प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 581–590

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 581–590

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणे अनुमान-च विकासस्य तत्कालसन्निहितकारणाधीनकर्मजन्यत्वादित्यादि वाच्यम् । शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य प्रसादो वैशद्यम्, तच्छरदि प्रतीयमानमगस्त्योदयस्य लिङ्गम्, न कालान्तरे, व्यभिचारात् । कार्यादिव्यतिरिक्तमपि यदि लिङ्गमस्ति तहि नूनं तत्र सर्वलिङ्गा-नामनवरोधात आह— एवमादि तत् सर्वमस्येदमिति सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धमिति । अध्वर्यु श्रावयतीत्येवमादिपदाविनाभूतं लिङ्गं तत् सर्वमस्येदमिति पदेन सम्बन्धमात्रवचनात् सिद्धं परिगृहीतम् । अर्थान्तरमर्थान्तरस्य लिङ्गमिति न युज्यते ( इति ) प्रसक्तिः स्यादिति पर्यनुयोगमाशङ्कयेदमुक्तं सूत्रकारेणा-स्येदमिति । लिङ्गमित्यन्यत्वाविशेषेऽप्यस्य साध्यस्येदं सम्बन्धीति कृत्वा अस्येदं लिङ्ग न सर्वस्येति सामान्येन सम्बन्धिमात्रस्य लिङ्गत्वप्रतिपादनात् । यद्यस्य उसके पत्रों का एक दूसरे से विभाग, ये दोनों ही उस समय अपने कारणों से उत्पन्न होनेवाले कर्मों से ही उत्पन्न होंगे ( चन्द्रमा की वृद्धि से नहीं, अतः चन्द्रमा का उदय समुद्रवृद्धि का कार्य भी नहीं है ) । ' शरदि जलप्रसादोऽगस्त्योदयस्य लिङ्गम् ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) ' प्रसाद ' शब्द का अर्थ है वैशद्य ( स्वच्छता ), यह वैशद्य शरद् ऋतु में ( ही ) ज्ञात होकर अगस्त्य नाम के नक्षत्र के उदय का ज्ञापक लिङ्ग होता है, अन्य ऋतु में ज्ञात होने पर भी नहीं, क्योंकि व्यभिचार देखा जाता है ( अर्थात् ग्रीष्मादि ऋतुओं में जल में स्वच्छता का भान होने पर भी अगस्त्योदय की प्रतीति नहीं होती ) है । ( प्र ० ) ( यदि साध्य के ) कार्यादि न होने पर भी कोई हेतु साध्य का ज्ञापक हो सकता है, तो फिर ' अस्येदं कार्यम् ' इत्यादि सूत्र द्वारा लिङ्ग के जिन प्रकारों का उल्लेख किया गया है, उनसे सभी हेतुओं का संग्रह नहीं होता है? ( जिससे सूत्रकार की न्यूनता होती है ) इसी प्रश्न का समाधान भाष्यकार ने ' एवमादि ' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा दिया है । ' एवमादि ' अर्थात् साध्य के कार्यादि से भिन्न और सभी हेतु उक्त सूत्र के ' अस्येदम् ' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा संगृहीत होते हैं । अभिप्राय यह है कि ' अध्वर्युरों श्रावयति ' इत्यादि वाक्यों के द्वारा जिन हेतुओं का उल्लेख किया गया है वे सभी हेतु उक्त सूत्र के ही अस्पदम् ' इस सम्बन्धबोधक वाक्य के द्वारा ' सिद्ध ' हैं, अर्थात् संगृहीत हैं । किन्तु " अर्थान्तर ( साध्य के कार्यत्वादि सम्बन्धों से रहित कोई भी अर्थ अर्थान्तर का ( अर्थात् हेतु के कारणत्वादि सम्बन्धों से शून्य किसी दूसरे अर्थ का ) साधक हेतु नहीं हो सकता " उक्त सूत्र में कार्यत्वादि सम्बन्धों के उल्लेख से इस अवधारण की स्थिति हो जाएगी । इस अभियोग की सम्भावना को हटाने के लिए हो सूत्रकार ने उक्त सूत्र में ( कार्यत्वादि सम्बन्धों के बोधक वाक्यों के अतिरिक्त ) ' अस्येदम् ' इस वाक्य का भी प्रयोग किया है । ' इतरस्य लिङ्गम् ' इत्यादि भाष्य के द्वारा लिङ्ग का भेद और सभी पदार्थों ( साध्यों ) में समान रूप से रहने पर भी ' इस साध्य का सम्बन्ध इसी हेतु में है, इस नियम के अनुसार यह नियम भी उपपन्न होता है For Private And Personal

पृष्ठ 582

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] तत्तु भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् द्विविधम् - दृष्टं सामान्यतोदृष्टं ५०७ च । तत्र दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्य मेदेऽनुमानम् | यथा गव्येव ( १ ) दृष्ट और ( २ ) सामान्यतोदृष्ट भेद से अनुमान दो प्रकार है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और वर्तमान में उसी हेतु के ज्ञाप्य साध्य दोनों अभिन्न हों, उस हेतु से उत्पन्न अनुमान ही ' दृष्ट ' अनुमान है । जैसे कि पहिले एक स्थान में गाय में ही केवल सास्नारूप हेतु न्यायकन्दली देशकालाद्यविनाभूतं तत् तस्य लिङ्गमित्युक्तम्, तदेव हि तस्य यद् यस्याव्यभिचारि ( a ) ( यद्यस्थ व्यभिचारि न तत् तस्य, अन्यत्रापि भावात् । अपि भोः! किमस्येदं कार्यमिति न सम्बध्नातीति ब्रूनहे, कार्यादिग्रहणं तर्हि किमर्थम्? निदर्शनार्थ-मित्युक्तम् । अवश्यं हि शिष्यस्योदाहरणनिष्ठं कृत्वा किमप्यव्यभिचारि लिङ्गं दर्शनीयमिति सूत्रे कार्यादिकमुदाहृतम् । न तावन्त्येव लिङ्गानीत्यर्थः । भेदं कथयति तत्तु द्विविधं दृष्टं सामान्यतोदृष्टं चेति । चशब्दोऽवधारणार्थः । तदनुमानं द्विविधमेव दृष्टमेकमपरं सामान्यतोदृष्टम् । तत्र तयोर्मध्ये दृष्टं प्रसिद्ध-कि इस साध्य का यही लिङ्ग है '! इस प्रकार सामान्य रूप से साध्य के सभी सम्बन्धियों में लिङ्गत्व का प्रतिपादन एवं सर्वत्र देशकाला विनाभूतमितरस्य लिङ्गम् ' इस भाष्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् जिसमें जिस दूसरे वस्तु की दैशिकी या कालिको व्याप्ति है, वही उसका हेतु है । जिसमें जिसका व्यभिचार है, वह उसका हेतु नहीं है. क्योंकि उसके न रहने के स्थान में भी वह रहता है । ( प्र ० ) तो क्या उक्त सूत्र में ' कमस्येदं कार्यम् ' इस वाक्य के द्वारा यह कहते हैं कि ' साध्य का सम्बन्ध हेतु में नहीं है '? यदि ऐसी बात है तो फिर ' कार्यादि ' का उपादान ही उक्त सूत्र में व्यर्थ है? इसी प्रश्न का उतर निदर्शनार्थम् ' इस वाक्य से दिया गया | अभिप्राय यह है कि शिष्यों को उदाहरण के द्वारा पूर्ण अभिज्ञ बनाकर ही यह समझना होगा कि ' साध्य का अव्यभिचारी ही उसका लिङ्ग है ' । अतः सूत्र में कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख केवल उदाहरण के लिए है । इसका यह अभिप्राय नहीं है कि सूत्र में कथित कार्यत्वादि सम्बन्धों से युक्त ही हेतु हैं, साध्य के और सम्बन्धों से युक्त भी हेतु हो सकते हैं, यदि वह सम्बन्ध अव्यभिचरित हो । ' तत्तु द्विविधम् - दृष्टम्, सामान्यतो दृष्टञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान के अवान्तर प्रकारों का निरूपण किया गया है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' च ' शब्द ' अवधारण ' अर्थ का है । ( तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि ) कथित अनुमान दो ही प्रकार का है, एक है ' हट ' और दूसरा है ' सामान्यतोट ' | ' तत्र ' अर्थात् उन दोनों अनुमानों में से ' दृष्टं प्रसिद्धसाध्ययोजत्यिभेदेऽनुमानम् ' ' प्रसिद्ध ' अर्थात् हेतु के साथ पहिले For Private And Personal

पृष्ठ 583

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५०५ सास्नामात्रमुपलभ्य प्रतिपत्तिः । न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान --देशान्तरेऽपि सास्नामात्र दर्शनाद् प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेद लिङ्गान मेयधर्म-को देखकर, दूसरे स्थान में सास्ना को देखने के बाद गोविषयक प्रतिपत्ति ( अनु-मिति ) होती है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और उसी हेतु के द्वारा वर्त्तमान में ज्ञाप्य साध्य, दोनों विभिन्न जाति के हों, उस हेतु सामान्य और ( वर्तमान में अनुमेय ) साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है, उसे ' सामान्यतोदृष्ट ' अनुमान कहते हैं । जैसे कि कृषक, न्यायकन्दली साध्ययोर्जात्यभेदेऽनुमानम् । प्रसिद्धं यत् पूर्वं लिङ्गेन सह दृष्टं साध्यं यत् सम्प्रत्यनुमेयं तयोरत्यन्तजात्यभेदे सति यदनुमानं तद् दृष्टम् Toda । यथा सास्नामात्रमुपलभ्य देशान्तरे गवि प्रतिपत्तिः । पूर्वं गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्त सानोपलब्ध्या सम्प्रत्यपि गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्ते-रनुमानमत्यन्त जात्यभेदे । इदं च दृष्टमित्याख्यायते । सास्नामात्र दर्शनाद् वनान्तरे यदनुमीयते गोत्वसामान्यं तस्य स्वलक्षणं पूर्व नगरे दृष्टमिति कृत्वा प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्म-सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् । प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं जो साध्य ज्ञात है और जो साध्य अभी अनुमेय है, इन दोनों के जातितः अत्यन्त अभि होने पर जो अनुमान होता है, वही ' दृष्ट ' अनुमान है । जैसे कि पहिले किसी गाय में ही सास्ना को देखकर दूसरे देश में गो का अनुमान होता है । पहिले गोव जाति सेयुक्त गो व्यक्ति में ही सास्ना की उपलब्धि हुई, अभी भी सास्ना से जो गो अनुमिति होती है, वह गोत्र जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही होती है, अतः गो विषयक दोनों ज्ञानों में विषय होनेवाला गोत्व अत्यन्त अभिन्न ( एक ही ) है, तस्मात् यह ' दृष्ट ' अनुमान कहलाता है । इसे दृष्ट अनुमान होने की युक्ति यह है कि वन में केवल सास्ता के देखने से जिस गोत्व जाति का अनुमान होता है, वह उस स्वरूप से नगर में पहिले से ही गो में देखा जा चुका है । “ प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्त जातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्मं सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतो-दृष्टम् ” ( इस भाष्यवाक्य के ) प्रसिद्धसाध्ययो: ' इस पद से ' प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं साध्यमनुमेयं ययोः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनुमान का साध्य एवं हेतु के साथ पहिले गृहीत होनेवाला साध्य ये दोनों साध्य अभिप्रेत हैं । इन दोनों साध्यों में परस्पर अत्यन्त भेद के रहने पर भी हेतु सामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न होता है, वही ' सामान्यतोदृष्ट ' अनुमान है । ( इस अर्थ के बोधक For Private And Personal

पृष्ठ 584

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ve प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं । सामान्यतोदृष्टम् । यथा कर्षकवणिग्राज-पुरुषाणां च प्रवृत्तेः फलवत्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजन-मनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानमिति । तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणं वणिक् और राजपुरुषों की सभी सफल प्रवृत्तियों को देखकर वर्णाश्रमियों की उन धार्मिक प्रवृत्तियों से भी फल का अनुमान होता है, जिन प्रवृत्तियों के कोई प्रत्यक्ष फल नहीं दीख पड़ते । न्यायकन्दली साध्यमनुमेयं तयोरत्यन्तजातिभेदे सति, लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेय-धर्मो, तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्मसामान्ये, तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयधर्म-सामान्यानुवृत्तिः, ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविनाभावाद् यदनुमानं तत् सामान्यतोदृष्टम् । यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलत्वमुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्तमानानां फलानुमानम् । कर्षका-दिप्रवृत्तेः फलं दृष्ट्वा वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि फलानुमानम्, कर्षकस्य प्रवृत्तेः फलं शस्यादिकम्, वणिग्राजपुरुषस्य च प्रवृत्तेः फलं काञ्चनमणिमुक्तावाजिवारणा-दिकम् वर्णाश्रमिणां च प्रवृत्तेः फलं स्वर्गादिकमित्यनयोरत्यन्तजातिभेदः । अनुमानोदयस्तु प्रवृत्तित्वसामान्यस्य फलवत्त्वसामान्येनाविनाभावात् । अत एव चेदं सामान्यतोदृष्टमुच्यते, सामान्येन नियमदर्शनात् । लिङ्गानुमेयधर्म सामान्यवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतो दृष्टम् ' इस भाष्यवाक्य का विग्रह इस प्रकार है कि ) लिङ्गं चानुमेयधर्मश्च लिङ्गानुमेयधम तयोः सामान्ये लिङ्गानुमेयधर्मसामान्ये, तयोरनुवृत्तिः लिङ्गानुमेयसामान्यानुवृत्तिः, ततो लिङ्गसामान्यस्य साध्यसामान्येन सहाविना-भावात् यदनुमानं तत् ' सामान्यतोदृष्टम् ' । ' यथा कर्षकवणिग्राजपुरुषाणां प्रवृत्तेः फलवस्व-मुपलभ्य वर्णाश्रमिणामपि दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य प्रवर्त्तमानानां फलानुमानम् ' । अर्थात् कृषकादि की प्रवृत्तियों की सफलता को देखकर वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों में भी सफलता का अनुमान होता है, जिन प्रवृत्तियों की उत्पत्ति के लिए वे दृष्ट ( सांसारिक ) फलों का अनुसन्धान नहीं करते । अभिप्राय यह है कि भूमि जोतने की किसानों को प्रवृत्ति के फल है अन्न प्रभृति, एवं बनियों की एवं राजसेवा में लगे व्यक्तियों की प्रवृत्तियों के फल है, सुवर्ण, मणि, मुक्ता, हाथी, घोड़े प्रभृति; किन्तु वर्णाश्रमियों के ( सन्ध्यावन्दनादि ) प्रवृत्तियों के फल हैं स्वर्गादि । इस प्रकार यह ज्ञात होता है कि साध्य और दृष्टान्त दोनों अत्यन्त विभिन्न जाति के हैं । फिर भी उक्त दृष्टान्त के द्वारा अनुमान की उत्पत्ति उस सामान्यमुखी व्याप्ति से होती है, जो प्रवृत्तिसामान्य का फलसामान्य के साथ है । इसीलिए इस अनुमान को १. अभिप्राय यह है कि ' शिष्ट जनों की सभी प्रवृत्तियाँ सफल ही होती हैं ' इस सामान्य ति के बल से ही उक्त अनुमान होता है । किन्तु इस व्याप्ति के अवधारण के For Private And Personal

पृष्ठ 585

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान -प्रमितिरग्निज्ञानम् । अथवाग्निज्ञानमेव प्रमाणं त्रमितिरग्नौ गुणदोष-माध्यस्थ्यदर्शनमित्येतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । इनमें लिङ्ग ( हेतु ) का ज्ञान ही ( अनुमान प्रमाण है ) एवं ( उससे उत्पन्न ) अग्नि का ज्ञान ही ( फलरूपा ) प्रमिति है । अथवा ( कथित ) अग्नि का ज्ञान ही ( अनुमान ) प्रमाण है । अग्नि में उपादेयत्व, हेयत्व या उपेक्षा की बुद्धि ही प्रमिति ( अनुमिति ) है ये सभी अनुमान करनेवाले पुरुष में ही निश्चय ( अनुमिति ) के उत्पादक ( स्वार्थानुमान ) हैं । न्यायकन्दली यः पुनरत्रानुमेयः स्वर्गादिलक्षणः फलविशेषो नैतज्जातीयस्य फलस्य नियमो दृष्टो वर्णाश्रमिणां प्रवृत्तेरपि जीविकामात्रमेव प्रयोजनमिति बार्हस्पत्याः, तदर्थमाह- दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्येति । सन्त्येव तथाविधाः पुरुषा ये खलु दृष्टनिस्पृहा वानप्रस्थादिकं व्रतमाचरन्ति तेषां प्रवृत्तेरिदं फलानु-मानमिति न सिद्धः साध्यत इत्यर्थः । ' सामान्यतोदृष्ट ' कहा जाता है, चूंकि सामान्यमुखी व्याप्ति के दर्शन से ही इसकी उत्पत्ति होती है! बार्हस्पत्य ' ( चार्वाक ) लोग ( इस अनुमान में सिद्धसाधन दोष का उद्भावन इस प्रकार करते हैं कि ) वर्णाश्रमियों को प्रवृत्ति से स्वर्गादि जिस प्रकार के अलौकिक फलों का यहाँ अनुमान किया जाता है, उस प्रकार के फलों का नियम नहीं देखा जाता है ( क्योंकि वे अतीन्द्रिय हैं ) अतः वर्णाश्रमियों की उन प्रवृत्तियों का अपनी जीविका चलाना ही फल है, वह तो दृष्ट ही है । अतः इसमें अनुमान की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इसका विषय पहिले से ही सिद्ध है । इसी सिद्धसाधन दोष को मिटाने के लिए प्रकृत भाष्यसन्दर्भ में ' दुष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्य ' यह वाक्य लिखा गया है । इस वाक्य से यह कहना अभिप्रेत है कि इस प्रकार के भी महापुरुष हैं जो वर्णाश्रमियों के लिये निर्दिष्ट वानप्रस्थादि व्रतों का आचरण करते हैं, जिनको जीविकादि दृष्ट फलों के प्रति स्नेह नहीं है । वर्णाश्रमियों की इस प्रकार की प्रवृत्तियों से फल का अनुमान ही प्रकृत में सामान्यतो-दृष्ट अनुमान के उदाहरण के लिए उपस्थित किया गया है. अतः सिद्धसाधन दोष नहीं है । लिए प्रकृत में साव्यभूत वर्णाश्रमियों को सफलता को उपस्थित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह सिद्ध नहीं है; एवं प्रत्यक्ष के द्वारा उसका सिद्ध होना सम्भव भी नहीं है, क्योंकि उसके स्वर्गादि फल अतीन्द्रिय हैं । अतः प्रकृत फल से सर्वथा विपरीत अर्थात् कृषकादि के प्रत्यक्ष फलों को दृष्टान्त रूप से उपस्थित किया गया है । १. इसी प्रसङ्ग में बार्हस्पत्यों का यह श्लोक सर्वदर्शनसंग्रहादि ग्रन्थों में उल्लिखित है: -For Private And Personal

पृष्ठ 586

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५११ प्रमाणशब्दः करणव्युत्पत्तिसिद्धो न फलं विना पर्यवस्यति, अतः प्रमाणफलविभागं दर्शयति - तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणमिति । तत्रानुमाने लिङ्गज्ञानं प्रमाणं प्रमीयतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या प्रमितिः प्रमाणस्य फलमग्नि-ज्ञानम् । यद्यपि लिङ्गलिङ्गिज्ञानयोरुत्पत्त्यपेक्षया विषयभेदस्तथापि लिङ्गज्ञान-स्यापि लिङ्गिनि ज्ञानोत्पत्तौ व्यापारालिङ्गिविषयत्वम्, ततश्च प्रमाणफलयोर्न व्यधिकरणत्वम् । प्रकारान्तरमाह – अथवेति । अग्निज्ञानं प्रमाणम्, प्रमितिः प्रमाणस्य फलम् । अग्नौ गुणदोषमाध्यस्थ्यदर्शनम् - गुणदर्शनं सुखसाधनमेतदिति ज्ञानम्, दोषदर्शनं दुःखसाधनत्वज्ञानम्, माध्यस्थ्यदर्शनं सुखदुःखसाधनत्वाभाव-ज्ञानम्, अग्निज्ञाने सति तथाप्रतीत्युत्पादात् । ' प्रमीयतेऽनेन ' इस करणव्युत्पत्ति के द्वारा प्रकृत में ' प्रमाण ' शब्द का प्रयोग किया गया है । प्रमाकरणरूप इसका निरूपण प्रमारूप फल के निर्देश के विना अधूरा ही रहेगा । अतः तत्र लिङ्गदर्शनं प्रमाणम् ' इस वाक्य के द्वारा प्रमाण और फल का विभाग दिखलाया गया है । ' तत्र ' अर्थात् अनुमान स्थल में ' लिङ्गज्ञान ' ही ' प्रमाण ' है चूंकि यहाँ ' प्रमाण ' शब्द ' प्रमीयतेऽनेन ' इस व्युत्पत्ति द्वारा सिद्ध है । ' प्रमिति ' अर्थात् प्रमाण का फल है अग्नि का ज्ञान । यद्यपि यह ठीक है कि ( प्र ० ) लिङ्गज्ञान और लिङ्गी ( साध्य ) का ज्ञान दोनों की उत्पत्ति भिन्न विषयक होती हैं, अतः दोनों व्यधिकरण हैं, किन्तु कार्य और कारण को समान अधिकरण का होना चाहिये ) | ( उ ० ) फिर भी लिङ्गी ( साध्य ) में जो ( विधेयता सम्बन्ध से ) ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, उसमें लिङ्गज्ञान व्यापार ( रूप कारण ) है, अतः लिङ्गज्ञान भी लिङ्गिरूप विषय से सर्वथा असम्बद्ध नहीं है | अतः लिङ्गज्ञानरूप प्रमाण और लिङ्गि ( साध्य ) ज्ञानरूप फल इन दोनों में सर्वथा विपरीतविषयत्व रूप वैयधिकरण्य की आपत्ति नहीं है । ' अथवा ' इत्यादि सन्दर्भ से ( प्रमाण फल विभाग का दूसरा प्रकार दिखलाया गया है । अग्नि ( साध्य ) का ज्ञान ही ' प्रमाण ' है, और ' प्रमिति ' अर्थात् उस प्रमाण का फल है अग्नि ' गुण, दोष, और माध्यस्थ्य का ज्ञान । ( अग्नि में ) ' यह सुख का साधन है ' इस प्रकार का ज्ञान है ' गुणदर्शन ' एवं ' यह दुःख कासाधन है ' इस आकार को बुद्धि ही ' दोषदर्शन ' है । और ' न यह सुख का साधन है न दुःख का ' इस प्रकार का ज्ञान ही ' माध्यस्थ्यदर्शन ' है । चूँकि अग्नि ज्ञान के बाद ही उक्त गुणदर्शनादि उत्पन्न होते हैं ( अतः ये गुणदर्शनादि अग्निज्ञान रूप प्रमाण के फल हैं ) ।

अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् ।

बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः ॥

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पृष्ठ 587

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५१२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् शब्दादीनामप्यनुमानेऽन्तर्भावः, [ गुणे अनुमान -समानविधित्वात् । यथा प्रसिद्धसमयस्यासन्दिग्धलिङ्गदर्शन प्रसिद्धयनुस्मरणाभ्यामतीन्द्रियेऽर्थे भव-त्यनुमानमेवं शब्दादिभ्योऽपीति । शब्दादि प्रमाण भी इसी ( अनुमान ) के अन्तर्गत हैं ( वे स्वतन्त्र अलग प्रमाण नहीं हैं ), क्योंकि शब्दादि प्रमाणों से भी उसी रीति से ( व्याप्ति के बल पर ) प्रमिति की उत्पत्ति होती है, जिस प्रकार अनुमान प्रमाण से प्रमिति की उत्पत्ति होती है । जैसे कि जिस पुरुष को पूर्व में व्याप्ति गृहीत है, उसी पुरुष को हेतु के निश्चय और व्याप्ति के स्मरण इन दोनों से अप्रत्यक्ष अर्थ की अनुमिति होती है । उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी अतीन्द्रिय अर्थ का ज्ञान होता है । न्यायकन्दली एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् । निश्चितमिति भावे निष्ठा, स्वनिश्चितार्थं स्वनिश्चयार्थमेतदनुमानमित्यर्थः । शब्दादीन्यपि प्रमाणान्तराणि सङ्गिरन्ते वादिनः तानि कस्मादिह नोक्तानि? इति पर्यनुयोगमाशङ्कय तेषामत्रैवान्तर्भावान्न पृथगभिधानमित्याह-शब्दादीनामपीति । शब्दादीनामनुमानेऽन्तर्भावोऽनुमानाव्यतिरेकित्वम्, समान-विधित्वात् समानप्रवृत्तिप्रकारत्वात् । यथा व्याप्तिग्रहणबलेनानुमानं प्रवर्तते, तथा शब्दादयोऽपीत्यर्थः । शब्दोऽनुमानं व्याप्तिबलेनार्थप्रतिपादकत्वाद् धूमवत् । समानविधित्वमेव दर्शयति - यथेति । प्रसिद्धः समयोऽविनाभावो यस्य ' एतत् स्वनिश्चितार्थमनुमानम् ' इस भाष्यवाक्य का ' निश्चित ' शब्द ' भाव ' अर्थ में निष्ठा प्रत्यय से निष्पन्न है । तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि यह कथित अनुमान अपने आश्रय पुरुष में ही निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने के लिए है ( दूसरों को समझाने के लिए नहीं ) । ( प्रत्यक्ष और अनुमान के अतिरिक्त ) शब्दादि प्रमाणों को भी अन्य दार्शनिक गण स्वीकार करते हैं कि वे शब्दादि प्रमाण इस भाष्य में क्यों नहीं कहे गये? अपने ऊपर इस अभियोग की आशङ्का से भाष्यकार ने ' शब्दादीनामपि ' इत्यादि ग्रन्थ से यह कहा है कि ' उन शब्दादि प्रमाणों का भी अनुमान में ही अन्तर्भाव हो जाता है ' । शब्दादि प्रमाणों का अनुमान में हो अन्तर्भाव होता है अर्थात् शब्दादि प्रमाण अनुमान से अभिन्न हैं ( अनुमान ही हैं ), क्योंकि ( अनुमान और शब्दादि ) समानविधि ' के हैं, अर्थात् अनुमान और शब्दादि की सभी प्रवृत्तियां समान हैं । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार अनुमान की प्रवृत्ति व्याप्ति के बल से होती है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों को प्रवृत्ति भी व्याप्ति के बल से ही होती है । ( इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि ) जिस प्रकार व्याप्ति के बल से धूम वह्नि का ज्ञापक है, उसी प्रकार शब्द भी व्याप्ति के बल से ही अर्थ का ज्ञापन करता है, अतः ( घूम की तरह ) शब्द भी For Private And Personal

पृष्ठ 588

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 588 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ५१३ न्यायकन्दली For Private And Personal पुरुषस्य तस्य लिङ्गदर्शन प्रसिद्ध्यनुस्मरणाभ्यां लिङ्गदर्शनम्, यत्र धूमस्तत्राग्नि-रित्येवंभूतायाः प्रसिद्धेरनुस्मरणं च । ताभ्यां यथाऽतीन्द्रियेऽर्थे भवत्यनुमानं तथा शब्दादिभ्योऽपीति । तावद्धि शब्दो नार्थं प्रतिपादयति यावदयमस्या-व्यभिचारीत्येवं नावगम्यते, ज्ञाते त्वव्यभिचारे प्रतिपादयन् धूम इव लिङ्गं स्यात् । अत्राह कश्चित् - अनुमाने साध्यधर्मविशिष्टो धर्मी प्रतीयते, शब्दादर्था-नुमाने को धर्मी? न तावदर्थः, तस्य तदानीमप्रतीयमानत्वात् । शब्दो धर्मोति चेत्? किमस्य साध्यम्? अर्थवत्त्वं चेत्? न पर्वतादेरिव वह्नयादिना शब्दस्यार्थेन सह संयोगसमवायादिलक्षणः कश्चित् सम्बन्धो निरूप्यते, येनायमर्थविशिष्टः साधनीयः । प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव एव हि तयोः सम्बन्धः सोऽर्थप्रतीत्युत्तर-अनुमान रूप से ही प्रमाण है । ' यथा ' इत्यादि से कथित ' समानविधि ' का प्रदर्शन करते हैं । ' प्रसिद्धः समयो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को समय ( व्याप्ति ) पूर्व से ज्ञात है, वही पुरुष प्रसिद्धसमय ' शब्द का अर्थ है । ' लिङ्गदर्शन प्रसिद्धयनुस्म-रणाभ्याम् ' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि लिङ्गदर्शन ( अर्थात् पक्षधर्मता ज्ञान ) और जहाँ धूम है वहाँ वह्नि भी अवश्य ही है ' इस प्रकार की ' प्रसिद्धि ' अर्थात् व्याप्ति का स्मरण, इन दोनों से उक्त ' प्रसिद्धसमय ' पुरुष को जिस प्रकार इन्द्रियों के द्वारा अज्ञेय वस्तु का ज्ञान होता है, उसी प्रकार शब्दादि प्रमाणों से भी कथित पुरुष को ही ज्ञान होता है ( अतः शब्दादि प्रमाण भी वस्तुतः अनुमान ही हैं ) । शब्द तब तक अर्थ के बोध का उत्पादन नहीं कर सकता, जब तक कि अर्थ के साथ उसका अव्यभिचार ( व्याप्ति ) गृहीत न हो जाय, ज्ञात अव्यभिचार के द्वारा ही जब ( धूम की तरह ) शब्द भी अर्थ का ज्ञापक है, तो फिर धूम की तरह वह भी ज्ञापक लिङ्ग ( अनुमान ) ही होगा । यहाँ कोई ( शब्द को अलग स्वतन्त्र प्रमाण माननेवाले ) यह विचार उठाते हैं कि अनुमान में तो साध्य रूप धर्म से युक्त धर्मों की प्रतीति होती है, किन्तु शब्द से जो अर्थं का अनुमान होगा उसमें धर्मी रूप से किसका भान होगा? अर्थ तो उस अनुमान का धर्मी ( पक्ष ) हो नहीं सकता, क्योंकि वह तब तक अज्ञात है ( पक्ष को पहिले से निश्चित रहना चाहिए ) । शब्द को ही यदि उस अनुमान का पक्ष मानें, तो फिर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि इस अनुमान का साध्य कौन होगा? अर्थवत्त्व को साध्य मानना सम्भव नहीं है, क्योंकि पर्वतादि पक्षों का वह्नि प्रभृति साध्यों के साथ जिस प्रकार का संयोगसमवायादि सम्बन्ध है, शब्द के साथ अर्थ का उस प्रकार के किसी सम्बन्ध का निर्वाचन सम्भव नहीं है, जिस सम्बन्ध के द्वारा अर्थ से युक्त शब्द रूप धर्मी का साधन किया जा सके । शब्द और अर्थ में प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव सम्बन्ध ही केवल हो सकता है, किन्तु इस सम्बन्ध का ज्ञान तो शब्द से अर्थ प्रतीति के बाद ही होगा, अर्थं प्रतीति के पहिले नहीं । एवं वह्नि और धूम तरह

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-न्यायकन्दली कालीन नार्थप्रतिपादनात् पूर्वं सम्भवति । नाप्यग्निधूमयोरिव शब्दार्थयो-रस्त्यविनाभावनियमः, देशकालव्यभिचारात्; तद्वयभिचारश्चासत्यपि युधिष्ठिरे कलौ युधिष्ठिरशब्दप्रयोगात्, असत्यामपि लङ्कायां जम्बुद्वीपे लङ्का शब्दश्रवणात् । तस्मादनुमानसामग्री नानुमानम्, वैलक्षण्याच्छब्दो देशविशेषेऽर्थव्यभि चारात् । न धूमो ह्न क्वचिद् व्यभिचरति, शब्दस्तु स्वार्थं व्यभिचरति । तथा हि चौर इति भक्ताभिधानं दाक्षिणात्यानाम्, आर्यावर्तनिवासिनां तु तस्कराभिधानम् । यदि च शब्दोऽनुमानं त्रैरूप्यप्रतीत्याऽस्य प्रामाण्यनिश्चयः स्यात्, नाप्तोक्तत्वप्रतीत्या; तत्प्रतीत्या तु निश्चीयमाने प्रामाण्येऽनुमानाद् व्यति-रिच्यत एव । एवं वैधर्म्यात् । अत्रोच्यते - यदूवकृतायां तर्जन्यां देशकालव्यवहितेष्वर्थेषु दशसंख्यानुमानं न तत्र संख्या धर्मिणी, अप्रतीयमानत्वात् । नापि तर्जनीविन्यासो धर्मी, तस्थ शब्द और अर्थ में ' अविनाभाव ' ( व्याप्ति ) सम्बन्ध है भी नहीं, क्योंकि जिस देश या जिस काल में शब्द या अर्थ है, उस देश और उस काल में अर्थ या शब्द अवश्य रहता ही नहीं है, क्योंकि कलिकाल में युधिष्ठिर रूप अर्थ की सत्ता न रहने पर भी युधिष्ठिर शब्द का प्रयोग होता है, एवं लङ्का नगरी की सत्ता जम्बुद्वीप में वत्तंमान काल में न रहने पर भी ' लङ्का ' शब्द का प्रयोग होता है । अतः यह मानना पड़ेगा कि शब्द प्रमाण अनुमान प्रमाण से भिन्न है, क्योंकि विशेष प्रकार के कई देशों में शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार देखा जाता है । धूमका वह्नि के साथ व्यभिचार कहीं नहीं देखा जाता, किन्तु शब्द के साथ अर्थ का व्यभिचार देखा जाता है । जैसे कि एक ही ' चौर ' शब्द का प्रयोग दाक्षिणात्य लोग भात के अर्थ में करते हैं, किन्तु उसी ' चौर ' शब्द को आर्य लोग ' तस्कर ' ( चोर ) अर्थ में प्रयोग करते हैं । दूसरी बात यह है कि शब्द यदि अनुमान रूप से ही प्रमाण होता तो उससे अर्थ बोध के लिए उसका पक्षमत्त्वादि ) तीनों रूपों से ज्ञान की ही अपेक्षा होती ( जैसे कि सभी अनुमानों में होता है ), आप्तोक्तत्व निश्चय की नहीं । यदि शब्द में आसोक्तत्व के निश्चय के बाद ही प्रामाण्य का निश्चय होता है, तो फिर अवश्य ही शब्द अनुमान से भिन्न प्रमाण है, क्योंकि दोनों के स्वरूप भिन्न हैं । इस प्रसङ्ग में हम लोग कहते हैं कि ( यह सङ्केत कर लेने पर कि यदि केवल तर्जनी अंगुली को ऊपर उठावें तो उससे दश संख्या को समझना, इसके बाद तर्जनी अगुली को ऊपर उठाने पर उस सङ्केत को समझनेवाले को दश संख्या का अनुमान होता है, जिस दश संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य उस बोद्धा पुरुष के आश्रयीभूत देश और काल से भिन्न देश और भिन्न काल का होता है । इस अनुमान में पक्ष कौन होता है? For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५१५ प्रतिपाद्यमानतया दशसंख्यया सह सम्बन्धान्तराभावेन तद्विशिष्ट प्रति-पादनायोगात् । नाप्यनयोरेकदेशता, नाप्येकका लत्वम्, कथमनुमानप्रवृत्ति:? क्रय-विक्रयव्यवहारे वणिजां तथाविधतर्जनीविन्यासस्य दशसंख्या प्रतिपादनाभि-प्रायाव्यभिचारोपलम्भात् । कर्त्तुस्तत्प्रतिपादनाभिप्रायावगतिमुखेनास्य दश संख्या-प्रतीतिहेतुत्वमिति चेत्? शब्दस्याप्येवमेव । प्रथमं गोशब्दादुच्चारिताद् वक्तुः ककुदादिमदर्थविवक्षा गम्यते, स्वसन्ताने गोशब्दोच्चारणस्य पदार्थविवक्षापूर्व-कत्वोपलम्भात् । तदर्थविवक्षया चार्थानुमानम् । अयं चात्र प्रयोगः - पुरुषो धर्मी ककुदादिमदर्थविवक्षावान्, गोशब्दोच्चारणकर्त्त त्वादहमिवेति । अर्थाभावेऽप्य-नाप्तानां विवक्षोपलब्धेर्न विवक्षातोऽर्थसिद्धिरिति चेत्? शब्दादपि कथं तत्सिद्धिः? संख्या तो इस अनुमान का पक्ष हो नहीं सकती, क्योंकि वह पहिले से प्रतीत नहीं है । तर्जनी का ऊपर उठाना ( विन्यास ) भी उस अनुमान का धर्मी नहीं हो सकता, क्योंकि इस अनुमान के द्वारा मुख्य ज्ञाप्य दश संख्या के साथ उसका कोई ( सङ्केत सम्बन्ध को छोड़कर ) दूसरा ( स्वाभाविक संयोग समवायादि ) सम्बन्ध नहीं है । अतः दश-संख्यारूप साध्य धर्म से युक्त तर्जनी विन्यास रूप धर्मी का बोध इस अनुमान के द्वारा नहीं हो सकता, क्योंकि तर्जनी विन्यास और प्रकृत दशसंख्या न एक काल के हैं, न एक देश के । अतः तर्जनी के उक्त विशेष प्रकार के विन्यास से दशसंख्या में जो अनुमान की प्रवृत्ति होती हैं, वह कैसे हो सकेगी? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) खरीद बिक्री के प्रसङ्ग में बनियों में यह अव्यभिचरित नियम प्रचलित है कि ' केवल तर्जनी को उठाने से दश संख्या को समझना, अतः उक्त वर्जनी विन्यास से तर्जनी को ऊपर उठानेवाले पुरुष के इस अभिप्राय का बोध होता है कि ' तर्जनी को ऊपर उठाने से इस पुरुष को दश संख्या का बोध, अभिप्रेत है । इसी रीति से इसके बाद तर्जनी के उक्त विन्यास से दश संख्या का अनुमान होता है । ( उ ० ) तो फिर शब्द से अर्थानुमान के प्रसङ्ग में भी यही रीति समझिए कि ( श्रोता ) पुरुष को वक्ता के द्वारा उच्चरित गो शब्द ( के श्रवण ) से ककुदादि धर्मों से युक्त ( बैल ) जीव को समझाने के लिए वक्ता के शब्द प्रयोग की इच्छा ( विवक्षा ) ज्ञात होती है, क्योंकि श्रोता अपनेज्ञात शब्द समूहों में से जब गोशब्द का उच्चारण करता है, उससे पूर्व उसे ककुदादि से युक्त अर्थ की विवक्षा का अपने में बोध होता है । इस प्रसङ्ग में अनुमान का प्रयोग इस प्रकार है कि जिस प्रकार मेरे द्वारा गोशब्द के उच्चारण से पहिले मुझमें ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा रहती है, उसी प्रकार यह गो-शब्द को उच्चारण करनेवाला पुरुष रूप धर्मी भी ककुदादि धर्मों से युक्त अर्थ की विवक्षा से युक्त है, क्योंकि यह भी गोशब्द का उच्चारण का कर्ता है । ( प्र ० ) अर्थ की सत्ता न रहने पर भी अनाप्त ( अविश्वास्य ) लोगों में उस अर्थ को विवक्षा देखी जाती है, अतः विवक्षा से अर्थ की सिद्धि नहीं की जा सकती । ( उ ० ) शब्द For Private And Personal