प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 771–780
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 771–780
पृष्ठ 771
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६ ९ ६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-प्रशस्तपादभाष्यम् ग्रहणम् । श्रोत्रशब्दयोर्गमनागमनाभावादप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, परिशेषात् सन्तानसिद्धिरिति । इति प्रशस्तपादभाष्ये गुणपदार्थः समाप्तः । ( उक्त समूहों के द्वारा ) श्रोत्र प्रदेश में पहुँचने के बाद श्रोत्र के द्वारा उसका प्रत्यक्ष होता है । यतः श्रोत्रेन्द्रिय और शब्द इन दोनों में से कोई भी गतिशील नहीं है, और श्रोत्र से असम्बद्ध शब्द का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, अतः परिशेषानुमान से ( शब्दजनित ) शब्दसन्तान ( समूह ) की सिद्धि होती है । प्रशस्तपादभाष्य में गुणों का निरूपण समाप्त हुआ । न्यायकन्दली वायुप्रतिघातात् । अतीवायं मार्गस्ताकिकैः क्षुण्णस्तेनास्माभिरिह भाष्यतात्पर्य-मात्रं व्याख्यातम्, नापरा युक्तिरुक्ता । गुणोपबद्धसिद्धान्तो
युक्तियुक्तिप्रभावितः ।
मुक्ताहार इव स्वच्छो हृदि विन्यस्यतामयम् ॥
इति भट्ट श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेश न्यायकन्दलीटीकायां गुणपदार्थः समाप्तः । इत्यादि से किया गया है । अर्थात् न शब्द ही श्रोत प्रदेश में जा सकता है, और न श्रोष ही शब्द प्रदेश में आ सकता है, क्योंकि दोनों ही क्रिया से सर्वथा रहित हैं । यतः इन्द्रियाँ विषय के साथ सम्बद्ध होकर ही विषय को ग्रहण करती हैं ( यही इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व है ) । अतः शब्दसन्तान की कल्पना के बिना शब्द की उपलब्धि उपपन्न नहीं हो सकती । जल के तरङ्ग अपनी उत्पत्ति के प्रदेश में विनाशप्राप्त होने पर भी उससे अव्यवहित उत्तर प्रदेश में अपने सदृश ही दूसरे तरङ्गव्यक्ति को उत्पन्न करते हुए देखे जाते हैं? इसी दृष्टान्त के बल से शब्दसन्तान की कल्पना करते हैं । इसमें अनवस्था दोष भी नहीं है, क्योंकि शब्द के निमित्तकारण कोष्ठ सम्बन्धी की वायु अनुवृत्ति जितनी दूर तक रहेगी, उतनी ही दूर तक शब्दसन्तान की अनुवृत्ति की कल्पना करेंगे । यही कारण हैं कि रहने पर शब्द की उपलब्धि नहीं होती है, क्योंकि कोष्ठ सम्बन्धी वायु हो जाता है । इस मार्ग को तार्किकों प्रतिकूल वायु के उससे प्रतिहत ने अनेक प्रकार से रौंद डाला है. अत: हम लोगों ने कोई दूसरी युक्ति नहीं दिखलायी । भाष्य का तात्पर्य मात्र ही लिखा, मोती के माला की तरह ( गुणनिरूपण रूप ) यह स्वच्छ हार विद्वान् लोग हृदय में धारण करें । यह हार युक्ति स्वरूप शुक्तिका में उत्पन्न मोतियों से बना है, एवं सिद्धान्त सिद्धगुण ( डोरी में ) गुंथा हुआ है । भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रची गयी एवं पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टोका का गुणपदार्थों का विवेचन समाप्त हुआ । For Private And Personal
पृष्ठ 772
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् अथ कर्मपदार्थनिरूपणम् उत्क्षेपणादीनां प्रशस्तपादभाष्यम् पञ्चानामपि १ ९ ७ कर्मत्वसम्बन्धः । एकद्रव्यवत्वं क्षणिकत्वं मृद्रव्यवृत्तित्वमगुणवाचं गुरुत्व-द्रवत्वप्रयत्नसंयोगवश्वं स्वकार्य संयोगविरोधित्वं संयोगविभागनिरपेक्ष-( १ ) कर्मत्व जाति के साथ सम्बन्ध, ( २ ) एक समय एक ही द्रव्य में रहना, ( ३ ) क्षणिकत्व, ( ४ ) मूर्त द्रव्यों में ही रहना, ( ५ ) गुण-रहितत्व, ( ६ ) गुरुत्व, द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इन चार गुणों से उत्पन्न होना, ( ७ ) अपने द्वारा उत्पन्न संयोग से नष्ट होना, ( ८ ) किसी और के साहाय्य के बिना संयोग और विभाग को उत्पन्न करना, ( ६ ) असमवायि-कारणत्व, ( १० ) अपने आश्रय रूप द्रव्य एवं उससे भिन्न द्रव्य इन दोनों में न्यायकन्दली जगदङ्कुरबीजाय
संसारार्णवसेतवे ।
नमो ज्ञानामृतस्यन्दिचन्द्रायार्धेन्दुमौलये ॥
उत्क्षेपणादीनां च परस्परं साधर्म्यमितरपदार्थवैधर्म्य च प्रतिपादयन्नाह-उत्क्षेपणादीनामिति । कर्मत्वं नाम सामान्यम्, तेन सह सम्बन्ध उत्क्षेपणा-बीनामेव । एकद्रव्यवत्त्वम् एकदा एकस्मिन् द्रव्ये एकमेव कर्म वर्तते, एकं कर्म एकत्रैव द्रव्ये वर्त्तत इत्येकद्रव्यवत्त्वम् । यद्येकस्मिन् द्रव्ये युगपद् विरुद्धो भयकर्म-समवायः स्यात्, तदा तयोः परस्परप्रतिबन्धाद् दिग्विशेषसंयोगविभागानुत्पत्तौ संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्मेति लक्षणहानिः स्यात् । अथाविरुद्धकर्मद्वयसमा-उन अर्द्धचन्द्रशेखर शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ जो जगत् रूप अङ्कुर के बीज, संसार समुद्र से पार उतरने के सेतु एवं ऐसे चन्द्रमा के स्वरूप हैं जिनसे ज्ञान रूप अमृत अनवरत स्रवित होता रहता है । उत्क्षेपणादि कर्मों के परस्पर साधर्म्यं और द्रव्यादि पदार्थों के वैषम्यं का प्रतिपादन करते हुए ' उत्क्षेपणादीनाम् ' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् कर्मत्व नाम की जो जाति है, उसके साथ उत्क्षेपणादि सभी कर्मों का सम्बन्ध है । ' एक-road ' शब्द से यह अभिप्रेत है कि एक समय तक द्रव्य में एक ही क्रिया रहती है । एवं एक क्रिया एक ही द्रव्य में रहती है ( इसलिए एक द्रव्यवत्त्व सभी कर्मों का साधम्यं है ) एक ही समय यदि विरुद्ध दो कर्मों की सत्ता एक द्रव्य में मानें, तो ' संयोग और विभाग का इतर निरपेक्ष कारण ही कर्म है ' कर्म का यह लक्षण न हो सकेगा, क्योंकि ( दो क्रियाओं के परस्पर प्रतिरोध के कारण ) किसी विशेष दिशा के दो क्रियायें न मानकर ) साथ उस क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग नहीं हो सकता । यदि ( विरुद्ध अविरुद्ध दो क्रियाओं की सत्ता एक ही समय एक द्रव्य में मानें क्रिया में अभिमत देश के साथ क्रियाश्रयद्रव्य का संयोग या विभाग दह तो उनमें से एक ही उत्पन्न हो ही जाएगा, For Private And Personal
पृष्ठ 773
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६८ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -कारणत्वमसमवायिकारणत्वं स्वपराश्रयसमवेतकार्यारम्भकत्वं समानजातीयानारम्भकत्वं द्रव्यानारम्भकत्वं च प्रतिनियतजातियो-गित्वम् । दिग्विशिष्टकार्यारम्भकत्वं च विशेषः । समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले ( संयोग और विभाग ) वस्तुओं को उत्पन्न करना, ( ११ ) अपने समानजातीय वस्तु को उत्पन्न न करना ( १२ ) ( प्रत्येक क्रिया में ) नियमित उत्क्षेपणत्वादि जातियों का सम्बन्ध ( १३ ) एवं दिग्विशिष्ट कार्य का कर्तृत्व ये तेरह उत्क्षेपणादि पाँचों कर्मो के असाधारण धर्म हैं । न्यायकन्दली वेशः, तदैकस्मादेव तद्देशद्रव्यसंयोगविभागयोरुपपत्तेः द्वितीयकल्पनावैयर्थ्यम् । एवमेकं कर्म नानेकत्र वर्त्तते, एकस्य चलने तस्मात् कर्मणोऽन्यस्य चलनानुपल-म्भात् । क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वम् । मूर्तद्रव्यवृत्तित्वम् अवच्छिन्नपरिमाण-द्रव्यवृत्तित्वम् । अगुणवत्त्वं गुणवत्त्वरहितत्वम् । गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नसंयोगज-त्वम् । स्वकार्येति । स्वकार्येण संयोगेन विनाश्यत्वं न विभागविनाश्यत्वम्, उत्तरसंयोगाभावप्रसङ्गात् । संयोगविभागेति । यथा वेगारम्भे नोदनाभिघातविशेषापेक्षत्वं नैवं संयोगविभागारम्भे नोदनाद्यपेक्षत्वमित्यर्थः । असमवायिकारणत्वम्, यथा गुणानां निमित्तकारणत्वमपि नैवं कर्मणाम्, किं त्वसमवायिकारणत्वमेवेत्यर्थः । स्वपरा-श्रयेति । स्वाश्रये पराश्रये च व्यासज्य समवेतं यत् कार्यं संयोगविभागलक्षणं दूसरी क्रिया की कल्पना व्यर्थ होगी । एक ही कर्म अनेक आश्रयों में भी नहीं रहता है, क्योंकि जिस क्रिया से आश्रयीभूत एक द्रव्य का चालन होता है, उसी क्रिया से दूसरे द्रव्य का चालन कहीं नहीं देखा जाता । उत्पत्ति के बाद अतिशीघ्र विनष्ट होना ही ' क्षणिकत्व ' है । किसी अल्पपरिमाणवाले द्रव्य में रहना ही ' मूतं द्रव्यवृत्तित्व ' है । गुणवत्व का अभाव ( फलतः गुणों का न रहना ही ) ' अगुणवत्त्व ' है । यह गुरुत्व, प्रयत्न और संयोग इनमें से किसी से उत्पन्न होता है । ' स्वकार्येति ' यह संयोग द्रवश्व, रूप अपने कार्य से ही विनष्ट होता है, विभाग रूप अपने कार्य से नहीं । यदि ऐसा मानेंगे तो क्रियाश्रय द्रव्य का उत्तरदेश के साथ संयोग न हो सकेगा । ' संयोगविभागेति ' अर्थात् क्रिया को वेग के उत्पादन में जिस प्रकार विशेष प्रकार के नोदनसंयोग या अभिघात संयोग की अपेक्षा होती है, उसी प्रकार संयोग और विभाग के उत्पादन में उसे नोदनादि किसी और वस्तु की अपेक्षा नहीं होती है । ' असमवायिकारणत्वम् ' अर्थात् गुण असमवायिकारण होने के साथ - साथ निमित्तकारण भी हो सकता है, क्रिया में यह बात नहीं है, वह केवल असमवाविकारण ही होती है । ' स्वपराश्रयेति ' क्रिया अपने आश्रयीभूत द्रव्य और उससे भिन्न द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाले एक ही For Private And Personal
पृष्ठ 774
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
www.kobatirth.org Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली दिग्विशिष्टकार्यकर्त्ता त्वमेव कथयति -- तत्रेति । For Private And Personal Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ६६६ अनुमान किया जा वैसे ही कोई क्रिया तत्रोत्क्षेपणं शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च यदूर्ध्वभाग्भिः प्रदेशैः संयोगकारणमघोभाग्भिश्च प्रदेशैर्विभागकारणं कर्मोत्पद्यते गुरुत्व प्रयत्न संयोगेभ्यस्तदुत्क्षेपणम् । इनमें उत्क्षेपण ( कहते हैं, जो कर्म ) शरीर के अवयव एवं उनसे संयुक्त और द्रव्यों का ऊपर के देश के साथ संयोग का कारण हो, एवं नीचे के प्रदेशों के साथ उन्हीं विभाग का भी कारण हो, एवं गुरुत्व, प्रयत्न और संयोग से उत्पन्न हो, उसी कर्म को ' उत्क्षेपण ' कहते हैं । तदारम्भकत्वम् । समानेति । कर्मणः कर्मान्तरारम्भे गच्छतो गतिविनाशो न स्यात् । इच्छाप्रयत्नादिविरामादन्ते गतिविराम इति चेत्? तच्छाप्रयत्ना-दिकमेवोत्तरोत्तरकर्मणामपि कारणम्, न तु कर्म । विवादाध्यासितं कर्म कर्मकारणं न भवति, कर्मत्वात् अन्त्यकर्मवत् । अथवा विवादाध्यासितं कर्म कर्मसाध्यं न भवति, कर्मत्वादाद्यकर्मवत् । द्रव्येति । उत्तरसंयोगान्निवृत्ते कर्मणि द्रव्यस्योत्पादनम् । प्रतिनियतेति । उत्क्षेपणादिषु प्रत्येकमुत्क्षेप-णत्वादियोग इत्यर्थः । एतत् सर्वमपि पञ्चानां साधर्म्यम् । कार्य अर्थात् व्यासज्यवृत्ति संयोग और विभाग रूप कार्य का कारण है । ' समानेति ' अर्थात् क्रिया यदि दूसरी क्रिया को उत्पन्न करे, तो फिर एक बार जो चल पड़ेगा वह बराबर चलता ही जाएगा, उसकी क्रिया कभी रुकेगी ही नहीं । क्योंकि उसकी गति का कभी विनाश नहीं होगा । ( प्र ० ) चलने की इच्छा या तदनुकूल प्रयत्न इन सबों के विराम से गति का विराम होगा? ( उ ० ) तो फिर वह इच्छा या प्रयत्न ही उस दूसरी क्रिया का भी कारण होगा, कर्म नहीं तदनुकूल यह अनुमान भी है कि जैसे अन्तिम क्रिया किसी भी क्रिया का कारण नहीं होती है, उसी प्रकार कोई भी क्रिया केवल क्रिया होने के नाते ही दूसरी क्रिया को उत्पन्न नहीं करती । अथवा यह भी सकता है कि जैसे क्रिया से पहिली क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है, केवल क्रिया होने से ही किसी क्रिया को उत्पन्न नहीं कर सकती है । ' द्रव्येति ' उत्तरदेश के साथ संयोग के उत्पन्न होने पर जब क्रिया का नाश हो जाता है, तभी द्रव्य की उत्पत्ति होती है । ' प्रतिनियतेति ' उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रिया में उत्क्षेपणत्वादि जाति का सम्बन्ध ( भी ) कर्म का साधर्म्य है । ये सभी पाँचों कर्मों के साधर्म्यं हैं । ' दिग्विशिष्टेति । ' तत्रोत्क्षेपणम् ' इत्यादि से दिग्विशिष्ट कार्यों के कर्त्तव्य का विवरण देते हैं । उत्क्षेपण
पृष्ठ 775
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-तद्विपरीतसंयोगविभागकारणं कर्मापक्षेपणम् । ऋजुनो द्रव्यस्याग्रावयवानां तद्देशैर्विभागः संयोगश्च, मूलप्रदेशैर्येन कर्मणावयवी कुटिलः सञ्जायते तदाकुञ्चनम् । तद्विपर्ययेण संयोगविभागोत्पत्तौ येन कर्मणावयवी ऋजुः सम्पद्यते तत् प्रसारणम् । यदनियत दिक् प्रदेश संयोगविभागकारणं तद् गमनमिति । संयोग और विभाग के ( अन्यानपेक्ष ) कारणीभूत ( एवं उत्क्षेपण के ) विपरीत क्रिया को ही ' अपक्षेपण ' कहते हैं । कोमल द्रव्य के आगे के अवयवों का उनके आश्रय प्रदेश के साथ विभाग और मूल प्रदेशों के साथ संयोग जिस क्रिया से हो ( अर्थात् ) जिस क्रिया से अवयवी टेढ़ा हो जाय उसी को ' आकुञ्चन ' कहते हैं । जिस क्रिया से उक्त संयोग के विपरीत संयोग और उक्त विभाग के विपरीत विभाग की उत्पत्ति होने पर ( कुटिल ) अवयवी सीधा हो जाय उसी क्रिया को ' प्रसारण ' कहते हैं: जो क्रिया अनियमित रूप से जिस किसी दिक् प्रदेश के साथ संयोग और विभाग को उत्पन्न करे, उस क्रिया को गमन कहते हैं । न्यायकन्दली शरीरावयवेषु हस्तादिषु तत्सम्बद्धेषु मुसलादिषु च यदूर्ध्वभाग्भिः प्रदेशः संयोगकारणम्, अधोभाग्भिश्च विभागकारणं गुरुत्वसंयोगप्रयत्नेभ्यो जायते तदुत्क्षेपणम् । क्षेपणमित्यर्थः । तद्विपरीतेति । ऋजुन इति । येन कर्मणेति सम्बन्धः । अधोदेशसंयोगकारणमूर्ध्वदेश विभागकारणं कर्माप-तद्देशैरग्रावयवसम्बद्धैराकाशादिदेशैः सञ्जायते इति, अग्रावयवानां मूलप्रदेशविभागादुत्तरदेशसंयोगोत्पत्तौ सत्यामित्यर्थः । उसे कहते हैं जिससे शरीर के हाथ प्रभृति अवयवों में एवं हाथ से युक्त मुसल प्रभृति द्रव्यों में ऊपर के देशों के साथ संयोग की उत्पत्ति हो, और वह स्वयं गुरुत्व, संयोग और प्रयत्न से उत्पन्न हो । ' तद्विपरीतेति ' अर्थात् नीचे के देशों के साथ संयोग का कारण और ऊपर के देशों से विभाग का कारण कर्म ही ' अपक्षेपण ' है । ' ऋजुन इति ' इस वाक्य में प्रयुक्त ' तद्देश: ' इस शब्द के द्वारा " आगे के अवयवों से सम्बद्ध आकाशादि देशों के साथ संयोग उत्पन्न होता है जिस क्रिया से " ऐसा अभ्वय For Private And Personal
पृष्ठ 776
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७०१ एतत् पञ्चविधमपि कर्म शरीरावयवेषु तत्सम्बद्धेषु च सत्प्रत्य-यमसत्प्रत्ययं च । यदन्यत् तदप्रत्ययमेव तेष्वन्येषु च तद् गमनमिति । कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम्, गमनाविशेषात् । क्षणिक कर्म गमनमात्रमुत्पन्नं स्वाश्रयस्योर्ध्वमधस्तिर्यग्वाष्य-णुमात्रैः प्रदेशैः संयोगविभागान् करोति सर्वत्र गमनप्रत्ययो ये पाँचो ही प्रकार के कर्म शरीर के अवयवों में एवं उनसे सम्बद्ध दूसरे द्रव्यों में भी प्रयत्न से ( सत्प्रत्यय ) और बिना प्रयत्न के ( असत्प्रत्यय ) के भी उत्पन्न होते हैं । इन दोनों से भिन्न सभी प्रकार के कर्म ' अप्रत्यय ' कम हैं । ( अर्थात् ) शरीर के अवयवों या उनसे भिन्न द्रव्यों में रहनेवाले ये सभी अप्रत्यय - कर्म गमन रूप ही हैं । ( प्र ० ) यतः सभी क्रियाओं में गमनत्व की प्रतीति समान रूप से होती है, अत: क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि पाँच जातियों का सम्बन्ध मानना अयुक्त है | ( अर्थात् ) कियायें सभी क्षणिक हैं, वे प्रथमतः गमन रूप ही उत्पन्न होती हैं । उत्पन्न होने के बाद अपने आश्रयद्रव्यों के ऊपर के प्रदेश, नीचे के प्रदेश या पार्श्वप्रदेश के साथ संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं । किन्तु सभी कर्मों में ' यह गमन है ' इस प्रकार की प्रतीति समान रूप से होती है । अतः सभी क्रियायें गमन रूप ही हैं । न्यायकन्दली सत्प्रत्ययमिति । प्रयत्नपूर्वकमप्रयत्नपूर्वकं च भवतीत्यर्थः । यदन्यदिति । एते शरीरावयवेषु मुसलादिष्वन्येषु वा द्रव्येषु यत् तदप्रत्ययजं कर्म जायते सत्प्रत्ययादन्यत् तद् गमनमेव । चोदयति कर्मणामिति उत्क्षेपणा-दीनां कर्मणां जातिपञ्चकत्वमयुक्तम्, गमनात् सर्वेषामविशेषादभेदादिति चोद-नार्थः । सर्वेषां गमनादविशेषमेव कथयति - सर्वं होत्यादिना । उत्क्षेपणा-समझना चाहिए । अर्थात् आगे के अवयवों का मूल प्रदेश के साथ विभाग से जिस स्थिति में उत्तर देश संयोग की उत्पत्ति होती है उस स्थिति में । ' सत्प्रत्ययमिति ' अर्थात् ( कर्म दोप्रकार से उत्पन्न होते हैं ) एक तो प्रयत्न से उत्पन्न होता है, दूसरा बिना प्रयत्न के ही उत्पन्न होता है । ' यदन्यत् ' अर्थात् शरीर के अवयवों में एवं मूसल प्रभृति द्रव्यों में अथवा अन्य ही द्रव्यों में प्रयत्नजनित क्रिया से भिन्न जिस क्रिया की उत्पत्ति होती है, वह क्रिया गमन रूप ही है । ' कर्मणाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा आक्षेप करते हैं । आक्षेप ग्रन्थ का यह आशय है कि उत्क्षेपणादि में रहनेवाली उत्क्षेपणत्वादि पांच जातियों का जो उल्लेख For Private And Personal
पृष्ठ 777
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७०२ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-ऽविशिष्टस्तस्माद् गमनमेव सर्वमिति । न, वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ति-दर्शनात् । इहोत्क्षेपणं परत्रापक्षेपणमित्येवमादि सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती दृष्टे, तद्धेतुः सामान्यविशेषभेदोऽवगम्यते । तेषामुदाद्युपसर्गविशेषात् प्रतिनियत दिग्विशिष्टकार्यारम्भत्वादुपलक्षण-( उ ) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि उत्क्षेपणादि सभी क्रिया के समूहों में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ ( समानजातीय प्रतीति ) एवं व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं । ( विशदार्थ यह है ) कि ' यहाँ उत्क्षेपण क्रिया है ' और ' दूसरी जगह अपक्षेपण क्रिया है ' इस प्रकार प्रत्येक क्रिया में भिन्न-भिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्तिप्रतीति उपलब्ध होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि उन विभिन्न प्रतीतियों के सामान्य और विशेष के भेद ही कारण हैं, अर्थात् गमनत्व रूप सामान्य जातियों और उत्क्षेपणत्वादि रूप विशेषजातियों की विभिन्नता ही कारण है । उत्क्षेपणादि शब्दों के ' उद् ' न्यायकन्दली दिषूर्ध्वं गच्छति, अधो गच्छतीति प्रत्ययदर्शनात् सर्वमेवेदमुत्क्षेपणादिकं गमन-मेव । समाधत्ते - नेति । यत् त्वयोक्तं तन्न, उत्क्षेपणादिषु वर्गशः प्रतिवर्ग प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्त्योदर्शनात् । गोवर्गे अश्वादिवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानुगमदर्श-नाद गोत्वं कल्प्यते यथा, तथोत्क्षेपणादिषु प्रतिवर्गमितरवर्गव्यावृत्त्या प्रत्ययानु-गमदर्शनादुत्क्षेपणत्वादिसामान्य कल्पनेत्यभिप्रायः । अस्य विवरणं सुगमम् । तेषामिति । उपलक्षणभेदोऽपीत्यपिशब्दः कार्यारम्भादित्यस्मात् परो प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनयेत्युपलक्षणं द्रष्टव्यः 1 उपलक्ष्यतेऽन्य विलक्षणतया किया गया है, वह अयुक्त है, क्योंकि ' गमन ' रूप क्रिया से उत्क्षेपणादि शेष चार क्रियाओं में कोई अन्तर नहीं है । ' सर्व हि ' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का जो अभेद कहा गया है उसका समर्थन करते हैं । अर्थात् ' ऊपर की तरफ जाता है, नीचे की तरफ आता है ' इसी प्रकार की ही प्रतीतियाँ उत्क्षेपणादि की भी होती हैं, इससे समझते हैं कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियायें वस्तुतः गमन रूप ही हैं । ' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका समाधान करते हैं । अर्थात् तुमने जो उत्क्षेपणादि क्रियाओं को गमन रूप क्रिया से अभिन्न कहा है, वह ठीक नही है, क्योंकि ' वर्गश: ' अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग को क्रियाओं में समान आकार की प्रतीतियाँ ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) होती हैं । एवं उक्त वर्ग की उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में अपक्षेपणादि अपर वर्ग की क्रिया से भिन्नत्व की प्रतीति रूप व्यावृत्तिबुद्धि भी होती है । जैसे कि गो वर्ग की प्रत्येक व्यक्ति में ' अयं गौ: ' इस आकार की समानकारक प्रतीति होती है, एवं अश्वादि वर्ग के प्रत्येक For Private And Personal
पृष्ठ 778
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७०३ भेदो s पि सिद्धः । एवमपि पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः । निष्क्रमणप्रवे-शनादिष्वपि वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनात् । यद्युत्क्षेपणा-एवं ' अप ' प्रभृति उपसर्ग, एवं उन क्रियाओं के द्वारा किसी विशेष प्रदेश में ही नियम से किसी विशेष प्रकार के कार्यो का उत्पादन करना भी ' उप-लक्षणभेद ' अर्थात् उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक हैं । ( प्र ० ) तब फिर कर्म पाँच ही हैं ' यह नियम भी ठीक नहीं होगा, क्योंकि निष्क्रमण एवं प्रवेशन प्रभृति क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं । यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक क्रियासमूह में विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीति और व्यावृत्ति-प्रतीति से उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों की कल्पना करते हैं, तो फिर न्यायकन्दली जातिः I ।तदयमत्रार्थ: - - न केवलमनुवृत्तिव्यावृत्ति प्रत्ययदर्शनादुत्क्षेपणापक्षेपणादीनां जातिभेदः सिद्धः, उदाद्युपसर्गभेदात् प्रतिनियतदिग्विशिष्टकार्यारम्भादपि सिद्धः । अपरे तु तेषामुत्क्षेपणादीनामुदाद्युपसर्गविशेषाद् दिविशिष्ट कार्यारम्भादुपलक्षण-भेदोऽपि प्रतिपत्तिभेदोऽपि सिद्ध इति । अभेदे हि यथोत्क्षेपणमूर्ध्वसंयोगविभाग-हेतुरेवमपक्षेपणादिकमपि स्यात् । पुनश्चोदयति — एवमपीति । यदि प्रतिवर्ग प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनादुत्क्षेपणादिषु सामान्यमभ्युपेयते, तदा निष्क्रमणादि-ष्वपि प्रतिवर्गं प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनान्निष्क्रमणत्वादिकमभ्युपेयम्, ततश्च व्यक्ति से भिन्नत्व की प्रतीति भी होती है, इन्हीं दोनों प्रतीतियों से ' गोत्र ' जाति की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार उत्क्षेपणत्वादि बातियों की भी कल्पना करते हैं । इस भाष्य ग्रन्थ की व्याख्या सुबोध है । ' तेषाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के ' उपलक्षणभेदोऽवि ' इस वाक्य में जो ' अपि शब्द है उसका पाठ ' कार्यारम्भात् ' इस वाक्य के बाद ही समझना चाहिए ( अर्थात् कार्यारम्भादप्युपलक्षणभेदः - वाक्य का ऐसा स्वरूप समझना चाहिए ) । ' उपलक्ष्यते अन्यविलक्षणतया प्रतिपाद्यते व्यक्तिरनया ' अर्थात् ( ' उपलक्षित हो ' अर्थात् व्यक्ति दूसरों से भिन्न रूप में समझी जाय जिससे ' ) इस व्युत्पत्ति के अनुसार ' उपलक्षण ' शब्द से यहाँ ' जाति ' ही विवक्षित है । केवल अनुवृत्तिप्रत्यय ( अर्थात् सभी उत्क्षेपण क्रियाओं में ' यह उत्क्षेपण है ' इत्यादि एक आकार की प्रतीति ) एवं व्यावृत्तिप्रत्यय ( अर्थात् उत्क्षेपणादि प्रत्येक व्यक्ति में उससे भिन्न अपक्षेपणादि क्रियाओं से भिन्नत्व को बुद्धि ) ही उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक नहीं हैं, उद, अप प्रभृति उपसर्ग के भेद एवं विभिन्न नियत देशों में ही कार्यों को उत्पन्न करना भी उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के साधक हैं । किसी सम्प्रदाय के लोग ' तेषामुदाद्युप-सर्गविशेषात् ' इत्यादि सन्दर्भ की व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि ' तेषाम् ' अर्थात For Private And Personal
पृष्ठ 779
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७०४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-दिषु सर्वत्र वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिदर्शनाज् जातिभेद इष्यते, एवं च निष्क्रमणप्रवेशनादिष्वपि कार्यभेदात् तेषु प्रत्ययानुवृत्ति-व्यावृत्ती इति चेत्? न, उत्क्षेपणादिष्वपि कार्यभेदादेव प्रत्ययानुवृत्तिव्या-वृत्तिप्रसङ्गः । अथ समाने वर्गशः प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तिसद्भावे उत्क्षेपणादीनामेव जातिभेदो न निष्क्रमणादीनामित्यत्र विशेषहेतुर-उसी युक्ति से निष्क्रमण और प्रवेशनादि क्रियाओं में भी विभिन्न जातियों की कल्पना करनी होगी । यदि ( ऊपर के देश के साथ संयोगादि रूप ) कार्य की विभिन्नता से ( उनमें विभिन्न ) अनुवृत्तिप्रतीतियाँ और व्यावृत्तिप्रतीतियाँ होती हैं, तो फिर कार्य की विभिन्नता ही उन प्रतीतियों का कारण होगी ( जाति की विभिन्नता नहीं ) । उत्क्षेपणादि समान क्रियाओं के समूहों में अनुवृत्ति और व्यावृत्ति के कारण उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों की कल्पना की जाय, और निष्क्रमण प्रवेशनादि क्रियाओं में ठीक वही युक्ति रहने पर भी विभिन्न जातियों की कल्पना न की जाय, इसमें कोई विशेष युक्ति नहीं है । ( उ ० ) ऐसी बात नहीं है, ( अर्थात् उत्क्षेपणत्वादि जातियाँ मानी जाँय और निष्क्रमणत्वादि जातियाँ नहीं, इसमें विशेष युक्ति है ) यदि न्यायकन्दली पञ्चैवेत्यवधारणानुपपत्तिः । अथ निष्क्रमणादिषु कार्यभेदात् प्रत्ययभेदो न जातिभेदात्, तदोत्क्षेपणादिष्वपि तथा स्यादित्याह -- कार्यभेदात् तेष्विति । समाधत्ते नेति । यदि निष्क्रमणत्वादिजातय इष्यन्ते, तदा जातिसङ्करप्रसङ्गः । उत्क्षेपणादि का ' उद् ' ' अप ' प्रभृति विभिन्न उपसर्गों के कारण एवं विशेष दिशाओं में कार्योत्पादक होने के कारण ' उपलक्षणभेदोऽपि ' अर्थात् प्रतिपत्ति ( प्रतीति ) का भेद भी सिद्ध होता है ( एवं प्रतिपत्ति के भेद से बस्तुओं का भेद सुतराम् सिद्ध है ) । उत्क्षेपणादि सभी कर्म यदि अभिन्न हों तो फिर जिस प्रकार उत्क्षेपण क्रिया ऊर्ध्वदेश में ही संयोग और विभाग को उत्पन्न करती है, वैसे ही अपक्षेपणादि क्रियायें भी ऊध्वंदेश में हो संयोगादि को उत्पन्न करतीं । ' एवमपि ' इत्यादि से पुनः आक्षेप करते हैं । आक्षेप करने वालों का यह अभिप्राय है कि यदि उत्क्षेपणादि प्रत्येक वर्ग में अलग अलग अनुवृत्ति-प्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण उत्क्षेपणादि अलग अलग की कल्पना जातियों करें, तो फिर निष्क्रमण ( जाना ) और प्रवेशन ( आना ) प्रभृति प्रत्येक वर्ग के भी उक्त अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय विभिन्न प्रकार के हैं ही । अतः उनमें भी अलग अलग जाति का मानना आवश्यक होगा । जिससे पश्चैव कर्माणि ' यह अवधारण असङ्गत हो जाएगा । ' कार्यभेदात् तेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग में उपपत्ति देते है कि यदि निष्क्रमण प्रवेशन प्रभृति की प्रतीतियों की विभिन्नता जातिभेदमूलक न For Private And Personal
पृष्ठ 780
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ८० www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ७०५ प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal स्तीति । न, जातिसङ्करप्रसङ्गात् । निष्क्रमणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्तौ जातिसङ्करः प्रसज्यते । कथम्? द्वयोर्द्रष्ट्रो-रेकस्मादपवरकादपवरकान्तरं गच्छतो युगपनिष्क्रमण प्रवेशनप्रत्ययौ उत्क्षेपणत्वादि की तरह निष्क्रमणत्वादि जातियाँ मानी जाँय तो इसमें साङ्कर्यं दोष होगा । ( विशदार्थ यह है कि ) निष्क्रमणादि क्रियाओं में यदि विभिन्न जातियों के कारण अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति मानें तो इसमें साङ्कर्य दोष होगा । ( प्र ० ) किस प्रकार? ( साङ्कर्य दोष होगा? ) । ( उ ० ) दो द्वारों को पार करते हुए किसी एक व्यक्ति के एक हि गमनकर्म को देखनेवाले दो पुरुषों में से एक को एक ही समय उसी गमन कर्म में निष्क्रमण की प्रतीति और दूसरे को प्रवेशन की प्रतीति होती है । जैसे कि एक ही द्वार में जाते एकस्यां व्यक्तौ विरुद्धानेकजातिसमवायः प्रसज्यत इत्यर्थः । कथमिति पृष्टः सन्नाह- द्वयोर्द्वष्ट्रोरिति । द्वयोर्द्रष्ट्रोरेकस्मादपवरकादपवर-कान्तरं गच्छतः पुरुषस्य यो द्रष्टारौ तयोरेकस्यां व्यक्तौ निष्क्रमणप्रवेशनप्रत्ययौ दृष्टौ । यतोऽपवरकात् पुरुषो निर्गच्छति तत्र स्थितस्य निर्गच्छतीति प्रत्ययः, मानकर कार्यभेदमूलक मानें तो फिर विभिन्न उत्क्षेपणादि विषयक प्रतीतियों की उपपत्ति भी उन प्रतीतियों को कार्यभेदमूलक मान कर की जा सकती ' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । अभिप्राय यह है कि ( उत्क्षेपणत्वादि की तरह यदि निष्क्रमणत्वादि जातियाँ भी मानी जायँ तो ' जातिसङ्करप्रसङ्ग ' होगा, अर्थात् एक ही व्यक्ति में विरुद्ध अनेक जातियों का समवाय मानना पड़ेगा । ' कथम् इस पद के द्वारा पूछे जाने पर ( अर्थात् यह साङ्कर्य क्यों कर होगा? ) ' द्वयोर्द्रष्ट्रो: ' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त साङ्कर्य दोष का उपपादन करते हैं । ' द्वयोर्द्रष्ट्रोः ' अर्थात् एक प्रकोष्ठ से दूसरे प्रकोष्ठ में जाते हुए पुरुष को जो दो देखने-वाले पुरुष हैं, उन दोनों में से एक पुरुष को उक्त गमन रूप क्रिया में निष्क्रमणत्व की और दूसरे पुरुष को प्रवेशनत्व ' की प्रतीति होती है । इस प्रकार एक ही क्रिया में दोनों की प्रतीति होती है, अर्थात् जिस प्रकोष्ठ से वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले पुरुष को उससे जानेवाले पुरुष में ' निष्क्रामति ' इस आकार की प्रतीति होती है, एवं जिस प्रकोष्ठ में वह पुरुष जाता है, उस प्रकोष्ठ में रहनेवाले को