प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 691–700

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 691–700

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६१६ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणेऽनुमानेऽवयव-वस्तुवृत्त्योपपद्यते तावानर्थो वचनेन प्रतिपादनीयः, न प्रतिपत्तृविशेषानुरोधेन व्यम् । यथोक्तम्-वस्तु प्रत्यभिधातव्यम् सिद्धार्थो न परान् प्रति 1 को हि विप्रतिपन्नायास्तद्बुद्धेरनुधावति ॥ उपसंहरति- तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्तिरिति । सति हेतोः समग्रं सामर्थ्यं प्रतीयते तस्मादत्रैव निगमने अर्थस्य साध्यस्य परिस-माप्तिः प्रतीतिपर्यवसानम् । यद्वैवं योजना, यस्मान्निगमनमन्तरेण विपरीतप्रमाणाभावो नावगम्यते, तस्मादेतस्मिन्नेवार्थस्य सम्यग् हेतुसामर्थ्यस्य परिसमाप्तिः पर्यवसानमिति । प्रत्येकमुक्तमेवावयवानां रूपमेकत्र संहृत्य प्रश्नपूर्वकं कथयति -- कथ-मित्यादिना । किं शब्दो नित्यः किं वा अनित्य इत्यन्यतरधर्मजिज्ञासायां प्रतिज्ञावचनेना निश्चितेनानित्यत्वमात्रेण विशिष्टः शब्दः कथ्यते ' अनित्यः ' की जितनी शक्ति है, उसके अनुसार उन उन जगहों में अलग अलग संख्या के वाक्यों का प्रयोग किया जाय । जैसा कहा गया है कि " दूसरों को किसी वस्तु को समझाने के लिए ' सिद्धार्थवाक्य ' का ( अर्थात् जितने वाक्यों से उस अर्थ की सिद्धि की सम्भावना हो उन सभी वाक्यों का ) प्रयोग करना चाहिए ( समझनेवाले पुरुष की बुद्धि के अनुसार वाक्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ) बोद्धा की विविध बुद्धियों का अनुगमन कौन कर सकता है? " ' तस्मादत्रैवार्थपरिसमाप्ति: ' इस वाक्य से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । यतः निगमन वाक्य के प्रयोग के होने पर ही हेतु के पूर्णसामर्थ्य की प्रतीति होती है ' तस्मादत्रैव ' अर्थात् अतः ' यहीं ' निगमनवाक्य में ही ' अर्थ ' को अर्थात् साध्य की ' परिसमाप्ति ' अर्थात् प्रतीति की अन्तिम परिणति होती है । अथवा ' तस्मात् ' इत्यादि उपसंहार वाक्य को इस प्रकार लगाना चाहिए कि यतः निगमन के बिना विपरीत प्रमाण को असत्ता की प्रतीति नहीं होती है ' तस्मात् ' निगमनवाक्य में ही ' अर्थ ' की अर्थात् सद्धेतु के सामर्थ्य की परिसमाप्ति ' अर्थात् पर्यवसान ( अन्तिम परिणति ) होता है । अलग अलग कहे गए प्रत्येक अवयव के स्वरूप को एक स्थान में संग्रह कर प्रश्नोत्तर रूप से ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कहते हैं । शब्द के प्रसङ्ग में नित्यत्व और अनित्यत्व इन दोनों में से ' यह नित्य है? अथवा अनित्य? ' इस प्रकार की एक ही आकाङ्क्षा उठती है । उसी के शमन के लिए ' अनित्यः शब्द: ' इस आकार का प्रतिज्ञा-वाक्य प्रयुक्त होता है, जिससे ' शब्द उस अनित्यत्व रूप धर्मं से युक्त है, जो अनिश्चित है ' इस आकार का बोध होता है । ' शब्द अनित्य ही है ' इसमें क्या हेतु है? For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ७८ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६१७ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal कथम्? अनित्यः शब्द इत्यनेनानिश्चितानित्यत्वमात्र विशिष्टः शब्दः कथ्यते । प्रयत्नानन्तरीयकत्वादित्यनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रम-भिधीयते । ' इह यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यं दृष्टम्, यथा घटः ' इत्यनेन साध्य सामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रमुच्यते । नित्यम-( प्र ० ) ( प्रतिज्ञादि पाँच अवयवों की आवश्यकता ) किस प्रकार है? ( उ ० ) ' अनित्यः शब्द: ' ( शब्द अनित्य है ) इस प्रतिज्ञावाक्य से अनिश्चित अनित्यत्व से युक्त शब्द का ही बोध होता है । प्रतिज्ञावाक्य के बाद प्रयुक्त ' प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् ' ( यतः प्रयत्न के बाद ही शब्द की सत्ता उपलब्ध होती है ) इस हेतु वाक्य से ' शब्द में अनित्यत्व का इति । तत्र को हेतुरित्यपेक्षायां प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् पूर्वमसतः प्रयत्नानन्तरमुप-लभ्यमानत्वादिति हेतुवचनेनानित्यत्वसाधनधर्ममात्रमभिधीयते । मात्रग्रहणेन पक्षधर्मताया अन्वयव्यतिरेकयोश्चानभिधानं दर्शयति । अवगतसाधनस्य कथमिदं साध्यं गमयतीति साधनसामर्थ्यापेक्षायाम् ' इह जगति यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यं दृष्टम् ' इत्युदाहरणेन साध्यसामान्येन साधनसामान्यस्यानुगममात्रं करोति, न तु स्वरूपान्तरमिति मात्रशब्दार्थः । नित्यमयत्नानन्तरीयकमिति वैधर्म्य -निदर्शनेन साध्याभावे साधनाभावः प्रदर्श्यते - यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्य-इस प्रकार की आकाङ्क्षा के उठने पर उसके शमन के लिए ' प्रयत्नानन्तरीयकत्वात् ' इस हेतुवाक्य का प्रयोग किया जाता है । प्रयत्न के बाद ही पहिले से अविद्यमान वस्तु की उपलब्धि होती है । इस हेतु वाक्य के द्वारा शब्द में अनित्यत्व के साधक ' प्रयत्नानन्तरीयकत्व ' ही केवल उपस्थित किया जाता है । इस वाक्य में ' मात्र ' शब्द का प्रयोग यह समझाने के लिए किया गया है कि इस वाक्य से हेतु का अन्वय और व्यतिरेक अर्थात् व्याप्ति और पक्षधर्मता का प्रतिपादन नहीं होता है ( केवल हेतु का ही अभिधान होता है ) । बोद्धा को जब हेतु का ज्ञान हो जाता है, तब उसे जिज्ञासा होती है कि किस रीति से यह हेतु इस साध्य की अनुमिति का उत्पादन कर सकता है? ' हेतु के सामर्थ्य के प्रसङ्ग की इस जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए ही ( उक्त स्थल में ) ' इह ' इत्यादि उदाहरण वाक्य का प्रयोग किया जाता है । जिनका अभिप्राय है कि ' इह ' अर्थात् संसार में प्रयत्न के बाद हो जिसकी उपलब्धि होती है, वह अर्थ अनित्य ही देखा जाता है । उदाहरण वाक्य से सभी साधनों में सभी साध्यों की केवल अनुगति अर्थात् व्याप्ति ही केवल दिखलायी जाती है, पक्षधर्मता नहीं । यही बात उक्त सन्दर्भ में ' मात्र ' शब्द के प्रयोग से दिखलायी गई है । ' नित्यमप्रयत्ना-नन्तरीयकम् ' इस वैधभ्यंनिदर्शन वाक्य के द्वारा साध्य के अभाव में हेतु के अभाव

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-प्रयत्नानन्तरीयकं दृष्टम्, यथाकाशमित्यनेन साध्याभावेन साधनस्या-सत्त्वं प्रदर्श्यते । तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दो दृष्टो न च तथाकाशवदप्रयत्नानन्तरीयकः शब्द इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्ट-सामर्थ्यस्य साधनसामान्यस्य शब्देऽनुसन्धानं गम्यते । तस्मादनित्यः साधक प्रयत्नान्तरीयकत्व की सत्ता है ' केवल इतना ही बोध होता है । ( इसके बाद प्रयुक्त ) ' प्रयत्न के बाद जो सत्ता लाभ करते हैं, वे सभी अनित्य ही देखे जाते हैं जैसे कि घटादि ' इस ( साधर्म्य ) निदर्शन वाक्य सभी साध्यों के साथ सभी हेतुओं के केवल अन्वय का बोध होता है ' जितने भी नित्य पदार्थ उपलब्ध हैं, उन सभी की सत्ता बिना प्रयत्न के ही देखी जाती है जैसे कि आकाश की ' इस ( वैधर्म्य ) निदर्शन वाक्य से साध्य के अभाव के साथ हेतु के अभाव की नियमित सत्ता रूप व्यतिरेक ही प्रतिपादित होता है " शब्द घटादि की तरह प्रयत्न के बाद ही सत्ता लाभ करते दीखते हैं ' एवं ' आकाशादि की तरह बिना प्रयत्न के ही सत्ता लाभ करते नहीं दीखते ' इस अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा ( प्रयत्नानन्तरीयकत्व रूप ) हेतु में अनित्यत्व रूप साध्य के साधन का व्याप्ति रूप सामर्थ्य ज्ञात होता है ( इस प्रकार ) ज्ञान के सामर्थ्य ( व्याप्ति ) से युक्त हेतु सामान्य का शब्द रूप पक्ष में अनुसन्धान ही अनुसन्धान - वाक्य से किया जाता है । न्यायकन्दली मिति । दृष्टमेतत् किं तु शब्दे तदस्ति नवेति जिज्ञासायाम् - तथाच प्रयत्ना-नन्तरीयकः शब्द इति । यथा घटः प्रयत्नानन्तरीयकः, तथा शब्दोऽपि प्रयत्ना-नन्तरीयकः न चाकाशवदप्रयत्नानन्तरीक इत्यनुसन्धानेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां दृष्टसामर्थ्यस्य दृष्टाविनाभावस्य प्रयत्नानन्तरीकत्वस्य शब्दे धर्मिण्यनुसन्धान-मुपस्थापनं गम्यते । यथा यत् कृतकं तदनुष्णं दृष्टम्, यथा घट इति सत्यपि ( की व्याप्ति ) दिखलायी गयी है । ' यत् प्रयत्नानन्तरीयकम्, तदनित्यम् ' इस साधर्म्य निदर्शन वाक्य से " यह तो समझा कि प्रयत्न को सत्ता के अधीन जिनकी सत्ता होती है, वे सभी अनित्य होते हैं, किन्तु शब्द में यह प्रयत्नानन्तरीयकत्व है कि नहीं? यह जानने की इच्छा तब भी बनी ही रहती है, इसी इच्छा को निवृत्ति के लिये " तथा च प्रयत्नानन्तरीयकः शब्दः " इस वाक्य का प्रयोग किया जाता है । अर्थात् जिस प्रकार घट में प्रयत्नानन्तरीयकत्व है, उसी प्रकार शब्द में भी प्रयत्नानन्तरीयकत्व है । एवं आकाश की तरह शब्द प्रयत्नानन्तरीयक नहीं है । इस प्रकार दोनों अनुसन्धान वाक्यों से अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा दृष्टसामर्थ्य ' अर्थात् जिस प्रयत्नानन्तरीयकत्व हेतु की व्याप्ति ज्ञात हो गयी है, उसी प्रयत्नानन्तरीयकत्व का ' शब्द ' में अर्थात् पक्ष में ' अनुसन्धान ' अर्थात् उपस्थापन होता है । जिस प्रकार " जो कृति से उत्पन्न होता है, वह अनुष्ण होता है " इस प्रकार की बाह्य व्याप्ति की सम्भावना इससे मिट जाती है For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् } भाषानुवादसहितम् ६१ ९ प्रशस्तपादभाष्यम् शब्द इत्यनेनानित्य एव शब्द इति प्रतिपिपादयिषितार्थ परिसमाप्ति-गंम्यते: ( अर्थात् निदर्शन के द्वारा ज्ञात व्याप्ति विशिष्ट हेतु का पक्ष के साथ सम्बन्ध रूप पक्षधर्मता ही अनुसन्धान वाक्य से प्रतिपादित होती है ) इसके बाद ' अनित्यः शब्दः ' इस प्रत्याम्नाय वाक्य से ' शब्द अनित्य ही है ' इस प्रकार प्रतिपादन के लिए इच्छित अर्थ की परिसमाप्ति होती है । न्यायकन्दली बहिर्व्याप्तिसम्भवे कृतकस्तेजोऽवयवी अनुष्णो न भवति, प्रमाणविरोधात् । तथा यत् प्रयत्नानन्तरीयकं तदनित्यमिति बहिर्व्याप्तिसम्भवे कदाचित् प्रयत्नानन्त-रीयकः शब्दोऽनित्यो न भवेदिति विपक्षाशङ्कायां हेतोरसाधकत्वे तस्मादनित्यः शब्द इति प्रत्याम्नायः यस्मान्नित्यत्वप्रतिपादकं प्रमाणं नास्ति तस्माच्छब्दो नित्यो न भवतीत्यर्थः । अनेनान्यव्यावृत्तिवाचिना विपरीतप्रमाणाभावग्राहकं प्रमाणमुपस्थाप्यते, उपस्थापिते च तदभावे प्रतिपादिते विपरीतशङ्कानिवृत्तौ दर्शिताविनाभावाद्धेतोर्धमिण्युपसंहृताद् ब्याप्तिग्राहक प्रमाणबलेन निर्विचिकित्सः साध्यं प्रत्येति, नापरं किञ्चिदपेक्ष्यत इत्यनेन प्रत्याम्नायेनानित्य एव शब्द इति प्रतिपिपादयिषितस्यार्थस्य परिसमाप्तिनिश्चयो गम्यते । कि तेज के अवयव कृतिजन्य होते हुए भी अनुष्ण नहीं होते क्योंकि ऐसा मानने पर प्रत्यक्ष प्रमाण का विरोध होगा । उसी प्रकार ' जो प्रयत्नानन्तरीयक है वह अनित्य है ' इस बाह्य व्याप्ति की सम्भावना में भी यह आपत्ति की जा सकती है कि शब्द यद्यपि प्रयत्नानन्तरीयक है, फिर भी अनित्य नहीं भी हो सकता है ' इस प्रकार शब्द में अनित्यत्व के साधक ' प्रयत्नानन्तरीयकत्व ' में असाधकत्व ( साध्य को साधन करने की अक्षमता ) की जो आपत्ति उपस्थित होती है, उसी को मिटाने के लिए ' तस्मादनित्यः शब्द: ' इस प्रत्या-माय वाक्य का प्रयोग किया जाता है । इसका यह अभिप्राय है कि यतः शब्द में नित्यत्व का साधक कोई प्रमाण नहीं है, अतः शब्द नित्य नहीं हो सकता । अन्यव्यावृत्ति के बोधक इस प्रत्याम्नाय वाक्य के द्वारा प्रकृत अनित्यत्व रूप साध्य के विपरीत अर्थात् नित्यत्व के साधक प्रमाण का अभाव उपस्थित किया जाता है । उसकी उपस्थिति हो जाने पर प्रकृत साध्य के विपरीत साध्य को शङ्का मिट जाती है, जिससे कथित व्याप्ति से युक्त हेतु का प्रकृत पक्ष में उपसंहार के द्वारा व्याप्ति के बोधक प्रमाण की निर्बाध उपस्थिति होती है । विपरीत प्रमाणाभाव को इस उपस्थिति से साध्य के विपरीत अर्थात् साध्याभाव की शङ्का भी मिट जाती है । इससे पूर्व में कथित व्याप्ति से युक्त हेतु का पक्ष में उपसंहार के कारण उस व्याप्ति रूप ज्ञापक प्रमाण से साध्य का निःशङ्क ज्ञान हो जाता है । फिर साध्यज्ञान के लिए और किसी की अपेक्षा नहीं रह जाती । इस प्रकार प्रत्याम्नाय के द्वारा ' शब्द अनित्य हो है ' इस प्रतिपाद्य अर्थ की ' परिसमाप्ति ' अर्थात् अन्तिम ज्ञान होता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-प्रशस्तपादभाष्यम् तस्मात् पञ्चावयवेनैव वाक्येन परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं क्रियत इत्येतत्परार्थानुमानं सिद्धमिति । अतः पाँच अवयव वाक्यों से ही कोई समझानेवाला अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझा सकता है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि पाँच अवयव वाक्य ही ' परार्थानुमान ' हैं । न्यायकन्दली साध्यवाक्यार्थवादिनस्तु – निगमनस्येत्यमर्थवत्त्वं समर्थयन्ति -- अन्यदेव कृतकत्वमनित्यत्वेन घटस्य कृतकत्वमन्यच्छब्दस्य, तत्र यदि नाम घटस्य व्याप्तं किमेतावता शब्दगतेनापि तथा भवितव्यम्? इति व्यामुह्यतो दर्शितयोरपि लिङ्गस्य पक्षधर्मत्वाविनाभावयोः साध्यप्रतीत्यभावे सति निगमनेन तस्मादिति सर्वनाम्ना सामान्येन प्रवृत्तव्याप्तिग्राहकं प्रमाणमनुस्मार्य शब्दे अनित्यत्वं प्रतिपाद्यते यस्माद् यत् कृतकं तदनित्यमिति सामान्येन प्रतीतं न विशेषतः, तस्मात् कृतकत्वेनानित्यः शब्दः इति । एतस्मिन् पक्षे च प्रकरणसमकालात्य-यापदिष्टत्वाभावः पक्षवचनेनैवोपदर्श्यते, असत्प्रतिपक्षत्वाबाधितविषयत्वयोः पक्षलक्षणत्वात् । साध्यवाक्यार्थ वादिगण ( निगमन को साध्य का ज्ञापक माननेवाले ) निगमन को सार्थकता की पुष्टि इस प्रकार करते हैं कि ( दृष्टान्तभूत ) घट में रहनेवाला कृतकत्व और शब्द में रहनेवाला कृतकत्व दोनों भिन्न हैं । अतः कथित व्याप्ति और पक्षधर्मता को समझनेवाले पुरुष को भी यह भ्रान्ति हो सकती है कि घट में रहनेवाले कृतकत्व में अनित्यत्व की व्याप्ति के रहने पर भी यह निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में भी अनित्यत्व की व्याप्ति है हो | इस प्रकार के पुरुष को ( घट में रहनेवाले अनिश्यत्व में कृतकत्व को व्याप्ति का ज्ञान रहने पर भी ) शब्द में अनित्यत्वरूप साध्य की अनुमिति नहीं हो सकती । इसी के लिए तस्मात् ' इत्यादि सर्वनाम घटित निगमनवाक्य के द्वारा कृतकत्व सामान्य में अनित्यत्व सामान्य की व्याप्ति का स्मरण कराया जाता है, जिससे उसे भी शब्द में अनित्यत्व का ज्ञान हो । अभिप्राय यह है कि उक्त उदाहरण वाक्य से सामान्य रूप से ही यह प्रतोति होती है कि जितनी भी वस्तुयें कृति से उत्पन्न होती है, वे सभी अनित्य होती हैं । उदाहरण वाक्य का यह विशेष अभिप्राय ही नहीं है कि ' घट कृति से उत्पन्न होता है । अतः वही अनित्य है ' । तस्मात् शब्द भी कृतिजन्य है, वह भी अनित्य है । इस मत में अबाधितत्व और असत्प्रतिपक्षितत्व हेतु के ये दोनों ही सामर्थ्य पक्षवचन ( प्रतिज्ञावाक्य ) से ही प्रदर्शित होते हैं । क्योंकि ये दोनों वस्तु पक्ष के स्वरूप के ही अन्तर्गत हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 696

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 696 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६२१ अपरे तु तस्मादिति त्रैरूप्यमेव परामृशन्ति ' यस्माद् यत् कृतकं तदनित्यं दृष्टम्, यस्मात् कृतकः शब्दः, यस्माच्च प्रतिपक्षबाधयोरसम्भवस्तस्मात् कृतकत्वादनित्यः शब्दः ' इति । उपसंहरति - तस्मादिति । यस्मात् पञ्चस्वावयवेषु समग्रस्य साधनसामथ्र्यस्य प्रतीतौ साध्यप्रतीतिः पर्यवस्यति, नापरं किश्विदपेक्षते, तस्मात् पञ्चावयवेनैवान्यूनाधिकेन वाक्येन स्वनिश्चितस्यार्थस्य प्रतिपादनं क्रियत इति कृत्वा एतत्पश्वावयवं वाक्यं परार्थानुमानमिति सिद्धं व्यवस्थितम् । ये तु प्रत्यक्षमेवैकं प्रमाणमिच्छन्तो नानुमानं प्रमाणमिति वदन्ति त इदं प्रष्टव्याः, किमेकमेव प्रत्यक्षं स्वलक्षणं प्रमाणं यत्स्वरूपं प्रतीयते? किं वा सर्वमेव? न तावदेकमेव प्रमाणम्, अपरस्य तत्तुल्यसामग्रीकस्याप्रामाण्यका-दूसरे सम्प्रदाय के लोग निगमन वाक्य के तस्मात् ' इस ( सर्वनाम पद ) से हेतु की व्याप्तिपक्षधर्मता और अबाधितत्व असत्प्रतिपक्षितत्व इन तीनों रूपों का ही ग्रहण करते है, तदनुसार ' तस्मादनित्यः शब्द. ' इस निगमन वाक्य का अर्थ इस प्रकार करते हैं कि ' यस्मात् ' अर्थात् जिस लिए कि जितनी भी कृति से उत्पन्न वस्तुयें हैं, वे सभी अनित्य हो देखो जाती हैं, एवं ' यस्मात् ' अर्थात् यतः शब्द भी कृति जन्य वस्तु है, एवं ' यस्मात् अर्थात् उक्त स्थल में बाघ और सत्प्रतिपक्ष को सम्भावना नहीं है ' तस्मात् ' अर्थात् कृति जन्य होने से शब्द भी अनित्य है । ' तस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा भाष्यकार इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ( इस उपसंहार वाक्य का अभिप्राय यह है कि ) ' यस्मात् ' अर्थात् जिस कारण कथित पाँच अवयववाक्यों से ही हेतु के सभी सामथ्र्य की प्रतीति होती है, और उसके बाद ही साध्य की अनुमिति रूप प्रतीति उपपन्न हो जाती है और किसी की अपेक्षा उसे नहीं रह जाती, अत: ' पञ्चावयवेनैव ' अर्थात् न उन पाँच अवयव वाक्यों से अधिक वाक्य की अपेक्षा रहती है, और न उनसे एक की भी कमी से काम ही चलता है, फलतः उन्हीं पञ्चावयव वाक्यों से वक्ता अपने पूर्व निश्चित अर्थ का प्रतिपादन करता है, इस रीति से यह ' सिद्ध ' हुआ अर्थात् व्यवस्थित हुआ कि ये पाँच अवयव वाक्य ही ' परार्थानुमान ' हैं । जो सम्प्रदाय एक मात्र प्रत्यक्ष को ही प्रमाण मानने के अभिप्राय से कहते हैं कि ' अनुमान प्रमाण नही है ' उनसे पूछना चाहिए कि ' केवल स्ववृत्ति एक वही प्रत्यक्ष व्यक्ति प्रमाण है? जिससे कि उसके विषय के स्वरूप का बोध होता है, ( अर्थात् वर्त्तमान विषय को ग्रहण करनेवाला स्वगत ज्ञान ही प्रत्यक्ष है ) अथवा जितने भी ( वर्त्तमान, भूत और भविष्य ) विषयों के ज्ञान होते हैं, वे सभी प्रमाण हैं १ ऐसा कहना तो सम्भव नहीं है कि एक ( वर्त्तमान विषय का ग्राहक ) ही प्रकार का ज्ञान प्रत्यक्ष है, क्योंकि समान कारणों से उत्पन्न ज्ञानों में से एक को ही प्रमाण मानकर और For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२२ म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपणे निर्णय-रणाभावात् । अथातीतमनागतं च पुरुषान्तरर्वात सर्वमेव प्रत्यक्षं स्वलक्षणं प्रमाणम्? कथमिदं निश्चीयते? प्रतीयमानप्रमाणव्यक्तिसजातीयत्वादिति चेत्? अङ्गीकृतं स्वभावानुमानस्य प्रामाण्यम् । एवमनुमानप्रमाणत्वमपि विकल्प्य वाच्यम् । कश्च प्रत्यक्षं प्रमाणं प्रतिपाद्यते? न तावत् स्वात्मैव प्रतिपादकत्वात् । परश्चेत्? स किं प्रतिपन्नः प्रतिपाद्यते? विप्रतिपन्नो वा? न प्रतिपन्नः प्रतिपन्नस्य प्रतिपादनवैयर्थ्यात् । विप्रतिपन्नश्चेत्? पुरुषान्तरगता विप्रतिपत्तिश्च न प्रत्यक्षेण गम्यते । वचन-लिङ्गेनानुमीयते चेत्? सिद्धं कार्यानुमानस्य प्रामाण्यम् । ( न ) अनुमानं प्रमाणमिति केन प्रमाणेन साध्यते? प्रत्यक्षं विधिविषयम्, न कस्यचित् प्रतिषेधे प्रभवति । अनुपलब्ध्या गम्यते चेत्? तर्ह्यनुपलब्धिलिङ्गक-मनुमानं स्यात् । तथा चोक्तं सौगते: -सभी को अप्रमाण मानने का कोई हेतु नहीं है । यदि भूत और भविष्य विषयक प्रत्यक्ष अथवा दूसरे पुरुष में रहनेवाले प्रत्यक्ष ये सभी प्रमाण हैं, तो फिर यह पूछता है कि यह कैसे निश्चय करते हैं कि ' वे सब भी प्रमाण हैं यदि यह कहें कि ( प्र ० ) अपने द्वारा ज्ञात प्रत्यक्षप्रमाण का सादृश्य उन ज्ञानों में देखा जाता है, अत: उन्हें भी प्रत्यक्ष प्रमाण समझते हैं ' ( उ ० ) तो फिर आपने भी स्वभावलिङ्गक अनुमान को मान ही लेते हैं । इसी प्रकार अनुमान प्रमाण के प्रसङ्ग में भी इस प्रकार के विकल्पों को उपस्थित कर पूछना चाहिए कि ( जिन अनुमानों को आप प्रत्यक्ष मानते हैं ) उन प्रत्यक्षों के द्वारा किसे समझाना है? प्रतिपादन करनेवाला अपने को तो समझा नहीं सकता, क्योंकि वह स्वयं ही प्रतिपादक है । ( प्रतिपाद्य और प्रतिपादक कभी एक नहीं हो सकता ) यदि दूसरे को समझाना है तो इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि वह समझनेवाला प्रमाज्ञान से युक्त है? अथवा भ्रमात्मकज्ञान से युक्त है? प्रमाज्ञान से युक्त पुरुष को समझाना ही व्यर्थ है, क्योंकि वह स्वयं प्रतिपाद्य विषय को अच्छी तरह जानता है । अतः उसे समझाने का प्रयास ही व्यर्थ है । यदि उसे भ्रमात्मक ज्ञान से युक्त मानते हैं ( तो फिर इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि उस पुरुष में रहनेवाले भ्रम को आपने कैसे जाना? क्योंकि दूसरे पुरुष में रहनेवाले भ्रम का तो प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है । मदि उस पुरुष के वचन से उसके भ्रम को समझते हैं? तो फिर कार्य हेतुक अनुमान का प्रामाण्य ही सिद्ध हो जाता है । ' अनुमान प्रमाण नहीं है ' यह आप किस प्रमाण से सिद्ध करना चाहते हैं? प्रत्यक्ष प्रमाण तो केवल भाव विषयक है, उससे किसी का प्रतिषेध नहीं किया जा सकता! यदि अनुपलब्धि के द्वारा अनुमान के प्रामाण्य का प्रतिषेध करते हैं, तो फिर अनुपलब्धि लिङ्गक अनुमान को मानना ही पड़ेगा | जैसा कि ' प्रमाणेतर ' इत्यादि वार्तिक के द्वारा बौद्धों ने कहा है-For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् ६२३ प्रशस्तपादभाष्यम् संशय विरोधी विशेषदर्शन जमवधारणज्ञानं निर्णयः । एतदेव प्रत्यक्षमनुमानं वा । यद् विशेषदर्शनात् संशयविरोध्युत्पद्यते । विशेष विषयक ज्ञान रूप ज्ञान ही ' निर्णय ' है । उत्पन्न एवं संशय का विरोधी अवधारण ' प्रत्यक्ष और अनुमिति दोनों निर्णय रूप ही न्यायकन्दली प्रमाणेतर सामान्य स्थितेरन्यधियो गतेः । प्रमाणान्तरसद्भावः प्रतिषेधाच्च कस्यचित् । इति । प्रमाणतदभावसामान्यव्यवस्थापनात्, परबुद्धेरधिगमात् कस्यचिदर्थस्य प्रतिषेधाच्च प्रत्यक्षात् प्रमाणान्तरस्य स्वभावकार्यानुपलब्धिलिङ्गस्यानुमानस्य सद्भाव इति वार्त्तिकार्थ इति । निर्णयं केचित् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां प्रमाणान्तरमिच्छन्ति, तान् प्रत्याह-विशेषदर्शनजमित्यादि । यत्र विशेषानुपलम्भात् संशयः संजातः, तत्र विशेष -दर्शनाज्जायमानमवधारणज्ञानं निर्णयः । स च संशयविरोधी, तस्मिन्नुपजाय-माने संशयस्योच्छेदात् । यथाह मण्डनो विभ्रमविवेके-निश्चिते न खलु स्थाणावूर्ध्वत्वेन विशेरते । इति । संशेरत इत्यर्थः । यद्यपि सर्वमेव निश्चयात्मकं ज्ञानं निर्णय:, तथापि संशयोत्तरकालभावित्वेन प्रसिद्धिप्राबल्यात् संशयविरोधीत्युक्तम् - - स्वोक्तं ' प्रत्यक्ष ही प्रमाण है, अनुमानादि नहीं ' इस प्रकार प्रत्यक्ष के प्रामाण्य की सत्ता से, एवं अनुमानादि के प्रामाण्य की असत्ता से दूसरे पुरुष में रहनेवाली बुद्धियों को समझने से एवं घटादि किसी भी विषय के प्रतिषेध से यह समझते हैं कि ' प्रत्यक्ष से भिन्न और भी प्रमाण हैं ' । उक्त वार्तिक का अभिप्राय है कि प्रमाण और प्रमाणाभाव की व्यवस्था से, दूसरे पुरुष की बुद्धि को समझने से एवं किसी वस्तु के प्रतिषेध से समझते हैं कि प्रत्यक्ष से भिन्न कोई दूसरा प्रमाण अर्थात् स्वभावलिङ्गक, कार्यलिङ्गक, एवं अनुपलब्धि -लिङ्गक अनुमान प्रमाण भी अवश्य है । किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष और अनुमान से भिन्न एक ' निर्णय ' नाम का अलग प्रमाण मानने की अभिलाषा रखते हैं, उन्हीं लोगों के मत का खण्डन करने के लिए विशेष-दर्शनजम् ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । जहाँ असाधारण धर्म की अनुपलब्धि से संशय हो चुका है, वहाँ विशेषधर्म ( अपाधारण धर्म ) की उपलब्धि से उत्पन्न होनेवाला अव-धारणात्मक ज्ञान ही ' निर्णय ' है । यह सशय का प्रतिबन्धक है, क्योंकि इसके उत्पन्न होते ही संशय छूट जाता है । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने विभ्रमविवेक नाम के ग्रन्थ में कहा है कि - ( पुरोवत्ति पदार्थ का ) जब ' यह स्थाणु है ' इस आकार से निश्चय हो जाता है, तब फिर उसकी उँचाई ( साधार धर्म के ) ज्ञान से " यह स्थाणु है? या पुरुष इस आकार का संशय किसी को भी नहीं होता । ( उक्त आधे श्लोक में For Private And Personal

पृष्ठ 699

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२४ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे निर्णय-स प्रत्यक्षनिर्णयः । यथा स्थाणुपुरुषयोरुतामात्र सादृश्यालोचनाद् विशेषेष्व प्रत्यक्षेषूभय वि शेषानुस्मरणात्, किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति संशोत्पत्तौ शिरःपाण्यादिदर्शनात् पुरुष एवायमित्यवधारणज्ञानं प्रत्यक्ष निर्णयः । विषाणमात्र दर्शनाद् गौर्गवयो वेति संशयोत्पत्तौ सास्नामात्रदर्शनाद् गौरवायमित्यवधारणज्ञानमनुमाननिर्णय इति । होते हैं । अत: ( १ ) प्रत्यक्ष निर्णय और ( २ ) अनुमाननिर्णय भेद से निर्णय दो प्रकार का है । ( १ ) ( धर्मी के असाधारण धर्म रूप ) विशेष के प्रत्यक्ष से जो संशय का विरोधी ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' प्रत्यक्षनिर्णय ' कहते हैं । जैसे कि स्थाणु और पुरुष दोनों में साधारण रूप से रहनेवाली उच्चता ( उँचाई ) रूप सादृश्य के आलोचन ( साधारण ) ज्ञान से एवं स्थाणु और पुरुष दोनों के असाधारण धर्मों के ज्ञात न रहने के कारण केवल उन दोनों के असाधारणधर्म रूप विशेषों के स्मरण से यह स्थाणु है? या पुरुष? ' इस आकार के संशय की उत्पत्ति होती है इसके बाद ( केवल पुरुष में ही रहनेवाले शिर पैर प्रभृति ) पुरुष के असाधारण धर्मों के देखने से यह पुरुष ही है ' इस आकार का जो निश्चय रूप ज्ञान उत्पन्न होता है वही ' प्रत्यक्ष निर्णय ' है । ( २ ) केवल सींग के देखने के कारण यह संशय होता है कि यह गो है या गवय? ' ( इसके बाद केवल गाय में ही रहनेवाली ) सास्ना के देखने से जो " यह गाय ही है ' इस आकार का ज्ञान उत्पन्न होता है वही ' अनुमाननिर्णय ' है । न्यायकन्दली संग्रहवाक्यं विवृण्वन्निर्णस्य प्रत्यक्षानुमानयोरन्तर्भावं दर्शयति – एतदेवेत्यादि । प्रत्यक्षविषये यदवधारणात्मकं ज्ञानं स प्रत्वक्षनिर्णयः । यच्चानुमानविषये sa धारणज्ञानं सोऽनुमाननिर्णय इति उपरितनेन ग्रन्थसन्दर्भेण कथयति । प्रयुक्त ) ' विशेरते ' इस पद का अर्थ है ' संशेरते ' अर्थात् संशय का होना । यद्यपि सभी प्रकार के निश्चयात्मक ज्ञान निर्णय हैं फिर भी संशय के बाद होनेवाले निश्चयात्मक ज्ञान में ही ' निर्णय ' शब्द का अधिकतर प्रयोग होता है, अतः निर्णय के लक्षणवाक्य में ' संशयविरोधि ' पद का प्रयोग किया गया है | ' एतदेव ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अपने -हो संक्षिप्त लक्षण वाक्य की व्याख्या करते हुए भाष्यकार ने ' निर्णय ' का प्रत्यक्ष और अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया है । ऊपर कहे हुए सन्दर्भ का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का अवधारणात्मक ज्ञान ' प्रत्यक्ष निर्णय ' है, एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का जो अवधारणात्मक ज्ञान वह ' अनुमाननिर्णय ' है । For Private And Personal

पृष्ठ 700

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरणाद्यपेक्षादात्ममनसोः पट्वाभ्यासादर प्रत्ययजनिताच्च लिङ्ग ( हेतु ) के दर्शन एवं साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के इन दोनों से उत्पन्न ज्ञान ही स्मृति है । द्वारा ज्ञात विषयों की होती है, संस्काराद् ६२५ संयोगविशेषात् दृष्टश्रुतानुभूतेष्व-इच्छा, स्मृति प्रभृति ( उद्बोधकों ) से विशेष प्रकार के संयोग और संस्कार यह प्रत्यक्ष, अनुमिति एवं शाब्दबोध के अतः स्मृति अतीत विषयक ही न्यायकन्दली स्मृतिलक्षणां विद्यामाचष्टे – लिङ्गदर्शनेच्छेत्यादिना । लिङ्गदर्शनं चेच्छा. नुस्मरणं च । आदिशब्देन न्यायसूत्रोक्तानि प्रणिधानादीनि संगृह्यन्ते, तान्य-पेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगविशेषादिति स्मृतिकारणकथनम् । आत्ममन: -संयोगस्य च लिङ्गदर्शनादिसहकारितैव विशेषः, केवलादस्मात् स्मरणानुत्पत्तेः । लिङ्गदर्शनवत् संस्कारोऽपि स्मृतेनिमित्तकारणमित्याह - पट्वाभ्यासादरप्रत्ययज-नितात् संस्काराज्जायते पटुप्रत्ययः स्फुटतरप्रत्ययस्तस्मात् संस्कारो जायते । तेन गच्छत्तृणसंस्पर्शज्ञानात् क्वचित् पटुप्रत्ययोत्पादेऽपि ग्रहणयोग्यः संस्कारो न भवति । यथा साक्षात् पठितेऽनुवाके । तेन गृहीतस्यावृत्त्या - पुनः पुनर्ग्र-हणलक्षणोऽभ्यासः संस्कारकारणम्, तस्मिन् सत्यनुवाकस्य ग्रहणदर्शनात् । ' लिङ्गदर्शनेच्छा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा स्मृति ' रूप विद्या ( प्रमा ) का निरूपण करते हैं । ( उक्त वाक्य में प्रयुक्त ' लिङ्गदर्शनेच्छानुस्मरण ' शब्द से ) लिङ्गदर्शन, इच्छा च, अनुस्मरणव ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार, लिङ्गज्ञान, इच्छा और बार बार स्मरण को, एवं उक्त वाक्य में ही प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से न्यायसूत्र ( अ ० ३ आ ० २ सू ० ४४ ) में कथित स्मृति के प्रणिधानादि कारणों को संगृहीत समझना चाहिए । ' तान्य-पेक्षमाणादात्ममनसो संयोगविशेषात् ' इस पूर्वानुवृत्तिवाक्य से स्पृति का कारण प्रदर्शित हुआ है | आत्मा और मन के संयोग को स्मृति के उत्पादन में जो कथित ' प्रणिधानादि ' सहायकों की अपेक्षा होती है, वही उस संयोग का ' विशेष ' है ( जो प्रकृत वाक्य में प्रयुक्त ' संयोगविशेष ' शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है ) । क्योंकि ( प्रणिधानादि के न रहने पर ) केवल आत्मा और मन के संयोग से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती है । ‘ पट्वाभ्यासाद र प्रत्ययजनितात् संस्कारात् ' इस वाक्य के द्वारा लिङ्गदर्शन की तरह संस्कार में भी स्मृति की निमित्तकारणता कही गयी है । ' पटुप्रत्यय ' शब्द का अर्थ है स्फुटतर ( उपेक्षान्य ) प्रत्यय, उससे हो संस्कार को उत्पत्ति होती है । ' पटुप्रत्यय ' शब्द का स्फुटतर प्रत्यय रूप अर्थ इसलिए कर दिया गया है कि राह चलते हुए पुरुष को किसी तृण के स्पर्श का यद्यपि पटुप्रत्यय होता है, फिर भी उससे स्मृति के उत्पादन में क्षम GT For Private And Personal