प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 661–670
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 661–670
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् वक्ष्यामः । ननु शास्त्रे तत्र तत्रोभयथा दर्शनं संशयकारणमपदिश्यत कारण असाधारण होते हैं, इसी प्रकार क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ये दोनों स्वतन्त्र रूप से अलग - अलग मन से भिन्न वस्तुओं में रहते हुए भी मिलित होकर केवल मनरूप पक्ष में ही हैं, अतः क्रियावत्त्व से युक्त अस्पर्शवत्त्व असाधारण ही हैं, सन्दिग्ध नहीं । ( सिद्धान्तपक्ष ) हम आगे कहेंगे कि कथित स्थिति में अचाक्षुषत्व विशिष्ट प्रत्यक्षत्व या क्रियावत्त्वविशिष्ट अस्पर्शवत्त्व ' अनध्यवसित ' होगा, सन्दिग्ध नहीं । ( पूर्वपक्ष ) शास्त्र ( वैशेषिक सूत्रों अ ० २ आ ० २ सू ० १८ तथा १६ ) में एक धर्मी में विरुद्ध दो धर्मों के ज्ञान को संशय का कारण कई स्थानों में कहा गया है । अतः उक्त कथन शास्त्र के विरुद्ध है । न्यायकन्दली यच्चाह न्यायवात्तिककारः — विभागजत्वं विभागजविभागासमवायिकारण-कत्त्वं नर्ते शब्दात् सम्भवतीति सर्वतो व्यावृत्तेः संशयहेतुरिति । अत्राह - ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्याम इति । विरुद्धयोः सन्निपातो-S साधारणोऽसाधारणत्वाच्चानध्यवसितोऽयमिति वक्ष्यामः । किमुक्तं स्यात्? असाधारणो धर्मोऽध्यवसायं न करोतीति वक्ष्याम इत्यर्थः । है कि ( गन्धवत्वादि ) असाधारण धर्म भी ( पृथिवी में नित्यत्व एवं अनित्यत्व के ) संशय का कारण है । ( उसकी रीति यह है कि ) उक्त असाधारण धर्म किसी सपक्ष में एवं किसी भी विपक्ष में न रहने के कारण पृथिवी में नित्यत्व का अभाव अनित्यस्व और अनित्यत्व का अभाव नित्यत्व इन दोनों का साधन कर सकता है, क्योंकि दो विरुद्ध धर्मों की सत्ता एक धर्मी में सम्भव नहीं है, अतः पृथिव्यादि में गन्धवत्त्वादि रूप असाधारण धर्मों से नित्यत्वादि का संशय ही होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार ( उद्योतकर ) ने भी कहा है कि - विभागजस्व अर्थात्, विभागजविभागरूप असमवायिकारण से उत्पन्न होना शब्द से भिन्न किसी दूसरी वस्तुमें सम्भव नहीं है, अतः सपक्ष और विपक्ष इन दोनों में से किसी में भी न रहने के कारण उक्त विभागजत्व रूप असाधारण धर्म शब्द में संशय का कारण है । इसी आक्षेप का समाधान ' ततश्चानध्यवसित इति वक्ष्यामः ' इस वाक्य के द्वारा किया गया है । ( अर्थात् ) चूँकि विरुद्ध दो धर्मों का एक आश्रय में समावेश ही असाधारण है, अतः इसी असाधारण्य के कारण वह ' अनध्यवसित ' नाम का हेत्वाभास हैं, यह For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५८७ इति " न संशयो विषयद्वैतदर्शनात् । संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणम्, तुल्यबलत्वे च तयोः परस्परविरोधान्निर्णयानुत्पादकत्वं ( सिद्धान्त ) नहीं, यहाँ कोई भी शास्त्रविरोध नहीं है क्योंकि एक ही विषय के दो विरुद्ध प्रकार के ज्ञान से संशय होता है, ( एक धर्मी में दो विरुद्ध धर्मों के ज्ञान से नहीं ) । अर्थात् विषय का द्वैतदर्शन ( दो प्रकारों से देखने ) से ही संशय की उत्पत्ति होती है । उन ( क्रियावत्त्व और अस्पर्शवत्त्व ) दोनों न्यायकन्दली विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेत्वभावे प्रतिपादिते शास्त्रविरोध चोदयति -- नन्विति । उभयथा दर्शनमिति । उभाभ्यां विरुद्धधर्माभ्यां सहैकस्य धर्मिणो दर्शनं संशयकारणमिति शास्त्रे तत्र तत्र स्थाने कथितम् ' दृष्टं च दृष्टवद् दृष्ट्वा ' संशयो भवति ( वै ० अ ० २ आ ० २ सू ०१८ ) । अमूर्तत्वेन सहात्मनि दृष्टमस्पर्शवत्त्वं यथा मनसि दृश्यते, तथा मूर्तत्वेन सह परमाणौ दृष्टं क्रियावस्त्वमपि दृश्यते, अतोऽमूर्तत्वेन सह दृष्टमस्पर्शवत्त्वमिव मूर्तत्वेन सह दृष्टं क्रियावत्त्वमपि दृष्ट्वा संशयो भवति किं मनो मूर्तम्? किमुतामूर्तम्? इति । ' यथा दृष्टमयथा दृष्टमुभयथादृष्टत्वात् संशय: ' ( अ ० २ आ ० २ सु ० १ ९ ) । यथा हम आगे कहेंगे । ( प्र ० ) इससे क्या अभिप्राय निकला? ( उ ० ) यही कि हम आगे कहेंगे कि ' असाधारण धर्म ' ( हेतु ) ' अध्यवसाय ' ( निश्चय ) को उत्पन्न नहीं करता । ' विरुद्धाव्यभिचारी ' हेतु ( असाधारण धर्म ) संशय का कारण नहीं है । कथित इस पक्ष के ऊपर ' ननु ' इत्यादि ग्रन्थ से ( वैशेषिक सूत्र ) रूप शास्त्र के विरोध का उद्भावन किया गया है । ' उभयथा दर्शनम् ' इत्यादि सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि ' उभाभ्याम् ' अर्थात् ' विरुद्ध दो धर्मों के साथ एक धर्मी का ज्ञान संशय का कारण है । यह जो शास्त्र ( वैशेषिक सूत्र ) में उन सब स्थानों में कहा गया है उसका विरोध होगा! जैसे कि ' दृष्टं च दृष्टवत् ' ( वै ० सू ० अ ० २ ० २ सू ० १८ ) इस सूत्र के द्वारा कहा गया है कि ' दृष्ट्वा संशयो भवति ' ( अभिप्राय यह है कि ) मन में अमूर्त्तत्व के साथ आत्मा में रहनेवाला अस्पर्शवत्त्व भी है, एवं परमाणु मूर्त्तत्व के साथ रहनेवाला क्रियावत्त्व भी मन में है, अतः यह संशय होता है कि ' मन मूर्त है या अमूर्त? ' यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथा दृष्टत्वाच्च ' ( वै. सू. अ. २ सु. १६ ) के द्वारा यह प्रतिपादन किया गया है कि ' यथादृष्ट ' और ' अयथादृष्ट ' इन दोनों प्रकार से ज्ञात धर्म के द्वारा संशय होता है | कहने का तात्पर्य है कि ' यथा ' अर्थात् जिस प्रकार मूर्त्तत्व की व्याप्ति से युक्त क्रियावत्त्व के साथ मन की उपलब्धि होती है, एवं ' अयथादृष्ट ' अर्थात् उसी प्रकार इससे विरुद्ध अमूर्त्तत्व के साथ अवश्य रहने वाले क्रियावत्त्व के साथ भी मन की उपलब्धि होती है, अतः ' उभयथादृष्ट ' अर्थात् For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५८८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-न्यायकन्दली येन धर्मेण मूर्तत्वाव्यभिचारिणा क्रियावत्त्वेन समं ' दृष्टम् ' मनस्तस्मात् ' अयथा-दृष्टम् ' अमूर्तत्वाव्यभिचारिणा स्पर्शवत्वेन समं दृष्टम्, अत: ' उभयथादृष्टत्वात् ' संशयः किं क्रियावत्त्वान्मूर्तं मनः? उतास्पर्शवत्त्वादमूर्त्तम्? इति सूत्रार्थः । तेन विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निराकुर्वतः शास्त्रविरोधः । एतत् परिहरति न संशयः, विषयद्वैतदर्शनादिति । यत् त्वयोक्तं शास्त्रविरोध इति, संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति । तन्न, यस्मात् एतदेव विवृणोति - संशयोत्पत्तौ विषयद्वैतदर्शनं कारणमिति । यादशे धर्मिण्यूर्ध्वस्वभावे संशयो जायते, ' स्थाणुर्वा पुरुषो वा ' इति, तादृशस्य विषयस्य पूर्वं द्वैतदर्शनमुभयथादर्शनं स्थाणुत्वपुरुषत्वाभ्यां सह दर्शनं संशयकारणम्, न त्वेकस्य धर्मिणो विरुद्धधर्मद्वयसन्निपातस्तस्य कारणम्, तस्मान्नायं सूत्रार्थी यद्विरुद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयोपनिपातात् संशय इत्यभिप्रायः । तथा च दृष्टं च दृष्टवद्दृष्ट्वेत्यस्यायमर्थः - पूर्वमेव ' दृष्टम् ' पदार्थ स्थाणु ं वा पुरुषं वा, ' दृष्टवद् ' दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां तुल्यं वर्त्तमानं दृष्टम्, स्थाणुपुरुषान्तरसमानमिति यावत् देशान्तरे कालान्तरे वा पुनर्दृष्ट्वा मन की उक्त दोनों प्रकार से उपलब्धि होने के कारण यह संशय होता है कि ' यतः मन क्रियाशील है, अतः मूर्त है? अथवा ' मन में स्पर्श नहीं है, अत: मन अमूर्त है? यही उक्त दोनों वैशेषिक सूत्रों के अर्थ हैं । जो कोई विरुद्धाव्यभिचारी ( असाधारण ) धर्म को संशय का कारण नहीं मानते, उन्हें उक्त दोनों सूत्र रूप शास्त्रों के विरोध का सामना करना पड़ेगा । ' न विषयद्वैतदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सिद्धान्ती इस विरोध का परिहार करते हैं । अर्थात् आप ( पूर्वपक्षी ) ने जो यह कहा है कि ' शास्त्र - विरोध है ', सो नहीं है, क्योंकि उक्त दोनों सूत्रों से यही कहा गया है कि विषय दो प्रकार से जानने के कारण ( विषयद्वैतदर्शन से ) संशय उत्पन्न होता है । ( संशयो विषयद्वैतदर्शनाद् भवति ) अपने इस वाक्य का ही ' संशयोत्पत्ती विषयद्वैतदर्शनं कारणम् ' इस वाक्य के द्वारा विवरण देते हैं । अभिप्राय यह है कि ( स्थाणुर्वा पुरुष: में ) ऊँचाई वाले जिस घर्मी में ' स्थाणुर्वा पुरुष: ' इस आकार का संशय होता है, उस संशय के प्रति पहिले ' विषय ' का ' द्वैतदर्शन ' अर्थात् ' उभयथा दर्शन ' फलतः पुरुष और स्थाणु दोनों में समान रूप से ऊँचाई का देखना ही कारण है । उस संशय के प्रति एक धर्मी में विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का सम्मिलन कारण नहीं है । अतः उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि विरुद्धाव्यभिचारी दो धर्मों का एक धर्मों में समावेश संशय का कारण है । तदनुसार ' दृष्टञ्च दृष्टवद् दृष्ट्वा ' इस सूत्र का यह अभिप्राय है कि पूर्वकाल ' दृष्ट ' स्थाणु या पुरुष को हो ' दृष्टवत् ' अर्थात् वर्त्तमान काल में दूसरे स्थाणु या दूसरे पुरुष के ' तुल्य ' देखकर अर्थात् दूसरे काल या दूसरे देश में दूसरे पुरुष का दूसरे स्थाणु के समान फिर से देखकर, किसी कारणवश उन दोनों के स्थाणुत्व और पुरुषत्व For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir करणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८६ न्यायकन्दली कुतश्चिन्निमित्ताद्विशेषानुपलम्भे सति संशयो भवति । दृष्टं चेति चशब्देन पूर्वमदृष्टमपि पदार्थं दृष्टवद् दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषान्तराभ्यां समानं दृष्ट्वा संशय इत्यर्थः । सूत्रान्तरं च यथादृष्टमयथादृष्ट मुभयथादृष्टमित्येक धर्मविशेषानुस्मरण-कृतं संशयं दर्शयति । पूर्वदृष्टमेव पुरुषं ' यथादृष्टम् ' येन येनावस्थाविशेषेण दृष्टं मुण्डं जटिलं वा, तस्मादयथादृष्टमन्येनान्येनावस्थाभेदेन दृष्टम्, कालान्तरे दृष्ट्वा, अवस्थाविशेषमपश्यतः स्मरतश्चैवं तस्यैव प्राक्तनीमवस्थितामुभयीमवस्थां किमयमिदानीं मुण्डः किं वा जटिल इति संशयः स्यादिति सूत्रार्थ: । न तु विरुद्धाव्यभिचारी संशयहेतुः, प्रयोगाभावात् । यदि तावदाद्यस्य तोर्यथोक्तलक्षणत्वमवगतं तदा तस्माद्योऽर्थोऽवधारितः स तथैवेति न द्वितीयस्य प्रयोग:, प्रतिपत्तिबाधितत्वात् । अथायं यथोक्तलक्षणो न भवति, तदानी-मयमेव दोषो वाच्यः, किं प्रत्यनुमानेन? विरुद्धं प्रत्यनुमानं न व्यभिचरति, नातिवर्तत इति विरुद्धाव्यभिचारी प्रथमो हेतुस्तस्यायमेव दोषो यद्विपरीतानु-रूप असाधारण धर्मं को न समझने के कारण संशय उत्पन्न होता है । ' दृष्टञ्च ' इस वाक्य के ' च ' शब्द से भी यही अर्थ व्यक्त होता है कि जो पदार्थ ( स्थाणु या पुरुष में ) पहिले से ज्ञात नहीं है, अगर उसका भी दूसरे स्थाणु वा दूसरे पुरुष को तरह ज्ञान होता है, तो उस ज्ञान के बाद भी संशय की उत्पत्ति होती है । ' यथा दृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टम् ' इस दूसरे सूत्र के द्वारा वह संशय दिखलाया गया है कि जिसकी उत्पत्ति एक धर्मी में ( अनेक धर्मों की ) स्मृति से होती है । पहिले देखा हुआ पुरुष ही अगर ' यथादृष्ट ' हो, अर्थात् जिन जिन विशेष अवस्थाओं से — जटी अथवा मुण्डी प्रभृति अवस्थाओं से युक्त होकर जो पूर्व में देखा गया हो, वही पुरुष दूसरी दूसरी अवस्थाओं से अगर उससे ' अयथादृष्ट ' अर्थात् ( उन पूर्वदृष्ट अवस्थाओं से ) युक्त रूप में दूसरे समय देखा जाता है, एवं ( उसको वर्तमान ) विशेष प्रकार की अवस्था की उपलब्धि नही होती है, एवं पूर्व की जटी और मुण्डी दोनों अवस्थाओं का स्मरण होता हैं, तो इस स्थिति में इसी संशय की उत्पत्ति होती है कि यह ' जटाधारी है मुण्डित - मस्तक? ( विरुद्धाव्यभिचारी हेतु में संशय की कारणता सूत्रों से नहीं कही गयी है इतनी ही नहीं वस्तुतः ) विरुद्धाव्यभिचारी हेतु संशय का कारण हो ही नहीं सकता, क्योंकि उसका प्रयोग ही सम्भव नहीं है । ( ' मूर्त्त मनः अस्पर्शवत्त्वात्, अमूर्तं मनः क्रियावत्त्वात् ' इत्यादि स्थलों में ) साध्य के ज्ञापकत्व के प्रयोजक जितने जिन प्रकार के ( सपक्ष सत्त्वादि धर्म ) हैं-पहिले हेतु में उन सबों का ज्ञान है, तो फिर इस हेतु से जो निश्चित होगा, वह उसी प्रकार का होगा । अतः ( उस विरुद्ध साध्य के साधन के लिए ) दूसरे हेतु का प्रयोग ही नहीं हो सकेगा, क्योंकि वह प्रथम हेतुजनित प्रथम साध्य की अनुमिति ( प्रतिपत्ति ) से बाधित है । ऐसी स्थिति में अगर प्रथम हेतु में साध्य ज्ञान के प्रयोजक ( सपक्ष सत्त्वादि ) For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् स्यान्न तु संशयहेतुत्वम्, न च तयोस्तुस्यबलवच्च मस्ति, अन्यतरस्यानु-मेयोद्देशस्यागमबाधितत्वादयं तु विरुद्धभेद एव । के ज्ञान समान बल के हैं, इससे इतना ही होगा कि दोनों में से कोई भा निश्चय का उत्पादन न कर सकेगा । इससे ( निश्चय की इस अनुपत्पदता ) से उनमें संशय की कारणता नहीं आ सकती । वस्तुतः मूर्त्तत्त्व का साधक क्रियावत्त्व और अमूर्त्तत्व का साधक अस्पर्शवत्त्व ये दोनों हेतु समानबल के हैं भी नहीं, क्योंकि इन दोनों में से एक ( अस्पर्शवत्त्व ) का साध्य ( अमूर्त्तत्त्व ) मन में तद्भावादणु मन: ' ( अ ० ६ ० १ - २३ ) इस वैशेषिक-सूत्र रूप आगम से बाधित है | अतः ( जिसे पूर्वपक्षी दूसरे प्रकार का सन्दिग्ध हेत्वाभास कहते हैं ), वह विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है । न्यायकन्दली मानसम्भवः । द्वितीयेन प्रतिपक्षे उपस्थाप्यमाने प्रथमस्य साध्यसाधकत्वा-भावादिति चेत्? यदि द्वितीयवत् प्रथममप्यनुमानलक्षणोपपन्नम्, न प्रथमस्या-साधकत्वम् । तदसाधकत्वेऽन्यत्राप्यनुमाने के आश्वास? वस्तुनो द्वैरूप्याभावाद-साधकत्वमिति चेत्? वस्तु द्विरूपं न भवतीति केनैतदुक्तम् यथा हि प्रमाण-मर्थं गमयति, तदेव हि तस्य तत्त्वम् । धर्मों का ज्ञान ही नहीं है तो फिर उस धर्मविहीनता के प्रयोजक हेत्वाभास का हो उद्भावन करना चाहिए, ( उस हेतु को दूषित करने के लिए ) प्रमथानुमान ( के विरोधी अनुमान ) के प्रयोग से क्या प्रयोजन? ( प्र ० ) ' विरुद्धं न व्यभिचरति ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' विरुद्धाव्यभिचारी ' शब्द का यह अर्थ है कि जो हेतु अपने विरोधी अनुमान की उत्पत्ति को न रोक सके वही हेतु ' विरुद्धाव्यभिचारी ' है । तदनुसार पूर्व में प्रयुक्त हेतु हा ' विरुद्धाव्यभिचारी है । इस हेतु में यही ' दोष ' है कि इसके रहते भी दूसरे हेतु विपरीत अनुमिति की उत्पत्ति होती है, क्योंकि द्वितीय ( प्रति ) हेतु के द्वारा जब विरोधी पक्ष की उपस्थिति हो जाती है, तो अपने साध्य के साधन करने की क्षमता पहिले हेतु से जाती रहती है । ( उ ० ) अगर दूसरे हेतु की तरह पहले हेतु में अनुमान के उत्पादक ( सपक्षसवादि ) सभी लक्षण हैं, तो फिर पहले हेतु अपने साध्य के साधन में अक्षम ही नहीं है, क्योंकि सपक्षसत्त्वादि रूपी बलों के रहते हुए भी यदि प्रथम हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य न माना जाय, तो और अनुमान प्रमाणों में हो कैसे विश्वास किया जा सकेगा कि वह अपने साध्य का साधन करेगा ही? अगर यह कहें कि ( प्र ० ) चूँकि कोई भी वस्तु ( विरुद्ध ) दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः एक ( पहिले ) हेतु को असाधक मान लेते हैं । ( उ ० ) यह किसने कहा कि एक वस्तु ( विरुद्ध ) दो प्रकार की नहीं हो सकती? प्रमाण से जिस प्रकार की वस्तु की सिद्धि होगी, वही प्रकार उस For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ५६१ अर्थकं वस्तूभयात्मकं न भवतीति सुदृढप्रमाणावसितोऽयमर्थो न शक्यतेऽ-न्यथा कर्तुम्, तर्हि तयोस्तुल्यबलत्वं नास्त्येव एकस्य यथार्थत्वादिति, कुतः संशयः? यद्यपि वस्तुवृत्त्या द्वयोर्यथार्थता नास्ति, तथाप्यन्यतरस्य विशेषानु-पलम्भेन भवेत् तुल्यबलत्वाभिमान इति चेदस्त्वेवम्, तथापि तुल्य-बलत्वाद्यथोत्तरेणाद्यं प्रतिबध्यते, तथाद्येनाप्युत्तरं प्रतिबध्यत इति परस्परं स्वसाध्यसाधकत्वं न स्यात्, न तु संशयकर्तृत्वम्, विशेषानुपलम्भमात्रेण विरुद्धो-भयविशेषोपस्थापनाभावादित्याह - तुल्यबलत्वे चेति । ननु यद्वस्तु तन्मूर्तं भवत्यमूर्तं वा, न मूर्तीमूर्ताभ्यां प्रकारान्तर-मुपलब्धम्, अतो मनसि मूर्त्तत्वामूर्त्तत्वत्योरनुपलम्भेऽपि द्वयोरभावं द्वयोरपि वस्तु का ' तत्त्व ' होगा ( यथार्थ रूप होगा । अगर सुदृढ़ प्रमाण के द्वारा यह निश्चित है कि वस्तु दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः उसका निराकरण नहीं किया जा सकता, तो फिर दोनों हेतु समानबल के है ही नहीं, क्योंकि उनमें एक यथार्थ ( अनुमिति का साधक ) है | अतः संशय किस प्रकार होगा? ( प्र ० ) यद्यपि वस्तुस्थिति यही है कि ( परस्पर विरोधी साध्यों के साधक ) दोनों हेतु यथार्थ ( ज्ञान के साधक नहीं हो सकते ) फिर भी दोनों पक्षों में से किसी एक में ( यथार्थ के प्रयोजक विशेष धर्म को उपलब्धि नहीं होती है, अतः दोनों हेतुओं में समान बल होने का अभिमान होता है । ( उ ० ) अगर दोनों हेतुओं को समानबल का मान भी लें, तो भी जैसे कि पहला हेतु दूसरे हेतु को प्रतिरुद्ध करता है, वैसे ही ( उसी के समानबल होने के कारण ) दूसरा हेतु भी पहिले हेतु को प्रतिरुद्ध कर सकता है । इस प्रकार दोनों परस्पर एक दूसरे से प्रतिरुद्ध होने के कारण केवल अपने अपने साध्य का साधन भर न कर सकेंगे । इससे वह सम्भव नहीं है कि दोनों मिलकर संशय का उत्पादन करें, क्योंकि ' दोनों के विशेष ( असाधारण ) धर्म उपलब्ध नहीं है ' केवल इतने से ही दोनों हेतुओं से परस्पर विरुद्ध दो साध्यों की उपस्थिति नहीं हो सकती । यही बात ' तुल्यबलत्वे च ' इत्यादि भाष्य के द्वारा कही गयी है । ( प्र ० ) जो कोई भी वस्तु वह या तो मूर्त ही होगी या फिर अमूर्त ही होगी, क्योंकि ( परस्पर विरोधी ) दो प्रकारों में से किसी एक ही प्रकार की होगी, दोनों से भिन्न किसी तीसरे प्रकार की नहीं, ( जैसे कि कोई भी वस्तु द्रव्य ही होगी वा अद्रव्य हो, द्रव्य भी न हो और अद्रव्य भी न हो ऐसे किसी तीसरे प्रकार की वस्तु की उपलब्धि नहीं होती है ), अतः मूर्त या अमूर्त इन दोनों को छोड़ कर वस्तुओं का कोई तीसरा प्रकार उपलब्ध नहीं है । अतः मन में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से किसी एक के निश्चित न होने पर भी जिस पुरुष के मन में मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व दोनों की सम्भावना या दोनों के अभाव की भी सम्भावना नहीं है, उस पुरुष को मूत्तंत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों में से एक पक्ष का यह संशय होता है कि मन मुत्तं है या अमूतं? ' ( उ ० ) यह ठीक है कि उस पुरुष को उक्त प्रकार का संशय होता है, किन्तु वह इस कारण नहीं होता कि मन रूप धर्मी में For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-न्यायकन्दली भावमसम्भावयतो भवत्येवान्यतरपक्षे स संशयः । सत्यं भवत्येव • न तु विरुद्धाव्यभिचारिधर्मद्वयसन्निपातात् किन्तु वस्तुत्वात् । यन्मूर्तत्वामूर्तत्वाभ्यां दृष्टसाहचर्यं मनसि प्रतीयमानं स्मृतिद्वारेण तयोरुपस्थापनं करोति । तुल्यबलत्वमभ्युपगम्य विरुद्धाव्यभिचारिणः संशयहेतुत्वं निरस्तम्, न त्वनयोस्तुल्यबलत्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्देशस्य ' अमूर्तं मनः ' इत्यस्यागमेन तदभावादणु मनः ' ( अ ० ७ भा ० १ सू ० २३ ) इति सूत्रेण बाधितत्वात् । अथेदं सूत्रमप्रमाणम्? व्यापकमेव मनः, तदा मनः सद्भावे न किञ्चित् प्रमाण-मस्तीत्यमूर्तं मनः अस्पर्शत्वादिति हेतुराश्रयासिद्धः । अथ युगपज्ज्ञाना-नुत्पत्त्या सिद्धं मनस्तदा धर्मिग्राहकप्रमाणबाधितो युगपज्ज्ञानानुत्पत्तेर्मनसोऽणु-विरुद्धाव्यभिचारी मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व रूप दोनों धर्मों का सन्निवेश है । वह तो इस वस्तुस्थिति के कारण होता है कि क्रियावत्व और अस्पर्शवत्त्व रूप जो दोनों धर्म मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व के साथ क्रमशः घटादि और आकाशादि में ज्ञात हो चुके हैं, उन दोनों की जब मन में प्रतीति होती है, तो वे मूर्त्तत्व और अमूर्त्तत्व इन दोनों को मनरूप धर्मी में उपस्थित कर देते हैं । विरुद्धाव्यभिचारी दोनों हेतुओं को समानबल का मान कर उनमें संशय की हेतुता का खण्डन किया गया है; किन्तु यथार्थ में वे दोनों समानबल के हैं ही नहीं, क्योंकि उन दोनों में से पहिला ' अनुमेयोद्देश ' अर्थात् ' अमूत्तं मनः ' यह प्रतिज्ञावाक्य ' तदभावादणु मन: ' इस सूत्र रूप आगमन से बाधित होने के कारण ' आगमविरोधी ' है । अगर उक्त सूत्र को प्रमाण न मानें, तो फिर मन ( आकाशादि की तरह ) व्यापक द्रव्य ही होगा, ऐसी स्थिति में मन की सत्ता में कोई प्रमाण न रहने के कारण ( अमूत्तं मनः, अस्पर्शवत्त्वात् ) यह हेतु आभयासिद्ध होगा । अगर एक ही समय दो ज्ञानों की उत्पत्ति न होने के कारण मन की सिद्धि मान लें तो मन का अमूर्त्तत्र रूप साध्य मन रूप धर्मी के ज्ञापक ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति ' रूप प्रमाण से ही बाधित होगा, क्योंकि, ' युगपज्ज्ञानानुत्पत्ति ' अर्थात् एक ही समय दो ज्ञानों की अनुत्पत्ति तभी उपपन्न हो सकती है जब कि मन अणु ( मूर्त ) हो, क्योंकि मन अगर व्यापक होगा तो एक ही समय सभी इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध हो सकेगा, जिससे एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति सम्भव हो जाएगी । ' अनुमेयोद्देश ' अर्थात् ज्ञान आगम के विरोध से कौन सा दोष होगा? इसी प्रश्न का समाधान ' अयं तु विरुद्ध-भेद इति ' इस भाष्य वाक्य से किया गया है । अर्थात् ' अनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञा'-इस प्रतिज्ञा लक्षण में ' अविरोधि ' पद के उपादान से जिन प्रत्यक्षादि विरुद्ध प्रतिज्ञा-भासों का निराकरण किया गया है, उन्हीं ( निराकृत प्रतिज्ञाभासों में से ही ) ' अमूर्त मनः' यह आगमविरोधी प्रतिज्ञा भी है । अतः यहाँ प्रतिज्ञाभास ही दोष है, सन्दिग्ध रूप हेत्वाभास नहीं । प्रकृत भाष्य वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द के द्वारा यह व्यक्त किया For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ५१३ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरसन्नेव सोऽन्य-तरासिद्धोऽनध्यवसायहेतुत्वादनध्यवसितः " " यथा सत्कार्यमुत्पत्तेरिति । ( ४ ) कथित अन्यतरासिद्ध हेत्वाभास ही यदि अनुमेय ( पक्ष ) में रहे किन्तु सपक्ष और विपक्ष में न रहे, तो वही ' अनध्यवसाय ' रूप ज्ञान का हेतु होने से ' अनध्यवसित ' नाम का हेत्वाभास कहा जाता है । जैसे कि ( कार्यं सत् उत्पत्तिमत्त्वात् ' इस अनुमान का उत्पत्तिमत्त्व ) हेतु न्यायकन्दली परिमाणत्वे सति सम्भवात् व्यापकत्वे मनसो युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाद्युगपदेव ज्ञानानि प्रसज्यन्ते । अनुमेयोद्देशस्यागमविरोधः किं दूषणमत आह- अयं तु विरुद्धभेद इति । अयमागमविरुद्धोऽनुमेयोद्देशोऽविरोधी प्रतिज्ञेत्यविरोधिग्रहणेन निर्वाततानां प्रत्यक्षादिविरुद्धानां प्रतिज्ञाभासानां प्रभेद एव, नायं सन्दिग्धो हेत्वाभासः । किन्तु विरुद्धप्रभेद एवेति तु शब्दार्थः । अनध्यवसित इत्यसाधारणो हेत्वाभासः कथ्यते । तं व्युत्पादयति-यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानासमानजातीययोरित्यादि । सर्वं कार्यमुत्पादात् पूर्वमपि सदिति साध्यते, उत्पत्तेरिति हेतु: सांख्यानाम् । सति सपक्षे व्योमादा-वसति विपक्षे गगनकुसुमादावभावान्नैकत रपक्षाध्यवसायं करोति । विशिष्टार्थ-गया है कि ( अमूर्त्तत्व का साधक अस्पर्शवत्त्व हेय ) विरुद्ध हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है ( सन्दिग्ध नहीं ) । ' असाधारण ' नाम का हेत्वाभास ही ( इस शास्त्र में ) ' अनध्यवसित ' शब्द से कहा गया है । ' यश्चानुमेये विद्यमानस्तत्समानजातीययोः इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी ( असाधारण ) को समझाते हैं । ' सभी कार्य अपनी उत्पत्ति से पहिले भी ' सत् ' अर्थात् विद्यमान ही है इसको सिद्ध करने के लिए सांख्याचार्यगण ' उत्पत्तेः ' इस हेतुवाक्य का प्रयोग करते हैं । इस वाक्य के द्वारा उपस्थापित यह ' उत्पत्ति ' रूप हेतु ' असाधारण ( या अनध्यवसित ) नाम का हेत्वाभास है, क्योंकि ( सदा से विद्यमान ) आकाश रूप सपक्ष में भी यह हेतु नहीं है, एवं ( सर्वदा असत् ) आकाशकुसुमादि में भी यह ' उत्पत्ति ' रूप हेतु नहीं है, ( क्योंकि आकाश और आकाशकुसुम इन दोनों से किसी की उत्पत्ति नहीं होती ), अत: यह हेतु ( कार्यों को उत्पत्ति से पूर्व सत्त्व और असत्त्व ) इन दोनों में से किसी भी पक्ष का साधन नहीं कर सकता । गगनादि नित्य पदार्थों की तरह घटादि अनित्य पदार्थ भी अगर पहिले से ही हैं, तो फिर ' उत्पत्ति ' रूप हेतु कहाँ रहेगा? कहीं पर निश्चित न रहने के कारण सांख्याचार्यों के इस
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् अयमप्रसिद्धोऽनपदेश इति वचनादवरुद्धः । ननु चायं विशेषः संशय-हेतुरभिहितः शास्त्रे तुम्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथा अनध्यवसित नाम का हेत्वाभास है । सूत्रकार ने इसे ' अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्चानपदेशः ( अ ० ३ आ ० १ सू ० १५ ) इस सूत्र के द्वारा संग्रह किया है । ( प्र ० ) ( सपक्ष और विपक्ष में न रहनेवाले एवं केवल पक्ष में ही रहनेवाले ) हेतु को ' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् ' ( अ ० २ आ ० २ सू ० २२ ) इस वैशेषिक सूत्र में संशय का कारण कहा गया है, न्यायकन्दली क्रियाजननयोग्येन रूपेण पूर्वमनभिव्यक्तस्य पश्चादभिव्यक्तिरेवोत्पत्तिरिति सांख्याः, तेन तेषामुत्पत्तेरिति हेतोर्न स्वतोऽसिद्धता । अयमध्यवसितो हेत्वाभासः केन वचनेन सूत्रकृता संगृहीत इत्याह-अययप्रसिद्धोऽनपदेश ( अ ० ३ आ ० १ सू ० १५ ) इति । अनैकान्तिकवद-साधारणो धर्मः संशयं करोति, तेनास्य ' सन्दिग्धश्चानपदेश: ' इत्यनेन संग्रहो युक्तो न पुनरप्रसिद्धवचनेनेत्यभिप्रायेणाह - ननु ि तुल्यजातीयेष्वर्थान्तर-भूतेष्विति पञ्चम्यर्थे सप्तमी । पदार्थानां विशेषस्तुल्यजातीयेभ्यो भवति, अर्थान्तरभूतेभ्यश्च भवति । यथा पृथिव्यां गन्धवत्त्वं विशेषो द्रव्यान्तरेभ्योऽपि स्याद् गुणकर्मभ्यश्च भवति । शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते । तत् किं उत्पत्ति रूप हेतु में असत्कार्यवादियों को स्वतः असिद्धता का आक्षेप करना उचित नहीं है, क्योंकि ( जल हरणादि ) विशेष कार्यों के उपयोगी रूप से अनभिव्यक्त ( किन्तु सर्वदा विद्यमान घटादि ) कार्यों को अभिव्यक्ति ही सांख्याचार्यों के मत से कार्यों की ' उत्पत्ति ' है । इस ' अनध्यवसित ' हेत्वाभास का संग्रह सूत्रकार ने किस सूत्र ( वचन ) से किया है? इसी प्रश्न का समाधान ' अयमप्रसिद्धोऽनपदेश: ' भाष्य के इस वाक्य के द्वारा किया गया है । अनैकान्तिक ( सव्यभिचार ) हेत्वाभास की तरह यह असाधारण ( अनध्यवसित ) हेत्वाभास भी ( साध्य ) संशय को उत्पन्न करता है, अतः इसका संग्रह ' सन्दिग्धश्चा-नपदेशः ' सूत्र के इस अंश के द्वारा ही होना उचित है, ' अप्रसिद्धवचन ' अर्थात् ' अप्रसिद्धोऽन-पदेश: ' इस अंश के द्वारा नहीं । ' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु ' इस वाक्य के दोनों पदों में सप्तमी विभक्ति का प्रयोग पञ्चमी विभक्ति के अर्थ में किया गया है । ( अभिप्राय यह है कि ) पदार्थों का अपने सजातीय और विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों को अपेक्षा ' विशेष ' अर्थात् असा-धारण धर्म होता है । जैसे कि पृथिवी का गन्धवत्त्व रूप ' विशेष ' उक्त दोनों ही प्रकार से पृथ्वी का विशेष है, क्योंकि गन्धवत्त्व पृथिवी के ( द्रव्यत्व रूप से ) सजातीय जलादि द्रव्यों में भी नहीं है, और उसके विजातीय गुणादि पदार्थों में भी नहीं है । इसी प्रकार शब्द में भी श्रावणत्व ( श्रवणेन्द्रिय से गृहीत होना ) रूप ' विशेष ' है । उसके प्रसङ्ग For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५ ९ ५ दृष्टत्वादिति ( अ, २ आ. २ सू. ७ ) नान्यार्थत्वाच्छब्दे - विशेषदर्शनात् । संशयानुत्पत्तिरित्युक्ते नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः स्याच्छ्रावणत्वं अतः कथित अनध्यवसित हेत्वाभास असाधारण के उक्त लक्षण से युक्त होने के कारण संशय रूप ज्ञान का ही कारण होगा अनध्यवसाय रूप ज्ञान का नहीं, क्योंकि वस्तुओं के विशेष ( व्यक्तिगत ) धर्म ही उनके सजातीयों और विजातीयों की अपेक्षा ' असाधारण ' समझ जाते हैं । ( उ ० ) यह आक्षेप युक्त नहीं है, क्योंकि उस सूत्र का कुछ दूसरा ही र्थ है । किसी ने आक्षेप किया था कि शब्द में सुनना ) रूप उसका असाधारण ( विशेष ) धर्म श्रावणत्व ( कान से न्याय कन्दली शब्दस्य रूपादिभ्यः समानजातीयेभ्योऽयं विशेष:? किं वा विजातीयेभ्यः? यदि शब्दो गुणस्तदा रूपादिभ्यः सजातीयेभ्यो विशेषोऽयम्, अथ द्रव्यं कर्म वा? तदा विजातीयेभ्य इति शब्दे श्रावणत्वाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इति पूर्ववादिना सूत्र विरोधे दर्शिते सत्याह - नान्यार्थत्वादिति । नायं सूत्रार्थी यदसाधारणो धर्मः संशयहेतुरिति किन्त्वस्यान्य एवार्थः । तमेवार्थं दर्शयति-शब्दे विशेषदर्शनादित्यादिना । श्रोत्रग्रहणो योऽर्थः स शब्द इति प्रतिपाद्य तस्मिन् द्रव्यं गणः कर्मेति संशय इत्यभिहितं सूत्रकारेण । तस्यायमर्थः - तस्मिन् में यह वितर्क उपस्थित होता है कि शब्द में क्या उसके सजातीय रूपादि गुणों की अपेक्षा यह ' श्रावणत्त्र, रूप विशेष है, अथवा द्रव्यकर्मादि विजातीय पदार्थों की अपेक्षा यह ' विशेष ' है? शब्द अगर गुण है तो फिर रूपादि उसके सजातीयों की अपेक्षा ही श्रावणत्व उसका विशेष है । शब्द अगर द्रव्य या कर्म है? तो फिर विजातीय की अपेक्षा ही यह श्रावणत्व रूप विशेष शब्द में है । इस रीति से श्रावणत्व रूप असाधारण धर्म के द्वारा शब्द में ' यह द्रव्य है? या गुण है? अथवा कर्म है? इस प्रकार के संशय की आपत्ति के द्वारा सूत्रविरोध का प्रसङ्ग पूर्वपक्षवादियों के उठाने पर उसके समाधान के लिए ही भाष्यकार ने ' न, अन्यार्थत्वात् ' यह वाक्य लिखा है । अर्थात् उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि ' असाधारण धर्मं संशय का कारण है ' उस सूत्र का कोई दूसरा ही अर्थ है ' शब्दे विशेषदर्शनात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वही दूसरा अर्थ प्रतिपादित हुआ | ' जो वस्तु श्रवणेन्द्रिय के द्वारा गृहीत हो वही शब्द है ' यह प्रतिपादन करने के बाद सूत्रकार ने कहा कि ( श्रोत्रग्राह्य ) उस वस्तु में यह संशय होता है कि ' यह द्रव्य है? या गुण है? अथवा कर्म है? " इस पर पूर्वपक्षवादी ने कहा कि श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले शब्द रूप अर्थ में जिन संशयों का तुमने उल्लेख किया है उससे ' श्रोत्रग्राह्यत्व ' रूप असाधारण धर्म में ही उक्त संशयों की कारणता व्यक्त होती है । किन्तु सो ठीक नहीं है, क्योंकि For Private And Personal