प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 751–760
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 751–760
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६७६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपणे धर्म-न्द्रियसम्बन्धाद्युपाधिकृतोऽहं ममेति — कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रत्ययो मिथ्याऽतस्मिंस्तदिति भावात् । एतत्कृतश्चानुकूलेषु रागः प्रतिकूलेषु द्वेष:, ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती, ततो धर्माधर्मे, ततश्च संसारः । यथोक्तं सौगतैः-आत्मनि सति परसंज्ञा स्वपरविभागात् परिग्रहद्वेषौ । अनयोः संप्रतिबद्धाः सर्वे भावाः प्रजायन्ते ॥ अनादिवासनावासित इति प्रबलो निसर्गबद्धः सर्वः सांव्यवहारिकः प्रत्यक्षेणैवैष प्रत्ययः । श्रतमात्मतत्त्वज्ञानं क्षणिकमनुपलब्धसंवादं परोक्षं च । न च दृढतरः प्रत्यक्षावभासः परोक्षावभासेन शक्यते निषेद्धम् । नहि शतशोऽपि प्रमाणान्तरावगते गुडस्य माधुर्ये दुष्टेन्द्रियजः तिक्तप्रतिभासस्तत्कृतश्च दुःखावगमो निवर्तते तस्मात् प्रत्यक्षज्ञानार्थं समाधिरुपासितव्यः । प्रचिते समाधौ तत्सामर्थ्यात् कर्तृत्वभोक्तृत्वपरिपन्थिन्यात्मतत्त्वे स्फुटीभूते समाने विषये विद्याविद्ययोविरोधादहङ्कार - ममकारवासनोच्छेदे सन्नपि प्रपञ्चो नात्मानं
स्पृशति । तथा च कापिलैरुक्तम् -तेन निवृत्तप्रसवार्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्तौ ।
प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्थः ॥
विहित विषयों में प्रवृत्ति से धर्म और निषिद्ध विषयों की प्रवृत्ति से अधर्म, एवं विहित विषयों की निवृत्ति से अधर्म और निषिद्ध विषयों की निवृत्ति से धर्म की उत्पत्ति होती है । घमं और अधर्म इन्हीं दोनों से संसार की उत्पत्ति होती है । जैसा बौद्धों ने भी कहा है कि--आत्मा को सत्ता मान लेने पर ही ' पर ' इस नाम का व्यवहार होता है । ' स्व ' और ' पर ' का जो यह व्यवहार है, उसी से राग और द्वेष उत्पन्न होता है । धर्माधर्मादि सभी भाव राग और द्वेष इन्हीं दोनों के साथ सम्बद्ध हैं । अनादि वासना से वासित होने के कारण ये सभी स्वाभाविक मिथ्याप्रत्यय संवृति ( अविद्या ) से उत्पन्न होते हैं, एवं वे प्रत्यक्षात्मक हैं । श्रुति से जो आत्मा का क्षणिक ज्ञान होता है, उसका प्रमात्व निर्णीत नहीं है, एवं वह परोक्ष भी है । अत: उससे दृढ़तर एवं प्रत्यक्षात्मक मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं हो सकती । जिस पुरुष की जिह्वा में दोष आ गया है, उसे यदि सैकड़ों प्रमाणों से गुड़ की मधुरता को समझावें, उससे उसे जो गुड़ में तिक्तता का भान है, एवं इस भान से जो दुःख होता है, इन दोनों से वह छूट नहीं सकता । तस्मात् आत्मा के प्रत्यक्ष के लिए समाधि की पूरी आवश्यकता है । इस प्रकार समाधि की वृद्धि हो जाने पर, उसके सामर्थ्य से ( बन्धन के प्रयोजक ) कर्तृत्व और भोक्तृत्व के विरोधी आत्मतत्त्व का स्फुट प्रतिभास होता है । तद्विषयक मिथ्याज्ञान ( अविद्या ) और तद्विषयक यथार्थज्ञान ( विद्या ) ये दोनों परस्पर विरोधी हैं, अतः आत्मविषयक तत्त्वज्ञान रूप विद्या की उत्पत्ति हो जाने पर आत्मा का कर्तृत्व भोक्तृत्वादि रूप से जितने भी मिथ्याज्ञान एवं तज्जनित वासनायें रहतीं हैं, वे सभी नष्ट हो जाती हैं, जिससे प्रपञ्च की ( किसी प्रकार की ) सत्ता For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७७ प्रशस्तपादभाष्यम् अधर्मोऽप्यात्मगुणः 1 कर्त्तुरहितप्रत्यवाय हेतुरतीन्द्रियोऽ-न्त्यदुःखसंविज्ञान विरोधी । तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि अधर्म भी आत्मा का ही गुण है । वह ( अधर्माचरण करनेवाले ) कर्त्ता के दुःख और दुःख के साधनों का कारण है । वह अतीन्द्रिय है । एवं अन्तिम दुःख और तत्वज्ञान इन दोनों से उसका नाश होता है । शास्त्रों में निषिद्ध न्यायकन्दली तेन तत्त्वज्ञानेन सता निवृत्तप्रसवां निवृत्तोपभोगजननसामर्थ्याज् ज्ञान-धर्मवैराग्यैश्वर्याधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्येभ्यः सप्तरूपेभ्यो विनिवृत्तां प्रकृति पुरुष: प्रेक्षकवदुदासीनः स्वस्थो रजस्तमोवृत्तिकलुषतया बुद्धया असम्भिन्नः पश्यतीत्यर्थः । यद्यप्यनादिरियं मोहवासना आदिमांश्च तत्त्वसाक्षात्कार:, तथा-प्यनेन सा निरुद्धयते, तत्त्वावग्रहो हि धियां परमं बलम् । अधर्मोऽप्यात्मगुणः । न केवलं धर्मोऽधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरिति । कर्तुरहितं दुःखसाधनम्, प्रत्यवायो दु: खम्, तयोरधर्मो हेतुः । अन्त्यदुःखसं विज्ञा-नेति । अन्त्यस्य दुःखस्य सम्यग् विज्ञानं तेन विनाश्यते । तस्य साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधन विपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । हिंसा परा -रहने पर भी आत्मा को वे छू नहीं सकते । जैसा सांख्यशास्त्र के आचार्यों ने ' तेन निवृत्तप्रसवाम् ' इत्यादि आर्या के द्वारा कहा है कि- ' तेन ' अर्थात् उस तत्त्वज्ञान से ' निवृत्त प्रसवाम् ' उपभोग के सामर्थ्य से रहित प्रकृति ' अर्थवशात् ' पुरुष के अपवर्ग रूप प्रयोजन से वशीभूत होकर ' सप्तरूप विनिवृत्ति ' को प्राप्त होती है, अर्थात् ज्ञान अज्ञान, धर्म, अधर्म, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य्यं इन अष्टविध भावों में से ज्ञान को छोड़कर सृष्टिजनक अज्ञानादि सातों प्रकार के भावों से निवृत्त हो जाती है । इसी प्रकार की प्रकृति को ' पुरुष ' प्रेक्षक की तरह अर्थात् उदासीन की तरह ' स्वस्थ ' होकर अर्थात् रजोगुण और तमोगुण की कलुषित वृत्तियों से सर्वथा असम्बद्ध रहकर देखता है । यद्यपि यह ठीक सा लगता है कि मिथ्याज्ञानरूप मोहरूप वासना अनादि है, और तत्त्वज्ञान उत्पत्तिशील है, ( अतः वासना ही बलवती है ) फिर भी सादि भी तत्त्वज्ञान से अनादि मिथ्याज्ञान का नाश होता है, क्योंकि तत्त्व का ग्रहण करना हो ज्ञानों का सबसे बड़ा बल है । ' अधर्मोप्यात्मगुण: ' अर्थात् केवल धर्म ही आत्मा का गुण नहीं है, किन्तु अधर्म भी आत्मा का गुण है इसी अर्थ की अभिव्यक्ति प्रकृत वाक्य के ' अपि ' शब्द से हुई है ) । ' कर्तुरिति ' कर्त्ता का जो ' अहित ' अर्थात् दुःख का साधन एवं प्रत्यवाय अर्थात् दुःख, अधर्म इन दोनों का ' हेतु ' है । ' अन्त्यदुःखसं विज्ञानेति ' अन्त्य अर्थात् अन्तिम दुःख और ' संविज्ञान ' अर्थात् सम्यग्विज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान इन दोनों से अधर्म का विनाश होता है । ' तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिसानुतस्तेयादीनि ' दूसरों के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणेधर्म-प्रशस्तपादभाष्यम् धर्मसाधन विपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । विहिताकरणं प्रमाद-श्चैतानि दुष्टाभिसन्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगादधर्मस्योत्पत्तिः । अविदुषो रागद्वेषवतः प्रवर्त्तकाद् धर्मात् प्रकृष्टात् स्वल्पा-धर्मसहिताद् ब्रह्मेन्द्र प्रजापतिपितृ मनुष्यलोकेष्वाशयानुरूपैरिष्टशरीरे-द्रियविषयसुखादिभिर्योगो भवति । तथा प्रकृष्टादधर्मात् स्वल्पधर्म-एवं धर्म साधन के विरोधी हिंसा, असत्य प्रभृति इसके साधन हैं । शास्त्रों में अनुष्ठान के लिए निर्दिष्ट कामों को न करना एवं प्रमाद ये दोनों भी अधर्म के हेतु हैं । ( अधर्म के ) ये सभी हेतु एवं कर्त्ता के दुष्ट अभिप्राय इन सबों की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा अधर्म की उत्पत्ति होती है । प्रवृत्तिजनक उत्कृष्ट धर्म के द्वारा थोड़े से अधर्म की सहायता स ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक, पितृलोक एवं मनुष्यलोक में उपयुक्त भोग के अनुरूप इन्द्रिय विषय एवं सुखादि के साथ तत्त्वज्ञान से रहित एवं राग और द्वेष से युक्त पुरुष का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से न्यायकन्दली भिद्रोह: । अनृतं मिथ्यावचनम् । स्तेयमशास्त्रपूर्वं परस्वग्रहणम् । एवमा-दीनि धर्मसाधन विपरीतानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि यानि तान्यधर्मसाधनानि । विहिताकरणं विहितस्यावश्यं करणीयस्या कर्त्तव्यता । प्रमादोऽबुद्धिपूर्व कोऽतिक्रमः, एतदपि द्वयमधर्मसाधनम् । यथैतेभ्यो धर्मस्योत्पत्तिस्तद् दर्शयति-- एता-नीति । यत्र कामनापूर्वकमधर्मसाधनानुष्ठानं कारणम् । अकामकृते तु प्रमादेनास्य हेतुत्वम् । तत्र दुष्टोऽभिसन्धिरधर्म-साथ अभिद्रोह करना ही ' हिंसा ' है । मिथ्याभाषण ही ' अमृत ' शब्द का अर्थ है । शास्त्रों में कहे हुए उपायों से विपरीत उपायों के द्वारा दूसरे के धन का ग्रहण करना ही ' स्तेय ' है । धर्म के साधनों के विरुद्ध एवं शास्त्रों से निषिद्ध जो हिंसादि उपाय हैं, वे ही अधर्म के साधन हैं । शास्त्रों के द्वारा अवश्य करने के लिए निर्दिष्ट कर्मों का न करना ही ' विहिताकरण ' है । अनजान में शास्त्रीय मर्यादा के अतिक्रम को ही ' प्रमाद ' कहते हैं । ( विहिताकरण और प्रमाद ) ये दोनों भी अधर्म के साधन हैं । ' एतानि ' इस वाक्य के द्वारा इन साधनों के द्वारा किस रीति से अधर्म की उत्पत्ति होती है? वह दिखलायी गयी है । जहाँ किसी कामना के वशीभूत होकर अधर्म के साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, वहाँ ' दुष्टाभिसन्धि ' अधर्म का कारण है । जहाँ अधर्म के साधनों का अनुष्ठान अनजाने होता है, वहाँ प्रमाद के द्वारा उन साधनों में हेतुता आती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] सहितात् भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् प्रेततिर्यग्योनिस्थानेष्वनिष्टशरीरेन्द्रिय विषयदुःखादिभिर्योगो भवति । एवं प्रवृत्तिलक्षणाद् धर्मादधर्मसहिताद् देवमनुष्य तिर्यनारकेषु पुनः पुनः संसारबन्धो भवति । धर्म से युक्त बड़े अधर्म से प्रेत, तिर्यग्योनि में भोग के उपयुक्त शरीर, इन्द्रिय, विषय और दुःख के साथ ( उक्त पुरुष ) का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से अधर्म से युक्त प्रवृत्तिस्वरूप धर्म के द्वारा देव तिर्यग्योनि एवं नारकीय शरीरों के सम्बन्ध से जीव को बारबार संसार रूप बन्धन मिलता है । न्यायकन्दलो E एवमधर्मस्य साधनमभिधाय संप्रति साध्यं कथयति-- अविदुष इत्या-दिना। यः कर्त्ता भोक्तास्तीत्यात्मानमभिमन्यते परमार्थतो दुःखसाधनं च बाह्याध्यात्मिकविषयं सुखसाधनमित्यभिमन्यते सोऽविद्वान् । स च स्वोपभोग-तृष्णापरिप्लुतः सुखसाधनत्वारोपिते विषये रज्यते, तदुपरोधनि च द्विष्टो भवति । तस्य प्रवर्त्तकाद् धर्माद् देवो वा स्यां गन्धर्वो वा स्यामिति पुनर्भवप्रार्थनया कृताद् धर्मात् प्रकृष्टात् फलातिशयहेतोराज्ञयानुरूपैः कर्मा-नुरूपेरिष्टशरीरादिभिः सम्बन्धो भवति ब्रह्मेन्द्रादिस्थानेऽपि मात्रया दुःख-सम्भेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखसंवेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखस्य कारणमतः स्वल्पाधर्मसहितादित्युक्तम् । यस्य प्रकृष्टो धर्मस्तस्य प्रकृष्टानि शरीरादीनि भवन्ति, यस्य प्रकृष्टतरो धर्मः, तस्य प्रकृष्टतराणि भवन्ति, उक्त सन्दर्भ के द्वारा अधर्म के साधनों को कहने के बाद ' अविदुष ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अधर्म से होनेवाले कार्यो का निरूपण करते हैं । ' अविद्वान् ' उस ( मूढ़ ) पुरुष को कहते हैं, जो अपने को हो कर्त्ता और भोक्ता समझता है, एवं दुःखों के बाह्य एवं आन्तरिक साधनों को सुखों का साधन समझता है । वह ( अविद्वान् पुरुष ) अपनी उपभोग की तृष्णा के वशीभूत होकर दुःख के जिन साधनों को सुख का साधन समझता है, उन विषयों में अनुरक्त हो जाता है, और उसके विरोधी विषयों के साथ द्वेष रखने लगता है । ' प्रवर्त्तकाद्धर्मात् ' अर्थात् ' मैं देव हो जाऊं, मैं गन्धर्व हो जाऊँ इस प्रकार की हेतुभूत पुनर्जन्म की वासना से किये गये प्रवर्तक एवं उत्कृष्ट फलों के हेतु उत्कृष्ट धर्म के द्वारा ( कुछ अधर्म की सहायता से ) आशय के अनुरूप अर्थात् पहिले किए हुए कर्म के अनुरूप अभीष्ट शरीरादि के साथ वह जीव सम्बद्ध होता है । ब्रह्मा प्रभृति के शरीर धारण करने पर भी थोड़ा सा दुःख का सम्बन्ध रहता ही है । बिना अधर्म के दुःख का अनुभव नहीं होता, एवं अधर्म को छोड़कर दुःख का भी कोई दूसरा ( असाधारण ) कारण नहीं है, अतः ' स्वल्पाधर्मसहितात् ' यह वाक्य जोड़ा गया है । ' आशयानुरूपैः ' यह वाक्य इस तारतम्य को समझाने के लिए लिखा गया है कि जिसका धर्म उत्कृष्ट रहता है. उसे उत्कृष्ट शरीर मिलता है, जिसका धर्म उससे उत्कृष्टतर For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६८० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-प्रशस्तपादभाष्यम् ज्ञानपूर्वकात्तु कृताद संकल्पितफलाद विशुद्धे कुले जातस्य दुःखविगमोपाय जिज्ञासोराचार्यमुपसङ्गम्योत्पन्नषट्पदार्थतत्वज्ञानस्या-ज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य रागद्वेषाद्यभावात् तज्जयोर्धर्माधर्मयोरनुत्पत्तौ ज्ञानपूर्वक किये हुए निष्काम कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न धर्म से जीव विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । इससे पुरुष को दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति के उपाय को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है । इस जिज्ञासा से प्रेरित होकर वह आचार्य के चरणों में बैठकर उनसे षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान का लाभ करता है । जिससे अज्ञान निवृत्ति के द्वारा उसे वैराग्य यस्य प्रकृष्टतमो धर्मस्तस्य प्रकृष्टतमानीति प्रतिपादयितुमाशयानुरूपैरि-त्युक्तम् । इष्टशब्दः प्रत्येकं शरीरादिषु सम्बद्धयते, द्वन्द्वानन्तरं प्रयोगात् । तथा प्रकृष्टादधर्मात् प्रेतयोनीनां तिर्यग्योनीनां च स्थानेष्वनिष्टैः शरीरादिभिर्योगो भवति । प्रेतादिस्थानेऽपि मनाक् सुखमस्ति तच्च धर्मस्य कार्यम्, अतः स्वल्पधर्म-सहितादित्युक्तम् । उपसंहरति - एवमिति । एवं धर्मात् संसारं प्रतिपाद्यापवर्ग प्रतिपादयति - ज्ञानपूर्वकात् त्विति । " स्वरूपतश्चाहमुदासीनो बाह्याध्यात्मिकारच विषयाः सर्व एवैते दुःखसाधनम् ” इति यस्य ज्ञानमभूत् स दृष्टानुश्रविक विषयसुखवितृष्णः “ एबमहं होता है, उसे उस शरीर से भी अच्छा शरीर मिलता है, एवं जिसका धर्म इन दोनों प्रकार के धर्मो से उत्कृष्टतम रहता है, उसे तदनुरूप ही शरीर भी उत्कृष्टतम मिलता है । प्रकृत वाक्य का ' इष्ट ' शब्द द्वन्द्वसमास के अन्त में प्रयुक्त है, अतः उसके पहिले के ' शरीरादि ' प्रत्येक शब्द के साथ उसका अन्वय है । इसी प्रकार प्रकृष्ट अधर्म से प्रेत तिर्यग्योनि के अनिष्ट शरीरादि के साथ आत्मा सम्बद्ध होता है । प्रेतलोक प्रभृति में भी थोड़ा सा सुख का सम्बन्ध है, एवं सुख धर्म से ही उत्पन्न होता है, अतः ' स्वल्पधर्मसहितात् ' ऐसा लिखा गया है । ' एवम् ' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । इस प्रकार धर्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन कर ' ज्ञानपूर्वकात्तु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा धर्म से मोक्ष की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं । " मैं वस्तुतः अपने यथार्थरूप में उदासीन हूँ, एवं बाह्य और अभ्यन्तर जितने भी विषय हैं, वे सभी दुःख के हो साधन हैं " इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को हो जाता है वह ' दृष्ट ' चन्दनवनितादि जनित सुखों से एवं ' आनुश्रविक ' स्वर्गादि सुखों की तृष्णा से निवत्त For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ८६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ६८१ न्यायकन्दली For Private And Personal भूयासमिति मे भूयासुः ” इति फलाकाङ्क्षया विना निवृत्तसाधनतया विहितमपरं चावश्यकरणीयं कर्म करोति । तस्मात् कर्मणो ज्ञानपूर्वकात् कृतादस्य विशुद्धे कुले जन्म भवति । अकुलीनस्य श्रद्धा न भवति । न चाश्रद्दधानस्य जिज्ञासा सम्पद्यते । न चाजिज्ञासोस्तत्त्वज्ञानम् तद्विकलस्य च नास्ति मोक्षप्राप्तिः । अतो मोक्षानुगुणमसंकल्पितफलं कर्म विशुद्धे कुले जन्म ग्राहयति, विशुद्धे कुले जातस्य प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य दुःखविगमोपाये जिज्ञासा सम्पद्यते " कुतो नु खल्वयं मम दुःखोपरमः स्यात् " इति । स चैवमाविर्भूतजिज्ञास आचार्यमुप-गच्छति, तस्य चाचार्योपदेशात् षण्णां पदार्थानां श्रौतं तत्त्वज्ञानं जायते । तदनु श्रवणमनननिदिध्यासनादिक्रमेण प्रत्यक्षं भवति । उत्पन्न-तत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ सवासन विपर्ययज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य विच्छिन्नराग-द्वेषसंस्कारस्य रागद्वेषयोरभावात् तज्जयोर्धमाधर्मयोरनुत्पादः । क्लेशवासनो-पनिबद्धा हि प्रवृत्तयस्तुषावनद्धा इव तण्डुलाः प्ररोहन्ति । क्षीणेषु क्लेशेषु निस्तुषा इव तण्डुलाः कार्यं न प्रतिसन्दधते । यथाह भगवान् पतञ्जलिः--हो जाता है । फिर भी ' अहं भूयासम् ', ' मे भूयासुः ' ( मैं बराबर रहूँ और मेरे इष्ट विषय बराबर मुझे प्राप्त होते रहें ) इस प्रकार की भावना बनी ही रहती है । फला-काङ्क्षा की इस भावना से प्रेरित होकर वह नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करता ही रहता है, क्योंकि उनको छोड़ने का कोई हेतु तब तक उपस्थित नहीं रहता । ये ही कर्म जब उक्त पुरुष के द्वारा ज्ञानपूर्वक किये जाते हैं, तो उस पुरुष को विशुद्ध कुल में जन्म प्राप्त होता है । क्योंकि अकुलीन पुरुष में श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, एवं बिना श्रद्धा के जिज्ञासा नहीं होती । जिसे जिज्ञासा नहीं, उसे तत्त्वज्ञान प्राप्त होना असम्भव है । बिना तत्त्वज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नहीं है । अतः निष्कामकर्म मोक्ष का सहायक है । तस्मात् वह पुरुष विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । विशुद्ध कुल में उत्पन्न वह पुरुष जब प्रतिदिन के दुःख से पीड़ित होने लगता है, तो उसे दुःखनाश के कारणों के प्रसङ्ग में यह जिज्ञासा उठती है । कि ' किन साधनों से इन दुःखों को निवृत्ति होगी? जब पुरुष में इस प्रकार की जिज्ञासा उठती है तो वह आचार्य के पास जाता है । आचार्य के उपदेश से उसे वेदवाक्यों के द्वारा आत्मतत्व का ( परोक्ष ) ज्ञान होता है । फिर श्रवण के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन इस रीति से उसे आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है । प्रत्यक्षात्मक इस आत्मतत्त्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर संसार के निदान भूत विपर्यय ( मिथ्याज्ञान ) का जड़मूल से विनाश हो जाता है । जिससे विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है । विरक्त पुरुष के राग और द्वेष के संस्कार भी छूट जाते हैं । राग और द्वेष के छूट जाने पर
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-प्रशस्तपादभाष्यम् पूर्व सञ्चितयोश्चोपभोगान्निरोधे सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेद चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं कृत्वा निवर्त्तते । तदा निरोधात् निर्बीज स्यात्मनः शरीरादि-निवृत्तिः, पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्ष इति । होता है । विरक्त पुरुष में राग और द्वेष की सम्भावना न रहने के कारण राग और द्वेष से होनेवाले धर्म और अधर्म की आगे उत्पत्ति रुक जाती है । पहिले से सञ्चित धर्म और अधर्म का उपभोग से नाश हो जाने के बाद सन्तोषात्मक सुख एवं शरीरपरिच्छेद ( शरीर के प्रति घृणा ) इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इनसे रागादि की निवृत्ति होती है । इसके बाद निवृत्तिजनक केवल ( अधर्म से सर्वथा असम्बद्ध ) धर्म आत्मतत्त्वज्ञान की सहायता से ( परम ) सुख को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है । निवृत्तिलक्षण उस धर्म की निवृत्ति से उस समय आत्मा संसार के बीज ( धर्माधर्मादि ) से रहित हो जाता है, अतः उसके उपभोग के पूर्व - आयतन ( वर्त्तमान शरीर ) की निवृत्ति हो जाती है, एवं आगे शरीर की उत्पत्ति रुक जाती है । लकड़ी के जल जाने के कारण अग्नि की निवृत्ति की तरह उस समय शरीर का फिर से उत्पन्न न होना ही मोक्ष है । न्यायकन्दली “ सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः " इति । यथाह भगवानक्षपादः – “ न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य " इति । पूर्वसश्वितयोश्च धर्माधर्मयो. निरोध उपभोगात्, निवृत्तिफलहेतोश्च कर्मान्तरात् । सन्तोषसुखं शरीरपरि. च्छेदं चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं इन दोनों से उत्पन्न होनेवाले धर्म और अधर्म की उत्पत्ति भी रुक जाती है । जिस प्रकार छिलके से युक्त धान से ही अङ्कुर उत्पन्न होता है उसी प्रकार क्लेश और वासना से युक्त प्रवृत्ति से हो जन्म रूप कार्य की उत्पत्ति होती है । प्रबृत्तियों से जब वासना और क्लेश का सम्बन्ध छूट जाता है, तब उससे आगे जन्म का कार्य उसी प्रकार रुक जाता है, जिस प्रकार छिलके के न रहने से धान के द्वारा अङ्कुर का होना रुक जाता है । जैसा कि ' न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य ' इस सूत्र के द्वारा भगवान् अक्षपाद ने भी कहा है । पूर्वसञ्चितों का अर्थात् पूर्वसञ्चित धर्म और अधर्मं का ' निरोध ' उपभोग से होता है । संसारनिवृत्ति रूप फल के कारणीभूत ( निवृत्ति रूप ) धर्म का विनाश दूसरे धर्म से होता है । ' सन्तोषसुखम ' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ' निवृत्ति ' शब्द ' निवर्त्यते संसारोऽनया ' इस For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली कृत्वा निवर्त्तते । निवर्त्यते संसारोऽनयेति निवृत्तिः, निवृत्तिलक्षणं यस्यासौ निवृत्तिलक्षणो निवृत्तिस्वभावो धर्मो रागादिनिवृत्तौ भूतायां केवलो व्यवस्थितः सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य परमार्थदर्शनजमात्मद-र्शनजं सुखं करोति, तत्कृत्वा निवर्त्तते । आभिमानिक कार्यविनिरोधात् तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिनिवृत्तौ पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्षः । यदा परमार्थदर्शनं कृत्वा निवृत्तो धर्मः, तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादि-बीजधर्माधर्मरहितस्यात्मन उत्पन्नानां शरीरादीनां कर्मक्षयान्निवृत्तौ भूतायाम-नागतानां कारणाभावादनुत्पत्तौ यथा दग्धेन्धनस्यानलस्योपशमः पुनरनुत्पादः, एवं पुनः शरीरानुत्पादो मोक्षः । इदं निरूप्यते । किं ज्ञानमात्रान्मुक्तिः? उत ज्ञानकर्मसमुच्चयात्? ज्ञानकर्मसमुच्चयादिति वदामः । निवृत्तेतराभिलाषस्य काम्यकर्मभ्यो निवृ-तस्यापि नित्यनैमित्तिककर्माधिकारो न निवर्त्तते तानि ह्युपनीतं ब्राह्मणमात्र-मधिकृत्य विहितानि । मुमुक्षुरपि ब्राह्मण एव, जातेरनुच्छेदात् । स यद्यधिका-व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है ( जिसका अर्थ है कि संसार की निवृत्ति जिससे हो ) । इस प्रकार से निष्पन्न निवृत्ति शब्द के साथ ' लक्षण ' शब्द का ' निवृत्तिलक्षणं यस्य असो निवृत्तिलक्षण: ' इस प्रकार का समास है, अर्थात् निवृत्तिस्वभाव का जो धर्म वह रागादि की निवृत्ति होने पर ' केवल ' अर्थात् व्यवस्थित हो जाता है । वह ( केवल धर्म ) सन्तोषसुख और शरीर सञ्चालन इन दोनों का उत्पादन कर ' परमार्थदर्शनजम् ' अर्थात् आत्मज्ञान जनित सुख को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है, क्योंकि आभिमानिक सभी कार्यों का वह विरोधी है । ' तदा ' इत्यादि सम्दर्भ से कहते हैं कि यह निवृत्तिस्वभाव का धर्म जब आत्मज्ञान जनित धर्मं को उत्पन्न कर स्वयं निवृत्त हो जाता है ' तदा निर्बीजस्य ' अर्थात् तब शरीरादि के उत्पादन के बीज प्रवृत्तिलक्षण धर्माधर्मादि से रहित आत्मा के शरीरादि का कर्मक्षय से नाश हो जाता है, और कारणों के न रहने से आगे होने-वाले शरीरादि की उत्पत्ति रुक जाती है । जिस प्रकार लकड़ी के जल जाने के बाद अग्नि का भी नाश हो जाता है, और पुनः उत्पत्ति भी नहीं होती है, उसी प्रकार शरीर का पुनः उत्पन्न न होना ही ' मुक्ति ' है । अब इस विषय का विचार करते हैं कि केवल ज्ञान से ही मुक्ति होती है? अथवा ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर मोक्ष का सम्पादन करते हैं? हम लोग तो कहते हैं । कि ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर ही मोक्ष का सम्पादन करते हैं । क्योंकि जिन्हें सांसारिक विषयों की अभिलाषा नहीं है, वे यद्यपि काम्य कर्म से निवृत्त हो जाते हैं, फिर भी वे अपने नित्य और नैमित्तिक कर्मों की अवश्यकर्तव्यता से मुक्त नहीं हो सकते, क्योंकि नित्य और नैमित्तिक कर्मों का विधान उपनीत सभी ब्राह्मणों के लिए किया गया है । मोक्ष के इच्छुक भी ब्राह्मण ही हैं, क्योंकि जाति का कभी नोश नहीं For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ६८४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भ्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-न्यायकन्दली रित्वे सत्यवश्यकरणीयान्यतिक्रमेत् प्रत्यवायोऽस्य प्रत्यहमुपचीयेत, बद्धो न मुच्यते । यथोक्तम् -यानि काम्यानि कर्माणि प्रतिषिद्धानि यान्यपि । तदुपचयाच्च तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं नित्यनैमित्तिकान्यपि ॥ इति । विहिताकरणमभावः, न चाभावो भावस्य हेतुरपि, अतो नास्मात् प्रत्यवायोत्पत्तिरिति चेत्? न विहिताकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायस्य सम्भवात् । अभावस्य हि स्वातन्त्र्येण हेतुत्वं नेष्यते, न तु भावोपसर्जनतया । न च शरोरी सन्ध्यादिकाले कायेन वाचा मनसा वा किञ्चिन्न करोति, शरीरधारणादीना-मपि करणात् । यथोक्तम्-कर्मणां प्रागभावो यो विहिताकरणादिषु । न चानर्थकरत्वेन वस्तुत्वान्नापनीयते ॥ स्वकाले यदकुर्वंस्तत् करोत्यन्यदचेतनः । प्रत्यवायो s स्य तेनैव नाभावेन स जन्यते ॥ इति । अभावेन केवलेन नासौ जन्यत इत्यर्थः । प्रतिषिद्धाचरणात् प्रत्यवायः, होता । यदि अधिकार रहने पर भी अपने अवश्य कर्त्तव्य ( नित्य नैमित्तिक ) कर्मों का अनुष्ठान वे नहीं करते, फिर उनका प्रत्यवाय बढ़ता ही जाएगा । प्रत्यवाय को इस वृद्धि के कारण बद्धपुरुष कभी मुक्त नहीं होगा । जैसा आचार्यों ने कहा है कि-जितने भी काम्य, निषिद्ध, नित्य और नैमित्तिक कर्म हैं, सभी अनुष्ठान न करनेवाले अधिकारो को संसार में बाँधते हैं । ( प्र ० ) विहित कर्मों का न करना अभाव पदार्थ है, अभाव किसी का कारण नहीं हो सकता, अतः विहित कर्मों के न करने से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं हो सकती । ( उ ० ) यह कोई बात नहीं है, जिस समय अधिकारी विहित कर्म का अनुष्ठान न करेगा उस समय कोई दूसरा कर्म तो करेगा ही, इस दूसरे कर्म रूप भाव पदार्थ ) से ही प्रत्यवाय की उत्पत्ति होगी । अभाव स्वतन्त्र होकर ही किसी का कारण नहीं होता, किन्तु भाव पदार्थ रूप कारण का उपसर्जन तो होता ही है । जितने भी शरीरी हैं, वे सन्ध्यावन्दनादि के समय ( उसके न करने पर भी ) शरीर से वचन से या से कोई न कोई काम अवश्य ही करते हैं । क्योंकि शरीर को धारण करना भी तो कर्म ही है, जैसा कि आचार्यों ने कहा है-विहित कर्म का न करना यतः कर्मों का प्रागभाव है, अतः भाव पदार्थ न होने के कारण वह प्रत्यवाय के उत्पादन से सर्वथा विरत नहीं हो सकता, क्योंकि मूढ़ भी विहित कर्म के काल में उसे न करने पर भी अन्य कोई कर्म अवश्य हो करता है, उस दूसरे कर्म से प्रत्यवाय की उपत्ति होती है, विहिताकरण रूप प्रागभाव से ही नहीं । अर्थात् केवल उक्त प्रागभाव से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं होती है | ( प्र ० ) निषिद्ध कर्मों के आचरण से प्रत्यवाय होता है, शरीर धारण रूप कर्म तो निषिद्ध नहीं है, For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६८५ शरीरधारणादिकं च न प्रतिषिद्धम् । तत्कुर्वन्नपि यदि संध्यया योगमभ्यस्यति को दोष इति चेत्? न, तत्काले विहितस्यावश्यकर्तव्यताविधेरर्थात् केवलस्य शरीरधारणादेः करणं प्रतिषिद्धमिति । तदाचरतो भवत्येव प्रति-षिद्धाचरणनिमित्त: प्रत्यवायः अथोच्यते । दीर्घकालादरनैरन्तर्य सेवित-भावनाहितविशदभावमात्मज्ञानमेव रागद्वेषौ मोहं च समूलकाषं कषद्विहिता-करणनिमित्तं प्रत्यवायमपि कषतीति चेत्? तदयुक्तम् । यत्र ह्यभ्यासः प्रसीदति, तत्र तत्त्वग्रहो जातः संशयविपर्ययौ व्युदस्यति, न त्वस्य वस्त्वन्तर-निर्वहणे सामर्थ्यं दृष्टपूर्वम् । यदि पुनरात्मज्ञानं कर्माणि निरुणद्धि उपारूढ-फलभोगमपि कर्म निरुन्ध्यात्, ततः सुदुरं गता जीवन्मुक्तिः? तत्त्वदर्शनानन्तर-मेव विलीनाखिलकर्मणो देहपातात् । अस्ति चायं परमार्थदृष्टिनिरुद्धाखिलावि-द्यो s पि चित्रलिखितमिवाभासमात्रेण सर्वं जगत् पश्यन्नेकत्राप्यनारूढाभिनिवेशः प्रारब्धफलं कर्मविशेषमुपभुञ्जानः कुलालव्यापारविगमे चक्र-भ्रान्तिवत् संस्कारवशादनुवर्त्तमानस्य देहपातमुदीक्षमाणः । तथा च श्रुतिः फिर विहिताकरण के समय शरीर धारण से प्रत्यवाय की उत्पत्ति क्यों कर होगी! शरीरधारण करते हुए यदि संध्या वन्दन के समय कोई योग का ही अभ्यास करता है, तो उसे प्रत्यवाय क्यों होगा? ( प्र ० ) ' सन्ध्यावन्दन अवश्य करें ' यह विधान है, इस विधान से ही इस प्रतिषेध का भी आक्षेप होता है कि उस समय केवल शरीरका धारण न करे ( सन्ध्या-वन्दन से युक्त शरीर का ही धारण करे ) अतः उस समय केवल शरीर का धारण प्रतिषिद्ध है । सुतराम् उससे प्रत्यवाय होना उचित है । यदि यह कहें कि ( प्र ० ) दीर्घकाल से आदर-पूर्व किये गये अभ्यास के कारण आत्मा का विशद तत्त्वज्ञान जिस प्रकार राग, द्वेष, मोह प्रभृति को मूल सहित विनष्ट कर देता है, उसी प्रकार वही आत्मतत्त्वज्ञान विहित सन्ध्यावन्दनादि के न करने से होनेवाले प्रत्यवाय को भी विनष्ट कर देगा । 30 ) तो उक्त कथन भी सङ्गत नहीं होगा, क्योंकि उपयुक्त अभ्यास केवल विषयों के तत्त्व को ही पूर्ण रूप में समझा सकता है, जिससे उसमें जो संशय या विपर्यय रहता है, उसका विनाश हो जाय | अभ्यासजनित तत्वग्रह में यह सामर्थ्य कहीं उपलब्ध नहीं है कि किसी दूसरी वस्तु को भी वह उत्पन्न करे । यदि यह मान भी लें कि आत्मज्ञान से कर्मों का नाश होता है, तो फिर उससे सारे प्रारब्ध कर्मों का भी की बात ही छोड़ देनी पड़ेगी । क्योंकि तत्त्वज्ञान के कानाश हो जाएगा, जिससे कि आत्मज्ञानवाले पुरुष के किन्तु ऐसे महापुरुषों की सत्ता अवश्य है जिनको सभी नाश हो जाएगा, जिससे जीवन्मुक्ति बाद ही प्रारब्ध सहित सभी कर्मों शरीर का भी नाश हो जाएगा । अविद्यायें आत्मतत्त्वज्ञान से नष्ट हो चुकी हैं, जो सम्पूर्ण विश्व को चित्रलिखित आभासमात्र की तरह देखते हैं, किसी भी एक विषय में अभिनिवेश न रखकर, अपने प्रारब्ध को भोगते हुए संस्कार के कारण कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह देहपात की प्रतीक्षा करते हैं । जैसा श्रुति For Private And Personal