प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 711–720
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 711–720
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३६ न्याय कन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे इच्छा-प्रशस्तपादभाष्यम् विषयत्यागेच्छा वैराग्यम् । परवश्चनेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढेच्छा भावः । चिकीर्षाजिहीर्षेत्यादिक्रियाभेदादिच्छा भेदा भवन्ति । को ठगने की इच्छा ही ' उपधा ' है । भीतर छिपी हुई इच्छा ही ' भाव ' है । ( इसी प्रकार ) चिकीर्षा ( कुछ करने की इच्छा ) जिहीर्षा ( छोड़ने की इच्छा ) इत्यादि भी ( अपने अन्तर्गत ) क्रियाओं के भेद के रहने पर भी ( वस्तुतः ) इच्छा के ही प्रभेद हैं । न्यायकन्दली मैथुनेच्छा काम इति । निरुपपदः कामशब्दो मैथुनेच्छायामेव प्रवर्तते, अन्यत्र तस्य पदान्तरसमभिव्याहारात् प्रवृत्तिः, यथा स्वर्गकामो यजेत इति । अभ्यवहारेच्छा अभिलाषः । अभ्यवहारो भोजनम्, तत्रेच्छा अभिलाषः । पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः । पुनविषयाणां भोगेच्छा राग इत्यर्थः । अनासन्न-क्रियेच्छा सङ्कल्पः । अनागतस्यार्थस्य करणेच्छा सङ्कल्पः । स्वार्थमनपेक्ष्य परदुःख-प्रहाणेच्छा कारुण्यम् । स्वार्थप्रयोजनं किमप्यनभिसन्धाय या परदुःखप्रहाणे अपनयने इच्छा सा कारुण्यम् । दोषदर्शनाद् दुःखहेतुत्वावगमे विषयाणां परित्यागे इच्छा वैराग्यम् । परवश्वनेच्छा परप्रतारणेच्छा उपधा । अन्तर्निगूढच्छा लिङ्गराविर्भाविता येच्छा सा भावः । चिकीर्षा जिहीर्षा इत्यादिक्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति । करणेच्छा चिकीर्षा, हरणेच्छा जिहीर्षा गमनेच्छा जिगमिषेत्येवमादय इच्छाभेदाः क्रियाभेदाद् भवन्ति । प्रभेद हैं, स्वतन्त्र गुण नही " उसी का उपपादन " मैथुनेच्छा कामः " इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । बिना विशेषण का केवल ' काम ' शब्द मैथुन की इच्छा में ही प्रयुक्त होता है, दूसरी तरह की इच्छाओं में ' काम ' शब्द की प्रवृत्ति दूसरे पदों के साथ रहने से ही होती है । जैसे कि ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि । ' अभ्यवहारेच्छा अभिलाष: ' इस वाक्य के ' अभ्यवहार ' शब्द का अर्थ है भोजन, उसकी इच्छा ही ' अभिलाष ' शब्द से कही जाती है । ' पुनः पुनर्विषयानुरञ्जनेच्छा रागः ' अर्थात् विषयों को बार बार भोगने की इच्छा हो राग ' है । ' अनासन्न कियेच्छा संकल्पः ' अर्थात् भविष्य काम को करने की इच्छा ही ' संकल्प ' है | ' स्वार्थमनपेक्ष्य दुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् ' अपने किसी प्रयोजन के साधन की अभिसन्धि के बिना जो दूसरों को दुःख से छुड़ाने की इच्छा, उसे ही ' कारुण्य ' कहते हैं । दोष-दर्शनात् ' अर्थात् दुःख के कारणों को अनिष्ट समझने पर विषयों को छोड़ने की इच्छा हो ' वैराग्य ' है । ' परवश्वनेच्छा ' दूसरों को ठगने की इच्छा को हो ' उपधा ' कहते हैं । ' अन्तर्निगूढेच्छा ' ' अर्थात् लिङ्गो से हो ज्ञात होनेवाली इच्छा को ' भाव ' कहते हैं । ' चिकीर्षा ' जिहीर्षा ' इत्यादि क्रियाभेदादिच्छाभेदा भवन्ति ' काम करने को इच्छा को ही ' चिकीर्षा ' कहते हैं । किसी की वस्तु को अपहरण करने की इच्छा को ही ' जिही ' कहते हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६३७ प्रज्वलनात्मको द्वेषः । यस्मिन् सति प्रज्वलितमिवात्मानं मन्यते स द्वेषः । स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । यत्नस्मृतिधर्माधर्मस्मृतिहेतुः । क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्प इति द्वेषभेदाः || द्वेष प्रज्वलन रूप है । ( अर्थात् ) जिसके रहते हुए प्राणी अपने को जलता हुआ सा अनुभव करे वही ' द्वेष ' है । दुःख या स्मृति से सापेक्ष आत्मा और मन के संयोग से यह उत्पन्न होता है । प्रयत्न, स्मृति, धर्म और अधर्म का यह कारण है । क्रोध, द्रोह, मन्यु, अक्षमा और अमर्ष ये ( पाँच ) द्वेष के प्रभेद हैं । न्यायकन्दली प्रज्वलनात्मको द्वेषः । एतद् विवृणोति -- यस्मिन् सतीत्यादिना । तद् व्यक्तम् । स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद् वोत्पद्यते । अतीते दुःखहेतौ तज्जदुःखस्मृतिजो द्वेषः । प्रयत्नधर्माधर्म स्मृतिहेतुः । एनमहं हन्मीति प्रयत्नो द्वेषात् वेदार्थविप्लवकारिषु द्वेषाद् धर्मः, तदर्थपरिपालन परेषु द्वेषादधर्मः । स्मृतिरपि द्वेषादुपजायते, यो यं द्वेष्टि स तं सततं स्मरति । क्रोध द्रोहो मन्युरक्षमाऽमर्ष इति द्वेषभेदाः । शरीरेन्द्रियादिविकारहेतुः क्षणमात्र-भावी द्वेषः क्रोधः । अलक्षित विकार विचरानुबद्धापकारावसानो द्वेषो द्रोहः । जाने की इच्छा ही ' जिगमिषा ' है । क्रियाओं की इस विभिन्नता से ही ये इच्छायें विभिन्न होती हैं । ‘ प्रज्वलनात्मको द्वेषः ' इस लक्षणवाक्य को ही व्याख्या ' यस्मिन् सति ' इत्यादि से किया गया है । ' स चात्ममनसोः संयोगाद् दुःखापेक्षात् स्मृत्यपेक्षाद्वा उत्पद्यते ' जहाँ दुःख के कारणों का नाश हो गया रहता है ऐसे स्थलों में उन कारणों से उत्पन्न दुःख की स्मृति से हो उन कारणों में द्वेष उत्पन्न होता है । ' प्रयत्नधर्माधर्म स्मृतिहेतु: ' ' मैं इसे मारता हूँ इस प्रकार का प्रयत्न द्वेष से उत्पन्न होता है । वेदों से प्रतिपादित अर्थों को विपरीत दिशा में ले जानेवाले के ऊपर किये गये द्वेष से धर्म उत्पन्न होता है । वेदों की आज्ञा पालनेवाले के ऊपर द्वेष करने से अधर्म उत्पन्न होता है । द्वेष से स्मृति भी उत्पन्न होती है, क्योंकि जिसके ऊपर जिसे द्वेष रहता है, उसे उसका सदा स्मरण होता रहता है । " क्रोधो द्रोहो मन्युरक्षमामर्ष इति द्वेषभेदाः " एक क्षण मात्र रहनेवाले ' द्वेष ' का नाम ही ' क्रोध ' है, जिससे शरीर एवं इन्द्रियादि अपने स्वरूप से च्युत दीख पड़ते हैं । जिससे शरीरादि में विकार परिलक्षित न हो, किन्तु जिसका बहुत दिनों के बाद अपकार में पर्यवसान हो, उस द्वेष को ही ' द्रोह ' कहते हैं । ' मन्यु ' उस ' द्वेष ' For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६३८ " न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे प्रयत्न-प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविध: - जीवन-पूर्वकः, इच्छाद्वेषपूर्वकश्च । तत्र जीवनपूर्वकः सुप्तस्य प्राणापान सन्तान-प्रेरकः, प्रबोधकाले चान्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुः । अस्य जीवन-पूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः । इतरस्तु हिताहित-प्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छापेक्षाद् द्वेषापेक्षाद् वोत्पद्यते ॥ प्रयत्न, संरम्भ, उत्साह ये सभी पर्यायवाची शब्द हैं । यह ( प्रयत्न ) ( १ ) जीवनपूर्वक ( जीवनयोनि ) और ( २ ) इच्छाद्वेषपूर्वक भेद से दो प्रकार का है । प्राणियों की सुप्तावस्था में प्राणवायु अपानवायु प्रभृति ( शरीरान्तर्वर्त्ती ) वायु समूह को ( उचित रूप से ) प्रेरित करनेवाला एवं अन्तःकरण ( मन ) को दूसरी इन्द्रियों से सम्बद्ध करनेवाला प्रयत्न ही जीवन-पूर्वक प्रयत्न है । धर्म और अधर्म से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग से इस ( जीवनपूर्वक प्रयत्न ) की उत्पत्ति होती है । दूसरा ( इच्छा द्वेषमूलक ) प्रयत्न हितों की प्राप्ति एवं अहितों का परिहार इन दोनों की उपयुक्त क्रिया एवं शरीर की स्थिति इन दोनों का कारण है । यह ( इच्छाद्वेषमूलकप्रयत्न ) इच्छा या द्वेष से साहाय्य प्राप्त आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । न्यायकन्दली अपकृतस्य प्रत्यपकारासमर्थस्यान्तनिगूढो द्वेषो मन्युः । परगुणद्वेषोऽक्षमा । स्वगुणपरिभवसमुत्थो द्वेषोऽमर्षः । प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः । स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि । सदेहस्यात्मनो विपच्यमानकर्माशयसहितस्य मनसा सह संयोगः सम्बन्धो जीवनम्, तत्पूर्वक: प्रयत्नः कामर्थक्रियां करोति? इत्यत आह -- तत्र का नाम है, जो प्रतीकार करने से असमर्थ व्यक्ति में अत्यन्त गूढ़ रूप से रहता है । दूसरे के गुण के प्रति द्वेष को ही ' अक्षमा ' कहते हैं | अपने गुण के पराजय से जो द्वेष उत्पन्न होता है उसे ' अमर्ष ' कहते हैं । ' प्रयत्नः संरम्भ उत्साह इति पर्यायाः, स द्विविधो जीवनपूर्वक इत्यादि ' देह्सम्बद्ध आत्मा का मन के साथ उस अवस्था का संयोग अर्थात् सम्बन्ध हो ' जीवन ' है, जिस अवस्था में वर्त्तमानकालिक विपाक से युक्त कर्माशय की सत्ता उसमें रहे । जीवनपूर्वक प्रयत्न से कौन सा विशेष कार्य होता है! इसी प्रश्न का समाधान ' तत्र जीवनपूर्वकः ' इत्यादि से किया गया है । ( जीवनपूर्वक प्रयत्न का साधक यह अनुमान है कि ) सोते For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६३६ जीवपूर्वक इति । सुप्तस्य प्राणापानक्रिया प्रयत्नकार्या क्रियात्वात् । न च तदानीमिच्छाद्वेषौ प्रयत्नहेतू सम्भवतः, तस्माज्जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापान प्रेरको गम्यते । न केवलं जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरकः, किन्तु प्रबोधकालेऽन्तःकरणस्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुश्च । विषयोपलम्भानुमि-तान्तःकरणेन्द्रिसंयोगः प्रयत्नपूर्वकान्तःकरणक्रियाजन्यः, अन्तःकरणेन्द्रियसंयोग-त्वात्, जागरान्तः करणेन्द्रियसंयोगवदिति प्रयत्नपूर्वकतासिद्धिः । अस्य जीवन-पूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः, धर्माधर्मापेक्ष आत्ममनसोः संयोगो जीवनम् तस्मादस्योत्पत्तिरित्यर्थः । इतरस्तु इच्छाद्वेषपूर्वकश्च हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यायामस्य व्यापारस्य हेतुः शरीर विधारकश्च । गुरुत्वे सत्यपततः शरीरस्येच्छापूर्वकः प्रयत्नो विधारकः । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते । हितसाधनोपादानेषु प्रयत्न इच्छापूर्वकः, दुःखसाधनपरित्यागे प्रयत्नो द्वेषपूर्वकः । हुए पुरुष की प्राणक्रिया और अपान क्रिया भी यतः क्रिया हैं, अतः वे भी प्रयत्न से ही उत्पन्न होती हैं । सोते समय की उन क्रियाओं की उत्पत्ति इच्छा और द्वेष से नहीं हो सकती, अतः यह सिद्ध होता है कि जीवनपूर्वक यत्न होउन क्रियाओं का कारण है । जीवनपूर्वक प्रयत्न से केवल उक्त प्राणापानादि को प्रेरणा देनेवाली क्रियायें ही नहीं होती हैं, किन्तु उससे सोकर उठते समय मन का और इन्द्रिय का संयोग भी उत्पन्न होता है । विषय की उपलब्धि से अन्तःकरण का अन्य इन्द्रियों के साथ संयोग का अनुमान होता है । यह जाग्नत अवस्था के अन्तःकरण एवं C अन्तःकरण एवं अन्य इन्द्रियों का अनुमित संयोग भी इन्द्रियसंयोग की तरह अन्तःकरण और इन्द्रिय का संयोग ही है । अतः इसकी उत्पत्ति भी प्रयत्न से उत्पन्न अन्तःकरण की क्रिया से ही होती है । अतः प्रबोधकालिक अन्तःकरण और इन्द्रियों के प्रबोधकालिक संयोग का भी प्रयत्न से उत्पन्न होना सिद्ध होता है । ' अस्य जीवन पूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः ' अर्थात् धर्म और अधर्म से उत्पन्न आत्मा और मन का संयोग ही जीवन है । इस जीवन से ही उक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । ' इतरस्तु ' अर्थात् ( जीवनयोनि यत्न से भिन्न ) इच्छा और द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ' हिताहित प्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च ' । शरीर में ( पतन के कारण ) गुरुत्व के रहने पर भी जो शरीर का पतन नहीं होता है उसमें इच्छा जनित प्रयत्न ही कारण है, ( इस प्रकार इच्छापूर्वक प्रयत्न विधारक है ) । ' स चात्ममनसोः संयोगादिच्छ द्वेषापेक्षादुत्पद्यते ' इनमें हित को साधन करनेवाली वस्तुओं के ग्रहण का इच्छा - जनित प्रयत्न कारण है, एवं दुःख के कारणों को हटाने में द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न कारण है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४० न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे गुरुत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् गुरुत्वं जलभूम्योः पतनकर्मकारणम् । अप्रत्यक्षं पतनकर्मानुमेयं संयोग प्रयत्न संस्कारविरोधि । अस्य चावादिपरमाणुरूपादिवन्नित्या-नित्यत्वनिष्पत्तयः | जिससे पृथिवी और जल में पतनक्रिया की उत्पत्ति हो, वही गुरुत्व है । पतन क्रिया रूप हेतु से इसका अनुमान ही होता है, इसका प्रत्यक्ष नहीं होता । यह संयोग, प्रयत्न और संस्कार का प्रतिरोधक है । जलादि के परमाणु और जलादि कार्यद्रव्य में रहनेवाले रूपादि के नित्यत्व और अनित्यत्व की तरह गुरुत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व की स्थिति समझनी चाहिए । न्यायकन्दली गुरुत्वं जलभूम्योरित्याश्रयकथनम् । पतनकर्मकारणमिति तस्य कार्यनिरूपणम् । अप्रत्यक्षमिति स्वभावोपवर्णनम्, न केनचिदिन्द्रियेण गुरुत्वं गृह्यत इत्यर्थः । ये तु त्वगिन्द्रियग्राह्यं तेषामधः स्थितस्य द्रव्यस्य गुरुत्वमाहुः, स्पर्शोपलम्भवद् गुरुत्वोपलम्भप्रसङ्गः " त्वगिन्द्रियस्यार्थोपलम्भे स्वसन्निकर्षव्यति-रेकेणान्यापेक्षा सम्भवात् । यत्तूपरिस्थितस्य गुरुत्वं प्रतीयते, तद्धस्तादीना-मधोगमनानुमानात् । अतीन्द्रियं चेत् कथमस्य प्रतीतिः? इत्यत आह - पतन-कर्मानुमेयमिति । यदवयविद्रव्यस्य पतनं तेन यदेकार्थसमवेतासमवायिकारणं तदेव ' गुरुत्वं जलभूभ्यो: ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' जलभूम्यो: ' इस पद से गुरुत्व के आश्रय दिखलाये गये हैं । पतनकर्मकारणम् ' इस वाक्य से गुरुत्व के द्वारा होनेवाले कार्यों को दिखलाया गया है । ' अप्रत्यक्षम् ' इस पद से गुरुत्व का ( अतीन्द्रियत्व रूप ) स्वभाव दिखलाया गया है । अर्थात् गुरुत्व का ग्रहण किसी भी इन्द्रिय से नहीं होता । जिस सम्प्रदाय के लोग त्वगिन्द्रिय से गुरुत्व का प्रत्यक्ष मानते हैं, उनके मत में जिस प्रकार नीचे रक्खे हुए द्रव्य के स्पर्श का प्रत्यक्ष होता है, उसी प्रकार उस द्रव्य गुरुत्व विषयक स्पार्शनप्रत्यक्ष की आपत्ति होगी । क्योंकि त्वगिन्द्रिय से प्रत्यक्ष के लिए उसका त्वगिन्द्रिय के साथ सम्बन्ध को छोड़ कर और किसी के साहाय्य की अपेक्षा मानना सम्भव नहीं है । ( तब रहा यह प्रश्न कि उसी द्रव्य को ऊपर उठाने पर गुरुत्व की उपलब्धि किस प्रमाण से होती है? इस प्रश्न का यह उत्तर है कि ) द्रव्य उठानेवाले हाथ प्रभृति द्रव्यों का ( उस अवस्था में ) नीचे की तरफ जाने से उस द्रव्य के गुरुत्व का अनुमान होता है । जिस अवयवी रूप द्रव्य का पतन होता है, उस पतन के साथ एक अर्थ ( उसी अवयवी द्रव्य ) में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले ( पतन का ) असमवायिकारण ही ' गुरुत्व ' है । किसी सम्प्रदाय के लोग अवयवी में गुरुत्व नहीं मानते For Private And Personal
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www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra भाषानुवादसहितम् प्रकरणम् ] प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४१ गुरुत्व से ही अवयवी अवयवों से ही होगा । कार्य द्रव्य में गुरुत्व का मानना रहनेवाले गुरुत्व से उससे भिन्न द्रव्यत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । त्रिद्रव्यवृत्ति । तत्तु द्विविधम् । जिस गुण से स्यन्दन ( अर्थात् फैलने की ) क्रिया उत्पन्न हो वही ' द्रवत्व ' है । यह ( १ ) सांसिद्धिक ( स्वाभाविक ) और ( २ ) नैमित्तिक हि नो गुरुत्वम् । एतेनैतत् प्रत्युक्तं यदुक्तमपरैः -- " अवयविगुरुत्व कार्य स्यावनति-विशेषस्यानुपलम्भादवयविनि गुरुत्वाभावः " इति, अवयविन: पतनाभावप्रसङ्गात् । अथावयवानां गुरुत्वादेव तस्य पतनम्? तदावयवानामपि स्वावयवगुरुत्वात् पतनमिति सर्वत्र कार्ये तदुच्छेदः । अथ व्यधिकरणेभ्यः स्वावयव गुरुत्वेभ्योऽ-वयवानां पतनासम्भवात् तेषु गुरुत्वं कल्प्यते, तदा अवयविन्यपि कल्पनीयम्, न्यायस्य समानत्वात् । यत् पुनरवयविगुरुत्वस्य न गृह्यते, कार्यातिरेको तदवयवावयविगुरुत्व भेदस्यात्पान्तरत्वात् । यथा महति द्रव्ये उन्मीयमाने तत्पतित-सूक्ष्मद्रव्यान्तरगुरुत्वकार्याग्रहणम् । है, क्योंकि अवयवों के गुरुत्व से जितनी अवनति होती है, उन अवयवों से बने अवयवी के द्वारा उससे अधिक अवनति नहीं देखी जाती है, अतः अवयवों में ही गुरुत्व है, अवयवी नहीं । गुरुत्व के उक्त लक्षण से उनके उक्त मत का भी खण्डन हो जाता है ( क्योंकि उस लक्षण में गुरुत्व ' को अवयवी में रहना मान लिया गया है ) क्योंकि अवयवी में गुरुत्व यदि न मानें तो अवयवी का पतन न हो सकेगा । यदि अवयवों के का भी पतन मानें, तो फिर उन अवयवों का पतन भी उनके उनमें भी गुरुत्व का मानना व्यर्थ होगा । फलतः किसी भी सम्भव न होगा । यदि यह कहें कि एक अधिकरण में द्रव्य में पतन का होना सम्भव नहीं है, अतः अवयवों में गुरुत्व मानते हैं ( क्योंकि अवयवों से उसके अवयव भिन्न हैं ) तो फिर इसी युक्ति से अययवी में भी गुरुत्व का मानना अनिवार्य है, क्योंकि अवयवों के अवयत्र भी तो अपने अवयवी से भिन्न हैं, अतः अवयवों में रहनेवाला गुरुत्व अवयवों से भिन्न अवयवी में पतन का उत्पादन कैसे कर सकता है? यह जो आक्षेप किया गया है कि अवयवों के गुरुत्व कार्य अवनति - विशेष से अवयवी के कार्य अवनतिविशेष में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता ' अतः अवयवों में ही गुरुत्व है अवयवी में नहीं ) इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि अवयवी के गुरुत्व से अवयवों के गुरुत्व में अत्यन्त अल्प अन्तर हैं, अतः उन दोनों से होनेवाले कार्यों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता । जैसे किसी भारी द्रव्य को दूसरी बार तौलने पर उससे कुछ कणों के झड़ जाने के बाद भी उसके गुरुत्व के कार्य अवनतियों में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवश्व-सांसिद्धिकम् नैमित्तिकं च । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः सामान्यगुणः । सांसिद्धिकस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व-निष्पत्तयः । सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकमयुक्तमिति चेन्न, दिव्येन तेजसा संयुक्तानामाप्यानां परमाणूनां परस्परं संयोगो द्रव्यारम्भकः सङ्घा-भेद से दो प्रकार का है । इनमें सांसिद्धिकद्रवत्व जल का विशेषगुण है और नैमित्तिकद्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्यगुण है । द्रवत्व के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय गुरुत्व की तरह समझना चाहिए । ( प्र ० ) ( जल में भी ) सङ्घात अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः यह कहना अयुक्त है कि जल का द्रवत्व सांसिद्धिक है । न्यायकन्दली संयोगप्रयत्नसंस्कारविरोधि । गुरुत्वस्य संयोगेन प्रयत्नेन वेगाख्येन च संस्कारेण सह विरोधो विद्यते, तैः प्रतिबद्धस्य स्वकार्याकरणात् । तथा च दोलारूढस्य संयोगेन प्रतिबन्धादपतनम्, प्रयत्नेन प्रतिबन्धादपतनं च शरीरस्य, वेगेन प्रतिबन्धादपतनं बहिः क्षिप्तस्य शरशलाकादेः । अस्य चाबादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथाप्यपरमाणु-रूपादयो नित्यास्तथा पार्थिवाप्यपरमाणुष्वपि गुरुत्वम् । यथा चाबादिकार्यद्रव्ये कारणगुणपूर्वप्रक्रमेण रूपादयो जायन्ते, आश्रयविनाशाच्च विनश्यन्ति तथा गुरुत्वमपि । ' संयोगप्रयत्न संस्कारविरोधी ' । गुरुत्व का विरोध ( अर्थात् अपने आश्रय के अधः-पतन रूप कार्य में अक्षमता ) संयोग, प्रयत्न, और वेगाख्यसंस्कार इन तीन गुणों से होता है । क्योंकि इनमें से किसी के साथ भी सम्बन्ध रहने पर गुरुत्व से पतन की उत्पत्ति नहीं होती है । संयोग से प्रतिरुद्ध होने के कारण हो पालकी पर चढ़े हुए मनुष्य का पतन नहीं होता है । प्रयत्नरूप प्रतिबन्धक से ही शरीर का पतन नहीं होता है । केवल वेग के हो कारण बाहर फेंका हुआ तीर ( कुछ देर तक ) रुका रहता है । ' अस्य चानादिपरमाणुरूपादिवन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः ' अर्थात् जिस प्रकार जलीय परमाणुओं के रूपादि नित्य होते हैं, उसी प्रकार पार्थिवपरमाणु और जलीयपरमाणु का गुरुत्व भी नित्य है । जैसे कार्य रूप जल रूपादि की उत्पत्ति कारणगुणक्रम से होती है, एवं आश्रय के विनाश से उनका विनाश होता है, उसी प्रकार कार्य रूप पार्थिव द्रव्य और जलीय द्रव्य इन दोनों के गुरुत्व भी कारणगुणक्रम से ही उत्पन्न होते हैं, और आश्रय के विनाश से ही विनष्ट होते हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir करणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् । यत् स्यन्दनकर्मकारणं तद् द्रवत्वमित्यर्थः । त्रिद्रव्यवृत्ति पृथिव्युदकज्वलनवृत्तीत्यर्थः । तत्तु द्विविधमिति । गुरुत्वमेकविधं द्रवत्वं तु द्विविधमिति तुशब्दार्थः । नेमित्तिकं सांसिद्धिकं च । निमित्तं च वह्निसंयोगः, तस्येदं कार्यमिति नैमित्तिकम् । सांसिद्धिकं च स्वभावसिद्धम्, वह्निसंयोगानपेक्षमिति यावत् । सांसिद्धिकमपां विशेषगुणः अन्यत्राभावात् । नैमि त्तिक पृथिवोतेजसोः सामान्यगुणः, साधारणत्वात् । सांसिद्धिकस्य द्रवत्वस्य गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । यथा नित्यद्रव्यसमवेतं गुरुत्वं नित्यम्, अनित्य-द्रव्यसमवेतं च कार्यकारणगुणपूर्वक माश्रयविनाशाद् विनश्यतीति तथा सांसि -किं द्रवत्वमपि । अत्र चोदयति - सङ्घातदर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तमिति चेत् आप्यस्य हिमकरकादेर्द्रव्यस्य सङ्घातदर्शनात् काठिन्यदर्शनादपां स्वभावसिद्धं द्रवत्व-' द्रवत्वं स्यन्दनकर्मकारणम् ' अर्थात् प्रसरण क्रिया का जो कारण वही ' द्रवत्व ' है । ' त्रिद्रव्यवृत्ति ' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों में द्रवत्व रहता है । ' तत्तु द्विविधम् ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तु ' शब्द से यह सूचित किया गया है कि गुरुत्व तो एक ही प्रकार का है, किन्तु द्रवत्व दो प्रकार का है । ' नैमित्तिकं सांसिद्धिकञ्च ' इस वाक्य में ' प्रयुक्त ' नैमित्तिक ' शब्द ' निमित्तस्येदं कार्यं नैमित्तिकम् ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न है, एवं इस ' निमित्त ' शब्द का अर्थ है वह्नि का संयोग । ( फलतः वह्निप्रभृति तैजस द्रव्य के संयोग रूप निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही नैमित्तिक द्रवत्व है ) स्वाभाविक द्रवत्व को सांसिद्धिक द्रवत्व कहते हैं । फलतः वह्नि प्रभृति तैजस पदार्थों के संयोग के बिना ही जो द्रवत्व उत्पन्न हो उसे सांसिद्धिकद्रवत्व कहते हैं । ' सांसिद्धिकोऽयं विशेषगुणः ' सांसिद्धिकद्रवत्व जल का विशेष गुण है, क्योंकि वह अन्य द्रव्यों में नहीं है । नैमित्तिकं पृथिवी तेजसोः सामान्य-गुण: ' नैमित्तिकद्रवत्व पृथिवी और तेज का सामान्य ही गुण हैं. क्योंकि वह दो द्रव्यों में समानरूप से रहता है । ' सांसिद्धिकस्य ' अर्थात् सांसिद्धिद्रवत्व का गुरुत्ववन्नित्या-नित्यत्वनिष्पत्तयः ' अर्थात् जिस प्रकार नित्यद्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व नित्य ही होता है, और अनित्यद्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला गुरुत्व कारणगुण-क्रम से उत्पन्न होनेवाला कार्य होता है. एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार द्रवत्व में भी समझना चाहिए । ( अर्थात् नित्य द्रव्य में रहनेवाला द्रवत्व भी नित्य है, एवं कार्य द्रव्य में रहनेवाले द्रवल की उत्पत्ति कारणगुणक्रम से होती है, एवं विनाश आश्रय के विनाश से होता है ) । ' संघात दर्शनात् सांसिद्धिकद्रवत्वमयुक्तम् ' इस सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप किया गया हैं कि हिम, करका प्रभृति जलीय द्रव्यों में ' संघात ' अर्थात् काठिन्य देखा जाता है, अतः जल में रहनेवाले द्रवत्व को स्वाभाविक मानना ठीक नहीं है । दिव्येन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । सभी जलों में स्वाभाविक द्रवत्व को For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४४ न्याय कन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे द्रवत्व-प्रशस्तपादभाष्यम् ताख्यः, तेन परमाणुद्रवत्वप्रतिबन्धात् कार्ये हिमकरकादौ द्रवत्वा-नुत्पत्तिः । नैमित्तिकं च पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् । कथम्? सर्पिर्जतु मधूच्छिष्टादीनां कारणेषु परमाणुध्वग्निसंयोगाद् वेगापेक्षात् कर्मोत्पत्ती तज्जेभ्यो विभागेभ्यो द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् कार्य-द्रव्यनिवृत्तावग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् स्वतन्त्रेषु परमाणुषु द्रवत्वमुत्पद्यते, ( उ ० ) यह बात नहीं है, क्योंकि दिव्यतेज के साथ संयुक्त परमाणुओं द्रव्य का उत्पादक संयोग ही सङ्घात रूप होता है ( अर्थात् उक्त परमाणुओं का ही संयोग कठिन होता है ) इसी से जल का स्वाभाविक द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है, जिससे जल से उत्पन्न होनेवाला पाला और बरफ में सांसिद्धिक द्रवत्व की उत्पत्ति नहीं हो पाती । अग्नि के संयोग से पृथिवी और तेज ( इन दोनों ही ) में नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । ( प्र ० ) किस प्रकार? ( इनमें नैमित्तिक द्रवत्व की उत्पत्ति होती है? ) उ ० ) घृत, लाह, मोम ( मधूच्छिष्ट ) प्रभृति द्रव्यों के उत्पादक परमाणुओं में बेग की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा क्रिया की उत्पत्ति होती है । उस क्रिया से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते । इस विभाग से उक्त परमाणुओं में रहनेवाले ( द्व्यणुक के ) उत्पादक संयोग का विनाश होता है । इस ( संयोगविनाश ) से घृतादि कार्य द्रव्यों के नाश हो जाने के बाद उष्णता की सहायता से अग्निसंयोग के द्वारा स्वतन्त्र ( परस्परासम्बद्ध ) परमाणुओं में द्रवत्व की उत्पत्ति होती न्यायकन्दली मित्ययुक्तम् । समाधत्ते - - दिव्येनेति । सर्वत्रोदके स्वभावसिद्धस्य द्रवत्वस्योप लम्भादपां स्वभावसिद्धमेव द्रवत्वं तावन्निश्चितम् । यत्र तु हिमकरकादौ कार्ये द्रवत्वानुत्पत्तिस्तत्र दिव्येन तेजसा सम्बद्धानामाप्यपरमाणूनां परस्परसंयोगो उपलब्धि होती है, इससे समझते हैं कि जल का द्रवत्व स्वाभाविक ही है । हिम कारकादि जलीय द्रव्यों में द्रवत्व की जो उत्पत्ति नहीं होती है उसका हेतु यह है कि दिव्य तेज के साथ उन द्रव्यों के उत्पादक परमाणु सम्बद्ध रहते हैं, अतः उन परमाणुओं के द्रव्योत्पादक संयोग संघातात्मक होते हैं, जिससे हिमकरकादि के सांसिद्धिकद्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाते हैं । ( प्र ० ) ' तेज के संयोग से सांसिद्धिक द्रवत्व का प्रतिरोध होता है ' यह किस प्रमाण से समझते हैं? ( उ ० ) अनुमान के द्वारा समझते हैं, क्योंकि हिमकरकादि से भिन्न For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६४५ ततस्तेषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मानुसंयोगात् कर्मोत्पत्तौ कर्मोत्पत्तौ तज्जेभ्यः संयोगेभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्यमुत्पद्यते, तस्मिंश्च रूपाद्यु-त्पत्तिसमकालं कारणगुणप्रक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यत इति । स्नेहो si विशेषगुणः । गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । संग्रहमृजादिहेतुः । अस्यापि है । इसके बाद भोग करनेवाले जीवों के अदृष्ट की सहायता से आत्मा और मन के संयोग से ( उन स्वतन्त्र परमाणुओं में ) क्रिया की उत्पत्ति होती है । इस क्रिया से ( द्रवत्व से युक्त परमाणुओं में द्रव्योत्पादक ) संयोग की उत्पत्ति होती है । इस संयोग से द्व्यणुकादि क्रम से कार्यद्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस कार्यद्रव्य में जिस समय रूपादिगुणों की उत्पत्ति होती है, उसी समय द्रवत्व की भी उत्पत्ति होती है । केवल जल में ही रहनेवाला विशेषगुण ' स्नेह ' है । वह संग्रह सत्तू प्रभृति चूर्ण द्रव्यों को गोले का आकार बनाने का, एवं मर्दन प्रभृति क्रिया का हेतु है । उसके नित्यत्व और अनित्यत्व की व्यवस्था गुरुत्व की तरह जाननी चाहिए । न्यायकन्दली द्रव्यारम्भकः सङ्घाताख्य:, तेन हिमकरकारम्भकाणां परमाणूनां द्रवत्वप्रति-बन्धात् । तेज: संयोगेन परमाणूनां द्रवत्वं प्रतिबद्ध मित्यन्यत्राप्यद्रव्यस्य लवणस्य वह्निसंयोगेन द्रवत्वप्रतिबन्धदर्शनादनुमितम् । लवणस्याप्यत्वमपि हिमकरका -दिवत् कालान्तरेण द्रवीभावदर्शनादवगतम् । विलयनं तु हिमकरकादेर्भी माग्नि-संयोगाद् यद् विलयनं कठिनद्रव्यस्य, तद् वह्निसंयोगादवगतम्, यथा सुवर्णादीनाम् । हिमकरकादिविलयनमपि विलयनमेव । तस्मादिहापि दृष्टसामर्थ्यो वह्नि-संयोग एव निमित्तमाश्रीयते । लवणरूप द्रव्य में वह्नि के संयोग से ( सांसिद्धिक ) द्रवस्त्र का प्रतिरोध देखा जाता है, अतः लवण रूप दृष्टान्त से तेज के संयोग में सांसिद्धिक द्रवत्व के प्रतिरोध की जनकता का अनुमान करते हैं । हिम, करकादि की तरह कुछ समय के बाद लवण को पिघलते देखा जाता है, अतः जलीय द्रव्य है । वह्नि संयोग से कठिन द्रव्य का पिघलना समझते हैं कि लवण भी सुवर्णादि द्रव्यों में प्रत्यक्ष देखा जाता है । हिम, कारकादि का पिघलना भी कठिन द्रव्य का पिघलना ही है, अत: समझते हैं कि वह वह्नि के संयोग से ही पिघलता है । तस्मात् पिघलने की कारणता जिसमें प्रत्यक्ष के द्वारा निश्चित है, उसी वह्निसंयोग में हिम, करकादि के पिघलने की भी कारणता स्वीकार कर लेते हैं । For Private And Personal