प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 741–750

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 741–750

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-प्रशस्तपादभाष्यम् तत्र सामान्यानि - धर्मे श्रद्धा, अहिंसा, भूतहितत्वम्, सत्यवचनम्, अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम् अनुपधा, कोधवर्जनमभिषेचनम्, शुचिद्रव्य सेवनम् विशिष्टदेवताभक्तिरुपवासोऽप्रमादश्च । उन ( सामान्यधर्मों के और विशेषधर्मों के साधनों ) में धर्म में श्रद्धा, अहिंसा, प्राणियों का उपकार, सत्यवचन, अस्तेय ( दूसरे की वस्तु को विना उसकी आज्ञा के न लेना ) ब्रह्मचर्य, दूसरे को ठगने की अनिच्छा ( अनुपधा ) अक्रोध, स्नान, पवित्रवस्तुओं का सेवन, इष्ट देवता में भक्ति, उपवास और अप्रमाद ये ( १३ ) सभी वर्णों और सभी आश्रमियों क लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली द्रोहसंकल्पस्य विहितत्वात् स्यादेव धर्मसाधनम् । भूतहितत्वं भूतानामनुग्रहः । सत्यवचनं यथार्थवचनम् । अस्तेयमशास्त्रपूर्वकं परस्वग्रहणं मया न कर्तव्य-मिति संकल्पः, न तु परस्वादाननिवृत्तिमात्रमभावरूपम् । ब्रह्मचर्यम् स्त्रीसेवा-परिवर्जनम् । एतदपि संकल्परूपम् । अनुपधा भावशुद्धिः, विशुद्धेनाभिप्रायेण कृतानां कर्मणां धर्मसाधनत्वात् । क्रोधवर्जनं क्रोधपरित्यागः, सोऽपि संकल्पात्मक एव । अभिषेचनं स्नानम् । शुचिद्रव्यसेवनं शुचीनां तिलादिद्रव्याणां क्वचित् पर्वणि नियमेन सेवनं धर्मसाधनम् । विशिष्टदेवताभक्ति: त्रयीसंमतायां देवतायां भक्तिरित्यर्थः । उपवास एकादश्यादिभोजननिवृत्तिसंकल्पः । अप्रमादो नित्य-नैमित्तिकानां कर्मणामवश्यम्भावेन करणम् । एतानि सर्वेषामेव समानानि है । द्रोह न करने का कथित जो संकल्प है उससे अवश्य ही धर्म उत्पन्न होगा. क्योंकि उसका विधान किया गया है । ' भूतहितत्व ' शब्द से प्राणियों के प्रति अनुग्रह अभीष्ट है । ' सत्यवचन ' शब्द का अर्थ है सच बोलना । ' दूसरे व्यक्ति के जिस धन क लेना शास्त्र में विहित नहीं है, वह घन मुझे नहीं लेना चाहिए ' इस प्रकार का संकल्प ही ' अस्तेय ' है । अस्तेय शब्दसे ' दूसरे के धन का न लेना ' केवल यह अभावरूप अर्थ नहीं है । ' ब्रह्मचर्य्य ' शब्द का अर्थ हैं, ' स्त्री से उपभोगसम्बन्ध का परित्याग ' यह भी संकल्प रूप ही है । ' अनुपधा ' शब्द से ' अभिप्रायशुद्धि ' अभीष्ट है, यतः विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अनुष्ठित कर्म ही धर्म के कारण हैं । ' क्रोधवर्ज । ' है क्रोध का परित्याग, यह भी संकल्प रूप ही है । ' अभिषेचन ' है स्नान | ' शुचिद्रव्य का सेवन ' अर्थात् किसी विशेष पर्व में तिल प्रभृति पवित्र द्रव्यों का सेवन धर्म का कारण है । ' विशिष्टदेवता में भक्ति ' अर्थात् तीनों वेदों के द्वारा प्रतिपादित किसी देवता में भक्ति । ' उपवास ' शब्द से एकादशी प्रभृति विशेष तिथियों में भोजन न करने का संकल्प अभिप्रत है । ' अप्रमाद ' शब्द का अर्थ है, ' नित्य एवं नेमित्तिक कर्मो का अवश्य अनुष्ठान करना ' ये सभी वर्णों और सभी आश्रमों के व्यक्तियों के लिए धर्म के साधन हैं । ' इज्या ' शब्द For Private And Personal

पृष्ठ 742

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामिज्याध्ययनदानानि ब्राह्मणस्य विशिष्टानि ६६७ प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि, स्वर्ण-विहिताश्च संस्काराः । यज्ञ वेदों का अध्ययन, और दान ये तीन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ( द्विजों ) इन तीनों वर्णों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं । प्रतिग्रह, अध्यापन ( वेदों का पढ़ाना ) यज्ञ कराना ( याजन ) अपने वर्ण ( ब्राह्मण ) के लिए विहित संस्कार, ये सभी ब्राह्मणों के लिए विशेषधर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली धर्मसाधनानि । इज्या यागहोमानुष्ठानम् । अध्ययनं वेदपाठः । दानं स्वद्रव्यस्य परस्वत्वापत्ति संकल्पविशेषः । शूद्रस्यापि दानमस्त्येव तेन यज्ञादिषु यद्दानं तदभि-प्रायेणेदं त्रैवर्णिकानां विशिष्टं धर्मसाधनमुक्तम् । ब्राह्मणस्य विशिष्टान्यसाधारणानि धर्मसाधनानि प्रतिपादयति-प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि । प्रतिग्रहो विशिष्टाद् द्रव्यग्रहणम् । अध्यापनं तु प्रसिद्धमेव । याजनमात्विज्यम् । एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभि-रेवोपायैरजितानां द्रव्याणां धर्माधिकारात् । स्ववर्णविहिताश्चाष्टचत्वारिं-शत् संस्काराः वैदिककर्मानुष्ठानयोग्यतापादनद्वारेण ब्राह्मणस्य धर्मसाधनम् । से याग एवं होम का अनुष्ठान समझना चाहिए । ' अध्ययन ' शब्द का अर्थ है वेदों का पाठ । ' दान ' शब्द से वह विशेष प्रकार का संकल्प अभीष्ट है, जिससे अपने स्वत्ववाले न में दूसरे के स्वत्व की उत्पत्ति हो सके । यज्ञादि में जो दान किये जाते हैं, यहाँ उन्हीं दानों को समझना चाहिए, यदि ऐसी बात न हो, किन्तु दान शब्द से सामान्यतः सभी दान अभीष्ट हों ( तो फिर ) वणिकों के लिए निर्दिष्ट विशेष धर्मो में इसकी गणना असङ्गत हो जाएगी, क्योंकि केवल दान तो शूद्रों के लिए भी धर्म का साधन है ही । ब्राह्मणों के ' विशिष्ट ' अर्थात् असाधारण धर्म के जो साधन हैं ( अर्थात् जो साधन केवल ब्राह्मणों में ही धर्म का उत्पादन कर सकते हैं ) उनका प्रतिपादन प्रति-ग्रहाध्यापनयाजनानि इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विहित एवं विशेष व्यक्ति से दान का ग्रहण ही ' प्रतिग्रह ' शब्द से लेना चाहिए । अध्यापन शब्द का अर्थ प्रसिद्ध हो है । याजन ' शब्द का अर्थ है ऋत्विक् का कार्य करना । ' एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि ' ब्राह्मणों को इन्हीं उपायों से प्राप्त धन के द्वारा धर्म सम्पादन का अधिकार है । ' स्ववर्ण विहिताश्च संस्कारा: ' अर्थात् ब्राह्मणों के लिए विहित अड़तालिस प्रकार के संस्कार भी उनमें वेदों से निद्दिष्ट अनुष्ठान करने की योग्यता सम्पादन के द्वारा धर्म के माधन है । For Private And Personal

पृष्ठ 743

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६८ न्याय कन्दली संचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-क्षत्रियस्य सम्यक् प्रजापालनमसाधुनिग्रहो युद्धेष्वनिवर्त्तनं स्व-कीयाश्च संस्काराः । वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि स्वकीयाश्च संस्काराः । अच्छी तरह प्रजा का पालन करना, दुष्टों का दमन, युद्ध से न लौटना ( अनिवृत्ति ) और अपने ( क्षत्रियों ) के लिए शास्त्रों में विहित संस्कार ये सभी क्षत्रियों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं । खरीद, बिक्री, खेती करना, पशुओं का पालन, अपने ( वैश्यों के ) लिए शास्त्रों के द्वारा विहित संस्कार ये सभी वैश्यों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि । सम्यक् प्रजापालनं न्यायवृ-तीनां प्रजानां परिरक्षणम् । असाधुनिग्रहः, दुष्टानां यथाशास्त्रं शासनम् । युद्धेष्वनिवर्त्तनं युद्धेषु विजयावधिः प्राणावधिर्वा आयुधव्यापारः । स्वकीयाश्च संस्काराः । वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि । मूल्यं दत्त्वा परस्त्राद् द्रव्यग्रहणं क्रयः, मूल्यमादाय परस्य स्वद्रव्यदानं विक्रयः । कृषिः परिकषिताय भूमौ बीजस्य वपनं रोपणं च पशुपालनं गोऽजाविकादिपरिरक्षणम् । एतानि वैश्यस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभिरेवोपायैरजितानां धनानां धर्माङ्गत्वात् । शूद्रस्य पूर्वेषु वर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रिया धर्मसाधनम् । ' क्षत्रियस्य विशिष्ट नि धर्मसाधनानि ' | ' सम्यकं प्रजापालन ' अर्थात् उचित न्याय की रीति से चलनेवाली प्रजाओं का पालना करना, ' असाधुनिग्रह ' अर्थात् शास्त्रों में कही गयी रीति के अनुसार दुष्टों को दण्ड देना, युद्धेष्वनिवर्त्तनम् ' अर्थात् जब तक विजय प्राप्त न हो जाय, था जब तक प्राण रहे तब तक अस्त्र शस्त्रों को चलाते रहना, एवं क्षत्रियों के लिए विहित संस्कार, य सभी क्षत्रियों के लिए धर्म कं साधन है । ' वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि ' । मूल्य देकर कहलाता है । मूल्य लेकर दूसरे को अपना द्रव्य देना ही में बीजों को बोना या रोपना ही ' कृषि ' है । गाय बकरी पालन ' है । ये सभी वैश्यों के लिए ही धर्म के साधन हैं । वैश्यों के धर्म के साधक हैं । दूसरों से द्रव्य लेना ' क्रय ' ' विक्रय है । जोती हुई भूमि प्रभृति को पालना ही पशु-इन्हीं उपायों से प्राप्त धन ' शूद्रस्य पूर्ववर्णेषु परतन्त्र्यममन्त्रिकारच क्रियाः ' अर्थात् पहिले कहे हुए ब्राह्मणादि वर्णों की अधीनता, बिना मन्त्र के ही विवाहादि क्रियाओं के अनुष्ठान प्रभृति ही शूद्रों के धर्म के साधन हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 744

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 744 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६६६ शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्य ममन्त्रिकाश्च क्रियाः । आश्रमिणां तु ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः स्वशास्त्र-गुरुशुश्रूषाग्नीन्धनमैक्ष्याचरणानि मधुमांसदिवास्वप्नाञ्ज विहितानि नाभ्यञ्जनादिवर्जनं च । कथित तीनों वर्णों की पराधीनता, एवं बिना मन्त्र की क्रिया, ये शूद्रों के विशेष धर्म के सावन हैं । आश्रमियों में गुरुकुलनिवासी ब्रह्मचारियों के लिए शास्त्रों में विहित गुरु और अग्नि की सेवा, ( होम के लिए ) लकड़ी लाना, भिक्षा माँगना, एवं मधु, मांस, दिन की निद्रा, अञ्जन और अभ्यङ्ग ( मालिश ), इन सबों को छोड़ना ( ये सभी ) उनक विशेष ( असाधारण ) धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली आश्रमिणां तु धर्मसाधनमुच्यते । ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिन इति । उपनीय यः शिष्यं साङ्गं सरहस्यं च वेदमध्यापयति स गुरुः, तस्य कुले गृहे वसनशीलस्य ब्रह्मचारिणः स्वशास्त्रविहितानि ब्रह्मचारिणमधिकृत्य शास्त्रेण विहितानि । गुरुशुश्रूषा गुरोः परिचर्या, गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनं च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि । गुरुशुश्रूषाभक्ष्ययोः करणमेवाचरणम् । अग्नेराचरणम्, प्रत्यहमग्नौ होम:, इन्धनस्याचरणमग्न्यर्थं वनादिन्धनस्याहरणमिति विवेकः । गृहस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-- विद्याव्रतस्नातकस्येति । यो वेदा-' ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब आश्रमियों के धर्मं का साधन कहते हैं । यहाँ ' गुरु ' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को ननझना चाहिए जो शिष्य का उपनयन संस्कार कराकर अङ्गों सहित वेदों के रहस्य को समझावें । ऐसे ' गुरु ' के गृह में सम्पूर्ण अध्ययनकाल तक नियमतः निवास कर अध्ययन करनेवाले ' ब्रह्मचारी ' के लिए ' स्वशास्त्रविहितानि ' अर्थात् विशेषकर ब्रह्मचारी के लिए ही शास्त्रों में विहित ( जो ' गुरुशुश्रूषादि ' ) । ' गुरुशुश्रूषान्नभैक्ष्याचरणानि ' यह वाक्य ' गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनञ्च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से सिद्ध है । गुरु की शुश्रूषा ( सेवा ) करना ही गुरुशुश्रूषा का आचरण है । भिक्षा माँगना हो भिक्षाचरण है । प्रतिदिन अग्नि में होम करना ही अग्नि का आचरण है । होम के लिए वन से लकड़ी लाना ही इन्धनाचरण है । इस प्रकार का विभाग प्रकृत में जानना चाहिए । ' विद्याव्रतस्नातकस्य ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गृहस्थाश्रमी के लिए जो धर्म के साधन हैं, वे कहे गये हैं । ' विद्याव्रतस्नातक ' शब्द से वे पुरुष अभिप्रेत हैं, जिन्होंने For Private And Personal

पृष्ठ 745

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-प्रशस्तपादभाष्यम् विद्याव्रतस्नातकस्य कृतदारस्य गृहस्थस्य शालीनयायावर-वृत्त्युपार्जितैरथैर्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्माख्ानां पञ्चानां महायज्ञानां सायम्प्रातरनुष्ठानम्; एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानां च नित्यानां शक्तौ विद्यमानायामग्न्याधेयादीनां च हविर्यज्ञसंस्थानामग्निष्टो-मादीनां सोमयज्ञसंस्थानां च । ऋत्वन्तरेषु ब्रह्मचर्यमपत्योत्पादनं च | शालीनवृत्ति एवं यायावरवृत्ति के द्वारा उपार्जित धन से प्रातःकाल और सायंकाल भूतयज्ञ ( काकादि प्राणियों के लिए अन्न उत्सर्ग करना ), मनुष्य-यज्ञ ( अतिथिसेवा ), देवयज्ञ ( होम ), पितृयज्ञ ( नित्यश्राद्ध ), ब्रह्मयज्ञ ( वेद-पाठ ) एवं सामर्थ्य के रहने पर एकाग्निविधान ( विवाह के समय गृहीत अग्नि ) से पाकयज्ञसंस्थाओं ( अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य, आश्वयुज्य प्रभृति ) का अनुष्ठान, अग्निहोत्र एवं विशेष प्रकार के हविर्यज्ञ संस्था के ( दर्श, पौर्ण-मास, चातुर्मास्य एवं आश्रयण प्रभृति ) इष्टियों का, सोमयज्ञ संस्था के अग्निष्टोम रक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र एवं आप्तोर्याम ) यज्ञों का अनुष्ठान एवं ( पत्नी के ) ऋतुकाल से भिन्न समय में ब्रह्मचर्य का पालन एवं पुत्र का उत्पादन, ये सभी विद्याव्रतस्नातक ( वेदाध्ययन के लिए स्वीकार किये गये व्रतों को अध्ययन के समाप्त हो जाने के कारण छोड़ देनेवाले ) विवाहित गृहस्थों के विशेष धर्म के साधन हैं । न्यायकन्दली ध्ययनार्थं गृहीतं व्रतमधीते वेदे विसर्जितवान् स विद्याव्रतस्नातकः, तस्य कृतदारस्य कृतपत्नोपरिग्रहस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरथैर्भूतमनुष्य-देवपितृब्रह्माख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरनुष्ठानम् । यावता धान्येन कुशूलपात्रं कुम्भीपात्रं वा परिपूर्यते, त्र्यहमेकाहं वा वर्तनं भवति, ताव-न्मात्रस्य परेण स्वयमानीयमानस्य श्रद्धया दीयमानस्य यः परिग्रहः सा शालीना वृत्तिः । परस्मादप्रतिग्रहगतश्चक्रमादाय यत् प्रत्यङ्गनं भिक्षाटनं सा यायावरवृत्तिः । ताभ्यामुपाजितैरर्थः पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरपराह्णे चानुष्ठानं वेदाध्ययन का व्रत लिया हो, एवं वेदाध्ययन के सम्पन्न हो जाने पर ही उसकी समाप्ति की हो । वे हो जब ' कृतदार ' हो जाँय अर्थात् विवाह कर लें, ऐसे गृहस्थों के लिए ही जो धर्म के साधन हैं, वे ' शालोमयायादर इत्यादि सन्दर्भ से गिनाये गये हैं । जितने अन्न से एक कुशूलपात्र ( कच्ची मिट्टी की कोठी ) या एक घड़ा भर जाय, अथवा तीन दिनों तक या एक ही दिन का भोजन चल सके, उतने ही अन्न को स्वयं ले आने पर या श्रद्धा-पूर्वक दूसरों के देने पर जो ग्रहण किया जाता है, उस वृत्ति को ' शालीना वृत्ति ' कहते हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 746

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 746 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६७१ गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो देवयज्ञ । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्नि-विधानेन पाकयज्ञसंस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले परिग्रह । तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणा-मष्टकापार्वणीचं त्र्याश्वयुज्यादीनां नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनु-ष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति अनुष्ठानं धर्मसाधनम्, अग्न्याधेयशब्दे -नाग्न्याधानस्याभिधानम्, यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते । हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञ-विशेषा दार्शपौर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते । अग्निष्टो-मादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति । ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्रीसेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम्: अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम्, पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः! दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी - बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को ' यायावरवृत्ति ' कहते हैं । इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा । सायङ्काल, प्रात काल और अपराह्न काल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को ' भूतयज्ञ ' कहते हैं । अतिथियों की पूजा को ही ' मनुष्य यज्ञ ' कहते हैं । होम ही ' देवयज्ञ ' है । श्राद्ध को ' पितृयज्ञ ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही ' ब्रह्मयज्ञ ' है । ' एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानाम् ' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । ' एकाग्नि ' शब्द से ओपासनिक अग्नि को समझना चाहिए, जिसका ग्रहण विवाह के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा ' पाकयज्ञसंस्था ' के होमों का अर्थात् अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान ( वे भी धर्म के साधन हैं ), ' अग्न्य घेगादीनाम् ' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । ' अग्न्याधेय ' शब्द से अग्नि का प्रधान समझना चाहिए, जो वमन्त के समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित होता है । ' हविर्यज्ञ संस्था ' शब्द से विशेष प्रकार के दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती है । ' अग्निष्टोमादीति ', उक्थ्य, अग्निष्टोम षोड़शी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ये सात विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही ' सोमयज्ञसंस्था ' कहलाते हैं । ' ऋत्वन्तरेषु ' स्त्री के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से ' ब्रह्मचर्य ' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है, क्योकि ' पुत्रेण लोकान् जयति ' यह श्रुति है । For Private And Personal

पृष्ठ 747

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 747 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ग्रामान्निर्गतस्य वनवास वल्कला जिन केशश्मश्रुनखरोमधारणं च; वन्यहुतातिथिशेषभोजनानि वानप्रस्थस्य । त्रयाणामन्यतमस्य श्रद्धावतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा, संन्यस्य स्वानि कर्माणि यमनियमेष्वप्रमत्तस्य षट्पदार्थ प्रसंख्यानाद योगप्रसाधनं प्रव्रजितस्येति । दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्यैतानि साधनानि भावप्रसादं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति । ग्रामों को छोड़ कर वनों में रहना, वल्कल, अजिन, केश, दाढ़ी-मूँछ, नख और रोम इन सबों को धारण करना ( कभी त्याग न करना ) एवं वनों के कन्दमूल फलों एवं होम से और अतिथियों से अवशिष्ट अन्नों का भोजन करना, ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम दोनों में से किसी भी आश्रम वानप्रस्थ लिए हुए सभी जनों के लिए विशेषधर्म के साघन हैं । ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इन तीनों में से किसी भी आश्रम से कोई भी श्रद्धाशील पुरुष ( जब ) सभी प्राणियों को सदा के लिए अपनी ओर से अभय देकर अपने ( और ) सभी कर्मों से छूट जाते हैं, फिर भी यमनियमादि का बिना प्रमाद के पालन करते रहते हैं ( वे ही ) परिव्राजक ( कहलाते हैं ) उनके लिए ( इस शास्त्र में वर्णित ) षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अनुष्ठान ही विशेष धर्म का साधन है । धर्म के पूजादि ) दृष्ट प्रयोजनों के की सहायता से आत्मा और बिना अनुष्ठित होने के बाद मन के संयोग के द्वारा धर्म को न्यायकन्दली ये साधन ( लाभ विशुद्ध अभिप्राय उत्पन्न करते हैं । वनस्थस्य धर्मसाधनं कथयति — ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वेति “ यदहरे-वास्य श्रद्धा भवति तदहरेवायं प्रव्रजेत् ” इति श्रवणात् सति श्रद्धोपनये ब्रह्म-चारिणो वनवासो भवति । गृहस्थस्य वा तस्य वानप्रस्थव्रतमाचरतो वल्क-लाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्, वन्यस्य फलमूलस्य भोजनं हुतशेषभोजनम्, ' ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वानप्रस्थाश्रमियों के धर्म के साधन कहे गये हैं । ' यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवायं प्रव्रजेत् ' ऐसी श्रुति है, तद्नुसार उपयुक्त श्रद्धा के उत्पन्न होने पर ब्रह्मचर्याश्रम से भी सीधे वानप्रस्थाश्रम में जा सकता हैं इसी अभिप्राय से ' ब्रह्मचारिणः ऐसा कहा गया है | ' गृहस्थस्य वा ' अर्थात् यदि गृहस्थ वानप्रस्थाश्रमी हो जाय तो ' वल्कला जिन केश श्मश्रुनखरोमधारणम् ' अर्थात् वल्कल और अजिन का परिधान एवं केश और दाढ़ी मूछों का रखना ये सभी गृहस्थवानप्र-स्थाश्रमियों के धर्म के समान हैं । एवं ' वन्य ' जो फलमूल उसका भोजन, होम से बचे हुए हवि का भोजन एवं अतिथि को देकर उससे बचे हुए अन्न का भोजन ( वान-For Private And Personal

पृष्ठ 748

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 748 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ८५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६७३ न्यायकन्दली For Private And Personal अतिथिशेष भोजनं च धर्मसाधनम् । यः प्राजापत्यामिष्ट निरूप्य सर्वस्वं दक्षिणां दत्त्वात्मन्यरिंन समाधाय पुत्रे भार्यां निक्षिप्य प्रव्रजितः, न तस्थ होमो न तस्यातिथिपरिग्रहः । यस्तु सह पत्न्या सहैवाग्निना वनं प्रस्थितः, तस्य हुतशेष भोजनमतिथिशेष भोजनं च धर्मसाधनम् । यतिधर्मं निरूपयति - त्रयाणामिति । यत्याश्रमपरिग्रहेऽपि नियमो नास्ति, श्रद्धोपगमे सति ब्रह्मचार्यव यतिर्भवति, गृहस्थो वा भवति, वानप्रस्थो वेत्यनेनाभि-प्रायेणोक्तं त्रयाणामन्यतमस्येति । श्रद्धावतः चित्तप्रसादवतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा भूतानि मया न जातु हिंसितव्यानीति अद्रोहसङ्कल्पं गृहीत्वा, स्वानि कर्माणि काम्यानि संन्यस्य परित्यज्य यमनियमेष्वप्रमत्तस्य । अहिंसा - सत्यादयो यमाः । यथाह भगवान् पतञ्जलिः - अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा इति । तपः शौचादयस्तु नियमाः । यथाह स एव भगवान् - शौचसन्तोषतपः-स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा इति । न्यायभाष्यकारस्तु प्रत्याश्रमं विशिष्टं धर्मसाधन नियममाह । तेष्वप्रमत्तस्य ताननतिक्रमतः । षट्पदार्थ-प्रस्थियों के ) धर्म के साधन हैं । जो गृहस्थ प्राजापत्य नाम की इष्टि करके अपने सर्वस्व को दक्षिणा रूप में देकर एवं पत्नी का भार पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थ को ग्रहण करते हैं उनके लिए होम और अतिथि की सेवा निर्दिष्ट नहीं हैं ( अतः उनके लिए ये दोनों धर्म के साधन नहीं हैं ) । जो पत्नी और अग्नि को साथ लेकर हो वानप्रस्थाश्रम को ग्रहण करते हैं, उनके लिए ही होम से बचे हुए हवि का भोजन और अतिथि से बचे हुए अन्न का भोजन ये दोनों धर्म के साधन हैं । ' त्रयाणाम् ' इत्यादि ग्रन्थ से यतियों ( संन्यासियों ) के धर्म का निरूपण करते हैं । सन्यासाश्रम ग्रहण करने का भी कोई नियम नहीं है ( कि किस आश्रम से संन्यास ग्रहण करे ) क्योंकि उपयुक्त श्रद्धा के रहने पर ब्रह्मचारी और गृहस्थ ये दोनों ही संन्यास ले सकते हैं । वानप्रस्थाश्रमी तो ले ही सकते हैं, इसी नियम को दृष्टि में रखकर लिखा गया है कि ' त्रयाणामन्यतमस्य ' । ' श्रद्धावतः ' चित्त प्रसाद से युक्त पुरुष के लिए ' सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा ' अर्थात् मुझसे किसी प्राणी की हिंसा न हो ' इस प्रकार से अद्रोह का संकल्प करके ' स्वानि कर्माणि ' अर्थात् अपने काम्य कर्मों को ' संन्यस्य ' अर्थात् छोड़कर, ' यमनियमेष्वप्रमत्तस्य ' इनमें अहिंसा सत्यप्रभृति ' यम ' कहलाते हैं । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि: - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ( ये पाँच ) ' यम ' हैं । प्रकृत में ' नियम ' शब्द से तपस्या शौंच प्रभृति इष्ट है । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि - शीच सन्तोष तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर का प्रणिधान ( ये पाँच ) ' नियम ' ' हैं | न्यायभाष्यकार ने प्रत्येक आश्रम के लिए निर्दिष्ट धर्म के नियमित अनुष्ठान को ही नियम बतलाया है । ' तेष्वप्रमत्तस्य ' अर्थात् यम और नियम के विरुद्ध आचरण न करनेवाले

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-न्यायकन्दली प्रसंख्यानात् षण्णां पदार्थानां तत्त्वज्ञानाद् योगस्यात्मज्ञानोत्पादनसमर्थस्य समाधि-विशेषस्य प्रसाधनमुत्पादनं प्रव्रजितस्य धर्मसाधनम् । यथैतानि धर्मं साधयन्ति, तथा कथयति - दृष्टं चेति । लाभ पूजादि प्रयोजनमनुद्दिश्यानभिसन्धाय देतानि साधनानि क्रियन्ते, तदेतानि साधनानि भावप्रसादं चाभिप्रायविशुद्धि चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति । प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य तत्त्वतो विज्ञातेषु दुःखेकनिदानेषु विष-येषु विरक्तस्यात्यन्तिकं दुःखवियोगमिच्छतः " आत्मख्यातिरविप्लवा हानोपायः " ' तस्याश्च समाधिविशेषो निबन्धनम् ' इति श्रुतवतः " संन्यस्य सर्वकाम्यकर्माणि समाधिमनुतिष्ठामः " तत्प्रत्यनीकभूयिष्ठं ग्रामं परित्यज्य वनमाश्रितस्य यम-नियमाभ्यां कृतात्मसंस्कारस्य समाध्यभ्यासान्निवर्त्तको धर्मो जायते । तस्मादस्य प्रकृष्टः समाधिस्ततोऽन्यः प्रकृष्टतरो धर्मः, तस्मादप्यन्यः प्रकृष्ट-तमः समाधिरित्यनेन क्रमेणान्त्ये जन्मनि स तादृशः समाधिविशेषः पुरुषों के लिए ये आचरण धर्म के साधन हैं । ' षट्पदार्थ प्रसंख्यानात् ' द्रव्यादि छः पदार्थों के तत्वज्ञान के द्वार योग का अर्थात् आत्मज्ञान में पूर्ण क्षम विशेष प्रकार के समाधि का जो उत्पादन वह ' प्रत्रजितों ' के लिए धर्म का साधन है । ' दृष्टञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह उत्पादन करते कि ये साधन किस प्रकार धर्म का सम्पादन करते हैं । अर्थात् ' दृष्ट ' लाभ पूजादि प्रयोजनों का उद्देश्य न रखकर जब यमनियमादिसाधनों का अनुष्ठान किया जाता है, उस समय ये साधन ' भावशुद्धि ' अर्थात् अभिप्राय की विशुद्धि के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा धर्म का उत्पादन करते हैं | जिस पुरुष का चित्त दुःखों से प्रतिदिन अभिहत होता रहता है, उसे यदि दुःखों के कारणीभूत विषय यथार्थ रूप से ज्ञात हो जाते हैं तो फिर उन विषयों से उसे वैराग्य हो जाता है | ऐसा पुरुष दुःखों से सदा के लिए छूटने की इच्छा करता है । ( अन्वेषण करने पर ) उसे यह ज्ञात होता है कि ' आत्मा का तत्त्वज्ञान ही दुःख के आत्यन्तिक निवृत्ति का अर्थ साधन है, एवं वह तत्त्वज्ञान विशेष प्रकार की समाधि ' से ही प्राप्त हो सकता है । तो फिर सभी काम्य कर्मों का त्याग कर मैं समाधि का ही अनुष्ठान करूँ ' वह ऐसा संकल्प करता है । फिर समाधि के अधिकतर विघ्नों से युक्त होने के कारण वह ग्राम को छोड़ देता है, और वन का आश्रय ले लेता है । ऐसा पुरुष यम और नियम से आत्मा को सुसंस्कृत कर लेता है । ऐसी स्थिति में जब वह समाधि का अभ्यास करता है, तो उससे ( संसार को निबृत्त करनेवाले ) निवर्त्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस निवर्त्तक धर्मं के द्वारा पहिले की समाधि से उत्कृष्ट समाधि की उत्पत्ति होती है ॥ इस उत्कृष्ट समाधि से उत्पन्न निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतर निवर्त्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस उत्कृष्ट निवर्त्तक धर्म से उत्कृष्टतम समाधि की उत्पत्ति होती है, इस For Private And Personal

पृष्ठ 750

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६७५ परिणमति यो द्वन्द्वेनाप्यभिभवितुं न शक्यते । दृष्टो हि किञ्चिदभिमतं विषय-मादरेणानुचिन्तयतः तदेकाग्रीभूतचित्तस्य सन्निहितेषु प्रबलेष्वपि विषयेषु संबाधः, यथेषुकार इषौ लब्धलक्ष्याभ्यासो गच्छन्तमपि राजानं न बुद्धयते । तथा च भगवान् पतञ्जलिः -- ' अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः ' इति । एवं परिणते समाधावात्मस्वरूप साक्षात्कारिविज्ञानमुदेति । यथाहुः कापिलाः-एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ इति । अत आत्मज्ञानार्थिना यतिना योगसाधनमनुष्ठीयते । ज्ञानं ज्ञेयादिप्रा-प्तिमात्रफलम् श्रौतात्मज्ञानेनाप्यात्मस्वरूपं प्राप्यते किमस्य ध्यानाभ्यासात् प्रत्यक्षीकरणेनेति चेत्? न, परोक्षस्य प्रत्यक्षसाधने सामर्थ्याभावात् । स्वरूपतस्तावदात्मा न कर्ता, न भोक्ता, किन्तूदासीन एव । तत्र देहे-प्रकार अन्तिम जन्म में वह समाधि इतनी उत्कृष्टता को प्राप्त कर लेती है कि वह पुरुष ( शीतोष्ण रूप ) द्वन्द्व से भी अभिभूत नहीं होता । यह तो सांसारिक इष्ट विषय को आदर के साथ चिन्तन करते हुए पुरुषों में भी देखा जाता है कि अत्यन्त समीप के प्रबल विषयों को भी वे नहीं देख पाते हैं । जैसे कि तीर का अभ्यास करता हुआ पुरुष आगे से जाते ' हुए राजा को भी नही देख पाता है । जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि ' अभ्यास और वैराग्य इन दोनों से चित्तनिवृत्ति रूप योग निष्पन्न होता है । ' इस प्रकार जब समाधि का परिपाक हो जाता है. तब उससे आत्मा का साक्षात्कार रूप विज्ञान उदित होता है । जैसा कि सांख्य शास्त्र के आचार्यों ने कहा है कि-" इस तस्व के अभ्यास से ' ये विषय मेरे नहीं हैं ' मैं इन विषयों से सम्बद्ध नहीं हूँ ' इस आकारका विषयरहित केवल ( प्राकृत विषयों से असम्बद्ध ) आत्मा का ज्ञान होता है । " यही कारण है कि आत्मज्ञान को इच्छा से यती लोग योग का अभ्यास करते! ( प्र ० ) ज्ञान का तो एक मात्र यही फल है कि उससे ज्ञेय विषय की प्राप्ति हो । श्रुति के द्वारा जो आत्मा का ज्ञान होता है उससे भी उसके विषय आत्मा के स्वरूप की प्राप्ति तो होगी ही. फिर ध्यान और अभ्यास के द्वारा आत्मा को प्रत्यक्ष करने को क्या आव-श्यकता है? ( उ ० ) यतः प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से ही सांसारिक विषयों का प्रत्यक्ष रूप मिथ्या-ज्ञान निवृत्त हो सकता है । श्रुति से उत्पन्न आत्मा का ज्ञान परोक्ष है, अतः आत्मा के प्रत्यक्ष की आवश्यकता होती है, जिसके लिए ध्यान और अभ्यास की पूरी आवश्यकता है । आत्मा तो स्वयं उदासीन है, न वह कर्ता है, न भोक्ता । उसमें जब शरीर, इन्द्रिय प्रभृति विषयों का सम्बन्ध होता है, तभी उसे ' अहं कर्त्ता, अहं भोक्ता ' इत्यादि ज्ञान होने लगते हैं वे ' जो जहाँ नहीं है वहीं तद्विशेषणक ' होने के कारण मिथ्याज्ञान होते हैं । इस मिथ्याज्ञान से ही अनुकूल विषयों में राग और प्रतिकूल विषयों में द्वेष उत्पन्न होता है । राग और द्वेष इन दोनों से ही क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति उत्पन्न होती है । For Private And Personal