प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 621–630
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 621–630
पृष्ठ 621
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्याय कन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-न्यायकन्दली शक्यम् । अयमेव हि भावाभावयोविशेषो यदेकस्य विधिरूपतया ग्रहणम्, अपरस्य त्वन्यप्रतिषेधमुखेन । यदाह न्यायवात्तिककार: - " स्वतन्त्रपरतन्त्रोप-लब्ध्यनुपलब्धिकारणभावाच्च विशेषः, सत्तु खलु प्रमाणस्यालम्बनं स्वतन्त्रम्, असत्तु परतन्त्रमन्यप्रतिषेधमुखेनेति " । यदि त्वभावस्यापि स्वातन्त्र्येण ग्रहणं तदा भावादविशेषः स्यात् । अतो नास्त्यभावस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणम् । यदपि विकल्पितं किं देवदत्तसंकीर्णस्य देवकुलस्य पूर्वं प्रतीतिरा-सीत्? तद्विविक्तस्य वा? संकीर्णग्रहणे तावत् केवलस्य न स्मरणम् । विविक्तग्रहणे वाभावोऽगृहीत एव पश्चात् स्मर्यत इति प्राप्तम् । तदप्यसारम्, देवदत्तभावाभावयोर ग्रहणेऽपि देवकुलस्य स्वरूपेण ग्रहणात् । तस्मान्न पूर्वमभाव-ग्रहणम्, तदभावान्न स्मृतिः, न च तदानों प्रमाणान्तरमुपलभ्यते तस्माद् व्यवहितेऽपि ग्रहण होता है, किन्तु अभाव का भाव के प्रतिषेध रूप से ग्रहण होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार उद्योतकर ने कहा है कि " भाव और अभाव में यहीं अन्तर है कि एक ( भाव ) स्वतन्त्र है, और दूसरा ( अभाव ) परतन्त्र । एवं एक की सत्ता का उसकी अपनी उपलब्धि ही नियामक है, और दूसरे की सत्ता के प्रतियोगी की अनुपलब्धि नियामक है । ' सत् ' अर्थात् भाव पदार्थ प्रमाण के द्वारा स्वतन्त्र ही गृहीत होता है, किन्तु ' असत् ' अर्थात् अभाव प्रतियोगी के प्रतिषेध रूप से, फलतः प्रतियोगी परतन्त्र होकर प्रमाण के द्वारा ज्ञात होता है " । यदि अभाव की भी स्वतन्त्र उपलब्धि ही हो तो भाव और अभाव दोनों में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा, फलतः दोनों अभिन्न हो जाएँगे । अतः निर्विकल्पक ज्ञान के अभाव का गृहीत होना सम्भव नहीं है । इस प्रसङ्ग में किसी ने जो यह विकल्प उपस्थित किया था कि पहले देवदत्त और देवालय ( देवकुल ) दोनों की साथ साथ प्रतीति थी? या देवदत्त से असम्पृक्त केवल देवकुल को ही प्रतीति थी? यदि साथ साथ प्रतीति मानें तो फिर केवल देवकुल का स्मरण नहीं होगा । ( उस स्मृति में देवदत्त भी अवश्य ही भासित होगा, एवं देवदत्त के भासित होने पर उसके अभाव की प्रतीति असम्भव होगी ) । यदि दूसरा पक्ष मानें तो ( यह अनिष्टापत्ति होगी कि ) पूर्व में अज्ञात ही देवकुल का स्मरण होता है । ( उ ० ) इस विकल्प में भी कुल सार नहीं है, क्योंकि देवदत्त या उनका अभाव, इन दोनों में से किसी का ग्रहण न होने पर भी देवकुल अपने देवकुलत्व स्वरूप के साथ ही वहाँ ज्ञात होता है । देवदत्त के अभाव का उस पुरुष को पहिले सविकल्पक या निर्विकल्पक कोई भी ज्ञान नहीं था अतः देवदत्त के अभाव की स्मृति भी उस पुरुष को नहीं हो सकती । उस समय देवदत्त के अभाव का ज्ञापक कोई दूसरा प्रमाण भी नहीं उपलब्ध होता है, अतः यही कहना पड़ेगा कि उस पुरुष को देवदत्त की संनिधि For Private And Personal
पृष्ठ 622
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५४७ प्रतियोगिनि स्मृत्यारूढ भाव ग्रहणाय प्रत्यक्षादिप्रमाणपञ्चकव्यावृत्तिरेव प्रमाणम् । एकत्र चाभावस्याभावपरिच्छेद्यत्वे सिद्धेऽन्यत्रापि तेनैव सेत्स्यतीति सिद्धमभावस्य प्रमाणान्तरत्वम् । अत्रोच्यते - देशान्तरं गतः केनचित् पृष्टो देवकुले देवदत्तस्येदानीन्तना-नुपलम्भेनेदानीन्तनाभावं प्रत्येति ' इदानीं नास्ति ' इति? किं वा प्राक्तनानुपलम्भेन प्राक्तनाभावं देवकुलग्रहणसमये नासीदिति? इदानीन्तनानुपलब्धिस्तावद् योग्यानु-पलब्धिर्न भवति, देशव्यवधानात् । सम्प्रत्यभावो देवदत्तस्य सन्दिग्धः आगमन-स्यापि सम्भवात् । प्राक्तनाभावपरिच्छेदयोग्या तु प्राक्तनानुपलब्धिर्नदानी-मनुवर्तते, अवस्थान्तरप्राप्तेः । न चाविद्यमाना प्रतीतिकारणं भवितुमर्हति । न रहने पर भी प्रश्न कर्त्ता के पूछने पर देवदत्त की स्मृति हो जाती है । स्मृति के द्वारा उपस्थित देवदत्त के अनुभावक प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों में से कोई भी वहाँ उपस्थित नहीं है, अतः देवदत्त के ग्राहक प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों का न रहना या व्यावृत्ति रूप अभाव प्रमाण से ही वहाँ देवदत्त के अभाव का बोध होता है । इस प्रकार एक स्थान में उक्त अभाव प्रमाण को अभाव का ज्ञापक मान लेने पर अन्य सभी स्थानों में अभाव की ज्ञापकता उसमें सिद्ध हो जाती है । इस प्रसङ्ग में ( अभाव को स्वतन्त्र प्रमाण न माननेवाले ) हम लोगों का कहना है कि दूसरे देश में जाने पर किसी पुरुष को किसी अन्य पुरुष के द्वारा पूछे जाने पर देवकुल में इस ( पूछने के ) समय की जो देवदत्त की अनुपलब्धि है, उस अनुपलब्धि के द्वारा ( १ ) देवदत्त का एतत्कालिक जो अभाव है, उसे पूछनेवाले को इस प्रकार समझाया जाता है कि ' अभी देवकुल में देवदत्त नहीं है । ( २ ) अथवा जिस समय वह पुरुष देवकुल में था, उस समय की जो देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि थी, उस अनुपलब्धि के द्वारा देवदत्त के तत्कालिक अभाव को ही इस प्रकार समझाते हैं कि ' उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे । ' इनमें इस समय की जो देवकुल में देवदत्त को अनुपलब्धि है. वह प्रत्यक्ष योग्य वस्तु की उपलब्धि ही नहीं है, क्योंकि इस समय बोद्धा ' पुरुष ' के देश और देवकुल इन दोनों में बहुत बड़ा व्यवधान है ( अतः देवदत्त उस देश में रहनेवाले पुरुष के द्वारा ज्ञात होने योग्य नहीं हैं ), अतः यह योग्यानुपलब्धि न होने के कारण देवदत्त के अभाव का ग्राहक नहीं हो सकती । ' इस समय देवकुल में देवदश नहीं हैं ' यह भी सन्दिग्ध ही है, क्योंकि बीच में वह आ भी सकते हैं । पूर्वकाल में रहनेवाली अनुपलब्धि जो — पूर्वकालिक अभाव को ही समझा सकती है - उसका अभी रहना सम्भव नहीं है, क्योंकि स्थिति बदल गई है । अविद्यमान अनुपलब्धि अभावोपलब्धि का कारण नहीं हो सकती । For Private And Personal
पृष्ठ 623
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्याय कन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-न्यायकन्दली नापि स्मृत्यारूढा व्याप्रियते, पूर्वमसंविदितत्वात् । नानुपलब्धिः प्रमाणान्तरसंवेद्या, अभावरूपत्वात् । अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षायां चानवस्था स्यात् । तस्मादियमगृहीतैवेन्द्रियवदर्थपरिच्छेदिकेति राद्धान्तः, तथा सति कुतस्तस्याः स्मरणम्? अनुभवाभावात् । अथ मतम् - देवकुले देवदत्तानुपलम्भो देवदत्तोपलम्भेन विनिवर्त्यते, न च देशान्तरगतस्य तदुपलम्भो जातः, तस्मादस्त्येव तदनुपलम्भः । यदि त्ववस्थान्तरमापन्नः, न चावस्थाभेदे वस्तुभेद इति । अस्तु तर्हि तावदिहैवम् । यत्र तु पूर्व प्रतियोगिस्मरणाभावाद् वस्त्वभावो न गृहीतः पश्चात् कालान्तरे वस्तुग्रहणादिहेदानीं नासीदिति प्राक्तनाभावज्ञानम्, तत्र कः प्रती-यह कहना भी सम्भव नहीं है कि ( प्र ० ) स्मृति के द्वारा उपस्थापित अनुपलब्धि से ही वहाँ अभाव का बोध होगा, ( उ ) क्योंकि अनुपलब्धि का पहिले अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति सम्भव नहीं है । अनुपलब्धि चूंकि अभाव रूप है, अतः प्रत्यक्षादि पाँचों ( भावबोधक ) प्रमाणों में से किसी से भी उसका बोध सम्भव नही है । दूसरी अनुप-लब्धि से यदि प्रकृत प्रमाणभूत अनुपलब्धि का अनुभव मानें, तो फिर कारणीभूत उस अनुपलब्धि के अनुभव के लिए तीसरी अनुपलब्धि की आवश्यकता होगी, जो अन्त में अनवस्था में परिणत होगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि जिस प्रकार इन्द्रिय से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसके ज्ञात होने की आवश्यकता नहीं होती है, उसी प्रकार अनुपलब्धि रूप प्रमाण भी स्वयं बिना ज्ञात हुए हो केवल अपनी सत्ता के द्वारा ही अपने अभाव रूप अर्थ के निश्चय का उत्पादन करता है । तस्मात् पूर्व में अनुपलब्धि का अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति किस प्रकार हो सकती है? यदि यह कहिए कि ( प्र ० ) देवकुल में देवदत्त की जो अनुपलब्धि है वह केवल देवदत्त की उपलब्धि से ही हट सकती है । देवकुल से आनेवाला पुरुष जब दूसरे देश में चला आता है, उस समय उसे देवदत्त की उपलब्धि तो हो नहीं जाती । अतः ( जिस समय वह दूसरे के पूछने पर देवकुल में देवदत्त के अभाव का प्रतिपादन करता है ) उस समय देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि बनी हुई है | मान लिया कि उस समय की अनुपलब्धि से इस समय की अनुपलब्धि दूसरी अवस्था में है, किन्तु कोई भी वस्तु केवल अवस्था के बदल जाने से दूसरी वस्तु नहीं हो जाती । ( उ ० ) यह मान भी लिया जाय कि उक्त रीति से देवकुल में देवदत्त के कथित अभाव के प्रतिपादन की इस प्रकार उपपत्ति की जा सकती है, तथापि जहाँ प्रतियोगी का स्मरण न रहने के कारण किसी एक अधिकरण में पहिले उस प्रतियोगी का अभाव ज्ञात न हो सका, फिर कुछ काल बीत जाने पर उसी अधिकरण में उस प्रतियोगी रूप वस्तु का ग्रहण हुआ । ऐसे अधिकरण में उस समय उसी वस्तु के पूर्वकालिक अभाव का For Private And Personal
पृष्ठ 624
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषांनुवादसहितम् न्यायकन्दली III कार:? निवृत्तो हि तद्वस्त्वनुपलम्भस्तस्योपलभ्भेन । न चानुपलम्भः पूर्वमासीदिति सम्प्रत्यविद्यमानोऽपि प्रतीतिहेतुः, प्रनष्टेन्द्रियस्यापि विषयग्रहण-प्रसङ्गात् । अद्यतनेन तूपलम्भेनाद्यतनानुपलम्भस्तस्य निर्वार्तितः, प्राक्तनानु-पलम्भस्त्वस्त्येव । तेन प्राक्कालीनाभावपरिच्छेदयोग्येन प्राक्तनाभावः परिच्छिद्यत इति चेत्? अहो पाण्डित्यम्? अहो नेपुण्यम्? अनुपलम्भ उपलम्भप्रागभावः, स च वस्तुत्पत्त्यवधिक एव न प्राक्तनाद्यतनकालभेदेन भिद्यते, तत्राद्यतनानु-पलम्भो निवृत्तः, प्राक्तनो न निवृत्त इति कः कुशाग्रीयबुद्धेरन्य इममतिसूक्ष्म-विवेकमवगाहते । तस्मादभावोऽभावेनैव परिच्छिद्यत इति न बुद्धधामहे । कथं तहि स्वरूपमात्रं गृहीत्वा स्थानान्तरगतस्य स्मर्यमाणे प्रति-योगिन्यभावप्रतीतिः? अनुमानात्, यो हि यस्मिन् स्मर्यमाणे स्मृतियोग्यः इस प्रकार का ज्ञान होता है कि ' उस अधिकरण में उस समय यह वस्तु नहीं थी ' वहाँ ( अनुपलब्धि को प्रमाण माननेवाले ) आप क्या प्रतीकार करेंगे? अर्थात् यहाँ अभाव का ग्रहण किससे होगा? क्योंकि यहाँ वर्त्तमान काल के प्रतियोगी की उपलब्धि से प्रतियोगी की भूतकालिक अनुपलब्धि नष्ट हो चुकी है । ( प्र ० ) उस अधिकरण में उस वस्तु की अनुपलब्धि तो पहिले से ही थी, किन्तु उसका ज्ञान भर नहीं था; वही ( भूतकालिक ) अनुपलब्धि वर्त्तमान काल में उपलब्धि के द्वारा नष्ट हो जाने पर भी उस अधिकरण में उस वस्तु के अभाव का ग्राहक होगी । ( उ ० ) यह समाधान भी ठीक नहीं है, क्योंकि कार्य के अव्यवहित पूर्वक्षण में न रहने पर भी यदि भूत काल में कभी रहने से ही कोई किसी का उत्पादन कर सके, तो फिर जिसे कभी इन्द्रिय थी और अभी वह नष्ट हो गयी है, ऐसे व्यक्ति को भी रूपादि का प्रत्यक्ष होना चाहिए । ( प्र ० ) आज की किसी वस्तु की उपलब्धि से आज की ही उस वस्तु की अनुपलब्धिविनष्ट होगी, उससे पूर्व की अनुपलब्धि नहीं, अतः पूर्वकाल की उस विषय को अनुपलब्धि तो इस ( उपलब्धि के ) समय भी है ही, इस अनुपलब्धि का तो विनाश नहीं हुआ है । पूर्वकालिक इसी अनुपलब्धि के द्वारा पूर्वकालिक उस वस्तु के अभाव का निश्चय होगा । ( उ ० ) इस पाण्डित्य और निपुणता का क्या कहना? ( यह आप नहीं समझते कि ) अनुपलब्धि शब्द का अर्थ है उपलब्धि का प्रागभाव | वह अनादि काल से अपने प्रतियोगी की उत्पत्ति के समय तक बराबर रहने-वाली एक ही वस्तु है । वह वर्तमान काल और भूतकाल के भेद से भिन्न नहीं हो सकती । अतः प्रकृत में पूर्वकालिक अनुपलब्धि का नाश नहीं हुआ है, और एतत्कालिक अनुपलब्धि का नाश हो गया है, इस भेद को किसी कुशाग्रबुद्धि महापुरुष को छोड़कर और कौन समझ सकता है? तस्मात् हम लोग इस बात को नहीं समझ पाते कि ( अनुपलब्धि रूप ) अभाव से ही अभाव का ग्रहण होता है । For Private And Personal
पृष्ठ 625
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५५० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-न्यायकन्दली सत्यामपि सुमूर्षायां न स्मर्यते स तस्य ग्रहणकाले नासीदिति । यथा केवले प्रदेशे स्मर्यमाणे तत्र प्राप्रतीताभावो घटोऽस्मर्यमाणः । न च स्मर्यते देवकुले स्मर्यमाणे सत्यामपि सुमूर्षायां स्मृतियोग्योऽपि देवदत्तः । तस्मात् सोऽपि देवकुलग्रहणसमये नासीदिति स्मृत्यभावादनुमानम् । सहोपलब्धयोरपि वस्तुनोः संस्कारपाटवादिविरहादेकस्य स्मरणमपरस्यास्मरणं दुष्टम्, यथाधीतस्य
श्लोकस्यैकस्य पदान्तरस्मरणेऽपि पदान्तरास्मरणम् । तत्र कथमेकस्य स्मरणे
परस्यास्मरणाद् अभावानुमानमनेकान्तिकत्वादिति चेत्? सहस्थितयोरपि पदार्थयोः कदाचित् कारणानुरोधादेक उपलभ्यते नापरः, तत्रापि कथं भूतलो-पलम्भादनुपलभ्यमानस्य घटस्याभावसिद्धि:? ( प्र ० ) तब फिर जहाँ कोई व्यक्ति केवल भूतल रूप आश्रय को देखकर दूसरी जगह चला जाता है, वहीं कुछ काल के बाद घट रूप प्रतियोगी का स्मरण होने पर ' उस भूतल रूप अधिकरण में उस समय घट नहीं था ' इस प्रकार से उसे अभाव का ग्रहण होता है, उसकी उपपत्ति कैसे होगी? ( उ ० ) उस अभाव का ग्रहण अनु-मान प्रमाण से होगा । क्योंकि ( घट से असंयुक्त ) केवल भूतल के स्मरण की पूर्ण इच्छा रहने पर भी पहिले से ज्ञात भूतल में घट का स्मरण नहीं होता है, वहाँ यह निश्चित है कि घट नहीं था । इससे यह सामान्य नियम उपपन्न होता है, कि जिस एक वस्तु का स्मरण होने पर, और स्मरण की पूर्ण इच्छा रहने पर भी स्मृति के योग्य जिस दूसरी वस्तु का स्मरण नहीं होता है, उस ( एक ) वस्तु में वह ( दूसरी ) वस्तु नहीं है । तदनुसार देवालय का स्मरण होने पर देवदत्त के स्मरण की इच्छा रहने पर और देवदत्त में स्मृति को पूर्णयोग्यता रहने पर भी यदि उनकी स्मृति नहीं होती है, तो यह अनुमान सुलभ हो जाता है ' उस समय देवालय में देवदत्त नहीं थे ' ( प्र ० ) उक्त नियम में व्यभिचार रहने के कारण कथित रीति से भूतकालिक अभाव का अनुमान सम्भव नहीं है, क्योंकि साथ साथ अनुभव होनेवाले दो विषयों में से यदि एक विषयक संस्कार दृढ़ नहीं रहता है, या उसमें कुछ पटुता की कमी रहती है, तो फिर उसका स्मरण नहीं होता है । एवं दूसरे विषय का संस्कार यदि उन दोषों से दूर रहता है, तो उस विषय का स्मरण होता है । जैसे कि पढ़े हुए एक पद्य के एक अंश का स्मरण होता है, दूसरे का नहीं । इस प्रकार के स्थलों में एक का स्मरण न होने पर भी दूसरे का स्मरण किस प्रकार हो सकेगा? ( उ ० ) ( जिस प्रकार एक साथ ज्ञात होनेवाले दो विषयों में से कभी एक का स्मरण होता है, दूसरे का नहीं उसी प्रकार ) एक साथ रहनेवाले दो पदार्थों में से भी एक का स्मरण होता है, चूँकि उसके सभी कारण ठीक रहते हैं । दूसरे का स्मरण नहीं होता, क्योंकि For Private And Personal
पृष्ठ 626
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५५१ अय मतम् – एकज्ञानसंसर्गिणोरेकोपलम्भेऽपरस्यानुपलम्भोऽभावसाधनं सर्वः । येन हि ज्ञानेन प्रदेशो गृह्यते तेनैव तत्संयोगी घटोऽपि गृह्यते, यैव प्रदेशग्रहणे सामग्री सैव घटस्यापि सामग्री । यदि प्रदेशे घटोऽभविष्यत् सोऽपि प्रदेशे ज्ञायमाने विज्ञास्येत तत्तुल्यसामग्रीकत्वात् । न ज्ञायते च तस्मान्ना-स्त्येव तदनुपलम्भस्य प्रकारान्तरेणासम्भवादिति । यद्येवमस्माकमप्येकज्ञान-संसगणोरेकस्मरणेऽपरस्यास्मरणमभावसाधनम् । यैव देवकुलग्रहणसामग्री सा देवदत्तस्यापि तत्संयुक्तस्य ग्रहणसामग्री, या च देवकुलस्य स्मरणसामग्री सा वदत्तस्यापि स्मृतिसामग्री, तदेकज्ञानसंसंगित्वाद् यदि देवकुलग्रहणकाले देवदत्तो-s भविष्यत् सोऽपि देवकुले स्मर्यमाणे अस्मरिष्यत् तत्तुल्यसामग्रीत्वात् । न च उसके स्मरण के कारणों में कुछ त्रुटि रहती है । ऐसी स्थिति में भूतल के स्मरण के बाद घट का स्मरण न होने से भूतल में घट के न रहने की सिद्धि किस प्रकार होगी । यदि यह कहें कि ( ० ) सभी अनुपलब्धियाँ अभाव की साधिका नहीं है, किन्तु एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक को अनुपलब्धि ही दूसरे के अभाव की साधिका है । अतः जिस ज्ञान के द्वारा भूतल रूप प्रदेश का ग्रहण होता है, उसी ज्ञान के द्वारा भूतल में संयुक्त घट को भी ग्रहण होता है । जिन कारणों के समूह से प्रदेश का ज्ञान होता है, उसी कारण समूह से भूतल में संयोग सम्बन्ध से रहनेवाले घट का भी ज्ञान होता है । अतः भूतल में यदि घट रहता तो भूतल पर वह भी दीख पड़ता ही, क्योंकि भूतल और घट दोनों का ग्रहण एक ही प्रकार के कारणों से होता है । किन्तु भूतल के ज्ञात होने पर भी घट ज्ञात नहीं होता है । तस्मात् घट की उक्त अनुपलब्धि से समझते हैं कि वहाँ भूतल में घट है ही नहीं । क्योंकि भूतल में घटाभाव से बिना घट की इस अनुपलब्धि की सम्भावना नहीं है । ( उ ० ) यदि ऐसी बात है तो समान रूप से हम भी कह सकते हैं कि एक ज्ञान में विषय होनेवाले दो विषयों में से एक विषय की स्मृति के न रहने की दशा में यदि दूसरे की स्मृति नहीं होती है, तो फिर यह अस्मरण ' ( या उस विषय की स्मृति का न होना ) ही उस दूसरे विषय के अभाव का साधक है । तदनुसार देवकुल को देखने की सामग्नी ( कारण समूह ) एवं देवकुल में संयोग सम्बन्ध से रहने वाले देवदत्त को देखने का कारण समूह चूँकि दोनों एक ही हैं । अतः जिस सामग्री से देवालय का स्मरण होगा, उसी सामग्री से देवदत्त का भी स्मरण होना चाहिए । इस उपपत्ति के अनुसार देवालय के दर्शन के समय यदि उसमें देवदत्त रहते तो देवकुल की स्मृति के बाद उनकी भी स्मृति अवश्य होती, क्योंकि देवकुल और देवदत्त दोनों की स्मृतियों के उत्पादक कारण-समूह समान रूप के हैं । किन्तु देवकुल की स्मृति होने पर भी देवदत्त का स्मरण For Private And Personal
पृष्ठ 627
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ५५२ न्यायकन्दली उसके वासिक दोनों के विरोध का सामना करना पड़ेगा? For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ज्ञान से उत्पन्न होनेवाला संस्कारों में दृढ़ता अधिक और जिन पदों के संस्कार प्रसङ्ग मेंभी कोई अनुपपत्ति न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-स्मर्यते, तस्मान्नासीद् देवदत्तः, तदस्मरणस्य प्रकारान्तरेणासम्भवादिति समानम् ।
श्लोकस्य तु पदान्युच्चारणानुरोधात् क्रमेण पठ्यन्ते, नंकज्ञानसंसर्गीणि । तेषु
यत्र तु बहुतरः संस्कारो जातस्तत् स्मर्यते, नापरमिति नास्त्यनुपपत्तिः । एवमुपलभ्यमानस्यापि वस्तुनो यत् प्राक्तनाभावज्ञानं प्रागिदमिह नासीदिति ज्ञानम्, तदपि प्रतियोगिनः प्राक्तनास्तित्वे स्मर्यमाणे तत्सत्तास्मृत्य -भावादनुमानम् । ये तु स्मृत्यभावमप्यभावं प्रमाणमाचक्षते तेषाम् " अभावोऽपि प्रमाणा-भावः " इति भाष्यविरोधः, " प्रमाणपञ्चकं यत्र वस्तुरूपे न जायते " इत्यादिवात्र्तिकविरोधश्चेत्यलं बहुना । ये पुनरेवमाहुः - अभावरूपस्य प्रमेयस्याभावान्न साध्वी तस्य प्रमाण-चिन्तेति । त इदं प्रष्टव्याः - नास्तीति संविदः किमालम्बनम्? यदि न किञ्चित्? नहीं होता है, अतः उस समय देवकुल में देवदत्त नहीं थे, क्योंकि उस समय देवकुल में देवदत्त के अभाव के बिना उसकी उपपत्ति नहीं हो सकती । किसी श्लोक के एक अंश की स्मृति और दूसरे अंश की देवदत्त की उक्त अस्मृति की स्थिति ही भिन्न है, क्योंकि श्लोक के प्रत्येक पद अलग अलग पढ़े जाते हैं, एवं उनके ज्ञान भी अलग अलग क्रमशः ही उत्पन्न होते हैं, अत: श्लोक रूप वाक्य के कोई भी अनेक अंश एक ज्ञान के द्वारा गृहीत नहीं होते । सुतराम् श्लोक के प्रत्येक पद के संस्कार अलग अलग । इन संस्कारों में से जिन पदों के होती है, उनके द्वारा उन पदों का स्मरण होता जाता है, दुर्बल होते हैं, उनका स्मरण नहीं होता है । अतः श्लोक के नहीं है । इसी प्रकार वर्तमान काल में जिस वस्तु को उपलब्धि है, उसके पूर्वकालिक अभाव की जो इस आकार की प्रतीति होती है कि ' यह पहिले नहीं था, वह ( प्रतीति ) भी अनुमान ही है । क्योंकि इस अभाव के प्रतियोगी का पूर्वकालिक अस्तित्व के स्मृत होने पर भी अधिकरण में उसकी सत्ता की स्मृति न होने से ही उक्त प्राक्तन अभाव की प्रतीति उत्पन्न होती है । ( मीमांसकों का ) जो सम्प्रदाय स्मृति के अभाव को भी ' अभाव ' प्रमाण मानता है, उसको " अभावोऽपि प्रमाणाभावः ' " इस शाबरभाष्य और " प्रमाणपञ्चकं यत्र " इत्यादि जो कोई यह कहते हैं कि ( प्र ० ) अभाव नाम का कोई अलग प्रमेय ही नहीं है, अतः उसके प्रमाण की बात ही अनुचित है । ( उ ० ) उनसे यह पूछना चाहिए
पृष्ठ 628
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७० www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ५५३ न्यायकन्दली For Private And Personal दत्तः स्वहस्तो निरालम्बनं विज्ञानमिच्छतां महायानिकानाम् । अथ भूतल-मालम्बनम्? कण्टकादिमत्यपि भूतले कण्टको नास्तीति संवित्तिः तत्पूर्वकश्च निःशङ्कं गमनागमनलक्षणो व्यापारो दुर्निवारः । केवलभूतलविषयं ' नास्तोति ' संवेदनम्, कण्टकसद्भावे च कैवल्यं निवृत्तमिति प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योरभाव इति चेत्? ननु किं कैवल्यं भूतलस्य स्वरूपमेव? किमुत धर्मान्तरम्? स्वरूपं तावत् कण्टकादिसंवेदनेऽप्यपरावृत्तमिति स एव प्रतिपत्तिप्रवृत्त्योरविरामो दोषः । धर्मान्तरपक्षे च तत्त्वान्तरसिद्धिः । अथ मन्यसे भाव एकाकी सद्वितीयश्चेति द्वयीमवस्थामनुभवति । तत्रैकाकीभावः स्वरूपमात्रमिति केवल इति चोच्यते तादृशस्य तस्य दृश्ये कि ' नास्ति ' इस आकार की बुद्धि का विषय ( प्रमेय ) कौन है? इस प्रश्न के उत्तर में वे यदि यह कहें कि ( प्र ० ) उस बुद्धि का कोई भी विषय नहीं है, क्योंकि उक्त भाष्य और वार्तिक दोनों ही में ' प्रत्यक्षादि पाँचों प्रमाणों को अनुत्पत्ति ' को ही ' अभाव ' प्रमाण कहा गया है । किसी के भी मत से स्मृति प्रमाण नहीं है, अतः स्मृति के किसी भी अभाव का प्रामाण्य भाष्य और वार्तिक के द्वारा अनुमोदित नहीं हो सकता । ( उ ० ) तो फिर बिना विषय के ही विज्ञान की इच्छा करनेवाले महायान के अनुयायियों को हो तरफ आप अपना हाथ बढ़ाते हैं । यदि इस प्रश्न के उत्तर में यह कहें कि ( प्र ० ) ( कण्टकाभावादि का ) भूतल रूप आश्रय ही उक्त ' नास्ति ' प्रत्यय का विषय है, ( उ ० ) तो फिर काँट प्रभृति से युक्त भूतल में भी ' कण्टको नास्ति ' इस आकार को बुद्धि होगी, जिससे कि ( निष्कण्टक भूमि की तरह ) काँटों से युक्त भूतल में भी निःशङ्क होकर आना जाना सम्भव हो जाएगा । ( प्र ० ) ' नास्ति ' इस प्रकार की उक्त बुद्धि का ' केवल ' भूतल ही विषय । फाँट के रहने पर भूतल से यह ' कैवल्य ' हट जाता है अत भूतल में काँट के न रहने पर भूतल में ' कण्टको नास्ति ' न इस ' प्रतिपत्ति ' की आपत्ति ही होती है, और न गमन और आगमन को निःशङ्क प्रवृत्ति हो हो पाती हैं । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि भूतल का यह ' कैवल्य ' भूतल स्वरूप है, या उससे भिन्न कोई दूसरा धर्म है? ( यदि पहिला पक्ष मानें तो फिर ) भूतल में कण्टकादि ज्ञान के समय भी ( भूतल स्वरूप वह ) कैवल्य है हो । अतः इस पक्ष में भी उक्त निःशङ्क प्रवृत्ति की ओर कण्टक के रहने पर भी भूतल में ' कण्टको नास्ति ' इस ज्ञान को आपत्ति रहेगी ही । यदि कैवल्य को भूतल से भिन्न कोई दूसरा धर्म मानें तो ( अभाव की तरह ) किसी दूसरे पदार्थ का मानना आवश्यक ही होगा । यदि यह कहें कि ( प्र ० भाव की दो अवस्थायें होती हैं ( १ ) एकाकी अवस्था और ( २ ) सद्वितीयावस्था | इनमें ' एकाकी ' अवस्था से युक्त भूतल ही ' स्वरूप मात्र ' कहलाता है । इस केवल भूतल में ( घटभाव के ) प्रतियोगी
पृष्ठ 629
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५५४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-न्यायकन्दलो प्रतियोगिनि प्रवर्तयतीति । घटादौ जिघृक्षिते सत्युपलब्धिर्घटाद्यभावव्यवहारं अत्रापि ब्रूमः - घटादेरभावाद् भूतलं च व्यतिरेच्यका किशब्दस्यार्थः कः समर्थतो भवद्धियों हि नास्तीति प्रतिषेधधिय आलम्बनम्? नहि विषयवैलक्षण्यमन्तरेण विलक्षणाया बुद्धेरस्त्युदयः, नापि व्यवहारभेदस्य संभवः । स्वाभाविकं यदेकत्वं भावस्य तदेवैकाकित्वमिति चेत्? किमेकत्वं प्रतियोगि-रहितत्वम्? एकत्वसंख्या वा? एकत्वसंख्या तावद् यावदाश्रयभाविनी भावस्य सद्वितीयावस्थायामप्यनुवर्तते । अथ प्रतियोगिरहितत्वं स्वाभाविकमेकत्वमुच्यते, सिद्धं प्रमेयान्तरम् । नवभाववादिनोऽपि भूतल ग्रहणमभावप्रतीतिकारणम्, अप्रतीते भूतले तत्राभावप्रतीतेरयोगात् । तत्र न तावत् कण्टकादिसहितभूतलोपलम्भात् कण्टको घटादि के ग्रहण की इच्छा से जब केवल भूतल की उपलब्धि होती है ( अर्थात् घटयुक्त भूतलकी उपलब्धि नहीं होती है ) तब ( भूतल की ) वही उपलब्धि भूतल में घटाभाव से व्यवहार को उत्पन्न करती है । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में भी हम लोगों का कहना है कि भूतल शब्द के साथ प्रयुक्त ' एकाकी ' शब्द का भूतल और घटाभाव को छोड़कर और कौन सा अर्थ आप लोग मानते हैं, जिसे आप ' भूतले घटो नास्ति ' इस प्रतिषेधबुद्धि का विषय कहते हैं? विषयों की विलक्षणता के बिना बुद्धियों की विलक्षणता सम्भव नहीं है । एवं बुद्धियों रूप विभिन्न व्यवहार भी सम्भव भावों में जो स्वाभाविक ' एकत्व ' है वही है । ( उ ० ) यह एकत्व ( भूतल में रहनेवाले रहना ही है? या उसमें रहनेवाली एकत्व की विभिन्नता के बिना ( शब्द प्रयोग नहीं हैं । ( प्र ० ) ( भूतलादि आश्रय रूप ) उसका एकाकित्व ( या एकाकी अवस्था ) घटाभाव के ) प्रतियोगी का ( भूतल में ) न संख्या रूप है? यदि एकत्व संख्या रूप मानें तक रहेगा तब तक — घट की घट रहने की दशा में भी तो वह एकाकित्व भूतल रूप आश्रय जब सत्ता के समय भी - भूतल में रहेगा ही ( अर्थात् भूतल में घटाभाव की प्रतीति की आपत्ति होगी ) । यदि उस स्वाभाविक एकत्व को भूतलादि में घटादि प्रतियोगियों का न रहना ही मानें, तो फिर अभाव रूप अलग स्वतन्त्र पदार्थ स्वीकृत ही हो गया । ( प्र ० ) जो सम्प्रदाय अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ मानते हैं, उनके मत से भी जब तक भूतल की प्रतीति नहीं होती, तब तक भूतल में अभाव की प्रतीति नहीं होती है । अत: उनके मत से भी भूतल की प्रतीति भूतल में अभाव प्रतीति का कारण है ही । किन्तु कण्टक सहित भूतल के ग्रहण से भूनल में ' कण्टको नास्ति ' इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है । यदि कण्टकादि के अभाव से युक्त भूतल की For Private And Personal
पृष्ठ 630
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् न्यायकन्दली नास्तीति प्रतीतिः । अभावविशिष्टभूतलग्रहणस्याभावप्रतीतिहेतुत्वे च ( भावग्रहणे ) तदभावग्रहणे तदभावविशिष्टभूतलग्रहणम्, तदभावविशिष्टाद् भूतलग्रहणाच्चा-भावग्रहणमिति स्वयमेव स्वस्य कारणमभ्युपगतं स्यात् । तस्मादभावव्यतिरिक्ता प्रतियोगि संसर्गव्यतिरेकिणी भूतलस्य त्वयापि काचिदेकाकित्वावस्थाभ्युपगन्तव्या, यस्याः प्रतीतावभावप्रतीतिः स्यात् सैवास्माकं नास्तीति व्यवहारं प्रवर्तयतीति । तदप्ययुक्तम्, भूतलस्वरूपग्रहणस्यैवाभावप्रतीतिहेतुत्वात् । न च सद्वितीय-ग्रहणेऽप्येतत्प्रतीतिप्रसङ्गः, भूतलग्रहणवदभावेन्द्रियसन्निकर्षोऽप्यभावग्रहणसामग्री, कण्टकादिसद्भावे तदभावो नास्तीति विषयेन्द्रियसन्निकर्षाभावात् सत्यपि भूतलग्रहणे नाभावप्रतीतिः । नहि चक्षुरालोकादिकमुपलम्भकारणमस्तीति यद्यत्र नास्ति तदपि तत्र प्रतीयते । तदेवं सिद्धोऽभावः । प्रतीतिको भूतल में कण्टकाभाव को प्रतीति का कारण मानें, तो यही निष्कर्ष निकलेगा कि ' भूतल में कण्टकाभाव के ग्रहण से ही कण्टकाभाव से युक्त भूतल का ग्रहण होता है ' एवं ' कण्टकाभाव विशिष्ट भूतल के ग्रहण से ही भूतल में कण्टकाभाव का ग्रहण होता है ' इन दोनों का इस अनिष्टापत्ति में पर्यवसान होगा कि ' वस्तु स्वयं ही अपना कारण हैं ' । तस्मात् आप ( अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ माननेवाले ) को भी भूतल की कोई ऐसी ' एकाकी अवस्था ' माननी ही होगी, जो कण्टकाभावादि स्वरूप न हो, एवं भूतल में कण्टक रूप प्रतियोगी की मत्त्व दशा में न रहे, जिससे भूतल में कण्टकाभाव का व्यवहार हो सके । भूतल की वही एकाकी अवस्था भूतल में कण्टकाभाव के व्यवहार का कारण होगा ( इसके लिए अभाव को स्वतन्त्र पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है | ( उ ० ) यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि केवल भूतल का ग्रहण ही भूतल में होनेवाले कण्टकाभावादि के प्रत्ययों का कारण है । ( प्र ० ) तो भूतल में कण्टकादि दूसरी वस्तुओं का प्रत्यय होता है, उस समय प्रतीतियाँ क्यों नहीं होतीं? ( उ ० ) चूँकि भूतल में कण्टकाभाव के के लिए जिस कारण समूह की अपेक्षा है, उसमें भूतल ग्रहण की साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष भी निविष्ट है । भूतल में जिस समय है, उस समय कण्टकागाव रूप विषय नहीं रहता है । अतः उस फिर जिस समय कण्टकाभावादि की प्रत्यक्ष ( ग्रहण ) तरह कण्टकाभाव के कण्टक की सत्ता रहती समय कण्टकाभाव रूप कण्टक की सत्त्व दशा विषय के साथ इन्द्रिय का संनिकर्ष सम्भव नहीं है । ( भूतल में में ) भूतल का प्रत्यक्ष रहने पर भी, कण्टकाभाव का प्रत्यक्ष नहीं होता है । यह तो सम्भव नहीं है कि प्रकाश एवं चक्षु प्रभृति प्रत्यक्ष के कारण विद्यमान हैं, केवल इसीलिए जो जहाँ नहीं भी है, उसका भी वहाँ प्रत्यक्ष हो । इस प्रकार यह सिद्ध है कि अभाव नाम का स्वतन्त्र पदार्थ अवश्य है । For Private And Personal