प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 681–690
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 681–690
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यमनु-प्रशस्तपादभाष्यम् निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन मेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् । अनुमेयधर्ममात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्य-निदर्शन ( उदाहरण ) में साध्यसामान्य के साथ ज्ञात हुए लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य की सत्ता का पक्ष में बोध करानेवाला वाक्य ही साधर्म्या -नुसन्धान ' ( साधर्म्यापनय ) है । ( विशदार्थ यह है कि ) लिङ्गसामान्य पक्ष ( अनुमेय ) में है ' इस प्रकार केवल पक्षमात्रवृत्तित्व रूप से कथित हेतु न्यायकन्दली मिति । एवं च न व्याप्तिरस्ति, आकाशस्य क्रियारहितत्वेऽपि द्रव्यत्वात् । तस्माद् विपरीतव्यावृत्तोऽयं वैधर्म्यनिदर्शनाभासः । लिङ्गं चानुमेयं चोभयं च लिङ्गानु-मेयोभयानि तान्यव्यावृत्तानि येषां ते तथोक्ताः । आश्रयोऽसिद्धो यस्य स आश्रयासिद्धः, लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्च अव्यावृत्तश्च विपरी-तव्यावृत्तश्चेति व्याख्या । निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वा-नयनमनुसन्धानम् । निदर्श्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्तिरस्मिन्निति निदर्शनं दृष्टान्तः तस्मिन्ननुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य प्रतीतस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेये साध्यधमण्यन्वानयनं सद्भावोपदर्शनं येन वचनेन क्रियते तदनुसन्धानम् । जिसमें क्रिया नहीं है, वह द्रव्य ही नहीं है, किन्तु ऐसी व्याप्ति नहीं है, क्योंकि आकाशादि द्रव्य तो हैं, किन्तु उनमें क्रियावस्त्व नहीं है । अतः प्रकृत अनुमान में ' यनिष्क्रियं तदद्रव्यम् ' यह वाक्य विपरीतव्यावृत्त ' नाम का वैधर्म्य निदर्शनाभास होगा । ' लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्ति ' शब्द ' लिङ्गश्वानुमेयं चोभयं च लिङ्गानुमेयोभयानि, तान्य-व्यावृत्तानि येषाम् ' इस व्युत्पत्ति से बना है, और ' आश्रयोऽसिद्धो यस्य ' इस व्युत्पत्ति से प्रकृत ' आश्रयासिद्ध ' शब्द बना है । ( इस प्रकार दोनों शब्दों के निष्पन्न होने के बाद ) ' लिङ्गानुमेयोभयाव्यावृत्तश्चाश्रयासिद्धश्चाव्यावृत्तश्च विपरीतव्यावृत्तश्च ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार व्याख्या करनी चाहिए । निदर्शनेऽनुमेयसामान्येन सह दृष्टस्य लिङ्गसामान्यस्यानुमेयेऽन्वानयनमनुसन्धानम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' निदर्शन ' शब्द का ' विदिश्यते निश्चिता साध्यसाधनयोर्व्याप्ति-रस्मिन्निति निदर्शनम् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पर्यायवाची ' दृष्टान्त ' शब्द है । तदनुसार दृष्टान्त में साध्य सामान्य के साथ दृष्ट अर्थात् ज्ञात लिङ्ग ( हेतु ) सामान्य का अनुमेय में अर्थात् साध्य के धर्मी में ( पक्ष में ) ' अन्वानयन ' अर्थात् सत्ता का प्रदर्शन जिस वाक्य के द्वारा किया जाय वही ' अनुसन्धान ' है । ' अनुसन्धीयते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार दुष्टान्त में साध्य की व्याप्ति से युक्त एवं उसी रूप में देखे हुए हेतु For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६०७ दृष्टान्ते साध्याविनाभूतत्वेन दर्शितं लिङ्गं पक्षेऽनुसन्धीयते प्रतिपाद्यते अनेनेति व्युत्पत्त्या । एतदेव स्वोक्तं विवृणोति - अनुमेयधर्ममात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्य-मिति । प्रतिज्ञानन्तरं हेतुवचनेन लिङ्गं वस्तुव्यावृत्त्यानुमेयेऽस्तीत्येतावन्मात्रतया हेतुत्वेनाभिहितम्, न तु धर्मिणि तस्य सद्भावः कथित इत्यभिप्रायः । लिङ्गस्य साध्यप्रतिपादने शक्तिरन्वयव्यतिरेकी पक्षधर्मता च, सा पूर्व प्रतिज्ञाहेतु-वचनाभ्यां तस्य नावगतेत्यनुपलब्धशक्तिकं निदर्शने साध्यधर्मसामान्येन सह दृष्टमनुमेये येन वचनेनानुसन्धीयते तदनुसन्धानमिति । अयमन्त्राभिसन्धिः - परार्थः शब्दो यथा यथा परस्य जिज्ञासोदयते तथा तथा प्रयुज्यते, प्रत्येतुश्च साध्येऽभिहिते साधने भवत्याकाङ्क्षा – कुत इदं सिद्धयति? न तु साधनस्य सामर्थ्यम्, स्वरूपावगतिपूर्वकत्वात् सामर्थ्य जिज्ञासायाः । साधने चाकाङ्क्षिते प्रयुज्यमानं हेतुवचनं हेतुस्वरूपमात्रं कथयति, न तस्य पक्ष-धर्मताम्, एकस्य शब्दस्योभयार्थवाचकत्वाभावात् । विज्ञाते हेतौ कथमस्य हेतुत्वमिति सामर्थ्य जिज्ञासायां साध्यप्रतीतेरविनाभावप्रतीतिनान्तरीयकत्वाद् व्याप्तिवचनेना-का पक्ष ( रूप अनुमेय ) में सत्ता का प्रदर्शन जिस वाक्य के द्वारा हो वही ' अनुसन्धान ' है, वही बात ' निदर्शने ' इत्यादि से भाष्यकार ने स्वयं कही है जिसकी व्याख्या ' अनुमेय मात्रत्वेनाभिहितं लिङ्गसामान्यम् ' इत्यादि से भाष्यकार स्वयं करते हैं । अभिप्राय यह है कि प्रतिज्ञावाक्य के प्रयोग के बाद प्रयुक्त हेतुवाक्य के विपक्षव्यावृत्ति के आक्षेप द्वारा सामान्य रूप से ही यह समझा जाता है कि ' यह हेतु अनुमेय ( पक्ष ) में है ' । इससे हेतु केवल हेतुत्व रूप से ही प्रतिपादित होता है । इससे पक्ष रूप धर्मी में हेतु की सत्ता प्रतिपादित नहीं होती है । हेतु में साध्य का अन्वय और व्यतिरेक एवं पक्ष में हेतु का रहना ( पक्षधर्मता ) ये दोनों ही वस्तुतः हेतु में रहनेवाली साध्य के ज्ञापन की शक्ति है । ( यह शक्ति हेतु में ज्ञात होकर ही साध्यज्ञान रूप अनुमिति को उत्पन्न करती है ) यह शक्ति ( निदर्शन वाक्य के प्रयोग के ) पहिले प्रतिज्ञा वाक्य और हेतु वाक्य इन दोनों के द्वारा ज्ञात नहीं हो पाती । इस प्रकार अज्ञात शक्ति से युक्त हेतुसामान्य ही साध्यसामान्य के साथ निदर्शन ( उदाहरण ) में देखा जाता है । इस रूप से देखे हुए हेतु का अनुमेय ( पक्ष ) में अनुसन्धान ( प्रतिदन ) जिस वाक्य के द्वारा हो वही प्रकृत में अनुसन्धान ' है । गूढ़ अभिप्राय यह कि जिस क्रम से बोद्धा पुरुष की जिज्ञासा उठती है, उसी क्रम से दूसरे के लिए ( प ) शब्द का प्रयोग होता है । तदनुसार ( वक्ता के द्वारा प्रयुक्त प्रतिज्ञा वाक्य से ) साध्य के प्रतिपादित हो जाने पर बोद्धा को हेतु के प्रसङ्ग में यही जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से होनी है कि ' इस साध्य की सिद्धि किस हेतु से होती है? ' ( प्रतिज्ञा वाक्य के प्रयोग के बाद हेतु विषयक इस जिज्ञासा से पहिले ) हेतु की शक्ति के प्रसङ्ग में जिज्ञासा नहीं होती है, क्योंकि हेतु के स्वरूप का ज्ञान हेतुगत सामर्थ्य को For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६०८ भ्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-विनाभावे कथिते सत्यवधारितसामर्थ्यस्य हेतोः पक्षे पश्चात् सम्भवो जिज्ञास्यत इत्युदाहरणानन्तरं पक्षधर्मतावगमार्थमुपगन्तव्ध उपनयः, हेतुत्वाभिधान-सामर्थ्यादेव पक्षधर्मत्वं प्रतीयते, व्यधिकरणस्यासाधकत्वादिति चेत्? तदभि-धानसामर्थ्याद् व्याप्तिरपि लप्स्यते, अनन्वितस्य हेतुत्वाभावादित्युदाहरणमपि न वाच्यम् । असाधारणस्यापि भ्रान्त्या हेतुत्वाभिधानोपपत्तेर्न तस्मादेकान्ते. नान्वयप्रतीतिरस्तीत्युदाहरणेन व्याप्तिरुपदश्यंत इति चेद्? धर्मिण्यविद्यमान स्यापि भ्रमेण हेतुत्वाभिधानोपलम्भान्न ततः पक्षधर्मतासिद्धिरस्तीत्युदाहरणस्थस्य लिङ्गस्य पक्षेऽस्तित्वनिश्चयार्थमुपनयो वाच्यः । असिद्धस्य भ्रमादुपनयोऽपि जिज्ञासा का कारण है ( प्रतिज्ञा वाक्य से साध्यावगति के बाद ) केवल हेतु की आकाङ्क्षा से जिस हेतु वाक्य का प्रयोग होता है, उससे केवल हेतु के स्वरूप काही बोध होता है, हेतु के पक्षधर्मता रूप सामर्थ्य का नहीं । क्योंकि ( एक बार प्रयुक्त शब्द एक ही अर्थ को समझा सकता है ), दो अर्थों को नहीं । साधारण रूप से हेतु का ज्ञान हो जाने पर स्वाभाविक रूप से यह जिज्ञासा होती है कि ' इससे साध्य का ज्ञान किस रीति से उत्पन्न होता है? ' बोद्धा की इस जिज्ञासा से प्रेरित होकर ही व्याप्तिवचन ( उदाहरण ) का प्रयोग किया जाता है, जिस हेतु में साध्य की जो व्याप्ति है, उसका प्रदर्शन हो सके, क्योंकि हेतु में साध्य की व्याप्ति के ज्ञात होने पर ही साध्य की अनुमिति होती है । इस क्रम से हेतु में साध्य के अविनाभाव का निश्चय हो जाने पर स्वाभाविक क्रम से पक्ष में साध्य की व्याप्ति से युक्त हेतु के रहने की जिज्ञासा उठती है, जिसको मिटाने के लिए ही उदाहरणवाक्य के बाद ' उपनय ' वाक्य का प्रयोग करना पड़ता है । ( प्र ० ) ( साध्य के साथ एक आश्रय में रहनेवाले हेतु से ही साध्य का बोध होता है ) साध्य के आश्रय से भिन्न आश्रय में रहनेवाले हेतु से नहीं, इस रीति से हेतु वाक्य के द्वारा हेतुत्व का जो प्रतिपादन होता है. उसी से हेतु में पक्षधर्मता का भी बोध हो ही जाएगा । अतः पक्षधर्मता के लिए उपनय-वाक्य का प्रयोग व्यर्थ है । ( उ ० ) इस प्रकार तो हेतु वाक्य के द्वारा हेतुत्व के अभिधान से ही व्याप्ति का लाभ भी सम्भव है, क्योंकि व्याप्ति के बिना भी हेतु में हेतुता सम्भावित नहीं है, अतः हेतु वाक्य से ही व्याप्ति का भी लाभ हो जाएगा । यतः साध्य की व्याप्ति ( अन्वय ) के बिना किसी में हेतुता नहीं आ सकती, अतः उदाहरण वाक्य का प्रयोग करना आवश्यक होता है । यदि यह कहें कि भ्रान्तिवश असाधारण हेतु ( केवल पक्ष में ही रहने-वाला हेतु जो वस्तुतः हेत्वाभास है ) भी हेतु वाक्य के द्वारा अभिहित हो सकता है । हेतु वाक्य से ही व्याप्ति का भी लाभ हो जाएगा, क्योंकि साध्य को व्याप्ति के बिना किसी में हेतुता नहीं आ सकती, अतः उदाहरण वाक्य का भी प्रयोग नहीं करना चाहिए | यदि यह कहें कि भ्रान्तिवश असाधारण हेतु ( केवल पक्ष में ही रहनेवाले हेत्वाभास ) का भी हेतु वाक्य के द्वारा अभिधान किया जा सकता है | अतः हेतु वाक्य के द्वारा हेतु में व्याप्ति की निश्चित प्रतीति नहीं हो सकती For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७७ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६०६ न्यायकन्दली For Private And Personal दृश्यते कथं तस्मादपि पक्षधर्मतासिद्धिरिति चेत्? असिद्धाविनाभावस्यापि भ्रान्त्या व्याप्तिवचनं दृश्यते कथं तस्मादन्वयसिद्धिः? उदाहरणे व्याप्तिग्राहकप्रमाणानुसारेणान्वयनिश्चयो न वचनमात्रेण, तस्य सर्वत्राविशेषा-दिति चेत्? उपनयेऽपि पक्षधर्मताग्राहकप्रमाणानुसारादेव तद्धर्मता निश्चयो न वचनमात्रत्वात् । हेत्वभिधानान्यथानुपपत्त्यैव पक्षधर्मताग्राहिप्रमाणानुसारो भव-तीति चेत्? तदन्यथानुपपत्त्यैव व्याप्तिग्राहकप्रमाणानुसारो भविष्यति । हेतु-वचनस्यान्यार्थत्वान्न तदुपनयनसामर्थ्यमस्तीति तदुपस्थापनमुदाहरणेन क्रियत इति चेत्? इहापि सैव रीतिरनुगम्यताम्, अलमन्यथा सम्भावितेन । हैं, अतः उदाहरण के द्वारा व्याप्ति का प्रदर्शन किया जाता है । ( उ ० ) तो फिर उपनय के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार यह कह सकते हैं कि पक्ष में न रहनेवाली ( अप-क्ष ) वस्तु में भी भ्रान्तिवश हेतुवाक्य के द्वारा हेतुत्व का प्रतिपादन हो सकता है, अतः उदाहरण में निश्चित रूप से विद्यमान हेतु को पक्ष में निश्चित रूप से समझाने के लिए उपनय का प्रयोग भी आवश्यक है । ( प्र ० ) पक्ष में अनिश्चित हेतु के बोधक उपनय वाक्य का भ्रान्ति से भी प्रयोग होता है, अतः उपनय से पक्षधर्मता की सिद्धि कैसे होगी? ( उ ० ) जिस हेतु में व्याप्ति निश्चित नहीं है, भ्रान्तिवश उसमें व्याप्ति को समझाने के लिए भी ' व्याप्तिवचन अर्थात् उदाहरण वाक्य का प्रयोग होता है, फिर उदाहरण से ही व्याप्ति की सिद्धि किस प्रकार होगी? ( प्र ० ) उदाहरण वाक्य केवल वाक्य होने के कारण ही व्याप्ति का बोधक नहीं हैं, क्योंकि वाक्यत्व तो सभी वाक्यों में समान रूप से है । किन्तु उदाहरण वाक्य में यतः व्याप्ति के बोधक प्रमाण रूप शब्दों का प्रयोग होता है, अतः उदाहरण वाक्य से व्याप्ति का बोध होता है । ( उ ० ) उपनय के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार कहा जा सकता है कि उपनयवाक्य केवल वाक्य होने के कारण ही पक्षधर्मता का बोधक नहीं है, क्योंकि वाक्यत्व तो सभी वाक्यों में समान रूप से है, किन्तु उपनय वाक्य में जिस लिए कि हेतु में पक्षधर्मता के बोधक प्रमाण रूप शब्दों का प्रयोग होता है, इसीलिए उपनय वाक्य से पक्षधर्मता का बोध होता है । ( प्र ० ) हेतु वाक्य से ( उपयुक्त ) हेतुत्व का बोध तब तक सम्भव नहीं है, जबतक कि उसे हेतु में पक्षधर्मता का बोधक प्रमाण न मान लिया जाय, अतः हेतु वाक्य से ही पक्ष-धर्मत्व का बोध हो जाएगा ( उसके लिए उपनय वाक्य के प्रयोग की आवश्यकता नहीं है ) | ( उ ० ) यही बात व्याप्ति के प्रसङ्ग में भी कही जा सकती है कि हेतु में उपयुक्त हेतुत्व का बोध तब तक सम्भव नहीं है, जबतक हेतुवाक्य को व्याप्ति का भी बोधक प्रमाण न मान लिया जाय, ऐसी स्थिति में यह भी कहा जा सकता है कि व्याप्ति के बोध के लिए उदाहरण वाक्य की आवश्यकता नहीं है ( हेतुवाक्य से ही व्याप्ति का भी बोध हो जाएगा ) यदि यह कहें कि ( प्र ० ) हेतु वाक्य ( हेतु रूप ) दूसरे अर्थ का बोक है, अतः उसमें व्याप्ति को समझाने का सामर्थ्य नहीं है, अतः व्याप्ति को समझाने के लिए उपनय वाक्य की अलग से आवश्यकता होती है । ( उ ० )
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-मनुपलब्धशक्तिकं निदर्शने साध्यधर्म सामान्येन सह दृष्टमनुमेये येन वचनेनानुसन्धीयते तदनुसन्धानम् । तथा च वायुः क्रियावानिति । अनुमेयाभावे च तस्यासत्वमुपलभ्य न च तथा वायुर्निष्क्रिय इति । सामान्य में साध्य सामान्य को साधन करने का सामर्थ्य उपलब्ध नहीं होता है । उसके लिए यह आवश्यक है कि उदाहरण में साध्यसामान्य के साथ वृत्तित्व रूप से ज्ञात हेतुसामान्य का ( केवल हेतुसामान्य का नहीं ) पक्ष में सत्ता का ज्ञापन हो । यह ज्ञापन जिस वाक्य से होता है, वही ' साधर्म्यानुसंधान ' है । ( वायु में क्रियावत्त्व हेतु से द्रव्यत्व के अनुमान के लिए यदि तीर को निदर्शन रूप से उपस्थित किया जाय, एवं उसके बाद तीर रूप निदर्शन में द्रव्यत्व के साथ ज्ञात क्रियावत्त्व का वायु रूप पक्ष में सत्ता दिखाने के लिए ) ' वायु में ( भी ) क्रिया है ' इस वाक्य का प्रयोग किया जाय तो ( उक्त अनुमान के लिए ) यह वाक्य ' साधर्म्यानुसन्धान ' होगा । ( वैधर्म्यनिदर्शन या विपक्ष में ) अनुमेय अर्थात् साध्य के अभाव के साथ ज्ञात हेतु के अभाव का पक्ष में जिस वाक्य से असत्ता प्रतिपादित हो, वही वाक्य ' वैधर्म्यानुसन्धान है । जैसे कि ( कोई वायु में क्रियावत्त्व हेतु से द्रव्यत्व के अनुमान के लिए ही इस वैधर्म्य निदर्शनवाक्य का प्रयोग करे कि ' जो द्रव्य नहीं है उसमें क्रिया भी नहीं है जैसे कि सत्ता, सत्ता में द्रव्यत्व नहीं है तो क्रिया भी नहीं है ' इस रीति से उक्त वाक्य से सत्ता में द्रव्यत्वाभाव के साथ ज्ञात ) क्रियावत्त्व के अभाव का वायु में असत्ता को प्रतिपादन करनेवाले सत्ता की तरह ' वायु क्रियाशून्य नहीं है ' इत्यादि वाक्य ' वैधर्म्यानुसन्धान हैं ' । न्यायकन्दली अस्तु तहर्युपनयः, व्यर्थं हेतुवचनम्? न असति हेतुवचने साधन-स्वरूपानवबोधात् तत्सामर्थ्यजिज्ञासाया अनुपपत्तौ उदाहरणादिवचनानां प्रवृत्त्य भावात् । तथा च न्यायभाष्यम् – ' असति हेतौ कस्य साधनभावः प्रदश्यते ' इति । तो फिर उपनय के प्रसङ्ग में भी वही रीति अपनाइए? उसके लिए अलग रीति अपनाना व्यर्थ है । ( प्र ० ) ऐसी स्थिति में उपनय को ही मान लीजिए, हेतु वाक्य को ही छोड़ दीजिए? ( उ ० ) सो सम्भव नहीं है क्योंकि यदि हेतुवाक्य न रहे, तो हेतु के स्वरूप का बोध कैसे होगा? हेतु के स्वरूप का बोध न होने पर हेतु की सामर्थ्य के प्रसङ्ग में कोई जिज्ञासा ही न उठ सकेगी, जिससे उदाहरणादि वाक्यों की प्रवृत्तियाँ ही अनुपपन्न For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे चानिश्चिते च Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir परेषां ६११ निश्चया-पादनार्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः । प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्टे चानिश्चिते च परेषां हेत्वादिभिरवयवैराहितशक्तीनां परिसमाप्तेन ( प्रथमतः प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) अनुमेय रूप से कथित होने पर भी ( समर्थ हेतु सम्बन्ध के प्रतिपादन के बिना ) अनिश्चित साध्य को दूसरों को निश्चित रूप से समझाने के लिए फिर से प्रयुक्त ( उपयुक्त हेतु के सम्बन्ध से युक्त साध्य के बोधक ) प्रतिज्ञा वाक्य ही प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) है | ( विशदार्थ यह है कि सर्वप्रथम प्रयुक्त ) केवल प्रतिज्ञा-वाक्य से साध्य अनुमेयत्व रूप से निर्दिष्ट होने पर भी बोद्धा पुरुष के लिए न्यायकन्दली अनुसन्धानस्योदाहरणमाह – तथा यति - अनुमेयाभावे चेति । चेति । धनुसन्धानं दर्श-प्रत्याम्नायं व्याचष्टे -- अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे इति । प्रतिज्ञावचनेन पक्षे अनुमे-यत्वेन प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्टे साध्यधर्मेऽनिश्विते तस्यैव धर्मिणि प्रत्याम्नायः प्रत्यावृत्त्याभिधानम् येन वचनेन क्रियते तत्प्रत्यास्नायः । अभिहितस्य पुनर-भिधानं किमर्थमत आह- परेषां निश्चयापादनार्थमिति । प्रथमं साध्यमभिहितं न तु तन्निश्चितम् प्रतिज्ञामात्रेण साध्यसिद्धेरभावात् । तस्योपदशिते तो, कथिते च हेतोः सामर्थ्य, निश्चयः प्रत्याम्नायेन क्रियत इत्यस्य साफल्यम् । एतदेव दर्शयति- प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्ट इत्यादिना । प्रथमं वचनमात्रेण परेषां हो जाएंगी । जैसा न्यायभाषा में कहा गया है कि ' हेतु के न रहने पर किसका ( साध्यबोधक जनक ) सामर्थ्य ( उदाहरणादि वाक्यों से ) दिखलाया जायगा? ' तथा च ' इत्यादि वाक्य के द्वारा अनुसन्धान ( उपनय ) का उदाहरण कहा गया है । ' अनुमेयाभावे ' इस सन्दर्भ से ' वैधर्म्यानुसन्धान ' का उदाहरण दिखलाया गया है । ' अनुमेयत्वेनोद्दिष्टे ' इत्यादि वाक्य के द्वारा ' प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) की व्याख्या करते हैं । प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा ' उद्दिष्ट ' अर्थात् कहने के लिए अभीष्ट जो ' अनिश्चित ' साध्य रूप धर्म, उसी साध्य रूप धर्म का उसी पक्ष में जो ' प्रत्याम्नाय ' अर्थात् दूसरी बार कहना, जिस वाक्य के द्वारा हो उसी को प्रत्यास्नाय ' कहते हैं । ( प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) कहे हुए साध्य रूप धर्म को ही फिर से क्यों कहते हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' परेषां निश्चयापादनार्थम् ' इस वाक्य से दिया गया है । पहिले ( प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा ) केवल साध्य कहा जाता है, किन्तु उससे साध्य का निश्चय नहीं हो पाता, क्योंकि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ६१२ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-वाक्येन निश्चयापादनार्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः 1 तस्माद् द्रव्यमेवेति । न ह्येतस्मिन्नसति परेषामवयवानां समस्तानां अनिश्चित ( सन्दिग्ध ) ही रहता है ( क्योंकि हेतु में पक्षधर्मता और व्याप्ति के निश्चय के बिना ) पक्ष में उसके निश्चयात्मक ज्ञान को अपनी आत्मा में उत्पादन का सामर्थ्य बोद्धा पुरुष को नहीं रहता है । हेतु प्रभृति अवयव जब समझानेवाले पुरुष से प्रयुक्त होते हैं, तब समझनेवाले पुरुष में साध्य को पक्ष में निश्चित रूप से समझने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है । इस प्रकार की शक्ति से सम्पन्न पुरुष को पक्ष में साध्य को निश्चित रूप से समझाने के लिए प्रयुक्त प्रतिज्ञावाक्य ही ' प्रत्याम्नाय ' ( निगमन ) है । जैसे कि ( क्रियावत्त्व हेतु से वायु में द्रव्यत्व की अनुमिति के लिए प्रयुक्त न्यायवाक्यों का ) ' तस्मात् वायु द्रव्य ही है ' यह वाक्य ( प्रत्याम्नाय है ) । इस ( प्रत्याम्नाय ) के न रहने पर शेष चार अवयव वाक्य परस्पर-न्यायकन्दली साध्यनिश्चयो न भूतः, तेषां हेतूदाहरणोपनयेरवयवैर्हेतोस्त्ररूप्ये दशिते सञ्जातानुमेय प्रतिपत्तिसामर्थ्यानां प्रत्याम्नाये कृते परिसमाप्तेन ' परिपूर्णन ' वाक्येन ' निश्चयो जायत इत्येतदर्थं प्रतिज्ञायाः पुनर्वचनं प्रत्याम्नायः प्रवर्त्तते । तस्योदाहरणम् – तस्माद् द्रव्यमेवेति । हेत्वादिभिरवयवैरेव साध्यं केवल प्रतिज्ञा वाक्य से साध्य का निश्चय ( सिद्धि ) नहीं होता है । जब हेतु वाक्य के द्वारा हेतु का प्रदर्शन हो जाता है एवं ( उदाहरण और उपनय के द्वारा ) हेतु का ( व्याप्ति और पक्षधर्मता रूप ) सामर्थ्य कथित हो जाता है, तब प्रत्थाम्नाय के द्वारा साध्य का निश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है । इस प्रकार प्रत्याम्नाय की सार्थकता स्पष्ट है । यही बात ' प्रतिपाद्यत्वेनोद्दिष्डे ' इत्यादि से कही गई है । अभिप्राय यह है कि बोद्धा को पहिले केवल ( प्रतिज्ञा ) बचन के द्वारा साध्य का निश्चय नहीं हो पाता, किन्तु हेतु, उदाहरण और उपनय इन तीन अवयवों के द्वारा ( अनुमान के प्रयोजक ) हेतु के ( पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासव इन ) तीनों रूपों का ज्ञान जब बोद्धा पुरुष को हो जाता है, तब उसो पुरुष को अर्थात् कथित रीति से अनुमेय के ज्ञान के सामथ्यं से युक्त हेतु के ज्ञान से युक्त पुरुष को प्रत्याम्नाय वाक्य के प्रयुक्त होने पर ' परिसमाप्त ' अर्थात् सम्पूर्ण वाक्य से निश्चयात्मक ज्ञान होता है । इसी निश्चयात्मक ज्ञान के लिए प्रतिज्ञा वाक्य का पुनः प्रयोग रूप प्रत्याम्नाय प्रवृत्त होता है । ' तस्माद् द्रव्यमेव ' इस वाक्य के द्वारा प्रत्याम्नाय का उदाहरण दिखलाया गया है | हेतु प्रभृति अवयवों से ही साध्य की सिद्धि हो जाएगी, अतः प्रत्याम्नाय का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६१३ व्यस्तानां वा तदर्थवाचकत्वमस्ति " गम्यमानार्थत्वादिति चेन्न, अति-मिलित होकर या स्वतन्त्र रूप से भी प्रत्याम्नाय के द्वारा प्रतिपाद्य अर्थ का प्रतिपादन नहीं कर सकते ( अतः उन चारों के रहते हुए भी प्रत्याम्नाय का असाधारण प्रयोजन है । सुतराम् इसके वैयर्थ्य की आशंका अयुक्त है ) ( प्र ० ) ( यदि प्रतिज्ञावाक्य को फिर से दुहराना ही प्रत्याम्नाय है तो फिर ) ज्ञात अर्थ के ही ज्ञापक होने के कारण ( प्रत्याम्नाय की कोई आवश्यकता नहीं है )? ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, यदि ऐसी बात हो तो न्यायकन्दली निश्चीयते किं प्रत्याम्नायेन? इत्यत आह --- नह्येतस्मिन्नसतीति । प्रतिज्ञा-दयो sarar: प्रत्येकं स्वार्थमात्रेण पर्यवसायिनोऽसति प्रत्याम्नाये नैकमर्थं प्रत्याययितुमीशते, स्वतन्त्रत्वात् । सति त्वेतस्मिन्नाकाङ्क्षोपगृहीताः अङ्गाङ्गि-भावमुपगच्छन्तः शक्नुवन्तीति युक्तः प्रत्याम्नायः । पुनश्चोदयति गम्यमानार्थत्वादिति । अयमभिप्रायः स्वार्थानुमाने यैव प्रतिपत्तिसामग्री, सैव परार्थानुमानेऽपि । इयांस्तु विशेषः, स्वप्रतीतावियं स्वय-मनुसन्धोयते, परप्रतीतौ च परेण बोध्यते । स्वयं च लिङ्गसामर्थ्यादर्थोऽवगम्यते, परस्यापि तदेव गमकम् । वाक्यं तु लिङ्गोपक्षेपमात्रे चरितार्थम् । प्रतिपादितं च कोई प्रयोजन नहीं है इसी आक्षेप का समाधान ' न तु तस्मिन्नसति ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । अभिप्राय यह है कि प्रतिज्ञादि चारों अवयव अलग अलग स्वतन्त्र रूप से केवल अपने अपने अर्थों का ही प्रतिपादन कर सकते हैं, स्वतन्त्र होने के कारण प्रत्याम्नाय के बिना किसी एक विशिष्ट अर्थ को उनमें से कोई भी एक अवयव नहीं समझा सकता । प्रत्याम्नाय वाक्य के प्रयोग से ही प्रतिज्ञादि अवयव परस्पराकाङ्क्षा के द्वारा एक दूसरे से अङ्गाङ्गिभाव को प्राप्त कर एक विशिष्ट अर्थ विषयक बोध का सम्पादन कर सकते हैं, अतः प्रत्याम्नाय का प्रयोग आवश्यक है । ' गम्यमानार्थत्वात् ' इस वाक्य के द्वारा फिर से आक्षेप करते हैं । आक्षेप करने-वाले का अभिप्राय है कि कारणों के जिस समुदाय से स्वार्थानुमान की उत्पत्ति होती है, परार्थानुमान भी उसी कारण समुदाय से उत्पन्न होता है । अन्तर इतना ही है कि स्वार्थानुमान वाले पुरुष को स्वयं ही उस कारण समूह का अनुसन्धान करना पड़ता है, और परार्थानुमान स्थल में उस समूह का अनुसन्धान दूसरे के द्वारा कराया जाता है । जिस प्रकार स्वार्थानुमान स्थल में हेतु के पक्ष सत्त्वादि सामथ्र्य के द्वारा ' अर्थावगम ' अर्थात् अनुमिति होती है, उसी प्रकार परार्थानुमान स्थल में भी हेतु के उन सामर्थ्यो सेही अनुमिति होती है । ( अवयव ) वाक्यों का तो अनुमिति में इतना ही उपयोग है कि वे ( उक्त सामर्थ्य से युक्त ) हेतु को उपस्थित कर देवें । अन्वय और व्यतिरेक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-प्रशस्तपादभाष्यम् प्रसङ्गात् । तथाहि प्रतिज्ञानन्तरं हेतुमात्राभिधानं कर्तव्यम्, विदुषामन्वय-व्यतिरेकस्मरणात् तदर्थावगतिर्भविष्यतीति, तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्तिः । फिर उक्त पक्ष में ( केवल प्रतिज्ञा और हेतु वाक्य को छोड़कर निदर्शन और अनुसन्धान इन दोनों के भी वैयथ्य की आपत्ति होगी ), क्योंकि ( पूर्वपक्षवादी की रीति के अनुसार ) प्रतिज्ञावाक्य के बाद केवल हेतु वाक्य के प्रयोग से ही प्रकृत प्रयोजन की निष्पत्ति हो जाएगी, क्योंकि ( व्याप्ति से ) अभिज्ञ पुरुष को ( व्याप्ति के कारणीभूत अन्वय और व्यतिरेक का स्मरण यों ही ( बिना निदर्शनवाक्य और अनुसन्धानवाक्य के सुने ही ) हो जाएगा । ( प्रतिज्ञावाक्य के प्रयोग के बाद हेतुवाक्य का प्रयोग होने के बाद ही ) अभीष्ट अर्थ का बोध सम्पन्न हो जाएगा । अतः ( प्रतिज्ञादि चार अवयवों के प्रयोग को पूर्व पक्षी जिस दृष्टि से आवश्यक मानते हैं, उसी दृष्टि से उन्हे मानना होगा कि ( प्रत्याम्नाय पर्यन्त पाँच अवयववाक्यों के प्रयोग से ही अभीष्ट अर्थ के ज्ञान की समाप्ति हो सकती है ) । न्यायकन्दली हेत्वादिभिरवयवैः पक्षधर्मतान्वयव्यतिरेकोपपन्नं लिङ्गम् । तावतेव च तस्माद-र्थावगतिसम्भवात् कृतं निगमनेनेति । समाधत्ते - नातिप्रसङ्गादिति । वाक्यं लिङ्गसामर्थ्यमेव बोधयति न साध्यम् । किं तु न तस्य सामर्थ्यं बहिर्व्याप्ति-पक्षधर्मतामात्रम्, सत्यपि तस्मिन् प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टयोर साधकत्वात्, अपि त्वबाधितविषयत्वमसत्प्रतिपक्षत्वमपि सामर्थ्यम् । तत्सद्भावो यावत्प्रमाणेन न प्रतिपाद्यते तावत्प्रतिपक्षसम्भवाशङ्काया अनिवर्तनात् । धर्मिण्युपसंहृतेऽपि साधने साध्यप्रतीतेरयोग इति विपरीतप्रमाणाभावग्राहकं ( व्याप्ति ) एवं पचधर्मता इन दोनों से युक्त हैतु की उपस्थिति तो हेतु उदाहरण और उपनय इन्हीं अवयवों से सम्पन्न हो जाती है, फिर कौन सी आवश्यकता अवशिष्ट रह जाती है, जिसके लिए निगमनवाक्य का प्रयोग आवश्यक होता है? " न, अतिप्रसङ्गात् " इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस आक्षेप का समाधान करते हैं । ( उदाहरणादि अवयव ) वाक्यों से लिङ्ग के ( व्याप्ति और पक्षधर्मता रूप ) सामर्थ्य का ही बोध होता है साध्य का नहीं, किन्तु केवल व्याप्ति और पक्षधर्मता ये ही दोनों हेतु के सामर्थ्य नहीं हैं, क्योंकि उक्त सामर्थ्य के रहने पर भी प्रकरणसम ( सत्प्रतिपक्षित ) और कालात्ययापदिष्ट ( बाधित ) हेतु से साध्य को सिद्धि नहीं होती । अतः हेतु में साध्यसिद्धि के उपयुक्त सामर्थ्य के लिए यह भी आवश्यक है कि पक्ष में उसके साध्य को बाध न हो, एवं पक्ष में उसके साध्य के अभाव साधक का कोई दूसरा हेतु न रहे, फलतः अबाधितविषयत्व और असत्प्रतिपक्षितत्व ये दोनों भी हेतु के सामर्थ्य हैं | प्रमाण के द्वारा जब तक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१५ न्यायकन्दली प्रकरणसमकालात्ययापदिष्टत्वा-प्रमाणमुपदर्श्यते । तदभावे प्रतिपादिते, भावे निश्चिते, प्रख्यापितसामर्थ्यं साधनं साध्यं समर्थयतीति प्रत्याम्नायोपयोगः । तत्र यद्यनुक्तमपि सामर्थ्यमर्थाद् गम्यत इत्यस्य प्रतिक्षेपः क्रियते, तदोदाहारणा-दिकमपि प्रतिक्षेप्तव्यम् । प्रतिज्ञानन्तरं हेत्वभिधाने कृते विदुषां स्वयमेवान्व यव्यतिरेकस्मरणादर्थावगतिसम्भवात् । एतदुक्तं भवति । न प्रतिपन्नं प्रति परार्थानुमानम्, वैयर्थ्यात् । न च प्रतिपाद्यस्य कियत्यङ्ग प्रतिपत्तिरस्ति, कियति नास्तीति शक्यमवगन्तुम्, युक्ता परचित्तवृत्ते रुन्नेयत्वात् । नापि तच्छक्त्यनुरोधाद् वाक्यकल्पना, प्रतिपत्तॄणां विचित्रशक्तिमत्त्वात् । तस्मात् परं बोधयता यावता हेतोः साधकत्वं इन दोनों सामर्थ्यो का प्रतिपादन नहीं होगा, तब तक प्रतिपक्ष को सम्भावना बनी ही रहेंगी । इस प्रकार ( व्याप्ति और पक्षधर्मता से युक्त हेतु का पक्ष में उपसंहार होने पर भी साध्य की ( प्रमा ) प्रतीति नहीं हो पाती है । अत: साध्य के विपरीत अर्थात् साध्याभाव के साधक प्रमाणों के अभाव के ग्राहक प्रमाण का भी प्रदर्शन किया जाता है । इस प्रकार विपरीत अर्थात् उक्त प्रमाणाभाव की उपपत्ति से ही हेतु में प्रकरणसमत्वा-भाव ( असत्प्रतिपक्षितत्व ) और कालात्ययापदिष्टत्वाभाव ( अबाधितत्व ) इन दोनों का भी निश्चय होता है । इस रीति से हेतु में साध्य के साधक उक्त सभी सामर्थ्यो के ज्ञान से ही हेतु साध्य का साधन करता है, अतः प्रत्याम्नाय ( निगमन ) का प्रयोग आवश्यक है । ऐसी स्थिति में यदि प्रत्याम्नाय वाक्य के बिना कहे हुए भी हेतु के उक्त प्रकरणसमत्वाभाव और कालात्ययापदिष्टत्वाभाव रूप सामथ्यं का आक्षेप से बोध मांन कर प्रत्याम्नाय ( निगमन ) वाक्य का खण्डन करें, तो फिर ( व्याप्ति और पक्ष-धर्मता के बोधक ) उदाहरणादि वाक्यों का भी खण्डन करना होगा । क्योंकि प्रतिज्ञा वाक्य के बाद हेतु वाक्य का प्रयोग कर देने से ही बोद्धा को स्वयं हेतु का साध्य के साथ जो अन्वय और व्यतिरेक है, उसका स्मरण हो जाएगा, जिससे साध्य की अनुमिति हो जाएगी । सिद्धान्तियों के इस सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि सर्वथा व्युत्पन्न पुरुष के लिए परार्थानुमान का प्रयोग व्यर्थ होने के कारण अपेक्षित ही नहीं है । यतः दूसरे की चित्तवृत्ति को यथार्थ रूप से समझना भी बहुत कठिन है । अतः बोद्धा को ' अनुमिति के उत्पादक कितने अङ्गों का ज्ञान है एवं कितने अङ्गों का नहीं ' यह समझना भी असम्भव साही है । यह भी सम्भव नहीं है कि बोद्धा के सामर्थ्य के अनुसार अवयव वाक्यों का प्रयोग हो, क्योंकि बोद्धाओं के प्रत्येक व्यक्ति में अलग अलग प्रकार की शक्ति होती है । अतः वस्तुस्थिति के अनुसार हेतु की जितनी शक्तियों से साध्य का प्रतिपादन सम्भव है, उन सभी को समझाने के लिए जितने वाक्यों की आवश्यकता जान पड़े, उन सभी वाक्यों का प्रयोग सभी परार्थानुमानों में कर देना चाहिए । यह नहीं कि जहाँ जिस बोद्धा For Private And Personal