प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 721–730

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 721–730

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४६ तत्र वेग वेगो न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कारे-प्रशस्तपादभाष्यम् संस्कारस्त्रिविध: - - वेगो -मूर्तिमत्सु भावना पश्च सु द्रव्येषु स्थितिस्थापकश्च । निमित्तविशेषापेक्षात् ( ) वेग ( २ ) भावना और ( ३ ) स्थितिस्थापक भेद से संस्कार तीन प्रकार का है । इनमें वेग मूर्त्तद्रव्यों में ही विशेष प्रकार के निमित्त-कारणों की सहायता से क्रिया के द्वारा उत्पन्न होता है । वह ( वेग ) किसी न्यायकन्दली सांसिद्धिकं द्रवत्वं व्याख्याय नैमित्तिकं व्याचष्टे -- नमित्तिकं पृथिवी -तेजसोरग्निसंयोगजमिति । कथमित्यज्ञेन पृष्टः सन्नुपपादयति -- सर्पिरित्यादिना । सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवानां कारणषु परमाणुष्वग्निसंयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यो विभागेभ्यः सर्पिराद्यारम्भकसंयोगविनाशात् सपिरादिद्रव्य निवृत्तौ सत्यां स्वतन्त्रेषु परमाणुषु वह्निसंयोगाद् द्रवत्वमुत्पद्यते । तदनन्तरमुत्पन्नद्रवत्वेषु परमाणुषु भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मपरमाणु संयोगात् क्रियोत्पत्तौ सत्यां कर्मजेभ्यः परमाणूनां परस्परसंयोगेभ्यो द्वयणुकादिप्रक्रमेण कार्यद्रव्ये जाते रूपाद्युत्पत्तिकाले एवं कारगद्रवत्वेभ्यो द्रवत्वमुत्पद्यते । हिम-करकादिविलयनेऽप्येवमेव न्यायः । स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । संग्रहः परस्परमयुक्तानां सांसिद्धिकद्रवत्व की व्याख्या करने के बाद ' नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोरग्निसंयोगजम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अन कमप्राप्त नैमित्तिक द्रवत्व की व्याख्या करते हैं । ' कथम् ' अर्थात् नैमित्तिकद्रवत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है, किसी अज्ञ के द्वारा यह पूछे जाने पर ' सर्पिः ' इत्यादि से उस प्रश्न का उत्तर देते हैं । घृत, लाह, एवं मोम प्रभृति ( नैमित्तिक द्रवत्व वाले पार्थिव अवयवी द्रव्यों के ) कारणीभूत परमाणुओं में अग्नि के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, क्रियाओं से परमाणुओं में विभाग उत्पन्न होते हैं । कर्मजनित इन विभागों से परमाणुओं में रहनेवाले ( द्वयणुकों के ) उत्पादक पूर्वसंयोगों का नाश होता है । इन संयोगों के विनाश से घृतादि अवयवी द्रव्यों का परमाणुपयन्त विनाश हो जाता है । इस प्रकार उन परमाणुओं के स्वतन्त्र हो जाने पर इन स्वतन्त्र परमाणुओं में वह्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । भोग जनक अदृष्ट की सहायता से आत्मा और परमाणु के संयोग से ( द्रवत्वयुक्त ) परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति होती है । फिर परमाणुओं के कर्मजनित इन संयोगों से द्वणुकादि क्रम से कार्य द्रव्यों की उत्पत्ति होती है, फिर आगे क्षण में रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी क्षण में समवायिकारणों में रहनेवाले द्रवत्वों से कार्यद्रव्यों में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । हिमकरकादि में द्रवत्वविलय के प्रसङ्ग में भी इसी रीति का अनुसरण करना चाहिए । ' स्नेहोऽपां विशेषगुणः संग्रहमृजादिहेतुः । ' संग्रह ' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है, जिससे परस्पर असंयुक्त सत्तू प्रभृति द्रव्यों का गोला बन जाता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६४७ कर्मणो जायते नियतदिकक्रियाप्रबन्धहेतुः स्पर्शवद्रव्यसंयोगविशेष-विरोधी क्वचित् कारणगुणपूर्वक्रमेणोत्पद्यते । भावनासंज्ञकस्त्वात्मगुणो स्मृतिप्रत्य-भिज्ञानहेतुर्भवति ज्ञानमददुःखादिविरोधी । पट्वभ्यासादरप्रत्ययजः । नियमित देश में ही क्रियासमूह का कारण है । स्पर्श से युक्त द्रव्यों का विशेष प्रकार का संयोग उसका विनाशक है । कहीं वह अपने आश्रय के समवायिकारण में रहनेवाले वेग से भी उत्पन्न होता है । ( २ ) पहिले देखे हुए, सुने हुए, एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की स्मृति और प्रत्यभिज्ञा का कारणीभूत संस्कार ही ' भावना ' है । ज्ञान, मद एवं दुःखादि से उसका नाश होता है । पटु, अभ्यास, आदर और न्यायकन्दली सक्त्वादीनां पिण्डीभावप्राप्तिहेतुः संयोगविशेष मृजा कायस्योद्वर्तनादिकृता शुद्धिः | आदिशब्दान्मृदुत्वं च तेषां हेतुः । स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्व-निष्पत्तयः । गुरुत्वं च परमाणुषु नित्यम्, कार्ये च कारणगुणपूर्वकमाश्रय-विनाशाद् विनाशि, तथा स्नेहोऽपीति । संस्कारस्त्रिविधो वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । तत्र वेगो मूर्ति-मत्सु पञ्चद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । पञ्चसु द्रव्येषु पृथिव्य -तेजोवायुमनस्सु कर्म वेगं करोति नान्यत्र, स्वयमभावात् । नोदनाभिघातादि-' मृजा ' शब्द से शरीर की वह शुद्धि अभिप्रेत है, जो शरीर में ( उबटन प्रभृति के ) मर्दन से प्राप्त होती है । आदि शब्द से मृदुत्वादि को समझना चाहिए । ' स्नेह ' इन सबों का कारण है । ' स्नेहस्यापि गुरुत्ववन्नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः अर्थात् गुरुत्व जिस प्रकार परमाणुओं में नित्य है, उसी प्रकार स्नेह भी परमाणुओं में नित्य है । जिस प्रकार कार्यद्रव्य में ' गुरुत्व ' कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है, एवं आश्रय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है, उसी प्रकार कार्यद्रव्य में स्नेह भी कारणगुणक्रम से उत्पन्न होता है, एवं आभय के विनाश से विनाश को प्राप्त होता है । संस्कारस्त्रिविधोवेगो सवना स्थितिस्थापकश्चेति, तत्र वेगो मूर्तिमत्सु पञ्वद्रव्येषु निमित्तविशेषापेक्षात् कर्मणो जायते । ' पाँच द्रव्यों में अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु और मन इन पाँच द्रव्यों में क्रिया से वेग को उत्पत्ति होती है, और किसी वस्तु में नहीं, क्योंकि इन पांच द्रव्यों को छोड़कर क्रिया स्वयं अन्यत्र कहीं नही है । क्रिया को वेग के उत्पादन में नोदन या अभिघात प्रभृति कारणों का साहाय्य आवश्यक है, वह स्वतन्त्र होकर केवल अपने ही बल से वेग का उत्पादन नहीं कर सकती. क्योंकि मन्दगति For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६४८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभव्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारातिशयो जायते । यथा दाक्षिणात्यस्योष्ट्र दर्शनादिति । विद्या शिल्पव्याया-मादिभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे पूर्व पूर्वसंस्कारमपेक्षमाणादुत्त रोत्तरस्मात् प्रत्ययादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते । ज्ञान से इसकी उत्पत्ति होती है । पटु ( अनुपेक्षात्मक ) ज्ञान एवं आत्मा और मन के संयोग से अद्भुत विषयों में पटु ' नाम के विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । जैसे कि दक्षिण देश के रहनेवाले को ऊँट के देखने से ( ऊँट का पटु संस्कार होता है ) । विद्या, शिल्प एवं व्यायाम प्रभृति वस्तुओं का बार बार अभ्यास करते रहने से उन्हीं विषयों के पूर्वपूर्व संस्कारों से उत्पन्न प्रतीतियों ( स्मृतियों ) के कारण आत्मा और मन संयोगसे एक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली निमित्तविशेषापेक्षं न केवलम् मन्दगतौ वेगाभावात् । नियतदिक्क्रिया-प्रबन्धहेतुः । यद्दिगाभिमुख्येन क्रियया वेगो जन्यते तद्दिगभिमुखतयैव क्रिया-सन्तानस्य हेतुरित्यर्थः । स्पर्शवदिति । विशिष्टेन स्पशवद्द्रव्यसंयोगेनात्यन्त-निबिडावयववृत्तिना वेगो विनाश्यते, यः स्वयं विशिष्टः । मन्दस्तु वेगः स्पर्श-वद्रव्यसंयोगमात्रेण विनश्यति यथातिदूरं गतस्येषोस्स्तमितवायुप्रतिबद्धस्य । क्वचिदिति । बाहुल्येन तावद्वेगः कर्मजः क्वचिद् वेगवदवयवारब्धे जलावयविनि कारणवेगेभ्योऽपि जायते । भावनेत्यादि । भावनासंज्ञकस्तु संस्कार आत्मगुणः । दृष्टश्रुतानुभूते-रूप क्रिया के रहने पर भी वेग की उत्पत्ति नहीं होती है । ' नियतदिक्रिया-प्रबन्धहेतुः ' वेग नियत दिशा में ही क्रियासमूह का उत्पादक है । अर्थात् जिस दिशा की तरफ क्रिया से वेग उत्पन्न होता है, उसी दिशा की तरफ क्रियासमूह को वेग उत्पन्न करता है । ' स्पर्शवदिति ' स्पर्श से युक्त द्रव्य के विशेष प्रकार के एवं निबिड़ अवयव के द्रव्य में रहनेवाले संयोग से तीव्र वेग का विनाश होता है । मन्द वेग का विनाश तो स्पर्श से युक्त किसी भी द्रव्य के संयोग से हो जाता है, जैसा कि अन्यत्र दूर ये हुए बाण के वेग का विनाश मन्द गति के वायु से भी हो जाता है । ' क्यचिदिति ' अर्थात् अधिकांश वेगों की उत्पत्ति तो क्रिया से ही होती है, किन्तु कुछ वेगों की उत्पत्ति श्रीभूत द्रव्य के अवयवों में रहनेवाले वेग से भी होती है, जैसे कि जल में कारण-गुणक्रम से भी वेग की उत्पत्ति होती है । ' भावनेत्यादि ' अर्थात् भावना नाम का जो संस्कार वह आत्मा का गुण है । ' दृष्टानुभूतेषु ' इस वाक्य के द्वारा इस संस्कार से उत्पन्न होनेवाले कार्यों को दिखलाया For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६४६ ष्विति । दृष्टश्रुतानुभूतेष्वर्थेषु स्मृतेः प्रत्यभिज्ञानस्य च हेतुरिति तस्य कार्य-कथनम् । दृष्टश्रुतानुभूतेष्विति विपर्ययावगतोऽप्यर्थो बोद्धव्यः, तत्रापि स्मृति-दर्शनात् । ज्ञानेति । प्रतिपक्षज्ञानेन संस्कारो विनाश्यते । द्यूतादिव्यसनापन्नस्य पूर्वाधीत विस्मरणात् । मदेनापि संस्कारस्य विनाशः सुररामत्तस्य पूर्वस्मृतिलोपात् । मरणादिदुः खादपि संस्कारो विनश्यति, जन्मान्तरानुभूतस्मरणाभावात् । आदि-शब्देन सुखादिपरिग्रहः, भोगासक्तस्य कुपितस्य वा पूर्ववृत्तस्मृत्यभावात् । पट्वभ्यासेति । पटुप्रत्ययादभ्यासप्रत्ययादादरप्रत्ययाच्च संस्कारो जायते । पटुप्रत्ययापेक्षादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते । यथेति । उष्ट्रो दाक्षिणात्यस्यात्यन्ताननुभूताकारत्वादाश्चर्य भूतोऽर्थः । तद्दर्शनात् तस्य पटुः संस्कारो जायते, कालान्तरेऽप्युष्ट्रानुभवस्मृतिजननात् । अभ्यास-प्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - विद्याशिल्पेत्यादि । विद्या शास्त्रागमादिका, शिल्पं पत्त्रभङ्गादिक्रिया, व्यायाम आयुषादिश्रमः, तेष्वभ्यस्यमानेषु तस्मिन्नेवार्थे गया है कि इससे प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थ को स्मृति और प्रत्यभिज्ञान नाम का विशेष ज्ञान उत्पन्न होता है । ' दृष्टानुभूतेषु ' इस पद से ( केवल प्रत्यक्ष प्रमा और अनुमानप्रभा के द्वारा ज्ञात अर्थ ही नहीं, किन्तु ) विपर्यय के द्वारा ज्ञात अर्थों का भी ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि उनके विषयों को भी स्मृति होती है । ' ज्ञानेति ' विरोधिज्ञान से संस्कार का विनाश होता है, क्योंकि जुआ प्रभृति व्यसनों में लगे हुए व्यक्तिको पहिले के अधीत विषयों का विस्मरण हो जाता है । मद से भी संस्कार का विनाश होता है, क्योंकि सुरापान से मत्त व्यक्ति के पूर्वस्मृति का लोप देखा जाता है । मरणादि दुःखों से भी संस्कार का नाश होता है, क्योंकि दूसरे जन्म की बातों का स्मरण नहीं होता । ( ' ज्ञानमददुःखादि ' पद में प्रयुक्त ) ' आदि ' पदसे सुखादि का ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि भोग में आसक्त पुरुषों को या अत्यन्त क्रुद्ध पुरुषों को पहिले की बातों की विस्मृति हो जाती है । ' पट्वभ्यासेति ' पटुप्रत्यय से, अभ्यासप्रत्यय से एवं आदरप्रत्यय से संकार की उत्पत्ति होती है । ' पटुप्रत्यायादात्ममनसोः संयोगविशेषादाश्चर्येऽर्थे पटुः संस्कारो जायते यथेति ' । ( दक्षिण देश में ऊँट नहीं होता, अतः ) दाक्षिणात्यों को ऊँट का कभी अनुभव नहीं रहता, अतः कभी देखने पर अत्यन्त आश्चर्य होता है; जिससे ऊँट को एक बार देखने पर भी उसे ऊँट विषयक ' पटुसंस्कार ' ही उत्पन्न होता है | अतः बहुत दिनों के बाद भी ऊँट की उन्हें स्मृति होती है । ' विद्या शिल्पेत्यादि इस सन्दर्भ के द्वारा अभ्यासप्रत्यय से उत्पन्न संस्कार का निरूपण किया गया है । इस सन्दर्भ के ' विद्या ' शब्द से शास्त्र एवं आगम प्रभृति अभिप्रेत हैं । ' शिल्प ' शब्द से पत्रभङ्गादि ' क्रियाओं को समझना चाहिए । ' व्यायाम ' शब्द से अस्त्रशस्त्रादि चलाने का श्रम लेना चाहिए | इन सबों का अभ्यास करने पर, ' तस्मिन्नेवार्थे ' अर्थात् पहिले अनुभूत उसी अर्थ में ( संस्कार की उत्पत्ति होती है ) । ' पूर्वपूर्वेत्यादि ' यतः वह संस्कार बहुत दिनों For Private And Personal

पृष्ठ 725

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६५० न्यायकन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-न्यायकन्दली पूर्वगृहीते । पूर्वेत्यादि । यतः सुचिरमनुवर्तते, स्फुटतरं च स्मरणं करोति । न ह्याद्यानुभव एव संस्कारविशेषमाधत्ते, प्रथमं तदर्थस्मरणाभावात् । नाप्युत्तर एव हेतु:, पूर्वाभ्यासवैयर्थ्यात् । तस्मात् पूर्वसंस्कारापेक्षोत्तरोत्तरानुभवाहिता-धिकाधिक संस्कारोत्पत्तिक्रमेणोपान्त्यसंस्कारापेक्षादन्त्यानुभवात् तदुत्पत्तिः । इदं त्विह निरूप्यते । विद्यायामभ्यस्यमानायां किं तदर्थो वाक्येन प्रतिपाद्यते? किं वा स्फोटेन? कुतः संशयः? विप्रतिपत्तेः । एके वदन्ति स्फोटोर्थं प्रतिपादयतीति । अपरे त्वाहुर्वाक्यं प्रत्यायकमिति । अतो युक्तः संशयः । किं तावत्प्राप्तम्? स्फोटोऽर्थप्रत्यायक इति । यदि हि वर्णानतिरिक्तं पदम् पदानतिरिक्तं च वाक्यम्, तदार्थप्रत्यय एव न स्यादिति । तथाहि न वर्णाः प्रत्येकमर्थविषयां धियमाविर्भावयन्ति, शेषवर्णवैयर्थ्यात् । समुदायश्च तेषां न सम्भवति, अन्त्यवर्णग्रहणसमये पूर्वेषामसम्भवात् । नित्यत्वाद् वर्णाना-मस्ति समुदाय इति चेत्? तथापि न तेषां प्रतीतिरनुवर्तते, अप्रतीयमानानां च प्रत्यायकत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । नहि प्रतीत्य अप्रतीयमानानां सर्वथा अप्रतीयमानानां च कश्चिद् विशेषः । पूर्वावगता वर्णाः स्मृत्यारूढाः प्रतीतिहेतव तक रहता है, एवं अत्यन्त स्पष्ट स्मृति का उत्पादन करता है । पहिले बार के ही अनुभव से विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि उस संस्कार से स्मृति की उत्पत्ति नहीं होती हैं । केवल आगे के अनुभव ही संस्कार के उत्पादक नहीं हैं, क्योंकि ( ऐसा मानने पर ) पहिले के सभी अभ्यास व्यर्थ हो जाएँगे । ' तस्मात् ' पूर्व संस्कार से युक्त आत्मा में आगे के अनुभवों से संस्कारों की उत्पत्ति को धारा चलती है, इस प्रकार उपान्त्य ( अर्थात् अन्तिम संस्कार से अव्यवहितपूर्व वृत्ति ) संस्कार की सहायता से अन्तिम अनुभव के द्वारा विशिष्ट संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस प्रसङ्ग में इस विषय का विचार उठाता कि शास्त्र या आगम रूप कथित विद्या के अभ्यास से जो उनके अर्थों का प्रतिपादन होता है, वह वाक्य से उत्पन्न होता है? या स्फोट से उत्पन्न होता है? ( प्र ० ) यह संशय ही उपस्थित क्यों हुआ? ( 30 ) परस्पर विरोधी मतों के कारण संशय उपस्थित होता है । किसी सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि स्फोट से अर्थ की प्रतीति होती है । दूसरे सम्प्रदाय के लोग कहते हैं कि वाक्य से ही अर्थ का बोध होता है । तो फिर इस प्रसङ्ग में क्या होना उचित है? ( १० ) स्फोट से ही अर्थ की प्रतीति उचित है । क्योंकि पदों का समूह ही वाक्य है । एवं वर्णों का समूह ही पद है, इस वस्तुस्थिति के अनुसार वाक्य के अर्थ-बोध का होना सम्भव नहीं है । ( विशदार्थ यह है कि वाक्य के ) हर एक वर्णं अर्थविषयक बोध के उत्पादक नहीं हैं, क्योंकि ऐसा मानने पर उनमें से किसी एक ही वर्ण से अर्थ विषयक बोध का सम्पादक हो जाएगा फिर अवशिष्ट वर्णों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा । वर्णों का एक समुदाय होना सम्भव ही नहीं है, क्योंकि अन्तिम वर्ण के For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 726 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६५१ इति चेत्? यदि हि स्मृतिरपि क्रमभाविनी? तदा नास्ति वर्णसाहित्यम्, तृतीय-वर्णग्रहणकाले प्रथमवर्णस्मृतिविलोपात् युगपदुत्पादस्तु स्मृतीनामनाशङ्कनीय एव, ज्ञानयोगपद्यप्रतिषेधात् । अथ प्रथममाद्यवर्णज्ञानम्, तदनु संस्कारः, तदनु तृतीयवर्णज्ञानम्, तेन प्राक्तनेन संस्कारेणान्त्यो विशिष्टः संस्कारो जन्यत इत्यनेन क्रमेणान्ते निखिल वर्णविषय: संस्कारो जातो निखिल वर्ण विषयामेकामेव स्मृति युगपत् करोतीत्याश्रीयते, तदा क्रमो हीयेत । क्रमो हि पौर्वापर्यम्, तच्च देशनिबन्धनं कालनिबन्धनं वा स्यात् उभयमपि तद्वणेषु नावकाशं लभते तेषां सर्व-प्रत्यक्ष के समय पूर्व के सभी वर्णों का रहना सम्भव नहीं है | ( प्र ० ) वर्ण तो नित्य हैं, अतः सभी अमयों में उनकी सत्ता सम्भावित है, सुतराम् वर्णों का समुदाय असम्भव नहीं है । ( उ ० ) फिर भी किसी एक समय में सभी वर्णों का ग्रहण सम्भव नहीं है । वर्णं गृहीत होकर ही अर्थप्रत्यय के कारण है । यदि वर्ण स्वरूपतः अर्थप्रत्यय के कारण हों तो फिर उनसे विंदा अर्थ की प्रतीति होनी चाहिए, क्योंकि एकबार ज्ञात वर्ण के अज्ञान में और वर्णों के सर्वया अज्ञान में कोई अन्तर नहीं है । अतः इस प्रकार भी वर्ण समूह से सर्वप्रत्यय का उपपादन नहीं किया जा सकता । ( प्र ० ) पद या वाक्य के जितने वर्ण पहिले ज्ञात हैं, वे सभी पुन: स्मृतिपथ में आकर अर्थ बोध का उत्पादन करते हैं । ( उ ० ) ( इस प्रसङ्ग में पूछना है कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्णं की अलग २ स्मृति होती है? या सभी वर्णों का एक ही स्मरण होता है? ) इनमें यदि यह प्रथमपक्ष मानें कि पद या वाक्य के प्रत्येक वर्ण की स्मृति क्रमशः होती है, तो फिर स्मृति मे भी वर्णों का एकत्र होना सम्भव नहीं है, क्योंकि तीसरे वर्णं की स्मृति के समय प्रथम वर्ण की स्मृति अवश्य ही विनष्ट हो जाएगी । प्रत्येक वर्ण-विषयक सभी स्मृतियों का एक ही समय उत्पन्न होना तो सम्भव ही नहीं है क्योंकि एक समय अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यदि इस प्रकार की कल्पना करें कि ( प्र 0 ) पहिले प्रथम वर्ण का ज्ञान होता है, उसके बाद उस वर्ण विषयक संस्कार की उत्पत्ति होती है, उसके बाद तृतीय वर्ण का ज्ञान, इसके बाद उसी क्रम से पहिले पहिले के संस्कारों से अन्तिम वर्णविषयक विशेष प्रकार के संस्कार की उत्पत्ति होती है । अन्त में सभी वर्णों के इस एक ही संस्कार से एक ही समय सभी वर्णविषयक एक ही स्मृति की उत्पत्ति होती है । ( उ ० ) तो फिर वर्णों में क्रम ही नहीं रह जाएगा, क्योकि पूर्वापरीभाव ( एक के बाद दूसरा ) को ही क्रम कहते हैं । यह क्रम दो प्रकारों से सम्भव है ( १ ) देशमूलक और ( २ ) क. लमूलक । वर्णों में इन दोनों में से एक भी प्रकार के क्रम की सम्भावना नहीं है । क्योंकि वर्ण व्यापक हैं, इस लिए दैशिक पूर्वापरीभाव रूप क्रम सम्भव नहीं है । वर्ण नित्य ( अविनाशी ) हैं, इसीलिए कालिक पूर्वा-भाव की सम्भावना भी नहीं है । अतः वर्णों में क्रम को उपपत्ति का एक ही मार्ग बच For Private And Personal

पृष्ठ 727

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 727 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६५२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणें स्फोट-न्यायकन्दली गतत्वान्नित्यत्वाच्च । बुद्धिक्रमनिबन्धनस्तु वर्णानां क्रमो भवेत् स चैकस्यां स्मृतिबुद्धौ परिवर्तमानानां प्रत्यस्तमित इत्यक्रमाणामेव प्रतिपादकत्वम् । अतश्च सरो रसो वनं नवं नदी दोनेत्यादिष्वर्थभेदप्रत्ययो न स्याद्, वर्णानाम-भेदात् क्रमस्य प्रतीत्यनङ्गत्वाच्च । अस्ति चायं प्रतीतिभेदः सवर्णेष्वनुपपद्य-मानः? तर्ह्यतिरिक्तं निमित्तान्तरमाक्षिपतीति स्फोटसिद्धिः । फोटो s पि नाभिव्यक्तोऽर्थं प्रतिपादयति, सर्वदार्थोपलब्धिप्रसङ्गात् । अभिव्यक्तिश्च न तस्य वर्णेभ्यः सम्भवति, उक्तेन न्यायेन तेषामेकैकतः समुदितानां चासामर्थ्यात् तस्मात् स्फोटादपि दुर्लभा अर्थप्रतीतिः । अत्र वदन्ति । प्रयत्नभेदानुपातिनो वायवीया ध्वनयः प्रत्येकमेव तद्वर्णा-त्मकतया स्फोटमस्फुटमभिव्यञ्जयन्तः पूर्वं विषयसंस्कारसाचिव्यलाभादन्ते स्फोटमाभासयन्ते । तथा चान्ते प्रत्यस्तमित निखिल वर्णं विभागोल्लेखक्रमम-जाता है कि बुद्धिक्रम के अनुसार वर्णों का क्रम मानें । किन्तु सभी वर्षों का एक ही संस्कार मान लेने से वह मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है । अतः इस पक्ष में यह आपत्ति आ खड़ी होती है कि ' बिना क्रम के ही वर्णों से अर्थ का बोध होता है ' । जिससे ' सर ' शब्द और ' रस ' शब्द से, एवं ' वन ' शब्द से और ' नव ' शब्द से अथवा ' नदी ' शब्द से और ' दीन ' शब्द से समानविषयक बोधों की आपत्ति होगी, क्योंकि दोनों शब्दों के वर्ण समान ही हैं, क्रम को बोध का कारण मान नहीं सकते । किन्तु उन दोनों शब्दों के समुदायों में से प्रत्येक पद के द्वारा विभिन्न बोध ही होता है । अतः समान वर्ण के उक्त पदों से विभिन्न प्रकार की उक्त प्रतीति की उपपत्ति स्फोट के बिना नहीं हो सकती, अतः ' स्फोट ' का मानना आवश्यक है । ( प्र ) स्फोट भी तो ज्ञात होकर ही अर्थ विषयक बोध का उत्पादन कर सकता है, यदि ऐसा न मानें स्वरूपतः ही स्फोट को अर्थबोध का कारण मानें तो सर्वदा अर्थ विषयक बोध की आपत्ति होगी । ( अब यह देखना है कि स्फोट की अभिव्यक्ति किससे होती है? ) वर्णों से स्फोट को अभिव्यक्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि या वाक्य के प्रत्येक वर्ण से यदि स्फोट की अभिव्यक्ति मानेंगे, तो अवशिष्ट वर्ण ही व्यर्थ हो जाएँगे । यदि वर्णनमुदाय से स्फोट की अभिव्यक्ति मानें, तो सो भी सम्भव नहीं है, क्योंकि सभी वर्णों में दैशिक या कालिक साहित्य सम्भव ही नहीं है । तस्मात् स्फोट से भी अर्थ का बोध सम्भव नहीं है । इस आक्षेप के प्रसङ्ग में स्फोट से अर्थबोध माननेवालों का कहना है कि स्फोट पहिले से ही रहते हैं, किन्तु अनभिव्यक्त रहते हैं, किन्तु तत्तद्वर्णों के उच्चारण के उक्त प्रयत्न से निष्पन्न ( कोष्ठय ) वायु की ध्वनियाँ उक्त अनभिव्यक्त स्फोट को ही पहिले तत्तद्वर्णं स्वरूप से अस्फुट रूप में अभिव्यक्त करती हुई पश्चात् अर्थविषयक संस्कार की सहायता से अति स्फुट रूप से भी अभिव्यक्त करती हैं । यही कारण है कि अन्त में वर्णों के अलग अलग स्वरूप नहीं रह जाते, एवं वर्णों का अलग अलग उल्लेख भी नहीं रह जाता, इन सबों से अलग For Private And Personal

पृष्ठ 728

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 728 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६५३ नवयवमेकं विस्पष्टमर्थतत्त्वमनुभूयते । यदि हि वर्णा एव पदम्? न तदेकबुद्धि -निर्ग्राह्यमिति अनालम्बना बुद्धिः पर्यवस्यति । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' इति च व्यपदेशो न घटते । तस्माद् वर्णव्यतिरिक्तः कोऽपि सम्भवत्येको यस्मादर्थः स्फुटीभवतीति । एवं प्राप्तेऽभिधीयते । गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदास इत्यादिषु पदेषूच्चार्यमाणेषु क्रमभाविनो वर्णाः परं प्रतीयन्ते न त्वन्ते वर्ण-व्यतिरिक्तस्य कस्यचिदर्थस्य संवेदनमस्ति । यदि हि तस्य पूर्व वर्णात्मकतया संविदितस्यान्ते स्वरूप संवेदनम्, पूर्वज्ञानस्य मिथ्यात्वमवसीयते रजतज्ञानस्येव शुक्तिकासंवित्तौ । न चैवं प्रतिपत्तिरस्ति नायं वर्णः, किं तु स्फोटः ' इति । या चेयमेकार्थावर्माशनो बुद्धि:, सापि नार्थान्तरमवभासयति, किन्तु वन-होता हूं । यदि वर्णों का समुदाय फिर पद में एकत्व की प्रतीति न निर्दिषयक हो जाएँगी । एवं ' शब्दात् हम समझते हैं । यह व्यवहार न हो समझते हैं ' इस प्रकार का व्यवहार जिससे अर्थ ' प्रस्फुटित ' होता है ( उसी एक सम्पूर्ण और अत्यन्त स्पष्ट अर्थ तत्व का बोध ही पद हो ( वर्णों का कोई एक स्फोठ न हो ) तो हो सकेगी, अत: ' एकं पदम् ' इत्यादि बुद्धियाँ अर्थ प्रतिपद्यामहे ' ( एक अखण्ड शब्द से अर्थ को सकेगा ( किन्तु ' बहुत से शब्दों से हम अर्थ को होगा ) | अतः वर्णों से भिन्न कोई एक वस्तु है, को अन्वर्थसंज्ञा ' स्फोट है ) । इन सब युक्तियों से स्फोट की सत्ता की सम्भावना उपस्थित होने पर सिद्धा-न्तियों का कहना है कि ' गुणरत्नाभरणः कायस्थकुलतिलकः पाण्डुदास ' ( अर्थात् पाण्डुदास कायस्थ कुल के तिलक रूप हैं एवं गुण रूपी रत्न ही उनके भूषण हैं ) इन सब वाक्यों के उच्चारण करने पर क्रमशः उत्पन्न होनेवाले वर्णों की ही प्रतीति होती है, किन्तु उच्चारण के अन्त में इन वर्णों से भिन्न किसी ( स्फोट रूप ) अर्थ का भान नहीं होता है । यदि ऐसा कहें कि ( प्र ० ) प्रथमतः वर्ण का जो भान होता है, वह वस्तुतः स्फोट का ही वर्ण रूप से भान होता है और अन्त में स्फोट का स्फोटत्व रूप से भान होता है । ( उ ) तो फिर जैसे कि शुक्तिका में रजत ज्ञान को मिथ्या मानना पड़ता है, वैसे ही स्फोट में वर्णत्व विषयक प्रथम ज्ञान को मिथ्या ही मानना पड़ेगा । ( किन्तु आगे ) यह बाघज्ञान भी नहीं होता कि ' ज्ञात होनेवाला यह वर्ण नहीं है, किन्तु स्फोट है ' । वर्णों के समुदाय में जो एकत्व की प्रतीति होती है, उस प्रतीति का भी विषय उन वर्णों के समुदाय से भिन्न कुछ भी नहीं है, जैसे कि ' यह वन है ' इस प्रतीति का विषय वृक्षसमुदाय से भिन्न स्वतन्त्र-वन नाम की कोई व तु नहीं है । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' यह पञ्चमी एकवचन से युक्त वाक्य का प्रयोग भी उन वर्णों के समुदाय को ही एक वस्तु मान कर किया जाता है । प्रत्यक्ष के द्वारा जिसका सर्वथा ज्ञान होना ही असम्भव उस ( स्फोट ) का अन्य प्रमाणों के द्वारा निरूपण सम्भव नहीं है, क्योंकि उसके ज्ञान का कोई दूसरा उपाय For Private And Personal

पृष्ठ 729

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६५४ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट-न्यायकन्दली प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रयवलम्बते । ' शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे ' इति वर्णसमुदाय-मेवोररीकृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते । न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपाया-भावात् । अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत्? किमप्रतीयमानः स्फोटो s-धिमे हेतुः समर्थितो भवद्भिः? प्रतीयमानो वा? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति तेनैषामेव वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चि-दुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगनकुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्त्तृभेदे व्यवधान च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । नहि ते विपरीतक्रमाः कर्त्तृभेदानुपातिनो देशकाल -कार्योन्या हि शक्तयो भावानाम् व्यवहितास्तदर्थधियः कारणम्,, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपदिशन्ति सन्तः -यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में हो उसके अन्वय और व्यतिरेक का आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूंढ़ निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इनके लिए आकाश कुसुम की तरह सर्वथा अप्रतोत होनेवाले किसी ( स्फोट रूप ) अर्थ की कल्पना की जाय । ( वर्गों से ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में ) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि ( प्र ० ) ( वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो ) ( १ ) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों से अर्थात् रस सर, वन नव नदी दीन, प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी, क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण है । ( २ ) एवं विभिन्न कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से ( अर्थात् देवदत्त से उच्चरित ' घ ' और यज्ञदत्त से उच्चरित ' ट ' शब्द से घट विषयक ) बोध की आपत्ति होगी । एवं ( ३ ) व्यवहित वर्णो से ( अर्थात् ' घ ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण और उसके बाद उच्चरित ' ट ' वर्ण से ) घट विषयक बोध की आपत्ति होगी । ( उ ० ) ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित, या विभिन्न कत्र्ताओं से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण ही नहीं मानते, क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है? यह केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि जितने एवं जिन वर्णों के जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य ( कार्य से ) निश्चित है, For Private And Personal

पृष्ठ 730

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६५५ सर्वगतत्वान्नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमभावः । अत एव नदी-दीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमभेदात् । वर्णेषु क्रमो नास्ति स कथमेषामङ्ग स्यादिति चेन्न तेषामुत्पत्तिभाजामव्याप्यवृत्तीनां देशकालकृतस्य पौर्वापर्यस्य सम्भवात् । यच्चेदमुक्तम् प्रत्येकशः समुदितानां च न सामर्थ्य-मिति, तदपि न परस्य मतमालोचितम् । यद्यपि वर्णा अनवस्थायिनस्तथापि तद्विषयाः क्रमभाविनः संस्काराः संभूय पदार्थधियमातन्वते । यद्वा पूर्ववर्ण-वे ही वर्ण उसी विन्यास - क्रम से उस अर्थ के बोधक हैं । " अत एव इसी क्रमभंद के कारण नद शब्द से और दोन शब्द से विभिन्न विषयक बोध होते हैं । ( प्र ० ) वर्ण नित्य और व्यापक हैं, अतः उनका क्रम ही सम्भव नहीं है, फिर शब्दों का क्रम शब्दबोध का अङ्ग कैसे होगा? ( उ ० ) १ नहीं, ऐसी बात नहीं है, क्योंकि वर्ण उत्पत्तिशील हैं, और अव्याप्यवृत्ति हैं ( अर्थात् आकाश में किसी प्रदेश में रहते हैं, अपने आश्रयीभूत कहीं और किसी प्रदेश में नहीं ) अतः उनमें कालिक और दैशिक दोनों ही प्रकार के क्रम हो सकते हैं । यह जो कहा गया था कि ( प्र ० ) पद या वाक्य घटक प्रत्येक वर्ण में अर्थ-बोध की हेतुता मानने से अवशिष्ट वर्गों का प्रयोग व्यर्थ हो जाएगा, एवं वर्णों के समुदाय में अर्थबोध की जनकता सम्भव नहीं है क्योंकि सभी वर्णों की कहीं एकत्र स्थिति ही सम्भव नहीं है फिर उनका समुदाय हो कैसा? इस प्रकार वर्णन प्रत्येकशः ही अर्थबोध के कारण हो सकते हैं, न समूहापन्न होकर ही ( अत: स्फोट हो अर्थबोध १. यहाँ मुद्रित स्थायकन्दली पुस्तक का पाठ कुछ अशुद्ध और व्यत्यस्त मालूम पड़ता है । ' एवं प्राप्तेऽभिधीयते ' इत्यादि वाक्यों से स्फोट का खण्डन और ' वाक्य से हो अर्थबोध की उत्पत्ति का सिद्धान्त ' उपपादित हुआ है, जिसका उपसंहार ' यावन्तो यादृशाः ' इत्यादि श्लोकात के श्लोक को उद्धृत कर किया गया है । इसके बाद ' सवंगत -त्वात्यित्वाच्च वर्णानां क्रमभाव ' ऐसी पक्ति है । यहीं कुछ त्रुटि मालूम होती है, क्योंकि वर्णों का सर्वगतत्व उनके क्रमभाव का बाधक है, जिसका अनुपद ही ' क्रमो हि पौर्वापर्यम् ' इत्यादि से उपपादन किया और अनित्यत्व ये हो वर्णों के क्रमभाव के गया है । तदनुसार वर्णों का असर्वगतत्व ज्ञापक होंगे । अतः उक्त पक्ति को यदि सिद्धान्तपक्षीय मानें तो ' सर्वगतत्वात् ' इत्यादि पाठ के स्थान पर उसके विरुद्ध ' अनित्यत्वा-दसवंगतत्वाच्च वर्णानां कमलावः ' ऐसा पाठ मानना पड़ेगा । दूसरा उपाय वह है कि उक्त पङ्क्ति को सिद्धान्तपक्षीय न मान कर पूर्वपक्षीय ही मान लें, और उस वाक्य के ' क्रमभाव: ' इस पद को क्रमाभावः ' में परिवर्तित कर दें । तदनुसार " सर्वगतत्वा-नित्यत्वाच्च वर्णानां क्रमाभावः । अत एव " इतने अंश को ' वर्णेषु क्रमो नास्ति ' इस पूर्वपक्षवाक्य के पहिले पाठ करें । एवं ' पावन्तो यादृशा ये च इस श्लोक के नीचे सिद्धान्त पक्ष का ' नदीदीनेत्यादिष्वर्थभेदः क्रमात् इतना ही रक्खें । इनमें द्वितीय पक्ष के अनुसार ही मैंने अनुवाद किया है । 1 For Private And Personal