प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 761–770

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 761 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ६८६ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपणे मोक्ष-जीवन्नेव हि विद्वान् संहर्षायासाभ्यां विप्रमुच्यते इति । कापिला: -सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तथा चाहु: तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमवद् धृतशरीरः ॥ इति । धर्मादीनामकारणप्राप्ताविति तत्त्वज्ञानेनोच्छिन्नेषु सवासनक्लेशेषु धर्मा-दीनां सहकारिकारणप्राप्त्यभावे सतीत्यर्थः । अलब्धवृत्तीनि कर्माणि तत्त्वज्ञानाद् विलीयन्त इति चेत्? न तेषामपि कर्मत्वादारब्धफलकर्मवज् ज्ञानेन विनाशाभा-वात् । योऽपि ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ' इत्युपदेशः, तस्या-प्ययमर्थ: - ज्ञाने सति अनागतानि कर्माणि न क्रियन्त इति । न पुनरयमस्यार्थः-उत्पन्नानि कर्माणि ज्ञानेन विनाश्यन्त इति । तथा चागमान्तरम् ' नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि ' इत्यादि । ज्ञानं यदि न क्षिणोति कर्माणि? अनेक-जन्म सहस्रसञ्चितानां कर्मणां कुतः परिक्षयः? भोगात् कर्मभिश्च । तदर्थं कहती है कि ' आत्मज्ञानी पुरुष शरीर को धारण करते हुए भी हर्ष और शोक से विमुक्त रहते हैं " इसी प्रसङ्ग में सांख्यदर्शन के आचार्य ने भी कहा है कि--' सम्यग्ज्ञान ( आत्मतत्त्व ज्ञान ) की प्राप्ति से धर्मादि से संसार के उत्पादक सहकारी ( वासनादि ) नष्ट हो जाते हैं, फिर भी संस्कार के कारण कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह तत्त्व ज्ञानी शरीर को धारण किये ही रहते हैं । उक्त आर्या में प्रयुक्त ' धर्मादीनामकारणप्राप्ती ' इस वाक्य का अर्थ है कि ' तत्त्वज्ञान से जब वासना सहित सभी क्लेशों का नाश हो जाता है, जब संसार के कारणीभूत धर्मादि भावों के सहकारी नष्ट हो जाते हैं, उस समय ' | ( प्र ० तत्वज्ञान के द्वारा प्रारब्ध से भिन्न सभी कर्मो का विनाश हो जाता है । ( उ ० ) यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रारब्ध कर्म की तरह वे भी कर्म ही हैं अतः तस्वज्ञान से उनका भी नाश नहीं हो सकता । ' क्षीयन्ते चास्य कर्माणि ' इत्यादि वाक्य का जो यह उपदेश है कि " आत्मतत्त्वज्ञान के हो जाने पर उसके सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं " उसका इतना ही अभिप्राय है कि ज्ञान हो जाने के बाद कर्म की धारा रुक जाती है । फिर भविष्य में कर्म अनुष्ठित नहीं होते । उसका यह अर्थ नहीं है कि जो कर्म उत्पन्न हो गये हैं, तत्त्वज्ञान से उनका भी विनास होता है । जैसा कि दूसरे आगम के द्वारा कहा गया है । कि बिना भोग के कर्मों का नाश नहीं होता है, चाहे सौ करोड़ कल्प ही क्यों न बीत जाय । ( प्र ० ) ज्ञान से यदि कर्मों का नाश नहीं होता है, तो फिर कई हजार वर्षो से सश्चित कर्मों का नाश किससे होता है? ( उ ० ) भोग से और नाशक दूसरे कर्मों से ही ( उन सश्चित कर्मों का ) नाश होता है । ( प्र ० ) कर्मनाश के लिए विहित कर्मों से अनन्तजन्मों से सश्चित कर्मों का एक ही जन्म में विनाश किस प्रकार होगा? ( उ ० ) ऐसी कोई बात नहीं है, कर्मक्षय के लिए काल का कोई नियम नहीं है । जिस For Private And Personal

पृष्ठ 762

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 762 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६८७ चोदितैरनन्तानां कथमेकस्मिन् जन्मनि परिक्षय इति चेत्? न, काला-नियमात् । यथैव तावत् प्रतिजन्म कर्माणि चीयन्ते तथैव भोगात् क्षीयन्ते च । यानि त्वपरिक्षीणानि तान्यात्मज्ञेनापूर्वं सञ्चिन्वता च क्रमेणोप-भोगात् कर्मभिश्च नाश्यन्ते । यथोक्तम्-कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो भोगात् कर्मपरिक्षयम् । युगकोटिसहस्रेण कश्चिदेको विमुच्यते ॥ इति । तदेवं विहितमकुर्वतः प्रत्यायोत्पत्तेस्तस्य च बन्धहेतुत्वादन्यतो विरामा-भावात्, प्रत्यवायनिरोधार्थं मुक्तिमिच्छता योगाभ्यासाविरोधेन भिक्षाभोजनादि-वद् यथाकालं विहितान्यनुष्ठेयानि यावदस्यात्मतत्त्वं न स्फुटीभवति । स्फुटी-कृतात्मतत्त्वस्यापि जीवन्मुक्तस्य तावत्कर्माणि भवन्ति, यावद्यात्रानुवर्तते । आत्मैकप्रतिष्ठस्य त्वभ्यर्णमोक्षस्य परिक्षीणप्रायकर्मणः तानि नश्यन्त्येव, बहिः संवित्तिविरहात् । परिणतसमाधिसामर्थ्य विशदीकृतमुपचितवैराग्या-हितपरिपाकपर्यन्तमापादितविषयाद्वैतमुन्मूलित निखिलविपर्ययवासन मेकाग्रीकृतान्तः-करणकारणमात्मतत्त्वज्ञानमेव केवलं तदानों सञ्जायते, न बहिः संवेदनम्, प्रकार प्रत्येक जन्म में कर्म का सचय होता है उसी प्रकार भोग से उनका विनाश भी होता रहता है । उनमें जितने कर्म भोग से बच जाते हैं, उन कर्मों को आगे आत्मज्ञ पुरुष अपूर्व कर्मों का सश्चय करते हुए ही भोग से और ( प्रतिरोधक ) कर्म से क्रमशः नष्ट कर देते हैं । जैसा कहा गया है कि-आत्मज्ञान से भोग के द्वारा कर्मों का नाश करते हुए हजारों कोटियुगों में कोई एक पुरुष मुक्त होता है । इन सब कारणों से यह मानना पड़ता है प्रत्यवाय बन्ध का कि यतः विहित कर्मों को न करने कारण है, इस प्रत्यवाय की निवृत्ति अतः जिन्हें मुक्ति पाने की अभिलाषा से प्रत्यवाय होता है, एवं विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना सम्भव नहीं है, हो, उन्हें योगाभ्यास को क्षति पहुँचाये बिना विहित कर्मों का अनुष्ठान तब तक करते रहना चाहिए, जब तक आत्मतत्त्व पूर्ण रूप से अवगत न हो जाय । जैसे कि ज्ञान न हो जाने तक भिक्षा भोजन प्रभृति कर्मों का अनुष्ठान अन्त तक करना पड़ता है । आत्मा का परिस्फुट ज्ञान हो जाने पर भी यदि वे जीवनमुक्त हैं, तो जब तक यह शरीर है, तब तक नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान उन्हें भी करना पड़ेगा । जिस महापुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान रह जाता है, और इस कारण जो परममुक्ति के समीप पहुंच जाते हैं, उनसे कर्म स्वयं छूट जाते हैं, क्योंकि उन्हें बाह्य विषयों का ज्ञान हो नहीं रह जाता । उन्हें तो केवल आत्मा का हो विशिष्ट ज्ञान रह जाता है । परिणत समाधि के द्वारा उत्पन्न होने के कारण जिस आत्मज्ञान में पूरी स्वच्छता आ गयी है, तीव्र वैराग्य से जिसमें पूरी परिपक्वता आ गयी है । एवं जिस आत्मज्ञान में दूसरे सभी विषयों का सम्बन्ध पूर्णतः समाप्त हो गया जिससे सभी विपर्यय रूप मिथ्या ज्ञान का For Private And Personal

पृष्ठ 763

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 763 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६८८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपणे मोक्ष-: - ' न बाह्येन्द्रियव्यापारोपरमात् । तत्र कः संभवः कर्मणाम्? तथा च श्रुतिः-शृणोतीत्याहुरेकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवतीत्यादि । तदा चाकरण-निमित्त: प्रत्यवायोऽपि नास्ति सन्ध्येयमुपस्थितेत्यादिकमजानतो ब्राह्मणोऽस्मीति प्रतीतिरहितस्य कर्माधिकारपरिभ्रंशात् । यथोक्तम्-ब्राह्मणत्वानहमानी कथं कर्माणि संसृजेत् ॥ इति । न चास्योपरत समस्तव्यापारस्य काष्ठवदवस्थितस्यापि प्राणिहिंसापि संभवति । यत् पुनरस्य दृष्टद्रष्टव्यस्य क्षीण ेतव्यस्य वशीकृतमनसो विषयाव-बोधस्मरणसंकल्पसुखदुःखबहिष्कृतस्य ब्रह्मलग्नसमाधेरपि शरीरं कियन्तञ्चित् ( कालमनुवर्तते ) तच्छरीरस्थितिमात्र हेतोरायुविपाकस्य कर्मग्रन्थेरनुच्छेदात् । यदा तु यावन्तं कालमायुविपाकेन कर्मणा शरीरं धारयितव्यं तावत्काल-प्राप्तिरभूत्, तदा स्वकार्यकरणात् कर्मसमुच्छेदे तत्कार्यस्य शरीरस्य निवृत्तिः । विनाश हो गया है । जिस आत्मज्ञान की उत्पत्ति एकाग्र अन्तःकरण से होता है । ऐसे आत्मज्ञानवाले पुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान उस समय होता है । बाह्य किसी विषय का भान उन्हें नहीं रह जाता, क्योंकि बाह्य विषयों के साथ उनकी इन्द्रियों का सम्बन्ध हो नहीं रह जाता है । ऐसी स्थिति में उनसे कर्म सम्पादन की कौन सी आशा की जा सकती है? इसी स्थिति को श्रुति ने ' न शृणोतीत्याहुरेकीभवति ' इत्यादि वाक्यों से कहा है । उस समय उनसे विहित कर्मों का अनुष्ठान न होने पर भी उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता । क्योंकि जिन्हें कर्माधिकार का सूचक ' अभी सन्ध्या उपस्थित हो गयी, मैं ब्राह्मण हूँ इत्यादि ज्ञान नहीं है, उनका कर्म करने का अधिकार भी छूट जाता है । जैसा कहा गया है कि--' मैं ब्राह्मण हूँ ' जिनको इस प्रकार का अहङ्कार नहीं है, वे ब्राह्मणोचित कर्म के साथ कैसे सम्बद्ध हो सकते हैं? इस प्रकार सभी कर्म छूट जाने के कारण जो काठ की तरह हो गये हैं, उनसे किसी भी प्राणी की हिंसा सम्भव नहीं है । जिन्होंने जानने योग्य सभी विषयों को जान लिया है, छोड़ने योग्य सभी विषयों को छोड़ दिया है! जिन्होंने मन को वशीभूत कर विषयों के अनुभव, स्मरण, संकल्प, सुख एवं दुःख सभी से छुटकारा पा लिया है, वे यदि ब्रह्म के ध्यान में समाधिस्थ भी हैं तथापि उनकी शरीर की अनुवृत्ति जो थोड़े समय के लिए भी चलती है, उसका कारण वह कर्मग्रन्थि रूप विपाक है जो केवल शरीर स्थिति का ही कारण है । जितने समय के आयु तक उक्त कर्मविपाक से शरीर की स्थिति आवश्यक है, वह समय जब समाप्त हो जाता है, तब अपना कर्तव्य समाप्त होने के कारण कर्म भी समाप्त हो जाता है । कर्म की समाप्ति से शरीर की समाप्ति, और शरीर की समाप्ति से तत्त्वज्ञान की भी समाप्ति हो जाती है, जिससे आत्मा को कैवल्य प्राप्त होता है । For Private And Personal

पृष्ठ 764

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 764 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६८६ निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्य मापद्यते । तत्रात्म-तत्वज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतु कर्मप्रतिबन्धव्यापारादस्ति सम्भूय-कारिता | शरीरादिविविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रति-सन्दधानस्याहङ्कार - ममकारयोरुपरमे सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोर-भावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतरकर्मणोरसश्वयात् सश्वितयोश्चोप-भोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठा-नेनंव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ कारणान्तराभावादा-मुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् । यथोक्तम्-नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् । ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥ अभ्यासात् पक्वविज्ञानः कैवल्यं लभते नरः ॥ इति । तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः । कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः । भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति । इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहितकर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर ( ज्ञानकर्मसमुच्चय ) हो बन्ध के कारणीभूत कर्मों के प्रतिरोध करने की क्षमता रखते हैं । जिस पुरुष को ' शरीरादि से आत्मा भिन्न है ' इस प्रकार का ज्ञान और शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और अपकार न समझने की बुद्धि है, उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा को प्रवृत्ति रुक जाती है, और वह उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है, और पहिले किये गये ( सचित ) पापपुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा, उसका प्रतिरोध विहित कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जाएगा, और कारणों के न रहने पर पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि-नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञानवाले पुरुष को ही कैवल्य प्राप्त होता है । अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है, जैसा कि इस श्लोक से स्पष्ट है-कर्म से अन्तःकरण को शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का ( साक्षात्कारात्मक ) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है । ८७ For Private And Personal

पृष्ठ 765

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 765 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ गुणनिरूपण मोक्ष-किं पुनरात्मनः स्वरूपं येनावस्थितिर्मुक्तिरुच्यते? आनन्दात्मतेति केचित् । तदयुक्तम् । विकल्पासहत्वात् । स किमानन्दो मुक्तावनुभूयते वा? न वा? यदि नानुभूयते? स्थितोऽप्यस्थितान्न विशिष्यते, अनुपभोग्यत्वात् । अनुभूयते चेत्? अनुभवस्य कारणं वाच्यम् । न च कायकरणादिविगमे तदुत्पत्तिकारणतां पश्यामः । अन्तःकरणसंयोगः कारणमिति चेत्? न, धर्माधर्मोपगृहीतस्य हि मनसः सहायत्वात्, तदखिलशुभाशुभबीजनाशोपगतं नात्मानुकूल्येन वर्त्तते । योगज-धर्मानुग्रहादात्मानमनुकूलयति चेत्? योगजोऽपि धर्मः कृतकत्वादवश्यं विना. शीति तत्प्रक्षये मनसः कोऽनुग्रहीता? अथ मतम् - अचेतनस्यात्मनो मुक्तस्यापि पाषाणादविशेषः, सोऽपि हि न सुखायते न दुःखायते । मुक्तोऽपि यदि तथैव, को s नयोविशेषः? तस्मादस्त्यात्मनः स्वाभाविकी चितिः, सा यदेन्द्रियैर्बहिरा -कृष्यते, तदा बहिर्मुखीभवति । यदा त्विन्द्रियाण्युपरतानि भवन्ति, तदा स्वात्मन्ये-वानन्दस्वभावे निमज्जति । आत्मा का वह कौन सा स्वरूप है जिस स्वरूप से आत्मा की स्थिति मुक्ति कहलाती है? ( इस प्रश्न का उत्तर ) कुछ लोग इस प्रकार देते हैं कि वह स्थिति आत्मा की आनन्दस्व-रूपता ही है । किन्तु यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित कोई भी विकल्प युक्त नहीं ठहरता । ( पहिला विकल्प यह है कि ) मुक्तावस्था में इस आनन्द का अनुभव होता है? अथवा नहीं? यदि अनुभव नहीं होता है, तो फिर उस आनन्द का रहना और न रहना दोनों बराबर है । क्योंकि उस आनन्द का उपभोग नहीं किया जा सकता । यदि कहें कि उस आनन्द का अनुभव होता है? तो फिर उस अनुभव का कारण कौन है— यह कहना पड़ेगा । शरीर एवं इन्द्रियादि के नष्ट हो जाने पर और किसी को उस अनुभव का कारण मानना सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) अन्तःकरण ( मन ) का संयोग उसका कारण होगा? ( उ ० 1 ) सो भी सम्भव नहीं है क्योंकि धर्म और अधर्म से प्रेरित मन हो अनुभव का सहायक है । जिसके सभी धर्म और अधर्म नष्ट हो चुके हैं, उसके मन से आत्मा को दुःख का अनुभव नहीं हो सकता । ( प्र ० ) योगज धर्म के साहाय्य से वह मन आत्मा के अनुकूल होता है ( अर्थात् आत्मा सुखानुभव उ ० के का उत्पादन करता है ) । ( ) किन्तु योगज धर्म भी तो उत्पत्तिशील हो है, अतः उसका भी अवश्य नाश होगा, फिर उसके नष्ट हो जाने पर मन का सहायक कौन होगा? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) मुक्त भो हो यदि उसमें चैतन्य न रहे, तो फिर पत्थर के समान ही होगा, क्योंकि पत्थर में भी सुख दुःख को चेतनायें नहीं होतीं । यदि मुक्त पुरुष को भी सुख और दुःख को चेतनाओं से रहित मान लिया जाय, तो पत्थर और मुक्त आत्मा में क्या अन्तर रहेगा? अतः यह मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक स्वाभाविक चैतन्य होता है । वह चैतन्य जब इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की तरफ खींचा जाता है, तब वह चैतन्य बहिर्मुख होता है ( अर्थात् बाह्य विषयक ज्ञान में परिणत होता है ) । जब इन्द्रियाँ For Private And Personal

पृष्ठ 766

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 766 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ६६१ अयं हि चितेरात्मा यदि यं कश्विदवभासयति, यदि पुनरियं मुक्ता-वस्थायामुदास्ते, तहि स्थितोऽप्यस्थित एव । वरमात्मा जड एवं कल्प्यता-मिति चेत्? अत्रोच्यते - किं चितेरानन्दात्मता स्वाभाविकी? कारणान्तर-जन्या वा? न तावदवभासकारणं मुक्तावस्ति, कायकरणादीनां तत्कारणानां विलयादित्युक्तम् । स्वाभाविकी चेत्? संसारावस्थायामप्यानन्दोऽनुभूयेत, चिति-चैत्ययोरुभयोरपि सम्भवात् । अविद्याप्रतिबन्धादननुभव इति चेत्? न, नित्या-याश्चितेरानन्दानुभवस्वभावायाः स्वरूपस्याप्रच्युतेः कः प्रतिबन्धार्थः? प्रच्युतौ वा स्वरूपस्य का नित्यता? तस्मान्नित्य आनन्दो नित्यया चित्या चेत्यमानो द्वयोरप्यवस्थयोरविशेषेण चेत्यते । न चैवमस्ति संसारावस्थायामुत्पन्नापव-गिणो विषयेन्द्रियाधीनज्ञानस्य सुखस्यानुभवात् । अतो नास्त्यात्मनो नित्यं अपने व्यापार से निवृत्त हो जाती हैं, उस समय वह ( चैतन्य ) अपने आनन्द स्वभाव में ही निमग्न रहता हैं । चित्स्वरूप इस आत्मा का यह स्वभाव है कि किसी को भासित करे । यदि मुक्तावस्था में वह इस काम से उदासीन हो जाता है, तो फिर उस समय चैतन्य का उसमें रहना और न रहना बराबर है । इससे अच्छा है कि आत्मा को जड़ ही मान लिया जाय । इस प्रसङ्ग में हम लोगों ( सिद्धान्तियों ) का कहना है कि आत्मा में जो आनन्द की अभिन्नता है वह स्वाभाविक है? या किसी दूसरे कारण से उत्पन्न होती है ( यदि कारणान्तरजन्य मानें तो ) मुक्तावस्था में वे कारण नहीं हैं । क्योंकि कह चुके हैं कि अवभास के कारण शरीर इन्द्रियादि का उस समय विलय हो जाता है । यदि उसको स्वाभाविक मानें तो फिर संसारावस्था में भी उसका अवभास होना चाहिए, क्योंकि उस समय भी अवभास्य और अवभासक दोनों विद्यमान हैं । ( प्र ० ) संसारावस्था में अविद्या रूप प्रतिबन्धक के कारण उस आनन्द का भान नहीं होता है । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि चिति नित्य है, एवं आनन्द 1. उसका स्वरूप है, अतः चिति अपने उस आनन्द स्वरूप से विच्युत हो ही नहीं सकती । फिर उक्त प्रतिबन्ध के लिए कोई अवसर ही नहीं रह जाता । यदि चिति कभी ( संसारावस्था में ) अपने आनन्दस्वरूपता से प्रच्युत हो सकती हैं, तो फिर वह नित्य हो नहीं रह जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि आनन्द भी नित्य है, एवं नित्य चिति के द्वारा ही उसका अनुभव होता । यदि ऐसी बात है, तो फिर संसार और अपवर्ग दोनों ही अवस्थाओं में समान रूप से नित्य आनन्द का अनुभव होना चाहिए । किन्तु सो नहीं होता, क्योंकि संसारावस्था में जब तक अपवर्ग की प्राप्ति नहीं होती, तब तक विषय एवं इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान और सुख का ही अनुभव होता है । तस्मात् आत्मा का नित्यसुख नाम का कोई गुण ही अनुभव में नहीं आता । अतः आत्मा का नित्यसुख नाम का कोई गुण नहीं है । सुतरामु नित्यसुख के अनुभव की अवस्था मुक्ति नहीं है । आत्मा के सभी विशेष-For Private And Personal

पृष्ठ 767

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 767 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir IIII शब्दोऽम्बरगुणः न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् श्रोत्रग्राह्यः, क्षणिकः, विरोधी, संयोगविभागशब्दजः प्रदेशवृत्तिः, आकाश का गुण ही शब्द है । वह क्षणिक है, एवं उसके कार्य और उसके [ गुणनिरूपणे शम्बं--कार्य कारणोभय-समानासमानजातीय-उसका प्रत्यक्ष श्रोत्र से होता हैं । कारण दोनों ही उसके विनाशक हैं । न्यायकन्दली सुखं तदभावान्न तदनुभवो मोक्षावस्था, किन्तु समस्तात्म विशेषयु जोन्छे बोपलक्षिता स्वरूपस्थितिरेव । यथा चायं पुरुषार्थस्तथोपपादितम् । शब्दोऽम्बरगुणः आकाशगुणः । ननु संख्यादयोऽप्याकाशगुणाः सन्ति, कथमिदं शब्दस्य लक्षणं स्यादत आह- श्रोत्रग्राह्य इति । श्रोत्रग्राह्यत्वे सत्यम्बरगुणो यः स शब्द इत्यर्थः । परस्य विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थमाह-क्षणिक इति । आशुतरविनाशी शब्दो न तु नित्यः, उच्चारणादूर्ध्वमनुपलम्भात् । सद्भावे प्रमाणाभावेन व्यञ्जकत्वकल्पनानवकाशात् । प्रत्यभिज्ञानस्य ज्वा लादिवत् सामान्यविषयत्वेनोपपतेस्तीव्रमन्दतादिभेदस्य च व्यक्ति भेदप्रसाधक-त्वात् । कार्यकारणोभयविरोधी आद्यः शब्दः स्वकार्येण विरुध्यते अन्त्यः स्वकारणेनोपान्त्यशब्देन विरुध्यते, अन्त्यस्य विनाशकारणस्याभावात् । मध्य-गुणों के आत्यन्तिकविनाश से युक्त आत्मा की स्वरूपस्थिति ही मोक्ष ' है । यह अवस्था पुरुष के लिए काम्य क्यों है? इसका उपपादन ( मङ्गलश्लोक की व्याख्या में ) कर चुके हैं । ' शब्दोऽम्ब र गुणः ' अर्थात् आकाश का गुण ही शब्द है । संख्यादि भी तो आकाश के -गुण हैं, फिर आकाश का गुण होना शब्द का लक्षण कैसे हो सकता है? इसी आक्षेप के समाधान के लिए ' श्रोत्रग्राह्य ' पद का उपादान किया गया है । अर्थात् जो श्रोत्र के द्वारा ग्रहण के योग्य हो, और आकाश का गुण भी हो वही ' शब्द ' है । शब्द में नित्यत्व पक्ष के निराकरण के लिए ही ' क्षणिक: ' यह पद प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् उत्पत्ति के बाद शब्द अतिशीघ्र विनष्ट हो जाता है, अतः वह नित्य नहीं है क्योंकि उच्चारण के बाद फिर उसकी उपलब्धि नहीं होती है । ( प्र ० उच्चारण के बाद शब्द की अभिव्यक्ति का कोई साधन नहीं रहता, अतः शब्द की उपलब्धि नहीं होती, किन्तु उस समय भी शब्द है ही । ( उ ० ) उच्चारण के बाद शब्द की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, अतः शब्द के व्यञ्जक की कल्पना करने का कोई अवकाश नहीं है । ' सोऽयं गकारः ' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक मान लेने से भी काम चल सकता है । एवं शब्दों में एक दूसरे में तीव्र और मन्द का व्यवहार होता है । ( वह भी नित्यश्व पक्ष में उपपन्न नहीं होता ) इससे अनेक शब्दों की कल्पना आवश्यक होती है । ' कार्य-कारणोभयविरोधी ' अर्थात् प्रथम शब्द अपने द्वारा उत्पन्न द्वितीय शब्द से विनष्ट होता हैं, For Private And Personal

पृष्ठ 768

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 768 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरण 1 भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् II कारणः । स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र अका-रादिर्वर्णलक्षणः शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र वर्ण-संयोग, विभाग और शब्द ( इन तीनों में से किसी ) से उसकी उत्पत्ति होती है । वह अपने आश्रयद्रव्य के किसी एक देश में ही रहता है । वह अपने समानजातीय ( शब्द ) और विजातीय ( संयोग और विभाग इन दोनों ) से उत्पन्न होता है । यह ( १ ) वर्ण और ( २ ) ध्वनि भेद से दो प्रकार का है । उनमें अकारादि शब्द वर्णरूप हैं, और शङ्खादि से उत्पन्न शब्द ध्वनिरूप हैं । न्यायकन्दली वर्तनस्तुभयथा विरुध्यन्ते । संयोगविभागशब्दजः । आद्यः शब्दः संयोगाद् शब्दादिति विवेकः । विभागाच्च जायते, पूर्व प्रदेशवृत्तिः अव्याप्यवृत्तिरित्यर्थः । एतच्चोपपादितम् । समानासमान -जातीयेति । शब्दजः 1 शब्दः समानजातीयकारणः । संयोगजविभागजश्च अस मानजातीथकारणः । सद्विविधो वर्णलक्षणः, ध्वनिलक्षणश्च । अकारादिर्वर्ण-लक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणः । तत्र तयोर्मध्ये, वर्णलक्षणस्यो-त्पत्तिरुच्यते । आत्ममनसोः संयोगात् पूर्वानुभूतवर्णस्मृत्यपेक्षात् तत्सदृशवर्णो-च्चारणे कर्तव्ये इच्छा भवति । ततः प्रयत्नस्तं प्रयत्नं निमित्तकारणमपेक्षमाणा-दात्मवायुसंयोगादसमवायिकारणात् कौष्ठयवायौ कर्म जायते । स च वायु-रूर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति हृत्कण्ठताल्वादीन् प्रदेशानभिहन्ति । ततो s एवं अन्तिम शब्द अपने कारणीभूत अपने से अव्यवहितपूर्व के शब्द से विनष्ट होता है, क्योंकि अन्तिम शब्द के विनाश का कोई और कारण नहीं हो सकता । बीच के जो शब्द हैं, कार्यशब्द और कारणीभूत शब्द दोनों ही उनके विरोधी हैं । ' संयोगविभाग-शब्दज: ' अर्थात् प्रथम शब्द ( कभी संयोग से और कभी ) विभाग उत्पन्न होता है, अत: उनके दोनों ही कारण हैं । मध्य के सभी शब्द शब्द से ही जन्म लेते हैं । प्रदेशवृत्तिः ' अर्थात् शब्द अव्याप्यवृत्ति है ( अपने आश्रय के सभी देशों में नहीं रहता ) । ' शब्द किस प्रकार अव्याप्यवृत्ति है ' इसका उपपाटन ( शब्द के साधर्म्यप्रकरण में ) कर चुके हैं । ' समानासमानजातीयेति ' शब्द से जिस शब्द की उत्पत्ति होती है, वह समान-जातीयकारणक है । संयोग और विभाग से जिन शब्दों की उत्पत्ति होती है, उनके कारण शब्द के असमानजातीय हैं । ' स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च ' अकारादि वर्णलक्षण शब्द है, एवं ' तत्र ' अर्थात् उनके शङ्ख प्रभृति से जो शब्द उत्पन्न होते हैं, वे ध्वनिलक्षण शब्द हैं । दोनों प्रकार के शब्दों में वर्णलक्षण शब्द की उत्पत्ति ( की रीति ) वर्ण की स्मृति के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा कहते हैं । अनुभूत सर्वप्रथम उस वर्ण के For Private And Personal

पृष्ठ 769

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 769 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६ ९ ४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-लक्षणस्योत्पत्तिरात्ममनसोः संयोगात् स्मृत्यपेक्षाद् वर्णोच्चारणेच्छा, तदनन्तरं प्रयत्नः, तमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगाद् वायौ कर्म जायते । वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि स्मृतिसहकृत आत्मा और मन के संयोग के द्वारा वर्ण के उच्चारण की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न के द्वारा आत्मा एवं वायु के संयोग से वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । न्यायकन्दली भिघातानन्तरं स्थानस्य कण्ठादेः कौष्ठयवायुना सह यः संयोगस्तन्निमित्त-कारणभूतमपेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् समवायिकारणाद् वर्णोत्पत्तिः । अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगाद् दण्डगतं वेगमपेक्षमाणाद् भेर्याकाशसंयोगा-दुपजायते । भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम्, भेरीदण्डसंयोगो दण्डगतश्च वेगो निमित्तकारणम् । वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाशविभागाच्च शब्दो जायते । शब्दाच्च शब्दनिष्पत्ति कथयति - शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीचीसन्तानवच्छब्द सन्तानः, यथा जलवीच्या तदव्यवहिते देशे वीच्यन्तरमुपजायते, ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्य-दित्यनेन क्रमेण वीचीसन्तानो भवति, तथा शब्दादुत्पन्नात् तदव्यवहिते देशे समानवर्ण के उच्चारण की इच्छा होती है । इसके बाद ' प्रयत्न ' अर्थात् समानवर्ण के उच्चारण के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । उस प्रयत्न रूप निमित्त कारण के साहाय्य से आत्मा और वायु के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा पुरुष के कोष्ठगत वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । वह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ आते हुए कण्ठादि स्थानों में आघात उत्पन्न करता है अर्थात् हृदय, कण्ठ तालु प्रभृति वर्णों के जो उच्चारणस्थान हैं, वहाँ आघात करता है । इस अभिघात के वाद कौष्ठय वायु के साथ कण्ठादि स्थानों का जो संयोग होता है, उस संयोग रूप निमित्त कारण के साहाय्य से कण्ठादि स्थान और आकाश इन दोनों के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा वर्ण रूप शब्द की उत्पत्ति होती है । अवर्णरूप शब्द ( ध्वनि ) भी दण्ड में उत्पन्न वेग के साहाय्य से भेरी और आकाश के संयोग के द्वारा उत्पन्न होता है । ( अर्थात् इस ध्वनि रूप शब्द के प्रति ) भेरी और आकाश का संयोग असमवायिकारण है, एवं भेरी और दण्ड का संगोग और दण्ड में रहनेवाला वेग ये दोनों निमित्त कारण हैं । बाँस और उसके गाँठ इन दोनों के विभाग एवं बाँस और आकाश के विभाग, इन दोनों से भी शब्द की उत्पत्ति होती है । ' शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद्वीची सन्दान वच्छन्द सन्तान: ' इस सन्दर्भ से शब्द-जनित शब्द का निरूपण करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार जल के एक तरङ्ग से उसके अति निकट के जल प्रदेश में दूसरा तरङ्ग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार ( संयोग और For Private And Personal

पृष्ठ 770

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 770 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ६ ९ ५ स चोर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति ततः पेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् वर्णोत्पत्तिः । स्थानवायु संयोगा-अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्ड संयोगापेक्षाद् भेर्याकाशसंयोगादुत्पद्यते । वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाश विभागाच्च शब्दाच्च संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीची सन्तानवच्छन्द सन्तान इत्येवं सन्तानेन श्रोत्र प्रदेशमागतस्य यह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ जाते समय कण्ठ में अभिघात को उत्पन्न करता है । इसके वाद ( कण्ठादि ) स्थान और वायु का संयोग, एवं ( कण्ठादि ) स्थान और आकाश के संयोग इन दोनों संयोगों से वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति होती है । भेरी ( प्रभृति ) और दण्ड ( प्रभृति ) का संयोग एवं भेरी ( प्रभृति ) और आकाश का संयोग, इन दोनों संयोगों से अवर्ण ( ध्वनि ) रूप शब्द की उत्पत्ति होती है । बाँस और उसकी सन्धि ( गाँठ ) के विभाग एवं बाँस और आकाश का विभाग इन दोनों विभागों से शब्द की उत्पत्ति होती है । संयोग और विभाग से निष्पन्न शब्द के तरङ्गों के समूह की तरह शब्द भी शब्द के तरङ्गों के समूहों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार शब्द के न्यायकन्दली शब्दान्तरम्, ततोऽप्यनयोर्गमनागमनाभावात् प्राप्तस्यैवोपलब्धिरिति, ततोऽप्यन्यत्, ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण शब्दसन्तानो भवति । एवं सन्तानेन श्रोत्रदेशे समागतस्यान्त्यशब्दस्य ग्रहणम् । नन्वेषा कल्पना कुतः सिद्धयतीत्यत आह- श्रोत्रशब्दयोरिति । न श्रोत्रं शब्ददेशमुपगच्छति, नापि शब्दः श्रोत्रदेशम्, तयोनिष्क्रियत्वात् । अप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति इन्द्रियाणां प्राप्यकारित्वात् । प्रकारान्तरेण चोपलब्धिर्न घटते । दृष्टा च वीचीसन्ताने स्वोत्पत्तिदेशे विनश्यतामपि स्वप्रत्यासत्तिमपेक्ष्य तद-व्यवहिते देशे सदृशकार्यारम्भपरम्परया देशान्तरप्राप्तिः, तेन शब्दसन्तानः कल्प्यते निमित्तकारणभूतः कौष्ठ्यवायुरनुवर्त्तते, । न चानवस्था, यावद्वरं तावद्वरं शब्दसन्तानानुवृत्तिः । अत एव प्रतिवातं शब्दानुपलम्भ:, कौष्ठय-विभाग से उत्पन्न ) शब्द के द्वारा उसके अति समीप के आकाश प्रदेश में दूसरे तत्सदृश शब्द की उत्पत्ति होती है । ( यह इसलिए मानना पड़ता है कि ) श्रोत्र और शब्द दोनों ही ( यत: व्य नहीं है ) अतः अन्यत्र नहीं जा सकते, एवं जब तक इन्द्रिय के साथ बिषय का सम्बन्ध नहीं होगा तब तक विषय का ग्रहण सम्भव नहीं है । अतः दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति, तीसरे शब्द से चौथे शब्द की उत्पत्ति, इस प्रकार शब्द-सन्तान ( समूह ) की उत्पत्ति होती है । इस सन्तान का अन्तिम शब्द श्रोत्र प्रदेश में जब उत्पन्न होता है, तब उस सन्तान के उसी अन्तिम शब्द का ग्रहण होता है । इस प्रकार के शब्दसन्तान की कल्पना क्यों आवश्यक होती है? इसी प्रश्न का समाधान ' श्रोत्रशब्दयोः ' For Private And Personal