प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 701–710

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 701–710

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२६ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्मृति-प्रशस्तपादभाष्यम् शेषानुव्यवसायेच्छानुस्मरण द्वेषहेतु रतीत विषया स्मृतिरिति । होती है । ( स्मृतिजनक उक्त संस्कार ) अत्यन्तस्फुटज्ञान, अभ्यास और आदर से उत्पन्न होता है । वह ( स्मृति रूप ज्ञान ) अनुमिति, इच्छा, स्मृति और द्वेष का ( उत्पादक ) कारण है । न्यायकन्दली क्वचिच्चात्यन्ताश्चर्यतरे वस्तुनि सकृदुपलब्धे कालान्तरे स्मृतिदर्शनादादरग्रहण-मपि संस्कारनिमित्तम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विषयसङ्कीर्तनं कृतम् । दृष्टेष्विति प्रत्यक्षीकृतेषु श्रुतेष्विति शब्दावगतेषु, अनुभूतेष्वनुमि-तेष्वित्यर्थः । शेषानुव्यवसायेच्छास्मरणद्वेषहेतुरिति कार्यनिरूपणम् । शिष्यते परिशिष्यते इति ' शेष ' | ' अनु ' पश्चाद् व्यवसितिः व्यवसायः । शेषश्चा-सावनुव्यवसायश्चेति शेषानुव्यवसायः, प्रथमोपजातलिङ्गज्ञानापेक्षया तदनन्तर्भा व्यनुमेयज्ञानम्, तस्य हेतुर्व्याप्तिस्मरणम् । सुखसाधनत्वस्मृतिरिच्छाहेतुः । प्रथम-संस्कार को उत्पत्ति नहीं होती है । जैसे कि पढ़े हुए भी अनुवाक के अध्ययन से स्मृतिक्षम संस्कार की उत्पत्ति होती है । इसकी पटुप्रत्यय की ' आवृत्ति ' अर्थात् बार बार ग्रहणरूप ' अभ्यास ' भी संस्कार का कारण है, क्योंकि अभ्यास के रहने पर ही अनुवाक का स्मरण होता है । किसी अत्यन्न अद्भुत वस्तु को एक बार देखने पर बहुत समय बाद भी उसकी स्मृति होती है, अतः ' आदरपूर्वक ग्रहण ' भी संस्कार का कारण है । किन प्रकार की वस्तुओं की स्मृति होती है? इस प्रश्न का उत्तर ' दृष्टानुभूतेषु ' इस वाक्य के द्वार दिया गया है । ' दृष्टेषु ' अर्थात् प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात वस्तुओं की, ' श्रुतेषु ' अर्थात् शब्द प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की ' अनुभूतेषु ' अर्थात् अनुमान प्रमाण के द्वारा ज्ञात विषयों की स्मृति उत्पन्न होती है, ' शेषानुव्यवसायेच्छा-स्मरणद्वेषहेतु: ' इस वाक्य के द्वारा स्मृति से होनेवाले कार्य दिखलाये गये हैं । प्रकृत ' शेष ' शब्द ' शिष्यते परिशिष्यते इति शेष: ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है । एवं प्रकृत ' अनुव्यवसाय ' शब्द ' अनु पश्चात् व्यवसितिरनुव्यवसाय: ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । एवं शेषानुव्यवसाय ' शब्द ' शेषश्चानुव्यवसायश्च ' इस ( कर्मधारय ) समास से बना है । फलतः प्रकृत में ' शेष ' और ' अनुव्यवसाय ' ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के बोधक 1 वह अर्थ है ) अनुमेय का ज्ञान ( अनुमिति ), क्योंकि ( अनुमिति के लिए प्रथम लिङ्ग-दर्शन से जो ज्ञानों की परम्परा है उसमें ) उक्त प्रथम लिङ्ग की अपेक्षा अनुमेयज्ञान अर्थात् साध्य का ज्ञान ही ' शेष ' है अर्थात् अन्तिम हैं, एवं वह ' अनुव्यवसाय ' भी है, क्योंकि लिङ्गज्ञान रूप व्यवसाय के बाद उत्पन्न होता है । इस प्रकार अनुमिति भी स्मृति का कार्य हैं, क्योंकि उक्त शेषानुव्यवसाय की से होती है । किसी भी वस्तु में ' इससे सुख होगा ' इस रहने पर उस विषय की इच्छा उत्पन्न होती है, अतः शेषानुव्यवसाय भी अर्थात् उत्पत्ति व्याप्ति की स्मृति प्रकार की स्मृति के स्मृति इच्छा का भी कारण For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६२७ आम्नाय विधातृणामृषीणामतीतानागतवर्तमानेष्वतीन्द्रियेष्वर्थेषु वेदों की रचना करनेवाले महर्षियों को उनके विशेष प्रकार के पुण्य से आगमग्रन्थों में कहे हुए या उनमें न कहे हुए भूत, भविष्य न्यायकन्दली पदस्मृतिद्वितीयपदानुस्मरणहेतुः । दुःखसाधकस्मरणं द्वेषहेतुः । तदित्येव स्मृतेरा-कारः, तत्र चार्थस्यातीतत्वं पूर्वानुभूतत्वं प्रतीयत इत्यतीतविषया स्मृतिः । अत एव न प्रमाणम्, तस्याः पूर्वानुभवविषयत्वोपदर्शनेनार्थं निश्चिन्वत्या अर्थ परिच्छेदे पूर्वानुभवपारतन्त्र्यात् । अनुमानज्ञानं तत्पत्तौ परापेक्षम्, स्वविषये स्वतन्त्रमेव, स्मृतिरिव । तस्मात् पूर्वानुभवानुसन्धानेनार्थप्रतीत्यभावात् । यथाहु-स्तन्त्रटीकायां सर्वोत्तरबुद्धयो गुरव: --पूर्वविज्ञानविषयं विज्ञानं स्मृतिरिष्यते । पूर्वज्ञानाद् विना तस्याः प्रामाण्यं नावगम्यते ॥ इति । यथा चेदमाहुः कारिकायाम्-तत्र यत् पूर्व विज्ञानं तस्य प्रामाण्यमिष्यते । तदुपस्थानमात्रेण स्मृतेश्च चरितार्थता ॥ इति । है । एक वाक्य में प्रयुक्त एक पद की स्मृति से उसी वाक्य में प्रयुक्त दूसरे पद की ' पश्चात् स्मृति ' की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार स्मृति अनुस्मरण ' का भी कारण है । दुःख देनेवाली किसी वस्तु का स्मरण उस वस्तु में ' द्वेष ' का भी कारण है । ' वह था ' स्मृति का यही आकार होता है । इस आकार से स्मृति के विषय का अतीत होना और पहिले से अनुभूत होना लक्षित होता है, अतः भाष्यकार ने स्मृति को ' अतीत-विषया ' कहा है । यही कारण है कि स्मृति को प्रमाण नहीं माना जाता, क्योंकि वह पूर्व में अनुभूत विषय को हो पुनः निश्चित करती है, अतः स्मृति अपने विषय को निश्चित करने में अपने कारण पूर्वानुभव के अधीन है । यद्यपि अनुमिति भी अपनी उत्पत्ति के लिए परामर्शादि दूसरे ज्ञानों के अधीन है । किन्तु साध्य रूप अपने असाधारण विषय के ज्ञापन में उसे किसी दूसरे की अपेक्षा नहीं है ( अतः अनुमान उत्पत्ति में परापेक्ष होने पर भी ज्ञप्ति में परापेक्ष नहीं है, अतः वह प्रमाण है ) क्योंकि अनुमिति से साध्य की प्रतीति में स्मृति की तरह किसी ( स्वविषयविषयक ) पूर्वानुभव की अपेक्षा नहीं है । जैसा कि तन्त्रटीका में लोकोत्तरबुद्धिमान् गुरु ने कहा है कि-' जिस विज्ञान में पूर्वानुभव का विषय ही विषय हो उसी विज्ञान को ' स्मृति ' कहते हैं, उस पहिले ज्ञान के प्रामाण्य के बिना स्मृति प्रमाण नहीं होती । उन्होंने ही ( लोकवार्तिक में इस प्रसङ्ग में ) कहा है कि ' कारणीभूत पूर्वानुभव में जो प्रामाण्य है, उसी का व्यवहार स्मृति से होता है, स्मृति का इतना ही काम है कि अपने कारणीभूत पूर्व विज्ञान के विषय को उपस्थित कर दे । For Private And Personal

पृष्ठ 703

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे आषंज्ञान-प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मादिषु ग्रन्योपनिबद्धेष्वनुपनिबद्धेषु चात्ममनसोः संयोगाद् धर्मविशेषाच्च यत् प्रातिभं यथार्थनिवेदनं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्ष -मित्याचक्षते । तत् तु प्रस्तारेण देवर्षीणाम्, कदाचिदेव लौकिकानाम्, यथा कन्यका ब्रवीति ' श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयति ' इति । और वर्तमान ( तीनों कालों में से किसी में भी रहनेवाले ) अतीन्द्रिय धर्मादिविषयक एवं उनके स्वरूप के परिचायक जो ' प्रातिभ ' ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' आर्ष ' कहते हैं । यह प्रायः देवताओं और महर्षियों को ही होता है । कदाचित् ही साधारण जन को यह ज्ञान होता है । जैसे कि बालिका कहती है कि, मेरा मन कहता है कि ' कल मेरे भाई आयेंगे । न्यायकन्दली ये त्वनर्थजत्वात् स्मृतेरप्रामाण्यमाहुः तेषामतीतानागतविषयस्यानुमान-स्याप्रामाण्यं स्यादिति दूषणम् । आर्ष व्याचष्टे -- आम्नायविधातृणामिति । आम्नायो वेदस्तस्य विधा-तारः कर्तारो ये ऋषयस्तेषामतीतेष्वनागतेषु वर्तमानेष्वतीन्द्रियेषु धर्माध-दिक्कालप्रभृतिषु ग्रन्थोपनिबद्धेष्वागमप्रतिपादितेष्वनुपनिबद्धेष्वागमाप्रतिपा-दितेषु चात्ममनसोः संयोगाद् यत् प्रातिभं ज्ञानं यथार्थनिवेदनं यथास्वरूपसंवेदनं संशयविपर्ययरहितं ज्ञानमुत्पद्यते तदार्षमित्याचक्षते विद्वांसः । इन्द्रियलिङ्गाद्य-भावे यदर्थप्रतिभानं सा प्रतिभा, प्रतिभैव प्रातिभमित्युच्यते तत्र भवद्भिः । जो सम्प्रदाय स्मृति को इस हेतु से अप्रमाण मानते हैं कि वह अर्थ जनित नहीं है ( अर्थात् उसके अव्यवहित पूर्वक्षण में विषय की सत्ता नहीं रहती है, अतः वह प्रमाण नहीं है ) उनके मत में भूत और भविष्य विषयक अनुमान में अप्रामाण्य रूप दोष होगा । ' आम्नायविधातॄणाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' आ ' विद्या की व्याख्या करते हैं! वेदों को ' आम्नाय ' कहते हैं । उसके जो ' विघ । तागण ' अर्थात् रचना करनेवाले ऋषि लोग, उन्हें अतीत, अनागत और वर्त्तमान काल के ' अतीन्द्रिय ' वस्तुओं का अर्थात् धर्म, अधर्म एवं दिशा और काल प्रभृति पदार्थों का, एवं ' ग्रन्थोपनिबद्ध ' अर्थात् आगमों के द्वारा कथित, एवं ' ग्रन्थानुपनिवद्ध ' अर्थात् आगम के द्वारा अप्रतिपादित अर्थों का जो आत्मा और मन के संयोग से ' प्रातिभ ' ' यथार्थनिवेदन ' रूप अर्थात् संशय और विपर्यय से भिन्न विषयानुरूप ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे विद्वान् लोग ' आर्ष ' कहते हैं । इन्द्रिय एवं हेतु प्रभृति यथार्थज्ञान के साधनों के न रहते हुए भी जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ' प्रतिभा ' कहते हैं । इस ' प्रतिभा ' को ही आदरणीय विद्वद्गण ' प्रातिभ ' For Private And Personal

पृष्ठ 704

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६२ ९ सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम्, कस्मात् १ पादलेपखङ्गगुलिकादिसिद्धानां प्रयत्नपूर्वकमञ्जन-सूक्ष्मव्यवहितविप्र-कृष्टेष्वर्थेषु यद् दर्शनं तत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्षभौमानां प्राणिनां ( सिद्धजनों के अस्मदादि से विलक्षण ज्ञान रूप ) ' सिद्धदर्शन ' नाम का कोई ( प्रत्यक्ष और अनुमिति से ) भिन्न ज्ञान नहीं है, क्योंकि यत्नपूर्वक ( विशेष प्रकार के ) स्नान, पैर में विशेष प्रकार के लेप, खड्ग गुलिका ( आदि पद से मण्डूकवशाञ्जन ) से ( विशेषदर्शन का सामर्थ्य रूप ) सिद्धि से युक्त पुरुषों को सूक्ष्म, व्यवहित एवं अत्यन्त दूर की वस्तुओं का जो ( अस्मदादिविलक्षण ) ज्ञान उत्पन्न होता है वह प्रत्यक्ष ही है । दिव्यलोक, न्यायकन्दली तस्योत्पत्तिरनुपपन्ना कारणाभावादित्यतु ( प ) योगे सति इदमुक्तम् - धर्मविशेषा-दिति । विशिष्यते इति विशेषः, धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः, विद्यातपः समाधिजः प्रकृष्टो धर्मस्तस्मात् प्रतिभोदयः । तत्तु प्रस्तारेण बाहुल्येन देवर्षीणां भवति, कदाचिदेव लौकिकानामपि । यथा कन्यका ब्रवीति — श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयतीति । न चेदं संशयः, उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । न च विपर्यय:, संवादादतः प्रमाणमेव । सिद्धदर्शनमपि विद्यान्तरमिति केचिदिच्छन्ति तन्निवृत्त्यर्थमाह - सिद्ध-दर्शनं न ज्ञानान्तरम् । एतदेवोपपादयति — कस्मादित्यादिना । प्रयत्नपूर्व-कहते हैं । इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप कर सकता है कि ( यदि इन्द्रिय या लिङ्ग उसका कारण नहीं है तो फिर ) कारण के न रहने से उसकी आपत्ति ही सम्भव नहीं है? इसी आक्षेप का समाधान ' धर्मविशेषात् ' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । ' विशिष्यते इति विशेषः, धर्म एव विशेषः धर्मविशेष: ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विद्या, तपस्या और समाधि से उत्पन्न प्रकृष्टधर्म ही उक्त ' धर्मविशेष ' शब्द का अर्थ है | इस प्रकृष्टधर्म से ही प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । तत्तु प्रस्तारेण ' अर्थात् यह प्रातिभ ज्ञान ' प्रस्तार ' से अर्थात् अधिकतर देवषियों को ही होता है । लौकिकव्यक्तियों ( साधारण मनुष्यों ) को कदाचित् ही होता है । जैसे कि कभी कोई बालिका कहती है कि ' मेरा मन कहता है, कल मेरे भैया आयेंगे ' यह ज्ञान संशय रूप नहीं है, क्योंकि इसमें उभय-कोटि का सम्बन्ध नहीं है । यह विपर्यय भी नहीं है, क्योंकि इस ज्ञान के अनुसार काम देखा जाता है । किसी सम्प्रदाय के लोग ' सिद्धदर्शन ' नाम का एक अलग प्रमाज्ञान मानते हैं, उन लोगों के मत का खण्डन ही ' सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम् ' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । ' कस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । ' प्रयत्न-For Private And Personal

पृष्ठ 705

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३० न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे सिद्धदर्शन-ग्रहनक्षत्र सञ्चारादिनिमित्तं प्रशस्तपादभाष्यम् धर्माधर्मविपाकदर्शनमिष्टम्, तदप्यनु-मानमेव । अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तदपि प्रत्यक्षा-योरन्तरस्मिन्नन्तर्भूतमित्येवं बुद्धिरिति । अनुग्रहलक्षणं सुखम् । गाद्यभिप्रेतविषय सान्निध्ये सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धमांद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद अन्तरिक्षलोक तथा भूलोक में रहनेवाले प्राणियों को ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष प्रकार की गति देखकर जो धर्म, अधर्म और उनके परिणामों का ( अस्मदादि से विलक्षण ) ज्ञान होता है, उसे भी यदि सिद्धदर्शन कहना इष्ट हो तो वह भी वस्तुतः अनुमान ही है । यदि हेतु की अपेक्षा के बिना ही धर्म ( अधर्म एवं इनके परिणामों ) का ज्ञान मानें ( तो वे यह अनुमान नहीं होंगे ) फिर भी प्रत्यक्ष या आर्षज्ञान में अन्तर्भूत हो जाऐंगे । इस प्रकार विद्यारूप बुद्धि ( मूलतः चार प्रकार की ही ) है । जिसका अनुभव अनुकूल जान पड़े वही ' सुख ' है ( विशदार्थ यह है कि ) माला प्रभृति अभिप्रेत विषयों का सान्निध्य होने पर ( मालादि उन ) न्यायकन्दली कमञ्जनपादलेपादिसिद्धानां दृश्यानां दर्शनयोग्यानां स्वरूपवतां पदार्थानां द्रष्टारो ये ते ' सिद्धाः ' उच्यन्ते । तेषां दृश्यद्रष्टृ णामञ्जनादिसिद्धानां सूक्ष्मेषु व्यवहितेषु विप्रकृष्टेषु यद् दर्शनमिन्द्रियाधीनानुभवस्तंत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्ष भौमानां प्राणिनां ग्रहनक्षत्र सञ्चारनिमित्तं धर्माधर्मविपाकदर्शनं सिद्धज्ञानमिष्टं तदप्यनुमानमेव, ग्रहसश्वारादीनां लिङ्गत्वात् । अथ लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तत् प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम् । यदि धर्मादिदर्श. पूर्वक्रमञ्जनपादलेपादिसिद्धानाम् ' इत्यादि सन्दर्भ में प्रयुक्त ' दृश्यद्रष्टृणाम् ' इस पद की यह व्युत्पति है कि ' दृश्यानाम् ये द्रष्टारः तेषां दृश्यद्रष्टृणाम् । इस व्यत्पत्ति के अनुसार देखने योग्य ( घटादि स्थूल ) वस्तुओं के देखनेवाले पुरुष ही उक्त ' दृश्यद्रष्टृ ' शब्द से अभिप्रेत हैं । वे ही जब प्रयत्नपूर्वक ( मण्डूकवशाञ्जन, पादलेपादि के द्वारा ) विशेष सामर्थ्य रूप ' सिद्धि ' को प्राप्त करते हैं, तो वे ' सिद्ध ' कहलाते हैं । उन्हें भी जो अत्यन्त सूक्ष्म, या दीवाल प्रभृति से घिरे हुए या अतिदूर के वस्तुओं का इन्द्रियों से अनुभव होता है वह तो ' प्रत्यक्ष ' ही है, यदि ' सिद्धदर्शन ' शब्द से धर्म, अधमं और उनके विपाकों के वे ज्ञान ही अभीष्ट हों, जो दिव्यलोक में, अन्तरिक्षलोक में या भूमि में रहनेवाले सिद्धों को ग्रहसश्वारादि को समझकर होता है, तो फिर ये सिद्धदर्शन रूपसभी ज्ञान अनुमान ही हैं, क्योंकि इनकी उत्पत्ति ग्रहसश्वारादि लिङ्गों से For Private And Personal

पृष्ठ 706

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३१ नुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकमुपद्यते तत् विषयेषु स्मृतिजम् । अनागतेषु ङ्कल्पजम् । सुखम् । अतीतेषु यत्तु विदुषामसत्सु ssc विषयों का ज्ञान, उन विषयों के साथ ( त्वक् घ्राणादि ) इन्द्रियों के संनिकर्ष, एवं धर्म से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग इन सबों से धर्म की उत्पत्ति होती है । यह ( सुख स्वविषयक ज्ञान रूप ) अनुग्रह, अनुराग एवं नयन ( मुख ) प्रभृति की विमलता इन सबों का कारण है 1 हुए विषयों का सुख उन विषयों की स्मृति से उत्पन्न होता है, एवं होनेवाले न्यायकन्दली नमिन्द्रियजं तदा प्रत्यक्षम् । अथेन्द्रियानपेक्षं तदार्षमित्यर्थः । उपसंहरति — एवं बुद्ध । एवमनन्तरोक्तेन क्रमेण । बुद्धिरिति बुद्धिर्व्याख्यातेत्यर्थः । इतिशब्दः परिसमाप्ति सूचयति । बुद्धिकार्यत्वात् सुखं बुद्धयनन्तरं व्याचष्टे - - अनुग्रहलक्षणं सुखमिति ॥ सुखं अनुगृह्यतेऽनेनेत्यनुग्रहः, अनुग्रहलक्षणमनुग्रहस्वभावमित्यर्थः ह्यनुकूल. स्वभावतया स्वविषयमनुभवं कुर्वन् पुरुषान्तरमनुगृह्णाति । एतदेव व्याचष्टे-गादीति । त्रचन्दनवनितादयो येऽभिप्रेता विषयास्तेषां सान्निध्ये सति होती है । ( अतः धर्मादि के उक्त ज्ञान अनुमान में अन्तर्भूत हो जाते हैं ) । अर्थ-लिङ्गानपेक्षं धर्मादिषु दर्शनमिष्टं तत्प्रत्यक्षार्षयोरन्यतरस्मिन्नन्तर्भूतम् ' अर्थात् यदि धर्मा-धर्मादि के उक्त ज्ञान इन्द्रियों से होते हैं, तो वे प्रत्यक्ष ही हैं । यदि उन ज्ञानों को इन्द्रियों की अपेक्षा नहीं है, तो फिर वे ' आषंज्ञान ' ही हैं । एवं बुद्धि: ' इस वाक्य के द्वारा बुद्धि निरूपण का उपसंहार करते हैं । ' एवम् ' अर्थात् कथित क्रम से ' बुद्धि: ' अर्थात् बुद्धि की व्याख्या की गयी है । उक्त वाक्य का ' इति ' शब्द प्रकरण समाप्ति का सूचक है । सुख यतः बुद्धि से उत्पन्न होता है, अतः बुद्धि निरूपण के वाद ' अनुग्रहलक्षणं सुखम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सुख का निरूपण करते हैं । ( प्रकृत ) सन्दर्भ का ' अनुग्रह ' पद ' अनुगृह्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति से निधन्न हैं । तदनुसार ' अनुग्रहलक्षण ' शब्द का अर्थ है ' अनुग्रहस्वभाव ' । सुख स्वभावतः ( जीव को प्रिय होने के कारण उसके ) अनुकूल है । अत: सुख अपने अनुभव के द्वारा पुरुष को अनुगृहीत करता है । ' गादि ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा इसी की व्याख्या करते हैं । माला, चन्दन, स्त्री प्रभृति जितने भी प्रिय विषय हैं, उनका सान्निध्य रहने पर अर्थात् उनका सम्बन्ध रहने पर, अभिप्रेत विषय की उपलब्धि एवं इन्द्रियों का उन अर्थों के साथ सम्बन्ध प्रभृति कारणों के द्वारा धर्म के साहाय्य से जिसकी उत्पत्ति होती है वही ' सुख ' हैं । विषय अभिप्रेत भी हो उसका सान्निध्य भी हो किन्तु भोक्ता का चित्त यदि दूसरे विषय For Private And Personal

पृष्ठ 707

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् " [ गुणनिरूपणे सुख-विषयानुस्मरणेच्छासङ्कल्पेष्वानिर्भवति तद् विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष-निमित्तमिति ॥ विषयों से यह उन विषयों के संकल्प से उत्पन्न होता है । आत्मतत्त्व-ज्ञानियों को जो सुख बिना विषयों के, विषयों के स्मरण के न रहने पर भी बिना इच्छा और बिना संकल्प के ही उत्पन्न होता है, उस पुरुष का आत्मतत्त्वज्ञान, शम, सन्तोष एवं विशेष प्रकार के धर्म उस सुख के कारण हैं । न्यायकन्दली सन्निकर्षे सतीष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् धर्माद्यपेक्षादि यदुत्पद्यते तत् सुखम् । सन्निहितेऽप्यभिमतेऽर्थे विषयान्तरव्यासक्तस्य सुखानुत्पादादिष्टोपलब्धेः कार-णत्वं गम्यते । वियुक्तस्य सुखाभावाद् विषयसन्निकर्षस्यापि कारणत्वावगमः । धर्मादीत्यादिपदेन स्वस्थतादिपरिग्रहः । अनुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकमिति कार्योपवर्णनम् । अनुग्रहः सुखविषयं संवेदनम् । अभिष्वङ्गोऽनुरागः, नयनादि -प्रसादो वैमल्यम् | आदिशब्दान्मुख प्रसादस्य ग्रहणम् । एतेषां सुखं जनकम् । सुखेनोत्पन्नेन स्वानुभवो जन्यते स एवात्मनोऽनुग्रहः, सुखे चोपजाते मुखादीनां प्रसन्नता स्यात् । सुखसाधनेष्वनुरागः सुखाद् भवति । अतीतेषु स्मृतिजम् अती-तेषु सुखसाधनेष्वनुभूतेषु सुखं पूर्वानुस्मरणाद् भवति । अनागतेष्विदं मे भविष्य-में लगा रहे तो उसे विषय से उत्पन्न होनेवाला सुख नहींमिलता, अतः सुख के प्रति इष्ट विषय की उपलब्धि को भी कारण माना गया है । और सभी कारणों के रहने पर भी यदि स्रगादि विषयों के साथ पुरुष का सम्बन्ध नहीं है, तो फिर विषय से वियुक्त उस पुरुष को सुख नहीं मिलता, अतः सुख के प्रति भोक्ता और विषय के संनिकर्ष को भी कारण मानना पड़ेगा । कथित ' धर्मादि ' पद में प्रयुक्त आदि ' पद से स्वास्थ्य प्रभृति सहायकों को समझना चाहिए । ' अनुग्रहाभिष्वङ्गनयनादिप्रसादजनकम् ' इस वाक्य के द्वारा सुख से होनेवाले कार्यों का वर्णन किया गया है । सुख का प्रत्यक्ष ही प्रकृत ' अनुग्रह ' शब्द का अर्थ है । भभिष्वङ्ग ' शब्द से अनुराग अभिप्रेत है । ' नयनादिप्रसाद ' शब्द से आँखो की स्वच्छता को समझना चाहिए । ' नयनादिप्रसाद ' शब्द में प्रयुक्त ' आदि ' शब्द से मुँह की प्रसन्नता प्रभृति को समझना चाहिए । इन सबों का कारण सुख है । सुख उत्पन्न होकर अपने आश्रयीभूत आत्मा में जो अपने अनुभव का उत्पादन करता है, वही आत्मा के साथ सुख का अनुग्रह है । सुख के उत्पन्न होने पर मुख पर प्रसन्नता छा जाती है । सुख के कारणों में जो अनुराग उत्पन्न होता है, उसका कारण भी सुख हो है । ' अतीतेषु स्मृतिजम् ' अर्थात् पूर्व में For Private And Personal

पृष्ठ 708

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] उपघातलक्षणं 10 www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६३३ प्रशस्तपादभाष्यम् विषाद्यनभिप्रेतविषय सान्निध्ये दुःखम् । न्यायकन्दली For Private And Personal सत्यनिष्टोपलब्धीन्द्रियार्थसन्निकर्षादधर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद् यदमर्षोपघातदैन्यनिमित्तमुत्पद्यते तद् दुःखम् । अतीतेषु सर्पव्याघ्र-चौरादिषु स्मृतिजम् । अनागतेषु सङ्कल्पजमिति । उपघातस्वभाव अर्थात् प्रतिकूलवेदनीय ही दुःख है । वह विष प्रभृति अनभिप्रेत विषयों के सामीप्य, उनके साथ इन्द्रियों का संयोग, एवं अधर्म सहकृत आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । वह असहिष्णुता, दुःख का अनुभव एवं दीनता का कारण है । अतीत सर्प, व्याघ्र एवं चोर इत्यादि से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उनकी स्मृतियाँ हैं । एवं भविष्य में आनेवाले विषयों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उन ( अनभिप्रेत ) विषयों का सङ्कल्प है । तीति सङ्कल्पाज्जायते । यत्तु विदुषामात्मज्ञानवतामसत्सु विषयानुस्मरणसङ्कल्पे-व्वसति विषयेऽसति चानुस्मरणे असति च सङ्कल्पे चाविर्भवति तद् विद्याशम-सन्तोषधर्म विशेषनिमित्तमिति । विद्या आत्मज्ञानम्, शमो जितेन्द्रियत्वम्, सन्तोषो देहस्थितिहेतुमात्रातिरिक्तानभिकाङ्क्षित्वम्, धर्मविशेषः प्रकृष्टो धर्मो निवर्तक-लक्षणः, एतच्चतुष्टयनिमित्तम् । ये तु दुःखाभावमेव सुखमाहुस्तेषामानन्दात्मनानुभवविरोधः, हितमा. स्यामि, अहितं हास्यामीति प्रवृत्तिद्वैविध्यानुपपत्तिश्च । सुखप्रत्यनीकतया तदनन्तरं दुःखं व्याचष्टे - उपघातलक्षणं दुःखम् । अनुभूत के अतीतसाधनों में सुख की स्मृति से अनुराग उत्पन्न होता है । ' यह मुझे मिलेगा ' इस आकार के संकल्प से सुख के भविष्यसाधनों में अनुराग उत्पन्न होता है । ' विदुषाम् ' अर्थात् आत्मज्ञानी विद्वानों में ' असद्विषयानुस्मरण संकल्पेषु ' अर्थात् विषयों के न रहने पर, अनुस्मरण के न रहने पर, एव संकल्प के न रहने पर भी जो दिव्य सुख का आविर्भाव होता है वह ' विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष निमित्तम् ' अर्थात् विद्या, शम, सन्तोष, और प्रकृष्ट धर्म ये सब उसके कारण हैं । ' विद्या ' है तत्त्वज्ञान, शम ' है इन्द्रियों का जय करना, जितने धन से शरीरयात्रा चले उससे अधिक धन की आकाङ्क्षा न करना ही ' सन्तोष है । ' धर्मविशेष ' शब्द से निवृत्ति रूप प्रकृष्टधर्म अभीष्ट है । इन चारों कारणों से आत्मज्ञानियों में उक्त सुख की उत्पत्ति होती है । जो सम्प्रदाय दुःखाभाव को ही सुख मानते हैं उनके मत में इन दोषों को आपत्ति होगी । एक तो आनन्द का सभी जनों को जो अनुभव होता है, वह विरुद्ध होगा । एवं ' मैं हित को प्राप्त करूँ एवं ' अहित को छोड़ " ये दो प्रकार की जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, वे अनुपपन्न हो जाएंगी । दुःख सुख का विरोधी है, अतः सुख के निरूपण के बाद ' उपघातलक्षणं दुःखम् '

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 709 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् स्वार्थ परार्थं प्रशस्तपादभाष्यम् वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा । सा [ गुणनिरूपणे इच्छा-चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः । अपने लिए या दूसरों के लिए अप्राप्तवस्तु की प्रार्थना ही ' इच्छा ' है | यह ( इच्छा ) सुख अथवा स्मृति से साहाय्यप्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है । वह प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्म का कारण है न्यायकन्दली उपहन्यतेऽनेनेत्युपधातः, उपघातलक्षणम् उपधातस्वभावम् । दुःखमुपजातं प्रति-कूलस्वभावतया स्वात्मविषयमनुभवं कुर्वदात्मानमुपहन्ति । एतद् विवृणोति--अनिष्टोपलब्धीत्यादिना । अमर्षोऽसहिष्णुता द्वेष इति यावत् । उपघातो दुःखानुभवः, दैन्यं विच्छायता, तेषां निमित्तम् । दुःखे सति तदनुभवलक्षण आत्मोपघातः स्यात् । अतीतेषु सर्पादिषु स्मृतिजम्, अनागतेषु सङ्कल्पजमिति पूर्ववद् व्याख्यानम् । स्वार्थं परार्थं वा s प्राप्तप्रार्थनेच्छा । अप्राप्तस्य वस्तुनः स्वार्थ प्रति या प्रार्थना इदं मे भूयादिति परार्थं वा प्रार्थना अस्येदं भवत्विति सेच्छा । सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अनागते इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दुःख की व्याख्या करते हैं । प्रकृत में ' उपघात ' शब्द ' उपहन्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के द्वारा सिद्ध है । ' उपघातलक्षण ' अर्थात् दुःख उपघातस्वभाव का है । दुःख की उत्पत्ति ही अपने आश्रयीभूत आत्मा की इच्छा के प्रतिकूल होती है, अतः वह अपनी उत्पत्ति के द्वारा आत्मा का ' उपहनन ' करती है । ' अनिष्टोपलब्धि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसी का विवरण देते हैं । ' अमर्ष ' शब्द का अर्थ है असहिष्णुता, फलतः द्वेष । ' उपघात ' शब्द का अर्थ है दुःख का अनुभव | दैन्य शब्द का अर्थ है दीनता । दुःख इन सबों का कारण है । दुःख के रहने पर आत्मा का दुःखानुभव रूप उपघात होता है । अतीत साँप प्रभृति वस्तुओं से उनकी स्मृति के द्वारा दुःख उत्पन्न होता है । अनागत अनिष्ट वस्तुओं के संकल्प से दुःख उत्पन्न होता है । इस प्रकार सुख प्रकरण में कथित रीति से यहाँ भी व्याख्या करनी चाहिए । ' स्वार्थं परार्थं वाऽप्राप्तप्रार्थनेच्छा ' अर्थात् अपने लिए या दूसरों के लिए किसी अप्राप्त वस्तु की जो ' प्रार्थना ' अर्थात् यह मुझे मिळे ' या ' यह इस व्यक्ति को मिले ' इस प्रकार की जो प्रार्थना वही ' इच्छा ' है । ' सा चात्ममनसोः संयोगात् सुखाद्यपेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वोत्पद्यते ' सुख के साघनीभूत भविष्य वस्तु की इच्छा होती है, अतः उस विषय से होनेवाला सुख For Private And Personal

पृष्ठ 710

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 710 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितत् प्रशस्तपादभाष्यम् ६३५ कामोऽभिलाषः, रागः सङ्कल्पः, कारुण्यम्, वैराग्यमुपधा भावः इत्येवमादय इच्छाभेदाः । मैथुनेच्छा कामः । अभ्यवहारेच्छा-मिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः । अनासन्नक्रियेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्षा परदुःख प्रहाणेच्छा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद् काम, अभिलाषा, राग, संकल्प, वैराग्य, उपधा एवं भाव प्रभृति इच्छा केही भेद हैं । ( जैसे कि ) मैथुन की इच्छा ही ' काम ' है । भोजन करने की इच्छा ही ' अभिलाषा है । बार बार विषयों को भोगने की इच्छा ही ' राग ' है । शीघ्र किसी काम को करने की इच्छा ही ' संकल्प ' है । अपने कुछ स्वार्थ के बिना दूसरों के दुःख को छुड़ाने की इच्छा ही ' कारुण्य ' है । दोष के ज्ञान से विषय को छोड़ने की इच्छा ही ' वैराग्य ' है । दूसरे न्यायकन्दली सुखसाधने वस्तुनीच्छा उपजायते, तदुत्पत्तौ च तद्विषयसाध्यं सुखमनागतमपि बुद्धिसिद्धत्वान्निमित्तकारणम् । यदाह न्यायवात्तिककारः -- " फलस्य प्रयो-जकत्वात् ” इति । अतिक्रान्ते सुखहेताविच्छोत्पत्तेः स्मृतिः कारणम् । प्रयत्नस्मृति-धर्माधर्महेतुः । उपादानेच्छातस्तदनुगुणः प्रयत्नो भवति, स्मरणेच्छातः स्मर-णम्, विहितेषु ज्योतिष्टोमादिषु फलेच्छया प्रवृत्तस्य धर्मो जायते । प्रतिषिद्धेषु रागात् प्रवृत्तस्याधमः । कामादयोऽपि सन्ति ते कस्मान्नोक्ताः? अत आह--इत्यादि । कामादय इच्छाप्रभेदाः, न तत्त्वान्तरमिति यदुक्तं तदेव दर्शयति-भी अनात ही रहता है ( वर्तमान नहीं ) फिर भी वह भविष्य सुख भी बुद्धि के द्वारा सिद्ध होने के कारण इच्छा का निमित्तकारण होता है । जैसा कि न्यायवार्तिककार ने ' फलस्य प्रयोजकत्वात् ' इत्यादि ग्रन्थ से कहा है कि सुख के कारणीभूत विषयों के नष्ट हो जाने पर भी जो उन विषयों की इच्छा होती है, उस इच्छा के प्रति उन विषयों की स्मृति कारण है । ' प्रयत्नस्मृतिधर्माधर्महेतुः ' विषयीभूत वस्तु की इच्छा से उसे प्राप्त करने या त्याग करने के उपयुक्त प्रयत्न की उत्पति होती है ( इस प्रकार इच्छा प्रयत्न का भी कारण है ) । स्मरण की इच्छा से भी स्मृति होती है । स्वर्गादि के लिए वेदों से निर्दिष्ट ज्योतिष्टोमादि यागों में स्वर्गादि फलों की इच्छा से जो प्रवृत्ति होती हैं, उस इच्छा से धर्म होता है हिंसादि में किसी की प्रवृत्ति होती है, उससे अधर्म को के प्रति उक्त राग रूप इच्छा कारण है । इस प्रकार । एवं राग से जो प्रतिषिद्ध उत्पत्ति होती है, उस अधर्म इच्छा प्रयत्नादि का हेतु है ) । काम प्रभृति गुण भी तो है, वे क्यों नहीं कहे गए? ' काम: ' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । यह जो कहा है कि" कामादि इच्छा के ही इसी प्रश्न का उत्तर For Private And Personal