प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 591–600

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 591–600

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-न्यायकन्दली भ्रान्त्या विप्रलम्भधिया वार्थशून्यस्य शब्दस्य प्रयोगात् । आप्तोक्ताच्छब्दा-दर्थप्रतीतिरिति चेत्? आप्ताभिप्रायादेवार्थस्याधिगतिरिति समानार्थः । यस्तु सत्यपि लिङ्गत्वे देशविशेषे शब्दस्यार्थ ( स्य ) व्यभिचारो न धूमस्य, तत्रैष न्यायः । धूमः स्वाभाविकेन सम्बन्धेनाग्नेलिङ्गम् । शब्दस्तु चेष्टावत् पुरुषेच्छा-कृतेन सङ्केतेन प्रवर्तमानो यत्र यत्रार्थे पुरुषेण सङ्केत्यते तस्य तस्यैवार्थस्य विवक्षावगतिद्वारेण लिङ्गम् । अत एवास्मादाप्तप्रयुक्तत्वानुसारेण चेष्टादिवत् तावदर्थनिश्चये सातत्योर्ध्वगत्यादिधर्मविशिष्टस्येव धूमस्याप्तोक्तस्यैव शब्दस्यार्थाव्यभिचारसम्भवात् । भावात्, शब्दस्यार्थप्रतिपादनं मुख्यया वृत्त्या किं न कल्प्यते? सम्बन्धा-असम्बद्धस्य गमकत्वे चातिप्रसङ्गात् । अस्ति स्वाभाविकः ( को अलग प्रमाण मान लेने ) से ही अर्थ की सिद्धि क्यों कर होगी? क्योंकि अभिधा को भ्रान्ति से अथवा श्रोता को ठगने के लिए ऐसे शब्दों का भी प्रयोग होता है, जिनके वे अर्थ सम्भावित नहीं रहते । ( प्र ० ) आप्तजनों के द्वारा उच्चरित शब्द से ही अर्थ की प्रतीति होती है । ( उ ० ) इसके बदले यह भी तो कह सकते हैं कि आप्तपुरुष के द्वारा प्रयुक्त शब्द के श्रवण से श्रोता को उनके अभिप्राय का बोध होता है, एवं उस अभिप्राय से अर्थ विषयक अधिगति ( अनुमिति ) होती है । यह जो कहा गया है कि " शब्द यद्यपि अर्थ का ( ज्ञापक ) लिङ्ग है, किन्तु किसी विशेष प्रकार के देश में शब्द का भी अर्थ के साथ व्यभिचार उपलब्ध होता है, किन्तु धूम में वह्नि का व्यभिचार कहीं भी उपलब्ध नहीं होता, ( अतः धूम से वह्नि का अनुमान होता है, किन्तु शब्द से अर्थ का अनुमान नहीं हो सकता ) " । इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि धूम ( संयोग रूप ) स्वाभाविक सम्बन्ध से वह्नि का ज्ञापक हेतु है, किन्तु शब्द में यह बात नहीं है । जिस प्रकार पुरुषकृत सङ्क ेत के द्वारा तर्जन्यादि के विशेष विन्यास रूप चेष्टा से दश संख्या का अनुमान होता है, उसी प्रकार शब्द भी पुरुष की बोधनेच्छा रूप सङ्केत के द्वारा ही अर्थबोध के लिए प्रवृत्त होता है | अतः पुरुष का सङ्केत जिन अर्थों में जिन शब्दों का रहता है, उन्हीं अर्थों के वे शब्द विवक्षा के बोध के द्वारा ज्ञापक लिङ्ग होते हैं । जिस प्रकार चेष्टा रूप हेतु से ( बनियों के सङ्केत के द्वारा दश संख्या प्रभृति ) अर्थों का बोध होता है, उसी प्रकार शब्दों से उसके आप्तोक्तत्व के कारण हो अर्थ का बोध होता है । अत एव जिस प्रकार अविच्छिन्नमूला एवं ऊर्ध्वमुखी रेखा से युक्त धूम में वह्नि का अव्यभिचार सम्भव होता है, उसी प्रकार आप्त से उच्चरित शब्द में भी अर्थ का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) भी सम्भव है । ( प्र ० ) अभिधा रूप मुख्य वृत्ति से ही शब्द के द्वारा अर्थ का प्रतिपादन क्यों नहीं मान लेते? ( उ ० ) चूंकि शब्द को अर्थ के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है । ( प्र ० ) For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५१७ सम्बन्ध इति चेत्? शब्दस्यैकस्य देशभेदेन नानार्थेषु प्रयोगात् । यत्रायमायैः प्रयुज्यते तत्रास्य वाचकत्वम्, इतरत्र सङ्केतानुरोधात् प्रवृत्तस्य लिङ्गत्वमिति चेत्? न तुल्य एव तावच्चीरशब्दस्तस्करे भक्ते च प्रतीतिकरः, तत्रास्य तस्करे वाचकत्वं भक्ते च लिङ्गत्वमिति नास्ति विशेषहेतुः । आर्याणामपि चौरशब्दादर्थप्रतीतिः लिङ्गपूर्वका, चौरशब्दजनितप्रति-पत्तित्वात्, उभयाभिमतदाक्षिणात्य प्रयुज्यमानचौरशब्दजनितप्रतिपत्तिवत् । न च स्वाभाविकसम्बन्धसद्भावे प्रमाणमस्ति । शब्दस्य वाच्यनिष्ठा स्वाभाविकी वाचकशक्तिरेवोभयत्र दत्तपदत्वात् सम्बन्ध इत्युच्यते भवद्भिः । तथा चोक्तम् - " शक्तिरेव शब्दशक्तेश्च स्वभावादेव वाच्यनिष्ठत्वे सम्बन्धः " इति । व्युत्पन्नवदन्युत्पन्नोऽपि शब्दादर्थं यदि वर्ष के साथ असम्बद्ध शब्द को ही अर्थ का बोधक मानें तो फिर ( घट पद से पट बोध की आपत्ति रूप ) अतिप्रसङ्ग होगा, अतः शब्द का अर्थ के साथ स्वाभा-विक ( शक्ति रूप ) सम्बन्ध की कल्पना करते हैं । ( उ ० ) यह सम्भव नहीं है, क्योंकि एक ही शब्द का विभिन्न अर्थों के बोध के लिए प्रयोग होता है । ( प्र ० ) जिस अर्थ में आर्यलोग जिस शब्द का प्रयोग करते हैं, उस अर्थ का तो वह शब्द वाचक है ( उससे भिन्न जिन अर्थों में तरह ) ज्ञापक लिङ्ग है अर्थात् उस अर्थ में उस शब्द का स्वाभाविक सम्बन्ध है ) । केवल सङ्केत से ही शब्द प्रवृत्त होता है, वहाँ वह ( धूम की । ( उ ० ) यह भी कहना सम्भव नहीं है, भात दोनों का समान रूप से बोधक है क्योंकि एक ही ' चौर ' शब्द चोर और इन दोनों अर्थों में से चौर रूप अर्थ का तो चौर शब्द को वाचक माने और भात रूप अर्थ का उसे बोधक लिङ्ग माने, इसमें विशेष युक्ति नहीं है । ( इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि ) जिस प्रकार दोनों पक्ष यह मानते कि दाक्षिणात्यों के द्वारा प्रयुक्त ' चोर ' शब्द से भात रूप अर्थ की प्रतीति उक्त शब्द रूप लिङ्ग से उत्पन्न ( होने का कारण अनुमिति रूप होती ) है, उसी प्रकार आर्यों के द्वारा प्रयुक्त चौर शब्द से तस्कर की प्रतीति भी चौर शब्द रूप लिङ्ग से ही होती है, क्योंकि यह प्रतीति भी चौर शब्द से उत्पन्न होती है । इसमें कोई प्रमाण भी नहीं है कि शब्द और अर्थ दोनों में कोई स्वाभाविक सम्बन्ध है, क्योंकि केवल शब्द में ही रहनेवाला जो वाच्य ( अर्थ ) का वाचकत्व सम्बन्ध है, उसी सम्बन्ध को अर्थ और शब्द दोनों में कल्पना कर लेते हैं, और केवल शब्द में रहनेवाले उस सम्बन्ध को ही आप ( मीमांसक ) लोग दोनों का ' सम्बन्ध ' कहते हैं | जैसा कहा गया है कि ' शक्ति ही सम्बन्ध है ' । शब्द के शक्ति रूप सम्बन्ध को यदि स्वाभाविक रूप से ही वाच्य अर्थ में भी मान लें तो फिर जिस प्रकार व्युत्पन्न ( अर्थ में शब्द-For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-न्यायकन्दली प्रतीयात शब्दस्यार्थस्य तयोः सम्बन्धस्य च संभवात् । ज्ञातः सम्बन्धोऽर्थ-प्रत्यय हेतुर्न सत्तामात्रेणेति चेत्? यथाहु: -सम्बन्धः स्वात्मज्ञानमपेक्षते । तेनासौ विद्यमानोऽपि नागृहीतः प्रकाशकः ॥ इति । कीदृशं तस्य सम्बन्धस्य ज्ञानम्? अस्य शब्दस्यायमर्थों वाच्य इत्ये. वंभूतमिति चेत्? तत् कस्माद् भवति? वृद्धव्यवहारादिति चेत्? एतदेवाभि-धानाभिधेयालम्बनज्ञानं परस्परं व्यवहरद्भिर्वृद्धः पार्श्वस्थस्य बालकस्य क्रिय-माणं सङ्केत व्युत्पत्तिरिति चाभिधीयमानं संस्कारद्वारेणार्थप्रतीतिकारणमस्तु किं सम्बन्धान्तरेण? शब्दस्य हि निजं सामर्थ्यं शब्दत्वम्, आगन्तुकं च सामथ्यं सङ्केतो विशिष्टा चानुपूर्वी । तस्मादेव सामर्थ्यद्वितयात् तदर्थप्रत्ययो -पपत्तिः, सम्बन्धान्तरकल्पनावैयर्थ्यम्, दृष्टात् कार्योपपत्तावदृष्टकल्पनानवकाशात् । सङ्केत को जाननेवाले पुरुष को शब्द से अर्थ का बोध होता है, उसी प्रकार अव्यु-त्पन्न ( उक्त सङ्केत को न जाननेवाले ) पुरुष को भी शब्द से अर्थ के बोध की आपत्ति होगी, क्योंकि वहाँ भी शब्द और अर्थ इन दोनों का शक्ति रूप सम्बन्ध है ही । ( प्र ० > उक्त सम्बन्ध ज्ञात होकर ही अर्थ बोध के प्रति कारण हैं, केवल सत्ता मात्र से नहीं ( अतः अव्युत्पन्न पुरुष को अर्थबोध नहीं होता है ) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि चूंकि शब्द का शक्ति रूप सम्बन्ध ज्ञापक हेतु है ( उत्पादक नहीं ), अतः वह अपने अर्थज्ञान रूप कार्य के उत्पादन में अपने ज्ञान की अपेक्षा रखता है, यही कारण है कि शब्द में विद्यमान रहने पर भी जब तक वह ज्ञात नहीं हो जाता, तब तक अर्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता । ( उ ० ) शक्ति रूप सम्बन्ध का कैसा ज्ञान अर्थबोध के लिए अपेक्षित है? ' यदि यह कहें कि ' इस शब्द का यह अर्थ वाच्य है ' इस प्रकार का ज्ञान अपेक्षित है, तो फिर यह पूछना है कि यह ज्ञान किससे उत्पन्न होता है? यदि इसका यह उत्तर दें कि ' यह ज्ञान वृद्धों के व्यवहार से उत्पन्न होता है ' तो फिर ' अभिधाना-धेय ' के इस ज्ञान को ही अपने संस्कार के द्वारा कारण क्यों नहीं मान लेते? जो शब्दों का व्यवहार करते हुए वृद्धजनों से बालकों में उत्पन्न होता है, और जिसे ' सङ्केत ' एवं ' व्युत्पत्ति ' भी कहते हैं । इसके लिए शब्द का अर्थ में विलक्षण सम्बन्ध मानने का क्या प्रयोजन है? कहने का अभिप्राय है कि शब्द की अपनी स्वाभाविक शक्ति शब्दत्व रून ही है, एवं पुरुषों के द्वारा उसमें दो शक्तियाँ उत्पन्न की जाती हैं, जिनमें पहिली है सङ्केत और दूसरी है विशेष प्रकार की आनुपूर्वी ( वर्णों का विन्यास ) | इन्हीं दोनों सामयों से शब्द के द्वारा अर्थ की उत्पत्ति हो जाएगी । अतः शब्द का अर्थ में स्वतन्त्र सम्बन्ध की कल्पना व्यर्थ है, होने पर अतीन्द्रिय कारणों की क्योंकि दृष्ट कारणों से ही कार्य की उत्पत्ति संभावित कल्पना उचित नहीं है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५१६ श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, तद्वचनादाम्नाय -श्रुति एवं स्मृति रूपशब्द प्रमाणों का भी प्रामाण्य उनके वक्ताओं के प्रामाण्य के हो अधीन है । यही बात ' तद्वचनादाभ्नायस्य प्रामाण्यम् ” “ लिङ्गाच्चानित्यः ननु यदि वक्तृद्वारेण शब्दोऽर्थावबोधकः, तदा वेदवाक्यादर्थप्रत्ययो न घटते, वक्तुरभावादत आह- श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याभ्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्ष इति । न केवलं लौकिक आम्नायः श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तुः प्रामाण्य-सपेक्ष्य प्रत्यायकः । शब्दो वक्त्रधीनदोषः, न त्वयमसुरभिगन्धवत् स्वभावत एव दुष्टः । यथोक्तम्— शब्दे कारणवर्णादिदोषा

वक्तृनराश्रयाः ।

नहि स्वभावतः शब्दो दुष्टोऽसुरभिगन्धवत् ॥

नित्यत्वे वेदस्य वक्तुरभावाद् दोषाणामनवकाशे सति निराशङ्कं प्रामाण्यं सिद्धयति, पौरुषेयत्वे तु निविचिकित्सं प्रामाण्यं न लभ्यते, कदाचित् पुरुषाणां रागद्वेषादिभिरयथार्थस्यापि वाक्यस्य दर्शनात् । तत्राह - " तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ” इति । तदित्यनागतावेक्षणन्यायेन “ अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्ग मृषेः ” इति ( प्र ० ) यदि वक्ता की विवक्षा के द्वारा ही शब्द अर्थ का बोधक है, तो फिर वेद वाक्यों से अर्थों का बोध न हो सकेगा, क्योंकि वेदों का कोई वक्ता नहीं है । इसी प्रश्न के समाधान के लिए " श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः ” भाष्य का यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् केवल लौकिक ' आम्नाय ' के द्वारा प्रमाबोध के उत्पादन के लिए ही वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा नहीं है, किन्तु श्रुति एवं स्मृति रूप आम्नाय ( शब्द ) भी अपने द्वारा प्रमात्मक बोध के उत्पादन के लिए वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा रखते हैं । क्योंकि शब्द दुर्गन्ध की तरह स्वतः ही दुष्ट नहीं है । उसमें तो वक्ता के दोष से ही दोष आते हैं । जैसा कहा गया है कि ' शब्द में कारणों के द्वारा वर्णों के जितने भी दोष भासित होते हैं, वे सभी वस्तुतः वक्ता पुरुष में रहनेवाले दोषों के कारण ही आते हैं । दुर्गन्ध की तरह शब्द स्वभावतः स्वयं दुष्ट नहीं हैं ' । ( प्र ० ) वेदों को यदि नित्य मान लिया जाता है तो फिर उनमें निःशङ्क प्रामाण्य की सिद्धि होती है । यदि उन्हें पौरुषेय मानते हैं तो यह शङ्का बनी ही रहती है कि ' कदाचित् इसका कोई अंश अप्रमाण न हो ' । क्योंकि कभी कभी ऐसा देखा जाता है कि रागद्वेष के कारण मनुष्य अयथार्थ ( बोषजनक ) वाक्य का भी प्रयोग करता है । इसी प्रश्न का उत्तर ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इत्यादि सूत्रों का उल्लेख करते हुए भाष्यकार ने दिया है । ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इस सूत्र में ' तत् ' शब्द से ' आने-वाले भविष्यवस्तु को भी बुद्धि के द्वारा देखा जा सकता है ' ( अनागतावेक्षण ) इस For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२० न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव-न्यायकन्दली सूत्रे प्रतिपादितस्यास्मद्विशिष्टस्य वक्तुः परामर्शः, तद्वचनात् तेन विशिष्टेन पुरुषेण प्रणयनादास्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम् । अयमभिसन्धिः -- दोषाभावप्रयुक्तं प्रामाण्यं न नित्यत्वप्रयुक्तम्, सत्यपि नित्यत्वे श्रोत्रमनसोरागन्तुकदोषैः क्वचिदप्रामाण्यात् । असत्यपि नित्यत्वे प्रसृष्ट-दोषाणां चक्षुरादीनां प्रामाण्यात् । दोषाश्च पुरुषविशेषे नैव सन्तीत्युपपा-दितम् । तेनैतत्प्रोक्तस्याम्नायस्य सत्यपि पौरुषेयत्वे प्रामाण्यम् । नहि यथार्थद्रष्टा प्रक्षीणरागद्वेषः कृपावानुपदेशाय प्रवृत्तोऽयथार्थमुपदिशतीति शङ्कामारोहति । अथ पुरुषविशेषप्रणीतो वेद इति कुत एषा प्रतीतिरिति? सर्वैर्वर्णाश्रमिभि-रविगानेन तदर्थपरिग्रहात् । यत्किञ्चनपुरुष प्रणीतत्वे तु वेदस्य बुद्धादि -वाक्यवन सर्वेषां परीक्षकाणामविगानेन तदर्थानुष्ठानं स्यात्, कस्यचिदप्रा-न्याय से आगे ' अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः ' इस सूत्र में कथित अस्मदादि साधारण जनों से उत्कृष्ट पुरुष का परामर्श अभिप्रेत है । ' तद्वचनात् ' उस विशिष्ट पुरुष के द्वारा निर्मित होने के कारण ही आम्नाय ' में अर्थात् वेद में प्रामाण्य है । गूढ़ अभिप्राय यह है कि किसी भी प्रमाण में प्रामाण्य के लिए उसका नित्य होना आवश्यक नहीं है । उसमें दोषों का न रहना ही उसके प्रामाण्य के लिए पर्याप्त है । क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय और मन ये दोनों ही नित्य हैं ( पोरुषेय नहीं हैं ), किन्तु किसी कारण से जब इनमें दोष आ जाते हैं तो फिर ( ये नित्य होते हुए भी ) अप्रमाण हो जाते हैं । इसी प्रकार चक्षुरादि इन्द्रियाँ यद्यपि अनित्य हैं फिर भी जब तक दोषों से शून्य रहती हैं तब तक उनमें प्रामाण्य बना रहता है । अतः विशिष्ट पुरुष ( रूप ईश्वर ) के द्वारा रचित आम्नाय में उसके पौरुषेय होने पर भी प्रामाण्य के रहने में कोई बाधा नहीं है । इसकी तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि यथार्थ ज्ञान से युक्त और रागद्वेष से रहित कृपाशील महापुरुष जब उपदेश करने के लिए उद्यत होंगे तो वे अयथार्थ ( ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले ) वाक्यों का भी कभी प्रयोग करेंगे । ( प्र ० ) यह कैसे समझते हैं कि विशिष्ट ( सर्वज्ञ ) पुरुष के द्वारा ही वेदों का निर्माण हुआ है? ( उ ० ) चूंकि ब्राह्मणादि सभी वर्गों के लोग एवं ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों के लोग बिना किसी विरोध के वेदों के द्वारा प्रतिपादित निर्देशों का पालन करते हैं | यदि किसी साधारण पुरुष से वेदों का निर्माण हुआ होता तो बुद्धिपूर्वक चलनेवाले इतने शिष्ट जनों के द्वारा वेदों के द्वारा कथित अर्थों का बिना विरोध के अनुष्ठान न होता, जैसे कि बुद्धादि के वाक्यों का अनुसरण कुछ ही व्यक्तियों के द्वारा हुआ, और वह भी बहुत विरोध के बाद | वेदों को बुद्धादि वाक्यों की तरह अप्रामाणिक मानने पर वर्णाश्रमियों में से भी किसी को अप्रामाण्य ज्ञान के द्वारा वेदों से अप्रमा ज्ञान भी होता । ( इससे यह अनुमान होता है कि ) जिसमें सभी को प्रामाण्य यह होता है वह प्रमाण ही होता है ( अप्रमाण नहीं ), जैसे कि प्रत्य-For Private And Personal

पृष्ठ 596

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 596 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भावानुवादसहितम् ५२१ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal प्रामाण्यम् " ( वै. अ. १ आ. १ सू. ३ ) “ लिङ्गाच्चानित्यो बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे " ( वै. अ. ६ आ. १ सू. १ ) " बुद्धिपूर्वो ददातिः ” ( वै. अ. ६ आ. १ सू. ३ ) इत्युक्तत्वात्! " बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे ", " बुद्धिपूर्वो ददातिः " इत्यादि सूत्रों के द्वारा कही गयी है । माण्यावबोधेन विसंवादप्रतीतेरपि सम्भवात् । यत्र च सर्वेषां संवादनियम-स्तत्प्रमाणमेव, यथा प्रत्यक्षादिकम् । प्रमाणं वेदः सर्वेषामविसंवादिज्ञानहेतुत्वात्, प्रत्यक्षवत् । यत्तु दृष्टार्थेषु कर्मस्वनुष्ठानात् क्वचित् फलादर्शनं न तदस्य प्रामाण्यं प्रतिक्षिपति, सामग्रीवैगुण्य निबन्धनत्वात् । तन्निबन्धनत्वं च यथावत्सामग्री सम्भवे सति फलदर्शनात् । आप्तोक्तत्वादाम्नायस्येति न युक्तम्, तदर्थानुष्ठानकालेऽभियुक्तैरनुष्ठा-तृभिः स्मृत्ययोग्यस्य कर्तुरस्मरणादभावसिद्धेरत आह - लिङ्गाच्चानित्य इति । तद्वचनादाम्नाय प्रामाण्यमित्यत्रोक्तमाम्नायपदं प्रकृतत्वादिह सम्बध्यते, लिङ्गा. दाम्नायोऽनित्यो गम्यत इत्यर्थः । लिङ्गमुपन्यस्यति - बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेद इति । क्षादि प्रमाण । अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों की तरह वेद भी सभी व्यक्तियों में प्रमा ज्ञान काही उत्पादक होने के कारण प्रमाण ही है । यह जो कोई आक्षेप करते हैं कि ' वेदों के द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठानों में से कुछ निष्फल भी होते हैं, जिससे निःशङ्क प्रामाण्य का विघटन होता है, यह आक्षेप तो उन अनुष्ठानों की यथाविहित सामग्री में वैगुण्य की कल्पना करके भी हटाया जा सकता है । ' उन अनुष्ठानों के विधान के अनु-सार सामग्री का सम्बलन नहीं था ' यह इसी से समझ सकते हैं कि विधान के अनुसार सामग्री के द्वारा जो अनुष्ठान किया जाता है, वह अवश्य ही सफल होता दीखता है । ( प्र ० ) आम्नाय ( वेद ) आप्तों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं है, क्योंकि अनुष्ठान के समय अनुष्ठाताओं को वेदों के कर्त्ता का स्मरण नहीं होता है, अतः सत्ता के न रहने के कारण वे स्मृति के अयोग्य हैं? इसी प्रश्न के समाधान के उल्लेख लिए ' लिङ्गाच्चानित्यः ' इस सूत्र का किया गया है । इस सूत्र के पूर्ववर्ती ' तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ' इस सूत्र के ' आम्नाय ' पद को प्रकृत में उपयुक्त होने के कारण ' लिङ्गाच्चानित्यः ' इस सूत्र में अनुवृत्त समझना चाहिए । तदनुसार इस सूत्र का यह अर्थ होता है कि हेतु से आम्नाय को अनित्य समझना चाहिए, ( अर्थात् हेतु से वेद में अनित्यत्व का अनुमान करना चाहिए ) | ' बुद्धि-पूर्वा वाक्यकृतिर्वेदें ' इस सूत्र के उल्लेख के द्वारा वेद में अनित्यत्व के साधक हेतु का हो निर्देश किया गया है । उक्त सूत्र का ' वाक्यकृतिः ' शब्द ' वाक्यस्य कृति: ' इस समास

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणें स्वतः प्रामाण्यखण्डन-न्यायकन्दली वाक्यस्य कृतिर्वेद इति - वाक्यस्य कृतिर्वाक्यरचना बुद्धिपूर्विका, वाक्यरचनात्वात्, लौकिकवाक्यरचनावत् । लिङ्गान्तरमाह - बुद्धिपूर्वो ददातिरित्युक्तत्वात् । वेदे ददातिशब्द बुद्धि-पूर्वको ददातिरित्युक्तत्वाल्लौकिकददातिशब्दवत् । यच्चेदमस्मर्यमाणकर्ता ' कत्वादिति, तदसिद्धम्, “ प्रजापतिर्वा इदमेक आसीना-हरासीन्न रात्रिरासीत्, स तपोऽतप्यत, तस्मात् तपसश्चत्वारो वेदा अजायन्त " इत्याम्नायेनैव कर्तृ स्मरणात्, जीर्णकूपादिभिर्व्यभिचाराच्च । तदेवमनित्यत्वे वेदस्य सिद्धे पुरुषवचसां द्वैतोपलम्भात् प्रामाण्यसन्देहे सति दृष्टे विषये कदाचि-दर्थसन्देहात् प्रवृत्तिर्भवत्यपि अदृष्टे तु विषये प्रचुरवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये के द्वारा निष्पन्न है, तदनुसार उक्त सूत्र से लौकिक वाक्य की रचना केवल वाक्य को उत्पन्न होती है, उसी प्रकार वेदवाक्यों की भी पुरुष की बुद्धि से ही उत्पन्न I यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार रचना होने के कारण ही पुरुष की बुद्धि से रचना भी चूंकि वाक्य रचना ही है, अतः वह वेदों में अनित्यत्व के साधन के लिए ही दूसरे हेतु का प्रदर्शन करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि ' बुद्धिपूर्वो ददाति: ' इस सूत्र की रचना महर्षि कणाद ने की है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार लोक में ' ददाति ' शब्द का प्रयोग ( पुरुष की ) बुद्धि के द्वारा निष्पन्न होता है, उसी प्रकार वेद के ' ददाति ' शब्द का प्रयोग भी केवल ' ददाति ' शब्द का प्रयोग होने के कारण ही बुद्धि के द्वारा उत्पन्न है । ( वेद को नित्य माननेवालों ने ) यह जो ' अस्मय्यं माणकत्र्त्ती कत्व ' रूप हेतु का उल्लेख ( वेदों के नित्यत्व के लिए किया है, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ) यह हेतु ही वेद रूप पक्ष में सिद्ध नहीं है । चूंकि ' प्रजापतिर्वा ' इत्यादि वेद वाक्यों में कर्त्ता का स्पष्ट उल्लेख है । एवं यह ' अस्मर्यमाणकर्तृकत्व ' रूप हेतु उन जीर्णकूपादि में व्यभिचरित भी है, जिनके बनानेवालों का नाम आज कोई नहीं जानता । इस प्रकार वेदों में अनित्यत्व के सिद्ध हो जाने पर ( यह उपपादन करना सुलभ है कि ) दृष्टान्तभूत लौकिक वाक्य प्रमाण और अप्रमाण दोनों ही प्रकार के उपलब्ध होते हैं, अत: उनमें प्रामाण्य-सन्देह के कारण उन वाक्यों से निर्दिष्ट कार्यों में कदाचित् अर्थ के सन्देह से भी प्रवृत्ति हो सकती है, किन्तु वैदिक यागादि कार्यो में - जिनके फल स्वर्गादि सर्वथा अष्ट हैं, जिनके अनुष्ठान में बहुत से धन का व्यय होता है, शारीरिक परिश्रम भी बहुत For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५२३ तावत् प्रेक्षावान्न प्रवर्तते, यावत् तद्विषये वाक्यस्य प्रामाण्यं नावधारयति । दृष्टं च लोके वचसः प्रामाण्यं वक्तृगुणावगतिपूर्वकम् तेन वेदेऽपि तथैव प्रामा-यान्निविचिकित्स मनुष्ठानं स्यात् । अत्र वदन्ति - नाप्तोक्तत्वनिबन्धनं वचसः प्रामाण्यम्, सर्वप्रमाणानां स्वत एव प्रामाण्यादिति । ते इदं प्रष्टव्याः, प्रामाण्यमेव तावत् किमुच्यते? किमर्थाव्यभिचारः? किं वा यथार्थपरिच्छेदकत्वम्? न तावदर्थाव्यभिचारः । सत्यपि वह्निनियतत्वे धूमस्य प्रमत्तस्य कुतश्चिन्निमित्तादनुत्पादिता-ग्निज्ञानस्यप्रामाण्याभावात्, नीलपीतादिषु प्रत्येकं व्यभिचारेऽपि चक्षुषो यथार्थ-ज्ञानजनकत्वेनैव प्रामाण्यात् । अथ यथार्थपरिच्छेदकत्वं प्रामाण्यम्? तत् किं स्वतो ज्ञायते? स्वतो वा जायते? किं वा स्वतो व्याप्रियते? यदि तावज्ज्ञानेन स्वप्रामाण्यं स्वयमेव ज्ञायेत, यथार्थपरिच्छेदकमहमस्मीति । न हि अपेक्षित होता है तब तक प्रवृत्ति नहीं हो सकती जब तक कि उन अनुष्ठानों के बोधक वाक्यों में प्रामाण्य का अवधारण न हो जाय । शब्दों के प्रामाण्य के प्रसङ्ग में लोक में यह देखा जाता है कि उसका प्रामाण्य अपने ज्ञान के लिए वक्ता में यथार्थज्ञानादि गुणों के ज्ञान की अपेक्षा रखता है, अतः वेदों में भी उसी प्रकार से वक्ता में गुणाव-धारणमूलक प्रामाण्य जब तक अवधारित नहीं होगा, तब तक उनसे विहित यागादि का निःशङ्क अनुष्ठान नहीं हो सकेगा । इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के ( मीमांसक ) लोग कहते हैं कि ( प्र ० ) शब्द आप्तजनों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं हैं, क्योंकि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः है | ( उ ० ) इन लोगों से यह पूछना चाहिए कि आप लोग प्रामाण्य किसे कहते हैं? क्या ( १ ) अर्थ के साथ ज्ञान का अव्यभिचार ( नियत सम्बन्ध ) ही प्रामाण्य है? अथवा ( २ ) वस्तुओं को अपने रूप में निश्चित करना ही प्रामाण्य है? ( १ ) अर्थ का अव्यभिचार तो प्रामाण्य नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसे कितने हो पागल दुनियाँ में हैं, जिन्हें जिस किसी प्रतिबन्ध के कारण धूम में वह्नि की व्याप्ति रहने पर भी धूमज्ञान से वह्नि का ज्ञान नहीं होता, फलतः उस धूम ज्ञान में प्रामाण्य नहीं रहेगा । एवं नील में सम्बद्ध चक्षु पीत में व्यभिचरित रहने पर भी यथार्थ ज्ञान का करण होने से ही प्रमाण माना जाता है । ( २ ) यदि प्रामाण्य को यथार्थपरिच्छेदकत्व रूप मानें तो उस प्रसङ्ग में पहिले यह पूछना है कि यह यथार्थपरिच्छेदकत्व निम्नलिखित पक्षों में से क्या है? ( १ ) प्रामाण्य स्वतः ज्ञात होता है? या ( २ ) प्रामाण्य स्वतः उत्पन्न होता है? अथवा ( ३ ) प्रामाण्य अपने अर्थपरिच्छेद रूप कार्य में स्वतः व्यापृत होता है? ( १ ) यदि ज्ञान का प्रामाण्य अपने ही द्वारा ' यथार्थ परिच्छेदक For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभव्यम् [ गुणे स्वतः प्रामाण्यखण्डन-न्यायकन्दली प्रमाणे यथार्थमिदमयथार्थं वेति संशयः कदाचिदपि स्यात्, विपर्ययज्ञाने च प्रवृत्तिर्न भवेत् । अथ स्वात्मनि क्रियाविरोधादात्मानमगृह्णद् विज्ञानमात्मनो यथार्थपरिच्छेदकत्वं न गृह्णाति तहि तत्परिच्छेदाय परमपेक्षितव्यम्, प्रमाणेन विना प्रमेयप्रतीतेरभावात् । प्रामाण्यस्यापि प्रमीयमानदशायां प्रमेयत्वादिति परतः प्रामाण्यमेव । परेण प्रामाण्ये ज्ञायमाने परेण प्रामाण्यं ज्ञेयम्, तस्यापि प्रामाण्यमपरेण ज्ञेयं तस्याप्यन्येनेत्यनवस्थेति चेत्? नानवस्था, सर्वत्र प्रामाण्ये जिज्ञासाभावात् । प्रमाणं हि स्वोत्पत्त्यैवार्थं परिच्छिनत्ति न ज्ञातप्रामाण्यम्, तेन त्वर्थे परिच्छिन्नेऽपि यत्र कुतश्चिन्निमित्तात् प्रमाणमिदमप्रमाणं वेति संशये जाते विषयसन्देहात् पुरुषस्याप्रवृत्तिः, तत्रास्य प्रवृत्त्यर्थं करणान्तरात् प्रामाण्य-जिज्ञासा भवति, अनवधारिते प्रामाण्ये संशयानुच्छेदात् । यत्र पुनरत्यन्ताभ्यास-मैं ही हूँ इस प्रकार से ज्ञात होता तो फिर ( प्रमा ज्ञान रूप ) प्रमाण में ' यह यथार्थ है? या अयथार्थ? इस प्रकार का संशय कभी नहीं होता । एवं विपर्यय ज्ञान से जो ( विफला ) प्रवृत्ति होती है, वह भी कभी नहीं होती ( उससे भी सफल प्रवृत्ति ही होती ) । यदि यह कहें ( प्र ० ) ' स्व ' में क्रिया के विरोध के कारण अर्थात् एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश असम्भव होने के कारण एक ज्ञान व्यक्ति अपने उसी ज्ञान व्यक्ति का ग्रहण नहीं कर सकता, अतः ' स्व ' में रहनेवाले यथार्थपरिच्छेदकत्व का भी ग्रहण उससे नहीं होता है । ( उ ० ) तो फिर अर्थ परिच्छेद के लिए किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा होगी, क्योंकि प्रमाण के बिना प्रमेय का ज्ञान नहीं होता है । प्रमाण भी अपने प्रमा ज्ञान में विषय होने की दशा में प्रमेय है ही । अतः यथार्थपरिच्छेदकत्व भी ' परतः ' ही है । ( प्र ० ) दूसरी प्रमा से जिस समय प्रामाण्य गृहीत होता है, उस समय यह प्रामाण्य उस दूसरे प्रमाण का ज्ञेय विषय होता है । किन्तु जब यह दूसरा प्रमाण स्वयं ज्ञेय होता है, तब वह किसी तीसरे प्रमाण के द्वारा गृहीत होता है । इसी तरह उस तीसरे प्रमाण का भी ग्रहण किसी चौथे प्रमाण से होगा । इस प्रकार ' परतः प्रामाण्यम ' पक्ष में अनुवस्था दोष है । ( उ ० ) यह अनवस्था दोष ' परतः प्रामाण्य ' पक्ष में नहीं है, क्योंकि सभी ज्ञानों में प्रामाण्य का संशय उपस्थित नहीं होता । प्रमाण अपनी उत्पत्ति के द्वारा अपने अर्थों का अवधारण कर लेता है । अर्थ परिच्छेद के लिए प्रामाण्य के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है । प्रामाण्यसंशय के द्वारा अर्थ में प्रवृत्ति के न होने का यह कारण है कि प्रमाण के द्वारा अर्थ पच्छेिद के बाद जब किसी कारणवश अर्थ के परिच्छे-दक इस प्रमाण में ' यह प्रमाण है या अप्रमाण? ' इस आकार का संशय उपस्थित होता है । और इस संशय से अर्थविषयक संशय होता है । इस अर्थ संशय के कारण ही प्रवृत्ति का उक्त प्रतिरोध होता है, प्रवृत्ति के इस प्रतिरोध को हटाकर पुनः प्रवृति के सम्पादन के लिए ही दूसरे कारणों के द्वारा प्रामाण्य को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है, क्योंकि जब तक प्रामाण्य का अवधारण नहीं हो जाएगा, तब तक प्रामाण्य का उक्त संशय For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५२५ पाटवादखिलविशेषग्रहणाद् वा प्रमृष्टसन्देहकलङ्कलेखमेव प्रमाणमुदेति, तत्र तदुत्पत्त्यैवार्थनिश्चये प्रमातुर्निराकाङ्क्षत्वात् प्रतिपित्सेव नास्तीति न प्रमाणान्तरानुसरणम् । यस्तु तत्रापि ज्ञानस्योभयथा दर्शनेन सन्देहमारोपयति स न शक्नोत्यारोपयितुम्, तदर्थनिश्चयेनैव पराहतत्वात् । यथाह मण्डनो ब्रह्म-सिद्धौ-" अनाश्वासो ज्ञायमाने ज्ञानेनैवापबाध्यते " इति । यदि प्रवृत्त्यर्थं प्रामाण्यं विजिज्ञास्यते? यत्रानवधारितप्रामाण्यस्यैवार्थसंशयात् प्रवृत्तिरभूत् तत्रार्थप्राप्तिपरितुष्टस्य प्रामाण्ये जिज्ञासा नास्ति, कथं प्रवृत्ति-सामर्थ्यात् प्रमाणस्यार्थवत्त्वावधारणम्? न तत्रापि कर्षकस्येव बीजपरीक्षार्थं प्रामाण्यपरीक्षार्थमेव प्रवृत्तिः अस्यास्त्येव तदर्थिता । यस्य प्रामाण्य सन्देहादर्थे सन्दिहानस्यार्थग्रहणार्थमेव प्रवृत्तिर्जाता, तस्यार्थप्राप्तिचरितार्थस्यानभिसंहितमपि दूर नहीं हो सकेगा । जहाँ अभ्यास की अत्यन्त पटुता के कारण अथवा विषय के सभी अंशों को खूब अच्छी तरह देखने के कारण ऐसा ही प्रमाण उपस्थित होता है, जिसमें सन्देह कलङ्क की रेखा भी नहीं रहती है, वहाँ प्रमाण केवल अपनी उत्पत्ति के द्वारा ही अर्थ का अवधारण करा देता है ( इसी से प्रमाता पुरुष की प्रामाण्य ज्ञान की आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है ), अतः ऐसे स्थलों में प्रामाण्य ज्ञान के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती । जो कोई ज्ञान प्रमा और अप्रमा दोनों प्रकार का होता है ' केवल यह समझने के कारण ही ऐसे स्थलों में भी प्रामाण्य सन्देह का आरोप करते हैं, उनका यह आरोप भी सम्भव नहीं है, क्योंकि तदर्थं विषयक निश्चय हो जाने के कारण तदर्थ विषयक प्रामाण्य सन्देह नहीं हो सकता । जैसा कि आचार्य मण्डन ने ब्रह्मसिद्धि में कहा है कि किसी विषयक ज्ञान में उत्पन्न अविश्वास उस विषयक निश्चय के द्वारा ही पराभूत हो सकता है, ( अर्थात् इसके लिए ज्ञान गत प्रामाण्य का अवधारण अपेक्षित नहीं है ) । यदि प्रवृत्ति के लिए ज्ञान के प्रामाण्य की जिज्ञासा मानते हैं, तो फिर जो प्रवृत्ति अर्थ के संशय से ही होती है, जिस प्रवृत्ति के आश्रयीभूत पुरुष में प्रामाण्य का अवधारण है ही नहीं, ( उस प्रवृत्ति की उपपत्ति कैसे होगी? ) क्योंकि वह पुरुष तो उसी संशयजनित प्रवृत्ति के द्वारा अभीष्ट अर्थ को पाकर सन्तुष्ट है, उसमें प्रामाण्य की जिज्ञासा क्यों कर उठेगी? फिर कैसे कहते कि प्रवृत्ति की सफलता से प्रमाण में अर्थवत्त्व का अवधारण होता है? जिस प्रकार कोई किसान बीज की परीक्षा को ही प्रधान प्रयोजन मानकर प्रवृत्त होता है, उस प्रकार की स्थिति प्रकृत में नहीं है, क्योंकि वह सन्दिग्ध पुरुष उस अर्थ का प्रार्थी है । किन्तु जहाँ प्रामाण्य - सन्देह के कारण उत्पन्न अर्थ सन्देह से ही अर्थ में ग्रहण पुरुष प्रवृत्त होता है और उसकी प्रवृत्ति सफल भी होती है, उस प्रवृत्ति की सफलता से परितुष्ट पुरुष को भी प्रवृत्ति की सफलता से प्रामाण्य की अनुमिति अवश्य होती है, For Private And Personal