु नहीं मालूम होता कि बार बार उपलब्ध होनेवाले वह्नि और धूम के सम्बन्ध की उपलब्धि तो हो, किन्तु उसकी प्रयोजिका उपाधि की उपलब्धि न हो । इसमें भी कोई हेतु नहीं है, कि उपलब्ध होनेवाली वस्तुओं के सम्बन्ध की उपाधियाँ नियमतः अनुपलभ्य ही हों । ये ( उपाधियाँ ) यदि अपनी स्वरूपसत्ता के कारण ही अपने उपधेयों ( साध्य और हेतुओं ) के सम्बन्ध के कारण हैं, फलतः नित्य हैं । तो भी व्याप्ति की सिद्धि हो ही जाती है, क्योंकि यह औपाधिक सम्बन्ध अपने उपधेय रूप सम्बन्बियों की सत्ता तक विद्यमान ही रहता है । यदि ये आगन्तुक हैं? अर्थात् कारणों से उत्पन्न होते हैं तो फिर उनके कारणों की भी प्रतीति होनी चाहिए । यह कल्पना तो बहुत गौरवपूर्ण होगी कि उपाधियाँ और उनके कारण सभी अतीन्द्रिय ही हैं । जिन हेतुओं के उपाधि नहीं होते, वे कदाचित् स्वतन्त्र रूप से ( साध्य सम्बन्ध के बिना ) भी उपलब्ध होते हैं । किन्तु उपाधि से रहित धूम हेतु कभी भी स्वतन्त्र रूप से ( वह्नि को छोडकर ) उपलब्ध नहीं होता है, जैसे कि उपाधिमूलक सम्बन्ध के योग्य वह्नि ही जब सूखी हुई लकड़ियों से उत्पन्न होती है तो बिना धूम सम्बन्ध के भी देखी जाती है, यद्यपि वह्नि ही जब गीली लकड़ी से उत्पन्न होती For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-मुपाधीनामनुपलम्भादभावप्रतीतौ ( उपलब्धानामनुपलम्भादभावप्रतीतौ ) उपलब्धानां शेषकालेन्धनावस्थाविशेषाणां पुनः पुनर्दर्शनेषु व्यभिचाराद-हेतुत्वनिश्चये सति निखिल देशकालादिविशेषाध्याहारेण न उपाध्यभावोपलब्धि-दोषः । सहभावदर्शनजसंस्कार सहकारिणा निरस्त प्रतिपक्षशङ्केन चरमप्रत्यक्षेण धूमसामान्यस्याग्निसामान्येन स्वभावमात्राधीनं सहभावं निश्चित्य इदमनेन नियतमिति नियमं निश्चिनोति । यद्यपि प्रथमदर्शनेऽपि सहभावो गृहीतः, तथापि न नियमग्रहणम् । नहि सहभावमात्रान्नियमः अपि तु निरुपाधिकसहभावात् । निरुपाधिकत्वं च तस्य भूयो दर्शनाभ्यासावशेषमित्यतो भूयः सहभावग्रहणबलभुवा सविकल्पक-प्रत्यक्षेण सोऽध्यवसीयत इति । एतेन प्रत्यक्ष उपलब्धविद्यमानविष-यत्वादतीतानागतासु व्यक्तिषु कथं नियमग्रहणमिति प्रत्युक्तम् । तब उसमें धूम के उपाधिमूलक सम्बन्ध की भी योग्यता है, किन्तु धूम की कोई भी प्रतीति वह्नि सम्बन्ध को छोड़कर नहीं होती है । तस्मात् जिन उपाधियों में उपलब्ध होने की योग्यता है ( अर्थात् जिनकी उपलब्धि हो सकती हैं ) उनकी अनुपलब्धि से ही उपाधियों के अभाव की सिद्धि होती है । इस प्रकार उपाधि के अभाव की प्रतीति हो जाने पर आर्द्रेन्धन संयोग रूप उपाधि से युक्त वह्नि हेतु में बार बार धूम का व्यभिचार देखे जाने पर वह्नि हेतु में अहेतुत्व ( हेत्वाभासत्व ) का निश्चय हो जाता है । अत: ' सभी देशों में या सभी कालों में उपाधि के अभाव की उपलब्धि नहीं हो सकती ' केवल इसी कारण सभी हेतुओं में उपाधि संशय की आपत्ति नहीं दी जा सकती । अतः धूम सामान्य में वह्नि सामान्य का जो स्वाभाविक सामानाधिकरण्य है, उसके निश्चय से हो ' यह ( धूम ) इससे ( वह्नि से ) नियत है ' इस प्रकार से ( व्याप्ति रूप ) नियम का ज्ञान होता है । ( व्याप्ति के कारणीभूत उक्त सामानाधि-करण्य का निश्चय ) प्रतिपक्ष शङ्का से रहित उस अन्तिम प्रत्यक्ष से होता है, जिसमें उसे सहभाव विषयक प्रत्यक्ष से उत्पन्न संस्कार के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । यद्यपि प्रथमतः ही जब धूम और वह्नि साथ साथ देखे जाते हैं, तब भी दोनों का सामानाधिकरण्य गृहीत ही रहता है, तथापि उससे नियम ( व्यासि ) का ग्रहण नहीं होता । किन्तु उपाधिरहित सहभाव से ही व्याति का ग्रहण होता है । बार बार साध्य और हेतु को साथ देखने से ही उपाधि के अभाव का निश्चय होता है | अतः बार बार सामानाधिकरण्य के दर्शन के द्वारा बलप्राप्त ( सामानाधिकरण्य विषयक ) सवि -कल्पक प्रत्यक्ष से हो वह ( नियम ) गृहीत होता है । इससे नियम ( ब्याप्ति ) ग्रहण के प्रसङ्ग में इस आपत्ति का भी समाधान हो जाता है कि ( प्र ० ) प्रत्यक्ष केवल वर्तमान काल की वस्तुओं का हो होता है, अतीत में बीते हुए एवं भविष्य काल में होनेवाले For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली vat विशेषनिष्ठं व्याप्तिग्रहणमाचक्ष्महे । विशेषहान्या सामान्येन व्याप्तिग्रहणे तु सर्वत्रैव निर्विशङ्कः प्रत्ययः, तस्य सर्वत्रैकरूपत्वात् । किं व्यक्तयो व्याप्तावप्रविष्टा एव? को वै ब्रूते न प्रविष्टा इति । किन्तु सामान्यरूपतया न विशेषरूपेण । अत एव धूमसंवित्या वह्निमात्रमेवानुसन्दधानस्तमनुधावति न विशेषमाद्रियते । यदि तु सामान्येन सर्वत्र निश्चितेऽपि नियमे निष्प्रामाणिकैराशङ्का क्रियते, तदा त्वत्पक्षेऽपि प्रत्यक्षेण दृष्टासु वह्निधूमव्यक्तिषु गृहीतेऽपि कार्यकारणभावे देशकालव्यवहितात् तद्भावसन्देहादत्रानुमानाप्रवृत्ति को निवारयति? अथोच्यते - भूयोदर्शनेन कार्यकारणभावो निर्द्धार्यते, सकृद्दर्शनेन तदु-पाधिजत्वशङ्काया अनिवर्तनात् । भूयोदर्शनं च सामान्यविषयम्, क्षणिकानां व्यक्तीनां पुनः पुनर्दर्शनाभावात् । तेनानग्निव्यावृत्तस्याधूमव्यावृत्तस्य च सामान्य-अनन्त हेतु ( धूमादि ) व्यक्तियों में ( वह्नि आदि ) साध्य के नियम ( व्याप्ति ) का ( प्रत्यक्ष रूप ) ग्रहण कैसे होगा? ( उ ० 1 ) हम लोग विशेष व्यक्तियों में अलग अलग व्याप्तिग्रहण नहीं मानते, किन्तु विशेष को ोड़कर केवल हेतुसामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति का ग्रहण मानने से ही सभी हेतुओं में व्याप्ति का शङ्का से सर्वथा रहित निश्चय हो जाएगा । क्योंकि सामान्यमुखी व्याप्ति सभी व्यक्तियों में समान । ( प्र ० ) तो क्या व्याप्तिग्रहण में विशेष्य रूप से ( हेतु ) व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता? ( उ ० ) कौन कहता है कि व्याप्ति के ग्रहण में व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता है । ' व्याप्ति सामान्य विषयक ही है, विशेष विषयक नहीं ' इसका इतना ही अभिप्राय है कि व्याप्ति-बुद्धि में विशेष भी सामान्य रूप से ही भासित होते हैं, अपने असाधारण तत्तद्वयक्तित्वादि रूपों से नहीं । अत एव धूम के ज्ञान से वह्नि सामान्य की अनुमिति के द्वारा प्रमाता वह्नि सामान्य का ही अनुधावन करता है, किसी विशेष प्रकार के वह्नि का आदर वह नहीं करता । यदि हेतु सामान्य में साध्य सामान्य की व्याप्ति के निश्चित हो जाने पर भी अत्रामाणिक लोग यह शङ्का करें कि तुम्हारे मत में भी यह कहा जा सकता है कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धूम और प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत इन दोनों में कार्यकारणभाव के गृहीत होने पर भी विभिन्न देशों के धूमों और वह्नियों में एवं विभिन्न काल के धूमों और वह्नियों में कार्यकारणभाव का सन्देह बना ही रहेगा तो फिर इस सन्देह के कारण सभी अनुमानों के उच्छेद का निवारण कौन कर सकेगा? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) हेतु और साध्य को बार बार एक स्थान में देखने ( भूयो दर्शन ) से दोनों में कार्यकारणभाव का निश्चय होता है । कहीं एक बार हेतु और साध्य दोनों में सामानाधिकरण्य के देखने पर भी यह संशय रह ही जाता है कि इन दोनों का सम्बन्ध स्वाभाविक है, या औपाधिक? बार बार का यह देखना ( भूयो -दर्शन ) साध्य सामान्य का हेतु सामान्य के साथ ही हो सकता है, एक साध्य व्यक्ति For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान -विषय: कार्यकारणभाव एकत्र निश्चीयमानः सर्वत्र विनिश्चितो भवति, सामान्य-स्यैकत्वादिति चेत्? अस्माभिरपीत्थमेव सर्वत्र निश्चीयमानो नियमः किं भवद्भ्यो न रोचते? किञ्च भवतां प्रत्यक्षागोचरः सामान्येन कार्यकारणभावः, अनुभवतोऽ-वस्तुत्वात् व्यक्तयस्तादृश्यः । तासु सर्वाणि प्रत्यक्षेण गृह्यन्ते । न चातीता-नागतानां व्यक्तीनां मनसा संकलनमिति न्याय्यम्, मनसो बहिरर्थे स्वातन्त्र्येऽन्ध-बधिराद्यभावप्रसङ्गात् । दृष्टासु व्यक्तिषु कार्यकारणभावोऽध्यवसायश्चादृष्टासु नानुमानोदयस्तदन्यत्वात् । नापि व्यक्तीनां साध्यसाधनभावो युक्तः, परस्पर-मनन्वितत्वात् । न च तासामेकेन सामान्येनोपग्रहः, वस्त्ववस्तुनोः सम्बन्धा-भावात् असम्बद्धस्योपग्राहकत्वे चातिप्रसङ्गात् । तत्किविषय: प्रत्यक्षसाधनस्त-दुत्पादविनिश्चयः यस्मादनुमानप्रवृत्तिरिति न विद्मः । का एक हेतु व्यक्ति के साथ नहीं, क्योंकि व्यक्ति क्षणिक हैं । अतः उनको बार बार साथ देखना सम्भव नहीं है । तस्मात् अनग्निव्यावृत ( अपोह या अग्नित्व जाति ) अधूम व्यावृत्त ( अपोह या धूमत्व जाति ) इन दोनों का सामान्य विषयक कार्यकारणभाव ही गृहीत होता है । ' धूम सामान्य की उत्पत्ति वह्निसामान्य से होती है ' यह निश्चित हो जाने पर सभी घूमों और सभी वह्नियों में कार्यकारणभाव गृहीत हो जाता है, क्योंकि सामान्य ( अपोह ) एक ही है । ( उ ० ) इसी प्रकार जब हम हेतु सामान्य में साध्य सामान्य के नियम ( व्याप्ति ) का उपपादन करते हैं, तो आप लोगों को क्यों पसन्द नहीं आता? आप लोगों का सामान्य ( अपोह ) चूंकि अभाव रूप है, अतः सामान्यों में आप लोग ( बौद्धगण ) कार्यकारणभाव का अनुभव नहीं कर सकते । व्यक्ति सभी प्रत्यक्ष के विषय हैं अतः उनमें कार्यकारणभाव का ग्रहण होता है । यह कहना भी उचित नहीं है कि ( प्र ० ) भूत और भविष्य व्यक्तियों का ( चक्षुरादि से ज्ञान सम्भव न होने पर भी ) मन से ग्रहण हो सकता है ( अतः अतीत और अनागत व्यक्तियों में भी कार्यकारणभाव का ग्रहण असम्भव नहीं है ) | ( उ ० ) ( यह सम्भव इस लिए नहीं है कि ) मन को यदि बाह्य अर्थों के ग्रहण में स्वतन्त्र ( अर्थात् चक्षुरादि निरपेक्ष ) मान लिया जाय तो जगत् में कोई गूँगा या बहरा न रह जाएगा । इस प्रकार भी बोद्धों के मत से उपपत्ति नहीं की जा सकती कि प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत व्यक्तियों में हो कार्यकारण भाव गृहीत हो सकता है, किन्तु ( व्याप्ति ) का निश्चय अदृष्ट व्यक्तियों में भी होता है, चूँकि व्यक्ति भिन्न भिन्न हैं । व्यक्तियों में परस्पर कार्यकारणभाव भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वे परस्पर असम्बद्ध हैं । उन सभी व्यक्तियों का एक सामान्य धर्म ( अपोह ) के द्वारा संग्रह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वस्तु ( भाव ) और अवस्तु ( अभाव ) इन दोनों में सम्बन्ध हो ही नहीं सकता, यदि सम्बन्ध के न रहने पर भी संग्रह मानें तो ( अघटव्यावृत्ति रूप अपोह से पट व्यक्तियों का संग्रह रूप ) अतिप्रसङ्ग होगा । अतः यह For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् एवं सर्वत्र शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं देशकालाविनाभूतमितरस्य निदर्शनार्थं इसी प्रकार और सभी स्थानों में ५०३ लिङ्गम् । कृतं नाव-एक वस्तु में जिस रहती है, वह । वैशेषिक सूत्र उल्लेख है, वह किसी दूसरी वस्तु की दैशिक और कालिक व्याप्ति एक वस्तु उस दूसरे का ज्ञापक हेतु होता है में जो व्याप्ति के लिए कार्यादि सम्बन्धों का न्यायकन्दली एवं देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम्, यथा धूमो वह्नेलिङ्गम् । एवं देशाविनाभूतं कालाविनाभूतं चेतरस्य साध्यधर्मस्य लिङ्गम् । यथा काश्मीरेषु सुवर्णभाण्डागारिक पुरुषैर्यववाटिकासंरक्षणं यवनालेषु हेमाङकुरोद्भेदस्य लिङ्गम् । कालाविनाभूतं यथा प्राग्ज्योतिषाधिपतेर्वेश्मनि प्रातर्गायनादीनि नृपतिप्रबोधस्य लिङ्गम् । यदि देशकालाविनाभावमात्रेण गमकत्वं ननु सूत्र-विरोध:? अस्येदं कार्यं कारणं संयोगि विरोधि समवायि चेति लैङ्गिकमिति, समझ में ही नहीं आता कि प्रत्यक्ष के द्वारा किसमें उत्पत्ति का निश्चय होगा? जिससे कि अनुमान की प्रवृत्ति होगी । इसी प्रकार ( साध्य की ) दैशिक या कालिक व्याप्ति से युक्त एक पदार्थ ( हेतु ) दूसरे ( साध्य ) का ज्ञापक हो जाता है । जैसे कि धूम वह्नि का ज्ञापक हेतु है | ( अभिप्राय यह है कि ) दैशिक और कालिक व्याप्ति से युक्त ' एक ' ( हेतु ) पदार्थ ' इतर ' का अर्थात् साध्य रूप धर्म का ज्ञापक हेतु होता है । ( दैशिक व्याप्ति से युक्त हेतु का उदाहरण यह है ) जैसे कि काश्मीर देश में जब यह देखा जाता है कि यव के क्यारियों का संरक्षण सोने के खजाने के अधिकारी लोग कर रहे हैं, तब यह समझा जाता है कि यब की क्यारियों में केसर के अङ्कुर उग आये हैं अतः काश्मीर देश की यव की क्यारियों का सोने के खजाने के अधिकारियों द्वारा संरक्षण ( रूप क्रिया ) यव को क्यारियों में केसर के अङ्कुर का ज्ञात हेतु है । ( एवं कालिक व्याप्ति से युक्त हतु का उदाहरण यह है ) जैसे कि प्राग्ज्योतिषपुर ( आसाम ) के में राजगृह प्रातःकालिक गाना बजाना वहाँ के राजा के जागरण का ज्ञापक हेतु है । ( प्र ० ) यदि दैशिक व्याप्ति और कालिक व्याप्ति केवल इन दोनों सम्बन्धों में से किसी के रहने से ही हेतु में साध्य को समझाने का सामर्थ्य माना जाय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान -धारणार्थम्, कस्मात् १ व्यतिरेकदर्शनात् । तद्यथा अध्वर्युरों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुर्लिङ्गम्, चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च केवल उदाहरण के लिए ही है, अवधारण के लिए नहीं । क्योंकि ( कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से किसी के न रहने पर भी अनुमान होता है ) जैसे कि ओंकार को सुनाते हुए अध्वर्यु समूह अपने से व्यवहित भी होता हवन करनेवाले ) के अनुमापक होते हैं । अथवा चन्द्र का उदय समुद्र की वृद्धि और कुमुद के विकास का अनुमापक होता है । अथवा शरद् ऋतु में जल की न्यायकन्दली तत्राह - शास्त्रे च कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतं नावधारणार्थमिति । अस्येदमिति सूत्रे कार्यादीनामुपादानं लिङ्गनिदर्शनार्थं कृतम्, न त्वेतावन्त्येव लिङ्गानीत्यव-धारणार्थम् । कथमेतदित्याह - कस्मादिति । उत्तरमाह - व्यतिरेकदर्श-नादिति । कार्यादिव्यतिरेकेणाप्यनुमानदर्शनाद् नावधारणार्थम् । ( तत्र ) यत्र कार्यादीनां व्यतिरेकस्तद्दर्शयति - यथाध्वर्युरो श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्ग-मिति । अध्वर्युर्होतारमोम् इत्येवं श्रावयति नान्यमित्येवं यस्य पूर्वमवगति-तो फिर अस्येदं कार्यम् ' इस सूत्र का विरोध होगा ( क्योंकि इस सूत्र के द्वारा कार्यत्व, कारणत्व, संयोग, विरोध एवं समवाय इतने सम्बन्धों को ही हेतु में साध्य के ज्ञापन के सामर्थ्य का प्रयोजक माना गया है दैशिक और कालिक व्याप्ति को नहीं ) । इसी प्रश्न का समाधान ' शास्त्रे कार्यादिग्रहणं निदर्शनार्थं कृतम्, नावधारणार्थम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् वैशेषिक सूत्र रूप शास्त्र में जो कार्यत्वादि ' सम्बन्ध का उपादान किया गया है: उसका यह अवधारण रूप अर्थ अभिप्रेत नहीं है कि कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से ही किसी के रहने से हेतु साध्य का ज्ञापक होता है । किन्तु साध्य के ' व्याप्ति रूप सम्बन्ध से युक्त हेतु हो ज्ञापक होता है ' इस नियम के उदाहरण रूप में ही कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख किया गया है कि साध्य के इन कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त हेतु में साध्य की व्याप्ति रहती है । ' कस्मात् ' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न किया गया है कि कैसे समझते हैं कि उक्त सूत्र में ' कार्यादि ' का उपादान अवधारण के लिए नहीं है? ' व्यतिरेकदर्शनात् ' इस वाक्य से उक्त प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अर्थात कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के न रहने पर भी हेतु से साध्य का बोध होते देखा जाता है, अतः समझते हैं कि कार्यत्वादि सम्बन्धों का उल्लेख ' अवधारण ' के लिए नहीं है । इन कार्यत्वादि सम्बन्धों के न रहने पर भी जहाँ अनुमिति होती है, उसका प्रदर्शन ' यथाऽध्वर्यु ' रों श्रावयन् व्यवहितस्य होतुलिङ्गम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । जिस पुरुष को यह नियम पहिले से अवगत है कि होता को ही अध्वर्यु ओंकार सुनाते हैं किसी दूसरे को नहीं, वही पुरुष यदि अध्वर्यु को ओंकार का उच्चारण करते हुए For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ५०५ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्येति । एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धम् । स्वच्छता अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक होती है । ( व्याप्ति के प्रयोजक ) कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों से भिन्न इन वस्तुओं में व्याप्ति के प्रयोजक अवशिष्ट सभी सम्बन्धों का संग्रह सूत्रकार ने उक्त सूत्र के ' अस्येदम् ' इस वाक्य के द्वारा किया है । भूतस्य ओं इति श्रावयन्तमध्वर्यु प्रतीत्य कुडचादिव्यवहिते होतरि अनुमानं होताप्यत्रास्तीति । न चाध्वर्युः होतुः कार्यं न कारणं न संयोगे ( गी ) न च विरोधे ( धी ) न समवाये ( यी ) चेति व्यतिरेकः । उदाहरणान्तरमाह – चन्द्रोदयः समुद्रवृद्धेरित्यादि । यदा चन्द्र उदेति तदा समुद्रो वर्द्धते कुमुदानि च विकसन्तीति नियमो येनावगतः, तस्य चन्द्रो-दयः समुद्रवृद्धेः कुमुदविकासस्य च लिङ्गं स्यात् । न च चन्द्रोदयः समुद्र-वृद्धिकुमुदविकासयोः कार्यम् । उदयो हि चन्द्रस्य विशिष्टदेशसंयोगः, स च चन्द्र-क्रियाकार्य:, न समुद्रवृद्धयादिनिमित्तः । न चायं समुद्रवृद्धेः कारणं नापि कुमुदविकासस्य, उत्कल्लोललक्षणाया वृद्धेः, पत्राणां परस्परविभागलक्षणस्य देखता है और दीवाल से छिपे रहने के कारण होता को नहीं देखता, तब भी ' होता ' का यह अनुमान उसे होता है कि यहाँ होता भी अवश्य हैं । किन्तु अध्वर्युरूप हेतु होतारूप साध्य का न कार्य है, न कारण न संयोगी है, न विरोधी और न समवायी । अतः ( सूत्र में कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों में से अध्वर्यु में होता का कोई भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु उक्त अध्वर्युं से होता का अनुमान होता है, अतः ' कथित कार्यत्वादि सम्बन्ध के कारण ही हेतु ज्ञापक होता है ' इस नियम में यही व्यतिरेक व्यभिचार हैं ) । ' चन्द्रोदयः समुद्रवृद्ध: ' इस वाक्य के द्वारा भाष्यकार ने उक्त व्यतिरेक व्यभिचार का दूसरा उदाहरण कहा है । ' जिस समय चन्द्रमा का उदय होता है, उस समय समद्र बढ़ जाता है और कुमुद के पुष्प प्रफुल्लित हो जाते हैं । यह नियम जिस पुरुष को ज्ञात है, उसके लिए चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि और कुमुदिनी के विकास का अवश्य ही ज्ञापक लिङ्ग होगा, किन्तु चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि से उत्पन्न होता है, न कुमुद के विकास से, क्योंकि चन्द्रमा का किसी विशेष देश के साथ संयोग ही चन्द्रमा का उदय है, चन्द्रमा का यह संयोग चन्द्रमा में रहनेवाली क्रिया से ही उत्पन्न होगा, समुद्र की वृद्धि प्रभृति कारणों से नहीं, ( अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का या कुमुद के विकास का कार्य नहीं है ) एवं चन्द्रमा का उदय न समुद्र की वृद्धि का कारण है, न कुमुद के विकाश का, क्योंकि समुद्र को वृद्धि है उसका उफान एवं कुमुद का विकास है