प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 671–680
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 671–680
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-प्रशस्तपादभाष्यम् किन्तु सामान्यमेव सम्पद्यते, कस्मात्? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वादित्युक्तम्, न संशय-देखा जाता है, अत: कान से सुने जानेवाले एवं सत्ता जाति से सम्बद्ध शब्द में ' यह द्रव्य है? या गुण है? ' अथवा कर्म है? ' इस प्रकार का संशय नहीं होगा । इसी आक्षेप के समाधान में उक्त सूत्र के द्वारा कहा गया है कि श्रावणत्व द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से किसी का ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म नहीं है । उनका वह साधारण धर्म ही प्रतीत होता है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों से प्रत्येक द्रव्य, प्रत्येक गुण, एवं प्रत्येक कर्म के असाधारण धर्म अपने सजातीयों के ( अर्थात् अपने में और अपने सजातीयों में समान रूप से रहनेवाले ) सामान्य धर्म के साथ ही देखा न्यायकन्दली श्रोत्रग्रहणेऽर्थे संशयः किं द्रव्यं किं वा गुणः किमुत कर्मेति । अत्र परेणोक्तम्- -श्रोत्रग्रहणे शब्दे संशयं वदता त्वया श्रोत्रग्राह्यत्वमेव संशयकारणत्वमुक्तम् । श्रोत्रग्राह्यत्वं च विशेषः, तस्य दर्शनात् संशयानुपपत्तिः । विरुद्धोभयस्मृतिपूर्वको हि संशयः, स्मृतिश्च नासाधारणधर्मदर्शनाद्भवति, तस्थ केनचिद्विशेषेण सहा-नुपलम्भादिति परेणोक्ते सति सूत्रकारेण प्रतिविहितमेतत्, नायं द्रव्यादीना-मन्यतमस्य विशेषः श्रावणत्वम्, द्रव्यगुणकर्मणां मध्येऽन्यतमस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा श्रावणत्वं विशेषो न भवति, किन्तु तेषां सामान्यमेवेदं सम्पद्यते, कस्मात्? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु च द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेष-स्योभयथा दृष्टत्वादित्युक्तम् । भिद्यन्ते इति भेदाः, द्रव्यादय एव भेदा श्रोत्रग्राह्यत्व शब्द का ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म है, अतः उसके ज्ञान से संशय नहीं हो सकता । चूँकि विरुद्ध दो कोटियों की उपस्थिति स्मृति का कारण है, यह स्मृति असाधारण धर्म के ज्ञान से सम्भव नहीं है, क्योंकि किसी भी विशेष धर्म के साथ उनकी उपलब्धि नहीं होती है । पूर्वपक्षवादियों के द्वारा यह आक्षेप किये जाने पर महर्षि कणाद ने यह समाधान किया है कि जिस श्रावणत्व धर्म का उल्लेख किया गया है, वह द्रव्यादि में से किसी एक का ' विशेष ' नहीं है, अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा कर्म इन तीनों में से श्रावणत्व किसी एक का ' विशेष ' नहीं है, किन्तु उन तीनों का वह सामान्य ही प्रतिपन्न होता । अपने इस उत्तर के प्रसङ्ग में ' कस्मात् ' अर्थात् किस हेतु से आप यह बात कहते हैं? यह पूछे जाने पर सूत्रकार ने “ तुल्यजातीयेष्वर्थान्तर-भूतेषु द्रव्यादिभेदानामनेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वात् " इत्यादि सूत्र के द्वारा इसका For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir करणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III द्रव्यादिभेदा द्रव्यगुणकर्माणि तेषां मध्ये एकैकस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यो विशेष ' उभयथादृष्टः ' । पृथिव्याः स्वसमानजातीयेभ्यो विशेषः पृथिवीत्वं द्रव्यत्वेन सह दृष्टम्? रूपस्य विशेषो रूपत्वं गुणत्वेन सह दृष्टम्, उत्क्षेपणस्य विशेष उत्क्षेप-त्वं कर्मत्वेन सह दृष्टम् । शब्दस्यापि श्रावणत्वं विशेष: गुणत्वेन, तस्मा-देतदपि विशेषत्वेन रूपेण द्रव्यदीनां सामान्यमेव । ततश्चास्य तेन रूपेण संशयहेतुत्वं युक्तम् । यत् पुनरसाधारणं रूपं न तत् संशयकारणम्, विशेष-स्मारकत्वाभावादित्याह - न संशयकारणमिति । तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्य-इति वक्तव्ये सूत्रे सप्तम्यभिधानादेषोऽप्यर्थो गम्यते । शब्दे श्रावणत्वविशेषदर्शनाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशयः । द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्य तुल्यजातीयेषु सपक्षेष्वर्थान्तरभूतेषु विपक्षेषु दर्शनादिति । किमुक्तं स्यात्? विशेषो द्रव्ये गुणे उत्तर दिया है । भिद्यन्त इति भेदा: द्रव्यादय एव भेदा द्रव्यादिभेदा: इस व्युत्पत्ति के अनुसार उक्त में ' द्रव्यादिभेद ' शब्द से द्रव्य कर्म, ये तीनों ही सूत्र प्रयुक्त गुण और अभिप्रेत हैं । उन तीनों में से एक एक का अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा कर्म का इनमें से सभी में ' तुल्यजातीयों ' से अर्थात् समानजातीयों एवं ' अर्थान्तरभूत वस्तुओं ' से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों प्रकार की वस्तुओं से ' विशेष ' अर्थात् व्यावृत्ति देखी जाती है । दोनों प्रकार से व्यावृत्ति या विशेष का यह देखा जाना ही सूत्र के ' उभयथादृष्ट ' शब्द से अभिप्रेत है । पृथिवी का ' विशेष ' है पृथिवीत्व, जो ( उसके समानजातीय जलादि द्रव्यों में रहनेवाले ) द्रव्यत्व के साथ ही पृथिवी में है । रूप का ' विशेष ' है रूपत्व, जो रूप में गुणत्व के साथ ही देखा जाता है । एवं उत्क्षेपण रूप क्रिया का विशेष हे उत्क्षेपणत्व, जो कर्मत्व के साथ ही देखा जाता है । इसी तरह शब्दों का श्रावणत्व रूप विशेष भी गुणत्व के साथ ही रहेगा । अतः यह श्रावणत्व रूप धर्म ( गन्ध-वत्त्वादि अन्य सभी विशेषों के समान होने के कारण ' सामान्य ' ही है ( साधारण धर्म ही है ) ' विशेष ' अर्थात् असाधारण धर्म नहीं, अतः श्रावणत्व शब्द में द्रव्यत्वादि संशय का अवश्य ही कारण है, किन्तु असाधारण धर्म होने के नाते नहीं किन्तु साधारण धर्म होने के नाते ही । असाधारण धर्म कभी संशय का कारण होता ही नहीं क्योंकि वह किसी व्यावृत्ति का ( अभाव का ) स्मारक नहीं है । यही बात भाष्यकार ने ' न संशय-कारणम् ' इस वाक्य से कही है । ' तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु ' इत्यादि सूत्र में साधारण रीति से प्राप्त पञ्चमी विभक्ति से युक्त ' तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यः ' इस प्रकार के पदों का प्रयोग न कर उक्त सप्तमी विभक्ति से युक्त पदों के प्रयोग से भी यही मालूम होता है कि शब्द में श्रावणत्व रूप विशेष के ज्ञान से यह संशय होता है कि ' शब्द द्रव्य है? अथवा गुण है? कि वा कर्म है? ' क्योंकि ' द्रव्यादि भेदों ' के अर्थात् द्रव्य ' गुण और कर्म में से प्रत्येक के ' विशेष ' से अपने आश्रय को तुल्यजातीयों से अर्थात् सपक्षों से, और For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५ ९ ८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-प्रशस्तपादभाष्यम् कारणम् । अन्यथा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्य-प्रत्ययादेव संशय इति । द्विविधं निदर्शनं साधम्र्येण वैधम्र्येण च । तत्रानुमेय-सामान्येन लिङ्गसामान्यस्यानुविधानदर्शनं साधर्म्य निदर्शनम् । तद्यथा जाता है । उक्त सूत्र के द्वारा यह नहीं कहा गया है कि त्रिशेष ( आसाधारण ) धर्म संशय का कारण है । अगर ऐसी बात न हो तो ( शब्द में गुणत्व के संशय की तरह ) छः पदार्थों में भी अविराम संशय की आपत्ति होगी । अत: सामान्य ( साधा-रण ) धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है ( असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं ) । ( अन्वय ) साधर्म्य एवं ( व्यतिरेक ) वैधर्म्य भेद से निदर्शन ( उदा-हरण ) भी ( १ ) साधम्र्योदाहरण और ( २ ) वैधम्र्योदाहरण भेद से दो प्रकार का है । इनमें अनुमेय ( साध्य ) सामान्य के साथ लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य न्यायकन्दली कर्मणि च दृष्टः । शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते, तस्माद्विशेषत्वाद् द्रव्यादिविषयः संशयः । यदि चासाधारणमपि रूपं संशयकारणम्, तदा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गः? सर्वेषामेव तेषामसाधारणधर्मयोगित्वात्, ततश्च संशय-स्याविरामप्रसङ्ग इत्याह- अन्यथेति । उपसंहरति तस्मादिति । साधारणो धर्मो विरुद्धविशेषाभ्यां सह दृष्टसाहचर्य:, तयोः स्मरणं शक्नोति कारयितु-मतस्तद्दर्शनादेव संशयो भवति, नासाधारणधर्मदर्शनादित्युपसंहारार्थः । निदर्शनस्वरूपनिरूपणार्थमाह - द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधम्र्येण चेति । साध्यसाधनयोरनुगमो निदर्यते येन वचनेन तद्वचनं साधर्म्य-विपक्षों से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों से व्यावृत्तिबुद्धि का उत्पादन देखा जाता है । इस का फलितार्थ क्या हुआ? यही कि द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में ही ' विशेष ' देखे जाते हैं, एवं शब्द में भी श्रावणत्व रूप विशेष देखा जाता है, अतः संशय होता है कि ' शब्द द्रव्य है? अथवा गुण है? कि वा कर्म है? ' अगर असाधारण धर्म भी संशय का कारण हो तो फिर छः पदार्थों में ही संशय की आपत्ति होगी, क्योंकि वे सभी असाधारण धर्म से युक्त है । जिससे संशय की अनन्त धारा की आपत्ति होगी । यही बात ' अन्यथा ' इत्यादि ग्रन्थ से आचार्य ने कही है । ' तस्मात् ' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । इस उपसंहार ग्रन्थ का आशय है कि परस्परविरुद्ध दो विशेष धर्मों के साथ दृष्ट होने के कारण साधारण धर्म हो उन परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों की स्मृति को उत्पन्न कर सकता है । अत: साधारण धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है, असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं | ' द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च ' भाष्य का यह वाक्य ' निदर्शन ' के स्वरूप को समझाने के लिए लिखा गया है । ' साध्य और हेतु का एक जगह रहना ' For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ५६६ यत् क्रियावत् तद् द्रव्यं दृष्टं यथा शर इति । अनुमेयविपर्यये च लिङ्गस्याभावदर्शनं वैधर्म्य निदर्शनम्, तद्यथा यदद्रव्यं तत् क्रियावन्न भवति यथा सत्तेति । अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति । की अनुगति जहाँ देखी जाए वह साधर्म्य निदर्शन है । जैसे कि जिसमें क्रिया देखी जाती है, वह द्रव्य ही होता है, जैसे कि तीर ( में क्रिया देखी जाती है और वह द्रव्य है ) । अनुमेय ( साध्य ) के अभाव के साथ लिङ्ग ( हेतु ) के अभाव का आनुगत्य जहाँ देखा जाए वह ' वैधर्म्य निदर्शन ' है । जैसे कि ( क्रिया युक्त किसी वस्तु को देख कर उसमें द्रव्यत्व के अनुमान के लिए प्रयुक्त ) जो द्रव्य नहीं है, उसमें क्रिया भी नहीं रहती है, जैसे कि सत्ता ( जाति द्रव्य नहीं है, अतः उसमें क्रिया भी नहीं है ) । अतः उक्त अनुमान में सत्ता वैधर्म्य निदर्शन है । निदर्शनों के इन लक्षणों से ( जो वस्तुतः निदर्शन नहीं हैं, किन्तु अज्ञ के द्वारा निदर्शन रूप से प्रयुक्त होने के कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं उन ) निदर्शनाभासों में निदर्शनत्व खण्डित हो जाता है । न्यायकन्दली निदर्शनम्, साध्यव्यावृत्त्या साधनव्यावृत्तिर्येन वचनेन निदश्यते तद्वैधम्र्म्यनिदर्शन-मिति भेदः । तत्र तयोर्मध्ये साधर्म्यनिदर्शनं कथयति - तत्रानुमेयेत्यादिना । तद्वयक्तमेव । वैधर्म्यनिदर्शनं कथयति - अनुमेयविपर्यय इत्यादिना । तदपि व्यक्तमेव । जिस वाक्य से ' निर्देशित ' हो, उसे ' साधम्र्म्यनिदर्शन ' कहते हैं । एवं जिस वाक्य से साध्य के अभाव के द्वारा हेतु का अभाव निर्दिष्ट हो, उसे ' वैधर्म्यनिदर्शन ' कहते हैं, यही दोनों ( निदर्शनों ) में अन्तर है । ' तत्र ' अर्थात् उन दोनों में ' तत्रानुमेयसामान्येन ' इत्यादि वाक्य के द्वारा ' साधर्म्यनिदर्शन ' का उपपादन हुआ है । इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट है । ' अनुमेय विपर्यय ' इत्यादि वाक्य के द्वारा " वैधर्म्य निदर्शन ' का उपपादन हुआ है, उस वाक्य का भी अर्थ स्पष्ट ही है । ' अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति ' जो वस्तुतः ' निदर्शन ' नहीं है, वह भी निदर्शन के किसी सादृश्य के कारण निदर्शन की तरह प्रतीत होते हैं, इस प्रकार जो निदर्शनाभास अर्थात् निदर्शन न होने पर भी निदर्शन के समान हैं, वे ' अनेन ' अर्थात् निदर्शन के इस प्रकार के लक्षण के निर्देश से निदर्शन की श्रेणी से अलग हो जाते हैं, क्योंकि उन निदर्शनाभासों में निदर्शन का यह लक्षण नहीं है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६०० न्याय कन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-प्रशस्तपादभाष्यम् तद्यथा - नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् यदमूर्त्त दृष्टं तभिस्यम्, यथा परमाणुर्यथा कर्म, यथा स्थाली, यथा तमः अम्बरवदिति, यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगत-विपरीतानुगताः साधर्म्य निदर्शनाभासाः । अगर कोई शब्द में नित्यत्व के साधन के लिए अमूर्त्तत्व हेतु को उपस्थित कर ( शब्दो नित्यः, अमूर्त्तत्वात् ) ( १ ) परमाणु, ( २ ) क्रिया, ( ३ ) वर्त्तन, ( ४ ) अन्धकार, ( ५ ) आकाश जैसी वस्तुओं को ( साधर्म्य ) निदर्शन के लिए उपस्थित करे तो ( उक्त अनुमान के लिए ) ये सभी ( साधर्म्य ) निदर्शना भास ' होंगे । एवं आकाशादि निष्क्रिय द्रव्यों में केवल द्रव्यत्व हेतु से अगर कोई क्रियावत्त्व अनुमान के लिए ( ६ ) तीर प्रभृति सक्रिय द्रव्य को उपस्थित करे तो वह भी साधर्म्य निदर्शनाभास ही होगा । कथित ये ( छ: ) वस्तु कथित अनुमान के लिए प्रयुक्त होने पर साधर्म्य निदर्शन के निम्नलिखित छः दोषों में से क्रमशः एक से युक्त होने कारण ' साधर्म्य निदर्शनाभास ' ही होंगे, इन दोषों के ( १ ) लिङ्गासिद्धि, ( २ ) अनुमेयासिद्धि, ( ३ ) उभयासिद्धि, ( ४ ) आश्रयासिद्धि, ( ५ ) अननुगत और विपरीतानुगत ( ये छ: नाम हैं ) । न्यायकन्दली अनेन निदर्शनाभासा निरस्ता भवन्ति । अनिदर्शनान्यपि केन-चित् साधर्म्येण निदर्शनवदाभासन्त इति निदर्शनसदृशाः, अनेन निदर्शनलक्ष-नार्थान्निरस्ता भवन्ति, तल्लक्षणरहितत्वात् । यावन्निदर्शनाभासानां स्वरूपं न ज्ञायते तावत् तेषां स्ववाक्ये वर्जनं परवाक्ये चोपालम्भो न शक्यते कर्तुम्, अतस्तेषां स्वरूपं कथयति - यथा नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात् यदमूर्तं तन्नित्यं दृष्टम्, यथा परमाणुः, यथा कर्म, यथा स्थाली, यथा तमोऽम्बरवत् निदर्शनाभासों का स्वरूप जबतक ज्ञात न हो जाए, तबतक न तो अपने द्वारा किये जानेवाले प्रयोगों में उनसे बचा जा सकता है, और न दूसरे यदि उनका प्रयोग करें तो उन वाक्यों में ( निदर्शनाभास रूप ) दोष का दिखाना ही सम्भव हो सकता हैं. अतः ' तद्यथा ' इत्यादि वाक्यों से उनके उदाहरण और अन्त में उनके भेद दिखलाये गये हैं । अर्थात् ( १ ) लिङ्गासिद्ध, ( २ ) अनुमेयासिद्ध, ( ३ ) उभयासिद्ध, ( ४ ) आभया-सिद्ध, ( ५ ) अननुगत और ( ६ ) विपरीतानुगत ये छ: भेद ' निदर्शनाभास ' के हैं । ( १ ) ' नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् यथा परमाणु: ' अर्थात् शब्द में अमूर्त्तत्व हेतु से निरवयत्व के साधन के लिए कोई अगर ' यदमूर्तं तन्नित्यम्, यथा परमाणु: ' इस प्रकार के निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे तो वह ' लिङ्गासिद्ध ' निदर्शनाभास होगा, क्योंकि परमाणु For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६०१ न्यायकरदली For Private And Personal यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगतविपरीता-नुगताः साधर्म्यनिदर्शनाभासाः । नित्यः शब्दोऽमूर्तत्वात्, यथा परमाणु-रिति लिङ्गासिद्धो निदर्शनाभासः परमाणोरमूर्तत्वाभावात् । यथा कर्मेत्यनु-मेयासिद्ध:, कर्मणो नित्यत्वाभावात् । यथा स्थालीत्युभया सिद्ध:, न स्थाल्यां साध्यं नित्यत्वमस्ति, नापि साधनममूर्तत्वम् । यथा तम इत्याश्रयासिद्धः । परमार्थतस्तमो नाम न किञ्चिदस्ति, क्व साध्यसाधनयोर्व्याप्तिः कथ्यते? अम्बरवदित्यननुगतोऽयं निदर्शनाभासः । यद्यप्यम्बरे नित्यत्वममूर्त्तत्वमुभयमप्यस्ति तथापि यदमूर्तं तन्नित्मेवं न ब्रूते, किन्त्वम्बरवदित्येतावन्मात्रमाह । न चेतस्माद् वचनादप्रतिपन्नसाध्यसाधनयोरम्बरे सद्भावप्रतीतिरस्ति, तस्मादननु. के मूर्त होने के कारण उसमें अमूर्त्तत्व नाम का हेतु ही सिद्ध नहीं है । ( निदर्शन में साध्य की तरह हेतु का निश्चित रहना भी आवश्यक है ) । ( २ ) नित्यः शब्दोऽमूर्त्तत्वात् ' इसी अनुमान में अगर कोई ' यदमूतं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा कर्म ' इस निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे तो वह अनुमेयासिद्ध ' निदर्शनाभास होगा, क्योंकि क्रिया में नित्यत्व रूप अनुमेय अर्थात् साध्य ही सिद्ध नहीं है । ( ३ ) उसी अनुमान में ' यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा स्थाली इस प्रकार के निम्दर्शनवाक्य का अगर कोई प्रयोग करे तो वह ' उभयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा, क्योंकि स्थाली ( बटलोही ) में नित्यत्व रूप अनुमेय और अमूर्त्तत्व रूप लिङ्ग दोनों हो सिद्ध नहीं हैं । ( ४ ) उसी अनुमान में कोई अगर ' यदमूर्त्तं दृष्टं तन्नित्यम्, यथा तमः ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य का प्रयोग करे, तो वह आश्रयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा, क्योंकि तम नाम का कोई ( भाव ) पदार्थ वस्तुत: है ही नहीं, साध्य और हेतु की व्याप्ति का प्रदर्शन कहाँ होगा? ( क्योंकि निदर्शन का यही प्रयोजन है कि वहाँ साध्य और हेतु को व्याप्ति निश्चित रहे, जिससे कि प्रकृत पक्ष में साध्य की सिद्धि के लिए उसका प्रयोग किया जा सके । ) ( ५ ) ' शब्दो नित्यः, अमूर्त्तत्वात् ' इसी स्थल में अगर उदाहरण को दिखाने के लिए ' अम्बरवत् ' केवल इतने ही अंश का कोई प्रयोग करे ' यदमूर्तं तन्नित्यम् ' इस अंश का प्रयोग न करे तो वह ' अननुगत ' नाम का निदर्शनाभास होगा । यद्यपि आकाश में नित्यत्व और अमूर्त्तत्व ये दोनों ही हैं, फिर भी ' यदमूर्त्त तन्नित्यम् ' इस अंश का प्रयोग नहीं किया गया है, किन्तु केवल ' अम्बरवत् ' इतना ही कहा गया है, केवल इसी त्रुटि से यह ' अननुगत ' नाम का हेत्वाभास होगा । क्योंकि इस वाक्य के बिना पहिले से अज्ञात साध्य और हेतु इन दोनों की सत्ता का ज्ञान आकाश में नहीं हो सकेगा, अतः यह ( साध्य और हेतु आकाश रूप अधिकरण में अनुगत रूप से ज्ञापक न होने के कारण ) ' अननुगत ' नाम का निदर्शनाभास है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६०२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-न्यायकन्दली तोऽयं निदर्शनाभासः । यद् द्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टमिति विपरीतानुगतः, द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वादित्यत्रापि व्याप्यं क्रियावत्त्वं व्यापकं च द्रव्यत्वम् । यच्च व्याप्यं तदेकनियता व्याप्तिर्न संयोगवदुभयत्र व्यासज्यते, व्यापकस्य व्याप्यव्यभिचारात् । यत्रापि समव्याप्ति के कृतकत्वानित्यत्वादौ व्याप्यस्यापि व्यापकत्वमस्ति तत्रापि व्याप्यत्वरूपं समाश्रित्यैव व्याप्तिर्न व्यापकत्वरूपा-श्रयत्वात्, व्यभिचारिण्यपि तद्रूपस्यापि सम्भवात् । यथोपदिशन्ति गुरवः -व्यापकत्वगृहीतस्तु व्याप्यो यद्यपि वस्तुत: । आधिक्येऽप्यविरुद्धत्वाद् व्याप्यं न प्रतिपादयेत् ॥ इति । ( ६ ) ' द्रव्यं वायुः क्रियावत्वात् ' इस अनुमान के लिए अगर कोई ' यद्रव्यं तत् क्रियावद् दृष्टम् ' इस प्रकार ( ' यत् क्रियावत् तत् द्रव्यं दृष्टम् ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य प्रयोग न करके ) उसके विपरीत वाक्य का कोई प्रयोग करे, तो वह निदर्शन न होकर ' विपरीतानुगत ' नाम का निदर्शनाभास होगा । क्योंकि इस अनुमान में ' क्रियावत्त्व ' हेतु है, अतः वही व्याप्य है, एवं साध्य होने के कारण द्रव्यत्व ही व्यापक है । अनुमान की उपयोगी व्याप्ति केवल व्याप्त ( हेतु ) में ही रहती है, व्यापक ( साध्य ) में नहीं । एक ही व्याप्ति संयोग की तरह व्यापक और व्याप्य अपने दोनों सम्बन्धियों में व्याप्त होकर रहनेवाली वस्तु नहीं है । क्योंकि ( साध्य ) व्यापक में व्याप्य ( हेतु ) की व्याप्ति नहीं ( भी ) रहती है, क्योंकि साध्य हेतु के बिना भी देखा जाता है । जिन समव्याप्तिक ( जिस अनुमान के साध्य और हेतु दोनों समान आश्रयों में हों, साध्य का आश्रय हेतु के आश्रय से अधिक न हो ) स्थलों में जैसे कि ' घटोऽनित्यः कृतकत्वात् ' इत्यादि अनुमान के कृतकत्व हेतु में व्याप्यत्व की तरह साध्य का व्यापकत्व भी हैं, फिर भी कृतकत्व हेतु में जो अनित्यत्वरूप साध्य की व्याप्ति है, वह इसी कारण है कि वह साध्य का व्याप्य है । इसलिए कृतकत्व हेतु में अनित्यत्व रूप साध्य की व्याप्ति नहीं है कि कृतकत्वरूप हेतुमित्यत्वरूप साध्य का व्यापक है । अगर साध्य के व्यापक होने के कारण ही साध्य की व्याप्ति हेतु में मानें तो ( ' धूमवान् वह्नेः ' इत्यादि ) व्यभिचारी स्थलों के हेतुओं में भी साध्य की व्याप्ति माननी होगी । क्योंकि व्याप्ति के प्रयोजक साध्य का व्यापकत्व तो वहाँ भी है ही ( वह्नि धूम का व्यापक है ही ) । जैसा कि गुरुचरणों का उपदेश है कि: - ( किसी ) व्याप्य ( हेतु ) में भी साध्य की व्यापकता वस्तुतः रहने पर भी वह हेतु व्यापक होने के कारण व्याप्य का ( अपने से व्याप्य साध्य का केवल उसके व्याप्य होने के कारण ) ज्ञापन नहीं कर सकता, क्योंकि साध्य की व्यापकता ( केवल समव्याप्त हेतु में ही नहीं, किन्तु ) साध्य से अधिक स्थानों में रहनेवाले ( व्यभिचारी ) हेतु में भी है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६०३ यदनित्यं तन्मूर्त दृष्टम्, यथा कर्म यथा परमाणुर्यथाकाशं यथा तमः, घटवत्, यन्निष्क्रियं तदद्रव्यञ्चेति लिङ्गानुमेयोभयाव्या-वृत्ताश्रयासिद्धाव्यावृत्तविपरीतव्यावृत्ता वैधर्म्यनिदर्शनाभासा इति ॥ ( रूपादि अनित्य गुणों में यदि कोई अनित्यत्व हेतु से मूर्त्तत्व के साधन के लिए प्रस्तुत होकर वैधर्म्यनिदर्शन के लिए ( १ ) क्रिया, ( २ ) परमाणु ( ३ ) आकाश, ( ४ ) अन्धकार और ( ५ ) घट जैसी वस्तुओं को उपस्थित करे तो ये सभी वस्तुयें ( उक्त अनुमान के लिए प्रयुक्त होने पर ) ' वैधर्म्यनिदर्शनाभास ' होंगे । एवं ( आकाशादि निष्क्रिय द्रव्यों में द्रव्यत्व हेतु से क्रियावत्त्व के अनुमान के लिए प्रयुक्त सत्ता जाति भी ) जिसमें क्रिया नहीं है, वह द्रव्य भी नहीं है, जैसे कि ( ६ ) ' सत्ता ' इस प्रकार से प्रयुक्त होने पर वैधर्म्यनिदर्शनाभास ' ही होगा । ( वैधर्म्यनिदर्शनाभास रूप दोषों के ये छ: नाम हैं - ( १ ) लिङ्गाव्यावृत्त ( २ ) अनुमेयाव्यावृत्त, ( ३ ) उभयाव्यावृत्त, ( ४ आश्रयासिद्ध, ( ५ ) अव्यावृत्त और ( ६ ) विपरीत व्यावृत्त ( तदनुसार वैधर्म्यनिदर्शनाभास रूप दुष्ट निदर्शन भी छ: हैं ) न्यायकन्दली अतो व्याप्तिर्व्याप्यगतत्वेन दर्शनीया ' यत् क्रियावत् तद् द्रव्यमिति । व्यापक तत्र तस्या अभावात्, अतो विपरीतानुगतोऽयम् । लिङ्गं चानुमेयं चोभयं चाश्रयश्च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयाः, तेऽसिद्धा येषां ते लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाः, लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाश्चाननुगताश्च विपरी तानुगताश्चेति योजना । वैधर्म्यनिदर्शनाभासान् कथयति - यदनित्यमित्यादिना । नित्यः शब्दोऽ. मूर्त्तत्वाद् यदनित्यं तन्मूर्तं यथा कर्मेति लिङ्गाव्यावृत्तो वैधर्म्यनिदर्शना-अतः व्याप्य ( हेतु ) में ही व्याप्ति की वर्तमानता दिखानी चाहिए, जैसे कि ' यत् क्रियावत् तद् द्रव्यम् ' इस प्रकार के वाक्यों से होता है । व्यापक में व्याप्ति को नहीं दिखाना चाहिए, क्योंकि व्यापकीभूत वस्तु में रहनेवाली व्याप्ति ( अनुमिति की उपयोगी ) नहीं है । अत: ' यत् द्रव्यं तत् क्रियावत् ' इत्यादि प्रकार के निदर्शनवाक्य ' विपरीतानुगत ' निदर्शनाभास ही हैं । ' लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाननुगत विपरीतानुगताः ' इस समस्तवाक्य का विग्रह ' लिङ्गञ्चानुमेयश्वोभयश्वाश्रयश्च लिङ्गानुमेयोभयाश्रयाः, ते असिद्धा येषां ते लिङ्गानु-मेयोभयाश्रयासिद्धाः, लिङ्गानुमेयोभयाश्रयासिद्धाश्चाननुगताश्च विपरीतानुगताश्च ' इस प्रकार समझना चाहिए । ' यदनित्यम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वैधर्म्य निदर्शनाभासों का उपपादन करते ! वैधम्यं निदर्शनाभास भी निम्नलिखित छ: प्रकार के हैं, ( १ ) लिङ्गाव्यावृत्त, ( २ ) अनुमे-For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६०४ न्यायकन्दलीसंचलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-न्यायकन्दली भासः, कर्मणो मूर्त्यभावात् । यथा परमाणुरित्यनुमेयाव्यावृत्तः, अनुमेयं नित्यत्वं परमाणोरव्यावृत्तम् । यथाकाशमित्युभयव्यावृत्तः, नाकाशादमूर्तत्वं नापि नित्यत्वं व्यावृत्तम् । यथा तम इत्याश्रयासिद्धः । परमार्थतस्तु तम एव नास्ति, किमाश्रया साध्यसाधनयोर्व्यावृत्तिः स्यात् । घटवदित्यव्यावृत्तः । यद्यपि घटे साध्यसाधनयोरस्ति व्यावृत्तिः, तथापि यदनित्यं तन्मूर्तमित्येवं न याव्यावृत्त, ( ३ ) उभयाव्यावृत्त, ( ४ ) आश्रयासिद्ध, ( ५ ) अव्यावृत्त और ( ६ ) विपरीतव्यावृत्त । ( १ ) ' नित्यः शब्दः, अमूर्त्तत्वात् ' रूप में इस अनुमान के लिए कोई यदि ' यदनित्यं तन्मूर्त्तम्, यथा कर्म ' इस प्रकार से कर्म को वैधर्म्यनिदर्शन न उपस्थित करे तो वहाँ कर्म ' लिङ्गाव्यावृत्त ' नाम का वैधर्म्यनिदर्शनाभास होगा । क्योंकि क्रिया रूप विपक्ष में अमूर्त्तत्व रूप लिङ्ग की अव्यावृत्ति अर्थात् अभाव नहीं है । क्रिया में नित्यत्त्र रूप साध्य तो नहीं है, किन्तु अमूर्त्तत्व रूप हेतु है । ( ६ ) ' नित्यः शब्दः, अमूर्त्तत्वात् ' इसी अनुमान में यदि कोई यदनित्यं तन्मूर्त्त दृष्टम्, यथा परमाणु: ' इस प्रकार से परमाणु को वैधर्म्य निदर्शन के लिए उपस्थित करे तो वह ' अनुमेयाध्यावृत्त निदर्शनाभास ' होगा, क्योंकि परमाणु में नित्यत्व रूप अनुमेय अर्थात् साध्य की व्यावृत्ति ( अभाव ) नहीं है । ( ३ ) उसी अनुमान में यदि कोई ' यदनित्यं तन्मूर्त्तं दृष्टम्, यथाकाशम् ' इस प्रकार से आकाश को वैधर्म्य निदर्शनाभास के लिए उपस्थित करे तो वह ' उभयाव्यावृत्त ' निदर्शनाभास होगा, क्योंकि आकाश में नित्यत्वरूप साध्य का अभाव और अमूर्त्तत्व रूप हेतु का अभाव, अर्थात् अनित्यत्व और मूर्त्तत्व इन दोनों में से कोई भी नहीं है, अतः आकाश में साध्यभाव और हेत्वभाव दोनों की ही व्यावृत्ति ( अभाव ) न रहने के कारण प्रकृत में आकाश ' उभयाव्यावृत्त ' निदर्शनाभास है । ( ४ ) उसी अनुमान में ' यथा तम: ' इस प्रकार से तम ( अन्धकार को यदि वैधर्म्य दृष्टान्त रूप से उपस्थित किया जाय तो वह ' आश्रयासिद्ध ' नाम का निदर्शनाभास होगा | क्योंकि तम नाम की कोई वस्तु ही नहीं है, फिर साध्यव्यावृत्ति ( साध्य का $ भाव ) और हेतुव्यावृत्ति ( हेतु का अभाव ) इन दोनों का किसमें प्रदर्शन होगा? ( ५ ) ' नित्यः शब्दः, अमूर्त्तत्वात् इसी अनुमान में वैधर्म्यनिदर्शन को दिखलाने के लिए यदि ' घटवत् ' केवल इसी वाक्य का प्रयोग करे ( ' यदनित्यं तन्मूर्त्तम् ' इस अंश का प्रयोग ' घटवत् ' इस वाक्य के पहिले न करे ) तो वह ' अव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास होगा । यद्यपि घट में साध्य की व्यावृत्ति ( अर्थात् अनित्यत्व ) और हेतु की व्यावृत्ति ( मूर्त्तत्व ) ये दोनों ही हैं, फिर भी ' यदनित्यं तन्मूर्तम् ' ( जो अनित्य होता है वह अवश्य ही मूर्त होता है ) इस अंश का प्रयोग न करने के कारण इस प्रसङ्ग में विरुद्ध मत For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६०५ वदति, न च तथानभिधाने साध्यसाधनयोर्व्यावृत्तिप्रतिपत्तिविप्रतिपन्नस्य भवति, अतोऽयमव्यावृत्तः । यन्निष्क्रियं तदद्रव्यमिति विपरीतव्यावृत्तः । यथा साध्यं व्यापकं साधनं व्याप्यम्, तथा साध्याभावो व्याप्यः साधनाभावश्च व्यापकः । यथोक्तम्-नियम्यत्वनियन्तृत्वे भावयोर्यादृशे मते । विपरीते प्रतीयेते ते एव तदभावयोः ॥ इति । तत्र द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वादित्यत्र विपर्ययव्याप्तिप्रदर्शनार्थं यदद्रव्यं तदक्रियमिति वाच्यम्, अयं तु न तथा ब्रूते, किन्त्वेवमाह - यन्निष्क्रियं तदद्रव्य-रखनेवाले पुरुष को साध्य के अभाव और हेतु के अभाव की ( उपयुक्त ) प्रतीति नहीं हो पाती है, अतः उक्त स्थल में घट ' अव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास समझना चाहिए । ( ६ ) ' द्रव्यं वायुः क्रियावत्त्वात् ' इस अनुमान के लिए यदि कोई ' निष्क्रियं तदद्रव्यम् ' इस प्रकार से वैधर्म्यं निदर्शन का प्रयोग करना चाहे, तो वह ' विपरीत-व्यावृत्ति ' नाम का ( वैधर्म्य ) निदर्शनाभास होगा, क्योंकि ' यद् द्रव्यं न भवति ' इत्यादि प्रकार से साध्याभाव के बोधक वाक्य का प्रयोग पहिले न कर उसके ' विपरीत ' अर्थात् उल्टा पहिले हेतु के अभाव का बोधक ' यन्निष्क्रियम् ' इस वाक्य का ही प्रयोग पहिले किया गया है । जैसे कि साध्य व्यापक है और साधन व्याप्य है ( अतः साधर्म्य निदर्शन वाक्य में पहिले हेतु बोधक पद का प्रयोग होता है, बाद में साध्य बोधक पद का, उसी प्रकार ) साध्याभावव्याप्य है और हेत्वभाव व्यापक ( अतः वैधर्म्य निदर्शन वाक्य में पहिले साध्याभाव के बोधक वाक्य का ही प्रयोग होना चाहिए, बाद में हेत्वभाव के बोधक वाक्य का, अर्थात् दोनों ही प्रकार के निदर्शन वाक्यों में व्याप्य के बोधक वाक्य का पहिले प्रयोग चाहिए, बाद में व्यापक के बोधक वाक्य का, प्रकृत में इसके विपरीत हुआ है । अतः ' विपरीतव्यावृत्त ' नाम का निदर्शनाभास है । जैसे कि ( अनुमिति के लिए ) साध्य का हेतु से व्यापक होना और हेतु का साध्य से व्याप्य होना सहायक है, उसी प्रकार ( अन्वयव्यतिरेकी और केवलव्यतिरेकी हेतु का अनुमानों में ) हेतु के अभाव से साध्य के अभाव का व्यापक होना और साध्य के अभाव का हेतु के अभाव का व्याप्य होना भी सहायक है । जैसा कहा गया है कि जिस प्रकार के हेतु में नियन्तृत्व ( व्याप्यत्व ) एवं जिस प्रकार के साध्य में नियम्यत्व ( व्यापकत्व ) रहता है, उसके विपरीत उन दोनों के अभावों में हेतु का अभाव ही व्यापक और साध्य का अभाव ही व्याप्य होता है । इस स्थिति में ' द्रव्यं वायुः क्रिया-वस्त्वात् ' इस अनुमान में यदि विपर्यय ( व्यतिरेक ) व्याप्ति का दिखाना आवश्यक हो तो ' यदद्रव्यं तदक्रियम् ' इस प्रकार से निदर्शन वाक्य का प्रयोग करना चाहिए । प्रकृत में वह पुरुष ( जो निदर्शनाभास का प्रयोग करता है! इस प्रकार न कह कर, उसका उल्टा ( विपरीत ) ऐसा कहता है कि ' यन्निष्क्रियं तदद्रव्यम् ' अर्थात् For Private And Personal