प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 611–620
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 611–620
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५३६ यथोक्तम्-न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्यन्तर्भाव-न्यायकन्दली अन्वयाधीनजन्मत्वमनुमाने व्यवस्थितम् । अर्थापत्तिरियं त्वन्या व्यतिरेकप्रवर्तिनी ॥ इति । श्रुतार्थापत्तिरपि यत्रानुपपद्यमानः शब्दः शब्दान्तरं कल्पयति, यथा ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इति वाक्याद् रात्रौ भुङ्क्त इति वाक्यैकदेशकल्पना । तत्र दृष्टार्थापत्ति तावदनुमानेऽन्तर्भावयति - दर्शनार्थादर्थापत्तिर्विरोध्ये-वेति । दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनं च तदर्थश्चेति दर्शनार्थः, पञ्चभिः प्रमाणैरव-गतोऽर्थः । तस्माद् दर्शनार्थादर्थान्तरस्यापत्तिरर्थान्तरस्यावगतिर्विरोध्येव, विरोध्यनु-मानमेव । यस्य यथा नियमस्तस्य तथैव लिङ्गत्वम्, इह तु प्रमाणान्तरविरुद्ध एवार्थोऽर्थान्तराविनाभूत इति विरोध्येव लिङ्गम् । अयमभिप्रायः -- गृहाभावो यद्यनुपपत्तिमात्रेण बहिर्भावं कल्पयति, नियम हेतोरभावाद् अर्थान्तरमपि कल्पयेत् । स्वोपपत्तये गृहाभावोऽर्थान्तरं रीति भिन्न हैं, अतः ये दोनों दो भिन्न प्रमाण हैं । अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति की रीति दिखलायी जा चुकी है ) जैसा कहा गया है कि-यह निश्चित है कि अन्वय ( व्याप्ति ) के द्वारा अनुमान प्रमाण अपने फल रूप ज्ञान का उत्पादन करता है, अतः व्यतिरेक ( व्याप्ति ) के द्वारा अपने ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला अर्थापत्ति प्रमाण अनुमान से भिन्न है । जहाँ शब्द अनुपपन्न होकर दूसरे शब्द की कल्पना करता है, वहाँ ' श्रुतार्थापत्ति ' समझना चाहिए । जैसे कि ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' ( यह मोटा तो है, किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है ) इस वाक्य के द्वारा ' रात्रौ भुङ्क्ते ' ( तो फिर रात में खाता है ) इस वाक्यखण्ड का कल्पक होता है । ' दर्शनार्थापत्तिविरोध्येव ' इस वाक्य के द्वारा कथित ' दृष्टार्थापत्ति ' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं । इस भाष्य में प्रयुक्त ' दर्शनार्थ ' शब्द की अभीष्ट व्युत्पत्ति इस प्रकार है, दृश्यत इति दर्शनम् दर्शनञ्च तदर्थश्च दर्शनार्थः तदनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि ( अभाव ) इन पाँच ग्रमाणों में से किसी के द्वारा निश्चित अर्थ ही उक्त ' दर्शनार्थ ' शब्द से अभिप्रेत है । इस ' दर्शनार्थ ' अर्थात् कथित पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा अवगत अर्थ से जो दूसरे अर्थ की ' आपत्ति ' अवगति होती है, वह ' विरोधी ' ही अर्थात् विरोधी अनुमान ही है । हेतु में साध्य का जिस प्रकार का नियम रहेगा, उसी प्रकार से हेतु में साध्य की ज्ञापकता भी ( हेतुता ) होगी । यहाँ ( अर्थापत्ति स्थल में ) दूसरे प्रमाण से विरुद्ध अर्थ हो दूसरे अर्थ की व्याप्ति से युक्त है । अतः यहाँ विरोधी ही हेतु है । कहने का अभिप्राय यह है कि चैत्र का घर में न रहना ( गृहाभाव ) यदि केवल अपनी अनुपपत्ति से ही उसके बहिर्भाव ( बाहर रहने ) की कल्पना करे तो फिर वह तुल्ययुक्ति से दूसरे की भी कल्पना कर सकता है, क्योंकि ऐसे नियम का कोई कारण नहीं है कि वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करे और किसी की नहीं । ( प्र ० ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५३७ For Private And Personal कल्पयति, अन्यस्मिन् कल्पिते च न तस्योपपत्तिरिति चेत्? बहिर्भावे सति तस्योप-पत्तिरिति न तत् कथितम्? वयं तु ब्रूमो बहिर्भावेऽपि सति गृहाभावस्यानु-पपत्तिरेव । दृष्टमेतद् अव्यापकं द्रव्यमेकत्रास्ति तदन्यत्र नास्तीति । यथा प्राची-प्रतीच्योरेकत्रोपलभ्यमानः सविताऽन्यत्र न भवतीति इदं दर्शनबलेन वावधार्यते जीवतो गृहाभावो बहिर्भावे सत्युपपद्यते नान्यथेति । नन्वेवमन्वयावगतिपूर्विकैव तथोपपत्यवगति:? तथा सति चार्थापत्तिरनुमानमेव, अन्वयाधीनजन्मत्वात् । यत्तु विरोधे सति प्रवर्तत इति तद् वैधर्म्यमात्रम् । तथा चात्र प्रयोगः - देवदत्तो बहिरस्ति, जीवनसम्बन्धित्वे सति गृहेऽनुपलभ्यमानत्वात्, अहमिवेति । श्रुतार्थापत्तिमन्तर्भावयति - श्रवणादनुमितानुमानमिति । ' पोनो दिवा न भुङ्क्ते इति वाक्यश्रवणाद् रात्रिभोजनकल्पना ' अनुमितानुमानम् ' । लिङ्गभूतेन वाक्येनानुमितात् पीनत्वात् तत्कारणस्य रात्रिभोजनस्यानुमानात् । चैत्र का गृह में न रहना ( गृहाभाव ) अपनी उपपत्ति के लिए ही दूसरे अर्थ की कल्पना करता है, यह काम चैत्र के बहिर्भाव रूप दूसरे अर्थ को कल्पना से ही सम्भव है और किसी दूसरे अर्थ की कल्पना से नहीं । अतः वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करता है, किसी और अर्थ की नहीं । ( उ ० ) यह आपसे किसने कहा कि चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर लेने से ही चैत्र के घर में न रहने की उपपत्ति हो जाएगी? यदि हम यह कहें कि जीवित चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर भी ली जाय, तो भी चैत्र का घर में न रहना अनुपपन्न ही रहेगा । यदि इसका यह उत्तर दें कि ( प्र ० ) ( व्यापक आकाशादि को छोड़कर ) जितने भी अव्यापक ( मूर्त ) द्रव्य हैं, उनको देखते हैं कि एक समय यदि एक आश्रय में रहते हैं तो दूसरे में नहीं । जैसे कि पूर्वदिशा और पश्चिम दिशा इन दोनों में से किसी एक में जिस समय सूर्य की उपलब्धि होती है, उस समय वे दूसरी दिशा में नहीं रहते । इसी से यह समझते हैं कि जीवित चैत्र का घर में न रहना, चैत्र के बाहर रहने से ही उपपन्न हो सकता है । ( उ ० ) यदि ऐसी बात है तो फिर चैत्र के बहिर्भाव में उसके गृह में न रहने की अन्वयव्याप्ति से ही अर्थापत्ति होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि चूंकि अर्थापत्ति की उत्पत्ति अन्वयव्याप्ति से होती है, अतः वह अनुमान ही है । यह ( अर्थापत्ति रूप अनुमान ) जो विरोध के कारण अपने कार्य में प्रवृत्त होता है, इससे और अनुमानों से इसकी विचित्रता हो केवल व्यक्त होती ( इससे इसका अनुमान न होना निश्चित नहीं होता ) । प्रकृत में अनुमान का यह प्रयोग इष्ट है कि जैसे कि ' जीवन सम्बन्ध से युक्त मैं घर में न रहने पर बाहर अवश्य रहता हूँ उसी प्रकार जीवन के सम्बन्ध से युक्त देवदत्त घर में अनुपलब्ध होने के कारण अवश्य ही बाहर हैं । ' श्रवणादनुमितानुमानम् ' इस वाक्य के द्वारा ' श्रुतार्थापत्ति ' को अनुमान में अन्तर्भूत करते हैं । ' श्रवणात् ' अर्थात् ' पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य को सुनने से जो
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५३८ श्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्यन्तर्भाव-न्यायकन्दली इदमत्राकूतम् - अर्थाप्रतिपादकत्वं प्रमाणस्यानुपपत्तिः । ' दिवा न भुङ्क्ते ' इति वाक्यं च स्वार्थं बोधयत्येव, का तस्यानुपपन्नता? पीनत्वं भोजनकार्यं दिवाभोजने सति नोपपद्यते, कारणाभावात् । तदनुपपत्तौ च वाक्यमप्यनुपपन्नम्, अनन्वितार्थत्वादिति चेत्? तर्ह्यर्थानुपपत्तिर्वाक्यस्यानुपपन्न-त्वमर्थोपपत्तिश्चोपपन्नत्वम्, न त्वस्य स्वरूपेणोपपत्त्यनुपपत्ती । दिवा न भुञ्जानस्य पीनत्वलक्षणश्चार्थो भोजनकार्यत्वाद् रात्रिभोजन रूपेणार्थेनोपपद्यते, न रात्रिभोजनवाक्येनेत्यर्थस्यानुपपत्त्या तस्य तद्वाक्यस्य चोपपत्तिहेतुरर्थ एवार्थ-नोयो न वाक्यम्, अनुपपादकत्वात् । उपपद्यमानश्चार्थोऽर्थेनैवावगम्यते, दिवा भोजनरहितस्य पीनत्वस्य रात्रिभोजनकार्यत्वाव्यभिचारादिति नास्त्यर्थापत्तिः शब्दगोचरा । देवदत्त के रात्रिभोजन की कल्पना होती है वह भी ' अनुमितानुमान ' ही है । अर्थात् ' पीनः ' इस वाक्य रूप लिङ्ग ( हेतु ) से अनुमित पीनत्व ( मोटाई ) के द्वारा पीनत्व के कारणीभूत रात्रि भोजन का वहाँ भी अनुमान ही होता है । गुढ़ अभिप्राय यह है कि अपने अर्थ को यथार्थ रूप सेन समझा पाना ही प्रमाणों की अनुपपत्ति है । ' दिवा न का ज्ञापन तो वह अवश्य ही भुङ्क्ते ' इस वाक्य का अर्थ है करता है, फिर उसमें किस दिन में अभोजन, इस अर्थ प्रकार की अनुपपत्ति है? ( प्र ० ) भोजन से उत्पन्न होनेवाला पीनत्वरूप कार्य ही दिन को भोजन न करने से अनुपपन्न होता है. क्योंकि पीनत्व का कारण वही नहीं है । पीनत्व रूप अर्थ की इस अनुपपत्ति ' ही ' पीनः ' इत्यादि वाक्य अनुपपन्न होता है, क्योंकि ( योग्यता न रहने के कारण ) उसका अन्वय नहीं हो पाता है । ( उ ० ) तो फिर यह कहिए कि अर्थ की अनुपपत्ति हो वाक्य की अनुपपत्ति है और अर्थ को उपपत्ति ही उसकी उपपत्ति है, वाक्य स्वतन्त्र रूप से उपपन्न या अनुपपन्न नहीं होता । दिन को भोजन न करनेवाले ( देवदत्त ) में रहनेवालो पीनता भी भोजन से ही उत्पन्न हो सकती हैं, अतः प्रकृत में रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही उसकी उपपत्ति होती है, ' रात्री भुङ्क्ते ' इस रात्रिभोजन वाक्य से नहीं । चूंकि पीनत्व रूप अर्थ की अनुपपत्ति से ही रात्रि भोजन रूप अर्थ और उसका बोधक ' रात्री - भुङ्क्ते ' यह वाक्य दोनों की ही उपपत्ति होती हैं, ' रात्रौ भुङ्क्ते इस वाक्य से इसकी उपपत्ति नहीं होती हैं, अतः इनके लिए ' रात्रिभोजन ' रूप अर्थ की कल्पना ही आवश्यक है, ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य की कल्पना आवश्यक नहीं है । उपपन्न होनेवाला अर्थ ' ( अपने व्याप्त ) दूसरे अर्थ से ही उपपन्न होता है; ( इस नियम के अनुसार ) चूंकि दिन में भोजन न करनेवाले देवदत्त की पीनता की व्याप्ति रात्रि भोजन रूप कार्य के साथ है, अतः दिन को न खानेवाले की पोनता रूप अर्थ की उपपत्ति रात्रि भोजन रूप अर्थ से ही होती है, तस्मात् कोई भी अर्था-पत्ति ' शब्द ' विषयक नहीं है, ( अर्थात् श्रुतार्थापति नाम की कोई वस्तु नहीं है ) | For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] } भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५३६ अथ मतम् - अर्थोऽर्थेनैवोपपद्यत इति तदुपपत्त्यैव तच्छब्दस्याप्युपपन्नता, किन्तु शब्दोऽर्थः शाब्देनैवार्थेनोपपद्यते, प्रमाणान्तरावगतस्य तेन सहान्वया-भावात् । नहि पचतीत्युक्ते क्रियायाः कर्मणा विनानुपपत्तिः पच्यमानस्य कलायस्य प्रत्यक्षेणोपशाम्यति, तस्मिन् सत्यपि किं पचतीत्याकाङ्क्षाया अनिवृत्तेः । शब्दोपनीते तु कर्मणि निर्विचिकित्सः प्रत्ययो भवति ' शार्क पचति कायं पचति ' इति । ' पोनो दिवा न भुङ्क्ते ' इत्यपि वाक्यार्थानुपपत्ति-रियम्, तस्मादस्यापि शाब्देनैवार्थेनोपशान्तिर्भविष्यतीति प्रथममर्थापत्या रात्रि-भोजनप्रतिपादकं वाक्यमेवार्थनीयम्, अन्यथा दिवावाक्यपदार्थः सह रात्रि-भोजनस्यान्वयाभावात् । वाक्यविषये चार्थापत्तिपर्यवसाने रात्रिभोजन-मर्थो नार्थापत्तिविषयतामेति, तस्य वाक्यादेवावगमात् । न चैतद्वाच्यम्, दिवा-यदि यह कहें कि ( प्र ० ) यह तो ठीक है कि एक अर्थ की उपपत्ति उससे नियत दूसरे अर्थ से ही होती है, एवं अर्थ की उपपत्ति से ही तद्बोधक शब्द की भी उपपत्ति होती है । किन्तु इतना अन्तर है कि शब्द के द्वारा उपस्थित अर्थ की अनुपपन्नता शब्द के द्वारा उपस्थित दूसरे अर्थ से ही निवृत्त की जा सकती है, क्योंकि शब्द से भिन्न अन्य का अन्वय शब्द प्रमाण के द्वारा उपस्थित अर्थ के साथ प्रमाणों के द्वारा उपस्थित अर्थ नहीं होता है । जैसे कि केवल पचति ' पद के उच्चारण के बाद जो कर्म के बिना पाक क्रिया को अनुपपत्ति उपस्थित होती है, उसकी निवृत्ति प्रत्यक्ष के द्वारा पकते हुए मटर ( कलाय ) को देखकर भी नहीं होती । उसके प्रत्यक्ष के बाद भी कि पचति ' यह जिज्ञासा बनी ही रहती है । ' कलायम् ' ' शाकम् ' इत्यादि पदों के प्रयोग के बाद जब इन शब्दों से शाक या कलाय रूप कर्म उपस्थित हो जाता है, तभी कलाय पक रहा है ' या ' शाक पक रहा है ' इत्यादि आकार के निश्चयात्मक बोध होते हैं । ' पीनो दिवा न भुते ' यहाँ वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ की ही अनुपपत्ति है, अतः ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रिभोजन रूप अर्थ से ही उसकी निवृत्ति हो सकती है, ( दूसरे प्रमाणों के द्वारा उपस्थित किये हुए रात्रिभोजन रूव अर्थ से नहीं ) । अतः प्रकृत में अर्थापत्ति से रात्रिभोजन के बोधक ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य की ही कल्पना करनी होगी । ऐसा न करने पर ( अर्थापत्ति के द्वारा सीधे रात्रि भोजन रूप अर्थ की ही कल्पना करने पर ) पोनो दिवा न भुङ्क्ते ' इस ( दिवा ) वाक्य के द्वारा उपस्थित पदार्थों के साथ ( दूसरे प्रमाण के द्वारा उपस्थित ) रात्रिभोजन रूप अर्थ का अन्वय नहीं हो सकेगा । ( उ ० ) जब प्रकृति श्रुतार्थापत्ति की विषयता केवल वाक्य के द्वारा उपस्थित अर्थ में नियत हो जाती है, तो फिर रात्रिभोजन रूप अर्थ अर्थापत्ति प्रमाण से ग्राह्य हो नहीं रह जाता, क्योंकि ( अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस ) वाक्य रूप शब्द प्रमाण से ही उसकी अवगति हो जाएगी । यह कहना भी उचित नही है कि ( प्र ० ) ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' यह वाक्य और इस वाक्य के अर्थ दोनों में से किसी का भी ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य के साथ कोई नियत सम्बन्ध नहीं है, अतः इनमें से किसी के द्वारा For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव-न्यायकन्दली वाक्यस्य तदर्थस्य वा रात्रिवाक्येन सह प्रत्यासत्त्यभावान्न ताभ्यां तदुपस्था-पनमिति, अर्थप्रत्यासत्तिद्वारेण वाक्यस्यापि प्रत्यासन्नत्वात् । न चार्थापत्तावनु-मानवत् प्रत्यासत्तिरपेक्षते, तस्या अनुपपत्तिमात्रेणैव प्रवृत्तेः । तदुक्तम्-न चार्थेनार्थ एवायं द्वितीयो गम्यते पुनः । सविकल्पक विज्ञानग्राह्यत्वावृत्तिरोहितः ॥ शब्दान्तराण्यबुद्ध्वाऽसामर्थ्यमे वावगच्छति । तेनैषां प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचराः । वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गतत्वाद् गमयिष्यति ॥ इति । ' रात्री भुङ्क्ते ' इस वाक्य की उपस्थिति नहीं हो सकती । ( उ ० ) चूंकि ' पोनी दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य के अर्थ के साथ ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य अर्थ का नियत सम्बन्ध है | इस सम्बन्ध के द्वारा ही ' पीनो दिवा न भुङ्ते ' इस वाक्य के साथ भी ' रात्रौ भुङ्क्ते, इस वाक्य का नियत सम्बन्ध अवश्य है । ( दूसरी बात है कि ) अर्थापत्ति को अपने प्रमेय में प्रवृत्त होने के लिए अनुमान की तरह नियत सम्बन्ध की अपेक्षा भी नहीं होती है उसका काम अर्थानुपपत्ति से ही चल जाता है । जैसा कहा गया है कि-( १ ) ' पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य से भोजन न करने वाले देवदत्त की पीनता का शाब्दबोध रूप सविकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है ( इस सविकल्पक ज्ञान में विषयीभूत दिन में न खानेवाले देवदत्त की मोटाई रूप प्रथम ) अर्थ के द्वारा ( रात्रि भोजन रूप ) द्वितीय अर्थ ज्ञात नहीं होता है क्योंकि वह ( रात्रि भोजन रूप द्वितीय अर्थ ) ' वृत्ति रोहित ' नहीं है, अर्थात् किसी शब्द से ( अभिषादि ) ' वृत्ति ' के द्वारा उपस्थित नहीं है । ( २ ) अतः ' पीनो दिवा न भुङवते ' इस वाक्य को सुनने के बाद ' रात्रिभोजन ' रूप दूसरे अर्थ को समझानेवाले ' रात्रो भुङक्ते ' इत्यादि किसी दूसरे शब्द को न सुनकर ( समझनेवाला पुरुष ) इतना ही समझता है कि ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य में रात्रि भोजन रूप अर्थ को समझाने का सामर्थ्य नहीं है । ( ३ ) अत: ( श्रुतार्थापत्ति स्थल में ) अर्थापत्ति के द्वारा पहिले रात्रौ भुङ्क्ते ' इत्यादि वाक्यों का ही बोध होता है । इसके बाद अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञात ' रात्रो भुङ्क्ते ' यह वाक्य ही रात्रि भोजन रूप अर्थ विषयक बोध को उत्पन्न करेगा । १. उपक्रम और उपसंहार की दृष्टि से इन श्लोकों का यथाश्रुत पाठ ठीक नहीं जँचता । इन श्लोकों का निम्नलिखित स्वरूप का होना उचित जान पड़ता है तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । न चार्थेनार्थ एवायं द्वितीयो गम्यते पुनः । सविकल्पक विज्ञानग्राह्येणावृत्तिरोहितः ॥ शब्दान्तराण्यबुद्ध्वाऽसामर्थ्य मे वावगच्छति । तेनैषा प्रथमं तावन्नियतं वाक्यगोचरा । वाक्यमेव तु वाक्यार्थं गतत्वाद् गमयिष्यति || For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५४१ अत्रोच्यते - पदानि वाक्यार्थप्रतिपादनाय प्रयुज्यन्ते । तानि प्रत्येकं पदार्थ संस्पर्शात्मकं वाक्यार्थं प्रतिपादयितुमशक्नुवन्त्यपर्यवसितव्यापारत्वाद् एकार्थकारीणि पदान्तराण्यपेक्षन्ते । यत्र पुनरमीभिर्वाक्यार्थः प्रतिपादितः, तत्रैषां शब्दान्तरापेक्षा नास्त्येव, स्वव्यापारस्य कृतत्वात् । यस्तैरुपपादितोऽर्थः स नोपपद्यत इति चेत्? नोपपादि, नह्यर्थस्याविरोधोपपादनमपि शब्दस्य व्यापारः, किन्तु प्रतिपादनम् । तच्चानेनासन्निहितेऽपि रात्रिवाक्ये कृतमेव । प्रतीयते हि दिवा s भोजनवाक्यात् पीनस्याभोजनम्, निःसन्दिग्धाऽभ्रान्ता चात्रेयं प्रतीतिः, अन्यथार्थापत्तेरपि प्रवृत्त्यभावात् । निश्चितस्यैव हि पोनस्य दिवाऽभोजन. प्रमाणसिद्धस्यानुपपत्तिर्न युक्तेति तदुपपादनमर्थ्यते, सन्दिग्धे विपरीतत्वेन चावधारिते तस्मिन् कस्योपपत्तयेऽर्थान्तरकल्पना स्यात? न चार्थयोः पर इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि वाक्य के अर्थ को समझाने के लिए ही पदों का प्रयोग किया जाता है । वाक्य प्रयुक्त होनेवाले पदो के अर्थ ही परस्पर उपयुक्त सम्बन्ध से युक्त होकर ' वाक्यार्थ ' कहलाते हैं । इस विशिष्ट वाक्यार्थ को कोई एक पद नहीं समझा सकता, क्योंकि पदों में केवल अपने अपने ही अर्थ को समझाने का सामर्थ्य होता है । अतः एक पद अपने अर्थ के साथ और अर्थों के सम्बन्ध के लिए दूसरे पदों की अपेक्षा रखता है । जहाँ जितने ही पदों से वाक्यार्थं विषयक बोध का सम्पादन हो जाता है, वहाँ उनसे भिन्न पदों की अपेक्षा नहीं होती है । इन पदों के द्वारा उपस्थित अर्थ में यदि अनुपपन्नता या विरोध है तो इसको छुड़ाने का दायित्व पदों पर नहीं है, क्योंकि अपने अपने अर्थों का प्रतिपादन करना ही पदों का काम है, उनके विरोध को मिटाना नहीं | ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' यह वाक्य ' रात्रौ भुङ्क्ते ' इस वाक्य का सांनिध्य न पाने पर भी दिन को भोजन न करनेवाले में पीनत्व रूप अपने अर्थ का बोध रूप काम तो भोजन न करनेवाले यदि ' दिवा ' वाक्य कर ही दिया है, क्योंकि ' दिवा न भुङ्क्ते ' इस वाक्य से दिन में में पीनत्व की अभ्रान्त एवं निःसन्दिग्ध प्रतीति हो जाती है । से दिन को भोजन न करनेवाले में पोनत्व की अभ्रान्त और निःशङ्क प्रतीति न हो तो फिर आगे उससे अर्थापत्ति की प्रवृत्ति भी क्योंकर होगी? दिन में न खाने पर भी देवदत्त में निश्चित पीनत्व की उपपत्ति ठीक नहीं बैठती है, उसकी उपपत्ति के लिए ही उसको प्रमाण सिद्ध रूप में समझाना आवश्यक होता है । दिन को न खाने पर भी देवदत्त में जो पीनता है, वह यदि इस स्थिति में सन्दिग्ध या विपरीत ही हो तो फिर उसकी उपपत्ति ही अपेक्षित नहीं है । अतः किसकी उपपत्ति के लिए रात्रिभोजन रूप दूसरे अर्थ की कल्पना आवश्यक होगी? किन्हीं दो अर्थों में परस्पर विरोध है, केवल इसी लिए उनको प्रतीति ही नहीं होती ' यह कहना For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावप्रमाणान्तर्भाव-प्रशस्तपादभाष्यम् सम्भवोऽप्य विनाभावित्वादनुमानमेव । अभावोऽप्यनुमानमेव, यथोत्पन्नं कार्य कारणसद्भावे लिङ्गम्, ' सभ्भव ' प्रमाण से भी व्याप्ति के द्वारा ही अर्थ का बोध होता है, अतः वह भी अनुमान ही है । अभाव प्रमाण भी अनुमान के ही अन्तर्गत है, क्योंकि जिस न्यायकन्दली स्परविरोध इति तयोः प्रतीतिरप्रतीतिर्भवति । तस्मादर्थप्रतीत्यैवोपपन्नः शब्दो न शब्दान्तरमपेक्षते, कर्तव्यतान्तराभावात् । अर्थ एव तु तेनाभिहितो-ऽर्थान्तरेण विनानुपपद्यमानः प्रतीत्यनुसारेण स्वोपपत्तये मृगयतीत्यव्याहतं शब्दश्रवणादनुमितानुमानमिति । शतं सहस्रे सम्भवतीति सम्भवाख्यात् प्रमाणान्तरात् सहस्रेण शत-ज्ञानमिति केचित् । तन्निरासार्थमाह - सम्भवोऽप्यविनाभावित्वादनुमानमेव । सहस्रं शतेनाविनाभूतम्, तत्पूर्वकत्वात् । तेन सहस्राच्छतज्ञानमनुमानमेव । प्रमेयाभावप्रतीतौ भावग्राहकप्रत्यक्षादिपञ्चप्रमाणानुत्पत्तिरभावाख्यं प्रमाणान्तरं कैश्चिदिष्टम् । तद् व्युदस्यति - अभावोऽप्यनुमानमेव । कथमित्यत ठीक नहीं है । अतः ' पीनो दिवा न भुङ्क्ते ' इत्यादि शब्द यदि दिन में न खानेवाले में ' पीनत्वादि ' रूप अपने अर्थ को अभ्रान्त और निःशङ्क रूप से समझा देते हैं, तो फिर वे अपना कर्त्तव्य कर ही लेते हैं, क्योंकि उन शब्दों का उन अर्थों को समझाना छोड़कर दूसरा कोई कर्त्तव्य नहीं है । अपने इस कार्य के सम्पादन के लिए उन्हें ' रात्री भुङ्क्ते ' इत्यादि किसी दूसरे शब्द की अपेक्षा नहीं है । तस्मात् दिन में न खानेवाले की पीनता रूप अर्थ ही रात्रि भोजन रूप दूसरे अथ के बिना अनुपपन्न होकर अपनी उपपत्ति के लिए उस दूसरे अर्थ की खोज करता है, अतः ' दिवा न भुङ्क्ते ' इस शब्द के श्रवण के बाद जो रात्रि भोजन रूप अर्थ का बोध होता है, वह ' अनुमिता-नुमान ' ही है । इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है । ' हजार में सौ के रहने की सम्भावना है ' इस प्रकार के सम्भव नाम के स्वतन्त्र प्रमाण से ही कोई सम्प्रदाय सहस्र संख्या से सो संख्या का ज्ञान मानते हैं । उनका खण्डन करने के लिए ही ' सम्भवोऽप्यविनाभावादनुमानमेव ' यह वाक्य लिखा गया है । अभिप्राय यह है कि सहस्र में सो की व्याप्ति रूप सम्बन्ध है । इस व्याप्ति रूप सम्बन्ध के द्वारा ही उक्त ज्ञान होता है, अतः सहस्र संख्या से जो शत संख्या का ज्ञान होता है, वह भी अनुमान हो है । किसी सम्प्रदाय के लोग किसी वस्तु के अभाव की प्रतीति के लिए एक ' अभाव ' नाम का और प्रमाण मानते हैं । एवं इस अभाव को भाव पदार्थों के ग्राहक प्रत्यक्षादि पांच For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् एवमनुत्पन्नं कार्य कारणासद्भावे लिङ्गम् । ५४३ प्रकार उत्पन्न कार्य अपने कारण की सत्ता का ज्ञापक हेतु है, उसी प्रकार अनुत्पन्न कार्य भी अपने कारण की असत्ता का ज्ञापक हेतु ही है । न्यायकन्दली आह — यथोत्पन्नं कार्य कारणसद्भावे लिङ्गम्, एवमनुत्पन्नं कार्य कारणा-सद्भावे लिङ्गम् । योऽप्यभावं प्रमाणमिच्छति, तस्यापि न ज्ञानानुत्पादमात्रात् प्रमेया-भावज्ञानम्, स्वरूपविप्रकृष्टस्यापि वस्तुनोऽभावप्रतीतिप्रसङ्गात् । किन्तु ज्ञान-कारणेषु सत्सु ज्ञानयोग्यस्य वस्तुनो ज्ञानानुत्पादोऽभावावगमनिमित्तम् । न चायोग्यानुपलम्भाद् योग्यानुपलम्भस्य कश्चित् स्वरूपतो विशेषः, अभावस्य निरतिशयत्वात् । तेन नायं स्वशक्त्यैवेन्द्रियवद् बोधकः, किन्तु योग्यानुपलम्भो ज्ञेयाभावं न व्यभिचरति । अयोग्यानुपलम्भस्तु व्यभिचरति, सत्यपि ज्ञेये तस्य प्रमाणों की अनुत्पत्ति रूप कहते हैं, उनके इस मत का खण्डन ही ' अभावोऽप्यनुमानमेव ' इत्यादि भाष्यसन्दर्भ के द्वारा किया गया है । किस युक्ति से यह अभाव नाम का प्रमाण मानते हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' यथोत्पन्नं कार्यं कारणसद्भावे लिङ्गम् एवमनुत्पन्नं कार्यं कारणासद्भावे लिङ्गम् ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । जो सम्प्रदाय उक्त अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण मानने को इच्छुक हैं, उन्हें भी ज्ञान की केवल अनुत्पत्ति से ही किसी वस्तु के अभाव का ज्ञान नहीं होता, यदि ऐसी बात हो तो उन वस्तुओं के अभावों की भी प्रतीति की आपत्ति होगी, जिन वस्तुओं में प्रत्यक्ष की योग्यता नहीं है । अत: ( उन्हें भी ) यही कहना पड़ेगा कि ज्ञान के ( सामान्य ) कारणों के रहने पर ज्ञात होने योग्य वस्तुओं के ज्ञान की अनुत्पत्ति ही उन वस्तुओं के अभाव का ज्ञापक ' अभाव ' नाम का प्रमाण है । ( उपलब्धि के ) योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि और ( उपलब्धि के ) अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि इन दोनों के स्वरूपों में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिससे कि दोनों अनुपलब्धियों में भेद माना जाय, क्योंकि केवल अभाव रूप दोनों अनुपलब्धियों में कोई विशेष धर्म नहीं | अतः अभाव ( या प्रमाणों की कथित अनुत्पत्ति ) उस प्रकार केवल अपनी ही शक्ति से अपने ज्ञेय अभाव के ज्ञान को उत्पन्न नहीं कर सकते, जिस प्रकार इन्द्रियाँ केवल अपनी शक्ति से ही प्रत्यक्ष ज्ञान को उत्पन्न करती है । कथित अभाव प्रमाण से वस्तुओं के अभाव की प्रतीति की यह रीति है कि जिस वस्तु की जहाँ उपलब्धि हो सकती है, वहाँ यदि उसकी उपलब्धि नहीं होती है, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावप्रमाणान्तर्भाव-न्यायकन्दली सम्भवात् एतावता विशेषेण योग्यानुपलम्भ: प्रतिपादको नापरः । एवं सत्य -भावो लिङ्गमेव स्यादविनाभाव ग्रहण सापेक्षत्वात् । तदनपेक्षत्वे त्वविशेषेण तस्याभावस्याभावबोधकत्वमिति दुर्निवारणप्रसङ्गः । अपि चेन्द्रियसन्निकर्षादुपलभ्यमाने भूतलेऽभावज्ञानमपि भवति ' अघट भूतलम् ' इति, तत्र भूतलस्येवाभावस्यापि प्रत्यक्षता किं नेष्यते? भावांशेनैवेन्द्रि यस्य सम्बन्धः, योग्यत्वादिति चेत्? नेदमनुपपादितं सिध्यति । कार्यगम्या हि योग्यता, यथेन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायि कार्यं भावे दृश्यते, तद्वदभावेऽपीति भाववदभावोऽपि इन्द्रियग्रहणयोग्य एव । कार्यदर्शनादेव चास्येन्द्रियसम्बन्धोऽपि कश्चित् कल्पयिष्यते । तो समझते हैं कि वहाँ वह वस्तु नहीं है, इस प्रकार योग्यानुपलब्धि के साथ योग्य वस्तु के अभाव की व्याप्ति है, प्रत्यक्ष के अयोग्य वस्तुओं के अभाव के साथ उस वस्तु की अनुप-लब्धि की व्याप्ति नहीं है, ( अर्थात् व्यभिचार है ), क्योंकि ( अयोग्य पिशाचादि ) ज्ञेयों के रहने पर भी उनकी उपलब्धि नहीं होती है, ( अर्थात् अनुपलब्धि रहती है ), इससे यह निष्कर्ष निकला कि योग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि हो उसके अभाव का ज्ञापक है, अयोग्य वस्तुओं की अनुपलब्धि नहीं । अतः उक्त अभाव प्रमाण भी उक्त प्रमेयाभाव का ज्ञापक हेतु ही है, क्योंकि व्याप्ति के द्वारा ही उसका ज्ञापन कर सकता है, अन्यथा नहीं । यदि उसमें व्याप्ति की अपेक्षा न मानें तो सभी अभावों से सभी अभाबों की प्रतीति की आपत्ति होगी, जिसका वारण करना सम्भव न होगा । दूसरी बात यह है कि इन्द्रिय के द्वारा भूतल के उपलब्ध होने पर ही ' अघट भूतलम् ' इत्यादि आकारों से अभाव की प्रतीति भी होती है । यदि ऐसी बात है तो फिर भूतल की तरह उसमें विशेषण रूप से भासित होनेवाले घट के अभाव का इन्द्र के द्वारा प्रत्यक्ष ही क्यों नहीं मान लेते? ( प्र ० ) भाव पदार्थ ही इन्द्रियों से प्रकाशित होने की क्षमता रखते हैं, अतः ( कल्पना करते हैं कि ) भाव पदार्थों के साथ ही इन्द्रियों का प्रत्यक्षोपयुक्त ) सम्बन्ध हो सकता है । ( उ ० ) ( भाव पदार्थों में योग्यता है ' यह सिद्धान्त ) युक्ति के द्वारा कारण में कार्योत्पादन की इन्द्रियों के प्रत्यक्षोपयुक्त सम्बन्ध की उपपादन किये बिना नहीं माना जा सकता । कार्य से हो योग्यता निर्धारित होती है । जिस प्रकार भाव पदार्थों के इन्द्रियों का अन्वय और साथ भी वे दोनों देखे प्रत्यक्ष रूप कार्य के साथ व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं, उसी प्रकार अभाव की उपलब्धि के जाते हैं, अतः भाव पदार्थों की तरह अभाव पदार्थों में भी इन्द्रियों से गृहीत होने की योग्यता है । इस प्रकार इन्द्रियों से अभाव के प्रत्यक्ष की उपपत्ति हो जाने पर अभाव पदार्थों के साथ भी इन्द्रियों के किसी उपयुक्त सम्बन्ध की कल्पना कर ली जाएगी । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् I न्यायकन्दली For Private And Personal अथ मतम् - निरधिकरणो न कस्यचिदभावः प्रतीयते, देशादिनियमेन प्रवृत्तिनिवृत्तिदर्शनात् । यदधिकरणश्चायं प्रतीयते तस्य प्रतीताविन्द्रियव्यापारो नाभावग्रहणे, इन्द्रियव्यापारोपरमेऽप्यभावप्रतीतिदर्शनात् । तथा हि- कश्चित् स्वरूपेण देवकुलादिकं प्रतीत्य स्थानान्तरगतो देवकुले देवदत्तोऽस्ति नास्तीति केनचित् पृष्टः तदानीमेव ज्ञातजिज्ञासो नास्तीति प्रतीत्याऽभावं व्यवहरति नास्तीति । न च पूर्वमेव देवकुलग्रहणसमये देवदत्ताभावो निर्विकल्पेन गृहीतः, सम्प्रति स्मर्यमाण इति वाच्यम्, युक्तं घटादीनामिन्द्रियसन्निकर्षानिर्विकल्पेन ग्रहणम्, तेषां स्वरूपस्य परानपेक्षत्वात् । अभावस्य तु प्रतिषेधस्वभावस्य स्वरूपमेव यस्यायं ( एव ) प्रतिषेधः स्यात् तदधीनम् । अतस्तत्प्रतिषेधतामन्तरेण तद-भावस्य स्वरूपान्तराभावात् । तत्रास्य प्रतियोगिस्वरूपनिरूपणमन्तरेण निरूपणम-इस प्रसङ्ग में अभाव को प्रमाण माननेवालों का कहना है कि नियमतः किसी विशेष देश में ही अभाव के प्रसङ्ग में प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है, इससे यह सिद्ध होता है कि किसी अधिकरण में ही अभाव की प्रतीति होती है, अधिकरण को छोड़कर केवल अभाव की प्रतीति नहीं होती है । तदनुसार जिस अधिकरण में अभाव की प्रतीति होती है, उस अधिकरण की प्रतीति में ही इन्द्रिय का व्यापार आपेक्षित होगा । ( प्र ० ) उस अधिकरण में भी अभाव की प्रतीति के लिए इन्द्रिय का व्यापार अपेक्षित नहीं है, क्योंकि इन्द्रियों के व्यापार के हट जाने पर भी अभाव की प्रतीति होती है । जैसे किसी पुरुष को किसी देवालय को देखने के बाद किसी दूसरे स्थान में जाने पर कोई पूछता है कि ' वहाँ देवदत्त हैं या नहीं? उसी समय उस पुरुष की जिज्ञासा को समझकर ' देवालय में देवदत्त नहीं हैं ' इस प्रतीति के द्वारा वह पुरुष ' नास्ति ' का व्यवहार ( अर्थात् ' देवकुले देवदत्तो नास्ति ' इस वाक्य का व्यवहार ) करता है । ( प्र ० ) देवालय के देखने के समय ही उसे वहां देवदत्त के अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान हो गया था । अभी वह उसी निर्विकल्पक ज्ञान जनित स्मृति के द्वारा देवदत्त के अभाव का व्यवहार करता है । ( उ ० ) ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान सम्भव ही नहीं है । घटादि पदार्थों का निर्विकल्पक ज्ञान इस लिए सम्भव होता है कि उनके ज्ञान के लिए प्रतियोगी प्रभृति किसी दूसरे पदार्थों को जानने की अपेक्षा नहीं होती है । किन्तु अभाव तो किसी भाव पदार्थ का प्रतिषेध रूप है, अतः उसको जानने के लिए उस भाव पदार्थ को भी जानना आवश्यक है, जिसका कि वह प्रतिषेध है । क्योंकि भाव के प्रतिषेध को छोड़कर अभाव का कोई दूसरा स्वरूप ही नहीं है । तस्मात् प्रतिषेध्य ( प्रतियोगि ) ज्ञान के बिना अभाव का ज्ञान सम्भव ही नहीं है । ( अर्थात् अभाव का ज्ञान प्रतियोगी रूप विशेषण से युक्त होकर ही होगा, अतः अभाव का निर्विकल्पक ज्ञान असम्भव है ) । भाव और अभाव में यही अन्तर है कि भाव का अपने भावत्व रूप से ही