प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 631–640

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 631–640

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव-स च चतुर्व्यूहः - प्रागभावः प्रध्वंसाभावः, इतरेतराभाव:, अत्यन्ता-भावश्चेति । प्रागुत्पत्तेः कारणेषु कार्यस्याभाव: प्रागभावः, तत्र प्राक् कार्योत्पत्तेः पूर्वमभावो विशेषस्य प्रागभावः स चानादिरप्यनित्य:, कार्यात्पादेन तस्य विनाशात्, अविनाशे च कार्यस्योत्पत्त्यभावात् । कः प्रागभावस्य विनाश:? वस्तुत्पाद एव । निवृत्ते वस्तुनि प्रागभावोपलब्धिप्रसङ्ग इति चेत्? वस्तुवद् वस्त्ववयवानामप्यारब्धकार्याणां प्रागभावविनाशलक्षणत्वात् । उत्पन्नस्य स्वरूपप्रच्युतिः प्रध्वंसाभावः । स चोत्पत्तिमानप्यविनाशी, भावस्य पुनरनुपलम्भात् । प्रागभूतस्य पश्चाद्भाव उत्पाद:, प्रध्वंसस्य कः ( १ ) प्रागभाव, ( २ ) प्रध्वंसाभाव ( ३ ) इतरेतराभाव ( अन्योन्याभाव या भेद ) और ( ४ ) अत्यन्ताभाव, अभाव के ये चार भेद हैं । ( १ ) उत्पत्ति से पहिले ( समवायि ) कारणों में कार्य का जो अभाव रहता है वही प्रागभाव है ( प्रागभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है कि ) ' प्राक् ' अर्थात् कार्य की उत्पत्ति से पहिले ' अभाव ' अर्थात् कार्यं रूप ' विशेष ' का अभाव ही ' प्रागभाव ' है । यह अनादि होने पर भी बिनाशशील है, यदि प्रागभाव को अविनाशी मानें तो कार्य की उत्पत्ति हो न हो सकेगी । अतः ( प्रतियोगिभूत ) कार्य की उत्पत्ति से उसका विनाश मानना आवश्यक है । ( प्र ० ) प्रागभाव का विनाश कौन सी वस्तु है? ( उ ० ) प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का विनाश है । ( प्र ० ) तो फिर उस वस्तु के विनष्ट हो जाने पर उस वस्तु के प्रागभाव की फिर से उपलब्धि होनी चाहिए? ( उ ० ) ( प्रागभाव के विनाश को प्रतियोगी का उत्पत्ति स्वरूप मानने पर भी यह आपत्ति ) नहीं है क्योंकि प्रागभाव का विनाश जिस प्रकार प्रागभाव के प्रतियोगी रूप वस्तु का उत्पत्ति रूप है, उसी प्रकार उस वस्तु के कारणीभूत उन अवयवों के स्वरूप भी हैं, जिन अवयवों से कार्य की उत्पत्ति हो चुकी है । ( २ ) उत्पन्न हुए कार्य का जपने स्वरूप से हटना ही ( उसका ) ' प्रध्वंसाभाव ' है । यह अभाव उत्पत्तिशील होने पर भी विनाशशील नहीं है, क्योंकि विनष्ट हुए भाव व्यक्ति की फिर कभी उपलब्धि नहीं होती है । ( प्र ० ) पहिले से जिसका प्रागभाव रहता है, बाद में उसकी सत्ता ही उस वस्तु की उत्पत्ति कहलाती है, किन्तु प्रध्वंस का प्रागभाव कौन सी वस्तु है? ( उ ० ) प्रध्वंस के प्रतियोगिभूत वस्तु की सत्ता ही १. अर्थात् जिसकी उत्पत्ति होगी, उसका यदि प्रागभाव मानना आवश्यक हो तो प्रध्वंस का भी प्रागभाव मानना आवश्यक होगा, क्योंकि वह भी उत्पत्ति-शील है । अतः प्रश्न उठता है कि प्रध्वंस का प्रागभाव क्या है? For Private And Personal

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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली प्रकरणम् ] For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५५७ अभाव है, वही एक ही है, और प्रागभाव:? यस्यार्थस्य यः प्रध्वंसः, तस्यार्थस्य स्वरूपस्थितिरेव तत्प्रध्वंसस्य प्रागभावः । यथा वस्तुत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाश:, तथा प्रध्वंसोत्पत्तिरेव तत्प्रागभावस्य विनाशः । यदसद्भूतं तस्य कथमभाव इति न परिचोद्यम्, कारणसामर्थ्यस्यापर्यनुयोज्यत्वात् । गव्यश्वाभाव issa च गोरभाव इतरेतराभावः । स च सर्वत्रैको नित्य एव, पिण्डविनाशेऽपि सामान्यवत् पिण्डान्तरे प्रत्यभिज्ञानात् । यथा सामान्य-मदृष्टवशादुपजायमानेनैव पिण्डेन सह सम्बद्धयते, नित्यत्वं च स्वभावसिद्धम्, तथेतरेतराभावोऽपि । इयांस्तु विशेषः - पिण्डग्रहणमात्रेण सामान्यग्रहणम्, इत-तराभावग्रहणं तु प्रतियोगिसापेक्षम्, पररूपनिरूपणीयत्वात् । अत्यन्ताभावो यदसतः प्रतिषेध इति । इतरेतराभाव एवात्यन्ताभाव इति चेत्? अहो राजमार्ग एव भ्रमः? इतरेतराभावो हि स्वरूपसिद्धयोरेव उस प्रध्वंस का प्रागभाव है । जिस प्रकार प्रतियोगिभूत वस्तु की उत्पत्ति ही उसके प्रागभाव का विनाश है, उसी प्रकार प्रध्वंस की उत्पत्ति हो उसके प्रागभाव का विनाश हैं । यह अभियोग करना युक्त नहीं है कि ( प्र ० ) जो ( प्रागभाव ) स्वयं अभाव स्वरूप है, उसका अभाव कैसे निष्पन्न होगा? ( उ ० ) क्योंकि कारणों का सामर्थ्य सभी अभियोगों से बाहर है । ( ३ ) गो में अश्व का अभाव और अश्व में गो का जो ' इतरेतराभाव ' हैं । वह समवाय की तरह अपने सभी आश्रयों में नित्य भी हैं, क्योंकि आश्रयीभूत एक वस्तु के विनष्ट हो जाने पर भी उसी प्रकार की दूसरी वस्तु में उसका भान होता है । जैसे कि ( घटत्व ) सामान्य के आश्रयीभूत एक घट का नाश हो जाने पर भी दूसरे घट में उसका प्रत्यभिज्ञान होता है । एवं जिस प्रकार घटादि वस्तुओं के उत्पन्न होते ही अदृष्ट रूप कारणवश सामान्य उनके साथ सम्बद्ध हो जाता है । एवं जिस प्रकार सामान्य में नित्यत्व स्वभावतः प्राप्त है । उसी प्रकार ये सभी बातें इतरेतराभाव ( अन्योन्याभाव या भेद ) में भी समझना चाहिए । ( सामान्य और इतरेतराभाव इन दोनों में उक्त सादृश्यों के रहते हुए भी ) इतना अन्तर है कि केवल आश्रय का ज्ञान होते ही सामान्य का ज्ञान हो जाता है । किन्तु इतरे-तराभाव को समझने के लिए ( उसके आश्रय के अतिरिक्त ) उसके प्रतियोगी के ज्ञान की भी अपेक्षा होती है । क्योंकि सभी अभाव को समझने के लिए प्रतियोगी रूप दूसरी वस्तु के ज्ञान की अपेक्षा होती है । सर्वथा अविद्यमान वस्तु का जो निषेध वही ' अत्यन्ताभाव ' है । ( प्र ० ) अत्य-न्ताभाव इतरेतराभाव से भिन्न कोई वस्तु नहीं है । ( उ ० ) यह तो राजमार्ग में ही भूल होने जैसी बात है, क्योंकि जहाँ प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों की सत्ता रहती हैं, किन्तु परस्पर एक के तादात्म्य का दूसरे में निषेध किया जाता है, वहाँ इतरेतराभाव माना जाता है । किसी सिद्ध आश्रय में सर्वथा अविद्यमान किन्तु केवल बुद्धि में आरो-

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir पू ५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् तथैवैतद्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एवेति । पञ्चावयवेन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं [ गुणेऽनुमानेऽवयव-परार्थानु इसी प्रकार ' ऐतिह्य ' भी सत्य अर्थ के बोधक एवं आप्त से उच्चरित शब्द प्रमाण ही है ( फलतः अनुमान ही है ) । अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझाने के लिए ( प्रसिद्ध ) पाँच अवयव ( पञ्चावयव ) वाक्यों का प्रयोग ही ' परार्थानुमान ' है । ( अर्थात् ) न्यायकन्दली सर्वथा असद्भूतस्यैव गवाश्वयोरितरेतरात्मताप्रतिषेधः । अत्यन्ताभावे तु बुद्धा-वारोपितस्य देशकालानवच्छिन्नः प्रतिषेधः । यथा षट्पदार्थेभ्यो नान्यत् प्रमेय-मस्तीति । यदि चात्यन्ताभावो नेष्यते, षडेव पदार्था इत्ययं नियमो दुर्घटः स्यात् । ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव ' इति है ' इति निपातसमुदाय उपदेश-पारम्पर्ये वर्तते, तत्रायं स्वार्थिकः ष्यञ् प्रत्ययः, ऐतिह्यमिति । वितथमैतिह्यं तावत् प्रमाणमेव न भवति । अवितथमाप्तोपदेश एव । आप्तो-पदेशश्चानुमानम् । तस्मादवितथमैतिह्यमनुमानान्न व्यतिरिच्यते इत्यभिप्रायः । वाक्येन स्वनिश्चितार्थ-परार्थानुमानव्युत्पादनार्थमाह-- पञ्चावयवेन प्रतिपादनं परार्थानुमानमिति । प्रतिपादनीयस्यार्थस्य यावति शब्दसमूहे प्रतीतिः पर्यवस्यति, तस्य पञ्चभागाः समूहापेक्षयावयवा इत्युच्यन्ते । स्वयं साध्यानन्तरीयकत्वेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः, साध्याविनाभूतं लिङ्गम् । पित वस्तु का इस आश्रय में यह कभी किसी भी प्रदेश में नहीं है ' इस प्रकार का प्रतिषेध ही अत्यन्ताभाव है । जैसे द्रव्यादि छः पदार्थों से अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है ( इस प्रकार का प्रतिषेध अत्यन्ताभाव रूप है ) यदि अत्यन्ताभाव न मानें तो ' पदार्थ छः ही हैं ' इस प्रकार का अवधारण कठिन होगा । ' ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' ऐतिह्य ' शब्द इति है इन दोनों निपातों से स्वार्थ में ' ष्यन् ' प्रत्यय से निष्पन्न होता है । ये दोनों निपात ' परम्परा से प्राप्त उपदेश ' रूप अर्थ के बोधक हैं! अभिप्राय यह है कि जो ' ऐतिह्य ' रूप वचन ( या उपदेश ) असत्य है, वह तो प्रमाण ही नहीं है । जो ऐतिह्य प्रमा ज्ञान का उत्पादक है, वह आप्तवचन को छोड़कर औरकुछ भी नहीं है । ( यह उपपादन कर चुके हैं कि आतोपदेश अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः ऐतिह्य भी अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । ' पञ्चावयवेत वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम् ' यह वाक्य परार्था-नुमान को समझाने के लिए कहा गया है । अभीष्ट अर्थ की प्रतीति जिन शब्दों के समूह से सम्पन्न होती है, उसके पाँच खण्ड होते हैं । वाक्य के वे ही पाँच खण्ड वाक्यसमूह की अपेक्षा ( अर्थात् उक्त समूह को अवयवो मानकर ) उसके अवयव कहलाते हैं । ' स्वयं साध्यानन्तरीयकत्वेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः ' इस व्युत्पत्ति के For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् | भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली 8 तस्य पश्वावयवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रतिपत्तिजननसमर्थपञ्चावयववाक्य-प्रयोगः परार्थानुमानम् । पश्वावयवं हि वाक्यं यावत्सु रूपेषु लिङ्गस्य साध्या-विनाभावः परिसमाप्यते तावद्रूपं लिङ्गं प्रतिपादयति । तत्प्रतिपादिताच्च लिङ्गात् साध्यसिद्धिः । न वाक्यमेव साध्यं बोधयति, तस्य शाब्दत्वप्रसङ्गात् । तस्मादविनाभूतलिङ्गाभिधायकवाक्यप्रयोग एव परार्थानुमानमुच्यते । अपरे तु यत्परः शब्दः स शब्दार्थः, वाक्यं च साध्यपरम्, तत्प्रतिपाद-नार्थमस्य प्रयोगात् । लिङ्गप्रतिपादनं त्ववान्तरव्यापारः, वचनमात्रेण विप्रतिपन्नस्य साध्यप्रतीतेरभावादिति वदन्त एवं व्याचक्षते - स्वनिश्चितार्थ: साध्यः, तस्य लिङ्गप्रतिपादनमेवावान्तर व्यापारीकृत्य पञ्चावयवेन वाक्येन प्रतिपादनं तत्प्रति-पादकवाक्यप्रयोगः परार्थानुमानमिति । स्वोक्तं विवृणोति - पञ्चावयवेनैवेत्यादिना । द्वयवयवमेव वाक्य-अनुसार साध्य की व्याप्ति से युक्त वस्तु हो ( प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त ) ' स्वनिश्चित ' शब्द का अर्थ है । उस ( स्वनिश्चित अर्थ रूप साध्यव्याप्त हेतु ) का पञ्चावयव वाक्य के द्वारा जो ' प्रतिपादन अर्थात् साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु विषयक बोध के उत्पादन में क्षम पञ्चावयव वाक्य का प्रयोग, वही ' परार्थानुमान ' है । जिन धर्मों के द्वारा हेतु में साध्य की व्याप्ति पूर्ण रूप से समझी जाती है, उन धर्मों से युक्त हेतु का ही प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से होता है । पञ्चावयत्र वाक्य के द्वारा प्रतिपादित उक्त हेतु से ही साध्य का बोध ( अनुमिति ) होता है, साक्षात् पञ्चावयव वाक्य से साध्य की अनुमिति नहीं होती है, यदि ऐसी बात हो तो साध्य का उक्त बोध अनुमिति न होकर शाब्दबोध हो जाएगा । अतः साध्य को व्याप्ति से युक्त हेतु के बोधक पञ्चावयव वाक्यों के प्रयोग को ही ' परार्थानुमान ' कहा जाता है । दूसरे सम्प्रदाय के कुछ लोग कहते हैं कि जिस विषय को समझाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया जाता है, वही विषय उस शब्द को अर्थ होता है । पञ्चा-वयव वाक्य साध्य को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होता है, अतः साध्य हो पञ्चावयव वाक्य रूप शब्द का प्रतिपाद्य अर्थ है । चूंकि केवल पञ्चावयव रूप वाक्य के प्रयोग से भ्रान्त व्यक्ति को साध्य का बोध नहीं होता है, अतः मध्यवर्ती व्यापार के रूप में ( साध्यव्याप्य हेतु का ज्ञान ) आवश्यक होता है । ये लोग प्रकृत वाक्य की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि साध्य ही प्रकृत ' स्वनिश्चितार्थ ' शब्द से अभिप्रेत है । इसी ' साध्य ' का प्रतिपादन पञ्चावयव वाक्य से ( मुख्यतः ) होता है । इतना अवश्य है कि इस काम के लिए उसे साध्यव्याप्यहेतुज्ञान को बीच का व्यापार मानना पड़ता है । अतः साध्य के ज्ञापक पञ्चावयव वाक्यों का प्रयोग ही ' परार्थानुमान ' है । ' पञ्चावयबेनैव वाक्येन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा भाष्यकार ने अपने ' पञ्चावयवेन वाक्येन ' इत्यादि अपनी ही पङ्क्ति की व्याख्या की हैं । किसी सम्प्रदाय के लोग For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-प्रशस्तपादभाष्यम् मानम् ॥ पञ्चावयवेनैव वाक्येन संशयितविपर्यस्ताव्युत्पन्नानां परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानं विज्ञेयम् । अपने निश्चित अर्थ विषयक संशय या विपर्यय अथवा अव्युत्पत्ति से युक्त पुरुषों को पञ्चावयव वाक्य के द्वारा ही उस अर्थ को समझाने के लिए उक्त ( अपने निश्चित ) अर्थ का पञ्चावयव वाक्य के द्वारा ) प्रतिपादन ही ' परार्थानुमान ' समझना चाहिये । न्यायकन्दली मित्येके । त्र्यवयवमित्यपरे । तत्प्रतिषेधार्थमेव कारकरणम् – पञ्चावयवेनैवेति । प्रतिपाद्येऽर्थे यस्य संशयोऽस्ति स संशयितः यस्य विपर्ययज्ञानं स विपरीतः, यस्य न संशयो न विपर्ययः किन्तु स्वज्ञानमात्रं सोऽव्युत्पन्नः, प्रतिपादनार्हाः, तत्त्वप्रतीतिविरहात् । यो यानि पदानि समुदितानि प्रयुङ्क्ते स तत्पदार्थ संसर्गप्रतिपादनाभि-प्रायवानिति सामान्येन स्वात्मनि नियमे प्रतीते पश्चात् पदसमूहप्रयोगाद् वक्तुस्त-त्पदार्थ संसर्गप्रतिपादनाभिप्रायावगतिद्वारेण पदेभ्यो वाक्यार्थानुमानं न तु पदार्थे-भ्यस्तत्प्रतीतिः । नहि पदार्थो नाम प्रमाणान्तरमस्ति मीमांसकानाम् । नापि वाक्यार्थप्रतिपादनाय पदैः प्रत्येकमभिधीयमानानां पदार्थानां वाक्यार्थप्रतिपादन-दो ही अवयव मानते हैं । अन्य सम्प्रदाय के लोग तीन अवयव मानते हैं । इन दोनों मतों का खण्डन करने के लिए ही ' एवकार ' से युक्त ' पञ्चावयवेनैव ' यह वाक्य लिखा गया है । प्रतिपादन के लिए अभिप्रेत अर्थ में जिसे संशय रहता है, वही पुरुष प्रकृत में ' संशयित ' शब्द का अर्थ है । एवं जिसे उक्त अर्थ का विपर्यय रहता है, वहो व्यक्ति विपरीत ( या ' विपर्यस्त ' शब्द का अर्थ ) है । जिस पुरुष को प्रकृत अर्थ का न संशय ही है, न विपर्यय ही, केवल स्वज्ञान ही है, वही पुरुष प्रकृत में अव्युत्पन्न शब्द का अर्थ है । इन तीन प्रकार के पुरुषों को ही विषयों का समझना उचित है, क्योंकि इन्हें साध्य का तत्त्व ज्ञात नहीं रहता है । ' जो पुरुष जिन अनेक पदों का साथ साथ प्रयोग करता है उसका यह अभिप्राय भी अवश्य ही रहता है, कि उनमें से प्रत्येक पद का अर्थ परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हो । अपने स्वयं इस नियम को समझने के बाद ही पद समूह ( रूप ) वाक्य के प्रयोग से वक्ता का यह अभिप्राय ज्ञात होता है कि वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के अर्थ परस्पर सम्बद्ध होकर ज्ञात हों । वक्ता के इस अभिप्राय विषयक ज्ञान के द्वारा पदों से ही वाक्यार्थ का ज्ञान होता है, पद के अर्थों से वाक्यार्थ की प्रतीति नहीं होती है, क्योंकि मीमांसकों के मत में भी पदार्थ नाम का कोई प्रमाण नहीं है । यह कहना भी सम्भव नही है कि ( प्र ० ) वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद के द्वारा उपस्थित सभी For Private And Personal

पृष्ठ 636

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] शक्तिराविर्भवति, भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली प्रमेयप्रतीतिमात्रव्यापारस्य ५६१ प्रमाणस्य प्रमेयशक्त्याधाय-कत्वाभावात् । तस्मात् पदार्था वाक्यार्थं प्रतिपादयन्तो लिङ्गत्वेन वा प्रतिपाद-येयुरन्यथानुपपत्त्या वा, उभयथाऽप्यशाब्दो वाक्यार्थः स्यात् । ननु किं पदानि प्रत्येकमेकैकमर्थं प्रतिपादयन्ति वाक्यार्थस्य लिङ्गम्? किं वा परस्परान्वितं स्वाथं बोधयन्ति? अत्रके तावदाहु: - व्युत्पत्त्यपेक्षया पदानामर्थ प्रतिपादनम् । व्युत्पत्तिश्च गामानय गां बधानेत्यादिषु वृद्धव्यवहारेषु क्रियान्वितेषु कारकेषु, कारकान्वितायां वा क्रियायाम्, न स्वरूपमात्रे । अतः परस्परान्विता एव पदार्थाः पदैः प्रतिपाद्यन्त इति । अत्र निरूप्यते - यदि गामानयेत्यादिवाक्ये गामिति पदेनैवानयेत्य-र्थान्वितः स्वार्थोऽभिहितस्तदानयेतिपदं व्यर्थम् उक्तार्थत्वात् । आनयेतिपदेना-नयनार्थेऽभिहिते सत्यानयेत्यर्थान्वितः स्वार्थी गोपदेनाभिधीयते, तेनानयेति पदस्य अर्थों में उन पदों से शक्ति उत्पन्न होती है के ज्ञान को उत्पन्न करे, वाक्यार्थ विषयक विशिष्ट बोध के लिए एक विशेष प्रकार की । ( उ ० ) क्योंकि प्रमाण का इतना ही काम है कि वह प्रमेय उसमें यह सामर्थ्य नहीं है कि प्रमेय में अपने ज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति को भी उत्पन्न करे । तस्मात् पदों के अर्थ लिङ्ग बनकर वाक्यार्थ का प्रतिपादन करे या अन्यथानुपपत्ति के द्वारा दोनों ही प्रकार से यह निश्चित है कि ( इस पक्ष में ) शब्द के द्वारा वाक्यार्थ की उपस्थिति नहीं मानी जा सकती । ( प्र ० वाक्य में प्रयुक्त ) प्रत्येक पद अलग २ अपने अपने अर्थों का प्रतिपादन करते हुए वाक्यार्थ के ज्ञापक हेतु हैं? अथवा वे पद परस्पर अन्वित होकर वाक्यार्थ विषयक ज्ञान को उत्पन्न करते हैं? इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के ( अन्विताभिधानवादी ) लोगों का कहना है कि व्युत्पत्ति ( शक्ति या अभिधावृत्ति ) के सहारे ही पदों से अर्थं का प्रतिपादन होता है । यह व्युत्पत्ति ' गामानय, गां बन्धय ' इत्यादि स्थलों में वृद्धों के व्यवहार से गृहीत होती देखी जाती है । वृद्ध के इन व्यवहारों से क्रियाओं के साथ अन्वित कारकों में या कारकों के साथ अन्वित क्रियाओं में ही पदों की शक्ति ( व्युत्पत्ति ) गृहीत होती है, केवल कारकों में या केवल क्रियाओं में नहीं । अतः परस्पर अन्वित अर्थ ही पदों के द्वारा प्रतिपादित होते हैं । ( अर्थात् इतरान्वित स्वार्थ में ही पदों की शक्ति है, केवल स्वार्थ में नहीं ) इस प्रसङ्ग में हम ( अभिहितान्वयवादी ) लोग यह विचार करते हैं कि यदि ' गामानय ' इस वाक्य में प्रयुक्त केवल ' गाम् ' यह पद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित गो रूप अपने अर्थ को समझाता है, तो फिर आनय ' पद के प्रयोग का क्या प्रयोजन? उसका आनयन रूप अर्थ तो ' गाम् ' पद से ही कथित हो जाता है । ( प्र ० ) ' आन ' पद से आनयन रूप अर्थ के कथित होने के बाद ही आनयन रूप अर्थ में अन्वित गो रूप के स्वार्थ का प्रतिपादन ' गो ' शब्द से होता है, अतः उक्त वाक्य में ' आन ' ७१ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-न्यायकन्दली न वैयर्थ्यमिति चेत्? तह्यनियेति पदं केवलं स्वार्थमात्रमाचक्षाणमनन्विता-भिधायि प्राप्तम् । यथा चेदमनन्वितार्थं तथा पदान्तरमपि स्यादिति दत्तजलाञ्जलि-रन्विताभिधानवादः । यदानयेति पदेनापि पूर्वपदाभिहितेनार्थेनान्वितः स्वार्थी -ऽभिधीयते, तदा यावत् पूर्वपदं स्वाथं नाभिधत्ते तावदुत्तरपदस्य पूर्वपदार्थान्वित-स्वार्थाभिधानं नास्ति । यावच्चोत्तरपदं स्वार्थं नाभिधत्ते तावत् पूर्वपदस्यो. त्तरपदार्थान्वितस्वार्थप्रतिपादनं न भवतीत्यन्योन्याश्रयत्वम् । अथ मन्यसे-प्रथमं पदानि केवलं पदार्थ स्मारयन्ति, पश्चादितरेतरस्मारितेनार्थेनान्वितं स्वार्थमभिदधतीति ततो नेतरेतराश्रयत्वम् । तदप्यसारम्, सर्वदेव हि पदान्य-न्वितेन पदार्थेन सह गृहीतसाहचर्याणि नानन्वितं केवलं पदार्थमात्रं स्मारयितु-मीशते, यथानुभवं स्मरणस्य प्रवृत्तेः । वृद्धव्यवहा रेष्वन्वयव्यतिरेकाभ्यां गो-पद का प्रयोग व्यर्थ नहीं है । ( उ ० ) तो फिर इससे यह निष्कर्ष निकला कि ' आनय ' पद से ( दूसरे अर्थ में अनन्वित ) केवल ' आनयन ' रूप स्वार्थ का ही बोध होता है । अतः यह कहना सुलभ हो जाएगा कि जिस प्रकार ' आनय ' पद से केवल ( इतरानन्दित ) स्वार्थ का बोध होता है, उसी प्रकार गो प्रभृति अन्य पदों से भी केवल स्वार्थ का बोध हो सकता है, इस प्रकार तो अन्विताभिधान को जलाञ्जलि ही मिल जाएगी । इस पर यदि यह कहें कि ( प्र ० ) पूर्वपद ( गाम् इस पद ) से अभिहित अर्थ के साथ अन्वित ही आनयन रूप अर्थ का अभिधान आनयन पद से होता है । ( उ ० ) तो यह भी मानना पड़ेगा कि जब तक ' आनय ' रूप उत्तर पद से आनयन रूप अर्थ का अभिधान नहीं होता है, तब तक ' गाम् ' इस पूर्वपद से उत्तरपद के अर्थ में अन्वित स्वार्थ का बोध नहीं हो सकता । इस प्रकार इस पक्ष में अन्योन्याश्रय दोष अनिवार्य है । यदि यह मानते हों कि ( प्र ० पहिले पदों से उनके केवल ( इतरानन्वित ) अर्थों का ही स्मरण होता है, उसके बाद स्मरण किये गये अर्थों में से एक दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन पद ही करते हैं । अतः उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है । ( उ ० ) इस उत्तर में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि ( आपके मत से ) दूसरे अर्थ के साथ अनन्वित केवल अपने अर्थ का पद से स्मरण हो हो नहीं सकता, क्योंकि दूसरे पदों के अर्थों के साथ अन्वित अपने अर्थों के साथ ही सभी पदों का सामानाधिकरण्य गृहीत है । एवं अनुभव के अनुरूप ही स्मृति की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) ( इतरान्वित अर्थ में शक्ति मानने पर भी ) पदों से ( इतरानन्वित ) केवल अर्थ का स्मरण हो सकता है, क्योंकि वृद्धों के व्यवहारों के द्वारा गो शब्द का ककुदादि से युक्त अर्थों के साथ ही अन्वय और व्यतिरेक गृहीत है, उसके साथ अन्वित होनेवाले आन-यनादि क्रियाओं के साथ या दण्डादि करणों के साथ नहीं, क्योंकि ककुदादि से युक्त अर्थ में ही उन क्रियाओं या करणादि के न रहने पर भी ( दूसरी क्रियाओं या कर-For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 638 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५६३ शब्दस्य ककुदादिमदर्थं नियमो गृहीतो न क्रियाकरणादिष्विति तेषां प्रत्येकं व्यभिचारेऽपि गोशब्दस्य प्रयोगदर्शनात् । तेनायं गोशब्दः श्रूयमाणोऽभ्यासपाटवाद-व्यभिचरितसाहचर्यं ककुदादिमदर्थमात्रं स्मारयति न क्रियाकरणादीनीति चेत्? एवं तहि यस्य शब्दस्य यत्रार्थे साहचर्यनियमो गृह्यते तत्रैव तस्याभिधायकत्वं नान्यत्रेत्यनन्विताभिधानेऽपि समानम् । न च स्मरणमनुमानवत् साह-चर्य नियमपेक्ष्य प्रवर्तत इत्यपि सुप्रतीतम्, तद्धि संस्कारमात्र निबन्धनं प्रति-योगमा दर्शनादपि भवति । तथाहि – धूमदर्शनादग्निरिव रसवत्यादिप्रदेशोऽपि स्मर्यते, तद् यदि गोशब्दः सहभावप्रतीतिमात्रेणैव गोपिण्डं स्मारयति, गोपिण्ड-प्रतियोगिनोऽपि पदार्थान् कदाचित् स्मारयेत् । नियमेन तु गोपिण्डमेव स्मार-यंस्तद्विषयं वाचकत्वमेवावलम्बते, तथासत्येव नियमसम्भवात् । किञ्च यथा वाक्ये पदानामन्विताभिधानं तथा पदेऽपि प्रकृतिप्रत्यययोरन्विताभिधानमिच्छन्ति णादि के साथ अन्वित होनेवाले ) ककुदादि से युक्त अर्थ को समझाने के लिए गो शब्द का प्रयोग देखा जाता है । इस प्रकार सुना गया यह गो शब्द बार बार प्रयुक्त होने से प्राप्त पटुता के कारण ककुदादि से युक्त जिस अर्थ के साथ उसका व्यभिचार कभी उपलब्ध नहीं होता है, केवल उसी अर्थ का स्मरण करा सकता है, क्रियाओं का या करणादि अर्थों का नहीं, क्योंकि उनके साथ गो शब्द का कभी प्रयोग होता है कभी नहीं । ( उ ० ) तब तो समान रूप से अनन्विताभिधानवादी की ही तरह यह कहिए कि " जिस अर्थ को समझाने के लिए जिस शब्द का प्रयोग नियम से होता है, केवल उसी अर्थ में उस शब्द की शक्ति है " । दूसरी बात यह है कि जिस प्रकार अनुमान के द्वारा उसी अर्थ का ग्रहण होता है, जिसका साहचर्य हेतु में नियमतः गृहीत होता है । उस प्रकार स्मृति को साहचर्य नियम की अपेक्षा नहीं होती है, क्योंकि वह तो केवल संस्कार से उत्पन्न होनेवाली वस्तु है, अतः साहचर्य के किसी एक सम्बन्धी को देखने पर भी उत्पन्न हो कती है । जैसे कि धूम के देखने से वह्नि का स्मरण होता है, उसी तर वह्नि के आश्रय महानसादि प्रदेशों का भी स्मरण होता है । इस प्रकार गो शब्द से ककुदादि से युक्त गोरूप अर्थ का स्मरण यदि इस लिए मानेंगे कि गो शब्द का सामानाधिकरण्य उक्त गो रूप अर्थ के साथ है, तो फिर गो शब्द से कदाचित् ( वह्नि के आश्रयभूत महानसादि की तरह ) गो के आश्रयीभूत गोष्ठादि का भी स्मरण हो सकता है । ' गो पद से नियमतः गोपिण्ड का ही स्मरण हो, इसके लिए किसी भी दूसरी रीति से गो पिण्ड में गो शब्द को शक्ति को हो हेतु मानना पड़ेगा, क्योंकि उस नियम की उपपत्ति किसी दूसरी रीति से सम्भव नहीं है । दूसरी यह भी बात है कि जिस प्रकार वाक्य में प्रयुक्त प्रत्येक पद की शक्ति दूसरे अर्थ में अन्वित स्वार्थ में ही मानने की इच्छा आप लोगों की है, उसी प्रकार यह भी आप लोगों का अभिप्रेत होगा कि पद के शरीर में प्रयुक्त होनेवाले प्रकृति और प्रत्यय रूप दोनों अंशों में से प्रत्येक For Private And Personal

पृष्ठ 639

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणेऽनुमानेऽवयव-भवन्तः, ताभ्यां चेत् परस्परान्वितः स्वार्थोऽभिहित: कस्तदन्यः पदार्थो यः पदेन पश्चात् स्मर्यते? तदेतदास्तां नग्नाटकपक्षपतितं वचः । प्रकृतमनुसरामः - अस्त्वेवं पदानामर्थप्रतिपादनम्, इदं तु न सङ्गच्छते परार्थानुमानमिति । लिङ्गं तज्जनितं वा ज्ञानमनुमानम् । न च लिङ्गस्य ज्ञानस्य च परार्थत्वम् । अनुमानवाचकस्य शब्दस्य परार्थत्वादनुमानं परार्थ-मुच्यते चेत् प्रत्यक्षवाचकस्यापि शब्दस्य परार्थत्वात् प्रत्यक्षमपि परार्थमुच्येत?

तदुक्तम्-ज्ञानाद् वा ज्ञानहेतोर्वा नान्यस्यास्त्यनुमानता ।

तयोश्च न परार्थत्वं प्रसिद्धं लोकवेदयोः ॥

वचनस्य परार्थत्वादनुमानपरार्थता 1 प्रत्यक्षस्यापि पारार्थ्यं तद्द्वारं किं न कल्प्यते ॥ इति । दूसरे अर्थ के साथ अन्वित हो अपने स्वार्थ का अभिधायक होगा । यदि प्रकृति और प्रत्यय ये दोनों ही एक दूसरे के साथ अन्वित अपने अर्थ का प्रतिपादन कर ही देते हैं, तो फिर कौन सा विलक्षण अर्थ समझने को अवशिष्ट रहता है, जिसका स्मरण पीछे पद के द्वारा होता है? व्यर्थ बातों की यह प्रक्रिया अब यहीं तक रहे । अब फिर प्रकृत विषय का अनुसरण करते हैं । ( प्र ० ) मान लिया कि पदों से अर्थों का प्रतिपादन उसी ( अभिहितान्वयवादियों की ) रीति से होता है, किन्तु यह समझ में नहीं आता कि अनुमान ' परार्थ ' किस प्रकार है? क्योंकि हेतु या पञ्चावयव-वाक्य जनित हेतु का ज्ञान इन दोनों में से ही कोई ' अनुमान ' है । इनमें से न लिङ्ग ही परार्थ है, न लिङ्ग का ज्ञान हो । यदि यह कहें कि ( उ ० ) उक्त लिङ्ग या लिङ्ग ज्ञान के वाचक ( पञ्चावयव के ) शब्द चूँकि परार्थ हैं ( अर्थात् दूसरे को समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं ) अतः हेतु या हेतुज्ञान रूप अनुमान को भी परार्थ कहा जाता है । ( प्र ० ) तो फिर प्रत्यक्ष के अभिधायक शब्द का भी प्रयोग तो दूसरे को समझाने के लिए ही किया जाता है । अत: प्रत्यक्ष भी ' परार्थ ' होगा । जैसा कहा गया है कि-( १ ) हेतु का ज्ञान या हेतु इन दोनों से भिन्न कोई अनुमान नहीं हो सकता । इन दोनों की परार्थता न लोक में ही प्रसिद्ध है न वेद में ही । ( २ ) यदि हेतु के ज्ञापक या हेतु ज्ञान के अभिलापक वाक्य दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त होते हैं, इस हेतु से लिङ्ग या लिङ्गज्ञान रूप अनुमान परार्थ हैं, तो फिर प्रत्यक्ष प्रमाण के बोधक वाक्य भी तो दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होते हैं, इस हेतु से ( अनुमान की तरह ) प्रत्यक्ष को भी परार्थ क्यों नहीं मानते? For Private And Personal

पृष्ठ 640

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५६५ अवयवाः पुनः प्रशस्तपादभाष्यम् प्रतिज्ञापदेश निदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः । ये अवयव ( १ ) प्रतिज्ञा, ( ) अपदेश ( हेतु ), ( ३ ) निदर्शन ( उदाहरण ), ( ४ ) अनुसंधान ( उपनय ) और ( ५ ) प्रत्याम्नाय ( निगमन ) भेद से पाँच प्रकार के हैं । न्यायकन्दली अत्र समाधिः- न शब्दस्य परार्थत्वात् तद्द्वारमनुमानप | रार्थ्यमिति वदामः, अपि तु यत् परार्थं पञ्चावयवं वाक्यं तल्लिङ्गप्रतीतिद्वारेणानुमितिहेतु-त्वादनुमानमिति ब्रूमः । नन्वेवमपि लिङ्गप्रतिपादकस्य प्रत्यक्षस्यानुमानता-वतारप्रसङ्गः? न प्रसङ्गस्तत्र लौकिकशब्दप्रयोगाभावात् । पश्चावयवं वाक्यमित्युक्तम् । के पुनस्ते पश्चावयवाः तत्राह अवयवाः पुनः प्रतिज्ञापदेशनिदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नायाः । पुनः शब्दो वाक्यालङ्कारे, तत्र तेषां मध्येऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा । एतत् स्वयमेव विवृणोति - प्रतिपिपादयिषितेत्यादिना । प्रतिपादयितुमिष्टो यो धर्मस्तेन ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का यह समाधान है कि इस युक्ति से हम अनुमान को परार्थ नहीं मानते कि सामान्यतः सभी शब्द दूसरों को समझाने के लिए ही प्रयुक्त होते हैं, अतः अपने उपस्थापक या ज्ञापक पञ्चावयववाक्य रूप शब्द के द्वारा हेतु वा हेतु ज्ञान रूप अनुमान भी पराथं है, किन्तु ( हम लोगों का यह कहना है कि ) चूंकि परार्थ ( दूसरों को समझाने के लिए प्रयुक्त ) जो पञ्चावयव वाक्य वह अपने द्वारा उपस्थित उपयुक्त हेतु के द्वारा या अपने से उत्पन्न हेतु के ज्ञान द्वारा ही अनुमिति का कारण है, अतः अनुमान परार्थ है । ( प्र ० ) इस प्रकार तो जहाँ हेतु का ज्ञान प्रत्यक्ष के ज्ञापक शब्द के द्वारा उत्पन्न होगा, वहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण भी ( परार्थ ) अनुमान होगा? ( उ ० > यह आपत्ति नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलों में कहीं भी शब्दों का प्रयोग लोक में नहीं देखा जाता है । यह कहा गया है कि परार्थानुमान के उत्पादक महावाक्य के पाँच अवयव हैं । किन्तु वे पाँच अवयव कोन कौन हैं? इस प्रश्न का समाधान ' अवयवाः पुनः प्रतिज्ञा-पदेश निदर्शनानुसन्धानप्रत्याम्नाया । ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । इस वाक्य में ' पुनः ' शब्द का प्रयोग केवल वाक्य को अलङ्कृत करने के लिए है । ' तत्र ' अर्थात् उन पाँचों अवयवों में प्रतिज्ञा का यह लक्षण किया गया है, ' अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ' । ' प्रतिपिपादयिषित ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा प्रतिज्ञा के उस ( अपने ) लक्षण वाक्य की हो For Private And Personal