प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 641–650
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 641–650
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-प्रशस्तपादभाष्यम् प्रतिपिपादयिषितधर्मविशिष्टस्य तत्रानुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा । धर्मिणोपदेश विषय मापादयितुमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा । इनमें ' अनुमेय ' का अर्थात् अनुमान के लिए अभिप्रेत विषय का प्रतिपादक वह वाक्य ही ' प्रतिज्ञा ' है, जिसका और किसा भी प्रमाण से विरोध न रहे । ( विशदार्थ यह है कि ) जिस धर्म ( साध्य ) का प्रतिपादन पक्ष में अभिप्रेत हो उस धर्म ( साध्य ) से युक्त धर्मी ( पक्ष ) ही अनुमेय है । ( साध्य से युक्त उस ) धर्मी पक्ष ) में हेतु के सम्बन्ध को दिखलाने के लिए प्रयुक्त ( साध्य से युक्त पक्ष के बोधक ) वाक्य ही ' प्रतिज्ञा ' है । न्यायकन्दली विशिष्टो धर्मी अनुमेय: पक्ष इति कथ्यते । तस्य यदुद्देशमात्रं सङ्कीर्तनमात्रं साधनरहितं सा प्रतिज्ञेति । यथोपदिशन्ति सन्तः--" वचनस्य प्रतिज्ञात्वं तदर्थस्य च पक्षता " इति । यदि हेतुरहितमुद्देशमात्रं प्रतिज्ञा नैव तस्याः असाधनाङ्गत्वान्न प्रयोगमर्हति । यथा वदन्ति तथागताः --शक्तस्य सूचकं हेतुर्वचोऽशक्तमपि स्वयम् । साध्याभिधानात् पक्षोक्तिः पारम्पर्येण नाप्यलम् ॥ इति । साध्यसिद्धिरस्तीति तत्राह - अपदेशविषयमापादयितुमिति । अपदेशो हेतुस्तस्य विषय-माश्रयमापादयितुं प्रतिपादयितुं प्रतिज्ञाने ', ( न ) खलु यत्र क्वचन साध्यसाधनाय व्याख्या भाष्यकार स्वयं करते हैं । जिस धर्म ( वस्तु ) का प्रतिपादन ( पञ्चावयव वाक्य के प्रयोक्ता को ) अभिप्रेत हो उस धर्म से युक्त धर्मी ही ' अनुमेय ' या ' पक्ष ' कहलाता है | उसका जो ' उद्देशमात्र ' केवल कथन अर्थात् हेतु वाक्य के सांनिध्य से रहित वाक्य का प्रयोग ही ' प्रतिज्ञा ' है । जैसा कि विद्वानों का कहना है कि " उक्त वाक्य ही प्रतिज्ञा है और प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा कथित अर्थ हो पक्ष है " । ( प्र ० ) यदि हेतु वाक्य से सर्वथा असम्बद्ध केवल पक्ष का बोधक वाक्य ही प्रतिज्ञा है, तो फिर साध्य सिद्धि का उपयोगी अङ्ग न होने से उसका प्रयोग ही उचित नहीं है । जैसा कि तथागत के अनुयायियों का कहना है कि - हेतु ही साध्य का ज्ञापक हैं । ( केवल प्रतिज्ञा रूप ) वचन में साध्य को समझाने का सामर्थ्य नहीं है, अतः परम्परा से साध्य को उपस्थित करने के कारण भी प्रतिज्ञा अनुमान का अङ्ग नहीं है । इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' अपदेश विषयमापादयितुम् ' यह वाक्य लिखा गया है । ' अपदेश ' शब्द का अर्थ है ' हेतु ' उसका ' विषय ' अर्थात् आश्रय के ' आपादन ' के लिए १. मुद्रित पुस्तक में यहाँ न्यायकन्दली का पाठ है ' अपदेशी हतुः तस्य विषय माश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञाने यत्र क्वचन सध्यसाधनाय हेतुः प्रयुज्यते तस्य सिद्धत्वात्, अपि च कस्मिश्चिर्द्धामणि प्रतिनियते " इसमें ' यत्र क्वचन ' इत्यादि का उत्तर वाक्य में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५६७ हेतुः प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात् अपि तु कस्मिश्चिद्धमणि प्रतिनियते, तस्मिन्न-नुपन्यस्यमाने निराश्रयो हेतुर्न प्रवर्तेत । तस्याप्रवृत्तौ न साध्यसिद्धिरतः प्रतिज्ञया धर्मग्राहकं प्रमाणमुपदर्शयन्त्या हेतोराश्रयो धर्मी सन्निधाप्यते, इत्या-श्रयोपदर्शनद्वारेण हेतुं प्रवर्तयन्ती प्रतिज्ञा साध्यसिद्धेरङ्गम् । तथा च न्याय-भाष्यम् – " असत्यां प्रतिज्ञायामनाथया हेत्वादयो न प्रवर्तेरन् " इति । उपनयादेव तोराश्रयः प्रतीयत इति चेन्न, असति प्रतिज्ञावचने तस्याप्यप्रवृत्तेः । उपनयः साधनस्य पक्षधर्मतालक्षणं सामर्थ्यमुपदर्शयति । न प्रत्येतुः प्रथममेव साधनं प्रत्याकाङ्क्षा, किन्तु साध्ये, तस्य प्रधानत्वात् । आकाङ्क्षिते साध्ये अर्थात प्रतिपादन के लिए ही प्रतिज्ञा वाक्य का उपयोग है । अभिप्राय यह है कि जिस किसी आश्रय में साध्य के साधन के लिए हेतु का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि सामान्यतः किसी स्थान में साध्य तो सिद्ध है हीं, अतः किसी विशेष धर्मों में साध्य-सिद्धि के लिए ही हेतु का प्रयोग होता है ( जहाँ पहिले से साध्य सिद्ध नहीं है और वहाँ साध्य का साधन इष्ट है ) वह ( विशेष प्रकार का धर्मी ) यदि प्रतिपादित न हो तो फिर बिना आश्रय ( विषय ) के होने के कारण हेतु की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । हेतु की प्रवृत्ति के बिना साध्य को सिद्धि भी न हो सकेगी । अतः प्रतिज्ञा पक्ष रूप धर्मी के ज्ञापक प्रमाण को उपस्थित करती हुई हेतु के आश्रय रूप धर्मी को उसके समीप आती है । इस आश्रय के प्रदर्शन के द्वारा ही हेतु की प्रवृत्ति में निमित्त होने के कारण प्रतिज्ञा भी साध्य - सिद्धि का उपयोगी अङ्ग है । जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है कि ' यदि प्रतिज्ञा न रहे तो फिर हेतु प्रभृति अवयवों की प्रवृत्ति ही न हो सकेगी ' | ( प्र ० ) उपनय से ही हेतु के उस आश्रय ( विषय ) की प्रतीति होगी? ( उ ० ) प्रतिज्ञा के न रहने पर उपनय की भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि हेतु के पक्षधर्मता - रूप सामर्थ्य का प्रदर्शन ही उपनय का काम है । किन्तु साध्य के प्रधान होने के कारण ज्ञाता पुरुष को पहिले साध्य के प्रसङ्ग में हो जिज्ञासा होती है, साधन के सामर्थ्य के प्रसङ्ग में नहीं 4 । एक ' न ' कार का रहना आवश्यक हैं । एवं पूर्ववाक्य के अन्त भी प्रतिज्ञाया उपयोगः ' इस अर्थ को समझाने के लिए भी कोई शब्द चाहिए । प्रकृत ग्रन्थ में जो ' प्रतिज्ञाने ' शब्द है, उसका भी कुछ ठीक अर्थ नहीं बैठता है । अतः यह तय करना पड़ा कि ' प्रतिज्ञाने ' इस पद में ' ए ' कार प्रमाद से लिखा गया है । अवशिष्ट ' प्रतिज्ञान ' भी एक शब्द नहीं है, किन्तु ' प्रतिज्ञा ' और ' न ' ये दो अलग शब्द हैं । जिनमें पहिला पहिले वाक्य के अन्त में और दूसरा दूसरे वाक्य के आदि में मान लिया गया है । तदनुसार प्रकृत पाठ इस प्रकार निष्पन्न होता है ' अपदेशो हेतु:, तस्य विषयमाश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञा । न खलु यत्र क्वचन साध्यसाधनाय हेतु: प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात् । अपि तु कस्मिंश्चिद्धमिणि प्रतिनियते " इसी पाठ के अनुसार अनुवाद किया गया है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणेऽनुमानेऽवयव-तत्सिद्धयर्थं पश्चात् साधनमाकाङ्क्षते, तदनु साधनसामर्थ्यमिति प्रथमं साध्यवचनमेवोपतिष्ठते, न पुनरग्रत एव साधनसामर्थ्यमुच्यते, तस्य तदानी -मनपेक्षितत्वात् । प्रतिपिपादयिषितेन धर्मेण विशिष्टो धर्मीति विप्रतिषिद्धमिदम् अप्रती-तस्याविशेषकत्वादिति चेत्? सत्यम्, अप्रतीतं विशेषणं न भवति, प्रतीतस्तु साध्यो धर्मः सपक्षे विप्रतिपन्नं प्रति ज्ञापनाय धर्मिविशेषणतया प्रतिज्ञायते । अत एव धर्मिणः पक्षता वास्तवी, तस्य स्वरूपेण सिद्धस्यापि प्रतिपाद्यधर्म-विशिष्टत्वेनाप्रसिद्धस्य तेन रूपेण आपाद्यमानत्वसम्भवात् पक्षधर्मतापि हेतोरित्थमेव, यदि केवलमेवानित्यत्वं साध्यते भवेच्छब्दधर्मस्य । कृतकत्वस्या-पक्षधर्मता, शब्दे एव त्वनित्ये साध्ये नायं दोषः । यथाहुराचार्याः -साध्य की आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाने पर फिर साध्य की सिद्धि के लिए साधन और उसके प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा जागती है, बाद में साधन के ( पक्षधर्मतादि ) सामर्थ्य के प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा उठती है । अतः पहिले प्रतिज्ञा रूप साध्य वचन की ही उपस्थिति उचित होती है । यह नहीं होता कि पहिले ( उपनय के द्वारा ) साधन के सामर्थ्य का ही प्रदर्शन हो, क्योंकि उस समय उसकी अपेक्षा ही नहीं है: ( प्र ० ) धर्मी का यह लक्षण ठीक नहीं मालूम पड़ता कि जिस धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो, उस धर्म रूप विशेषण से युक्त ही धर्मी ' ( या पक्ष ) है, क्योंकि ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं कि एक ही वस्तु प्रतिपादन के लिए अभीष्ट भी हो, एवं वही ( अप्रतिपादित ) वस्तु विशेषण भी हो, क्योंकि विशेषण के लिए यह आवश्यक है कि वह पहले से ज्ञात हो ( पहिले से ज्ञात वस्तु कभी प्रतिपाद्य नहीं हो सकता ) यह ठीक है कि विशेषण को ( स्व से युक्त धर्मी के ( 30 ) ज्ञान से ) पहिले ज्ञात होना ही चाहिए | किन्तु प्रकृत में भी तो साध्य ही रहता है । सपक्ष में ज्ञात साध्य के रूप धर्मपहिले से सपक्ष ( इष्टान्त ) में ज्ञात प्रसङ्ग मेंजिस पुरुष को पक्ष में विप्रतिपत्ति है उसे समझाने के लिए ही साध्यरूप विशेषण से युक्त धर्मी का निर्देश प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा कियो जाता है | चूँकि ( पर्वतत्वादि ) अपने स्वरूप से सिद्ध रहने पर भी प्रतिपाद्य ( वह्नि प्रभृति ) साध्य रूप धर्म से युक्त होकर वह पहिले से प्रसिद्ध नहीं है, अतः उस रूप से पक्ष का प्रतिदन सम्भव है । इसी कारण धर्मी का पक्ष होना ( धर्मी को पक्षता ) वास्तविक है ( काल्पनिक नहीं ) । इसी प्रकार हेतु की पक्षता भी ठीक ही है, क्योंकि ( शब्दोऽनित्यः कृतकत्वात्, घटादिवत् - इत्यादि स्थलों में ) यदि केवल अनित्यत्व का ही साधन करें तो शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में पक्षधमंता नहीं रह सकेगी, किन्तु अनित्यत्व से युक्त को हो यदि साध्य मान लेते हैं, तो फिर उक्त ( कृतकत्व हेतु में अपक्षधर्मत्व रूप ) दोष की आपत्ति नहीं होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि--For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७२ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ५६६ न्यायकन्दली स एव चोभयात्मायं गम्यो गमक एव च । असिद्धेनैकदेशेन गम्यः सिद्धो न बोधकः ॥ इति । For Private And Personal प्रतिज्ञाया उदाहरणमाह -- द्रव्यं वायुरिति । यो वायुं प्रतिपद्यमानोऽपि तस्य द्रव्यत्वं न प्रतिपद्यते, तं प्रति साधयितुमिष्टेन द्रव्यत्वेन विशिष्टस्य वायोरभिधानं प्रतिज्ञा क्रियते द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणस्य तात्पर्यं कथयति --- अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्वशास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्तीति । वादिना साधयितुमभिप्रेतोऽर्थः साध्य इत्युच्यते । प्रत्य-क्षादिविरुद्धोऽपि कदाचिदनेन भ्रमात् साधयितुमिष्यते, तद् यद्यविशेषेणानुमेयोद्देशः प्रतिज्ञेत्येतावन्मात्रमुच्यते, प्रत्यक्षादिविरुद्धमपि वचनं प्रतिज्ञा स्यात् । न चेयं प्रतिज्ञा, तदर्थस्य साधयितुमशक्यत्वात्, अतोऽविरोधिग्रहणं कृतम् । न विद्यते प्रत्यक्षादि.. धर्मी के दो भेद हैं, पहिला है साध्य रूप धर्म से युक्त, जो पक्ष कहलाता है । दूसरा है केवल धर्मी, जो ' धर्मी ' ही कहलाता है । इनमें पहिला ( पहिले से सिद्ध न होने के कारण ) ' गम्य ' है अर्थात् साध्य है । दूसरा ' गमक ' अर्थात् ( अपने ज्ञान के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा ) ' गमक ' अर्थात साध्य ज्ञान का कारण है । अर्थात् धर्मी के दो स्वरूप हैं, एक साध्य से सम्बद्धवाला, दूसरा केवल अपने स्वरूपवाला, इनमें पहिले स्वरूप से वह ' गम्य ' अर्थात् साध्य है, ( क्योंकि उस रूप से पहिले वह सिद्ध नहीं है ) दूसरे स्वरूप से वह ' गमक ' अर्थात् स्वज्ञान के द्वारा अथवा पक्षधर्मता सम्पादन के द्वारा साधक है । ' द्रव्यं वायु: ' इस वाक्य के द्वारा प्रतिज्ञा का उदाहरण कहा गया है । जो व्यक्ति वायु को समझता है, किन्तु उसे द्रव्य नहीं समझता, उसको वायु में द्रव्यत्व को समझाना अभिप्रेत है । उसके लिए द्रव्यत्व से युक्त वायु को समझाने के लिए ' द्रव्यं वायु ' ऐसी प्रतिज्ञा की जाती है । ' अविरोधिग्रहणात्प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगत स्वशास्त्रस्ववचनविरो-घिनो निरस्ता भवन्ति ' इस वाक्य के द्वारा ( प्रतिज्ञा के लक्षण वाक्य में ) ' अविरोधि ' शब्द के प्रयोग का हेतु दिखलाया गया है । वादी को जिस वस्तु का साधन अभिप्रेत होता है, उसे ' साध्य ' कहते हैं । ऐसे भी वादी हैं जो भ्रान्ति से वशीभूत होकर प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाधित अर्थों के साधन के लिए भी प्रवृत्त हो जाते हैं । ऐसी स्थिति में यदि सामान्य रूप से ' अनुमेयोद्देशः प्रतिज्ञा ' ( अर्थात् अनुमेय के बोधक सभी वाक्य प्रतिज्ञा हैं ) ऐसा ही प्रतिज्ञा का लक्षण किया जाय, तो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से विरुद्ध ( ' वह्निरनुष्णः ' इत्यादि ) वाक्य भी प्रतिज्ञा हो जाएँगे, किन्तु उस प्रकार के वाक्य प्रतिज्ञा नहीं हैं, क्योंकि उनके द्वारा कथित विषय का साधन सम्भव नहीं है । अतः ऐसे वाक्यों में प्रतिज्ञात्व के निराकरण के लिए ही भाष्यकार ने प्रतिज्ञा लक्षण में ' अविरोधि '
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-यथा द्रव्यं वायुरिति । अविरोधिग्रहणात् प्रत्यक्षानुमानाभ्युपगतस्व-शास्त्रस्ववचनविरोधिनो निरस्ता भवन्ति । यथाऽनुष्णोऽग्निरिति प्रत्यक्ष-जैसे ' द्रव्यं वायुः ' इत्यादि वाक्य । ( प्रतिज्ञा के लक्षणवाक्य में ) ' अविरोधि ' पद के देने से ( १ ) प्रत्यक्षविरुद्ध, ( २ ) अनुमानविरुद्ध, ( ३ ) आगमविरुद्ध, ( ४ ) स्वशास्त्रविरोधी एवं ( ५ ) स्ववचनविरोधी उक्त प्रकार के वाक्यों में प्रतिज्ञा लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण होता है । ( इनमें ) प्रत्यक्षविरोधी वाक्य का उदाहरण है ' अनुष्णोऽग्निः ' । न्यायकन्दली विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्य असावप्रत्यक्षादिविरोधस्तस्य वचनं प्रतिज्ञा, यस्य तद्विरोधोऽस्ति न सा प्रतिज्ञेत्यर्थः । किमनेनोक्तं भवति? न वाद्यभिप्राय-मात्रेण साध्यता, किं तु यत् साधनमर्हति तत् साध्यम्, स एव पक्षस्तदितर: पक्षाभास इति । प्रत्यक्षादिविरोधोदाहरणं यथा - अनुष्णोऽग्निरिति । अनुष्ण इत्युष्ण-स्पर्शप्रतिषेधोऽयम् । अवगतं च प्रतिषिध्यते नानवगतम् । न चोष्णत्वस्य वह्नेरन्यत्रोपलम्भसम्भवः, वह्नावपि तस्य प्रतीतिर्नानुमानिकी, प्रत्यक्षाभावे अनुमानस्याप्रवृत्तेः । प्रत्यक्ष प्रतीतस्य च प्रतिषेधे प्रत्यक्षप्रामाण्याभ्युपगमेन पद का उपादान किया है । ' अनुमेपोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा ' प्रतिज्ञा के इस लक्षण वाक्यमें ' प्रयुक्त ' अविरोधि ' पद का विवरण इस प्रकार है कि ' न विद्यते ( प्रत्यक्षादि ) विरोधो यस्यानुमेयोद्देशस्यासावप्रत्यक्षादिविरोधी, तस्य वचनं प्रतिज्ञा ' तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ है कि जिस ' अनुमेयोद्देश ' में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध न रहे उसके बोधक वाक्य हो प्रतिज्ञा है, अर्थात् जिस अनुमेथोद्देश में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विरोध रहे उसका बोधक वाक्य प्रतिज्ञा नहीं है । ( प्र ० ) इससे क्या निष्पन्न हुआ? ( उ ० ) यही कि साधन के लिए वादी के अभिप्रेत होने से ही कोई विषय साध्य नहीं हो जाता । साध्य वही है जिसका साधन करना सम्भव हो, वही साध्य पक्ष भी है, तद्भिन्न को अर्थात् प्रत्यक्षादि विरोध के कारण जिसका सांधन सम्भव न हो उसे ' पक्षाभास ' कहते हैं । ' अनुष्णो वह्निः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्षादि प्रमाणों के विरोधी प्रतिज्ञा-वाक्यों के उदाहरण दिखलाये गये हैं । प्रकृत में ' अनुष्ण ' शब्द उष्णस्पर्श के प्रतिषेध का बोधक है ( उष्णस्पर्श विरोधी शीतस्पर्श का नहीं ) । ज्ञात वस्तु का ही प्रतिषेध भी किया जाता है, अज्ञात वस्तु का नहीं । एवं उष्णता की प्रतीति वह्नि को छोड़ और कहीं सम्भव नहीं है । वह्नि में उष्णता की प्रतीति अनुमान से तब तक नहीं हो सकती, जब तक वह्नि में उष्णता को प्रत्यक्षवेद्य न मान लिया जाय, क्योंकि बिना प्रत्यक्ष के अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती है । प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होने योग्य वस्तु के प्रतिषेध के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली प्रवर्तमानं प्रतिषेधानुमानं तद्विपरीतवृत्ति तेनैव ५७१ बाध्यते, विषयापहारात् । को विषयस्यापहारः? तद्विपरीतार्थप्रवेदनम्, तस्मिन् सत्यनुमानस्य किं भवति? उत्पत्त्यभाव, प्रथमप्रवृत्तेनाबाधित विषय प्रत्यक्षेण वरुणत्वे प्रतिपा-दिते तत्प्रतीत्यवरुद्धे च तस्यानुष्णत्वप्रतीतिर्न भवति । हेतोरप्ययमेव बाधो यदयमनुष्णत्वप्रतिपादनाय प्रयुक्तः, तत्प्रतीति न करोति, प्रत्यक्षविरोधात् । यथोक्तम् -वैपरीत्यपरिच्छेदे नावकाशः परस्य तु । मूले तस्य ह्यनुत्पन्ने पूर्वेण विषयो हृतः ॥ इति । बाधाविनाभावयोविरोधादविनाभूतस्य बाधानुपपत्तिरिति चेत्? यदि त्रैरूप्यमविनाभावोऽभिमत:? तदास्त्येवाविनाभूतस्य बाधः यथानुष्णोऽग्निः लिए उस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य स्वीकार कर ही लिया जाता है, अतः उक्त स्वीकृति से प्रवृत्त होनेवाले वह्नि में उष्णता के प्रतिषेध का अनुमान उस प्रत्यक्ष से ही बाधित हो जाता है, जो प्रकृत प्रतिषेध के विरोधी उष्णता का ज्ञापक है । क्योंकि इस प्रत्यक्ष के द्वारा अनुमान के विषय रूपी उष्णता के प्रतिषेध का अपहरण कर लिया जाता है । ( प्र ० ) विषय का यह ' अपहरण ' क्या वस्तु है? ( उ ० ) प्रकृत अनुमान के द्वारा ज्ञाप्य विषय के विरोधी विषय का ज्ञापन ही प्रकृत में विषय का अपहरण है | ( प्र ० ) इस विषयापहरण से अनुमान के ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है? ( उ ० ) यही कि उसकी उत्पत्ति ही नहीं हो पाती, किन्तु उष्णता के बोधक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति अनुष्णत्व के अनुमान से पहिले होती है, उसका विषय उष्णत्व किसी दूसरे प्रमाण से बाधित भी नहीं है, अतः इस प्रत्यक्ष के द्वारा जब बह्नि में उष्णता की प्रतिपत्ति हो जाती है, उसके बाद उस प्रत्यश्च के द्वारा ज्ञात वह्नि में अनुष्णता की प्रतीति नहीं होती है । हेतु में बाघ की प्रतीति का भी यही रहस्य है कि वह्नि में अनुष्णत्व को समझाने के लिए प्रयुक्त होने पर भी इस प्रत्यअविरोध के कारण वह्नि में उष्णता की प्रतीति का उत्पादन नहीं कर सकता । जैसा कहा गया है कि विपरीत ( अभाव ) विषयक निश्चय के उत्पन्न हो जाने पर उसके विरोधी के ज्ञान का अवकाश नहीं रह जाता, क्योंकि उसके उत्पन्न होने के पहिले ही पहिले के प्रमाण से उसके विषय का अपहरण हो जाता है । ( प्र ० ) साध्य की व्याप्ति और साध्य का अभाव ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः साध्य का व्याप्य हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता । ( उ ० ) व्याप्ति या अवि-नाभाव को यदि हेतु में ( पक्षसत्त्व, सपक्ष सत्त्व और विपक्षासत्त्व इन ) तीनों रूपों का रहना समझें, जो फिर इन तीनों रूपों के रहने पर भी हेतु में ' बाध ' रह ही सकता है, क्योंकि ' अग्निरनुष्णः कृतकत्वात् ' इस स्थल में कृतकत्व रूप हेतु में उक्त तीनों रूप हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५७२ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-विरोधी, धनमम्बरमित्यनुमानविरोधी, ब्राह्मणेन सुरा पेयेस्यागम-अनुमानविरोधी प्रतिज्ञावाक्य का उदाहरण है ' घनमम्बरम् ' | ' ब्राह्मणेन सुरा पेया ' यह वाक्य आगमप्रमाण से विरुद्ध है । वैशेषिकशास्त्र को मानने-न्यायकन्दली कृतकत्वादित्यस्यैव | अथाबाधितविषयत्वे सति त्रैरूप्यमविनाभाव इत्यभि-प्रायेणोच्यते-- अविनाभूतस्य नास्ति बाधेति, तदोमित्युच्यते । किन्त्वबाधित-विषयत्वमेव रूपं कथयितुं प्रत्यक्षाद्यविरोधिग्रहणं कृतम् । प्रत्यक्षविरोधः किं पक्षस्य दोषः? किं वा हेतो:? न पक्षस्य, धर्मिण-स्तादवस्थ्यात् । नापि हेतोः, स्वविषये तस्य सामर्थ्यात् विषयान्तरे सर्वस्यैवा-सामर्थ्यात् । किन्तु प्रतिपादयितुरिदं दूषणम्, योऽविषये साधनं प्रयुङ्क्ते । यदि प्रतिज्ञातार्थप्रतीतियोग्यताविरहस्तत्प्रतिपादनम्? योग्यताविरहश्च दूषण-मभिमतम्? तदा कर्मकरणयोरप्यस्ति दोषः । घनमम्बरमित्यनुमानविरोधी । येन प्रमाणेनाकाशमवगतं तेनैवाका-शस्य नित्यत्वं निरवयवत्वं च प्रतिपादितम्, अतो निविडावयवमम्बर मिति प्रतिज्ञा धर्मग्राहकानुमानविरुद्धा । ( क्योंकि कृतकत्व वह्नि में है और वायु में भी है एवं आकाश में नहीं हैं ) और अग्निरूप पक्ष में अनुष्णत्वरूप साध्य का अभाव स्वरूप बाध भी है । यदि जो हेतु बाधित न होकर पक्ष सत्त्वादि तीनों रूपों से युक्त हो उन हेतु को ही साध्य का व्याप्य या अविनाभूत मान-कर यह कहते हों कि व्याप्ति से युक्त हेतु कभी बाधित नहीं हो सकता, तो हम इस के उत्तर में ' हाँ ' कहेंगे ( अर्थात इस प्रकार का हेतु कभी बाधित नहीं होता ) किन्तु व्याप्ति के लिए जिम अवाधितत्व या अबाधितविषयत्व को आप प्रयोजक मानते हैं, हेतु में उस अबाधितविषयत्व की सत्ता की आवश्यकता को समझाने के लिए ही प्रतिज्ञालक्षण में ' अविरोधि ' पद का उपादान किया गया है । यह ' प्रत्यक्ष विरोध ' किसका दोष है? पक्ष का या हेतु का? पक्ष का दोष तो वह हों नहीं सकता, क्योंकि पक्ष तो ज्यों का त्यों रहता है । हेतु का भी वह दोष नहीं हो सकता क्योंकि अपने ( व्यापक ) साध्य रूप विषय के ज्ञापन की क्षमता तो उस है हो? दूसरे हेतु के साध्य को समझाने की क्षमता तो किसी भी हेतु में नहीं होती । अतः यह प्रत्यक्षादि विरोध रूप दोष वस्तुतः प्रयोग करनेवाले पुरुष का है, जो ऐसे साध्य के ज्ञापन के लिए ऐसे हेतु का प्रयोग करता है, जिस साध्य के ज्ञापन की क्षमता जिस हेतु में नहीं होती है । घ'नमम्बरमित्यनुमानविरोधी ' जिस प्रमाण से आकाश के अस्तित्व का ज्ञान होता है, उसी प्रमाण से उसमें नित्यत्व एवं अवयवशुन्यत्व भी निश्चित है, अत: ' आकाश के अवयव घन हैं, अर्थात् परस्पर निविड़ संयोग से युक्त है, यह प्रतिज्ञा आकाश रूप धर्मी के ज्ञापक अनुमान के ही विरुद्ध है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५७३ विरोधी, वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी, न शब्दो -S र्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । वाले यदि ' सत्कार्यम् ' इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह स्वशास्त्र-विरोधी प्रतिज्ञा होगी । यदि कोई इस प्रतिज्ञा वाक्य का प्रयोग करे कि ' शब्दो नार्थप्रत्यायकः ' तो यह स्ववचनविरोधी प्रतिज्ञा होगी । न्यायकन्दली ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी । ब्राह्मणस्य सुरा पीता पापसाधनं न भवतीति प्रतिज्ञार्थः । अत्र क्षीरमुदाहरणम् क्षीरस्य च पापसाधनत्वा-भावः श्रुतिस्मृत्यागमैकसमधिगम्यः । येनैवागमेन क्षीरपानस्य पापसाधनत्वाभावः प्रतिपादितः तेनैव सुरापानस्य पापसाधनत्वं प्रतिपादितमिति ब्राह्मणेन सुरा पेयेति प्रतिज्ञाया दृष्टान्तग्राहकप्रमाणविरोधः । वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी । वैशेषिको हि वैशेषिकशास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेन वादादिषु प्रवर्तते । तस्य ' प्रागुत्पादात् सत् कार्यम् ' इति ब्रुवतः प्रतिज्ञायाः शास्त्रेण विरोधः, वैशेषिकशास्त्रे ' असदुत्पद्यते इति प्रतिपादनात् । शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । यदि शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं नास्ति तदा ' शब्दो नार्थं प्रतिपादयति ' इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनाय शब्दप्रयोगो-' ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी ' | ' ब्राह्मणेन सुरा पेया ' इस प्रतिज्ञा वाक्य का यह अर्थ है कि ब्राह्मण के द्वारा पी गयी सुरा ( मद्य ) पाप का कारण नहीं होती । इसका उदाहरण है दूध । ( अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया दूध पाप का कारण नहीं है, उसी प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया मद्य भी पाप का कारण नहीं है ) ' दूध स्वपान के द्वारा पाप का साधन नहीं है ' यह क ेवल श्रुति एवं स्मृति रूप ' आगम प्रमाण से ही समझा जा सकता है | आगम के द्वारा ही ' दूध का पीना पाप का कारण नहीं है ' यह कहा गया है, एवं आगम ( शब्द ) प्रमाण से ही यह निश्चित है कि सुरापान पाप का साधन है ' इस प्रकार ' ब्राह्मण को सुरापान करना चाहिए ' यह प्रतिज्ञा दुग्धपान रूप अपने दृष्टान्त के ज्ञापक प्रमाण का विरोधी है । ' वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी ' वैशेषिक दर्शन के अनुयायी वैशेषिक दर्शन रूप शास्त्र को प्रमाण मान कर ही वादादि कथाओं में प्रवृत्त होते हैं । वे यदि इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें कि ' कार्य अपनी उत्पत्ति के पहिले भी विद्यमान हो रहता है ' तो उनकी यह प्रतिज्ञा वैशेषिक दर्शन रूप अपने शास्त्र के ही विरुद्ध होगी, क्योंकि वैशेषिकदर्शन में यह प्रतिपादन किया गया है कि ' पहिले से अविद्यमान कार्य की ही उत्पत्ति होती है ' । ' शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी ' शब्द से यदि अर्थ का बोध ही नहीं होता है, तो फिर ' शब्द अर्थ का बोध का कारण नहीं है ' इस अर्थ को समझाने के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५७४ न्यायकन्दलीसंबलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्याय कन्दली [ गुणेऽनुमानेऽवयव-S नुपपन्नः । अथैतदर्थः शब्दः प्रयुज्यते? तदभ्युपगतं शब्दस्यार्थप्रतिपादकत्वमिति प्रतिज्ञायाः स्ववचनविरोधः । प्रत्यक्षानुमानावगतवस्तुतत्त्वान्वाख्यानं शास्त्रम् । तद्विरोधः प्रत्यक्षानु-मानविरोध एव तथा तद्भावभावित्वानुमानसमधिगम्यं शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं प्रतिषेधयतोऽनुमानविरुद्धेव प्रतिज्ञा, कस्मात् स्वशास्त्रवचनविरोधयोः पृथग-भिधानम्? अत्रोच्यते-- प्रमाणाभासमूलमपि शास्त्रं भवति शाक्यादीनाम् अत्र बौद्धस्य ' सर्वमक्षणिकम् ' इति प्रतिजानतः स्वशास्त्रविरोध एव न प्रमाणविरोधः । स्ववचनम् ( अपि ) कदाचिदप्रमाणमूलमपि स्यात्, अतस्तद्विरोधो न प्रमाणविरोध:, किन्तु स्ववचनविरोध एव । लिए ' शब्दो नार्थप्रत्यायक: ' इस वाक्य का भी प्रयोग करना उचित नहीं होगा । यदि उक्त अर्थ को समझाने के लिए उक्त वाक्य का प्रयोग वादी करते हैं, यो फिर वादी शब्द को अर्थबोध का कारण स्वयं मान ही लेते हैं । इस प्रकार उक्त प्रतिज्ञा स्ववचन विरोधी है ( क्योंकि वादो अपने अभीष्ट अर्थ को समझाने के लिए शब्दों का प्रयोग भी करें, और शब्द को अर्थप्रत्यायक भी न मानें ये दोनों बातें नहीं हो सकतीं ) । ( प्र ० ) प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा निर्णीत तत्त्व का ही ' अन्वाख्यान ' अर्थात् पश्चात् कथन तो शास्त्र ' है, अतः शास्त्र का विरोध वस्तुतः प्रत्यक्ष और अनुमान का ही विरोध है । एवं शब्द में अर्थबोध की कारणता इस अनुमान के द्वारा ही निश्चित होती है कि ' चूँकि शब्दप्रयोग के ' भाव ' अर्थात् सत्ता के कारण हो अर्थबोध की सत्ता देखी जाती है, अतः शब्द ही अर्थ का बोधक है ' सुतराम् शब्द में अर्थबोध के निषेध करनेवाले पुरुष की शब्दो नार्थप्रत्यायकः ' यह प्रतिज्ञा भी वस्तुतः अनुमान के हो विरुद्ध है । ( इस प्रकार स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध ये दोनों ही प्रत्यक्ष विरोध या अनुमानविरोध में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं ) उनका अलग से परिगगन क्यों? ( उ ० ) इस आक्षेप के उत्तर में हम लोग कहते हैं कि सभी शास्त्र प्रमाणमुलक ही नहीं होते, ऐसे भी शास्त्र हैं जिनका अनुमोदन प्रमाण से नहीं किया जा सकता, जैसे कि बौद्धों के आगम हैं । अतः बौद्ध यदि ' सभी वस्तुयें अक्षणिक हैं ' इस आशय के प्रतिज्ञा-वाक्य का प्रयोग करें तो वह प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विरुद्ध नहीं होगी, किन्तु उसमे ' स्वशास्त्र विरोध ' ही होगा । इसी प्रकार स्ववचन भी कभी कभी अप्र-माणमूलक होता है । ऐसे स्थलों की प्रतिज्ञा में प्रमाणविरोध तो होगा नहीं, स्ववचन विरोध ही होगा ( अतः स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध का अलग से उल्लेख किया गया है ) । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् III लिङ्गवचनमपदेशः । यदनुमेयेन सहचरितं तत्समान-जातीये सर्वत्र सामान्येन प्रसिद्धं तद्विपरीते च सर्वस्मिन्नसदेव तल्लिङ्ग-हेतुबोधक वाक्य ही ' अपदेश ' है । ( विशदार्थ ) जो अनुमेय ( पक्ष ) में साध्य के साथ रहे एवं सभी तत्सजातीयों में अर्थात् सभी दृष्टान्तों में सामान्य रूप से ( साध्य के साथ ) ज्ञात हो, एवं उसके विपरीत अर्थात् सभी विपक्षों में जो कदापि न रहे उसे ' लिङ्ग ' अर्थात् हेतु कहा गया है, न्यायकन्दली लिङ्गवचनमपदेशः । अस्यार्थं कथयति - यदनुमेयेनेत्यादिना । तत्सु-गमम् । उदाहरणमाह- क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वाच्चेति । द्रव्यं वायुरिति प्रति-ज्ञायाः क्रियावत्त्वादिति क्रियावत्त्वस्य लिङ्गस्य वचनमपदेशः, तस्यामेव प्रति-ज्ञायां गुणवत्त्वस्य लिङ्गस्य गुणवत्त्वादिति वचनमपदेशः, तयोरुपन्यासः सप-क्षैकदेशवृत्तेः सपक्षव्यापकस्य च हेतुत्वप्रदर्शनार्थः । यदुक्तं लिङ्गलक्षणं तत् क्रियावत्त्वस्य गुणवत्त्वस्य चास्तीत्याह - तथा च तदिति । तद् गुणवत्त्वमनु-मेयेऽस्ति तत्समानजातीये सपक्षे द्रव्ये सर्वस्मिन्नस्ति, असर्वस्मिन् सपक्षैकदेशे मूर्तद्रव्यमात्रे क्रियावत्त्वमस्ति, उभयमप्येतत् क्रियावत्त्वं गुणवत्त्वं चाद्रव्ये विपक्षे ' यनुमेयेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' लिङ्गवचनमपदेश: ' इस वाक्य का अर्थ स्वयं कहते है । इस ( स्वपदवर्णन रूप भाष्य ) का अर्थ सुगम है । क्रियावत्त्वाद् गुण-वस्वाच्च ' इस वाक्य के द्वारा ' अपदेश ' रूप दूसरे अवयव का उदाहरण दिखलाया गया है । ( प्रतिज्ञा प्रन्थ में उल्लिखित ) ' द्रव्यं वायुः ' इस प्रतिज्ञा के ही ' क्रियावत्त्व ' रूप हेतु का प्रतिपादक ' क्रियावत्त्वात् ' इस वाक्य का प्रयोग हो प्रकृत में ' अपदेश ' है । उसी प्रतिज्ञा में ' गुणवत्वात् ' इस वाक्य के द्वारा गुणवत्त्व रूप लिङ्ग का जो निर्देश किया गया है वह वचन भी ' अपदेश ' है । इन दोनों हेतुओं का निर्देश इस विशेष को समझाने के लिए किया गया है कि कुछ ही सपक्षों में रहने वाला भी ' हेतु ' है ( जैसे कि क्रियावस्व रूप हेतु पृथिवी प्रभृति कुछ सपक्षों में ही है सभी सपक्षों में नहीं, क्योंकि आकाशादि पक्षों में क्रियावत्त्व नहीं है ) एवं कुछ ऐसे भी हेतु होते हैं जो सभी सपक्षों में रहते हैं, जैसे कि प्रकृत ' गुणवत्त्व ' हेतु ( क्योंकि वह सभी द्रव्यों में है ) । ' तथा च तदनुमेयेऽस्ति ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहते हैं कि लिङ्ग के जितने भी लक्षण कहे गये हैं, वे सभी क्रिया-वत्त्व और गुणवत्त्व रूप दोनों हेतुओं में हैं । ' तत् ' अर्थात् गुणवत्त्व और क्रियावत्त्व रूप दोनों हेतु अनुमेय में अर्थात् वायु रूप पक्ष में हैं । इनमें गुणवत्त्व हेतु ' सर्वस्मिन् ' अर्थात् द्रव्य रूप सभी सपक्षों में है । और ' क्रियावत्त्व ' रूप हेतु ' असर्वस्मिन् ' अर्थात् ' सपक्षैकदेश ' में अर्थात् मूर्त्तद्रव्य रूप कुछ ही सपक्षों में है । किन्तु गुणवत्त्व और क्रियावत्त्व रूप दोनों हेतु ' अद्रव्य ' अर्थात् विपक्षों में द्रव्य से भिन्न सभी पदार्थों में कभी भी नहीं For Private And Personal