प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 811–820

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 811 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण -न्तरोपलब्धिदर्शनात् । सुप्तस्य प्रबोधकाले जीवनपूर्वक प्रयत्नापेक्षात । अपसर्पणकर्मोपसर्पणकर्म चात्ममनः संयोगाददृष्टापेक्षात् । कथम्? यदा जीवन सहकारिणोर्धर्माधर्मयो रुपभोगात प्रक्षयोऽन्योन्याभिभवो इच्छा के बाद ही इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि होती है । ( किन्तु ) सोते हुए व्यक्ति के जागने के समय ( उसके मन की क्रिया यद्यपि ) आत्मा और मन के संयोग से ही उत्पन्न होती है, किन्तु उसमें जीवनयोनियन का साहाय्य भी अपेक्षित होता है ( इच्छाद्वेष या जनित प्रयत्न का नहीं ) । मन की ' उपसर्पण ' और ' अपसर्पण ' नाम की दोनों क्रियायें आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती हैं । जिसमें अदृष्ट का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । ( प्र ० ) किस प्रकार? ( उ ० ) जिस समय भोग से जीवन के सहकारी धर्म और अधर्म का विनाश हो जाता है, अथवा परस्पर एक दूसरे से ही दोनों की कार्योत्पादन शक्ति अवरुद्ध हो जाती है, उस समय जीवन के दोनों सहायकों के अभाव के कारण उनसे उत्पन्न होनेवाले प्रयत्न का भी विनाश हो जाता है । प्रयत्न के इस अभाव से ही प्राण का नाश होता है । इसके बाद अपने कार्य के उत्पादन में उन्मुख दूसरे धर्म और अधर्म से उस अपसर्पण नाम की क्रिया की उत्पत्ति होती है जिससे ( ऐहिक न्यायकन्दली मस्ति । तस्मादिच्छाद्वेषपूर्वकात् प्रयत्नात्मनसि क्रिया भूतेति गम्यते । सुप्तस्येति । सुप्तस्य पुरुषस्येन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं प्रबोधकाले मनसि क्रिया जीवनपूर्वक प्रयत्नापेक्षादात्ममनसोः संयोगात् । अपसर्पति । एतदपि कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकं कथयति । विशिष्टा-त्ममनः संयोगो जीवनम् तस्य स्वकार्यकरणे धर्माधर्मो सहकारिणौ । यदा जाती है । पुरुष जिस समय रूप को देखना चाहता है, उस समय रूप को ही देखता है । एवं जिस समय रस का अस्वादन करना चाहता है, उस समय रस का ही आस्वादन करता है । अन्तःकरण ( मन ) के सम्बन्ध के बिना वाह्य इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य नहीं है । अतः समझते हैं कि इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न से ही मन में त्रिया उत्पन्न होती है । ' सुप्तस्येति ' अर्थात् सोते हुए पुरुष के मन में दूसरी इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध के लिए जागते समय जो क्रिया उत्पन्न होती है, वह आत्मा और मन के संयोग से होती है, जिसे जीवनयोनियत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा रहती है । ' अपसर्पणेति ' मन में यह अपसर्पणादि क्रियायें किस प्रकार होती हैं? यह प्रश्न कर उसका उत्तर देते हैं । आत्मा और मन का एक विशेष प्रकार For Private And Personal

पृष्ठ 812

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 812 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] वा तदा प्राणनिरोधे भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् जीवनसहाययोर्वैकल्यात् सत्यन्याभ्यां लब्धवृत्तिभ्यां ७३७ तत्पूर्वकप्रयत्नवैकल्यात् धर्माधर्माभ्यामात्म-मनःसंयोगसहायाभ्यां मृतशरीराद् विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते मृत ) शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । इस विभाग के उत्पादन में उन्हें आत्मा और मन के संयाग के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । इस विभाग से ही मन में ' अपसर्पण ' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । उस न्यायकन्दली तयोरुपभोगात् प्रक्षया विनाशोऽन्योन्याभिभवो वा परस्परप्रतिबन्धात् स्वकार्या-करणं वा ततो जीवनसहाययोः धर्माधर्मयोर्वैकल्येऽभावे सति तत्पूर्वक प्रयत्न-वैकल्याद् जीवनपूर्वकस्य प्रयत्नस्य वैकल्यादभावात् प्राणवायोनिरोधे सति पतितेऽस्मिन् शरीरे याभ्यां धर्माधर्माभ्यां देहान्तरे फलं भोजयितव्यं तौ लब्धवृत्तिको भूतावैहिकशरीरोपभोग्यधर्माधर्मप्रतिबद्धत्वाद् देहान्तरभोग्याभ्यां धर्माधर्माभ्यां कार्यं न कृतम् । यदा त्वैहिकशरीरोपभोग्यौ धर्माधम प्रक्षीणों तदा देहान्तरोपभोग्यधर्माधर्मयोर्वृतिलाभः प्रतिबन्धाभावाज्जातः । ताभ्यां लब्धवृत्तिभ्यामैहिक देहोपभोग्यात् कर्मणोऽन्याभ्यामात्ममन: संयोगसहायाभ्यां मृत शरीरान्मनसो विभागकारणमपसर्पणकर्मोत्पद्यते । का संयोग ही ' जीवन ' है । इस जीवन से जो कार्य उत्पन्न होंगे, धर्म और अधर्म उनके सहकारिकारण हैं । जिस समय उपभोग से उनका ' प्रक्षय ' अर्थात् विनाश हो जाएगा या ' अन्योन्याभिभव ' अर्थात् परस्पर एक दूसरे के प्रतिरोध के कारण दोनों अपने काम में अक्षय हो जाते हैं, उस समय जीवन ( उक्त आत्ममनः संयोग ) के सहायक धर्म और अधर्म के ' वैकल्य ' से अर्थात् अभाव के कारण ' तत्पूर्वक प्रयत्नवैकल्यात् ' अर्थात् जीवन से उत्पन्न होने वाले प्रयत्न के अभाव से प्राणवायु का निरोध हो जाता है । जिससे इसशरीर का पतन हो जाता है।इस शरीर के पतन के बाद जिन धर्मों और अधर्मो से दूसरे शरीर के द्वारा उपभोग करना है, उन धर्मों और अधर्मों में कार्य करने की क्षमता आ जाती है । वर्तमान शरीर के द्वारा उपभोग के कारणीभूत धर्म और अधर्म से प्रतिरुद्ध होने के कारण ही वे धर्म और अधर्म अपने उन उपभोग रूप कार्यों से विरत रहते हैं, जिनका सम्पादन दूसरे शरीर से होना है । जिस समय ऐहिक शरीर के धर्म और अधर्म नष्ट हो जाते हैं. या असमर्थ हो जाते हैं, उस समय दूसरे शरीर के द्वारा उपभुक्त होनेवाले धर्म और अधर्म अपना कार्य प्रारम्भ कर देते हैं, क्योंकि उनका कोई प्रतिबन्धक नहीं रह जाता । ऐहिक शरीर से उपभोग्य इन धर्म और अधर्म से भिन्न एवं जीवन रूप आत्ममन: संयोग के सहायक अथ च कार्यक्षम इन दूसरे धर्म और अधर्म से मन में अपसर्पण क्रिया उत्पन्न होती है, जिससे मृत शरीर से मन का विभाग उत्पन्न होता है । ६३ For Private And Personal

पृष्ठ 813

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 813 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-ततः शरीराद् बहिरपगतं ताभ्यामेव धर्माधर्माभ्यां समुत्पन्नेनातिवाहिक-शरीरेण सम्बध्यते, तत्संक्रान्तं च स्वर्ग नरकं वा गत्वा आशया-नुरूपेण शरीरेण सम्बद्धयते, तत्संयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । शरीर से निकला हुआ मन उन्ही धर्मों और अथर्मो से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध होता है । उस शरीर के साथ सम्बद्ध होकर ही मन स्वर्ग या नरक को जाता है और वहाँ जाकर स्वर्ग या नरक के भोगजनक धर्म और अधर्म के अनुरूप दूसरे शरीर के साथ सम्बद्ध न्यायकन्दली अपसर्पणकर्मोत्पत्तावात्ममनः संयोगोऽसमवायिकारणम्. मनः समवायि-कारणम्, लब्धवृत्ती धर्माधर्मौ निमित्तकारणम् । ततस्तदनन्तरं तन्मनो मृतशरीराद् बहिर्निर्गतं ताभ्यामेव लब्धवृत्तिभ्यां धर्माधर्माभ्यां सकाशादुत्पन्नेनाति-वाहिकशरीरेण सम्बद्ध्यते । तत्संक्रान्तं तदातिवाहिकशरीरसंक्रान्तं मनः स्वर्गं नरकं वा गच्छति । तत्र गत्वा आशयानुरूपेण कर्मानुरूपेण शरीरेण सम्बद्धयते । स्वर्गे नरके वा यदुपजातं शरीरं तत्र तावन्मनःसम्बन्धेन भवितव्यम्, अन्यथा तस्मिन् देशे भोगासम्भवात् । न चात्मवदगत्वैव मनसो देहान्तरसम्बन्धोऽस्ति, अव्यापकत्वात् । गमनं च तस्यैतावद् दूरं केवलस्य न सम्भवति, महाप्रलया-नन्तरावस्थाव्यतिरेकेणादारीरस्य मनसः कर्माभावात् । तस्मान्मृतशरीरप्रत्या-सन्नमदृष्टवशादुपजात क्रिये रणुभिद्वंचणुकादिप्रक्रमेणारन्धमतिसूक्ष्ममनुपलब्धियोग्यं आत्मा और मन का संयोग मन की इस अपसर्पण क्रिया का असमवायि-कारण है, एवं मन समवायिकारण है और कार्यक्षम धर्म और अधर्म उसके निमित्तकारण हैं । ' तत ' अर्थात् इसके बाद त शरीर से निकला हुआ वही मन अपने कार्य के उत्पादन में पूर्णक्षम उन्हीं धर्म और अधर्म से उत्पन्न आतिवाहिक शरीर के सय सम्बद्ध होता है | ' तत्सकान्तम् ' अर्थात् आतिवाहिक शरीर के साथ सम्बद्ध मन स्वर्ग या नरक में चला जाता है । वहाँ जाकर आशय के अनुरूप अर्थात् अपने कर्मों के अनुसार फल भोग के अनुरूप शरीर के साथ सम्बद्ध हो जाता है । शरीर को उत्पत्ति स्वर्ग में हो या नरक में । उसमें मन का सम्बन्ध रहना आवश्यक है, उसके बिना स्वर्गादि देशों में भी भोग नहीं हो सकता । जिस कार नि होने के कारण आत्मा स्वर्गादि देशों में न जाकर भी उन देशों में उत्पन्न शरीरों के साथ सम्बद्ध हो जाता है, उसी प्रकार से मन को बिना वहाँ गये उन दूसरे शरीरों के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि मन विभु नहीं है । इतनी दूर ( शरीर से असम्बद्ध ) केवल मन का जाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि महाप्रलय को For Private And Personal

पृष्ठ 814

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 814 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७३६ योगिनां च बहिरुचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च, तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम् । एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन की क्रिया का नाम ' अपसर्पण ' क्रिया है । एवं बाहर ( विषय ग्रहण के लिए ) निकला हुआ योगियों का मन जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है, मन की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है, उसका कारण न्यायकन्दली शरीरं परिकल्प्यते । तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवा-हनधर्मकत्वादातिवाहिक मित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते, महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्तिमनः कर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति । छोड़कर और किसी भी समय शरीर से अम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अति सूक्ष्म, उपलब्धि के सर्वथा अयोग्य, आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं, जिसकी उत्पत्ति सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्वणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया की उत्पत्ति अदृष्ट से होती । उस सूक्ष्म शरीर का ' अतिवाहिक शरीर ' यह अर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक ' अतिवहन ' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है ( महाप्रलय रूप एक ही ऐसा समय है, जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है ), अतः अनुमान करते हैं कि मृत्यु बाद और पुनः जन्म लेने से पहिले इस बीच मन में जो क्रिया उत्पन्न होती है, उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध अवश्य रहता है, क्योंकि मन की यह क्रिया भी महा-प्रलयकालिक क्रिया से भिन्न मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्द प्रमाण का समर्थन भी प्राप्त है । ' तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति ' सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में ' उपसर्पण ' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है । For Private And Personal

पृष्ठ 815

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 815 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir III म्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणु-कर्म, अग्निवाय्बोरूर्ध्व तिर्यग्गमने, महाभूतानां प्रक्षोगणम् । अभिषिक्तानां

मणीनां तस्करं प्रति गमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति ।

इति प्रशस्तपादभाष्ये कर्मपदार्थः समाप्तः ॥

-: ०: -भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार करनेवाली महाभूतों की जिन कियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं होता है, वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं । जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु की ऊर्ध्वगति रूप क्रियायें, भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है, या सामान्य लोह चुम्बक ओर जो जाता है, ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं । प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ । -: 0: ----न्यायकन्दली योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनः-कर्मादृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानु-मानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने, महाभूतानां भूगोलकादीनां ' योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य ' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं ( उस समय ) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे ही क्रियायें नहीं, ' अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमान-कारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम् ' ( अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की ही ) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से हो माननी पड़ेगी, जिनके कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है. एवं जिनसे जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । ' यथा सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोयंथासंख्यमूर्ध्वतियं ग्गमने ' जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की टेढ़े - मेढ़े चलने की क्रिया ( अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं ) । ' महाभूतानाम् ' अर्थात् भूगोल प्रभृति का ' प्रक्षोभण ' अर्थात् चलन, चोरों की परीक्षा के समय ' अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम् ' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त For Private And Personal

पृष्ठ 816

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 816 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७४१ सामान्यं द्विविधम — परमपरं च स्वविषय सर्वगत-वह अपने । एक, दो अपने एक ' पर ' और अपर ' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । विषयों ( आश्रयों ) में रहता है । वह अभिन्नस्वभाव का है या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है न्यायकन्दली च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति ।

हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् ।

कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥

इति भट्ट श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः । --:: -मणियों का चोर की ओर जाना, एवं ' अय सोऽयस्कान्ताभिसर्पणम् ' अर्थात् साधारण लौह का चुम्बक की ओर जाना ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं । सुख और उसके उपाय की प्राप्ति, एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार, ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यत्न से हृदय में धारण करना चाहिए । भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का कर्मनिरूपण समाप्त हुआ । -: 0: 1 जयन्ति न्यायकन्दली

जगदुत्पत्तिस्थितिसंहृतिहेतवः ।

विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥

सामान्यं व्याचष्टे - द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान-मेतदुद्देशावसरे । सर्व सर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह-स्वविषय सर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः, जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा, एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो । ' द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण करतेहैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में ( पृ ० २६ पं ० ११ ) कर चुके हैं । किसी सम्प्रदाय का मत है कि ' सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं ' इस मत के खण्डन के लिए ही ' स्वविषय सर्वगतम् ' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की For Private And Personal

पृष्ठ 817

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 817 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७४२ न्यायकन्दली संवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति स्वरूपाभेदेनाधारेप प्रशस्तपादभाष्यम् प्रबन्धेन एकद्विवहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्यय का रि वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । कथम्? प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय-ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर ( बिना विराम को ) रहता हुआ ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' का, अर्थात् अपने आश्रय रूप विभिन्न व्यक्तियों में एक न्यायकन्दली तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम्, सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपल-ब्धिरेव प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम् अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं तेनेव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वतते, तत्प्रत्ययाविशेषा-दित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति | अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीति सामर्थ्यात् समर्थनीयम् । नहि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिद-नुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते तस्मात् सामान्यस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह - एकद्विष्विति । सामान्यमेकस्मिन् पिण्डे द्वयोः पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । पिण्डस्य एकस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात् द्वित्वादिकं त्वेवं न प्रतीति जिस आश्रय में हो, वही उनका ' स्वविषय ' है । वह सभी विषयों में ' गत ' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है. क्योंकि उन सभी विषयों में उस ( सामान्य ) की प्रतीति होती है । ' सामान्यं सर्वसर्वगतं ' ( अर्थात् सभी सामान्य सभी सामान्य के विषयों में ) क्यों नहीं है? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । ' अभि-नात्मकम् ' शब्द का अर्थ है ' अभिन्नस्वभाव ' अर्थात् जिस वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है, उसी स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है । क्योंकि एक आश्रय में सामान्य की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर उपलब्ध नहीं होता । ' अनेकवृत्ति ' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है ' अनेकेषु वृत्तिर्यस्य ' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे वही ' अनेकवृत्ति है । सामान्य ' अभिन्नस्वभाव ' का है, और अनेक आश्रयों में रहता है ' इन दोनों बातों का समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रनीतियों से करना चाहिए । क्योंकि प्रमाण के द्वारा निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती । द्विश्वादि ( व्यासज्यवृत्ति गुण ) भी अनेक वृत्ति हैं, और अभिन्न स्वभाव के भी हैं, अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों से नहीं हो सकता, अतः एक द्विबहुषु ' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात् ( द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि ) ' सामान्य ' अपने एक आश्रय में दो आश्रयों में, अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार एक हो गोपिण्ड में ' अयं गो: ' इस प्रकार से ' सामान्य ' की प्रतीति होती For Private And Personal

पृष्ठ 818

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 818 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३ प्रशस्तपादभाष्यम् जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति । तत्र परस्पर विशिष्टेषु सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा चर्मवस्त्रकम्वलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धान्नीलं आकार की बुद्धि का कारण है । ( प्र ० ) यह किस प्रकार समझते हैं ( कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) | ( उ ० ) प्रथमतः अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान जब बार बार होता है । ( जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं ), तब उससे ( दृढतर ) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान समूहों का स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के विषयभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म हं वही सामान्य ' है । इन ( पर और अपर सामान्यों ) में सत्ता नाम का सामान्य केवल न्यायकन्दली भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्यमिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति - स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डान्तरेऽपि । तस्मादभेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्व पिण्डापरित्यागेन वर्तमान सदनुवृत्तिप्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीति-कारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु पिण्डेषु सामा-न्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह - प्रतिपिण्ड पिण्डं पिण्डं है, उसी प्रकार दो गोपिडों में भी ' इमौ गावौ ' या बहुत से गोपिण्डों में भी ' इमे गावः ' इत्यादि श्राकार से ' सामान्य ' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि ( व्यासज्यवृत्ति गुणों ) में ऐसी बात नहीं है । उनकी प्रतोति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती है, तद्घटक किसी एक अभय में नहीं ) द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है । ( सामान्य के लक्षणवाक्य कासार मर्म यह है कि ) जो स्वयं एक होकर भी अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहें, एवं ( अपने आश्रयीभूत ) एक व्यक्ति में, दो व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही ' सामान्य ' है । यही बात ' एनदेव ' इत्यादि से कही गयी हैं । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में ' प्रबन्ध से ' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहिले पहिले के अपने आश्रय रूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए हो जो ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' का अर्थात् अनेक वस्तुओं में एक आकार की प्रतीति का कारण हो वही ' सामान्य ' है । ' कथम् ' इत्यादि से प्रतिवादी का प्रश्न सचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है? ' प्रतिपिण्डम् ' इत्यादि से For Private And Personal

पृष्ठ 819

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 819 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७४४ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण -नीलमिति प्रशस्तपादभाष्यम् प्रत्ययानुवृतिः, तथा परस्पर विशिष्टेषु द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा ' अनुवृति प्रत्यय ' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस रीति से होता है कि जिस प्रकार नीलचर्म, नीलवस्त्र और नील कम्बलों में परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्गके सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में ' यह नील है ' इस एक आकार की प्रतीतियाँ होती हैं, उसी प्रकार परस्पर विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में ' यह सत् है ' इस एक न्यायकन्दली प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवे -क्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात्? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकव त्तित्वमव. गम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्षविरोधादपास्यन्ते । यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानों विविच्य कथयति -- तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह - यथा परस्परविशिष्टे-इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । ' पिण्डं पिण्डं यथा स्यात् ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत प्रतिपिण्ड ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस रीति से सामान्य का ज्ञान होता है, उसी रीति से जब सामान्य की ' अभ्यासप्रतीति ' अर्थात् बार बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत ' ज्ञानप्रबन्ध ' का अर्थात् ज्ञानसमूह का ' प्रत्यवेक्षण ' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा ( विभिन्न व्यक्तियों में ) जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही ' सामान्य ' है । इससे निष्कर्ष क्या निकला? ( यही कि ) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य अनेक वस्तुओं में रहता है । अत एव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं । पहिले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है । ' तत्र परं सत्ता ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें ' सत्ता ' पर सामान्य ( ही ) है । अर्थात् केवल ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध, For Private And Personal

पृष्ठ 820

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 820 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] I www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् III प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली For Private And Personal चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा । सत्तानुसम्बन्धात् सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तस्मात् सा सामान्यमेव । आकार की प्रतीति होती है । यह प्रतीति द्रव्य, गुण और कर्म इनसे भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए । वही वस्तु है सत्ता ' । इस सत्ता जाति के सम्बन्ध से ' यह सत् हैं, यह सत् है, इत्यादि आकारों के अतुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं ( कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं ), अतः सत्ता सामान्य ही है, विशेष नहीं । ष्विति । तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदितिप्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्यय-निबन्धना, भिन्नेषु प्रत्ययानुवृत्तित्वात् चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् । यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु प्रत्ययानुवृतिं करोति न व्यावृत्तिम् तस्मात् सामान्यमेव, न विशेष इत्युपसंहारार्थः । अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्ति-व्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्यय-हेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं गुणेष्वनु-वृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्यय हेतुत्वाद् विशेषः । तथा है, फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते, उनके सन्तोष के लिए ' परस्पर विशिष्टेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं । इस अनुमान प्रयोग का अर्थ स्पष्ट है । जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ग के हो कारण ' यह नील ' है, इस एक आकार की प्रतीतियाँ ' अनुवृत्तिप्रत्यय ' रूप होती हैं, उसी प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में ' यह सत् है ' इस एक आकार की प्रतीति भी होती हैं, इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का कारण है, क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतोतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं । ( जिसका ज्ञान उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही ' सत्ता ' है ) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में यह सत् है ' इस आकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, किसी भी व्यावृत्ति ( प्रत्यय ) का नहीं, अतः ' सत्ता ' सामान्य ही है, विशेष नहीं । द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों के ही कारण हैं, अतः वे ' सामान्य ' और विशेष ' दोनों ही हैं । जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में ' यह द्रव्य है ' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण है, अतः ' सामान्य ' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही ' यह गुण और कर्म से भिन्न है ( क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है ) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है, अतः ' विशेष ' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में ' यह गुण है ' इस प्रकार की