प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 601–610
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 601–610
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतः प्रामाण्यखण्डन-न्यायकन्दली प्रामाण्यावधारणं वस्तुसामर्थ्याद् भवति, प्रवृत्तिसामर्थ्यस्य प्रामाण्याव्यभिचारात् । तदेवं तावत् प्रामाण्यं स्वतो न ज्ञायते । नापि स्वतो जायते । यदि ज्ञानमुत्पद्य पश्चात् स्वात्मनि यथार्थपरिच्छेदकत्वं जनयति, प्रतिपद्येमहि तस्य स्वतः प्रमाणताम् । यथार्थावबोधस्वभावस्यैव तस्य कारणादुत्पत्ति पश्यन्तः परापेक्षमेव तस्य प्रामाण्यं मन्यामहे । अथ मन्यसे प्रमाणं स्वयमेव स्वकीयं प्रामाण्यं जनयतीति स्वतः प्रमाणत्वं न ब्रूमः अपि तु ज्ञानं प्रामाण्योत्पादाय स्वोत्पादककारणकलापादन्यन्नापेक्षत इति स्वतः प्रामाण्यम् । एतदप्यसत् । यदि ह्यन्यूनानतिरिक्तज्ञानोत्पादिकैव सामग्री प्रामाण्ये कारणम्, विपर्ययज्ञानं कुतः? यथार्थज्ञानजननं कारणानां स्वभावः, स यदा दोषैः प्रच्याव्यते तदा तान्ययथार्यज्ञानं जनयन्ति, यदा तु स्वभाव-प्रच्युतिहेतवो दोषा न भवन्ति तदा तेषां यथार्थज्ञानजननमेव स्वभावो व्यवतिष्ठत इति चेत्? तत् किं वक्तृज्ञानमात्रादेव तत्पूर्वके वाक्ये क्योंकि प्रवृत्ति की सफलता रूप हेतु में प्रामाण्य का अव्यभिचार ( व्याप्ति ) है ही, और वस्तु के सामर्थ्य को कार्य करने से कोई रोक नहीं सकता? तस्मात् प्रामाण्य न स्वतः उत्पन्न होता है और न स्वतः ज्ञात ही होता है । यदि उत्पन्न होने के बाद ज्ञान अपने में यथार्थ-परिच्छेदकत्व को उत्पन्न करता तो समझते कि वह ' स्वत: प्रमाण ' है । किन्तु हम देखते हैं कि यथार्थ बोध ( यथार्थपरिच्छेद ) स्वरूप ही तो उसकी उत्पत्ति होती है, अत । हम लोग उसके प्रामाण्य के लिए दूसरे कारणों की अपेक्षा मानते हैं । ( प्र ० ) यदि यह मानते हो कि ( प्र ० गुरुमत ) प्रामाण्य के स्वतस्त्व का यह अर्थ नहीं है कि प्रमाण अपने प्रामाण्य का उत्पादन स्वयं करता है, किन्तु स्वतः प्रामाण्य यह है कि ज्ञान के जितने कारण हैं, उतने से ही ज्ञान के प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है, प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए उन कारणों से न अधिक कारण की आवश्यकता है और न उन कारणों में से किसी को छोड़कर उसकी उत्पत्ति हो सकती है । ( उ ० ) किन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि यदि ज्ञान के लिए जितने कारण आवश्यक हैं, उतने ही कारण यदि ज्ञान के प्रामाण्य के लिए लपेक्षित हैं, प्रामाण्य के लिए न उनसे afe की आवश्यकता है, न उनमें से किसी को छोड़कर प्रामाण्य की उत्पत्ति हो सकती है, तो फिर विपर्यय रूप ज्ञान क्योंकर उत्पन्न होता है? ( प्र ० ) यद्यपि यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करना ही उन कारणों का स्वभाव है, किन्तु दोषों से वे जिस समय अपने उस स्वभाव से प्रच्युत हो जाते हैं, उस समय उनसे ( दोष सांनिध्य के कारण ) अयथार्थ ज्ञान की भी उत्पत्ति होती है । जिस समय उन कारणों को उस स्वभाव से च्युत करनेवाले दोष उपस्थित नहीं रहते, उस समय ज्ञान के कारणों का अपना यथायं ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला स्वभाव व्यवस्थित ही रहता है । ( उ ० ) तो क्या वक्ता पुरुष For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली .५२७ यथार्थतोत्पाद:? एवं सति सर्वमेव वाक्यमवितथं स्यात् । अथ प्रमाणज्ञानाड् वाक्ये यथार्थतोत्पाद:? न तर्हि कारणस्वरूपमात्रात् प्रामाण्यमपि तु तद्गुणात् । शब्दस्य कारणमर्थज्ञानम्, तस्य गुणो यथार्थत्वम् । अयथार्थत्वं च दोषः । तत्र यथार्थताया वाक्यप्रामाण्यहेतुत्वे कारणगुणादेव तस्य प्रामाण्यम्, न स्वरूपमात्रात् । शब्दस्य च गुणात् प्रामाण्ये ज्ञानान्तराणामपि तथैव स्यात् । विवादाध्यासितानि विज्ञानानि कारणगुणाधीनप्रामाण्यानि, प्रमाणज्ञानत्वाच्छन्दाधीनप्रमाणज्ञानवत् । शब्देऽपि कारणगुणस्य दोषाभावे व्यापारो न प्रामाण्योत्पत्ताविति चेत्? न, गुणेन दोषप्रतिबन्धाद् दोषकार्यस्यायथार्थत्वस्योत्पत्तिर्मा भूत्, यथार्थत्वोत्पादस्तु में रहनेवाले ( प्रमा अप्रमा साधारण ) सभी ज्ञानों से उस पुरुष के द्वारा प्रयुक्त वाक्यों से उत्पन्न ज्ञानों में यथार्थता ( प्रमात्व ) की उत्पत्ति होती है! यदि ऐसी बात हो तो सभी वाक्य प्रमाण ही होगे । अगर वक्ता में रहने वाले प्रमाज्ञान से ही तज्जनित वाक्य में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, अर्थात् वाक्यजनित ज्ञान में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, तो फिर ' ज्ञान के उत्पादक कारणों से ही प्रामाण्य की उत्पति होती है ' यह न कहकर यह कहिए कि उस ' कारणगुण ' से अर्थात् वक्तृज्ञान रूप कारण में रहनेवाले प्रमात्व रूप गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है । शब्द का कारण है वक्ता में रहनेवाला ज्ञान, वक्ता के ज्ञान रूप इस कारण में रहनेवाला ( प्रमात्व का उत्पादक ) गुण है उस ज्ञान की ' यथार्थता ' और अयथार्थत्व का उत्पादक दोष है उस ज्ञान की अयथार्थता । इनमें वक्ता में रहनेवाले ज्ञान की यथार्थता रूप गुण को वाक्य के प्रामाण्य का कारण मानें तो फिर ( यही निष्पन्न होता है कि ) वक्तृज्ञान रूप कारण मे रहनेवाले उसके प्रमात्व रूप गुण से ही शब्द से उत्पन्न ज्ञान में प्रमाण्य की उत्पत्ति होती है, ज्ञान स्वरूपतः अपने सामान्य कारणों से प्रामाण्य को लिये हुए ही उत्पन्न नहीं होता है । इस प्रकार शब्द में परतः प्रामाण्य के स्वीकृत हो जाने पर अनुमानादि ज्ञानों में भी प्रामाण्य के ' परतस्त्व ' की यह स्थिति सुव्यवस्थ हो जाएगी । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार वक्ता के ज्ञान रूप कारण में रहनेवाली यथार्थता रूप गुण से शब्द के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में यथार्थता ( प्रमात्व ) की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार उन सभी ज्ञानों में -- जिनके प्रसङ्ग में ( स्वतः प्रामाण्यवादी मीमांसकों के साथ ) विवाद है -कारण में रहनेवाले कथित ' गुण ' से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, चूँकि वे सभी ज्ञान प्रमाण हैं । ( प्र ० ) शब्द प्रमाण स्थल में भी वक्ता के ज्ञान का प्रमात्वरूप ' गुण ' इतना ही करता है कि शब्द ज्ञान में अप्रमात्व को लानेवाले दोषों को हटा देता है, प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए वह ( गुण ) कुछ भी नहीं करता ( जो जिसकी उत्पत्ति के लिए कुछ भी नहीं करता, वह उसका कारण कैसे हो सकता है? ) अतः शाब्दज्ञान को दृष्टान्त रूप से For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५२८ न्ययकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतः प्रामाण्यखण्डन-न्यायकन्दली कुतः? कारणाभावे हि कार्याभावो न तु विपरीतस्य भावः । ज्ञानस्वरूपमात्रादिति चेत्? न तस्याविशेषात् । अर्थसम्बन्धो हि ज्ञानस्य विशेषः, स चेद्दोषप्रतिबन्धमात्रोपक्षीणत्वाद् यथार्थतोत्पत्तावनङ्गम्, स्वरूपस्याविशेषाद् नार्थ-विशेषनियतं वाक्यं स्यादविशेषाद् विशेषसिद्धेरभावात् । अथ यदर्थविषयं ज्ञानं तदर्थविषयमेव वाक्यं जनयतीति, तदा ज्ञानस्य यथार्थतैव वाक्यस्य यथार्थताहेतुः, न बोधरूपतामात्रमित्यायातं तस्य गुणादेव प्रामाण्यम् । अस्तु वा गुणस्य दोषाभावे व्यापारस्तथापि परतः प्रामाण्यं न हीयते, तदुत्पत्तौ सर्वत्र कारण-स्वभावव्यतिरिक्तस्य दोषाभावस्याप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यांवधारणात् । उपस्थित करना युक्त नहीं है । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि गुण से दोष में कार्य को उत्पन्न करने की जो शक्ति है वही केवल प्रतिरुद्ध होती है, इससे दोष से होनेवाली जो ज्ञान की अयथार्थता या अप्रमात्व है, उसकी उत्पत्ति गुण के रहने से भले ही रुक जाय, किन्तु गुण के द्वारा उक्त ज्ञान में यथार्थत्व की उत्पत्ति कैसे हो जाएगी? ( जब तक वह प्रमाज्ञान के उत्पादन के लिए कोई व्यापार न करे ) कारण के न रहने से इतना ही होगा कि उसका कार्य उत्पन्न न हो सकेगा, किन्तु कारण के न रहने पर विपरीत कार्य की उत्पत्ति कैसे हो जाएगी? ( अभिमत कार्य की अनुत्पत्ति और विपरीत कार्य की उत्पत्ति दोनों बिलकुल पृथक् वस्तु हैं ) | ( प्र ० ) सभी ज्ञानों की उत्पादिका जो साधारण सामग्री है, उसी से प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है । ( उ ० ) यह तो विपर्ययादि ज्ञानों में भी समान ही है, अतः यह नहीं कह सकते कि ज्ञानों के साधारण कारणों से ( प्रामाण्य की ही उत्पत्ति होती है अप्रामाण्य की नहीं ) । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अर्थ का सम्बन्ध हो ( प्रमा ) ज्ञान का ( अप्रमा ज्ञान ) से अन्तर है, गुण दोषों को हटाने के ही काम में लग जाने के कारण यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति का अङ्ग नहीं है । ( उ ० ) ( घटादि ज्ञान और पटादिज्ञान दोनों का ज्ञानत्व रूप धर्म ) तो एक ही है, अतः किसी विशेष प्रकार के अर्थ की सिद्धि के लिए जो विशेष प्रकार के वाक्यों का प्रयोग का नियम है वह न रह सकेगा, क्योंकि विशेष वाक्य से विशेष प्रकार को सिद्धिआप मानते नहीं हैं । यदि यह कहें ( प्र ० ) वक्ता में जिस विषय का ज्ञान रहता है, तदर्थं विषयक बोध को उत्पन्न करनेवाले वाक्य की ही उत्पत्ति ( उस वक्तृ-ज्ञान से ) होती है, ( उ ० ) तो फिर कारणीभूत वक्तृज्ञान की यथार्थता ही वाक्य के प्रामाण्य का कारण है, शब्द केवल इसलिए प्रमाण नहीं है कि वह जिस किसी ज्ञान को उत्पन्न कर देता है । इससे वही बात आ जाती है कि ( दोष से अप्रामाण्य की तरह ) गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है । दूसरी बात यह है कि यदि गुण का उपयोग दोषों को हटाने भर के लिए मान भी लें, फिर भी प्रामाण्य के परतस्त्व में कोई बाधा नहीं आती है, क्योंकि प्रमात्व के प्रति उसके आश्रयीभूत ज्ञान के कारणों से अतिरिक्त For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६७ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भावानुवादसहितम् ५२६ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal प्रसिद्धाभिनयस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात् तदप्यनुमानमेव चेष्टा के साथ सङ्केतित अर्थ के ज्ञान से युक्त पुरुष को ही उस चेष्टा से अर्थ का बोध होता है, अतः चेष्टा भी अनुमान प्रमाण के ही अन्तर्गत है ( अतिरिक्त प्रमाण नहीं ) । दोषाभावाद् विपर्ययाभाव:, प्रामाण्यं त्विन्द्रियादिस्वरूपमात्राधीनमिति चेत्? दोषः प्रामाण्योत्पत्तिः प्रतिबध्यते, विपर्ययः पुनरिन्द्रियादिस्वरूपाधीन इति कस्मान्न कल्प्यते? दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाद् विपर्ययस्य नैवं कल्पनेति चेत्? प्रामाण्यस्यापि दोषाभावान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वदर्शनान्न तत्कल्पनेति समानम् । हि तदस्ति प्रमाणं यद् दोषाणां प्रागभावं प्रध्वंसाभावं नापेक्षते । एवं प्रवृत्त्यादिकार्यजननव्यापारोऽपि प्रमाणस्य परत एव न स्वरूप-मात्राधीनः, उपकारापकारादिसापेक्षस्य प्रवृत्त्यादिकार्यजनकत्वादित्येषा दिक् । हस्तस्यावाङ्मुखाकुञ्चनादाह्वानं प्रतीयते, पराङ्मुखोत्क्षेपणाच्च विसर्जन-प्रतीतिर्भवति एतत्प्रमाणान्तरमिच्छन्ति केचित् । तान् प्रत्याह -- प्रसिद्धाभिनय-दोषाभाव में भी कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है । ( प्र ० ) दीप के अभाव से तो विपर्यय ( अप्रमा ) का अभाव ही उत्पन्न होता है, प्रामाण्य तो ज्ञान सामान्य के लिए अपेक्षित इन्द्रियादि कारण समुदाय से ही उत्पन्न होता है । ( उ ० ) इसी प्रकार यह कल्पना भी तो की जा सकती है कि दोषों से प्रामाण्य की उत्पत्ति ही केवल प्रतिरुद्ध होती है, इन्द्रियादि साधारण कारणों से ही विपर्यय की उत्पत्ति होती है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) विपर्यय के साथ ही दोष का अन्वय और व्यतिरेक दोनों हैं, अतः यह ( दोष से प्रामाण्य की उत्पत्ति के प्रतिरोध की ) कल्पना नहीं की जा सकती? ( उ ० ) इसी प्रकार ' प्रामाण्य के साथ ही दोषाभाव का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं, अतः दोषाभाव से प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है ' यह कल्पना भी तुल्य युक्ति से की जा सकती है; क्योंकि ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है जो अपने प्रमाज्ञान रूप कार्य के लिए दोषों के प्रागभाव या ध्वंस रूप अभाव की अपेक्षा नहीं करता । इसी प्रकार चूंकि प्रमाण विषय में उपकारकत्वबुद्धि की सहायता से ही प्रवृत्तियों को उत्पन्न करते है, विषय में अपकारकत्व बुद्धि के सहयोग से ही प्रमाण के द्वारा निवृत्ति की उत्पत्ति होती है, अतः प्रमाण प्रवृत्त्यादि कार्यों के उत्पादन में भी परापेक्षी ही है ( केवल प्रवृत्त्यादि कार्यों की उत्पत्ति भी स्वतः नहीं होती है ), यही परतः प्रामाण्य-वादियों की दृष्टि है । हाथ को अपनी तरफ मोड़ने की ' आकुञ्चन ' नाम की क्रिया से अपने तरफ बुलाने का बोध होता है, एवं हाथ को बाहर की तरफ फैलाने की प्रसारण नाम की क्रिया से बाहर जाने की आज्ञा का बोध होता है । इस बोध के लिए कोई उक्त क्रिया
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५३० न्यायकन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव-प्रशस्तपादभाष्यम् आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्थ गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्त-वचनमेव । ( अज्ञ पुरुष को ) सर्वथा अज्ञात गवय का ज्ञान अप्त पुरुष से उच्चारित ' गो-सदृशो गवय: ' इस वाक्य से ही होता है । अत: उपमान भी आप्तवचन ( शब्द ) के ही ( अन्तर्गत ) है । ( फलतः उपमान भी अनुमान ही है ) न्यायकन्दली स्येति । कराकुश्वनादिलक्षणोऽभिनयोऽनेनाभिप्रायेण क्रियत इत्येवं यत्पुरुषस्य प्रसिद्धोऽभिनयः, तस्य चेष्टया करविन्यासेनाह्वानविसर्जनादिप्रतीतिदृश्यते नान्यस्य, अतस्तदपि चेष्टया ज्ञानमनुमानमेव । उपमानस्यानुमानेऽन्तर्भावं कुर्वन्नाह - आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । आप्तिः साक्षादर्थस्य प्राप्तिः, यथार्थोपलम्भ:, तया वर्त्तते इत्याप्तः साक्षात्कृतधर्मा यथार्थदृष्टस्यार्थस्य चिख्या-पयिषया प्रयोक्तोपदेष्टा, तेनाप्तेन वनेचरेण विदितगवयेनाप्रसिद्धगवयस्याज्ञात-गवयस्य नागरिकस्य कीदृग्गवय इति पृच्छतो गवा गोसारूप्येण गवयस्य स्वरूप ' चेष्टा ' नाम का एक स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं । उसी के खण्डन के लिए प्रसिद्धाभिनयस्य ' यह वाक्य कहा गया है । ' प्रसिद्धोऽभिनयो यस्य ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस क्रियायें इन अभिप्रायों पुरुष को यह सङ्केत ज्ञात है कि ' हाथ की ये आकुञ्चनादि से की जाती हैं ' वही पुरुष प्रकृत में ' प्रसिद्धाभिनय ' शब्द से अभीष्ट है । उसी पुरुष को ' चेष्टा ' से अर्थात् हाथ के विशेष प्रकार के अभिनय या क्रिया से बुलाने या बाहर लौटने की क्रिया का बोध होता है, दूसरे को नहीं । अतः चेष्टा से उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान भी अनुमान ही है । ' उपमान भी अनुमान ही है, वह कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है ' यह उपपादन करते हुए भाष्यकार ने ' आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनमुपमानमाप्तवचनमेव ' यह वाक्य लिखा है । ' आप्त्या वर्त्तते यः स आप्त: ' इस व्युत्पत्ति से ही ' आप्त ' शब्द बना है । साक्षात् ' अर्थ ' की प्राप्ति को ही ' आप्ति ' कहते हैं जो वस्तुतः यथार्थज्ञान रूप ही हैं । तदनुसार ' आप्त ' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना चाहिये, जिसने विषयों को उनमें विद्यमान सभी धर्मों के साथ प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है ( उनको पूर्ण रूप में यथार्थ रूप में समझा है ) और उस यथार्थज्ञान से ज्ञात वस्तु के ख्यापन ( लोगों को विदित ) करने की इच्छा के द्वारा ही जो उपदेश करते हैं । वनों में रहनेवाले इस प्रकार के किसी ' आप्त ' पुरुष से- जिन्हें गवय का ज्ञान है – जब ' अप्रसिद्धगवय ' अर्थात् गवय को न जाननेवाले नागरिक के द्वारा ' गवय किस तरह का होता है ' यह प्रश्न किया जाता है, तब उस पुरुष के द्वारा ' गा ' अर्थात् गो सादृश्य के द्वारा गवय को समझाने के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितत् न्यायकन्दली ५३१ प्रतिपादनादुपमानं यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यमाप्तवचनमेव, वक्तृप्रामाण्यादेव तथा प्रतीतेः । आप्तवचनं चानुमानम् । तस्मादुपमानमप्यनुमानाव्यतिरिक्त-मित्यभिप्रायः । ये तावत् पूर्वमीमांसका वनेचरवचनमेवोपमानमाहुः, तेषामिदमनुमानमेव । शरस्वामिशिष्या अनुभूतस्य गोपिण्डस्य वने गवयदर्शनात् स्मृत्यारूढायां गवि ' मदीया गौरनेन सदृशी ' इति सारूप्यज्ञानमुपमानमाचक्षते, तदपि स्मरणमेव । सादृश्यं हि सामान्यवत् प्रत्येकं व्यक्तिसमाप्तं न संयोग. वदुभयत्र व्यासज्य वर्तते, गोपिण्डस्यादर्शनेऽपि वने गवयव्यक्तौ गौसदृशो -ऽयमिति प्रतीत्युत्पादात् । यथोक्तं मीमांसागुरुभिः-सामान्यवच्च सादृश्यमेकैकत्र समाप्यते । प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि यस्मात् तदुपलभ्यते ॥ इति । लिए यथा गौस्तथा गवय: ( अर्थात गो को जिस प्रकार देख रहे हो गवय भी उसी प्रकार का होता है ) प्रयुक्त यह वाक्य आप्तवचन ' अर्थात् शब्द प्रमाण ही है, क्योंकि यहाँ भी वचनों के प्रामाण्य से ही अर्थ की प्रतीति होती है । आप्तवचन अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अत: उपमान भी अनुमान के ही अन्तर्गत है. यही उक्त भाग्य सन्दर्भ का अभिप्राय है । प्राचीन मीसांसकों ने वनवासी के उक्त आप्तपुरुष के वचन को हो उपमान प्रमाण माना है, उनका यह उपमान प्रमाण भी अनुमान में हो अन्तर्भूत हो जाता है । शबरस्वामी मीमांसासूत्र के भाष्य कर्ता ) के अनुयायी शिष्यगण यह कहते हैं कि जिस पुरुष ने गाय के शरीर को देखा है, वन में जाने पर वही जब गवय को देखता है तब उसे पहिले देखे हुए गो का स्मरण हो आता है । तब स्मरण किये हुए उस गो में यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि ' हमारी गाय इस गवय के समान है । यह सादृश्य ज्ञान ही उपमान प्रमाण है । इस प्रकार का उपमान प्रमाण रूप ज्ञान अनुमान के अन्तर्गत न आने पर भी स्मरण रूप हो सकता है । क्योंकि जिस प्रकार सामान्य ( जाति ) की अधिकरणता उसके प्रत्येक अधिकरण में अलग अलग होती है, उसी प्रकार सादृश्य की अधिकरणता भी उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में अलग अलग है । जिस प्रकार संयोग के अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में उसकी एक ही अधिकरणता रहती है उस प्रकार सादृश्य की एक ही अधिकरणता उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में नहीं है, किन्तु अलग अलग है । अतः गवय को देखने के समय गो का प्रत्यक्ष न रहने पर भी वन में गवय व्यक्ति रूप सादृश्य का ज्ञान उस समय अप्रत्यक्ष गो में भी हो सकता है । जैसा कि मीमांसा के आचार्यों ने कहा है कि ( एक आश्रय ) प्रतियोगी के न देखने पर भी होती है, आश्रयता प्रत्येक आश्रय में अलग अलग है । चूंकि सादृश्य को उपलब्धि उसके अतः सामान्य की तरह उसकी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५३२ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव-न्यायकन्दली प्रत्येकं परिसमाप्तत्वेऽपि सादृश्यं यद्यपि गवयग्रहणाभावाद् गवयसदृश इति गवि पूर्वं प्रतीतिर्नासीत्, तथापि स्वाधयसन्निकर्ष मात्र भाविनी सादृश्य-प्रतीतिरुचितेव । यथा प्रतियोग्यन्तराग्रहणात् तस्मादिदं दीर्घमिदं ह्रस्व-मिति प्रतीत्यभावेऽपि स्वाश्रयप्रत्यासत्तिमात्रेण परिमाणस्य स्वरूपतो ग्रहणम् । कथमन्यथा देशान्तरगतः प्रतियोगिनं गृहीत्वा अस्मात् तद्दीर्घं ह्रस्वमिति व्यवस्यति । यदि गवि पुरा सादृश्यमिन्द्रियापातमात्रेण न गृहीतम्? सम्प्र-त्यपि गवये न गृह्यते, गवयदर्शनादेव गव्येव च स्मरणमित्युभयनियमो न स्यादविशेषात् । यावतां खुरलाङ्गलित्वादिसामान्यानां गवि ग्रहणम्, तावतामेव गवयेऽपि ग्रहणात् स्मरणनियम इति चेत्? भूयोऽवयवसामान्यान्येवोभयवृत्तित्वात् सादृश्यम् । तानि चेत् प्रत्येकमाश्रयग्रहणेन गृह्यन्ते, गृहीतमेव सादृश्यम् । तस्माद् यद्यपि सादृश्य अपने प्रत्येक आश्रय में स्वतन्त्र रूप से ही रहता है, फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि गवय को देखने से पहिले उसका ज्ञान न रहने के कारण ( गो प्रत्यक्ष के समय ) गो में ' यह गवय के समान है ' इस आकार की प्रतीति नहीं थी, तथापि केवल सादृश्य के आश्रयीभूत गवय मे चक्षु के संनिकर्ष से, ( फलतः ज्ञानलक्षण सन्निकर्ष से सादृश्य का प्रत्यक्ष सम्भव न होने पर भी स्वसंयुक्तसमवाय सम्बन्ध से ही ) सादृश्य का ग्रहण होना अनुचित नहीं है । जैसे कि दीर्घत्वादि के आश्रयीभूत दण्डादि आश्रय जहाँ प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत रहते हैं, एवं इन दीर्घत्वादि परिमाणों के दूसरे अवधि द्रव्यों का ज्ञान नहीं रहता है, ऐसे स्थलों में ' यह इससे दीर्घ है या ' यह इससे छोटा है, इत्यादि विशिष्ट प्रतीतियाँ यद्यपि नहीं होती हैं, फिर भी ' यह दीर्घं है ' या ' यह ह्रस्व है ' इत्यादि आकारों से स्वरूपतः केवल परिमाण का ग्रहण तो होता ही है, यदि ऐसी बात न हो तो दूसरे देश में जाकर वह देख लेता है, उसके बाद ' यह उस द्रव्ब से होती है, वह कैसे होगी? उसके दूसरे अवधि रूप प्रतियोगी को जब बड़ा या छोटा है ' इस प्रकार की जो प्रतीति ( प्र ० ) गी में यदि गोत्व की तरह गवय का सादृश्य भी रहता तो गवय को देखने से पहिले भी गो में इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही गवय के सादृश्य की भी प्रतीति हो जाती, सो नहीं होती है? ( उ ० ) गवय के प्रत्यक्ष के समय भी तो गो में उस सादृश्य को प्रतीति नहीं होती है । अतः यह दोनों नियम नहीं किये जा सकते कि उक्त सादृश्य की प्रतीति ( १ ) गवय - प्रत्यक्ष ही उत्पन्न होती है और ( २ ) गो में ही उत्पन्न होती है । क्योंकि इससे विपरीत कल्पना के भी लिए स्थिति समान है । ( प्र ० ) खुर पूँछ प्रभृति जितने धर्मों का पहिले गो में ग्रहण हो चुका है, उतने का ही जब गवय में भी ग्रहण होता है तभी गो में गवयसादृदय का स्मरण होता है, ऐसे नियम की कल्पना करेंगे | ( उ ० ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५३३ गवयग्रहणे सत्यसन्निहितगोपिण्डावलम्बिनी सादृश्यप्रतीतिः सदृशदर्शनाभि-व्यक्तसंस्कारजन्या स्मृतिरेव न प्रमाणान्तरम् । दृष्टा च निर्विकल्पक गृहीत-स्यापि स्मृतिविषयता, अव्युत्पन्नेनैकपिण्डग्रहणे प्रथममविकल्पितस्य सामान्यस्य पिण्डान्तरग्रहणे प्रत्यभिज्ञानात् । sa देशवाक्यस्य गवयदर्शने गोसादृश्यप्रतीत्या ' अस्य गवयशब्दो नामधेयम् ' इति संज्ञासंज्ञि सम्बन्धप्रतीतिमुपमानमिच्छन्ति तेषामपि यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यं तज्जनिता च ' लोके यः खलु गवय इति श्रूयते स गोसदृशः ' इति बुद्धिरागम एव । यदपि गोसदृशस्य गव ५ शब्दवाच्यत्वज्ञानं तदप्यनुमानम्, तत्र तच्छब्दप्रयोगात् । यः खलु शब्दो यत्राभियुक्तैरविगानेन प्रयुज्यते स तस्य वाचकः । प्रयुज्यते चारण्यकेनाविगानेन गोसदृशे गवयशब्द इति । तस्मात् गो और गवय दोनों में जो अनेक अवयवों की समानतायें हैं, वे ही दोनों में रहने के कारण साय कहलाती हैं । ये समानतायें यदि गो और गवय इन दोनों में से एक मात्र के ग्रहण से भी गृहीत होती हैं, तो फिर सादृश्य भी उसी प्रकार गृहीत हो हो गया । तस्मात् प्रमाता पुरुष से दूर में रहनेवाले गोपिण्ड में जो गवय के सादृश्य की प्रतीति होती है, वह स्मरण रूप ही है । केवल इतनी सी बात है कि वह स्मरण उस संस्कार से उत्पन्न होता है, जिसका उद्बोधन गोसदृश गवय के दर्शन से होता है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत विषयों का भी स्मरण उपलब्ध होता है. जैसे कि अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा एक पिण्ड के ग्रहण के समय सविकल्पकज्ञान के द्वारा अगृहीत सामान्य का भी उसी जाति के दूसरे पिण्ड के ग्रहण के समय प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों का कहना है कि जो प्रमाता पहिले किसी आप्त पुरुष से ' गोसदृशो गवय: ' इस अतिदेश वाक्य को सुन लेता है, बाद में वही जब गवय को देखता है तो उसे यह प्रतीत होती है कि ' इसी पिण्ड का नाम गवय है ' । यह प्रतीति चूँकि गवय शब्द रूप सज्ञा की गवय पिण्ड रूप संज्ञी में ( वाच्यवाचकरूप ) सम्बन्ध विषयक है । ( ' अयं गवयपदवाच्यः ' इस आकार की प्रतीति को संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध को प्रतीति कहते हैं ), अतः यही उपमान है । किन्तु नैयायिकों का भी यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि यह भी वस्तुतः शब्द प्रमाण ही है, क्योंकि ' लोक में यह जो ' गवय ' का नाम सुनते हैं वह गोसदृश वस्तु काही बोधक है ' यह बुद्धि भी तो ' यथा गौस्तथा गवय: ' इस वाक्य से ही उत्पन्न होती है । एवं इससे गोसदृश पिण्ड में गवय शब्द के अभिधेय होने का जो ज्ञान होता हैं, वह ( उपमान न होकर ) शब्द ही है, क्योंकि गोसदृश पिण्ड में ही गवय शब्द का प्रयोग होता है, ( अतः नैयायिक गण जिसे उपमान कहते हैं, वह भी शब्द जनित होने के कारण अनुमान ही है ), एवं गोसदृश ( गवय में ) जो गवय शब्द की वाच्यता का ज्ञान होता है वह भी अनुमान ही है, क्योंकि ( यहाँ अनुमान का यह आकार है कि ) आप्तगण एक स्वर से बिना विरोध के जिस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह शब्द उस अर्थ का वाचक होता है, सभी आरण्यक आप्तजन गवय शब्द का प्रयोग उसी पिण्ड में करते हैं जो गो के समान है । तस्मात् गो - सहा उस पिण्ड का नाम अवश्य ही ' गवय ' है । एवं For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ५३४ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रमाणों के द्वारा ज्ञात अर्थ से न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir र्थों की जो अवगति अर्थ गवय शब्द रूप अनुसन्धान होता है, न्याय कन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्येव श्रवणादनुमितानुमानम् । ( दृष्टार्थापत्ति ) होती है वह विरोधि ( व्यतिरेकी ) अनुमान ही है । वाक्य के श्रवण से जो अर्थावगति ( श्रुतार्थापत्ति ) होती है, वह भी अनुमितानुमान ही है । सोऽपि गवयशब्दवाच्य एवेति सामान्येन ज्ञानमनुमानमेव । प्रत्यक्ष गवये सादृश्यज्ञानं त्रैलोक्यव्यावृत्तपिण्ड बुद्धिरपि प्रत्यक्षफलम् । यच्च तद्गतत्वेन संज्ञासंज्ञिसम्बन्धानुसन्धानम्, तदपि सादृश्यग्रहणाभिव्यक्त पूर्वोपजातसामान्य-प्रवृत्तगोसदृशगवयशब्दवाच्यत्वज्ञानजनितसंस्कारजत्वादेकत्रोपजातसामान्यविषय-सङ्केतज्ञानसंस्कारकृततज्जातीयपिण्डान्तरविषयतच्छब्दवाच्यत्वानुसन्धानवत् स्मर-णमेव । एवं हि तदायमनुसन्धत्ते ' अस्यैव तन्मया पूर्वमेव तच्छब्दवाच्यत्व-मवगतम् ' इत्युपमानाभावः । दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यर्थान्तरकल्पनार्थापत्तिः । श्रुतग्रह-णस्य पृथगभिधान साफल्यमुपपादयता परेणार्थापत्तिरुभयथोपपादिता दृष्टार्थापत्ति: श्रुतार्थापत्तिश्च । गवय में जो गोसादृश्य का ज्ञान अर्थात् ' यह गवय रूप पिण्ड संसार के और सभी पिण्डों से भिन्न ( स्वतन्त्र जीव ) है ' इस प्रकार का ज्ञान भी ( उपमान से उत्पन्न न होकर ) प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही उत्पन्न होता है । एवं ' गवय रूप यही संज्ञा का संज्ञी ( वाच्य ) हैं इस प्रकार संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध का जो वह भी स्मरण ही है ( उपमान नहीं ), क्योंकि ' गोसदृशो गवय: ' इस वाक्य के द्वारा पहिले उत्पन्न ग्रहणरूप संस्कार से ही इसकी उत्पत्ति होती है । यह संस्कार उक्त सादृश्य-ज्ञान से ही उदबुद्ध होता है । जैसे कि किसी एक ही घट व्यक्ति में घट पद का सङ्केत सामान्य रूप से गृहीत होने पर भी उससे उत्पन्न संस्कार के द्वारा दूसरे घट व्यक्ति में भी घट शब्द की वाच्यता का इस आकार का अनुसन्धान होता है कि ' इस व्यक्ति में जिस घटवाच्यता को मैं समझ रहा हूँ, उसको मैं पहिले जान चुका हूँ । इन सभी उपपत्तियों से यह सिद्ध होता है कि उपमान नाम का कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है । शब्द या और किसी प्रमाण के द्वारा निश्चित अर्थ की उपपत्ति जिस दूसरे अर्थ की कल्पना के विना न हो सके, उस दूसरे अर्थ को ही ' अर्थापत्ति ' कहते हैं । इस लक्षण में ( ' शब्द प्रमाण के द्वारा ' इस अर्थ के बोधक ) ' श्रुत ' पद का स्वतन्त्र रूप से साफल्य का उपपादन करते हुए मेरे प्रतिपक्षियों ( मीमांसकों ) ने ( १ ) दृष्टार्थापत्ति और ( २ ) श्रुतार्थापत्ति इसके ये दो भेद किये हैं ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५३५ यत्रार्थोऽन्यथानुपपद्यमानोऽर्थान्तरं गमयति सा दृष्टार्थापत्तिः । यथा जीवति चैत्रो गृहे नास्तीत्यत्राभावप्रमाणेन गृहे चैत्रस्याभावः प्रतीतो जीवतीति-श्रुतेश्च तत्र सम्भवोऽपि प्रतीयते, जीवतो गृहावस्थानोपलम्भात् । न चैकस्य युगपदेकत्र भावाभावसम्भवः, तयोः सहावस्थानविरोधात् । तदयमभावः प्रतीयमानो जीवतीति श्रवणान्नोपपद्यते, यद्ययं बहिर्न भवतीति । अनुपपद्यमानश्च यस्मिन् सति उपपद्यते तत्कल्पयति । जीवतो गृहाभावोऽन्यथा नोपपद्यते । यद्ययं बहिर्न भवतीति जीवतीत्यनेन सह विरोध एव तस्यानुपपत्तिः । सा चैत्रस्य बहिर्भावे प्रतीते निवर्तते । चैत्रो जीवति गृहे च नास्ति बहिःसद्भाभावादिति सावकाशनिरवकाशयोः प्रमाणयोविरोधे सति निरवकाशस्यानुपपत्तिमुखेन सावकाशस्य विषयान्तरोपपादनात् तयोर विरोधसाधनमर्थापत्तिः । या पुनर्देशादिनियतस्य सम्बन्धिनो दर्शनात सम्बन्धस्मरणद्वारेण सम्बन्ध्यन्तर-प्रतीतिः सानुमानमित्यनयोर्भेदो ज्ञानोदयप्रकारभेदात । जहाँ प्रकृत अर्थ अनुपपन्न होकर दूसरे अर्थ का ज्ञापक होता है वहाँ ' दृष्टार्थापत्ति ' समझना चाहिए । जैसे ' जीवति चैत्रो गृहे नास्ति ' ( चैत्र जीते किन्तु घर में नहीं हैं ) इस स्थल में जीवित रहने के कारण चैत्र के घर में रहने की सम्भावना की भी प्रतीति होती है । क्योंकि जीवित व्यक्ति घर में भी देखे जाते हैं । एवं अनुपलब्धि रूप अभाव प्रमाण से घर में चैत्र का अभाव भी निश्चित है । किन्तु एक ही समय चैत्र का घर में रहना और न रहना दोनों सम्भव नहीं है, क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय सत्ता और असत्ता दोनों का रहना परस्पर विरोध के कारण सम्भव नहीं है । अतः अभाव प्रमाण के द्वारा चैत्र के घर में न रहने की जो प्रतीति होती है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि चैत्र का घर से बाहर रहना निश्चित न हो । जिसकी अनुपपत्ति होती है, वह ऐसी ही किसी वस्तु की कल्पना करता है, जिससे कि उसकी उपपत्ति हो सके । जीते हुए का घर में न रहना अन्यथानुपपन्न है, अर्थात् यदि वह बाहर नहीं रहता है तो ठीक नहीं बैठता । ' जीवति ' के माथ ' गृहे नास्ति ' का यह ' विरोध ' ही उसकी ' अनुपपत्ति ' है । यह अनुपपत्ति तब हटती है जब कि चैत्र के इस प्रकार से बाहर रहने की प्रतीति होती है कि ' चैत्र घर में नहीं रहने पर भी बाहर हैं, क्योंकि वह जीवित है ' । ( इससे अर्थापत्ति का यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि ) एक सावकाश प्रमाण के साथ दूसरे निरवकाश प्रमाण का विरोध उपस्थित होने पर निरवकाश प्रमाण की अनुपपत्ति के प्रदर्शन के द्वारा सावकाश प्रमाण को दूसरे विषय का ज्ञापक मानकर उक्त दोनों प्रमाणों में अविरोध का सम्पादन ही ' अर्थापत्ति ' है । एक देश या एक काल में नियमित रूप से रहनेवाले दो सम्बन्धियों में से एक को देखने से उनके ( नियम या व्याप्ति रूप ) सम्बन्ध की स्मृति के द्वारा जो दूसरे सम्बन्धी की प्रतीति होती है, वही अनुमान ( या अनुमिति ) है | इस प्रकार चूँकि अनुमान और अर्थापत्ति इन दोनों प्रमाणों से ज्ञान की उत्पत्ति को For Private And Personal