प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 801–810
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 801–810
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७२६ न्याय कन्दली संवलित प्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्म निरूपणं-व्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः । नोदनम विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणम्, तस्माच्चतुर्ष्वपि महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम् । काही कारण है । इस ( संयोग ) से चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पङ्क नाम की पृथिवी में ( नोदन संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती हैं ) । न्यायकन्दली तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेषः । कथं संयोगविशेषो नोदनमुच्यते, तत्राह - नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणमिति । नोद्यनोदकयोः परस्परविभागं न करोति यत् कर्म तस्य कारणं नोदनम् । किमुक्तं स्यात्? अनेन संयोगेन सह नोदको नोद्यं नोदयति नान्यथा, तेनायं नोदनमुच्यते । नोदनं तु क्व कर्मकारणमत्राह- - यथा पङ्काख्यायां पृथिव्या-मिति । यदा पङ्कस्योपरि मन्दव्यवस्थापिता प्रस्तरगुटिका क्रमशः पङ्केन सममधो गच्छति, तदा गुरुत्वापेक्षः प्रस्तरपङ्कसंयोगो नोदनम् । यदा प्रयत्नेन दूर-मुत्थाप्य प्रस्तरेणाभिहन्यते पङ्कस्तदा गुरुत्वप्रयत्नवेगापेक्षः संयोगो नोदनम्, यदा जलेनाहन्यते तदा समस्तापेक्षः संयोगो नोदनमिति यथासम्भवमूह्यमिति । अभी कहा है कि पृथिव्यादि महाभूतों में नोदनादि से क्रिया की उत्पत्ति होती है, अतः प्रश्न उठता है कि यह ' नोदन कौन सी वस्तु है? इसी प्रश्न का उत्तर ' तत्र नोदनं गुरुत्वद्रवत्वप्रयत्नवेगान् समस्तव्यस्तानपेक्षमाणो यः संयोगविशेष: ' इस वाक्य से दिया गया है । उक्त विशेष प्रकार के सयोग को ही नोदन क्यों कहते हैं? इसी प्रश्न का उत्तर ' नोदनमविभागहेतोः कर्मणः कारणम् ' इस वाक्य से दिया गया है । नोद्य और नोदक इन दो द्रव्यों में जिस क्रिया से विभाग की उत्पत्ति नहीं होती नोदन ही उस क्रिया का हेतु है । इससे क्या निष्कर्ष निकला? यही कि नोदन रूप संयोग के साथ ही नोदक अपने नोद्य का नोदन करता हैं, अन्यथा नहीं । इसी कारण यह संयोग ' नोदन ' कहलाता है । नोदनसंयोग से क्रिया की उत्पत्ति कहाँ होती है? इसी प्रश्न का उत्तर ' यथा पङ्काख्यायां पृथिव्याम् ' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । जिस समय पङ्क के ऊपर धीरे से रक्खा हुआ पत्थर का टुकड़ा क्रमशः पङ्क के साथ नीचे की ओर जाता है, वहाँ पत्थर और पङ्क का संयोग रूप नोदन केवल गुरुत्व से उत्पन्न होता है । जिस समय प्रयत्न के द्वारा पत्थर को दूर उछाल कर पङ्क को आघात पहुँचाया जाता है, वहाँ जिस नोदन संयोग की उत्पत्ति होती है, उसका गुरुत्व, प्रयत्न और वेग ये तीनों कारण हैं । जिस समय वही पङ्क जल के द्वारा आहत किया जाता है, वहाँ का नोदन उन सभी कारणों से उत्पन्न होता है । इसी प्रकार जहाँ जिस प्रकार की सम्भावना हो उसके अनुसार कल्पना करनी चाहिए । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् .७२७ वेगापेक्ष यः संयोगविशेषो विभागहेतोरेकस्य कर्मणः कारणं सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु तथा पादादिभिर्नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा । पङ्काख्यायां पृथिव्यां यः संयोगो नोदनाभिघातयोरन्यतरापेक्ष उभयापेक्षो वास संयुक्तसंयोगः, तस्मादपि पृथिव्यादिषु कर्म भवति । ये च प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म जायते । ' अभिघात ' उस विशेष प्रकार के संयोग का नाम है जो वेग की सहायता से विभाग को उत्पन्न करनेवाले कर्म का कारण हो । अभिघात नाम के संयोग से भी चारों महाभूतों में क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । जैसे कि पत्थर प्रभृति कठिन द्रव्यों पर गिरे हुए द्रव्यों में ( क्रिया की उत्पत्ति होती है ) एवं पैर प्रभृति से केवल छुये जाने पर या अभिहत होने पर पङ्क नाम की पृथिवी में ( कथित ) नोदन और अभिघात नाम के दोनों संयोगों से या दोनों में से किसी एक संयोग से जिस संयोग की उत्पत्ति होती है, उसे ‘ संयुक्तसंयोग ' कहते हैं । इस सयुक्तसंयोग से भी पृथिव्यादि भूतों में क्रिया की उत्पत्ति होती है । जो प्रदेश किसी से छुये नहीं जाते, या न्यायकन्दली वेगापेक्षो यः सयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः, अभिघात्याभिघातकयोः परस्परविभागो यतः कर्मणो जायते तस्यैवैकस्य हेतुर्यः संयोगविशेषः सोऽभिघातः । तस्मादपि चतुर्षु महाभूतेषु कर्म भवति । यथा पाषाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु । नोदनं परस्परा विभागहेतो-रेवेकस्य कर्मणः कारणं न परस्परविभागहेतोः, एवमभिघातोऽपि परस्पर-विभागहेतोरेवैकस्य कर्मणः कारणं न परस्पराविभागहेतोरिदमुक्त मे कस्य कर्मणः कारणम् । " वेगापेक्षो यः संयोग एकस्य विभागकृतः कर्मणः कारणं सोऽभिघातः " अर्थात् अभिघात्य और अभिघातक इन दोनों में परस्पर विभाग की उत्पत्ति जिस एक क्रिया से हो, उस क्रिया का कारणीभूत विशेष प्रकार का संयोग हो ' अभियात ' है । ' तस्मादपि चतुषु महाभूतेषु कर्म भवति, यथा पाणादिषु निष्ठुरे वस्तुन्यभिपतितेषु ' ( जिस प्रकार ) परस्पर विभाग के अकारणीभूत एक क्रिया का ही कारण ' नोदन ' है, परस्पर विभाग के कारणीभूत एक क्रिया का कारण नोदन नहीं है । उसी प्रकार ( ठीक उससे विप-( त ) अभिघात भी परस्पर विभाग के हेतुभूत एक क्रिया का ही कारण है, वह परस्पर विभाग के अहेतुभूत एक क्रिया का कारण नही है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir २७२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-पृथिव्युदयोर्गुरुत्व विधारक संयोगप्रयत्नवेगाभावे सति गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । तत्राद्यं गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्वसंस्काराभ्याम् । अभिहत नहीं होते, उनमें भी क्रिया की उत्पत्ति होती है । गुरुत्व के विरोधी संयोग, प्रयत्न और वेग इन सबों के न रहने पर भी पृथिव्यादि द्रव्य केवल गुरुत्व के द्वारा जो नीचे की तरफ गिरते हैं, उस क्रिया को ही ' पतन ' कहते हैं । जैसा कि मुसल और तीर प्रभृति द्रव्यों में कह आये हैं । उनमें पहिली क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है और दूसरी क्रियायें गुरुत्व और वेग दोनों से उत्पन्न होती हैं । न्यायकन्दली संयुक्तसंयोगं व्याचष्टे - पादादिभिर्नुद्यमानायामिति । एकत्र पृथिव्यां पादेन नुद्यमानायामभिहन्यमानायां वा ये प्रदेशा न नुद्यन्ते नाप्यभिहन्यन्ते तेष्वपि कर्म दृश्यते । तत्र चलतां प्रदेशान्तराणां नुद्यमानाभिहन्यमान-भूप्रदेशैः सह संयुक्तप्रदेशसंयोगः कारणम् । यत्राभिघातकं द्रव्यं भूप्रदेशमभिहत्य किञ्चिदधो नीत्वोत्पतति तत्र प्रदेशान्तरक्रियायामुभयापेक्षः संयुक्तसंयोगो हेतुः । गुरुत्वस्य कर्मकारणत्वमाह - पृथिव्युदकयोर्गुरुत्वविधारकसंयोगप्रयत्न-वेगाभावे गुरुत्वाद् यदधोगमनं तत् पतनम् । यथा मुसलशरीरादिषूक्तम् । गुरुत्वप्रतिबन्धकस्य हस्तसंयोगस्याभावे मुसलस्य यदधोगमनं तत् पतनं गुरुत्वाद् भवति । एवं गुरुत्वविधा रकप्रयत्नाभावे शरीरस्य पतनम्, क्षिप्तस्येषोरन्तराले ' पादादिभिनु द्यमानायाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा ' संयुक्तसंयोग ' की व्याख्या करते हैं । पृथिवी का एक देश पैर के द्वारा छुये जाने पर या अभिहत होने पर ( उस देश से सम्बद्ध ) पृथिवी के अन्य प्रदेशों में भी- जो पैर से न छुवे गये हैं. और न अभिहत ही हुए हैं- क्रिया देखी जाती है । उस क्रिया का कारण वह संयुक्त संयोग है, जो क्रिया से युक्त भूप्रदेश के साथ पैर से छुए हुए या अभिहत हुए दूसरे भूप्रदेश का है । जहाँ अभिघात करनेवाला द्रव्य भूप्रदेश में अभिघात को उत्पन्न कर थोड़ा सा नीचे जाकर ऊपर की ओर उठता है । वहां जो दूसरे भूप्रदेश में क्रिया को उत्पत्ति होती है, उसका कारण ( वेग और संयोग ) इन दोनों से साहाय्यप्राप्त संयुक्त संयोग ही है । ' पृथिव्युदकयो: ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गुरुत्व से कर्म की उत्पत्ति कही गयी है । मूसल में हाथ का जो संयोग है, वह गुरुत्व का प्रतिबन्धक है । उसके न रहने पर ही मूसल नीचे की ओर जाता है, मूसल की वह पतन क्रिया गुरुत्व से उत्पन्न होती है । गुरुत्व एवं शरीरधारण के उपयुक्त प्रयत्न का अभाव, इन दोनों के रहने पर जो शरीर का पतन होता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इसी प्रकार फेंके हुए तीर में वेग के For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] स्रोतोभूतानामपां II www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ७२६ प्रशस्तपादभाष्यम् स्थलानिम्नाभिसर्पणं यत तद् न्यायकन्दली For Private And Personal द्रवत्वात् स्यन्दनम् । कथम्? समन्ताद् रोधः संयोगेनावयविद्रवत्वं प्रति-बद्धम्, अवयवद्रवत्वमध्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तरावयव-द्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रा सेतुभेदः धारा रूपी जल का अपने आश्रय रूप स्थल से नीचे की ओर फैलना ही ' स्यन्दन ' नाम की क्रिया है, जो द्रवत्व से उत्पन्न होती है । ( प्र ० ) किस प्रकार? ( उ ० ) नदी के जल किनारों के सभी अवयवों के साथ पूर्ण रूप से संयुक्त रहने के कारण अवयवी ( रूप जल ) का द्रवत्व प्रतिरुद्ध हो जाता है । उस अवयवी के सभी अवयवों के द्रवत्व भी उस अवयवी में एकार्थ-समवाय सम्बन्ध से रहने के कारण किनारों के उसी संयोग से प्रतिरुद्ध रहते हैं । उन अवयवों के आगे आगे के अवयवों के द्रवत्व भी उक्त संयुक्तसंयोगों से प्रतिरुद्ध रहते हैं । जब थोड़ा सा भी बाँध काट दिया वेगाभावात् पतनं गुरुत्वात् । तत्राद्यं कर्म गुरुत्वात्, द्वितीयादीनि तु गुरुत्व-संस्काराभ्याम् । तेषु मुसलादिष्वाद्यं कर्म गुरुत्वाद् भवति तेन कर्मणा संस्कारः क्रियते, तदनन्तरमुत्तरकर्माणि गुरुत्वसंस्काराभ्यां जायन्ते, द्वयोरपि प्रत्येक-मन्यत्र सामर्थ्यावधारणात् । द्रवत्वस्य कारणत्वं कथयति -- स्रोतोभूतानामपां स्थलान्निम्नाभिसर्पणं यत् तद् द्रवत्वात् स्यन्दनम् । अपां यत्र स्थलान्निम्नाभिसर्पणं तत् स्यन्दनं द्रवत्वा-दुपजायत इत्यर्थः । कथमिति प्रश्नः । समन्तादित्युत्तरम् । समन्तात् न रहने पर बीच में ही जो पतन हो जाता है, उसका कारण भी गुरुत्व ही है । इनमें पहिला कर्म गुरुत्व से उत्पन्न होता है और बाद के कर्म गुरुत्व और वेगाख्य संस्कार इन दोनों से उत्पन्न होते हैं । इनमें मूसल की पहिली क्रिया उसके गुरुत्व से उत्पन्न होती है । उस क्रिया से मूसल में वेग उत्पन्न होता । इसके बाद की मूसल की क्रियायें गुरुत्व और वेग इन दोनों से ही होती हैं क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में क्रिया को उत्पन्न करने का सामर्थ्य अन्यत्र निश्चित हो चुका है । ' स्रोतोभूतानामपाम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रवत्व से स्यन्दन रूप क्रिया की उत्पत्ति की रीति कही गयी है । किसी ऊँची जगह से जल जो नीचे की ओर फैलता है, उसे ' स्यन्दन ' कहते हैं, यह स्यन्दन रूप क्रिया द्रवत्व से उत्पन्न होती है । ' कथम् ' यह पद प्रश्न का बोधक है, और ' समन्तात् ' इत्यादि से इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्वादवयविद्रवत्वस्य कार्या-रम्भो नास्ति । सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयव-द्रवत्वानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः । तः क्रमशः संयुक्ताना-जाता है, उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं, अत: अपना ( स्यन्दन ) क्रिया रूप काम नहीं कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व हा अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं । उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही ' अपसर्पण ' ( नीचे की तरफ फैलने की ) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहिले द्रव्य का विनाश न्यायकन्दली सर्वतो रोधः संयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न करोति । अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, यस्मिन्नवयवे साक्षाद् रोधः संयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगः प्रतिबद्धानि रोधः संयुक्तेना-वयवेन सह संयोगादवयवान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तरद्रवत्वानि प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेद: कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति, दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेश कृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य ' समन्तात् ' अर्थात् सभी कल के अवयवों में ' रोधः संयोगेन ' दोनों किनारे के साथ जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । ' अवयवद्रवत्वमध्ये कार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम् ' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है, उस अवयव में रहनेवाला द्रवस्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो जाता है । ' उत्तरोत्तराणि स्वयद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगेः प्रतिबद्धानि ' अर्थात् किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होता है । उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रोति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते हैं । ' यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति ' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव नहीं है । किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं, उनका उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है । इस प्रकार जल के कुछ अवयवों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषावादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७३१ मेवाभिसर्पणम् । ततः पूर्वद्रव्यविनाशे सति प्रबन्धेनावस्थितै-रवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यमिति । हो जाने पर संयुक्त रूप से अवस्थित जलावयवों से ही बड़े द्रव्य की उत्पत्ति होती है । इस बड़े द्रव्य में कारणगुणक्रम से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । वहाँ पर किनारों के साथ सम्बद्ध अवयवों का संयुक्त रूप से गमन होने पर जो अवयवी में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी का नाम ' स्यन्दन ' है । न्यायकन्दलो त्ववयवद्रवत्वस्य वृत्तिलाभो भवति, अल्पस्यावयवस्य तेन मार्गेण निर्गति-सम्भवात् । तस्य वृत्तिलाभे चोत्तरेषामवयवद्रवत्वानामपि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभ: स्वकार्यकर्तृत्वं स्यात् । ततः क्रमशः संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । सेतुसमीपस्थोऽवयवः प्रथममभिसर्पति, तदनु तत्समीपस्थस्ततस्तत्समीपस्थ इत्यनेन क्रमेण सर्वेऽवयवा अभिसर्पन्ति । ते चाभिसर्पन्तो न परस्परभिन्नदेशा अभिसर्पन्ति, किं तु तथाभिसर्पन्ति यथा परस्परसंयुक्ता भवन्तीत्येतदवद्योतना-मुक्तं संयुक्तानामेवाभिसर्पणम् । न पुनरस्यायमर्थोऽप्रच्युतप्राच्यसंयोगाना मेवा-भिसर्पणमिति, संस्थानान्तरोपलम्भात् । ततः प्राक्तनसंयोगविनाशे पूर्वद्रव्य-विनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः संयुक्तीभावेनावस्थितेरवयवैर्दीर्घं द्रव्यमारभ्यते । तत्र च कारणगुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते! अवयवद्रवत्वेभ्यो दीर्घतरेऽ-के द्रवत्व से कार्य करना सम्भव होने पर उत्तरेषामवयवद्रवत्वानामपि प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभ:, अर्थात् अपने अपने कार्य करने में वे समर्थ होंगे । ' ततः क्रमशः संयुक्ताना-मेवाभिसर्पणम् ' अर्थात् पहिले बांध के समीप का अवयव निकलता है । उसके बाद उस अवयव के साथ संयुक्त दूसरा अवयव निकलता है । उनके बाद उस दूसरे अवयव के साथ सम्बद्ध तीसरा अवयव निकलता है । इसी क्रम से जल के सभी अवयव निकल जाते हैं । जल के वे अवयव ऐसे नहीं निकलते कि एक दूसरे से बिलकुल अलग होकर भिन्न देशों में चले जाँये, किन्तु इस प्रकार निकलते हैं कि जिससे परस्पर संयुक्त होकर ही निकलें । इसी वस्तुस्थिति को सूचित करने के लिए ' संयुक्तानामेवा -भिसर्पणम् ' यह वाक्य लिखा गया है! उक्त वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि पहिले के अविनष्ट संयोग से युक्त अवयवों का ही निःसरण होता है क्योंकि निःसरण के बाद दूसरे प्रकार के अवयवसंयोगों से युक्त अवयवियों की उपलब्धि होती है । ' ततः ' अर्थात् पहिले के संयोग के विनष्ट हो जाने पर ' पूर्वद्रव्यविनाशे प्रबन्धेनावस्थितैरवयवैः ' अर्थात् परस्पर संयुक्त होकर अवस्थित अवयवों से ' दीघं द्रव्यमारभ्यते, तत्र च कारण-गुणपूर्वक्रमेण द्रवत्वमुत्पद्यते ' अर्थात् अवयवों में रहनेवाले द्रवत्वों से बड़े अवयवी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-संस्कारात् कर्म इष्वादिषूक्तम् । तथा चक्रादिष्ववयवानां पार्श्वतः प्रतिनियत दिग्देश संयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्का-तीर प्रभृति में संस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कह चुक हैं । उसी प्रकार चक्र ( मिट्टी के बर्त्तन बनाने की चक्की ) प्रभृति में उनके न्यायकन्दली वयविनि द्रवत्वमुत्पद्यते । तत्र च कारणानां संयुक्तानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोत्पद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् । तत्र तस्थिन् द्रवत्वे उत्पन्ने सति वारणानामवयवानां प्रबन्धन गमने पङ्क्तीभावेनाभिन्नदेशतया गमने यदवयविनि द्रवत्वात् कर्मोत्पद्यते तत् स्यन्दनाख्यम् । संस्कारात् कर्मेष्वादिषूक्तम् तथा चक्रादिषु । तथाशब्दो यथाशब्द-मपेक्षते, यत्तदोनित्यसम्बन्धात् । यथा इष्वादिषु संस्कारात् कर्म कथितम्, तथा चक्रादिष्वपि भवतीत्यर्थः । एतदेव दर्शयति- अवयवानां पार्श्वतः प्रति-नियत दिग्देश संयोगविभागोत्पत्तौ यदवयविनः संस्कारादनियत दिग्देशसंयोग. विभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् । पाश्र्वतः प्रतिनियता ये दिग्देशास्तेः सहावय-वानां संयोगविभागयोरुत्पत्तौ सत्यां यदवयविनः संस्कारादनियतदिग्देशैः सर्वतो दिक्कविभागसंयोगनिमित्तं कर्म जायते तद् भ्रमणम् । प्रथमं चक्रावयविनि दण्डसंयोगात् कर्मोत्पद्यते 1 उत्तरोत्तराणि कर्माणि द्रव्य में द्रवत्व की उत्पत्ति होती है । ' तत्र च कारणानां प्रबन्धेन गमने यदवयविनि कर्मोपद्यते द्रवत्वात् तत् स्यन्दनम् ' वहाँ बड़े द्रव्य में द्रवत्व के उत्पन्न होने पर ' कारणों का ' अर्थात् उसके अवयवों का ' प्रबन्ध से ' अर्थात् पङ्क्तिबद्ध होकर एक देश में गमन होने पर द्रवत्व से अवयवी में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसी कर्म का नाम ' स्यन्दन ' है । ' संस्कारात् कर्मेष्वादिपूक्तम्, तथा चक्रादिषु ' । ' तथा ' शब्द ' यथा ' शब्द की अपेक्षा रखता है, क्योंकि ' यत् ' शब्द और ' तत् ' शब्द परस्पर नित्यसाकाङ्क्ष हैं । तदनुसार उक्त भाग्यग्रन्थ का यह आशय है कि जिस प्रकार तीर प्रभृति में वेगाख्यसंस्कार के द्वारा कर्म की उत्पत्ति कही गयी है, उसी प्रकार चत्रादि में भी ( वेग से ही संस्कार की उत्पत्ति ) होती है । ' अवयवानां पार्श्वतः प्रतिनियत दिग्देशसंयोगविभागनिमित्तं कर्म तद् भ्रमणम् ' इस भाष्यसन्दर्भ के द्वारा इसी अर्थ का प्रतिपादन किया गया है । इस सन्दर्भ का अक्षरार्थ यह है कि ) अवयवी के चारों ओर नियत जो दिग्देश हैं, उन देशों के साथ उनके अवयवों के संयोग और विभाग उत्पन्न होते हैं, उनके उत्पन्न होने पर अवयवी में रहने वाले वेगाख्य संस्कार से अनियमित दिग्देशों के साथ अर्थात् सभी दिशाओं के साथ संयोग और विभाग को उत्पत्ति होती है, इस संयोग या विभाग से जिस कर्म को उत्पत्ति For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७३३ रादनियत दिग्देश संयोगविभागनिमित्तं कर्म एवमादयो गमनविशेषाः । प्राणाख्ये तु वायौ तद् भ्रमणमिति । कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक-प्रयत्नापेक्षा आग्रत इच्छानुविधानदर्शनात् सुप्तस्य तु जीवनपूर्वक-प्रयत्नापेक्षात् । " अवयवों का अनियत दिशाओं साथ संयोग और विभागों के जनक क्रियाओं की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार की क्रियाओं को ' भ्रमण ' कहते हैं । ये सभी ( स्यन्दन, भ्रमणादि ) कर्म विशेष प्रकार के गमन रूप ही हैं । जागते हुए व्यक्ति के प्राण नाम के वायु में आत्मा और वायु के संयोग से क्रिया उत्पन्न होती है, जिसमें ( उक्त संयोग को ) इच्छा या द्वेष से उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि जगे हुए व्यक्ति की सभी क्रियाओं में इच्छा ( या द्वेष ) का अन्वय और व्यतिरेक देखा जाता है । सोये हुए व्यक्ति के प्राणवायु की क्रिया ( यद्यपि आत्मा और वायु के संयोग से ही होती है, किन्तु उसे ) जीवनयोनियन काही साहाय्य अपेक्षित होता है ( इच्छा पूर्वक या द्वेष पूर्वक प्रयत्न का नहीं ) । न्यायकन्दली नोदनादभिघातात् कर्मजात् संस्काराच्च भवन्ति । एवं वेगाद् दण्डसंयुक्ते चक्रावयवे आद्यं कर्म दण्डसंयोगात्, अवयवान्तरेषु च संयुक्तसंयोगात्, दण्डसंयुक्त-स्यावयवस्योत्तरोत्तरकर्माणि संस्कारान्नोदनाच्च । अपरेषां संस्कारात्, संयुक्त-संयोगाच्च । दण्डविगमे तु चक्रे तदवयवेषु च संस्कारादेव केवलात् । उप-संहरति - एवमादयो गमनविशेषा इति । होती है वही ' भ्रमण ' हैं । पहिले चक्र रूप अवयवी में दण्ड के संयोग से क्रिया की उत्पत्ति होती है । आगे आगे की क्रियायें कर्मजनित अभिघात या नोदन से और संस्कार से उत्पन्न होती हैं । इसी प्रकार वेग के कारण दण्ड से संयुक्त चक्र के अवयवों में पहिली क्रिया की उत्पत्ति दण्ड के संयोग से होती है । अन्य अवयवों में पहिलो क्रिया संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के साथ संयुक्त चक्र के अवयव को आगे आगे की क्रियायें संस्कार और नोदन से होती हैं । इससे भिन्न अवयवों को पहिली क्रिया संस्कार से और संयुक्तसंयोग से होती है । दण्ड के हटा लेने पर चक्र में और उसके अवयवों में जो क्रियायें होती रहती हैं, उनका कारण केवल संस्कार ही है । ' एवमादयो गमनविशेषाः ' इस सन्दर्भ से गमन रूप क्रिया के प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३४ न्याय कन्दली संचलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-आकाशकालदिगात्मनां प्रशस्तपादभाष्यम् सत्यपि द्रव्यभावे निष्क्रियत्वं सामान्यादिवदमूर्तस्वात् । मूर्तिरसवंगत द्रव्य परिमाणम्, तदनुविधायिनी आकाश, काल, दिशा और आत्मा ये सभी द्रव्य होने पर भी क्रिया से रहित हैं, क्योंकि ये सभी सामान्यादि पदार्थों की तरह अमूर्त हैं । सभी द्रव्यों के साथ असंयुक्त ( कुछ ही द्रव्यों के साथ संयुक्त ) द्रव्य के न्यायकन्दली प्राणाख्ये वायो कर्म आत्मवायुसयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षाद् भव-तीति । कथमिदं जातमत आह— इच्छानुविधानदर्शनात् । रेचकपूरकादिप्रयोगेष्वि-च्छानुविधायिनी प्राणक्रियोपलभ्यते । नासारन्ध्रप्रविष्टे रजसि तन्निरासार्थं प्राणक्रिया द्वेषादपि भवति, अतः प्रयत्नपूर्विकेत्यवगम्यते । सुप्तस्य जीवनपूर्वक-प्रयत्नापेक्षादात्मवायुसंयोगात् । सुप्तस्य प्राणक्रिया प्रयत्नकार्या प्राणक्रियात्वात् जाग्रतः प्राणक्रियावत् । स चेच्छाद्वेषपूर्वको न भवति, सुप्तस्येच्छाद्वेषयोरभावात् । तस्माज्जीवनपूर्वक एव निश्चीयते, प्राणधारणस्य तत्पूर्वकत्वात् । चतुर्षु महाभूतेष्विवाकाशादिषु कस्मात् क्रियोत्पत्तिर्न चिन्तितेत्याह-आकाशकालदिगात्मनामिति । क्रियावत्त्वं मूर्तत्वेन व्याप्तं मूर्तत्वं चाकाशादिषु ' प्राणाख्ये वायो कर्म आत्मवायुसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षाद् भवतीति ' प्राणवायु में उक्त प्रकार से क्रिया की उत्पत्ति कैसे होती है? इसी प्रश्न का उत्तर ' इच्छानुविधानदर्शनात् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् रेचक, पूरक प्रभृति प्राणा-याम में प्राणवायु की क्रियायें इच्छा के अनुरूप देखी जाती हैं । इसी प्रकार नाक के छिद्र में जब धूल चली जाती है, तो उसे निकालने के लिए द्वेष से भी प्राणवायु में क्रिया देखी जाती है | अतः यह समझते हैं कि प्राणवायु की क्रिया का प्रयत्न कारण है । सुप्त पुरुष के प्राणवायु की क्रिया आत्मा और वायु के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उस संयोग को जीवनयोनियल का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । इस प्रसङ्ग में जाग्रत् पुरुष के प्राणवायु की क्रिया केवल प्राण को यह अनुमान भी है कि जिस प्रकार क्रिया होने के कारण ही प्रयत्न से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार सुषुत वायु की क्रिया भी प्रयत्न से उत्पन्न होती है, क्यों के वह भी प्राण की पुरुष के प्राण-ही क्रिया है । सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक प्रयत्न, इच्छा और द्वेष से उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योंकि सुषुप्त पुरुष में इच्छा और द्वेष का रहना सम्भव नहीं है । अतः सुषुप्त पुरुष के प्राणवायु में क्रिया का उत्पादक जीवनपूर्वक प्रयत्न ही है । क्योंकि प्राण का धारण उसी प्रयत्न से होता है । ' आकाशकालदिगात्मनाम् ' इत्यादि सन्दर्भ से जिस प्रकार पृथिवी प्रभृति चार द्रव्यों में क्रिया की इस प्रश्न का उत्तर दिया गया हैं कि उत्पत्ति का विचार किया है, उसी For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७३५ च क्रिया, सा चाकाशादिषु नास्ति । तस्मान्न तेषां क्रियासम्बन्धोऽस्तीति । सविग्रहे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं जाग्रतः कर्म आत्ममन: -संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षात्, अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषया-परिमाण को ' मूर्ति ' कहते हैं । यह मूर्ति ' जहाँ रहती है, क्रिया वहीं होती है | यह ( मूर्ति ) आकाशादि द्रव्यों में नहीं है, अतः उनमें क्रिया का सम्बन्ध भी नहीं है । शरीर के सम्बन्ध से युक्त जागते हुए व्यक्ति के मन की क्रिया आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उसे इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि न्यायकन्दली नास्ति, अतः क्रियावत्त्वमपि न विद्यत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति -मूर्त्तिरित्यादिना । तद् व्यक्तम् । मनसि कर्मकारणमाह- सविग्रह इति । जाग्रतः पुरुषस्य सविग्रहे मनसि सशरीरे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म आत्ममनः संयोगादिच्छाद्वेष-पूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवति । इच्छाद्वेषपूर्वकः प्रयत्नो जाग्रतो मनसि क्रियाहेतुरिति । कथमेतदवगतं तत्राह - अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् । जागरावस्थायामभिप्रायानतिक्रमेणेन्द्रियान्तरेण चक्षुरादिना विषयोपलब्धि-दृश्यते । यदा रूपं जिघृक्षते पुरुषस्तदा रूपं पश्यति यदा रसं जिघृक्षते तदा रसं रसयति । न चान्तःकरणसम्बन्धमन्तरेण बाह्येन्द्रियस्य विषयग्राहकत्व-प्रकार आकाश, काल, दिकू और आत्मा इन चार महान् द्रव्यों में भी क्रिया की उत्पत्ति का विचार क्यों नहीं किया गया? इस प्रश्न के उत्तरग्रन्थ का अभिप्राय है कि यह व्याप्ति है कि क्रिया मूर्त्त द्रव्यों में ही रहे. आकाशादि कथित चारों द्रव्य मूर्त्त नहीं हैं, अतः उनमें क्रिया भी नहीं है । ' मूत्तिः ' इत्यादि सन्दर्भ से इसी का विवरण दिया गया है । इस भाष्य ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट है । ' सविग्रहे ' इत्यादि सन्दर्भ से मन में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसका कारण दिखलाया गया है । जागते हुए पुरुष के ' सविग्रहे मनसि ' अर्थात् शरीर सम्बन्ध से युक्त मन में इन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थ कर्म, आत्ममनः संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वक प्रयत्नापेक्षात् ' अर्थात् इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ही जागते हुए पुरुष के मन में क्रिया का कारण है । यह कैसे समझा? इसी प्रश्न का उत्तर ' अन्वभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् ' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् जाग्रत् अवस्था में इच्छा के अनुसार ही ' इन्द्रियान्तरेण अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि देखी For Private And Personal