प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 81–90

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 81–90

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ मङ्गलाचरण-संक्षेपेणाभिवायको ग्रन्थः प्रकृष्टो मया वक्ष्यत इति ग्रन्थकर्तुः प्रतिज्ञा । ग्रन्थस्य चेयं प्रकृष्टता यदन्यत्र ग्रन्थे विस्तरेणेतस्ततोऽभिहितानामिहैकत्र तावतामेव पदार्थधर्माणां ग्रन्थे संक्षेपेण कथनम् । एतदेव चास्यारम्भः सत्स्वप्युपनिबन्धान्तरेषु पदार्थधर्माणां सङ्ग्रहः पदार्थधर्म्मप्रतीतिहेतुः । पदार्थधर्म्मप्रतीतिश्च न पुरुषार्थ:, सुखदुःखाप्तिहान्योः पुरुषप्रयोजकत्वात् । तस्मादयमपुरुषार्थं हेतुत्वादनुपादेय एवे -त्याशङ्कय तस्य पुरुषार्थफलतां प्रतिपादयितुमुक्तं महोदय इति । महानुदयो महत्फलमपवर्गलक्षणं यस्मात् सङ्ग्रहादसौ महोदय: सङ्ग्रहः । एतेन सङ्ग्रहस्य पदार्थधम्मैः सह वाच्यवाचकभाव:, तत्प्रतिपत्त्या च महोदयेन सह साध्यसाधनभावः सम्बन्धो दर्शितः । ननु भोः क एष महोदयो नाम? ( १ ) सजासनसमुच्छेदो ज्ञानोपरम इत्येके । तथा च पठन्ति - न प्रेत्य संज्ञास्तीति । तदयुक्तम्, सर्वतः प्रियतमस्यात्मनः समुच्छेदाय प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यनुपपत्तेः, बन्धविच्छेदपर्यायस्य मुक्तिशब्दस्यातदर्थत्वाच्च । उनके धम्मों को संक्षेप में प्रतिपादित करनेवाले उत्तम ग्रन्थ को कहूँगा " ग्रन्थकार की ऐसी प्रतिज्ञा प्रतीत होती है । इस ग्रन्थ में और ग्रन्थों से उत्तमता यही है कि अन्य ग्रन्थों में जहाँ तहाँ विस्तृत रूप से कहे गये पदार्थ इस ग्रन्थ में एक ही स्थान में संक्षेप से कहे गये हैं । इसीलिए और निबन्धों के रहते हुए भी इसकी रचना सार्थक है । ( प्र ० ) ' पदार्थधर्माणां सङ्ग्रहः ” इस वाक्य का अर्थ है पदार्थों और उनके धम्र्मों की सम्यक् प्रतीति का कारण ', किन्तु पदार्थों की या उनके धम्म की सम् ( यथार्थ ) प्रतीति तो पुरुष का अभीष्ट नहीं है, क्योंकि पुरुष ( जीव ) का यथार्थ अभीष्ट तो सुख प्राप्ति एवं दुःख की निवृत्ति ये ही दोनों हैं । तस्मात् यह ग्रन्थ पुरुष के अभीष्ट का सम्पादक न होने के कारण अनुपादेय ही है । यही प्रश्न ( मन में ) रख कर ( इसके उत्तर स्वरूप ) " यह ग्रन्थ पुरुष के उक्त प्रयोजन का सम्पादक है " यह कहने के लिए “ महोदयः ” यह पद लिखा है । " महान् उदय " अर्थात् अपवर्ग ( मोक्ष ) रूप महान् फल जिस सङ्ग्रह से हो वही " महोदय सङ्ग्रह " है । इससे इस " सङ्ग्रह " रूप ग्रन्थ का पदार्थ और उनके धम्मों के साथ कार्य्यकारणभाव सम्बन्ध दिखलाया गया है । ( प्र ० ) यह महोदय नाम की कौन वस्तु है? ( १ ) कोई ( बौद्धविशेष ) कहते हैं कि वासनारूप मूलसहित ज्ञान का नाश ही ' महोदय ' ( निर्वाण ) है । इसके प्रमाण में वे उपनिषद् का यह वाक्य उद्धृत करते हैं— “ न प्रेत्य संज्ञास्ति ”, अर्थात् मरने के बाद ' संज्ञा ' ( चेतना ) नहीं रहती है । ( उ ० ) किन्तु यह पक्ष अयुक्त है, क्योंकि ( प्रश्नकर्त्ता के मत से आत्मा ज्ञानरूप है ) आत्मा ही For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ( २ ) निखिलवासनोच्छेदे विगत विषयाकारोपप्लव विशुद्धज्ञानोदयो महोदय इत्यपरे । तदयुक्तम्, कारणाभावे तदनुपपत्तेः । भावनाप्रचयो हि तस्य कारणमिष्यते स च स्थिरैकाश्रयाभावाद्विशेषानाधायकः प्रतिक्षणमपूर्ववदु-पजायमानो निरन्वयविनाशी लङ्घनाभ्यासवदनासादितप्रकर्षो न स्फुटाभज्ञान-जननाय प्रभवतीत्यनुपपत्तिरेव तस्य । समलचित्तक्षणानां स्वाभाविक्या: सदृशारम्भणशक्तेरसदृशारम्भं प्रत्यशक्तेश्चाकस्मादनुच्छेदात्, किश्व पूर्वे सब से प्रिय है, उसका विनाश वस्तुतः आत्मा का विनाश ही है, तो अपने सब से अधिक प्रिय वस्तु का नाश करने के लिए कौन बुद्धिमान् प्रवृत्त होगा? और यह बात भी है कि महोदय का पर्याय ' मुक्ति ' शब्द और ' बन्धविच्छेद ' शब्द दोनों एक ही अर्थ के बोधक हैं । ( २ ) कोई कहते हैं कि सभी वासनाओं के नष्ट हो जाने पर विषयरूप आकार के मालिन्य से रहित ज्ञान की उत्पत्ति ही ' महोदय ' है । किन्तु यह पक्ष भी कारण की अनुपपत्ति से अयुक्त है, क्योंकि इस पक्ष के माननेवाले भावना के ' प्रचय ' अर्थात् बार - बार होने को इसका कारण मानते हैं । ( किन्तु इस मत में ) सभी वस्तु क्षणिक हैं 1 वस्तुओं का निरन्वय विनाश उत्पत्ति के द्वितीय क्षण में ही कूदने के अभ्यास की तरह हो जाता है, और दूसरे क्षण में बिलकुल अपूर्व अन्य व्यक्ति की उत्पत्ति होती है । जब पहिले विज्ञान से आगे के विज्ञान में कोई उपकार नहीं पहुँच सकता है तो ' स्फुटाभ ' ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं होगी । इस प्रकार इस पक्ष में निर्वाण ही अनुपपन्न हो जाएगा । और भी बात है - ' मल ' अर्थात् बन्ध सहित चित्त ( ज्ञान ) - क्षण अपने उत्तर क्षण में अपने सदृश ही चित्त की उत्पत्ति का कारण हो सकता है, क्योंकि सदृशारम्भकत्व ही उसका स्वभाव है । घटविज्ञान दूसरे घटविज्ञान को ही उत्पन्न कर सकता है, पटविज्ञान को नहीं, नीलघट-विज्ञान को भी नहीं । तब घटादि विषयरूप मलसहित विज्ञान अपने से विसदृश शुद्ध ( निर्मल ) विज्ञानरूप मुक्ति का कारण कैसे हो सकता है? विज्ञान का सदृशारम्भकत्व तो नष्ट नहीं हो सकता | दुसरी बात यह है कि प्रत्येक क्षण अपने स्वभावसिद्ध निर्वाण से १. अभिप्राय यह है कि जैसे कोई अपराधी राजा की आज्ञा से बँध जाता है और उसके उस बन्धन के खुल जाने पर " वह मुक्त हो गया " यह व्यवहार होता है । इस व्यवहार के लिए उस आदमी के मरने की आवश्यकता नहीं होती । वह आदमी रहता ही है, उसका बन्धन भर खुल जाता है । वैसे हो ' यह जीव मुक्त हो गया " इस वाक्य का यह अर्थ नहीं है कि वह स्वयं ही नष्ट हो गया । उससे इतनी ही प्रतीति होती है कि उसके मिथ्याज्ञानादि बन्धन खुल गये हैं । इसलिए ' महोदय ' शब्द का अर्थ आत्मा से अभिन्न ज्ञान का उच्छेद कदापि नहीं हो सकता । २. अभिप्राय यह है कि इस मत में वास्तविक सत्ता ज्ञान की हो है । अन्य घटादि विषय ' संवृति ' या अज्ञान से कल्पित हैं ( वेदान्ती लोग जिनकी व्यावहारिक सत्ता मानते हैं ) । वास्तविक सत्ताविशिष्ट ज्ञान निर्विकल्पक है । उसमें घटादि विषयों का For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-क्षणाः स्वरसनिर्वाणाः, अयमपूर्वो जातः, सन्तानश्चैको न विद्यते, बन्धमोक्ष चैकाधिकरण विषयभेदेन वर्तेते, य एव च प्रवर्त्तते प्राप्य च निवृत्तो भवति । ( ३ ) प्रकृतिपुरुषविवेकदर्शनादुपरतायां प्रकृतौ पुरुषस्य स्वरूपेणावस्थानं मोक्ष इत्यन्ये । तन्न, प्रवृत्तिस्वभावायाः प्रकृते रौदासीन्यायोगात् । पुरुषार्थनिबन्धना तस्याः प्रवृत्तिः, विवेकख्यातिश्च पुरुषार्थः । तस्यां सञ्जातायां सा निवर्त्तते कृतकार्य्यत्वादिति चेन्न, अस्या अचेतनाया विमृश्यकारित्वाभावात् । यथेयं कृतेऽपि शब्दाद्युपलम्भे पुनस्तदर्थं प्रवर्त्तते, तथा विवेकख्यातौ कृतायामपि पुनस्तदर्थं प्रवत्तिष्यते स्वभावस्यानपायित्वात् । ( ४ ) नित्यनिरतिशय सुखाभिव्यक्तिर्मुक्तिरित्यपरे । तदप्यसारम्, अग्रे निराकरिष्यमाणत्वात् । तस्मादहितनिवृत्तिरात्यन्तिकी महोदय इति युक्तम् । युक्त है ( क्षण शब्द से क्षणिक विज्ञान विवक्षित है ), यह विशुद्धविशान बिलकुल अपूर्व ही है । संतान नाम की कोई विलक्षण वस्तु नहीं है । यह नियम है कि जो बद्ध रहता है वही मुक्त होता है । एवं यह भी स्वाभाविक है कि जो प्रवृत्त होता है वही प्राप्त करके निवृत्त होता है । ( ३ ) कोई कहते हैं कि जब प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान से प्रकृति अपने सृष्ट्यादि कार्यों से निवृत्त हो जाती है, उस समय पुरुष की अपने स्वरूप में अवस्थिति ही ' मुक्ति ' है । किन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिस्वभाववाली प्रकृति कभी उससे उदासीन नहीं हो सकती । ( प्र ० ) पुरुष के प्रयोजन- सन्पादन के लिए ही प्रकृति प्रवृत्त होती है, एवं प्रकृति और पुरुष का भेदज्ञान ही पुरुष का परम प्रयोजन है । उसके सम्पादित हो जाने पर वह कृतकार्य्य हो जाती है और फिर कार्य में प्रवृत्त नहीं होती । ( उ ० ) किन्तु उक्त कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रकृति जड़ है । उसमें विचारकर काम करने की शक्ति नहीं है, ( अतः ) वह जिस प्रकार शब्दविज्ञान के उत्पन्न होने पर भी फिर उसके लिए प्रवृत्त होती है, उसी प्रकार “ विवेकख्याति " अर्थात् प्रकृति - पुरुष के विवेक - ज्ञान के उत्पन्न होने पर भी फिर उसके लिए प्रवृत्त होगी । ( तस्मात् इस पक्ष में अनिर्मोक्ष प्रसङ्ग होगा ) । ( ४ ) यह भी कोई कहते हैं कि नित्य एवं निरतिशय ( सर्वोत्कृष्ट ) सुख की अभिव्यक्ति ही ' मुक्ति ' है । इस मत के ठीक न होने की युक्ति आगे लिखी जाएगी । तस्मात् दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति ही ' मुक्ति ' है । सम्बन्ध ही सुख और दुःखजनक होनेके कारण ' बन्ध ' है अतः उक्त विशुद्धज्ञान में घटादि विषयों के सम्बन्ध का उच्छेद ही मुक्ति है । यह ध्यान में रखना चाहिए कि " आत्माभिन्न ज्ञानोच्छेद " ही मुक्ति है, इस कथित पक्ष में नौ दोष दिखलाये गए हैं, ये दोष इस पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इस पक्ष में मुक्तावस्था में ज्ञानरूप आत्मा का नाश नहीं होता, किन्तु उसमें घटादि विषयों के सम्बन्ध का ही नाश होता है । For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra -प्रकरणम् ] २ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली For Private And Personal तस्या: सद्भावे किं प्रमाणम्? दुःखसन्ततिर्धम्मणी अत्यन्तमुच्छिद्यते -सन्ततित्वाद्दीप सन्ततिवदिति तार्किकाः । तदयुक्तम् पार्थिवपरमाणुरूपादि-सन्तानेन व्यभिचारात् । " अशरीरं वाव सन्तं प्रियाप्रिये न स्पृशतः ” इत्यादयो वेदान्ताः प्रमाणमिति तु वयम् । भूतार्थानामेषामप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चिन्न, प्रत्यक्षेणानैकान्तिकत्वात् । अथ मतं भूतार्थप्रतिपादकं वचनमनुवादकं स्यात्, ततश्चाप्रमाणत्वं प्रमाणान्तरसापेक्षत्वात्, प्रमायां साधकतमत्वाभावादिति । ( प्र ० ) इसमें क्या प्रमाण है कि दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है? इस प्रश्न के उत्तर में तार्किक लोग यह अनुमान उपस्थित करते हैं कि दुःखों की सन्तति ( समूह ) का अत्यन्त विनाश होता है, क्योंकि उसमें सन्ततित्व है, जैसे दीपसन्तति । किन्तु अत्यन्त विनाश के साधन के लिए जिस ' सन्ततित्व ' हेतु को उपस्थित किया गया है, वह पार्थिव परमाणु के रूपादि में व्यभिचरित है | इसलिए हम लोग कहते हैं कि " अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः " इत्यादि वेदान्त ही ( दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति में ) प्रमाण हैं । ( प्र ० ) भूत अर्थात् निष्पन्न विषय के अर्थ का प्रतिपादन करनेवाले वेदान्त के ये वाक्य प्रमाण नहीं हैं । ( उ ० ) ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि उस दशा में प्रत्यक्ष र प्रमाण में व्यभिचार होगा । अगर ऐसा कहें कि भूत अर्थ के प्रतिपादक वचन अनुवादक हैं, अतः वेदान्तों में दूसरे प्रमाणों की अपेक्षा के कारण अप्रामाण्य की सिद्धि होगी । क्योंकि प्रभा का जो ‘ साधकतम ' होगा, वही ' करण ' होने से प्रमाण होगा | अनुवादक वाक्य अपने अर्थ के १. अभिप्राय यह है कि वैशेषिक पार्थिव परमाणु को नित्य मानते हुए भी उसमें रूप, रस, गन्ध और स्पर्श को अनित्य मानते हैं । क्योंकि पाक से उनका परिवर्तन घटादि स्थूल वस्तुओं में प्रत्यक्ष सिद्ध है । किन्तु उनके मूल कारण परमाणुओं में रूपादि के परिवर्तित हुए बिना घटादि में उनका परिवर्तन सम्भव नहीं है । अतः वह मानना पड़ेगा कि पार्थिव परमाणु के रूपादि पाक से परिवर्तित होते हैं । रूपादि का यह परिवर्तन पहिले रूपादि का नाश और दूसरे रूपादि की उत्पत्ति के सिवाय और कुछ नहीं है । किन्तु परमाणु तो नित्य है, उसमें सभी समय कोई न कोई रूपादि अवश्य रहते हैं । तस्मात् एक ही परमाणु में नाना-जातीय रूपादि की सत्ता माननी पड़ेगी । इस प्रकार पार्थिव परमाणुगत नानाजातीय रूपादि का समूह मानना पड़ेगा । किन्तु उस समूह का कभी अत्यन्त विनाश नहीं होता है, अतः उसमें कथित ' सन्ततित्व ' हेतु है । तस्मात् उक्त ' सन्ततित्व ' हेतु व्यभिचार दुष्ट है । २. प्रत्यक्ष निष्पन्न वस्तु का ही होता है । अतः " वेदान्ता अप्रमाणम्, भूतार्थविषय-कत्वात् " अर्थात् वेदान्त अप्रमाण है, क्योंकि वे भूतार्थं के प्रतिपादक हैं । इस अनुमान का भूतार्थप्रतिपादकत्व हेतु प्रत्यक्ष प्रमाण में है, अथ च उसमें अप्रामाण्यरूप साध्य नहीं है | अतः उक्त हेतु व्यभचरित होने के कारण वेदान्तों में अप्रामाण्य का साधक नहीं हो सकता ।

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ मङ्गलाचरण-न सिद्धार्थप्रतिपादकत्वमनुवादकत्वम्, प्रत्यक्षस्याप्यनुवादकत्वप्रसङ्गात् । किन्त्व-धिगताधिगन्तृत्वम्, ईदृशश्च वेदान्तानामर्थो यदयं भूतोऽपि प्रत्यक्षादेः प्रमाणान्त-रस्य न विषयः, कुतस्तेषामनुवादकता कुतश्च सापेक्षत्वम्, स्मृतेरिव तेम्य: पूर्वाधिगमसंस्पर्शनार्थप्रतीतेरभावात् । अत एव पुरुषवाक्यमपि प्रमाणम् । नहि तदपि वक्तृप्रमाण्योत्थापनेनार्थं प्रतिपादयति, किन्त्वनपेक्षिततद्वयापारं स्वयमेव, उत्पत्तिमात्र एव तदपेक्षणात् । स्वाभाविकी हि पदानां पदार्थपरता, स्वाभाविकी च पदार्थानामाकाङ्क्षासन्निधियोग्यतावतामितरेतरान्वययोग्यता । तेन यथा वेदे प्रमाणान्तरानपेक्षः शब्दः, शब्दसामर्थ्यादेवार्थप्रत्ययः, एवं लोके s पि ये लौकिका वैदिकास्त एव चार्था इति न्यायेनोभयत्रापि शब्दशक्ते-बोधका‘'साधकतम ' का अर्थात् कारण नहीं है । ( उ ० ) किन्तु यह कथन भी असङ्गत ही है क्योंकि भूतार्थ का प्रतिपादक होना ही अनुवादक होना नहीं है । ( ऐसा मान लेने पर ) प्रत्यक्ष प्रमाण भी अनुवादक होगा । किन्तु ज्ञात विषय का ज्ञापक ही अनुवादक होता है । वेदान्तों से प्रतिपादित होनेवाले अर्थ निष्पन्न होने पर भी प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों के विषय नहीं है । तब वेदान्तों में प्रमाणान्तरसापेक्षत्व कैसा? और अनुवादकता कैसी? क्योंकि वेदान्त वाक्यों से स्मरण की तरह अर्थों की प्रतीति पूर्वानुभव से नहीं होती । इसी लिए पुरुष के वाक्य भी प्रमाण हैं । वे भी अपने अर्थविषय बोध के उत्पादन में वक्ता के प्रामाण्य - ज्ञान की अपेक्षा नहीं रखते । अपनी उत्पत्ति में ही वक्ता की अपेक्षा रखते हैं । किन्तु सुनने के बाद ही वक्ता के प्रामाण्य - ज्ञानरूप व्यापार की अपेक्षा नहीं रखते हुए ही केवल अपने सामर्थ्य से अपने अर्थ का बोध करा देते हैं । पदों में अपने अर्थों के बोध के उत्पा-दन की स्वाभाविक ' शक्ति ' है । अतः जैसे वेदों में दूसरे प्रमाणों की सहायता के विना ही केवल उन शब्दों के सामर्थ्य से ही अर्थ का बोध होता है, वैसे ही लोक में भी ---" जो पद लोक में जिस अर्थ में प्रयुक्त है, सन्भव होने पर उस पद से वेद में भी उसी अर्थ का बोध होता है " ( शाबरभाष्य ), इस न्याय से लौकिक और वैदिक १. अनवादक वाक्य का प्रसिद्ध उदाहरण है- ' नद्यास्तीरे फलानि सन्ति " । इस वाक्य में प्रामाण्य तभी होता है, जब कि नदी किनारे के फलों को प्रत्यक्षादि प्रमाण के द्वारा जानने-वाले से पुरुष वह प्रयुक्त हुआ हो । अतः उस बोध का ' साधकतम ' अर्थात् ' करण ' वहीं प्रमाण होगा, जिससे प्रयोक्ता को उक्त प्रमा का ज्ञान हुआ हो । अतः उक्त वाक्य अपने अर्थविषयक बोध का कारण होने पर भी साधकतम ' करण ' रूप प्रमाण नहीं है । तस्मात् अनुवादक वाक्य दूसरे प्रमाण से सापेक्ष रहने के कारण प्रमाण नहीं है । २. स्मृति ( स्मरण ) के प्रति पूर्वानुभव कारण है । स्मृति का प्रमात्व उसके कारणीभूत पूर्वानुभव के प्रमात्व के अधीन है । अतः संस्कार स्मृति का कारण होते हुए भी For Private And Personal

पृष्ठ 86

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ११ रविशेषात् । वक्तृप्रामाण्यानुसरणन्तु स्वरूपविपर्य्यासहेतोर्दोषस्याभावावगमाय । प्रत्यक्ष इव स्वकारणशुद्धेरनुगमो विपर्य्यासशङ्कानिरासार्थ इत्येषा दिक् । विस्तर-स्त्वद्वयसिद्धौ द्रष्टव्यः । ननु कार्येऽर्थे शब्दस्य प्रामाण्यं न स्वरूपे, वृद्धव्यवहारेष्वन्वयव्यतिरे-काभ्यां कार्य्यान्वितेषु पदानां शक्त्यवगमात् । अतो वेदान्तानां न स्वरूपपरतेति दोनों शब्दों के सामर्थ्य में कोई अन्तर नहीं है । ( प्रमात्व के ) स्वरूप के विपर्यासरूप अप्रमात्व के प्रयोजक दोषों के अभाव को जानने के लिए ही लौकिक वाक्यों में वक्ता के प्रामाण्य का अनुसन्धान किया जाता है । जैसे प्रत्यक्ष में स्वरूप विपर्यास, अर्थात् अप्रमत्व की शङ्का को हटाने के लिए उसके कारणों की शुद्धि का अनुसन्धान किया जाता है । यह केवल इस विषय का दिग्दर्शन मात्र है इसका विशेष विचार हमारे ' अद्वयसिद्धि ' नामक ग्रन्थ में देखना चाहिए । ( प्र ० ) कोई ( प्रभाकर ) कहते हैं कि कार्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शब्द की शक्ति है । ' स्वरूप ' अर्थात् कार्य्यात्व से असम्बद्ध केवल अर्थ में ही नहीं । क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से वृद्धों से व्यवहृत कार्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शक्ति गृहीत होती है ' । अतः वेदान्त वाक्य भी ' स्वरूप ' अर्थात् कार्यत्व से असम्बद्ध अर्थ के बोधक नहीं है ' | ' साधकतम ' करण नहीं है । एवं यथार्थानुभव से उत्पन्न स्मृति अप्रमा न होती हुई भी प्रमाणजन्य न होने के कारण प्रमा नहीं है । जिस यथार्थानुभव से उत्पन्न होने के कारण जिस स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना है, उस यथार्थ पूर्वानुभव का करण उस स्मृतिविषय - विषयक उसी यथार्थानुभव को उत्पन्न करने के कारण तज्जनित स्मृति की उत्पत्ति के समय में ज्ञातज्ञापक हो जाता है । सुतरां उससे स्मृति में प्रमात्व की सम्भावना नहीं हैं । तस्मात् उक्त स्मृति में अयथार्थभिन्नत्वप्रयुक्त कदाचित् प्रमात्व का गौण व्यवहार हो भी, तथापि उसके करण में प्रमाणत्व के व्यवहार की सम्भावना नहीं है । १. शब्द की शक्ति को ग्रहण करने की स्वाभाविक रीति यह है कि जिस स्थल में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहता है कि ' सामान्य ', अर्थात् गाय ले आओ, अथवा ' गां बन्धय ' अर्थात् गाय को बाँध दो । तब यह व्यक्ति गाय को ले जाता है या बाँध देता है । अगर उस स्थान पर कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा रहता है जिसे ' आनय ' या ' बषय ' रूप क्रियापद के अर्थ का ज्ञान है किन्तु उस क्रिया के कर्म के बोधक ' गाम् ' इस पद के अर्थ का ज्ञान नहीं है, वह व्यक्ति अनायास ही जिस व्यक्ति को लाया या बाँध गया देखता है, उस व्यक्ति को गोपद का अर्थ समझ लेता है । तब फिर दूसरे समय आनयनादि काय्यों को छोड़कर केवल ' गो ' प्रभृति अर्थों में गोपद की शक्ति कैसे गृहीत हो सकती है? २. अर्थात जिस " अशरीरम् " इत्यादि वेदान्तवाक्य को आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप मोक्ष For Private And Personal

पृष्ठ 87

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir १२ न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ मङ्गलाचरण-चेत्, वान्तमिदम्, स्वरूपपरस्यापि वाक्यस्य लोके प्रयोगदर्शनात् । यथा परिणाम -सुरसमानं परिणतिविरसश्च पनसमिति । अत्रापि प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुपदेश:, एवं हि वाक्यार्थः परिणामसुरसाम्रं भक्षय, परिणतिविरसश्व मा भक्षयेति । न, वैयर्थ्यात् । सुरसत्वप्रतीत्यैव स्वयमभिलाषात् पुरुषः प्रवर्त्तते, विरसत्वप्रतीत्यैव द्वेषान्निवर्त्तते । का तत्र वस्तुसामर्थ्य भाविन्युपदेशापेक्षा, अप्राप्ते हि शास्त्रमर्थवद्भ-वति । अथ प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेनास्य वाक्यस्य प्रयोगात् तादर्थ्यमिति चेत्, अस्ति प्रवृत्तिनिवृत्यर्थता, किन्तु जनकत्वान्न तु प्रतिपादकत्वेन । यस्माद् भूतार्थ-विषय एव प्रामाण्यम् । यदि तु प्रवृत्तिनिवृत्त्योरभिसन्धानेन वाक्यप्रयोगात् तयोर प्रतीयमानयोरपि शाब्दता, आम्रभक्षणोत्तरकालीना तृप्तिर्धातुसाम्यञ्च ( उ ) किन्तु यह कथन भी सारशून्य है, क्योंकि ' स्वरूप ' कार्यत्व से असम्बद्ध अर्थ के बोधक वाक्य से भी लोक में अर्थ - बोध देखा जाता है । जैसे " परिणतिसुरसमाम्रम्, परिणतिविरसञ्च पनसम् ” ( आम परिणाम में सुखद है और कटहल परिणाम में दुःखद है ) इत्यादि वाक्यों से अर्थ - बोध होता है । ( प्र ० ) यहाँ पर भी प्रवृत्ति और निवृत्ति ही वक्ता के उन वाक्यों से अभीष्ट है । तदनुसार उन दोनों वाक्यों का अर्थ यह है कि " आम खाओ, क्योंकि वह परिणाम में दुख देनेवाला है, और कटहल मत खाओ, क्यों कि वह अन्त में दुःख देनेवाला है । ” ( उ ० ) नहीं, यह कल्पना व्यर्थ है । वाक्यों को प्रवृत्त्यर्थक या निवृत्त्यर्थक न मानने पर भी आम में परिणामतः दुःख देने की कारणता का ज्ञान ही पुरुष को आम खाने में प्रवृत्त करेगा । एवं कटहल में परिणामतः दुःख देने की कारणता का ज्ञान ही पुरुष को कटहल खाने से निवृत्त करेगा । फिर वस्तुओं के सामर्थ्य से ही उत्पन्न होनेवाली प्रवृत्तियों एवं निवृत्तियों में उपदेश की आवश्यकता ही क्या है? क्योंकि और सभी प्रमाणों से अज्ञात वस्तु को समझाना ही शास्त्र ( शब्द ) का असाधारण प्रयोजन है । ( प्र ० ) " लोग आम खाने में प्रवृत्त हों और कटहल खाने में नहीं " यह मन में रखकर ही वक्ता उन वाक्यों का प्रयोग करते हैं, अतः प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों उन वाक्यों के ही अर्थ हैं । ( उ ० ) यह ठीक है कि उन वाक्यों से प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है किन्तु इससे केवल यही सिद्ध होता है कि वे वाक्य क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति के कारण हैं । इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वे दोनों उन दोनों वाक्यों के प्रतिपाद्य भी हैं । क्योंकि निष्पन्न अर्थों में ही शब्दों की शक्ति है । अगर प्रवृत्ति और निवृत्ति के अभिप्राय से उन वाक्यों का प्रयोग किया गया है, केवल इसीलिए प्रवृत्ति और निवृत्ति को उन वाक्यों का अर्थ मान लिया जाय तो ) आम के खाने से जो तृप्ति होती है या शरीर का उपकार होता है, उनकी प्रतिपादकता भी उस वाक्य में माननी पड़ेगी । ( किसी प्रकार की में प्रमाण माना है, उसका भी वह frs पन्न अर्थ नहीं है । उसका भी धाय्र्यत्वविशिष्ट कोई दूसरा ही अर्थ है । जिससे कि आपकी इच्छा पूर्ण नहीं होगी । For Private And Personal

पृष्ठ 88

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 88 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली १३ वाक्यार्थी स्याताम्, प्रत्यक्षस्य च काञ्चिदर्थक्रियामभिसन्धायोपलिप्सिते विषये प्रवृत्तस्यार्थक्रिया प्रमेया स्यात् । जनकत्वेन प्रवृत्तिपरत्वं वेदान्तानामपि विद्यते, तेभ्यः स्वरूपप्रतीतौ ध्यानाभ्यासादिप्रवृत्तस्य विगतविविधविकल्पविशदात्मज्ञानोदये सत्यपवर्गस्य भावात् । न चेदमावश्यकं यत्प्रवृत्तिनिवृत्त्यवधिकः प्रमाणव्यापार इति, तयोः पुरुषेच्छाप्रतिबद्ध योरनुत्पादेऽपि वस्तुपरिच्छेदमात्रेणापेक्षाबुद्धेः पर्यव-सानात् । न च कार्य्यान्वित एवार्थे पदानां शक्तिः, अनन्वितेऽपि व्युत्पत्तिदर्शनात् । यह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीति वर्त्तमानापदेशे प्रसिद्धेतरपदार्थोऽ-प्रसिद्ध मधुकरपदार्थस्तु यं मधुपानकर्त्तारं पश्यति तं मधुकरवाच्यत्वेन प्रत्येति । अत्राप्यस्ति पारम्पर्येण कार्यान्वयो वाक्यप्रयोक्तुः, वृद्धव्यवहारे कार्यान्वितपदाथ मधुकरपदस्य व्युत्पत्तिभावादिति चेत्? न, अनिश्चयात् । वाक्यप्रयोक्तुः किं कारणता से ही अगर प्रतिपादकता मान ली जाय तो ) मन में किसी कार्य्यविशेष की इच्छा से उत्पन्न तत्प्रयोजकीभूत किसी विषय के प्रत्यक्ष का वह विशेष कार्य्यं प्रमेय होगा । कारणत्व रहने से ही अगर प्रतिपादकत्व मान लिया जाय तो फिर वेदान्त - वाक्य भी प्रवृत्ति के वाचक ही हैं । क्योंकि उनसे भी स्वरूप अर्थविषयक बोध के बाद ध्यान, अभ्यासादि में प्रवृत्त पुरुष को अनेक प्रकार के विकल्पों से रहित आत्मा के यथार्थज्ञान के उदय से अपवर्ग की प्राप्ति अवश्य होती है । यह आवश्यक नहीं है कि ( शब्द ) प्रमाण के व्यापार की अवधि प्रवृत्ति और निवृत्ति ये ही दो मानी जाएँ । क्योंकि पुरुष की इच्छा से नियमतः प्रवृत्ति और निवृत्ति की उत्पत्ति न होने पर भी वस्तुओं का ' परिच्छेद ' अर्थात् इष्टसाधकत्वादि का परिचय देकरके ही अपेक्षा बुद्धि चरितार्थ हो जाती है । यह भी नियम नहीं है कि कार्य में अन्वित अर्थों में ही शब्दों की शक्ति है, क्योंकि कार्य में अनन्वित अर्थो में भी शब्दों की शक्ति देखने में आती है । जैसे " प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति " ( अर्थात् फूले कमल के बीच ' मधुकर ' मधु को पीता है ) इत्यादि वाक्य के ' मधुकर ' शब्द से । जिस व्यक्ति को पहिले से ( उक्त वृद्धव्यवहार की रीति से ) ' मधुकर ' पद के अर्थ का ज्ञान नहीं भी है, वह भी वर्त्तमानकालिक उस मधुपान क्रिया में रत भ्रमर को ' मधुकर ' शब्द का वाच्य समझ लेता है | ( प्र ० ) बोद्धा को कार्य्यान्वित अर्थ में शक्ति गृहीत न होने पर भी वक्ता को तो कार्य में अन्वित अर्थ में ही शक्ति गृहीत है, क्योंकि उसका शक्तिज्ञान वृद्ध-व्यवहारमूलक हो है । अतः साक्षात् न सही, परम्परा से मधुकर शब्द की शक्ति विशिष्ट अर्थ में ही है । ( उ ० ) यह आक्षेप भी अनिश्चय के कारण असङ्गत है, १. पहिले प्रमाण से यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । तदनन्तर उस ज्ञात ईप्सित विषय की इच्छा उत्पन्न होती है, अथवा द्वेष उत्पन्न होता है । ईप्सित For Private And Personal

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir I न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-वृद्धव्यवहारात् कार्य्यान्वितेऽर्थे व्युत्पत्तिरभूत्? किमुत प्रसिद्धपदसामानाधिकरण्येनो-पदेशाद्वा स्वरूपेऽर्थ इति निश्चयो नास्ति, इदम्प्रथमताया अभावात् । किश्व प्रयोक्तु-रन्विते व्युत्पत्तिः श्रोतुश्चानन्विते, अन्यव्युत्पत्त्याऽन्यो न शब्दार्थं प्रत्येति, ततश्च मधुकरशब्दस्यानन्वितार्थत्वमन्वितार्थत्वश्च पुरुष भेदेनेत्यर्द्ध वैशसमापतितम् । क्रिया-काङ्क्षानिबन्धनः पदार्थानामन्योन्यसम्बन्धो नाख्यातपदरहितेषु वेदान्तवाक्येषु भवितुमर्हतीति चेत्? न तावत्सर्वत्र क्रियाया अभाव:, यत्र तु नास्ति तत्रोप-संसर्गपरतया पदैरभिहितानां पदार्थानामेव योग्यता सन्निधिमतामन्योन्याकाङ्क्षानिब-न्धनः सम्बन्धः । तथा च ' काञ्च्यामिदानीं त्रिभुवनतिलको राजा ' इत्यत्रापि क्योंकि वाक्य के प्रयोक्ता को वृद्ध - व्यवहार से कार्यत्वविशिष्ट अर्थ में शक्ति गृहीत हुई थी, या प्रसिद्धपद के सामानाधिकरण्य के उपदेश से ' स्वरूप ' अर्थात् कार्य्यत्व से असम्बद्ध अर्थ में ही शक्ति गृहीत हुई थी, इसका कोई निश्चय नहीं है । यह नियम भी नहीं है कि वृद्ध - व्यवहार से ही उस परम्परा में शक्ति गृहीत हुई है और उसके पश्चात् प्रसिद्धपद के सामानाधिकरण्य से या उपदेश से । अगर यह मान भी लें कि वहाँ वक्ता को वृद्ध - व्यवहार से कार्य्यत्वविशिष्ट अर्थ में ही शक्ति गृहीत हुई है, तब भी यह मानना ही पड़ेगा कि उक्त स्थल में बोद्धा को कार्यत्व से अनन्वित केवल स्वरूप में ही शक्ति गृहीत होती है । अतः इस वाक्य के ' मधुकर ' शब्द का इस प्रकार कार्यत्व विशिष्ट अर्थ में एवं कार्यत्व से असम्बद्ध केवल स्वरूपार्थ में, दोनों जगह शक्ति की कल्पना करनी पड़ेगी । क्योंकि एक व्यक्ति के शक्ति - ज्ञान से दूसरे व्यक्ति को शाब्दबोध नहीं होता है । तस्मात् इस पक्ष में अर्द्धजरतीय न्याय हो जायगा । ( प्र ० ) पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध क्रिया की आकाङ्क्षा से होता है । वेदान्तवाक्यों में क्रियापद नहीं रहते, अतः वे परस्पर अस-बद्ध होने के कारण निराकाङ्क्ष हैं, फरतः अर्थ के बोधक न होने के कारण प्रमाण भी नहीं हैं । ( उ ० ) यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि पहिले तो यही असत्य है कि वेदान्तों में क्रियापद नहीं रहते । क्योंकि " अशरीरम् " इत्यादि क्रियापद से युक्त वेदान्त का उल्लेख कर चुके हैं । दूसरी बात है कि यह नियम ही ठीक नहीं है कि वाक्यों का परस्पर सम्बन्ध क्रिया की आकाङ्क्षा से ही उत्पन्न होता है । अतः जहाँ क्रियापद नहीं है, वहाँ भी पदों में परस्पर सम्बद्ध रूप से कथित आकाङ्क्षा, योग्यता और संनिधि से युक्त पदार्थों में ही आकाङ्क्षामूलक परस्पर सम्बन्ध है । क्योंकि “ काञ्च्यामिदानीं त्रिभुवनतिलको राजा " वस्तुओं में जीव प्रवृत्त होता है, अथवा अनिष्टसाधनत्व के अनुसन्धान से उत्पन्न द्वेष से निवृत्त होता है । फलतः यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न इच्छा और द्वेष इन दोनों से ही क्रमशः प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है । अगर ज्ञान के बाद किसी प्रतिबन्ध के कारण इष्टसाधनत्व या अनिष्टसाधनत्व का अनुसन्धान न हुआ तो फिर प्रवृत्ति और निवृत्ति की भी उत्पत्ति नहीं होती । किन्तु इससे ऐसा नहीं कहसकते कि उस शब्द से ज्ञान उत्पन्न हो नहीं हुआ । For Private And Personal

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प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 90 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् १५ द्रव्यगुणकम्मं सामान्य विशेषसमवायानां षष्णां पदार्थानां साधर्म्य-वैधर्म्य तत्वज्ञानं निःश्रेयसहेतुः । १ ) द्रव्य, ( २ ) गुण, ( ३ ) कर्म्म, ( ४ ) सामान्य, ( ५ ) विशेष, और ( ६ ) समवाय, इन छः पदार्थों के साधर्म्य और वैधर्म्य का तत्त्वज्ञान ' निःश्रेयस ' अर्थात् अपवर्ग का कारण है । एवं उक्त तत्त्वज्ञान का जनक यह ग्रन्थ भी परम्परा से अपवर्ग का कारण है । न्यायकन्दली अथवा तत्र श्रुतप्रयुज्यमानाऽस्तिभवति क्रियानिबन्धनो भविष्यतीति यत्किञ्चिदेतत् । वाक्यार्थो गम्यत एव । प्रकृतमनुसरामः । अत्र पवार्थधर्मज्ञानादेव पदार्थानामपि सङ्ग्रहो लभ्यते, स्वातन्त्र्येण धर्माणां सङ्ग्रहाभावात् । ननु पदार्थधर्माणां सङ्ग्रहपरो ग्रन्थो महोदयहेतुरिति नोपपद्यते, शब्दाना-पदार्थधर्म्मप्रतीतिहेतोः मर्थप्रतिपादनमन्तरेण कार्य्यान्तराभावादित्याशङ्कय सङ्ग्रहस्य पारम्पर्येण महोदयहेतुत्वं प्रतिपादयन्नाह - द्रव्यगुणेत्यादि । इत्यादि वाक्यों से भी अर्थ - बोध अवश्य होता है । ( अगर यह आग्रह मान भी लिया जाय कि क्रिया से ही पदों में परस्पराकाङ्क्षा होती है, तब भी ) अस्ति, भवति इत्यादि क्रियाओं का अध्याहार कर लिया जा सकता है । तस्मात् वेदान्त वाक्यों में अप्रामाण्य की कोई भी शङ्का नहीं है । अब हम फिर प्रकृत विषय का अनुसन्धान करते हैं । यहाँ ' पदार्थधर्म के ज्ञान से पदार्थों के भी ' संग्रह ' अर्थात् ज्ञान का लाभ होता है । पदार्थघर्म के यथार्थ ज्ञान का कारण ग्रन्थ ( शब्दसमूह ) महोदय अर्थात् अपवर्ग का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि शब्द में अपने अर्थों के प्रतिपादन को छोड़कर दूसरे कामों के करने का सामर्थ्य नहीं है । यह शङ्का मन में रखकर ( अपवर्ग के कारण ) पदार्थधर्म्मविषयक यथार्थ - ज्ञान के सम्पादक ग्रन्थ में ( अपवर्ग की साक्षात्कारणता सम्भव न होने पर भी ) परम्परया ( अपवर्ग की ) कारणता का प्रतिपादन करते हुए ' द्रव्यगुण ' इत्यादि भाष्य को कहते हैं । १. अभिप्राय यह है कि इस पुस्तक का नाम ' पदार्थधम्मंसंग्रह " है । ' संग्रह ' शब्द का अर्थ सम्यक् ज्ञान या यथार्थज्ञान है । " प्रवक्ष्यते महोदयः " इत्यादि वाक्य से पदार्थधम्मं के यथार्थज्ञान में ' महोदय ' या अपवर्ग की कारणता कही गई है । आगे साधर्म्यवैधर्म्ययुक्त पदार्थ - ज्ञान में ही महोदय को कारणता कही गई है । अतः दोनों उक्तियों में सामञ्जस्य नहीं होता । इसी को मिटाने के लिए इस अभिप्राय से उपर्युक्त शब्द कहना पड़ा कि धर्म का ज्ञान पम्मिज्ञान के बिना असम्भव है । For Private And Personal