प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 731–740

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 731–740

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ५५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-प्रशस्तपादभाष्यम् प्रयत्नेन मनश्चक्षुपि स्थायित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युत्स-प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने न्यायकन्दली संस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः, यथा चानेकसंस्काराः संभूय स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्का-रादर्थप्रतीतिरयुक्ता, संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषया-मेव स्मृतिमाधातुमीशते न कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ– संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः । फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धोर्न कल्प्यते ॥ इति । तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभव-राधीयमाना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कार विलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते, के कारण हैं, वर्ण नहीं ) | ( उ ० ) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है । यह ठीक है कि वर्णं चिरस्थायी नहीं हैं ( क्षणित्र हैं ) फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी संस्कार मिलकर पदार्थ षयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि पहिले पहिले वर्ण के संस्कार अथवा पहिले पहिले वर्ण की स्मृति इन दोनों में से किसी एक से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान सकते हैं । अनेक संस्कार के साहाय्य मिलकर एक ही स्मरण को रीति से सम्पादन करते हैं वह रीति द्वित्वनिरूपण के प्रसङ्गमें लिख आये हैं जिस । यदि यह कहना चाहते हों कि( प्र ० ) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी, वह संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकती है, जिससे एक विषयक संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोध रूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी? ( क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्ण विषयक स्मृतिरूप कार्यं ही उत्पन्न हो सकता है ) । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने ' स्फोट-सिद्धि ' नामक ग्रन्थ में कहा है कि संस्कार जिन विषयों की प्रख्या ' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे, उन्हीं विषयों में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं, अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक ' धी ' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । ( उ ० ) किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ( अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का नियम यद्यपि ठीक है तथापि ) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है, वह संस्कार स्मृति के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है, जिस संस्कार में पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है. उस संस्कार के कार्य For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५७ प्रशस्तपादभाष्यम् म्पातदर्शनवदादरप्रत्ययः तमपेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारा-तिशयो जायते । यथा देवहदे राजतसौवर्णपद्मदर्शनादिति । की इच्छावाले पुरुष को विद्युत् सम्पात के देखने की तरह ( उक्त विशेष वस्तु में ) आदरबुद्धि उत्पन्न होती है । इस आदरबुद्धि एवं आत्मा और मन के संयोग, इन दोनों से विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है । जैसे देवताओं के सरोवर में चाँदी और सोने के कमलफूल देखने से ( विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है ) । न्यायकन्दली तथाभूतानामेव तेषां कार्येणाधिगमात् । सन्तु वा भावनारूपाः संस्कारा-तथापि तेषामर्थप्रतिपादनसामर्थ्यमुपपद्यते, तद्भावभावित्वात् । यो हि स्फोट कल्पयति, तेन स्फोटस्यार्थप्रतिपादनशक्तिरपि कल्पनीयेति कल्पनागौरवम् । उभयसिद्धस्य संस्कारस्य सामर्थ्य मात्र कल्पनायां लाघवमस्तीत्येतदेव कल्पयितुमुचितम् । यथोक्तं न्यायवादिभिः-यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं संस्कारस्य व्यवस्थितम् । कार्यान्तरेऽपि सामथ्यं न तस्य प्रतिहन्यते ॥ इति । तदेवं वर्णेभ्य एव संस्कारद्वारेणार्थप्रत्ययसम्भवादयुक्ता स्फोटकल्पनेति । से ऐसा ही निश्चय करना पड़ता है । मान लिया कि वह भावनाख्य संस्कार है ( जिससे सामान्य नियम के अनुसार समानविषयक स्मृति ही हो सकती है ) तथापि पदार्थबोध के साथ उसके अन्वय ( और व्यतिरेक ) से इस संस्कार में अर्थ को प्रतिपादन करने की शक्ति की कल्पना अयुक्त नहीं कही जा सकती । जो कोई स्फोट नाम की अतिरिक्त वस्तु की कल्पना करते हैं, उन्हें उस वस्तु की कल्पना और स्फोट नाम की उस वस्तु में अर्थबोध के सामर्थ्य की कल्पना, ये दो कल्पनायें करनी पड़ती हैं | स्फोट न माननेवाले को वर्ण विषयक संस्कार में अर्थविषयक बोध के सामर्थ्यरूप धर्म की कल्पना करनी पड़ती है, क्योंकि वर्णविषयक संस्कार रूप धर्मी को तो दोनों पक्षों को मानना ही है । अतः लाघव की दृष्टि से भी वर्णों से ही अर्थविषयक बोध का मानना उचित है । जैसा कि न्यायवादियों ( भट्टकुमारिल ने ) कहा है कि " यद्यपि यह निर्णीत है कि संस्कार स्मृति का कारण है, फिर भी उसमें दूसरे कार्य की शक्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता " । तस्मात् वर्णों से ही उनके संस्कार रूप व्यापार के द्वारा अर्थबोध हो सकता है, अतः स्फोट की कल्पना अयुक्त है । ८३ For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार-प्रशस्तपादभाष्यम् स्थितिस्थापकस्तु स्पर्शवद्रव्येषु वर्तमानो घनावयवसन्नि-वेशविशिष्टेषु कालान्तरावस्थायिषु स्वाश्रयमन्यथाकृतं यथावस्थितं स्थापयति । स्थावरजङ्गमविकारेषु धनुःशाखाशृङ्गदन्तास्थिसूत्रवस्त्रा-स्पर्श से युक्त द्रव्यों में रहनेवाले संस्कार का नाम स्थितिस्थापक-संस्कार ' है, जो कालान्तर में भी रहनेवाले एवं अवयवों के कठिन संयोग से उत्पन्न अपने आश्रय द्रव्य को दूसरे प्रकार की स्थिति से अपनी स्वरूप-स्थिति में ले आता है । स्थितिस्थापक संस्कार का यह ( अपने आश्रय को पूर्वस्थिति में ले आने का ) कार्य टेढ़े किये हुए स्थावर या जङ्गम द्रव्यों के न्यायकन्दली आदर प्रत्ययजं संस्कारं दर्शयति - प्रयत्नेनेत्यादिना । आदरः प्रयत्ना-तिशयः, तस्मादपूर्वमर्थं द्रष्टुमिच्छतो यद् विद्युत्सम्पातदर्शनवदर्थदर्शनं तदादर-प्रत्ययः, तमेवापेक्षमाणादात्ममनसोः संयोगात् संस्कारातिशयो जायते, चिरका-लातिक्रमेऽपि तस्यानुच्छेदात् । अत्रोदाहरणम् - यथा देवहदे इत्यादि । देव-दे चैत्रमासस्य चित्रानक्षत्रसंयुक्तायां पौर्णमास्यामर्धरात्रे राजतानि सौवर्णानि च पद्मानि दृश्यन्त इति वार्तामवगम्य तस्यां तिथौ दिदृक्षया मिलितानां सन्निधीयमानेऽर्धरात्रे प्रयत्नातिशयाच्चक्षुषि मन: स्थापयित्वा स्थितानामुत्थि कालान्तरेऽपि तेषु पद्मेषु क्षणमात्रदर्शनादादरप्रत्ययात् संस्कारातिशयः स्फुटतरस्मृतिहेतुरुपजायते । स्थितिस्थापकं कथयतिस्थितिस्थापक स्त्विति । अस्पर्शव द्रव्य-वृत्तेर्भावनाख्यात् संस्कारात् स्पर्शवद्द्रव्यवृत्तित्वेन स्थितिस्थापकस्य विशेष-' प्रयत्नेन ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' आदरप्रत्यय ' से उत्पन्न होनेवाले संस्कार का निरूपण करते हैं । प्रकृत में ' आदर ' शब्द का अर्थ है विशेष प्रकार का प्रयत्न । इस आदर के द्वारा अपूर्व वस्तु को देखने की इच्छा से युक्त पुरुष को गिरती हुई बिजली को देखने की तरह जिस वस्तु का ज्ञान हो, वह ज्ञान ही ' आदर प्रत्यय ' है । इसके साहाय्य से ही आत्मा और मन के संयोग से वह विशेष प्रकार का संस्कार उत्पन्न होता है, जो चिरकाल तक विनष्ट नहीं होता । इसी का उदाहरण ' यथा देवह्रदे ' इत्यादि से दिखलाया गया है । ' चैत्र पूर्णिमा की आधी रात को यदि चित्रा नक्षत्र पड़ता है, तो उस समय देवहद में चाँदी और सोने के कमल दीख पड़ते हैं ' यह सुनकर उन कमलों को देखने के लिए उस रात को उस समय विशेष प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर जो देवहद के किनारे खड़ा रहता है, वह यदि एक क्षण भर भी उन कमलों को देख लेता है, फिर भी उसका यह देखना यतः ' आदरप्रत्यय ' है, अतः इससे होनेवाला संस्कार चिरकाल में भी स्मृति को उत्पन्न कर सकता है । ' स्थितिस्थापकस्तु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' स्थितिस्थापक ' संस्कार का निरूपण करते हैं । भावना नाम के संस्कार के आश्रय में स्पर्श नहीं है और स्थितिस्थापक For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६५६ दिषु भुग्न संवर्तितेषु स्थितिस्थापकस्य कार्य संलक्ष्यते । नित्यानित्यत्व-निष्पत्तयो s स्यापि गुरुत्ववत् । कार्यरूप धनुष, शाखा, शृङ्ग, दाँत, अस्थि, सूत्र एवं वस्त्र प्रभृति वस्तुओं को सीधा होने पर लक्षित होता है । गुरुत्व के सदृश ही इसके नित्यत्व और अनित्यत्व के प्रसङ्ग में भी जानना चाहिए । न्यायकन्दली माख्यातुं तुशब्दः । ये घना निविडा अवयवसन्निवेशा: तैर्विशिष्टेषु स्पर्शवत्सु द्रव्येषु वर्तमानः स्थितिस्थापकः स्वाश्रयमन्यथाकृतमवनामितं यथावत् स्थापयति पूर्ववदृजुं करोति । ये प्रत्यक्षतोऽनुपलम्भात् स्थितिस्थापकस्याभावमिच्छन्ति तान् प्रति तस्य कार्येण सद्भावं दर्शयन्नाह - स्थावरजङ्गमविकारेष्विति । भुग्नाः कुब्जीकृताः संवर्तताः पूर्वावस्थां प्रापिताः, भुग्नाश्च ते संवर्तिताश्चेति भुग्न संवतिता:, तेषु स्थितिस्थापकस्य कार्यं लक्ष्यते । किमुक्तं स्यात्? धनु: -शाखादिष्ववनामितविमुक्तेषु यत् पूर्वावस्थाप्राप्तिहेतोराद्यस्य कर्मणः एकार्थ-समवेतसमवायिकारणं स स्थितिस्थापकः संस्कारः, अन्यस्यासम्भवात् । अन्ये तु भुग्नसंवर्तितेष्विति सूत्रवस्त्रादिष्विति अस्येदं विशेषणमिति मन्यमाना भुग्नानि संस्कार स्पर्श से युक्त द्रव्यों का गुण है, आश्रयों के ( अस्पर्शवत्व और स्पर्शवत्त्व ) इन दोनों अन्तर के द्वारा दोनों संस्कारों में अन्तर दिखलाने के लिए प्रकृत सन्दर्भ में ' तु ' शब्द का प्रयोग किया गया है । अवयवों के ' घन ' अर्थात् कठिन संनिवेशयुक्त स्पर्शवाले द्रव्य में विद्यमान ' स्थितिस्थापक ' संस्कार ' अन्यथा कृत ' अर्थात् नमाये हुए अपने आश्रयभूत द्रव्य को ' यथावत्स्थापन ' अर्थात् पहिले की तरह सीधा कर देता है । जो समुदाय प्रत्यक्ष न होने के कारण ' स्थितिस्थापक ' संस्कार को मानना ही नहीं चाहते, उन्हें कार्यहेतुक अनुमान के द्वारा स्थितिस्थापक संस्कार की सत्ता को समझाने के लिए ही ‘ स्थावरजङ्गमविकारेषु ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । ' भुग्न ' शब्द का अर्थ है टेढ़ा किया हुआ ( तिय्र्यक्कृत ), और संवत्तित ' शब्द का अर्थ है पहिली अवस्था को प्राप्त । प्रकृत सन्दर्भ का भुग्न संवत्तितेषु ' पद ' भुग्नाश्च ते संवत्तिताश्च भुग्न-संवत्तिताः तेषु ' इस प्रकार के समास से निष्पन्न है । इस शब्द के द्वारा स्थितिस्थापक संस्कार से उत्पन्न कार्य दिखलाये गये हैं । इससे फलितार्थ क्या निकला? यही कि धनुष या वृक्ष की डॉल प्रभृति जब अवनमित होकर फिर जिन क्रियाओं के द्वारा पहिली अवस्था को प्राप्त होते हैं, उन क्रियाओं में से पहिली क्रिया का असमवायिकारण एवं उस क्रिया के साथ ( उसके आश्रय रूप ) एक अर्थ में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला संस्कार ही स्थितिस्थापक संस्कार ' है । क्योंकि अवनमित शाखादि की पुन: पूर्वावस्था की प्राप्ति का कोई दूसरा कारण नहीं हो सकता । कुछ अन्य लोग इस सन्दर्भ के ' भुग्न संवत्ततेषु ' इस पद को इसी सन्दर्भ के ' सूत्रवस्त्रादिषु ' इसका विशेषण For Private And Personal

पृष्ठ 735

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्मं-प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मः पुरुषगुणः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः, अतीन्द्रि योऽन्त्य सुखसंविज्ञानविरोधी पुरुषान्तःकरणसंयोग विशुद्धाभिसन्धिजः, वर्णाश्रमिणां प्रतिनियतसाधन निमित्तः । तस्य तु साधनानि श्रति-वर्णाश्रमिणां सामान्यविशेषभावेनावस्थितानि स्मृतिविहितानि द्रव्यगुणकर्माणि । धर्म पुरुष ( जीवात्मा ) का गुण है । वह अपने उत्पादक जीव के प्रिय हित और मोक्ष का कारण है, एवं अतीन्द्रिय है । अन्तिम सुख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से इसका नाश होता है । पुरुष और अन्तःकरण ( मन ) के संयोग और संकल्प इन दोनों से इसकी उत्पत्ति होती है । वर्णों और आश्रमियों के लिए विहित कर्म ( भी ) उसके साधन हैं । वेद एवं धर्मशास्त्रादि ग्रन्थों में वर्णों और आश्रमियों के साधारण धर्मों और विशेषधर्मों के साधन के लिए कहे गये द्रव्य, गुण और कर्म भी इसके कारण हैं । न्यायकन्दली यानि सूत्रादीनि संवर्तितानि तेष्विति व्याचक्षते । तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरुत्ववत् । यथा गुरुत्वं परमाणुषु नित्यं कार्येष्वनित्यं कारणगुणपूर्वकं च, तथा स्थितिस्थापकोऽपीत्यर्थः । धर्मः पुरुषेति । यो धर्मः, स पुरुषस्य गुणो न कर्मसामर्थ्यमित्यर्थः । कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः । प्रियं सुखम्, हितं सुखसाधनम्, मोक्षो नवानामात्मवि-शेषगुणानामत्यन्तोच्छेदस्तेषां हेतुः । कर्तुः प्रियादीनामेव यो हेतु: स धर्म मानते हैं, ( तदनुसार इस वाक्य का ऐसा अर्थ करते हैं ) कि संवतित जो सूत्रादि, उनमें रहनेवाला संस्कार ही ' स्थितिस्थापक संस्कार ' है । ' तस्य नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयो गुरु-त्वत् ' अर्थात् जैसे कि परमाणुओं में रहनेवाला गुरुत्व नित्य है, एवं कार्यद्रव्यों में रहनेवाला गुरुत्व अनित्य है, उसी प्रकार ' स्थितिस्थापक संस्कार ' को भी समझमा चाहिए । ( अर्थात् परमाणुओं में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार नित्य है, एवं कार्यद्रव्यों में रहने-वाला अनित्य ) । ' धर्मः पुरुषेति ' । अर्थात् धर्म ( नाम का ) जो गुण है वह ' पुरुष ' का अर्थात् जीव का ही गुण है, ( ज्योतिष्टोमादि ) क्रियाओं का शक्तिरूप नहीं है । ' कर्तुः प्रियहितमोक्षहेतुः ' ( इस वाक्य में प्रयुक्त ) प्रिय शब्द का अर्थ है सुख, ' हित ' शब्द सुख के साधनों को समझाने के लिए लिखा गया है, एवं ' मोक्ष ' शब्द जीव के बुद्धि प्रभृति नो विशेषगुणों का अत्यन्त विनाश रूप अर्थ का बोधक है । इन सबों का हेतु ( ही ' धर्म ' है ) । ' कर्तुः For Private And Personal

पृष्ठ 736

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६६१ इति व्याख्येयम् । न तु कर्तुरेव यः प्रियादिहेतुः स धर्म इति व्याख्या, पुत्रेण कृतस्य श्राद्धस्य पितृगामितृप्तिफलश्रवणात् । वृष्टिकामेन कार्यं कृतायां तद-न्यस्यापि समोपदेशवर्तिनो वृष्टिफलसम्बन्धदर्शनात् । स्वर्गकामो यजेतेत्यादिवाक्ये यागेन स्वर्गं कुर्यादिति कर्मणः श्रेयः-साधनत्वं श्रूयते । यश्च निःश्रयसेन पुरुषं संयुनक्ति स धर्मः, तस्माद् यागादिक-मेव धर्मः, न पुरुषगुणः । तथा हि, यो यागमनुतिष्ठति तं धार्मिकमित्याचक्षते । एतदयुक्तम् । क्षणिकस्य कर्मणः कालान्तरभाविफलसाधनत्वासम्बन्धात् । अथोच्यते । क्षणिकं कर्म, कालान्तरभावि च स्वर्गफलम्, विनष्टाच्च कारणात् कार्यस्यानुत्पत्तिः श्रुतं च यागादेः कारणत्वम्, तदेतदन्यथानुपपत्त्या फलोत्पत्त्यनुगुणं किमपि कालान्तरावस्थायि कर्मसामर्थ्यं कल्प्यते यद्द्द्वारेण कर्मणां श्रुता फलसाधनता निर्वहति । तच्च प्रमाणान्तरागोचरत्वादपूर्वमिति व्यपदिश्यते । प्रियहितमोक्ष हेतु: ' इस वाक्य की व्याख्या इस रीति करनी चाहिए कि ( धर्मजनक क्रियाओं के ) कर्ता के ' प्रियादि ' का जो हेतु वही ' धर्म ' है । इस प्रकार की व्याख्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पुत्र के द्वारा अनुष्ठित श्राद्धरूप क्रिया से पिता में ही प्रीतिरूप फल का होना शास्त्रों में उपलब्ध होता है । एवं वृष्टि की कामना से ' कारीरी ' नाम के याग के अनुष्ठान से जो वृष्टिरूप फल उत्पन्न होता है, उससे याग करनेवाले और उनके समीप के और लोग भी प्रीति का लाभ करते हैं । ( प्र ) ' स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि वाक्यों से याग ' के द्वारा स्वर्ग का सम्पादन करना चाहिए ' इस प्रकार यागादि श्रेय कर्म ही स्वर्गादि इष्टों के साधक के रूप में सुने जाते हैं । ' धर्म ' उसी का नाम है जो पुरुष को श्रेयस के साथ सम्बद्ध करे । तस्मात् यागादि कर्म ही धर्म हैं, धर्म जीव का गुण नहीं है । एवं जो यागादि कर्मों का अनुष्ठान करता है उसे ही लोग ' धार्मिक ' कहते भी हैं । ( उ ० ) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है । क्योंकि कर्म क्षण भर ही रहते हैं, उनसे बहुत काल बाद होनेवाले स्वर्गादि का सम्पादन सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) यागादि क्रियायें क्षणिक हैं । उनके स्वर्गादि फल उनसे बहुत समय बाद होते हैं । यह भी निर्णीत है कि विनाश को प्राप्त हुए कारणों से कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है । फिर भी यागादि क्रियाओं में स्वर्गादि फलों को हेतुता वेदों से श्रुत है । किन्तु यह हेतुता तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक की यागादि के बाद और स्वर्गादि की उत्पत्ति से पहिले तक रहनेवाले किसी व्यापार की कल्पना न कर लें, जिससे यागादि में वेदों के द्वारा श्रुत स्वर्गादि जनकता का निर्वाह हो सके । वही व्यापार और किसी प्रमाण के द्वारा गम्य न होने के कारण ' अपूर्व ' कहलाता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६२ यथोक्तम्-न्यायकन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली

[ गुणनिरूपणे धर्म-फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने ।

तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥

अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवैति, शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य सामर्थ्यस्यावस्थानासंभवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानी -मनागतमेव, न शक्तेराश्रयो भवितुमर्हति । यदि त्वनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गी भवति? अपूर्वकल्पनावैयर्थ्यम्, तदुपभोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादि-विरहादननुभवश्चेत्? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभाव-त्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनेयम् । तस्मान्न फलाश्रय-मपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च कार्यम-नाधारं नोपपद्यते, तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्यनुज्ञेया । तथा सति न तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात्, अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यस्याप्यन्यसमवेता शक्तिरिष्यते, तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत्? ( उ ० जैसा कहा गया है कि ' बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है, वह विधान तब तक उपपन्न नही हो सकता, जब तक कि ' अपूर्व ' की कल्पना न कर ली जाय । अतः ' अपूर्व ' की कल्पना करते हैं । ) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्य रूप अपूर्वं ( जिसे स्वर्गसाधत पर्यन्त रहना है ) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता, क्योंकि क्षणिक । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व ( स्वर्गोत्पादन पर्यन्त ) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के आश्रय नहीं हो सकते, क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ में ही रहते हैं । यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरंत बाद ही स्वर्गादि को उत्पत्ति ( आश्रय को उपपन्न करने के लिए ) मानें, तो उनका उपयोग भी ( उसी समय ) मानना पड़ेगा । यदि ऐसा कहें कि उस समय ( यागादि के अनुष्ठान के तुरंत बाद ) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं इसी से स्वर्ग की उत्पत्ति नही होती है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही नहीं होते, क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं । यह कल्पना अभूतपूर्व होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है, किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है । यह भी सम्भव नहीं है कि ( पुरुष से भिन्न ) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके आश्रय हों, क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना आश्रय के ही हो, क्योंकि वह भावरूप कार्य है | अतः अपूर्व को यदि मानना है, तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा कहें कि ( प्र ० ) हम यह भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है, जो समवाय सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे, क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 738 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] यथोक्तम् -भाषांनुवादसहितम् न्यायकन्दली ६६३ शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैवोपलभ्यते । तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति । तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनक त्वानुपलम्भादेव । तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके - " तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति " यागेनाहितत्वादपूर्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः, अपूर्वो-पकृतात् कर्मणः फलानुत्पत्तेः तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावस्था-दिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलस्योत्पत्तेरपूर्वमेव श्रेयः साघनम् । कारणत्व-श्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि यागादौ धर्मव्यपदेश:, सोऽप्य-पूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः । स्वर्गसाधने हि चोदि-तस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्दनादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात्, तदभावे चाप्रयोगात्, प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः, लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है । जैसा कहा गया है कि " कार्यरूप हेतु से अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी, उसी में उसकी सत्ता माननी पड़ेगी " अतः उस कारण को शक्ति उसी कारण में ही रहेगी, कभी उससे भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती । ( उ ० ) किन्तु यह भी अयुक्त ही हैं, क्योंकि शक्ति के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है कि " उससे ( याग से ) जिस लिए कि ' उसका ' अपूर्व का आधान होता है, अतः ' अपूर्व ' याग की शक्ति कहलाती है " । क्योंकि याग से ' आहित ' अर्थात् उत्पन्न होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है । अपूर्व याग की शक्ति नहीं है, क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है, और इस उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है ( क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के अव्यवहित पूर्व क्षण में याग की सत्ता ही नहीं है, फिर अपूर्व किसका साहाय्य करेगा? ) 1 तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसे उपयुक्त देश कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है । अतः प्रमाण के द्वारा इसी पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है । यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है वह हेतुता ' अपूर्व का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं, इसी अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि ' धर्म पुरुष काही गुण है ' । यागादि क्रियाओं में जो ' धर्म ' शब्द का व्यवहार होता है, उसे अपूर्व या धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए । जैसे कि प्रीति के चन्दन-For Private And Personal

पृष्ठ 739

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशास्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपणे धर्म-यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि तस्मात् प्रीति-साधनप्रतीत्युत्पत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षणया तत्साधने प्रयोगः, एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्ति-कल्पनानवकाशादिति तार्किकाणां प्रक्रिया | अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः । अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी, न च निर्हेतुको विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम्, तस्य यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः, कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य भागशो नाशः सम्भाव्यते, तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते । येतु वनितादि साधनों में ' स्वर्ग ' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साघनीभूत अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित व्यवहार होता है, वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है तभी ' स्वर्ग ' शब्द का प्रयोग होता है, जब जिसे उन साधनों से सुख नहीं मिलता है, तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग नहीं होता । अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द लाक्षणिक है, और प्रीति में हो उसकी अभिधा शक्ति है । क्योंकि प्रोति और उसके साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द को अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है । क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप उसके मुख्यार्थं का और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थं दोनों के बोध की उपपत्ति हो जाएगी । अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टो-मादि, दोनों में धर्म शब्द की अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यहीं तार्किक लोगों की रीति है । ' अतीन्द्रियः ' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी इन्द्रिय से नहीं देख सकता, अतः धर्म अतीन्द्रिय ' है । ' अन्त्यसुखसं विज्ञान विरोधी ' धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः वह विनाशशील भी है । किन्तु कोई भी विनाश बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति से पहिले तक उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी । ( यदि किसी भी उपभोग से धर्मं का विनाश मानें तो ) किसी किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है, अतः उनमें पहिले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा, आगे उससे उपभोग हों रुक जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग का विनाश हो ( और अवशिष्ट भाग बचा रहे ), तस्मात् अन्तिम सुख हो धर्म का नाशक For Private And Personal

पृष्ठ 740

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 740 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६६५ नित्यं धर्ममास्तेषां प्रायेणानुपपत्तिः, धर्माधर्मक्षयाभावात् । पुरुषान्तःकरणेति । आत्मविशेषगुणत्वात् सुखादिवत् । विशुद्धेति । विशुद्धोऽभिसन्धिः दम्भादिरहितः संकल्पविशेषः, तस्माद्धर्मो जायते । वर्णाश्रमिणामिति । वर्णा ब्राह्मण-क्षत्रियविट्शूद्राः । आश्रमिणो ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतयः । तेषां धर्मः प्रतिवर्णं प्रत्याश्रमं चाधिकृत्य विहितः साधनैर्जन्यत इत्यर्थः । अतीन्द्रियस्य धर्मस्य साधनानि कुतः प्रत्येतव्यानि तत्राह-तस्य त्विति । विशिष्टेनानुष्ठानेनाचार्य मुखाच्छ्रयत एव न लिखित्वा गृह्यत इति श्रुतिवेदः, स्मृतिर्मन्वादिवाक्यम्, ताभ्यां विहितानि प्रतिपादितानि वर्णाश्र मिणां सामान्यविशेषभावेनावस्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि सामान्यानि धर्मसा-धनानि । तत्र सर्वेषां वर्णाश्रमिणां च सामान्यरूपतया धर्मसाधनानि कथ्यन्ते । धर्मे श्रद्धा धर्मे मनःप्रसादः । अहिंसा भूतानामनभिद्रोहसंकल्पः । प्रतिषिद्धस्याभिद्रोहस्य निवृत्तेरधर्मो न भवति, न धर्मो जायते । अनभि-है ( अवान्तर सुख नहीं ) संविज्ञान अर्थात् सम्यग् विज्ञान ( तत्त्वज्ञान ) से भी धर्म का नाश होता है । जो कोई धर्म को नित्य मानते हैं, उनके मत में मोक्ष को उत्पत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि उसके लिए धर्म और अधर्म दोनों ही का विनाश आवश्यक है, जो धर्म को नित्य मानने से सम्भव नहीं है । ' पुरुषान्तःकरणेति ' ( धर्म पुरुष और अन्तःकरण के संयोग से उत्पन्न होता है क्योंकि ) वह भी सुखादि की तरह आत्मा का विशेषगुण है । विशुद्धेति ' विशुद्ध जो अभिसन्धि अर्थात् दम्भादि से रहित जो विशेष प्रकार का संकल्प, उससे धर्म की उत्पत्ति होती है । ' वर्णाश्रमिणामिति ' ' वर्ण ' शब्द से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र अभिप्रेत हैं । ' आश्रमी ' हैं-- ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वान-प्रस्थी और संन्यासी । अर्थात् इन सबों के तथ्यतः प्रत्येक वर्ण के मनुष्यों के लिए एवं प्रत्येक आश्रम के मनुष्यों के लिए शास्त्रों में विहित जो साधन हैं, उनसे धर्म की उत्पत्ति होती है । धर्म तो अतीन्द्रिय है, फिर उसके कारणों का ज्ञान कैसे होगा? इसी प्रश्न का उत्तर ' तस्य तु ' इत्यादि से दिया गया है । विहित विशेष प्रकार के अनुष्ठान से आचार्य के मुख से जिसे सुना ही जाता है, अर्थात् जिसका लिप्यादि से ज्ञान नहीं होता, वही है ' श्रुति ' अर्थात् वेद । ' स्मृति ' शब्द से मन्वादि ऋषियों के वाक्य अभि-प्रेत हैं । श्रुति और स्मृति इन दोनों से ' विहित ' अर्थात् प्रतिपादित जो सभी वर्णों और सभी आश्रमवाले पुरुषों के लिए सामान्यभाव और विशेषभाव से स्थित द्रव्य, गुण और क्रिया, वे सभी धर्म के सामान्यसाधन हैं । इनमें सभी वर्णों और सभी आश्रमियों के लिए समान रूप से जो धर्म के साधन हैं, उनका निरूपण ' धर्मे श्रद्धा ' इत्यादि से करते हैं । धर्म के प्रसङ्ग में चित्त की प्रसन्नता ही धर्म में श्रद्धा है । सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न करने का संकल्प अहिंसा हैं । जो द्रोह निषिद्ध हैं, उस द्रोह के न करने से इतना ही होता है कि ' अधर्म ' नहीं होता । किन्तु उससे धर्म की उत्पत्ति नहीं होती For Private And Personal