प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 651–660
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 651–660
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५७६ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास--प्रशस्तपादभाष्यम् मुक्तम्, तस्य वचनमपदेशः: यथा क्रियावच्त्वाद् गुणवत्चाच्चेति, तथा च तदनुमेयेऽस्ति तत्समानजातीये च सर्वस्मिन् गुणवत्त्वम सर्वस्मिन् क्रियावत्त्वम् । उभयमप्येतदद्रव्ये नास्त्येव । तस्मात् तस्य वचनमपदेश इति सिद्धम् । भवति । एतेनासिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितवचनानामनपदेशत्वमुक्तं इस प्रकार के हेतु का प्रतिपादक वाक्य ही ' अपदेश ' है । जैसे कि ( ' द्रव्यं वायुः ’ इस प्रतिज्ञा के उपयुक्त ) क्रियावत्त्वात् गुणवत्त्वाच्च ' ये वाक्य । इनमें गुणवत्त्व हेतु तो वायुरूप द्रव्य में भी है, एवं और सभी द्रव्यों में है । क्रियावत्त्व हेतु वायु में रहने पर भी ( एवं सभी द्रव्यों में न रहने पर भी ) मूर्त्तद्रव्यों में तो है ही । किन्तु ये दोनों ही विपक्षीभूत सभी अद्रव्य पदार्थों में नहीं हैं, अतः इससे सिद्ध होता है कि चूंकि ये दोनों ही हेतु के उक्त लक्षणों से युक्त हैं, अतः इनके बोधक उक्त वाक्य ' अपदेश ' हैं 1 इससे ( अर्थात् हेतु के अनुमेयसम्बद्धत्वादि लक्षणों के कहने से ) ( १ ) असिद्ध, ( २ ) विरुद्ध, ( ३ ) सन्दिग्ध, ( ४ ) अनध्यवसित ( हेत्वाभासों में ) अन-पदेशत्व अर्थात् हेत्वाभासत्व कथित हो जाता है । इनमें ( १ ) उभयासिद्ध, ( २ ) न्यायकन्दली नास्त्येव तस्योभयस्य वचनं क्रियावत्त्वाद् गुणवत्त्वादित्येवं रूपमपदेश इति हेतुरिति सिद्धं व्यवस्थितं निर्दोषत्वात् । एतेन अपदेशलक्षणकथनेन अर्थादसिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितवचना-नामनपदेशत्वमुक्तं भवति । अनुमेयेन सहचरितमित्यनेनासिद्धवचनस्यान पदेशत्व-हैं । अतः इससे सिद्ध होता है कि इन दोनों के बोधक क्रियावत्त्वात् ' और ' गुणवत्त्वात् ' इस आकार के दोनों वाक्य ' अपदेश ' हैं, अर्थात् हेतु रूप अवयव हैं, क्योंकि इस निर्णय में कोई दोष नहीं है । ' एतेन ' अर्थात् अपदेश के ' अनुमेयेन सहचरितम् ' इत्यादि लक्षण के कहने से ही असिद्धवचन, विरुद्धवचन, सन्दिग्धवचन और अनध्यवसितवचनों में ' अनपदेशत्व ' अर्थात् हेत्वाभासत्व का भी अर्थतः कथन हो जाता है । इस प्रसङ्ग में ऐसा विभाग समझना चाहिए कि हेतु के लक्षण में प्रयुक्त ' अनुमेयेन सहचरितम् ' इस पद से ‘ असिद्धः वचन ' मे हेत्वाभासत्व का आक्षेप होता है । एवं ' तत्समानजातीये च नास्ति ' इस वाक्य For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७७ प्रशस्तपादभाष्यम् अन्यतरासिद्धः, तद्भावा-तत्रासिद्धश्चतुर्विधः – उभयासिद्धः, सिद्ध:, अनुमेयासिद्धश्चेति । तत्रोभयासिद्ध उभयोर्वादिप्रतिवादिनोर-सावयवत्वादिति । अन्यतरासिद्धो यथा-सिद्धः, शब्दः, यथाऽनित्यः अन्यतरासिद्ध, ( ३ ) तद्भावासिद्ध और ( ४ ) अनुमेयासिद्ध भेद से ' असिद्ध ' चार प्रकार के हैं । इनमें जो हेतुवादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी के द्वारा पक्षादि में सिद्ध न हो उसे ' उभयासिद्ध ' हेत्वाभास कहते हैं । जैसे कि शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए प्रयुक्त ' सावयवत्वात् ' इस वाक्य से बोध्य सावयवत्व हेतु ( उभयासिद्ध हेत्वाभास ) है । शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए ही यदि कार्यत्व हेतु का कोई प्रयोग करे तो वह ' अन्यतरासिद्ध ' हेत्वाभास होगा, क्योंकि वादी ( वैशेषिक ) ही शब्द को कार्य मानते हैं । प्रतिवादी ( मीमांसक ) उसे कार्य नहीं मानते । न्यायकन्दली मुक्तम् । तत्समानजातीये च प्रसिद्धमित्यनेन विरुद्धानध्यवसितवचनयोरनपदे-शत्वम् । तद्विपरीते नास्त्येवेत्यनेन सन्दिग्धवचनस्यान पदेशत्वमिति विवेकः । एषामसिद्धविरुद्ध सन्दिग्धानध्यवसितानां मध्ये असिद्धं कथयति - तत्रा-सिद्धश्चतुर्विध उभयासिद्ध इत्यादि । तत्रोभयासिद्धः - उभयोर्वादिप्रतिवादिनो रसिद्धः, यथाऽनित्यः शब्दः, सावयवत्वादिति शब्दे सावयवत्वं न वादिनो नापि प्रतिवादिनः सिद्धमित्युभयासिद्धः । के द्वारा ' विरुद्धवचन ' और ' अनध्यवसितवचन ' इन दोनों का हेत्वाभास व्यञ्जित होता है । एवं तद्विपरीते च नास्त्येव ' इस वाक्य के द्वारा सन्दिग्धवचन ' की हेत्वाभासता ध्वनित होती है । ' तत्रासिद्धश्चतुर्विधः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इन असिद्ध, विरुद्ध, सन्दिग्ध और अनध्यवसितों में से असिद्ध नाम के हेत्वाभास का विवरण देते हैं । इनमें वादी और प्रतिवादी ये दोनों ही जिस हेतु की सत्ता पक्ष में न मानते हों, वह हेतु ' उभयानिद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि ' शब्दोऽनित्यः सावयवत्वात् ' इस अनुमान का सावयवत्व हेतु उभयासिद्ध हेत्वाभास है । इस अनुमान के प्रयोग करनेवाले ( नैयायिकादि ) हैं वादी, वे भी शब्द को सावयव नही मानते, एवं शब्द को नित्य मानने-वाले मीमांसक हैं प्रतिवादी, वे भी शब्द को द्रव्य मानते हुए भी सावयव नहीं मानते, अतः उक्त सावयवत्व हेतु ' उभयासिद्ध ' हेत्वाभास है । ७३ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir पू ७८ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् अनित्यः शब्दः, कार्यस्वादिति । तद्भावासिद्धो यथा - धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्त्तव्यायामुपन्यस्यमानो बाष्पो धूमभावेनासिद्ध इति । अनुमेया-सिद्धो यथा - पार्थिवं द्रव्यं तमः, कृष्णरूपवत्त्वादिति । यो ह्यनुमेयेऽ-( ३ ) जिस रूप ( हेतुतावच्छेदक ) से युक्त हेतु के द्वारा साध्य की अनुमिति अभिप्रेत हो, हेतु का वह रूप या धर्म जिस हेतु में न रहे वह हेतु तद्भवसिद्ध हेत्वाभास है । जैसे धूमत्व रूप से युक्त ( धूम ) से वह्नि की अनुमिति के अभिप्राय से यदि कोई बाष्प को धूम समझकर हेतु रूप से कोई उपस्थित करे तो वह वाष्प हेतु धूमभाव से ( अर्थात् धूमत्व रूप से ) सिद्ध न होने कारण ( अर्थात् बाष्प में घूमत्व के न रहने के कारण ) तद्भावा-सिद्ध हेत्वाभास होगा । ( ४ ) जहाँ अनुमेय अर्थात् अभीष्ट पक्ष ही असिद्ध रहे उसके लिए प्रयुक्त हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वाभास होगा । जैसे कि ' तमो द्रव्यं पार्थिवं कृष्णरूपवत्त्वात् इस अनुमान का कृष्णरूप हेतु अनुमेयासिद्ध हेत्वा-न्यायकन्दली अन्यतरासिद्धो यथा कार्यत्वादनित्यः शब्द इति । यद्यपि शब्दे वस्तुतः कार्यत्वमस्ति तथापि विप्रतिपन्नस्य मीमांसकस्यासिद्धम् । अन्यतरासिद्धं साध्यं न साधयति यावन्न प्रसाध्यते । तद्भावासिद्धो यथा धूमभावेनाग्न्यधिगतौ कर्त्तव्यायामुपन्यस्यमानो बाष्पो धूमभावेन धूमस्वरूपेणासिद्धस्तद्भावासिद्ध इत्युच्यते । अनुमेयासिद्धो यथा पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् । तमो नाम द्रव्यान्तरं ' अन्यतरासिद्ध ' का उदाहरण है ' शब्दोऽनित्यः कार्यत्वात् ' इस अनुमान का कार्यत्व हेतु । वैशेषिक नैयायिकादि के मत से शब्द में यद्यपि कार्यता सिद्ध हैं, किन्तु मोमांसक लोग शब्द को कार्य नहीं मानते, नित्य मानते हैं; अतः यह हेतु वादी और प्रतिवादी इन दोनों में से एक के द्वारा असिद्ध होने के कारण ' अन्यतरा सिद्ध ' नाम का हेत्वाभास है, क्योंकि अन्यतर के द्वारा भो असिद्ध हेतु तब तक साध्य का साधन नहीं कर सकता, जब तक कि वह दूसरे के द्वारा सिद्ध नहीं माना जाता । ' तद्भावासिद्ध ' का उदाहरण वह बाष्प हेतु है, जो धूम समझकर वह्निसाधन के लिए प्रयुक्त होता है, क्योंकि ' तद्भाव ' अर्थात् धूम का धूमत्व रूप धर्म बाष्प में सिद्ध नहीं है । अतः उक्त बाष्प हेतु ' तद्भावासिद्ध ' हेत्वाभास है । ' अनुमेवासिद्ध ' का उदाहरण है ' पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् ' इस अनुमान का ' कृष्णरूपवत्त्व ' रूप हेतु । तम नाम का कोई द्रव्य ही नहीं है, क्योंकि कृष्णरूप ( गुण ) का तेज के अभाव में आरोप मात्र होता है ( चूंकि पार्थिवत्वविशिष्ट तम रूप अनुमेय ही For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५७६ समझना चाहिए | असन्दिग्ध होने पर आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी सन्दिग्धासिद्ध होने पर भी प्रकार कोई हेतु वादी के लिए नास्ति, आरोपितस्य कार्यमात्रस्य प्रतीतेः अतस्तमो द्रव्यं पार्थिवम्, कृष्णरूप-वत्त्वादित्यनुमेयासिद्धमाश्रयासिद्धम् । अनुमेयमसिद्धं यस्येत्यसिद्धानुमेयमिति प्राप्तावाहिताग्न्यादित्वान्निष्ठायाः पूर्वनिपातः । यथा हेतुरन्यतरासिद्ध उभयासिद्धो वा भवति, एवमाश्रयासिद्धिरप्यु-भयथा । यथा च हेतोर्वादिप्रतिवादिनोः प्रत्येकं समुदितयोर्वा अज्ञानात् सन्देहाद् विपर्ययाद् वा असिद्धो भवति, तथाश्रयोऽपि । यथा च हेतुः कश्चिद् वादिनो-ज्ञानादसन्दिग्धः प्रतिवादिनः सन्दिग्धासिद्ध इति । यद्वा वादिनो s-ज्ञानासिद्धः, यदि वा प्रतिवादिनो विपर्ययासिद्धः । यद्वा वादिन: सन्देहासिद्धः प्रतिवादिनोऽज्ञानासिद्धः । यद्वा विपर्ययासिद्धो भवति वादिनः, उक्त स्थल में प्रसिद्ध नहीं है अतः ) ' पार्थिवं तमः कृष्णरूपवत्त्वात् ' इस अनुमान का ' अनुमेय ' अर्थात् आश्रय सिद्ध न होने के कारण इस अनुमान का ( कृष्णरूपवत्त्व ) हेतु अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है । यद्यपि ' अनुमेयमसिद्धं यस्य ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न होने के कारण अनुमेयासिद्ध ' न होकर ' असिद्धानुमेय ' शब्द का प्रयोग उचित है, तथापि आहिताग्न्यादि गण में पठित होने के कारण ' अनुमेय ' शब्द का पूर्वप्रयोग मानकर ( असिद्धानुमेय न लिखकर ) अनुमेयासिद्ध ' शब्द लिखा गया है । जैसे कि हेतु वादी और प्रतिवादी दोनों से असिद्ध होने के कारण ' उभयासिद्ध ' और उन दोनों में से केवल एक से असिद्ध होने के कारण ' अन्यतरासिद्ध ' कहलाता है, अर्थात् हेतु की सिद्धि दो प्रकार की होने से ' असिद्ध ' हेत्वाभास भी दो प्रकार का होता है; उसी प्रकार अनुमेय रूप आश्रय जहाँ वादी और प्रतिवादी दोनों के द्वारा असिद्ध होगा, वहाँ अनुमेयासिद्ध या आश्रयासिद्ध भी उभयासिद्ध रूप होगा । एवं जहाँ अनुमेय केवल वादी या प्रति-वादी किसी एक ही के द्वारा असिद्ध होगा, वहाँ अनुमेयासिद्ध भी अन्यतरासिद्ध नाम का आश्र-यासिद्ध हेत्वाभास होगा । कहने का अभिप्राय है कि वादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी एक के हेतुविषयक अज्ञान, या हेतुविषयक सन्देह या हेतुविषयक विपर्यय के कारण ' असिद्ध ' नाम का हेत्वाभास होता है, उसी प्रकार आश्रयासिद्ध ' नाम के हेत्वाभाग के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए कि साध्यविशिष्ट पक्ष रूप आश्रय या अनुमेय विषयक वादी और प्रतिवादी दोनों के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय एवं वादी और प्रतिवादी दोनों में से एक के उक्त अनुमेय या आश्रय के अज्ञान या सन्देह या विपर्यय के कारण ही आश्रयासिद्ध या अनुमेयासिद्ध नाम का हेत्वाभास भी होता है । ( अन्यतरासिद्ध के प्रसङ्ग में यह विशेष ' योजना या अतिदेश आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी जैसे कि कोई हेतु वादी के द्वारा अज्ञात होने के कारण भी प्रतिवादी के लिए सन्दिग्धासिद्ध होता है, वैसे ही समझना चाहिए । अथवा कोई हेतु वादी के लिए प्रतिवादी के लिए विपर्ययासिद्ध होता है । अथवा जिस सन्दिग्धासिद्ध है, किन्तु प्रतिवादी के लिए अज्ञानासिद्ध होता है, वैसे ही आश्रयासिद्ध
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ५८० किया गया । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-विद्यमानोऽपि तत्समानजातीये सर्वस्मिन्नास्ति, तद्विपरीते चास्ति, स विपरीत साधनाद् विरुद्धः, यथा यस्माद् विषाणी तस्मादश्व इति । भास है ( क्योंकि तम यदि द्रव्य होगा तभी वह पार्थिव हो सकता है, किन्तु तम में द्रव्यत्व ही सिद्ध नहीं है, चूँकि वह अभाव रूप है, अतः द्रव्यत्व विशिष्ट तम रूप अनुमेय असिद्ध होने के कारण उसमें पार्थिवत्व के साधन के लिए प्रयुक्त कृष्णरूपवत्त्व हेतु अनुमेयासिद्ध है ) । ( २ ) जो हेतु अनुमेय अर्थात् साध्य में एवं उसके सजातीयों में भी न रहे एवं अनुमेय के विपरीत वस्तुओं में रहे वह हेतु साध्य के विपरीत वस्तु का साधक होने के कारण ' विरुद्ध ' नाम का हेत्वाभास है । जैसे गो में ( अभेद सम्बन्ध से ) अश्व के साधन के लिए प्रयुक्त विषाण ( सींग ) हेतु ( विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है ), क्योंकि अश्व रूप अनुमेय में विषाण हेतु प्रतिवादिनः सन्देहासिद्धः । एवमाश्रयोऽपीति योजनीयम् । विशेषणासिद्धादयः, अन्यतरासिद्ध उभयासिद्धेष्वेवान्तर्भवन्तीति पृथङ् नोक्ताः । विरुद्ध हेत्वाभासं कथयति - यो ह्यनुमेय इति । यदा कश्चिद् वनान्तरिते गोपिण्डे विषाणमुपलभ्य ' अयं पिण्डोऽश्वो विषाणित्वात् ' इति साधयति, तदा विषाणित्वमश्वजातीये पिण्डान्तरेऽविद्यमानमश्वविपरीते गवि महिष्यादौ च विपक्षे विद्यमानं व्याप्तिबलेनाश्वत्वविरुद्ध मनश्वत्वं साधयदभिमतसाध्यविपरीतसाधनाद् के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए | अथवा जिस तरह कोई हेतु वादी के लिए ही विपर्ययासिद्ध और प्रतिवादी के लिए हो सन्दिग्धा सिद्ध होता है, वैसे ही आश्रयासिद्ध के प्रसङ्ग में भी समझना चाहिए । ' विशेषणासिद्ध ' प्रभृति हेत्वाभास कथित अन्यतरासिद्ध और उभयासिद्धों में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं, अतः उनका अलग से उल्लेख नहीं ' यो ह्यनुमेये ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' विरुद्ध ' नाम के हेत्वाभास का निरूपण करते हैं । जिस समय कोई पुरुष वन में छिपे हुए गो रूप अवयवी के केवल सींग को देखकर इस अनुमान वाक्य का प्रयोग करता है कि ' यह दीखनेवाला पिण्ड घोड़ा है, क्योंकि इसे सींग है ' उस समय यह ' विषाणित्व ' हेतु विरुद्ध नाम का हेत्वाभास होता है, क्योंकि अश्व रूप पक्ष के सजातीय गदहे प्रभृति में विषाणित्व हेतु नहीं है, एवं अश्व के विपरीत गो महिषादि विपक्षों में विषाणित्व हेतु विद्यमान हैं । इस व्याप्ति के कारण विषाणित्व हेतु वन में दीखनेवाले उक्त पिण्ड में अश्वत्व के विरुद्ध अश्वभिन्नत्व काही साधक होने के कारण ' विरुद्ध ' कहलाता है । यह उदाहरण कुछ ही विपक्षों में
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५८१ यस्तु सन्ननुमेये तत्समानासमानजातीययोः साधारणः सन्नेव स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः, यथा - यस्माद् विषाणी तस्माद् गौरिति । एक-नहीं है, एवं अश्व के सजातीय रासभादि भी वह नहीं है, किन्तु अश्व के विपरीत महिषादि में विषाण हेतु है, अत: गो में अश्व के विपरीत अश्वभेद का ही वह साधक है । ( ३ ) जो हेतु अनुमेय में ( साध्य में ) एवं उसके सजातीय और विरुद्धजातीय दोनों प्रकार के वस्तुओं में समान रूप से सम्बद्ध रहे. वह ( पक्ष में साध्य के ) सन्देह का कारण होने से ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास न्यायकन्दली विरुद्धमित्युच्यते । इदं विपक्षैकदेश वृत्तविरुद्धस्योदाहरणम् विषाणित्वस्य सर्वत्रानश्वे स्तम्भादावसम्भवात् । समस्त विपक्षव्यापकस्य विरुद्धस्योदाहरणम् -नित्यः शब्दः कृतकत्वादिति द्रष्टव्यम् । यस्तु सन्ननुमेये धर्मिणि, तत्समानजातीययोः सपक्षविपक्षयोः, साधारणः स सन्देहजनकत्वात् सन्दिग्धः । यथा यस्माद् विषाणी, तस्माद् गौरिति । यदायं पिण्डो गौविषाणित्वादिति साध्यते, तदा विषाणित्वं गवि महिषे च दर्शनात् सन्देहमापादयन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात् । अयं सपक्ष-रहनेवाले विरुद्ध ( हेत्वाभास ) का है । ( सभी विपक्षो में रहनेवाले विरुद्ध का नहीं ) क्योंकि प्रकृत अनुमान के विपक्षीभूत स्तम्भादि द्रव्यों में विषाणित्व हेतु नहीं है I । सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले विरुद्ध हेत्वाभास का उदाहरण ' नित्यः शब्दः कृतकत्वात् ' इस अनुमान में प्रयुक्त ' कृतकत्व ' को समझना चाहिए ( क्योंकि नित्यत्व रूप साध्य के अनाश्रयभूत सभी वस्तुओं में कृतकत्व हेतु आवश्य है ) । ' यस्तु सन्ननुमेये ' ( इस वाक्म में प्रयुक्त ' अनुमेये ' शब्द का अर्थ है ) ' धर्मी में ' अर्थात् जो हेतु पक्ष में रहते हुए ' तत्समानासमानजातीययोः ' अर्थात् सपक्ष और विपक्ष दोनो में भी समान रूप से रहे, वह हेतु ' सन्देहजनक ' होने के कारण ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास है । यस्माद् विषाणी तस्माद् गोः ' अर्थात् जिस समय वन में छिपे हुए कथित पिण्ड में ही केवल विषाण के देखने से कोई इस प्रकार के अनुमान का प्रयोग करे कि ' यह गो है क्योंकि इसे सींग है ' उस समय यह विषाण रूप हेतु गो रूप पक्ष और महिष रूप विपक्ष दोनों में समान रूप से रहने के कारण इस सन्देह को उत्पन्न करता है कि ' यह गो है या महिष ' । इस सन्देह को उत्पन्न करने के कारण ही उक्त विषाण हेतु सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास होता है । ( भाष्योक्त सन्दिग्ध हेत्वाभास का यह उदाहरण ) ( १ ) सपक्ष का व्यापक और कुछ ही विपक्षों में रहनेवाले ' सन्दिग्ध ' नाम के हेत्वाभास का है, ( क्योंकि विषाण रूप हेतु विषाणित्व रूप से निश्चित सभी गो रूप सपक्ष में है, किन्तु For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् स्मिश्च द्वयोर्हत्वोर्यथोक्तलक्षणयोर्विरुद्धयोः सन्निपाते सति संशय-दर्शनादयमन्यः सन्दिग्ध इति केचित् । यथा - - मूर्त त्वामूर्तत्वं प्रति मनसः है । जैसे कि किसी वस्तु में केवल विषाण के देखने से गो के अनुमान का विषाण हेतु ( सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास है ), क्योंकि विषाण रूप हेतु दर्शन के विषय किसी पक्षीभूत वस्तु में एवं उसके समानजातीयों में एवं विजातीय महिषादि में साधारण रूप से रहने के कारण पक्षीभूत वस्तु में यह ' गो ' है या ' महिष ' इस सन्देह का उत्पादक है । ( पूर्वपक्ष ) कोई कहते हैं कि उक्त रीति से ही यदि समानबल के एवं परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के साधक दो हेतुओं का समावेश जहाँ एक धर्मी में होता है वहाँ वह हेतु उस धर्मी में उक्त परस्पर विरुद्ध दो वस्तुओं के सन्देह का हेतु होने के कारण एक और ही प्रकार का सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास व्यापको विपक्षैकदेशवृत्तिरनैकान्तिकः । सपक्षविपक्षयोर्व्यापको नित्यः शब्दः, प्रमेयत्वादिति । सपक्षविपक्षैकदेशवृत्तिः, नित्यमाकाशममूर्तत्वादिति । सपक्षेक-देशवृत्तिविपक्षव्यापको द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वादिति । समानासमानजातीययोः साधारण इति यत् साधारणपद तस्य विवरणं सन्नवेति । गो से भिन्न महिष एवं अश्त्र प्रभृति जो सभी उसके विपक्ष हैं, उनमें से महिषादि में ही विषाण रूप हेतु है, अश्वादि में नहीं ) । ( २ ) सभी सपक्षों और सभी विपक्षों में व्यापक रूप से रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण ' नित्यः शब्दः प्रमेयत्वात् ' इस अनुमान का ' प्रमेयत्व ' हेतु है ( क्योंकि प्रमेयत्व सभी वस्तुओं में रहने के कारण नित्य रूप सभी सपक्षों में और अनित्य रूप सभी विपक्षों में विद्यमान है ) । ( ३ ) कुछ ही विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का दृष्टान्त है ' नित्य-माकाशममूर्तस्वात् ' इस अनुमान का ' अमूर्त्तत्व ' हेतु, ( क्योंकि आत्मा प्रभृति कुछ ही सपक्षों में अमूर्त्तत्व है, एवं अनित्य पृथिवी प्रभृति कुछ ही सपक्षों में ही अमृत्तत्व है ) ( ४ ) सभी विपक्षों में एवं कुछ ही सपक्षों में रहनेवाले सन्दिग्ध हेत्वाभास का उदाहरण है ' द्रव्यं शब्दो निरवयवत्वात् ' इस अनुमान का ' निरवयवत्व ' हेतु क्योंकि द्रव्यत्व शून्य सभी वस्तुओं में निरवयवत्व है, एवं सपक्षीभूत कुछ हो द्रव्यों में निरवयवत्व है । ' समानासमानजातीययोः साधारणः ' इस वाक्य में जो ' साधारण ' पद है, उसी की व्याख्या ' सन्नेव ' इस वाक्य के द्वारा की गई है । १. अर्थात् यह ' सन्दिग्ध ' हेत्वाभास चार प्रकार का है - ( १ ) सपक्षव्यापक और विपक्षैकदेशवृति ( २ ) सपक्ष और विपक्ष दोनों का व्यापक, ( ३ ) सपक्षकदेशवृत्ति एवं विपक्षैकदेशवृति, ( ४ ) विपक्षव्यापक और सपक्षेकदेशवृत्ति । मुद्रित न्यायकन्दली For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८३ अथवा अमूर्त? " । चूंकि अर्थको धर्मः सपक्षविपक्षयोर्दर्शनाद् धर्मिणि सन्देहं कुर्वन् सन्दिग्धो हेत्वाभासः स्यात् एवमेकस्मिन् धर्मिणि द्वयोर्हेत्वोस्तुल्यबलयोविरुद्धार्थप्रसाध-कयोः सन्निपाते सति संशयदर्शनादयं विरुद्धद्वयसन्निपातोऽन्यः सन्दिग्धो हेत्वा-भास इति कैश्चिदुक्तम्, तद् दूषयितुमुपन्यस्यति - एकस्मिश्चेति । तस्योदाहरणमाह-यथा मूर्तत्वामूर्तत्वं प्रति मनसः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोरिति । मूर्त मनः क्रियावत्त्वाच्छ्रादिवत्, अमूर्तं मनोऽस्पर्शवत्त्वादाकाशादिवदिति विरुद्धार्थप्रसाध-कयोः क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वयोर्हत्वोः सन्निपाते मनसो सूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति संशयः, नोभयोरपि साधकत्वम्, वस्तुनो द्वयात्मकत्वासम्भवात् । नापि परस्पर-विरोधादुभयोरप्यसाधकत्वम् मूर्तामूर्तत्वव्यतिरेकेण प्रकारान्तराभावात् । न किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि जिस प्रकार सपक्ष और विपक्ष दोनों में यदि एक हो धर्म ( हेतु ) देखा जाय तो वह धर्मी ( पक्ष ) में सांध्य के सन्देह को उत्पन्न करने के कारण ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास होगा, उसी प्रकार परस्पर विरुद्ध दो साध्यों के साधक एवं समानबल के दो हेतु यदि एक धर्मी में देखे जाँय तो भी उस धर्मी में उक्त दोनों विरुद्ध साध्यों का संशय होगा । अतः यह ' विरुद्धद्वय-संनिपात ' मूलक एक अलग ही ' सन्दिग्ध ' नाम का हेत्वाभास है । इस पक्ष को खण्डन करने का ही उपक्रम ' एकस्मिश्च ' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । इसी ( विशेष प्रकार के ) सन्दिग्ध का उदाहरण ' यथा मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वं प्रति मनसः क्रिया-वत्त्वास्पर्शवत्त्वयोः ' इस वाक्य के द्वारा प्रदर्शित हुआ है । अभिप्राय यह है कि ' जिस प्रकार घट शरावादि क्रिया से युक्त होने के कारण मूर्त्त हैं, उसी प्रकार मन भी मूर्त है, क्योंकि वह भी क्रियाशील है ' एवं ' जिस प्रकार आकाश स्पर्श से रहित होने के कारण मूर्त नहीं है, उसी प्रकार मन भी स्पर्श से विहीन होने के कारण अमूर्त है ' इस रीति से मूर्त्तत्व और अमूत्तंत्व रूप दो विरुद्ध साध्य को सिद्ध करनेवाले क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व रूप दोनों हेतुओं का एक ही मन रूप धर्मी में यदि सम्मिलन होता है, तो मन रूप धर्मी में यह संशय होता है कि ' मन मूर्त है? एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती हैं, परस्पर विरोधी दो प्रकार को नहीं ( सुतरामु मन मूर्त ही होगा या अमूर्त ही ), अतः वे दोनों हेतु मन रूप अपने एक ही पक्ष में अपने अपने साध्य ( अर्थात् मूर्त्तत्व एवं अमूर्त्तत्व के ) निश्चय का उत्पादन नहीं कर सकते । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि ( प्र ० ) चूंकि मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः मन रूप एक ही धर्मों में उक्त दोनों साध्यों को साधन करने का सामर्थ्य उन दोनों हेतुओं में से किसी में भी नहीं है । ( उ ० ) क्योंकि मन को मूर्त या अमूर्त इन दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार का होना सम्भव नहीं है, ( अतः उन दोनों में से एक हेतु मन में अपने साध्य का साधक पुस्तक के इस सन्दर्भ में जो ' अयं सपक्ष विपक्षयोर्ध्यापको विपक्षैकदेश वृत्तिरनैकान्तिकः ' यह पाठ है उसमें ' विपक्षयोः ' यह प्रमाद से लिखा गया जान पड़ता है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८४ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् क्रियावच्चास्पर्शवत्वयोरिति । नन्वयमसाधारण एवाचाक्षुषत्व प्रत्यक्ष-त्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् । ततश्चानध्यवसित है । जैसे कि मन में मूर्त्तत्व के साधक क्रियावत्त्व और अमूर्त्तत्व के साधक अस्पर्शवत्त्व ये दोनों ही हेतु विद्यमान हैं, अतः संशय होता है कि क्रियाशील होने के कारण मूर्त है या अस्पर्शयुक्त ( द्रव्य ) होने के कारण ( आकाशादि की तरह ) अमूर्त है? मन में उक्त सन्देह का कारण होने उक्त दोनों ही हेतु सन्दिग्ध नाम के हेत्वाभास हैं । ( अवान्तर उत्तरपक्ष ) जिस प्रकार अवाक्षुषत्व ( चक्षु से गृहीत न होना ) एवं प्रत्यक्षत्व ( इन्द्रिय से गृहीत होना ) इन दोनों में से एक - एक गुण से भिन्न दूसरी जगह पृथक् रूप से रहने पर भी मिलित होकर केवल गुण में ही रहने के न्यायकन्दली चान्यतरस्य हेतोविशे षोऽवगम्यते येनैकपक्षावधारणं स्यात् । अतः क्रियावत्वा-स्पर्शवत्त्वाभ्यां मनसि संशयो भवति, कि मूर्तं किं वामूर्तमिति । अयमेव च विरुद्धाव्यभिचारिणः प्रकरणसमाद् भेदो यदयं संशयं करोति, प्रकरण समस्तु सन्दिग्धेऽर्थे प्रयुज्यमानः संशयं न निवर्तयतीति । नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षा-सम्भवादिति । क्रियावत्त्वास्पर्शवत्त्वे प्रत्येकं न तावत् संशयं जनयतः, निर्णय-हेतुत्वात् । सन्निपातश्च तयोरयमसाधारण एव संहतयोस्तयोर्मनोव्यतिरेकेणान्य-अवश्य है ) । इन दोनों हेतुओं में से किसी एक हेतु में ' विशेष ' बल का भी निश्चय नहीं है कि उन दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का अवधारण हो जाय । अतः कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों हेतुओं से मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि ' मन मूर्त है या अमूत्तं? विरुद्धाव्यभिचारी ( प्रस्तुत विलक्षण सन्दिग्ध ) हेत्वाभास प्रकरण ( सत्प्रतिपक्ष ) हेत्वाभास से यही अन्तर है कि विरुद्धाव्यभिचारी हेत्वाभास पक्ष में प्रकृत साध्य के संशय का उत्पादन करता है. किन्तु प्रकरणसम उस साध्य में प्रवृत्त होता है जो सन्दिग्ध है, जिससे कि वह पक्ष में साध्य के सन्देह को दूर नहीं कर पाता । ' नन्वयमसाधारण एव, अचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्ववत् संहतयोरन्यतरपक्षासम्भवात् ' इस ( पूर्वपक्ष भाष्य ) का अभिप्राय है कि यह ( विरुद्धाव्यभिचारी या सन्दिग्धविशेष ) असाधारण हेत्वाभास ही है, क्योंकि कथित क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों में कोई एक हेतु संशय को उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि प्रत्येकशः वे दोनों निश्चय के ही उत्पादक हैं । दोनों हेतुओं का सम्मिलन ( जिससे संशय हो सकता है ) असाधारण ही है, क्योंकि क्रियावस्त्र और अस्पर्शवत्त्व इन दोनों का सम्मिलन तो केवल मन रूप पक्ष में ही सम्भव है, मन को छोड़कर उन दोनों का सम्मिलन For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् १८५ न्यायकन्दली
यत्रासाधारणो धर्मस्तदभावमुखेन तु ।
द्वयासत्त्वविरोधाच्च मतः संशयकारणम् ॥
निर्णीत ही है । अतः कारण पृथिवी में नित्यत्व पदार्थों में न रहने के For Private And Personal तरपक्षे सपक्षे विपक्षे वाऽसम्भवात्, यथाऽचाक्षुषत्व प्रत्यक्षत्वयोः प्रत्येकं गुण-व्यभिचारेऽपि समुदितयोर्गुणव्यतिरेकेणान्यत्रासम्भवः । यद्यपि विरुद्धाव्यभिचारि-धर्मद्वयोपनिपातो s साधारणो धर्मः, तथापि संशयहेतुत्वमेव । व्यतिरेकिणो हि विपक्षादेव कस्माद् व्यावृत्तिनियता, तेन पक्षे निर्णयहेतुत्वम् । असाधारणस्य तु व्यावृत्तिरनकान्तिकी, विपक्षादिव सपक्षादपि तस्याः सम्भवात् । तत्र यदि गन्धवत्त्वमनित्यव्यावृत्तत्वान्नित्यत्वं साधयति, नित्यादपि गगनाद् व्यावृत्तेरनित्यत्व-मपि साधयेत्? न चास्त्युभयोः सिद्धिः, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । नाप्युभयो-रसिद्धिः प्रकारान्तराभावात् । अतो गन्धवत्त्वात् पृथिव्यां संशयो भवति किमियं नित्या? किं वानित्या? इति । यदाहुर्भट्टमिश्राः -किसी भी सपक्ष में या किसी भी विपक्ष में सम्भव नहीं है । जैसे कि अचाक्षुषत्व ( आँखों से न देखे जाने योग्य ) और प्रत्यक्षत्व इन दोनों में से अलग अलग प्रत्येक का गुण में व्यभिचार ( गुण से भिन्न पदार्थ में विद्यमानत्व ) है, ( क्योंकि गुण से भिन्न आकाशादि द्रव्य चक्षु से नहीं देखे जाते एवं गुण से भिन्न होने पर भी घटादि द्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है ), किन्तु अचाक्षुषत्व और प्रत्यक्षत्व दोनों मिल कर केवल गुण में ही हैं ( क्योंकि गन्धादि गुणों का चक्षु से ग्रहण न होने पर भी प्रत्यक्ष होता है ) । यद्यपि विरुद्धाव्यभिचारी आश्रय दो धर्मों का एक में रहना असाधारण धर्म है, फिर भी वह संशय का ही उत्पादक है । निर्णय का नहीं ) । ( अन्वय ) व्यतिरेकी हेतु में केवल विपक्ष में न रहना ( विपक्षव्यावृत्ति ) ही केवल निश्चित है ( सपक्षव्यावृत्ति नहीं ), अतः वह हेतु पक्ष में साध्य के निश्चय का उत्पादन कर सकता है । असाधारण हेतु में सपक्ष या विपक्ष इन दोनों में से किसी एक की भी व्यावृत्ति नियमित नहीं है, क्योंकि विपक्ष की तरह सपक्ष में भी उसका न रहना गन्धवत्त्व रूप असाधारण हेतु सभी अनित्यों में न रहने के का अगर साधन कर सकता है, तो फिर गगनादि नित्य कारण पृथिवी में अनित्यत्व का भी वह साधन कर ही सकता है । किन्तु एक ही पृथिवी व्यक्ति में नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि एक वस्तु एक ही प्रकार की हो सकती है, दो प्रकार की नहीं । ( वस्तुओं का किसी एक ही प्रकार का होना निश्चित होने के कारण ही ) नित्यत्व और अनित्यत्व दोनों की असिद्धि भी नहीं कही जा सकती, क्योंकि किसी एक वस्तु का नित्यत्व और अनित्यत्व से भिन्न कोई तीसरा प्रकार हो ही नहीं सकता । अतः पृथिवी में गन्ध के रहने के कारण यह संशय होता है कि ' यह नित्य है अथवा अनित्य? जैसा कि भट्टमिश्र ( कुमारिलभट्ट ) ने कहा