प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 781–790

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 781–790

पृष्ठ 781

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७०.६ न्याय कन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -दृष्टौ तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति च । यदा तु प्रतिसीराय -पनीतं भवति, तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः, किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तथा नालिकायां वंशपत्रादौ पतति बहूनां द्रष्टृणां युगपद् भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्यया दृष्टा इति जातिसङ्कर-हुए एक ही व्यक्ति में ( विरुद्ध दिशाओं में खड़े हुए दो व्यक्तियों को ) क्रमशः ' यह प्रवेश करता है ' एवं ' यह निकलता है ' इन दोनों प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं । ( जब जाते हुए व्यक्ति के बीच की ) प्रतिसीरा ( पर्दा ) उठा दी जाती है, तब उन्हीं दोनों व्यक्तियों को न निष्क्रमण की प्रतीति होती है और न प्रवेशन की प्रतीति, केवल गमन की ही प्रतीति होती है । इसी प्रकार बहती हुई नाली में जब बाँस प्रभृति के पत्ते गिरते हैं, तब उन पत्तों में एक ही समय बहुत से देखनेवालों में से किसी को भ्रमण की प्रतीति होती है और किसी को प्रवेशन की प्रतीति होती है । अतः निष्क्रमणत्वादि जातियों के मानने पर जातिसङ्कर दोष होगा । उत्क्षेपणादि क्रियाओं में इस प्रकार का साङ्कर्य नहीं देखा जाता । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में अनुवृत्ति की प्रतीति और व्यावृत्ति की प्रतीति उत्क्षेपणत्वादि जातियों के भेद से होती हैं, किन्तु निष्क्रमणादि क्रियाओं में उक्त दोनों प्रतीतियाँ कार्यों की विभिन्नता न्यायकन्दली यत्र प्रविशति तत्र स्थितस्य प्रविशतीति प्रत्ययः । यदि जातिकृताविमौ प्रत्ययौ दृष्टौ तदैकस्यां व्यक्तौ परस्परविरुद्ध निष्क्रमणत्वप्रवेशनत्वजातिद्वय-समावेशो दूषणं स्यात् । तथा द्वारप्रदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति यथैकस्मिन्नेव बहुप्रकोष्ठके गृहे प्रकोष्ठात् प्रकोष्ठान्तरं गच्छति पुरुषे पूर्वापरप्रकोष्ठस्थितयो ट्रोर्द्वारप्रदेशे निर्गच्छति प्रविशतीति प्रत्ययौ भवतः । यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतं मध्यस्थितं जवनिकाद्यपनीतं भवति, तदा न प्रवेशनप्रत्ययो नापि निष्क्रमणप्रत्ययः, उसी पुरुष में ' प्रविशति ' यह प्रतीति होती है । यदि निष्क्रमण और प्रवेशन क्रियाओं को प्रतीतियाँ निष्क्रमणत्वादि जाति मूलक हों, तो फिर एक ही व्यक्ति में परस्पर विरुद्ध निष्क्रमणत्व और प्रवेशनत्वादि जातियों का समावेश रूप साङ्कर्यं दोष की आपत्ति होगी । ' तथा द्वारदेशे प्रविशति निष्क्रामतीति ' उक्त भाष्य सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि जैसे बहुत सी कोठरियों वाले भवन में यदि एक पुरुष एक कोठरी से दूसरी कोठरी में जाता है, तो जिस कोठरी से वह जाता है उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उस जानेवाले पुरुष में ' यह निकलता है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है और जिस कोठरी में वह जाता है, उस कोठरी में रहनेवाले दूसरे पुरुष को उसी पुरुष में ' यह आता है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है । ' यदा तु प्रतिसीराद्यपनीतम् ' अर्थात् जब बीच का पर्दा ( या दीवाल जिससे कोठरियाँ बनती हैं ) हटा दिया जाता है, उस समय उसी पुरुष में न ' निकलने ' की ओर न ' आने ' को प्रतीति होती है, केवल ' चलते ' की ही प्रतीति होती है । अतः वह ' गमन ' रूप क्रिया ही है, उसी में उपाधि भेद से For Private And Personal

पृष्ठ 782

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७०७ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रसङ्गः । न चैवमुत्क्षेपणादिषु प्रत्ययसङ्करो दृष्टः । तस्मादुत्क्षेप-णादीनामेव जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती, निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति । कथं युगपत् प्रत्ययभेद इति चेत्? अथ मतं यथा जातिसङ्करो नास्ति, एवमनेककर्म समावेशोऽपि नास्तीत्येकस्मिन् कर्मणि युगपद् द्रष्टृणां भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्ययाः कथं भवन्तीति? अत्र ब्रूमः - न, अवयवावयविनोर्दिग्विशिष्टसंयोग विभागानां भेदाद् | यो होती हैं । ( प्र ० ) एक ही समय ( एक हि क्रिया में ) उक्त विभिन्न प्रतीतियाँ कैसे होती हैं? ( विशदार्थ यह है कि ) जिस प्रकार ( उत्क्षेपण-त्वादि जातियों के मानने में ) जातिसङ्कर रूप दोष सम्भव नहीं है, ( उसी प्रकार ) एक ही समय एक ही वस्तु ( निष्क्रमण प्रवेशनादि ) अनेक कर्मों का रहना भी सम्भव नही है, फिर एक ही समय एक ही द्रव्य में अनेक देखनेवाले को ( भी ) भ्रमण, पतन और प्रवेशन विषयक प्रतीतियाँ कैसे हो सकती हैं? ( उ ० ) इस प्रश्न के समाधान में हम लोगों का कहना है कि नहीं, ( अर्थात् उक्त प्रतोतियाँ असम्भव नहीं हैं ) क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय भ्रमणादि की उक्त प्रतीतियाँ नाली में गिरे पत्ते प्रभृति अवयवी और उनके अवयवों की विभिन्न दिशाओं में उत्पन्न हुए संयोग विभागादि कार्यों की विभिन्नता से होती हैं । देखनेवालों में से जो व्यक्ति पार्श्व से क्रमशः प्रदेश के अवयवों का दिक्प्रदेशों के साथ संयोगों और विभागों को न्यायकन्दली किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तस्माद् गमनमेव, तत्रोपाधिकृतश्च प्रत्ययभेद इत्यभिप्रायः । उदाहरणान्तरमाह - तथा नालिकायामिति । गर्त्तस्या-भिधानम् । स्वपक्षे विशेषमाह - न चैवमिति । उपसंहरति तस्मादिति । एकदेकस्मिन् द्रव्ये तावदेकमेव कर्म भवति, तत्र कथं युगपदनेककर्मप्रत्यय ' निष्क्रमण ' प्रत्यय और ' प्रवेशन ' प्रत्यय प्रभृति विभिन्न प्रत्यय होते हैं । ' तथा नालिकायाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में दूसरा दृष्टान्त दिखलाया गया है । ' नालिका ' गड्ढे को कहते हैं । ' न चैवम् ' इत्यादि से पूर्व पक्ष की अपेक्षा अपने सिद्धान्त पक्ष में अन्तर दिखलाते हैं । ' तस्मात् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । ' कथम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह आक्षेप करते हैं कि यदि एक समय एक द्रव्य एक ही क्रिया हो सकती है, तो फिर एक ही समय अनेक कर्मों की प्रतीति कैसे होगी! ' अथ मतम् ' For Private And Personal

पृष्ठ 783

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७०८ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-हि द्रष्टा अवयवानां पार्श्वतः पर्यायेण दिक्प्रदेशैः संयोगविभागान् पश्यति तस्य भ्रमणप्रत्ययो भवति, यो द्यवयविन ऊर्ध्वप्रदेशैर्विभाग-मधः संयोगं चावेक्षते तस्य पतनप्रत्ययो भवति । यः पुनर्नालि कान्तदेशे संयोगं बहिदेशे च विभागं पश्यति, तस्य प्रवेशन-प्रत्ययो भवतीति सिद्धः कार्यभेदान्निष्क्रमणादीनां प्रत्ययभेद इति । भवतुत्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः, निष्क्रमणादीनां तु कार्यभेदादिति । देखता है, उसे उनमें भ्रमण की प्रतीति होती है । जो पुरुष अवयवी का ऊपर के देशों के साथ विभाग और नीचे के प्रदेश के साथ संयोग इन दोनों को देखता है, उसे उनमें पतन क्रिया की प्रतीति होती है । जो पुरुष उस अवयवी का नाली के भीतर के प्रदेश के साथ संयोग एवं ऊपर के देश के साथ विभाग को देखता है, उसे उसी अवयवी में प्रवेशन की प्रतीति होती है । इस प्रकार कार्यों के भेद से विभिन्न प्रकार की अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में उत्क्षेपण-त्वादि जातियों की विभिन्नता से ही विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियों और व्यावृत्तिप्रतीतियों के होने पर भी निष्क्रमणादि क्रियाओं में कार्यों की विभिन्नता से ही अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं । न्यायकन्दली इत्याह- कथमिति । तद् विवृणोति- - अथ मतमित्यादिना । अत्र ब्रम इति सिद्धान्तोपक्रमः । यत् त्वयोक्तं तन्न, अवयवानामवयविनश्च दिग्देशविशिष्टानां संयोगविभागानां भेदात् । अस्य सुगमं विवरणम् । अवयवकर्मसु पार्श्वतः संयोगविभागकारणेषु भ्रमणप्रत्ययः, अवयविक्रियायां कार्यभेदात् पतनप्रवेशन-प्रत्ययावित्यर्थः । इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी ' आक्षेपग्रन्थ ' का विवरण देते हैं । ' अत्र ब्रूमः ' इत्यादि ग्रन्थ से इस प्रसङ्ग में अपना सिद्धान्त करने का उपक्रम करते हैं । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि विभिन्न दिग्देशों में विद्यमान अवयवों और अवयवियों के संयोग और विभाग भी विभिन्न ही होते हैं । इस भाष्यग्रन्थ की व्याख्या सुलभ है । अभिप्राय यह है कि अवयवों के संयोग और विभाग इन दोनों की कारणीभूत क्रियायें जब पार्श्व में होती हैं तो उनमें ' भ्रमण ' का व्यवहार होता है । एवं अवयवी की क्रिया से होनेवाले विभिन्न कार्यों से उसी में ' पतन प्रवेशनादि ' की प्रतीतियाँ भी होती हैं । For Private And Personal

पृष्ठ 784

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] अथ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७० ९ कर्मस्वर्यायः १ आहोस्विदपरं गमनत्वं किं सामान्यमिति १ कुतस्ते संशयः? समस्तेषूत्क्षेपणादिषु कर्म-प्रत्ययवद् गमनप्रत्ययाविशेषात् कर्मत्वपर्याय इति गम्यते । यतस्तत्क्षे-पणादिवद् विशेषसंज्ञयाभिहितं तस्मादपरं सामान्यं स्यादिति । ( प्र ० ) गमनत्व शब्द और कर्मत्व शब्द ये दोनों क्या एक ही अर्थ के वाचक हैं? या गमनत्व नाम की ( कर्मत्व व्याप्य ) अलग स्वतन्त्र जाति है? ( उ ० ) तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ? ( प्र ० ) यतः उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में ' यह कर्म है ' इस आकार की प्रतीति की तरह सभी क्रियाओं में समान रूप से गमनत्वकी भी प्रतीति होती है, इससे ऐसा आभास होता है कि कर्मत्व और गमनत्व ये दोनों शब्द एक ही अर्थ के वाचक हैं । एवं यतः उत्क्षेपणादि की तरह ' गमन ' नाम की भी एक अलग क्रिया कही गयी है, अतः यह भी अनुभव होता है कि उत्क्षेपणत्वादि की तरह गमनत्व नाम की भी कर्मत्व व्याप्य एक स्वतन्त्र जाति ही है । न्यायकन्दली भवतत्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः । अथ गमनत्वं किं कर्मत्व-पर्यायः, आहोस्विदपरं सामान्यमिति । सिद्धान्ती पृच्छति - कुतस्ते संशयः? संशयानुपपन्नइत्यभिप्रायः । परः संशयमुपपादयति – समस्तेष्विति । उत्क्षेप-णादिषु सर्वेषु यथा कर्मप्रत्ययश्चलनात्मकताप्रत्ययस्तथा तेषु गमनप्रत्ययः, ऊध्वं गच्छत्यधो गच्छति मूलप्रदेशं गच्छत्यग्रदेशं गच्छतीति प्रत्ययो भवतीति । तेन गमनत्वं कर्मत्वर्याय इति गम्यते, समस्तभेदव्यापकत्वात् । यतस्तूत्क्षेपणादिवद् मनमपि पृथगभिहितं विशेषसंज्ञया, तस्माद् गमनत्वमपरं सामान्यं स्यात्, पूर्वपक्षवादी ‘ अथ गमनत्वम् ' इत्यादि सन्दर्भ से पूछते हैं कि मान लिया कि उत्क्षेप-णादि कर्मों की विभिन्न प्रतीतियाँ उत्क्षेपणत्वादि विभिन्न जातियों के कारण ही होती हैं, किन्तु यह ' गमनत्व ' कौन सी वस्तु है? क्या यह कर्मत्व जाति का ही दूसरा नाम है? अथवा कर्मत्व जाति से भिन्न यह कोई अलग ही जाति है? ' कुतस्ते संशय:? इस वाक्य के द्वारा सिद्धान्ती पूर्वपक्षवादी से पूछते हैं कि तुम्हें यह संशय ही क्यों कर हुआ? अर्थात् यह संशय यहाँ युक्त नहीं है । ' समस्तेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पूर्व -पक्षवादी अपने संशय का उपपादन करते हैं । अभिप्राय यह है कि उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में जैसे कि ' कर्मप्रत्यय ' अर्थात् चलनस्वरूपता की प्रतीति होती है, उसी प्रकार ' गमनप्रत्यय ' अर्थात् ऊपर की ओर जाता है, नीचे की ओर जाता है, मूलप्रदेश में जाता है, अन प्रदेश में जाता है, इत्यादि गमनविषयक प्रतीतियां भी होती हैं, अतः For Private And Personal

पृष्ठ 785

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७१० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-न कर्मत्वपर्यात्वात् । आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्व पर्याय एव गमनत्वमिति । अथ विशेषसंज्ञया किमर्थं गमनग्रहणं कृतमिति? न, भ्रमणायचा. रोधार्थत्वात् । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धानां भ्रमणपतन स्पन्दनादी-( उ ० ) नहीं ( अर्थात् उक्त संशय का यहाँ कोई हेतु नहीं है ), क्योंकि गमनत्व और कर्मत्व दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं । जैसे कि आत्मत्व और पुरुषत्व ये दोनों ही शब्द एक ही जाति के वाचक हैं, उसी प्रकार गमनत्व-शब्द और कर्मत्वशब्द दोनों एक ही जाति रूप अर्थ के वाचक हैं । ( प्र ० ) फिर ( उत्क्षेपणादि की तरह ' गमन ' रूप ) विशेष नाम के द्वारा गमन का उपादान क्यों किया गया है? ( उ ० ) नहीं, ( अर्थात् गमन शब्द से गमन रूप क्रिया का अभिधान गमनत्व को कर्मत्वव्याप्य अतिरिक्त जाति रूप समझाने के लिए नहीं है, किन्तु ) भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए है । ( विशदार्थ यह है कि ) उत्क्षेपणादि नामों के द्वारा संगृहीत न्यायकन्दली अवान्तरभेदनिरूपणावसरे तस्य संकीर्तनात् । एवमुपपादिते परेण संशये सति मुनिः प्राह - नेति । न कर्तव्यः संशयः, कुतः? गमनत्वस्य कर्मत्वपर्यायत्वात् । एतद् विवृणोति - आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्वपर्याय एव गमनत्वमिति । यथात्मत्वस्य पर्याय: पुरुषत्वं समस्तभेदव्यापकत्वात्, तथा गमनत्वं कर्मत्वस्य पर्यायः । अथ किमर्थं विशेषसंज्ञया पृथग् गमनग्रहणं कृतम्? इति चोदयति- अथेति । समझते हैं कि कर्मत्व का ही दूसरा नाम गमनत्व है । अर्थात् गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु है । क्योंकि क्रियाओं के जितने भी प्रकार हैं, उन सबों में गमनत्व को प्रतीति होती है, अतः गमनत्व और कर्मत्व एक ही वस्तु हैं । ' गमनत्व और कर्मत्व दोनों विभिन्न जातियाँ हैं ' इस प्रसङ्ग में यह युक्ति है कि उत्क्षेपणादि विभिन्न क्रियाओं की पङ्क्ति में ही ' विशेष ' नाम के द्वारा गमन रूप क्रिया का भी अलग से उल्लेख किया गया है, अतः समझते हैं गमनत्व नाम की कोई कर्मत्वव्याप्य अलग हो जाति है ( अतः उक्त संशय होता है ) । क्योंकि क्रियाओं के अवान्तर भेदों का जहाँ निरूपण किया गया है, वहीं गमन का भी उल्लेख है । इस प्रकार पूर्वपक्षी के द्वारा संसय का उपपादन किये जाने पर ' न ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ( प्रशस्तदेव ) मुनि ने अपना उत्कृष्ट उत्तर कहा है कि उक्त प्रकार से संशय करना युक्त नहीं है, यतः गमनत्व और कर्मत्व ये दोनों ही एक ही जाति के विभिन्न नाम हैं । ' आत्मत्वपुरुषत्ववत् कर्मत्व पर्याय एव गमनत्वम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । अर्थात् जिस प्रकार पुरुष के जितने भी भेद हैं, उन सबों में आत्मत्व का व्यवहार होने के कारण आत्मत्व और पुरुषत्व एक ही जाति के दो नाम हैं, उसी प्रकार गमनत्व और कर्मत्व भी एक ही जाति के दो नाम हैं । ' अर्थ ' इत्यादि For Private And Personal

पृष्ठ 786

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 786 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७११ प्रशस्तपादभाष्यम् नामवरोधार्थं गमनग्रहणं कृतमिति । अन्यथा हि यान्येव चत्वारि विशेषसंज्ञयोक्तानि तान्येव सामान्य विशेष संज्ञा विषयाणि प्रसज्ये-रन्निति । अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, अनियत दिग्देश-न होनेवाले भ्रमण, पतन, स्पन्दनादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ही ' गमन ' शब्द का उपादान किया गया है । यदि ऐसी बात न होती -भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ' गमन ' शब्द का उपादान न किया जाता तो-जो भी चार कर्म उत्क्षेपण, अपक्षेपण आकुञ्चन, और प्रसारण इन चार नामों से कहे गये हैं, उतने ही कर्म समझे जाते ( फलतः उत्क्षेपणादि चार क्रियाओं से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं का अभाव ही समझा जाता ) । अथवा ( कर्मत्व से भिन्न ) गमनत्व नाम का अलग सामान्य ही मान लें, जो अनिय-मित्त दिशाओं और अनियत देशों में संयोगों और विभागों के उत्पादक न्यायकन्दली उत्तरमाह - नेति । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धा न संगृहीता भ्रमणादयः । यदि गमनग्रहणं न क्रियेत, तदा तेषां कर्मत्वेन संग्रहो न स्यात् । किन्तु विशेष-संज्ञयोद्दिष्टानामुत्क्षेपणादीनामेव परं कर्मत्वसंज्ञाविषयत्वं भवेत् । भ्रमणा-दयो s पि च कर्मत्वेन लोकप्रसिद्धाः, अतस्तेषां परिग्रहार्थं पृथग् गमनग्रहणं कृतमिति ग्रन्थार्थः । अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, तत् केषु वर्त्तते, तत्राह – अनियतेति । पङ्क्ति से पूर्व पक्षी यह आक्षेप करते हैं कि ( उत्क्षेपणादि की तरह ) विशेष नाम के द्वारा गमन का उल्लेख क्यों किया गया है? ' न ' इत्यादि से इसी आक्षेप का उत्तर दिया है । अर्थात् यदि गमन शब्द का उल्लेख ( उत्क्षेपणादि शब्दों को पङ्क्ति में ) न किया जाता तो जिन भ्रमणादि क्रियाओं का अवरोध ( संग्रह ) उत्क्षेपणादि शब्दों के द्वारा सम्भव नहीं है, उन सबों का कर्म में संग्रह न हो सकता । ( गमनशब्दाघटित उक्त वाक्य से केवल ) उत्क्षेपणादि क्रियाओं का ही संग्रह होता । किन्तु उत्क्षेपणादि से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं में भी कर्मत्व का व्यवहार लोक में होता है । अतः उन सबों के संग्रह के लिए ही गमन ' शब्द का उल्लेख किया गया हैं । यही उक्त ( सिद्धान्त भाष्य ) ग्रन्थ का अभिप्राय I ' अथवा अस्त्वपरं सामान्यं गमनत्वम् ' ( अर्थात् गमनत्व को भी उत्क्षेपणत्वादि की तरह कर्मत्व का अवान्तर सामान्य हीं मान लें, तब भी कोई क्षति नहीं है ) । यह गमनश्व ( कर्मत्वव्याप्य ) जाति किन कर्मों में रहती है? इसी प्रश्न का उत्तर ' अनि-यत ' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । तो फिर उत्क्षेपणादि कर्मों में गमन की प्रतीति For Private And Personal

पृष्ठ 787

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७१२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -संयोगविभागकारणेषु भ्रमणादिष्वेव वर्तते गमनशब्दश्चोत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः, स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति । भ्रमणादि क्रियाओं में ही नियमित रूप से रहता है । भ्रमणादि क्रियाओं में वृत्ति के द्वारा प्रयुक्त होनेवाले ' गमन ' शब्द का जो प्रत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी प्रयोग होता है, उसका कारण है दोनों क्रियाओं में समान रूप से संयोग और विभाग को उत्पन्न करने की स्वतन्त्रक्षमता, इसी क्षमता या कर्तृत्व रूप सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि में भी गमन शब्द का प्रयोग होता है । अतः उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन शब्द का प्रयोग गौण है । न्यायकन्दली कुतस्तर्ह्यत्क्षेपणादिषु गमनप्रत्ययः? अत आह— गमनशब्दश्चेति । गमन-शब्दग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वाद् गमनप्रत्यय उत्क्षेपणादिषु भाक्तो द्रष्टव्यः । उपचारस्य बीजमाह - स्वाश्रयसंयोगविभागकर्तृत्वसामान्यादिति । गमनं स्वाश्रयस्य संयोगविभागौ करोति, उत्क्षेपणादयोऽपि कुर्वन्ति, एतावता साधर्म्ये-णोत्क्षेपणादिषु गमनव्यवहारः । अनेन साधम्र्येण गमने कस्मादुत्क्षेपणादि-व्यवहारो न भवति? पैङ्गव्यपाटलत्वादिसाधर्म्येण वह्नावपि माणवकव्यवहारः क्यों कर होती है? इस प्रश्न का समाधान ' गमनशब्दस्तु ' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् उत्क्षेपणादि कर्मों में प्रयुक्त गमन शब्द उपलक्षणार्थक है, अतः उत्क्षेप-नादि के प्रत्ययों के लिए गमन शब्द के प्रयोग को गौण ( लाक्षणिक ) ही समझना चाहिए | ' स्वाश्रयसंयोगविभाग कर्तृत्वसामान्यात् ' इस वाक्य के द्वारा प्रकृत में लक्षणा का प्रयोजक धर्म ( लक्ष्यतावच्छेदक ) दिखलाया गया है । अर्थात् जिस प्रकार गमन अपने भूद्र में संयोग और विभाग को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उत्क्षेपणादि क्रियायें भी अपने आश्रयीभूत द्रव्यों में संयोगों और विभागों को उत्पन्न करती हैं, इस सादृश्य के कारण ही उत्क्षेपणादि क्रियाओं में भी गमन शब्द का गौण प्रयोग होता है । ( प्र ० ) तो फिर इसी साधम्यं के कारण गमन में उत्क्षेपणादि शब्दों का भी गौण प्रयोग क्यों नहीं होता? उ ० ) ' अग्निर्माणवकः ' इत्यादि प्रयोग के द्वारा जिस प्रकार माणवक में अग्निपद का गौण व्यवहार तेजस्वित्वादि धर्मों के कारण होता है, उसी प्रकार पिङ्गलवर्ण और रक्तवर्ण रूप सादृश्य के कारण अग्नि में माणवक का गौण व्यवहार भी क्यों नहीं होता? यदि इसका यह परिहार उपस्थित करें कि केवल हेतु है, अतः उपचार की कल्पना नहीं की जाती, किन्तु उपचार या व्यवहार रहने पर ही कारण की कल्पना की जाती है ( अतः लोक में अग्नि में माणवक शब्द का व्यवहार न होने के For Private And Personal

पृष्ठ 788

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 788 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७१३ सत्प्रत्यय कर्मविधिः । कथम्? चिकीर्षितेषु यज्ञाध्ययनदान-कृष्यादिषु यथा हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छत्यपक्षेप्तुं वा तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नः सञ्जायते । तं प्रयत्नं गुरुत्वं चापेक्षमाणादात्महस्तसंयोगाद्धस्ते कर्म भवति, हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति । सत्प्रत्यय अर्थात् प्रयत्न कहते हैं । ( प्र ० ) कैसे? ( उ ० ) से उत्पन्न क्रिया की उत्पत्ति की विधि अर्थात् यह सत्प्रत्यय रूप कर्म किस प्रकार उत्पन्न होता है? यज्ञ, अध्ययन, दान अथवा कृषि प्रभृति कर्म के उत्पादन की इच्छा होने पर हाथ को नीचे या ऊपर करने के लिए आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार इस प्रयत्न. गुरुत्व एवं आत्मा और हाथ के संयोग इन तीनों कारणों से हाथ में क्रिया की उत्पत्ति होती है 1 हाथ की तरह शरीर के पैर प्रभृति अवयवों में एवं शरीर रूप अवयवी में भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कस्मान्न भवति? अथोच्यते । न कारणसद्भावे सत्युपचारकल्पना, किन्तु स्थिते व्यवहारे कारणकल्पनेति । एवं चेदत्रापि स एव परिहारः । सत्प्रत्ययकर्मविधिः- प्रयत्नपूर्वक कर्म प्रकारः कथ्यत इत्यर्थः । कथमिति पृष्टः सन्नाह - चिकीर्षितेष्विति । यज्ञादिषु कर्तुमभिप्रेतेषु सत्सु यदा पुरुषो हस्तमुत्क्षेप्तुमिच्छति, तदा हस्तवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो जायते । तं प्रयत्नं निमित्त-कारणभूतमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादसमवायिकारणाद्धस्ते कर्म भवति । कारण उक्त प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता )! ( उ ) तो फिर प्रकृत में मेरे लिए भी यही परिहार है । अर्थात् लोक में उत्क्षेपणादि क्रियाओं में गमन का व्यवहार होता है, अतः उस व्यवहार के लिए हेतु की कल्पना करते हैं । गमन में उत्क्षेपणादि का व्यवहार लोक में नहीं होता है, अत: उसके लिए किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है । ' सत्प्रत्यय कर्मविधिः ' अर्थात् प्रयत्न के द्वारा उत्पन्न कर्म की उत्पत्ति की रीति कहते हैं । ' किस प्रकार? " यह पूछे जाने पर ' चिकीर्षितेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा उसका उपपादन करते हैं । यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान पुरुष को अभिप्रेत रहने पर उसके लिए वह जिस समय हाथ को ऊपर की ओर उठाता है, उस समय आत्मा के हाथवाले प्रदेश में प्रयत्न उत्पन्न होता है । इस प्रयत्न रूप निमित्तकारण से हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है, जिसका असमवायिकारण आत्मा और हाथ का संयोग है । ६० For Private And Personal

पृष्ठ 789

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 789 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-तत्सम्बद्धेष्वपि कथम्? यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति ' उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम् ' इति, तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणा-( प्र ० ) शरीर और उनके अवयवों से संयुक्त द्रव्यों में कैसे? ( क्रिया उत्पन्न होती है? ) ( उ ० ) जब मूसल को हाथ में लेकर कोई यह इच्छा करता है कि ' मैं हाथ से मूसल को ऊपर की ओर उछालेँ ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न और हाथ एवं आत्मा के संयोग इन दोनों से उसी न्यायकन्दली सत्यपि प्रयत्ने गुरुत्वरहितस्य उत्क्षेपणापक्षेपणयोरशक्यकरणत्वाद् गुरुत्वस्यापि कारणत्वम् । हस्तवत्सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति । पादे कर्मोत्पतौ पादवत्यात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम्, पादात्मसंयोगोऽसमवायिकारणम् । एवं सर्वत्र शरीरावयवक्रियोत्पत्तौ द्रष्टव्यम् । शरीरक्रियोत्पत्तावपि शरीरात्म-संयोगोऽसमवायिकारणम्, शरीरवदात्मप्रदेशे प्रयत्नो निमित्तकारणम् । तत्सम्बद्धेषु शरीरसम्बद्धेषु, शरीरावयवसम्बद्धेष्वपि कथं कर्मोत्पत्तिरिति प्रश्नार्थः । यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति ' उत्क्षिपामि हस्तेन मुसलम् ' इति, तदनन्तरं तस्या इच्छाया अनन्तरम्, प्रयत्न हस्तेन मुसलमूर्ध्वमुत्क्षि-पामीति हस्तमुसलयोर्युगपदुत्क्षेपणेच्छातः प्रयत्नो जायमानस्तयोर्युगपदुत्क्षेपण-प्रयत्न भी का ऊपर उठना या नीचे गिरना के रहते हुए गुरुव से सर्वथा रहित द्रव्य नहीं होता, अतः गुरुत्व भी उसका कारण है । ' हस्तवत् सर्वशरीरावयवेषु पादादिषु शरीरे चेति ' अर्थात् पैर में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी, उसमें आत्मा के पादवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न निमित्तकारण होगा और पैर और आत्मा का संयोग असमवायि-कारण होगा । इसी प्रकार शरीर के सभी अवयवों में क्रिया की उत्पत्ति के प्रसङ्ग में समझना चाहिए । इसी प्रकार यह भी समझना चाहिए कि शरीर ( रूप अवयवी ) में जो क्रिया की उत्पत्ति होगी, उसका असमवायिकारण शरीर और आत्मा का संयोग ही होगा और आत्मा के शरीरवाले प्रदेश में उत्पन्न प्रयत्न उसका निमित्तकारण होगा । ' तत्सम्बद्धेषु ' इत्यादि प्रश्नवाक्य का अभिप्राय यह है कि शरीर के साथ और उसके अवयवों के साथ सम्बद्ध अन्य द्रव्यों में क्रिया की उत्पत्ति किस क्रम से होती मुसलमिति ' अर्थात् है? ' यदा हस्तेन मुसलं गृहीत्वेच्छां करोति - उत्क्षिपामि हस्तेन जिस समय हाथ में मूसल को लेकर पुरुष यह इच्छा करता है कि ' मैं मूसल को ऊपर की तरफ उछालू ' ' तदनन्तरम् ' अर्थात् उसके बाद ' प्रयत्नः ' अर्थात् ' हाथ से मूसल को लेकर मैं ऊपर की तरफ उछालू ' हाथ और मूसल को एक ही समय ऊपर की तरफ उछालने की इस आकार की इच्छा से उत्पन्न होनेवाला प्रयत्न, हाथ और मूसल को एक For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 790 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१५ प्रशस्तपादभाष्यम् दात्महस्तसंयोगाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्त मुसलसंयोगान्मु सलेऽपि कर्मेति । ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते । पुनरप्यपक्षेपणेच्छो-त्पद्यते । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगाद्धस्तमुसलयो-युगपदक्षेपणकर्मणी भवतः, ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखल-समय हाथ में क्रिया उत्पन्न होती है । एवं उसी समय प्रयत्न और हाथ एवं यूसल के संयोग इन दोनों से मूसल में भी क्रिया उत्पन्न होती है । इसके बाद उस मूसल के दूर फेंके जाने पर उस मूसल विषयक इच्छा का नाश हो जाता है । फिर उसी के अपक्षेपण ( निचे ले आने ) की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद प्रयत्न एवं उक्त ( आत्मा और हाथ के ) संयोग इन दोनों से एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में ही अपक्षेपणरूप क्रिया उत्पन्न होती है । मूसल की इस अन्तिम क्रिया से ऊखल में मूसल का अभिघात नाम का संयोग उत्पन्न होता है । उस कर्म और न्यायकन्दली समर्थो विशिष्ट एव जायते । तं प्रयत्नं विशिष्टं निमित्तमपेक्षमाणादात्महस्त-संयोगात् समवायिकारणाद् यस्मिन्नेव काले हस्ते उत्क्षेपणकर्मोत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले तमेव प्रयत्नमुभयार्थमुत्पन्नमपेक्षमाणाद्धस्त मुसलसंयोग । दसमवायिकारणा-न्मुसलेऽपि कर्म भवति, कारणयौगपद्यात् । ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते उत्क्षेपणेच्छा निवर्तते । पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते हस्तेन मुसलस्या-पक्षेपर्णच्छोपजायत इत्यर्थः । तदनन्तरं प्रयत्नः सोऽपि जायमान उत्क्षेपण-प्रयत्नवद् विशिष्ट एव जायते । तं च प्रयत्नमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् संयोगद्वया-ही समय ऊपर की ओर उछालने के सामथ्यं से युक्त ही उत्पन्न होता है । उस प्रयत्न रूप विशेष प्रकार के निमित्तकारण से जिस समय आत्मा और हाथ के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा हाथ में उत्क्षेपण कर्म की उत्पत्ति होती हैं, उसी समय हाथ और मूसल दोनों की क्रिया के लिए उत्पन्न उक्त प्रयत्न रूप निमित्तकारण से ही हाथ और मूसल के संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा मूसल में भी कर्म की उत्पत्ति होती है, क्योंकि एक ही समय हाथ और मूसल दोनों में हो क्रियोत्पत्ति के सभी कारण वर्तमान हैं । ' ततो दूरमुत्क्षिप्ते मुसले तदर्थेच्छा निवर्तते ' अर्थात् उत्क्षेपण को इच्छा नहीं रह जाती । ' पुनरप्यपक्षेपणेच्छोत्पद्यते ' अर्थात् हाथ से मूसल को नीचे की ओर ले आने की इच्छा उत्पन्न होती है । ' तदनन्तरं प्रयत्नः ' यह अपक्षेपण का प्रयत्न भी उत्क्षेपण के उक्त प्रयत्न की तरह ( एक ही समय हाथ और मूसल को नीचे की ओर ले आने के सामर्थ्य से ) युक्त ही उत्पन्न होता है । उक्त विशिष्ट-For Private And Personal