प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 791–800
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 791–800
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -मुसल योरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते, स संयोगो मुसलगतवेगमपेक्ष-माणोऽप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म करोति । तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते । तमपेक्ष्य मुसलहस्तसंयोगोऽप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म अभिघात इन दोनों से मूसल में संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस संस्कार के साहाय्य से मूसल और हाथ के संयोग के द्वारा हाथ में ' अप्रत्यय ' अर्थात् बिना प्रयत्न के ही उत्क्षेपण क्रिया की उत्पत्ति होती है । यद्यपि पहिले का संस्कार नष्ट हो गया रहता है, फिर भी मूसल और उलूखल का संयोग पटु ( संस्कारजनक ) कर्म को उत्पन्न करता है । वह संयोग ही अपनी विशिष्टता के कारण न्यायकन्दली दात्महस्तसंयोगाद्धस्तमुसलसंयोगाद्धस्तमुसलयोर्युगपदपक्षेपणकर्मणी ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणोलूखलमुसलयोरभिघाताख्यः भवतः । संयोगः क्रियते । अपक्षिप्तस्य मुसलस्यान्येन कर्मणा उलूखलमुसलसमवेतो मुसलस्योत्पतनहेतुः संयोगः क्रियत इत्यर्थः । स संयोगो मुसलगत वेगमपेक्षमाणोऽप्रत्ययमप्रयत्न-पूर्वकं मुसले उत्पतनकर्म करोति । वेगो निमित्तकारणम्, मुसलं समवायिकार-णम् । तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते उत्पतनकर्म स्वकारणा-भिघाताख्यं संयोगमपेक्षमाणं मुसले वेगमारभते । तं संस्कारमपेक्ष्य हस्तमुसल-प्रयत्न रूप निमित्तकारण के साहाय्य से कश्रित दोनों संयोग रूप असमवायिकारण के द्वारा अर्थात् आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और मूसल के संयोग इन दोनों संयोगों से एक ही समय दो अपक्षेपण क्रियायें ( अर्थात् हाथ और मूसल दोनों को नीचे की ओर ले आने की दो क्रियायें ) उत्पन्न होती हैं । " ततोऽन्त्येन मुसलकर्मणा उलूखलमुसल योरभिघाताख्यः संयोगः क्रियते " अर्थात् अपक्षेपण क्रिया से युक्त मूसल की अन्तिम क्रिया से उलूखल और मूसल इन दोनों में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले उस संयोग की उत्पत्ति होती है, जिससे मूसल का उत्पतन होता है । वह संयोग मुसल में रहनेवाले वेग के साहाय्य से अप्रत्यय ' अर्थात् बिना प्रयत्न के हो उस उत्पतन क्रिया को उत्पन्न करता है, जो मूसल में रहती है । इस ( अप्रत्ययक्रिया का ) वेग निमित्तकारण है और मूसल समवायिकारण है । ' तत्कर्माभिघातापेक्षं मुसले संस्कारमारभते ' अर्थात् वह उत्पतनरूपा क्रिया अपने कारणीभूत उक्त अभिघात नाम के संयोग के द्वारा मूसल में वेग को उत्पन्न करती है । इसी ( वेगाख्य ) संस्कार के साहाय्य से हाथ और मूसल का संयोग रूप असमवायिकारण हाथ में भी ' अप्रत्यय ' अर्थात् प्रयत्न से निरपेक्ष क्रिया को उत्पन्न करता है । ( प्र ० ) मूसल में पहिले की अपक्षेपण क्रिया से उत्पन्न वेग नाम का संस्कार For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१७ प्रशस्तपादभाष्यम् करोति । यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टस्तथापि मुसलोलूखलयोः संयोगः पटुकर्मोत्पादकः संयोगविशेषभावात् तस्य संस्कारारम्भे अथवा पहिले का ही साचिव्यसमर्थो भवति । अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघाताद-संस्कार के उत्पादन का मुख्य अधिष्ठाता है । विशेष कार्यक्षम संस्कार अभिघात नाम के संयोग न्यायकन्दलो नष्ट न होने के कारण संयोगोऽसमवायिकारणभूतोऽप्रत्ययम प्रयत्नपूर्वकं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म करोति । योऽसौ प्राक्तनोऽपक्षेपणसंस्कारो मुसलगतः सोऽप्यभिघाताद् विनष्टः, तदभावे कथं मुसलेऽप्रत्ययमुत्पतनकर्मोत्पतन संस्कारमारभते? अपेक्षाकारणाभावादत आह-यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्ट:, तथापि मुसलोलूखलसंयोगः पटुकर्मोत्पादकः संस्कारजनककर्मोत्पादकः । कुतः? संयोगविशेषभावात् संयोगविशेषत्वात् । किमतो यद्येवम्? तत्राह - तस्य कर्मणः संस्कारारम्भे कर्तव्ये साचिव्यसमर्थो भवति, साहाय्ये समर्थो भवति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसल योरुत्पतनकर्मणी क्रमेण भवतः । आशुभावाच्च यौगपद्यग्रहणम् । प्रकारान्तरमाह – अथवा प्राक्तन एव पटुः, संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्न-वस्थित इति विशिष्टकारणजत्वादतिप्रबल: संस्कार: स्पर्शवद्रव्यसंयोगेनापि अभिघात संयोग के द्वारा विनष्ट हो चुका है । उस संस्कार के न रहने पर मूसल की वह प्रयत्ननिरपेक्ष क्रिया मूसल में उत्पतनक्रिया से उत्पन्न होनेवाले संस्कार को कैसे उत्पन्न कर सकती है? क्योंकि ( प्राक्तन संस्कार रूप ) आवश्यक कारण वहाँ नहीं है । इसी प्रश्न का समाधान ' यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः ' इत्यादि से दिया गया है । इस सन्दर्भ के ' पटुकर्मोत्पादक: ' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि ( मूसल और उलूखल का संयोग ) ऐसे कर्म का उत्पादक है कि जिसमें ( वेगाख्य ) संस्कार को उत्पन्न करने की शक्ति है । कुत:? ' अर्थात् संयोग में ही संस्कार को कारणता क्यों हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' संयोगविशेषभावात् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् यतः वह संयोग अन्य संयोगों से विशेष प्रकार का है, ( अतः उससे संस्कार की उत्पत्ति होती है ) । उक्त संयोग में यदि विशिष्टता है भी तो इसका प्रकृत में क्या उपयोग है? इसी प्रश्न का उत्तर ' तस्य संस्कारारम्भे ' इत्यादि से दिया गया है । अर्थात् उस संयोग में यही विशिष्टता है कि उसमें कम के द्वारा वेग ( सस्कार ) उत्पादन में साहाय्य करने का सामर्थ्य है । इस पक्ष में हाथ में और मूसल में उत्पतन क्रियायें क्रमशः उत्पन्न होती हैं. ( युगपत् नही ) । ' हस्तमुसल योर्युगपदपक्षे पणकर्मणी ' इत्यादि वाक्य में जो यौगपद्य का ग्रहण किया गया है, उसका अर्थ केवल शीघ्रता है ( अर्थात् दोनों में अति-शीघ्र उत्पतन कर्म की उत्पत्ति होती है । ' अथवा प्राक्तन एवं पटुःसंस्कारोऽभिघातादविनश्यन्नवस्थिन इति ' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त प्रश्न का ही दूसरे प्रकार से समाधान किया गया है । अभिप्राय For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-विनश्यन्नवस्थित इति । अतः संस्कारवति पुनः संस्कारारम्भो नास्त्यतो यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतन-कर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणान्मुस लहस्त-संयोगादप्रत्ययं हस्ते ऽप्युत्पतनकर्मेति । पाणिमषु गमनविधिः • कथम्? यदा तोमरं हस्तेन गृहीत्वो-तदनन्तरं प्रयत्नः, तमपेक्षमाणाद् यथोक्तात् तब तक विद्यमान रहता है । अतः एक संस्कार से युक्त वस्तु में पुन: दूसरे संस्कार की उत्पत्ति की सम्भावना न रहने पर भी जिस समय संस्कार और अभिघात ( संयोग ) इन दोनों से बिना प्रयत्न के मूसल में उत्पतन ( उत्क्षेपण ) क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय उसी संस्कार और मूसल एवं हाथ के संयोग इन दोनों से अप्रत्यय ( प्रयत्नाजन्य ) उत्पतन ( उत्क्षेपण ) क्रिया उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) हाथ से फेंकी हुई वस्तुओं में गमन क्रिया किस प्रकार उत्पन्न होती है? ( उ ० ) जिस समय तोमर को हाथ में लेकर उसे उछालने की इच्छा ( पुरुष को ) होती है, उसके बाद प्रयत्न उत्पन्न होता है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं हाथ और तोमर के संयोग इन दोनों संयोगों के द्वारा उक्त प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में एक ही समय दो आकर्षणात्मक न्यायकन्दली न विनश्यति । अतः संस्कारवति संस्कारान्तरारम्भो नास्ति, यतः प्राक्तना-पक्षेपणसंस्कारो न विनष्टः, अतः प्राक्तनसंस्कारवति मुसले संस्कारान्तरा-रम्भो नास्तीति प्रतीयते । यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं यह है कि यह वेगाख्य संस्कार ( अन्य वेगाख्य संस्कारों के कारणों से ) विशेष प्रकार के कारणों से उत्पन्न होता है । अतः अत्यन्त बलवान होने के कारण ( अन्य संस्कारों के विनाशक ) स्पर्श से युक्त द्रव्य के संयोग से भी वह विनष्ट नहीं होता । यही कारण है कि उससे दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि पहिले अपक्षेपण क्रियाजनित संस्कार का विनाश नहीं हुआ है । इससे यह समझते हैं कि पहिले के संस्कार से युक्त मूसल में दूसरे संस्कार की उत्पत्ति नहीं होती है । " यस्मिन् काले संस्कारापेक्षादभिघातादप्रत्ययं मुसले उत्पतनकर्म, तस्मिन्नेव काले तमेव संस्कारमपेक्षमाणा-द्धस्तमुसलसंयोगादप्रत्ययं हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति ” इस पक्ष में हाथ और मूसल दोनों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७१ ९ संयोगद्वयात् तोमरहस्तयोर्युगपदाकर्षणकर्मणी भवतः । प्रसारित च हस्ते तदाकर्षणार्थः प्रयत्नो निवर्तते । तदनन्तरं तिर्यगूर्ध्व दूरमासनं वा क्षिपामीतीच्छा सञ्जायते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नस्तम-पेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः । तस्मात् तोमरे कर्मोत्पन्नं नोदनापेक्षं तस्मिन् संस्कारमारभते । ततः संस्कारनोदनाभ्यां तावत् क्रियायें उत्पन्न होती हैं । हाथ को पसार लेने पर आकर्षण का कारण वह प्रयत्न नष्ट हो जाता है I । इसके बाद ' इसको किसी पार्श्व में, या ऊपर बहुत दूर, या निकट में ही फेंक दूँ यह इच्छा उत्पन्न होती है । फिर ( इच्छाविषयी -भूत ) उस क्रिया के अनुकूल प्रयत्न उत्पन्न होता है । इसके बाद इस प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में नोदन नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । नोदन नाम के संयोग से तोमर में उत्पन्न क्रिया उस नोदन की न्यायकन्दली हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति । अस्मिन् पक्षे यौगपद्यम् । हस्तमुसलोत्पतनकर्मणोर्वास्तवमेव पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम्? पाणिमुक्तेषु द्रव्येषु गमनविधिः गमनप्रकारः कथमुत्पद्यत इति प्रश्ने कृते सत्याह - यदा तोमरमिति । युग-पदाकर्षणेति, अनाकृष्योत्क्षेप्तुमशक्यत्वात् । प्रयत्नो निवर्तत इति तयो -हंस्ततोमरयोराकर्षण प्रयोजनप्रयत्नो निवर्तते, तद्विरोधिप्रसारणप्रयत्नोत्पादादित्यर्थः । तदनन्तरमिति । प्रसारणानन्तरम् । तीर्यगूर्ध्वं वा दूरमासन्नं वा क्षिपामीतीच्छो-त्पद्यते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नः तिर्यक्क्षेपणेच्छायां तिर्यक्क्षेपणप्रयत्नो में ही उत्पन्न कर्म वास्तव में एक ही समय उत्पन्न होते हैं ( पहिले पक्ष की तरह यहाँ यौगपद्य का शीघ्रतामूलक गौण प्रयोग नहीं है ) । ' पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम्? हाथ से फेके हुए द्रव्यों को ' गमनविधि ' गमन की रीति अर्थात् गमनक्रिया को उत्पत्ति किस प्रकार होती है? यह प्रश्न किये जाने पर ' यदा तोमरम् ' इत्यादि से समाधान किया गया है । ' युगपदाकर्षणेति ' क्योंकि बिना आकर्षण के फेंकना सम्भव नहीं हैं । ' प्रयत्नो निवर्तत इति ' अर्थात् हाथ और तोमर इन दोनों के आकर्षण रूप प्रयोजन का सम्पादन कर प्रयत्न निवृत्त हो जाता है । क्योंकि आकर्षण का विरोधी और प्रसारण का हेतुभूत प्रयत्न उत्पन्न हो गया रहता हैं । ' तदनन्तरम् ' अर्थात् प्रसारण के बाद, टेढ़ा करके फेंके या ऊपर की ओर अथवा दूर फेंके अथवा समीप में फेंके, इस प्रकार की इच्छायें उत्पन्न होती हैं । ' तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्न: ' इसमें प्रयुक्त ' अनुरूप ' शब्द के द्वारा यह अर्थ व्यक्त होता है कि For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-कर्माणि भवन्ति यावद्धस्ततोमरविभाग इति । ततो विभागान्भोदने निवृत्ते संस्कारादूर्ध्वं तिर्यग् दूरमासनं वा प्रयत्नानुरूपाणि कर्माणि भवन्त्यपतनादिति । तथा यन्त्रमुक्तेषु गमनविधिः कथम्? यो बलवान् कृतव्यायामो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य दक्षिणेन शरं सन्धाय सहायता से तोमर में संस्कार को उत्पन्न करती है । इसके बाद संस्कार और नोदन से तोमर में तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक हाथ और तोमर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इसके बाद विभाग से जब नोदन नाम के संयोग का नाश हो जाता है, तब उस संस्कार ( वेग ) पार्श्व में, दूर में, या समीप में फेंकी जाने की क्रियायें से पतन के समय तक उत्पन्न होती रहती हैं । इसी प्रकार यन्त्र ( धनुषादि ) के द्वारा फेंकी हुई ( शरादि > ) वस्तुओं में भी गमन क्रिया की रीति जाननी चाहिए | ( प्र ० ) कैसे? ( उ ० ) न्यायकन्दली जायत इति । ऊर्ध्वक्षेपणेच्छाया मूर्ध्वक्षेपणप्रयत्नो जायते । दूरक्षेपणेच्छायां महान् प्रयत्नः आसन्नक्षेपणेच्छायां च शिथिलः प्रयत्नो जायत इति तदनु-रूपशब्दार्थः । तमपेक्षमाणस्तोमर हस्तसंयोगो नोदनाख्यो नोद्यस्य तोमरस्य नोदकस्य च हस्तस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्मान्नोदनाख्याद् यथोक्तादिच्छानुरूप-प्रयत्नापेक्षात् तोमरे कर्मोत्पन्नम् । तत् कर्म नोदनापेक्षम्, तस्मिन् तोमरे संस्कार-मारभते । ततः संस्कारेति । तोमरस्य पतनं यावत् संस्कारात् तदनुरूपाणि कर्माणि भवन्तीत्यर्थः । कृतव्यायामः कृतायुधाभ्यासो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य गाढं गृहीत्वा दक्षिणेन शरं सन्धाय ज्यायां शरं संयोज्य सशरां ज्यां शरेण सह वर्तमानां टेढ़ा कर फेंकने की इच्छा के होने पर प्रयत्न भी तदनुकूल हो उत्पन्न होता है । एवं ऊपर की ओर फेंकने की इच्छा होने पर ऊपर फेंकने के अनुकूल ही प्रयत्न भी उत्पन्न होता है । दूर फेंकने की इच्छा होने पर बहुत बड़ा प्रयत्न उत्पन्न होता है । समीप में फेंकने की इच्छा होने पर शिथिल प्रयत्न उत्पन्न होता है । ' तमपेक्षमाणस्तोमरहस्त-संयोगो नोदनाख्यः ' क्योंकि नोद्य जो तोमर एवं नोदक जो हाथ, इन दोनों के साथ साथ ही वह गमन का भी कारण है । ' तस्मात् ' अर्थात् कथित उस नोदन नाम के संयोग के द्वारा उक्त इच्छानुरूप प्रयत्न के साहाय्य से तोमर में क्रिया की उत्पत्ति होती है । यही क्रिया नोदन संयोग की सहायता से तोमर में संस्कार ( वेग को ) उत्पन्न करती है । ' ततः संस्कारेति ' अर्थात् जब तक तोमर का पतन नहीं हो जाता, तब तक वेग से उसमें नोदन के अनुरूप क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] E? www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२१ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal सरां ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा आकर्षणेच्छां करोति, सज्येष्वाकर्ष-याम्येतद् धनुरिति । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाक-र्षणकर्म हस्ते यदैवोत्पद्यते तदैव तमेव प्रयत्नमपेक्षमाणाद्भस्तज्याशर-संयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म, प्रयत्नविशिष्टहस्तज्याशर संयोगमपेक्ष-माणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी भवतो धनुष्कोटयेोरित्येतत् धनुषादि चालन में निपुण व्यक्ति जिस समय बायें हाथ से धनुषादि को जोर से पकड़ कर दाहिने हाथ से उसमें तीर को लगाता है और तीर सहित धनुष की डोरी को मुट्ठी से पकड़ कर उसे खींचने की इस प्रकार की इच्छा करता है कि मैं शर और डोरी सहित धनुष को खीचूँ ' उसके बाद प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और हाथ के संयोग एवं उक्त प्रयत्न इन दोनों से जिस समय आकर्षणात्मक क्रिया की उत्पत्ति होती है, उसी समय उस प्रयत्न और हाथ का डोरी से संयोग और डोरी का तीर के साथ संयोग इन दोनों संयोग प्रभूति कारणों से डोरी और तीर दोनों में ही क्रियायें उत्पन्न होती हैं । धनुष के दोनों कोणों के साथ डोरी के दोनों संयोगों से धनुष के दोनों कोणों में दो क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इन दोनों क्रियाओं की उत्पत्ति में प्रयत्न से युक्त हाथ के साथ डोरी और तीर के ज्यां मुष्टिना गृहीत्वा इच्छां करोति सज्येष्वाकर्षयाम्येतद् धनुरिति । ज्येति धनुर्गुणस्याख्या, इषुरिति शरस्याभिधानम् । ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनुरेतदाकर्षयामीतीच्छाया आकारो दर्शितः । तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्ते यदेवोत्पद्यते, तदैव तं प्रयत्नमपेक्षमाणाद्धस्तज्याशरसंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्म हस्तशर-संयोगात् । प्रयत्न विशिष्टज्या हस्तसयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्या कोटिसंयोगाभ्यां जो पुरुष अस्त्र चलाने का अभ्यास किया हो वही पुरुष ' कृतव्यायामः ' शब्द से अभिप्रेत है । ' वामेन करेण धनुविष्टभ्य ' अर्थात् वह जब बायें हाथ से धनुष को दृढ़तापूर्वक पकड़कर ' दक्षिणेन शरं सन्धाय ' अर्थात् धनुष की डोरी में तीर को लगा कर, ' सशरां ज्याम् ' अर्थात् तीर में लगी हुई डोरी को, ' मुष्टिना गृहीत्वा ' अर्थात् मुट्ठी से पकड़ कर इच्छा करता है कि ' सज्येष्वाकर्षयाम्येतद्धनुरिति ' धनुष की डोरी का नाम ' ज्या ' है । ' इषु ' शब्द शर ( तीर ) का वाचक है । ' सज्येषुधनुः ' यह शब्द " ज्या च इषुश्च ज्येषू, सह ज्येषुभ्यां वर्तत इति सज्येषु धनु: ' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से निष्पन्न है । ' एतदाकर्षयामि इस वाक्य के द्वारा प्रकृत इच्छा का आकार दिखलाया गया है । ' तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्महस्तसंयोगादाकर्षणकर्म हस्तशरसंयोगात्, प्रयत्न-विशिष्टज्या हस्तसंयोगमपेक्षमाणाभ्यां ज्याकोटिसंयोगाभ्यां कर्मणी धनुष्कोट्योरित्येतत् सर्व
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -सर्वं युगपत् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन गन्तव्य -मिति यज्ज्ञानं ततस्तदाकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाशस्ततः पुनर्मोक्ष-णेच्छा सज्जायते, तदनन्तरं प्रयत्नस्तमपेक्षमाणादात्माङ्गलिसंयो-गादङ्गलिकर्म तस्माज्ज्याङ्गुलि विभागः, ततो विभागात् संयोग-विनाशः, तस्मिन् विनष्टे प्रतिबन्धकाभावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थापयति, तदा संयोग भी सहायक हैं । ये सभी काम एक ही समय होते हैं । इस प्रकार कान तक धनुष के खींचे जाने पर ' इसको इससे आगे नहीं जाना चाहिए ' इस आकार का ( संकल्पात्मक ) ज्ञान ( उत्पन्न होता है ) । इस ज्ञान से आकर्षण के कारणीमूत प्रयत्न का विनाश हो जाता है । फिर उसे छोड़ने की इच्छा उत्पन्न होती है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । आत्मा और अङ्गुलि के संयोग से अगुलि में क्रिया की उत्पत्ति होती है, जिसमें उक्त प्रयत्न का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । अङ्गुलि की इस क्रिया से डोरी और अङ्गुलि में विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से { डोरी और अङ्गुलि के ) संयोग का विनाश होता है । उस संयोग के नष्ट हो जाने पर किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण धनुष न्यायकन्दली कर्मणी धनुष्कोटचोरित्येतत् सर्वं युगपत् कारणयौगपद्यात् । एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन हस्तेन गन्तव्यमिति यद् ज्ञानं तस्मात् । तदाकर्षणार्थस्त धनुराकर्षणार्थस्य प्रयत्नस्य विनाश इति । ततः शरस्य गुणस्य च मोक्षणेच्छा च । तदनन्तरं प्रयत्नो मोक्षणार्थ:, तमपेक्ष-माणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म । तस्माद् ज्याङ्गुलिविभागः, क्षरगुणाभ्याम् युगपत् ' क्योंकि सब को सामग्री एक ही समय उपस्थित है । ' एवमाकर्णादाकृष्टे धनुषि नातः परमनेन हस्तेन गन्तव्यमिति यज्ज्ञानम् ' अर्थात् उसी ज्ञान से ' तदाकर्षणार्थस्य ' धनुष को अपनी ओर खींचने के लिए जो प्रयत्न था उसका विनाश होता है । इसके बाद तीर और डोरी को छोड़ देने की इच्छा होती है, उसके बाद छोड़ने के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है ' तमपेक्षमाणादात्माङ्गुलिसंयोगादङ्गुलिकर्म, तस्माज्ज्याङ्गुलिविभागः ' अर्थात् डोरी का शर से और अङ्गुली का डोरी से विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग से शर का और डोरी का संयोग और डोरी के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७२३ तमेव संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुर्ज्या संयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मोत्पद्यते । तत् स्वकारणापेक्षं ज्यायां संस्कारं करोति । तमपेक्षमाण इपुज्यासंयोगो नोदनम्, तस्मादिषावाद्यं कर्म नोदनापेक्षमिषौ संस्कारमारभते । तस्मात् संस्कारान्नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्या-विभागः, विभागान्निवृत्ते नो कर्माण्युत्तरोत्तराणीषु-में रहनेवाला ( स्थितिस्थापक ) संस्कार नमे हुये उस धनुष को पहिली अवस्था में ले आता है । उसी समय इस स्थितिस्थापक संस्कार एवं धनुष और डोरी के संयोग इन दोनों से तीर क्रिया उत्पन्न होती है । यह क्रिया अपने कारणीभूत ( धनुष और डोरी के संयोग ) के साहाय्य से डोरी में ( वेगाख्य ) संस्कार को उत्पन्न करती है । इस संस्कार के द्वारा तीर एवं डोरी इन दोनों में ' नोदन ' नाम के संयोग की उत्पत्ति होती है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से तीर की पहिली क्रिया तीर में ( वेगाख्य ) ( संस्कार को उत्पन्न करती है । यह संस्कार उक्त नोदनसंयोग की सहायता से तब तक क्रियाओं को उत्पन्न करता रहता है, जब तक डोरी और तीर का न्यायकन्दली ततो विभागाच्छ्रगुणाङ्गुलिसंयोगविनाशस्तस्मिन् संयोगे विनष्टे प्रतिबन्धका-भावाद् यदा धनुषि वर्तमानः स्थितिस्थापकः संस्कारो मण्डलीभूतं धनुर्यथावस्थितं स्थापयति । तं संस्कारमपेक्षमाणाद् धनुज्यसंयोगाद् ज्यायां शरे च कर्मो-त्पद्यते । तत् कर्म स्वकारणापेक्षं धनुर्ज्या संयोगापेक्षं ज्यायां संस्कारं वेगाख्यं करोति तं च संस्कारमपेक्षमाण इषुज्यासंयोगो नोदनम्, नोद्यस्येपोर्नोदकस्य गुणस्य सहगमनहेतुत्वात् । तस्माद् नोदनादिषावाद्यं कर्म संस्कारमारभते । तस्मात् संस्काराद् नोदनसहायात् तावत् कर्माणि भवन्ति यावदिषुज्याविभागः । साथ अङ्गुली का संयोग इन दोनों संयोगों का विनाश हो जाता है । इन संयोगों के विनष्ट होने पर जिस समय धनुष में रहनेवाला स्थितिस्थापक संस्कार किसी प्रतिबन्धक के न रहने के कारण नमे हुये धनुष को अपनी पहिली अवस्था में ले आता है, ( उसी समय ) इस स्थितिस्थापक संस्कार के साहाय्य से ही धनुष और डोरी के संयोग के द्वारा डोरी में और शर में क्रिया उत्पन्न होती है । ' तत् ' अर्थात् वह कर्म ' स्वकारणापेक्षम् ' अर्थात् धनुष और डोरी के संयोग का साहाय्य पाकर डोरी में संस्कार को अर्थात् वेग नाम के संस्कार को उत्पन्न करता है । उसी वेग से तीर और डोरी का ' नोदन ' संयोग उत्पन्न होता है, ( वह संयोग नोदन रूप इसलिए है कि ) नोद्य ( प्रेर्य ) जो तीर और नोदक ( प्रेरक ) जो डोरी इन दोनों में साथ साथ गमन क्रिया के उत्पादन का हेतु है । इस नोदन संयोग के साहाय्य से पहिली क्रिया तीर में संस्कार को उत्पन्न करती For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-संस्कारादेवापतनादिति । बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात्? संयोग-बहुत्वात् । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावादिति । विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । विभाग से नोदन नाम के संयोग के विनष्ट हो जाने पर तीर के वेग नाम के संस्कार से ही आगे को क्रियायें तीर के गिरने तक होती रहती हैं । ( प्र ० ) बहुत सी क्रियायें क्रमशः क्यों उत्पन्न होती हैं? ( उ ० > ) यतः संयोग बहुत से हैं । किन्तु संस्कार उसमें एक ही रहता है, क्योंकि बीच में ( संस्कार के उत्पादक प्रथम ) कर्म को अपेक्षित अन्य कारणों का ( सहयोग प्राप्त ) नहीं है । न्यायकन्दली विभागान्निवृत्ते नोदने कर्माणि उत्तराणि संस्कारादेव वेगाख्याद् भवन्ति यावत् पतनम्, इषोरेतस्य च पातो गुरुत्वप्रतिबन्धकसं ह्कारक्षयात् । अत्र चोदयति - बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मादिति । ज्याविभक्तस्येषो-रन्तराले क्रमशो बहूनि कर्माणि भवन्तीति कस्मात् कल्प्यते? एकमेव कर्म कुतो न कल्पितमित्यभिप्रायः । समाधत्ते - संयोगबहुत्वादिति । उत्तरसंयो-गान्तं कर्मेत्यवस्थितम् । क्षिप्तस्येषोरन्तराले बहवः संयोगा दृश्यन्ते । तेन बहूनि कर्माणि भवन्तीत्याश्रीयते । एकस्तु संस्कारः, अन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् । नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्षं कर्म संस्कारमारभते न कर्ममात्रम्, वेगाभावात् । है । नोदन से साहाय्यप्राप्त उस संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब तक कि तीर और डोरी का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इस विभाग से जब उक्त नोदन संयोग का नाश हो जाता है, तब ' संस्कार ' से ही अर्थात् वेग नाम के संस्कार से ही तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं जब तक कि तीर का पतन नहीं हो जाता । यह पतन गुरुत्व के प्रतिबन्धक संस्कार के नाश से उत्पन्न होता है । ' बहूनि कर्माणि क्रमशः कस्मात् ' इस वाक्य के द्वारा फिर आक्षेप करते हैं । उक्त आक्षेपभाष्य का यह अभिप्राय है कि डोरो से विभक्त तीर में मध्यवर्ती अनेक क्रियाओं की कल्पना किस हेतु से की जाती है? एक ही कर्म की कल्पना क्यों नहीं की जाती १ ' संयोग बहुत्वात् ' इत्यादि से उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । यह निश्चित है कि क्रिया की सत्ता उत्तरदेश संयोग तक रहती है । एवं फेके हुए तीर के बीच में बहुत से संयोग देखे जाते हैं । अतः यह कल्पना करते हैं कि कर्म भी बहुत से उत्पन्न होते हैं । ' एकस्तु संस्कारोऽन्तराले कर्मणोऽपेक्षाकारणाभावात् ' नोदनसंयोग हो या अभिघातसंयोग हो इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य पाकर ही कर्म संस्कार को उत्पन्न करता है, केवल कर्म से बेगाख्यसंस्कार की उत्पत्ति नहीं होती । बीच में न नोदनसंयोग की For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org प्रकरणम् ] भाषांनुवादसहितम् प्रशस्तपादभष्यम् एवमात्माधिष्ठितेषु सत्प्रत्ययमसत्प्रत्ययं Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२५ च कर्मोक्तम् । गमनमेव अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं कर्म नोदनादिभ्यो भवति । तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्ववेगप्रयत्नान् समस्त-इस प्रकार आत्मा से अधिष्ठित द्रव्यों के प्रयत्नजनित और अप्रयत्नजनित दोनों ही प्रकार के कर्म कहे गये हैं । आत्मा की अध्यक्षता के बिना बाह्य चारों महाभूतों में बिना प्रयत्न के केवल नोदनादि से गमन रूप क्रिया की ही उत्पत्ति होती है ( उत्क्षेपणादि क्रियाओं की नहीं ) । यहाँ ( कथित ) ' नोदन ' उस संयोग विशेष का नाम है जो कभी गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और प्रयत्न सम्मिलित इन चार गुणों से, कभी इनमें से एक दो या तीन गुणों से उत्पन्न होता है । यह विभाग को उत्पन्न न करनेवाले कर्म न्यायकन्दली न चान्तराले नोदनं नाप्यभिघातः, तस्मादेक एव शरज्यासंयोगापेक्षेण शर-कर्मणा कृतो विशिष्टः संस्कारो यावत् पतनमनुवर्तते । यथा यथा चास्य कार्यकरणाच्छक्तिः क्षीयते, तथा तथा कार्यं मन्दतरतमादिभेदभिन्नमुपजायते । यथा तरोस्तरुणस्य फलं प्रकृष्यतेऽपकृष्यते च जीर्णस्य । उपसंहरति - एवमिति । अनधिष्ठितेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति । आत्मना असाधारणेन सम्बन्धिनानधि-ष्ठितेषु बाह्येष्वप्रयत्नपूर्वकं गमनाख्यमेव कर्म भवति, नोत्क्षेपणापक्षेपणादिक-मित्यर्थः । महाभूतेषु नोदनादिभ्यः कर्म भवतीत्युक्तम् । अथ किं नोदनमत आह-उत्पत्ति होती है, न अभिघातसंयोग की । अतः तीर और डोरी के एक ही संयोग के साहाय्य से तीर की क्रिया के द्वारा जिस विशेष प्रकार के वेगाख्य संस्कार की उत्पत्ति होती हैं, वही तीर के पतन होने तक बराबर बना रहता है । जैसे जैसे उससे कार्य होते जाते हैं, उसकी शक्ति क्षीण होती जाती हैं, एवं कार्य भी ( शक्ति की क्षीणता से ) क्रमशः मन्द मन्दतर और मन्दतम होते जाते हैं । जैसे कि तरुणवृक्ष का फल बढ़िया होता है, और जीर्णवृक्ष का फल घटिया । ' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । अनधिष्ठि-तेषु बाह्येषु चतुर्षु महाभूतेष्वप्रत्ययं गमनमेव नोदनादिभ्यो भवति ' । अर्थात् आत्मा रूप असाधारण आश्रय से असम्बद्ध पृथिव्यादि बाह्य चारों द्रव्यों में बिना प्रयत्न ( अप्रयत्नपूर्वकम् ) के ( नोदनादि संयोगों के द्वारा ) गमन नाम का कर्म ही उत्पन्न होता है, उत्क्षेपण या अपक्षेपण प्रभृति कर्म नहीं । For Private And Personal