प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 821–830

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 821–830

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७४६ न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-प्रशस्तपादभाष्यम् अपरं द्रव्यत्वगुणत्व कर्मत्वादि अनुवृधिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । तत्र द्रव्यत्वं परस्परविशिष्टेषु पृथिव्यादिष्वनु-वृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा गुणत्वं परस्परविशिष्टेषु रूपादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा कर्मत्वं परस्पर-विशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्यय हेतुत्वात् सामान्यम, द्रव्यगुणेभ्यो द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अपर है । ये अनुवृत्तिप्रत्यय के कारण होने से ' सामान्य ' और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण होने से ' विशेष ' दोनों ही हैं । इनमें द्रव्यत्व परस्पर विभिन्न पृथिवी प्रभृति नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में ' यह द्रव्य है ' इस एक आकर की प्रतीति के हेतु होने से सामान्य ' है, एवं उन्हीं नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में ' यह गुण और कर्म से भिन्न है ' इस व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार गुणत्व भी रूपादि चौबीस गुणों में से प्रत्येक में यह गुण है ' इस एक आकार के प्रत्ययों का हेतु होने से ' सामान्य ' है एवं ' ये रूपादि द्रव्य और कर्म से भिन्न हैं, इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार कर्मत्व जाति भी उत्क्षेपणादि विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक में " यह क्रिया है ' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण होने से सामान्य है, एवं उत्क्षेपणादि क्रियाओं में से प्रत्येक में ‘ यह द्रव्य और गुण से भिन्न है ' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण न्याकन्दली कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यं द्रव्यगुणेभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । द्रव्यत्वादिवत् पृथिवीत्वादीनामप्यनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्यय-हेतुत्वात् सामान्यविशेषभावोऽस्तीत्याह - एवमिति । प्राणिगतानि सामान्यानि गोत्वाश्वत्वादीनि अप्राणिगतानि घटत्वपटत्वादीनि । किं द्रव्यत्वादीनां सामान्य-अनुवृत्तिप्रतीति का कारण है. अतः सामान्य है । एवं द्रव्य और कर्म इन दोनों से ' गुण भिन्न है ' ( क्योंकि वह गुण है ) इस व्यावृत्तिबुद्धि का भी कारण है, अत: ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार परस्पर विभिन्न उत्क्षेपणादि क्रियाओं में ' ये कर्म हैं ' इस समान आकार की प्रतीति ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) कर्मत्व से होती है, अतः वह सामान्य है और उन्हीं कर्मों में ' ये द्रव्य और गुण से भिन्न हैं ' इस व्यावृत्ति बुद्धि की हेतु होने से ' विशेष ' भी है । ' एवम् ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रव्यत्वादि जातियों की तरह पृथिवीत्वादि जातियों में भी कथित सामान्यविशेषभाव का अतिदेश करते हैं । गोत्व, अश्वत्व प्रभृति For Private And Personal

पृष्ठ 822

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७४७ व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । एवं पृथिवीत्वरूपत्वोत्क्षेपणत्व गोत्वघटत्व-पटत्वादीनामपि प्राण्य प्राणिगतानामनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्य-विशेषभावः सिद्धः! एतानि तु द्रव्यत्वादीनि प्रभूतविषयत्वात् प्राधा-न्येन सामान्यानि स्वाश्रयविशेषकत्वाद् भक्त्या विशेषाख्यानीति । होने से ' विशेष ' भी है । इसी प्रकार प्राणियों में रहनेवाले और अप्राणियों में रहनेवाले पृथिवीत्व, रूपत्व, उत्क्षेपणत्व, गोत्व, घटत्व, पटत्व प्रभृति जातियों में भी अनुवृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से सामान्यत्व और व्यावृत्ति-प्रत्ययजनकत्व हेतु से विशेषत्व की सिद्धि समझनी चाहिए । द्रव्यत्वादि जातियाँ सामान्य के पूर्णलक्षण से युक्त होने के कारण वस्तुतः सामान्य ही हैं । किन्तु अपने आश्रयों को अपने से भिन्न वस्तुओं से पृथक् रूप में समझाने की योग्यता भी उनमें किसी अंश में संघटित होती है, अतः उनमें ' विशेष ' शब्द का भी गौणप्रयोग होता है । न्यायकन्दली स्वरूपं वास्तवम्? किं वा विशेषस्वरूपता? आहोस्विदुभयस्वरूपता? अत्राह -एतानीति । समानानां भावः सामान्यमिति सामान्यलक्षणं द्रव्यत्वादिषु विद्यते, स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टीति विशेष इति तु लक्षणं नास्ति । अत एतानि मुख्यया वृत्त्या सामान्यान्येव न विशेषाः, विशेषसंज्ञां तूपचारेण लभन्ते । विशेषो हि स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टि, द्रव्यत्वादिकमपि विजाती-येभ्यः स्वाश्रयस्य विशेषणमित्येतावता साधर्म्येणोपचारप्रवृत्तिः । प्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं. एवं घटत्व, पटत्व प्रभृति अप्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं । ( प्र ० ) ( द्रव्यत्वादि सामान्य और विशेष दोनों कहे गये हैं ) इस प्रसङ्ग में प्रश्न उठता है कि वे वास्तव में ' सामान्य ' रूप हैं? या वास्तव में वे ' विशेष ' रूप ही हैं? अथवा उनके दोनों ही स्वरूप वास्तव हैं? इन्हीं विकल्पों का समाधान ' एतानि ' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अर्थात् ' समानानां भावः सामान्यम् ' सामान्य का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में पूर्ण रूप से है, किन्तु ' स्वाश्रयं सर्वतो विशिनष्टिीति विशेष: ' ( जो अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग करे, वही विशेष ' है ) विशेष का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में नहीं है ( क्योंकि द्रव्यत्वादि अपने आश्रयीभूत एक द्रव्य व्यक्ति से अपने आश्रयी-भूत दूसरी द्रव्य व्यक्ति को अलग नहीं समझा सकता ), अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ ' सामान्य ' शब्द के ही मुख्यार्थ हैं । उनमें ' विशेष ' शब्द का लक्षणावृत्ति से ही प्रयोग होता है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार ' विशेष ' पदार्थ अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग रूप में रखता है, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सामान्य भी अन्ततः अपने आश्रय For Private And Personal

पृष्ठ 823

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७४८ लक्षणभेदादेषां न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् अत एव च नित्यत्वम् । प्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वं सिद्धम् ॥ द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों से इसका स्वरूप ( लक्षण ) भिन्न है, अतः सिद्ध होता है कि यह सामान्य ( द्रव्यादि की तरह ) दूसरा ही ( स्वतन्त्र ) पदार्थ है । यतः लक्षणभेद के कारण द्रव्यादि से यह भिन्न है, अतः यह सिद्ध होता है, सामान्य नित्य है । न्यायकन्दली द्रव्यत्वादीनि द्रव्यादिव्यतिरिक्तानि न भवन्ति, अतस्तेषां पृथक् कार्य-निरूपणमन्याय्यमित्यत्राह -- लक्षणभेदादिति । अनुगताकारबुद्धिवेद्यानि द्रव्य-त्वादीनि व्यावृत्तिबुद्धिवेद्याश्च द्रव्यादिव्यक्तयः, तस्मादेषां द्रव्यत्वादीनां लक्षण-भेदात् प्रतीतिभेदाद् द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । अत एव च नित्य-त्वम् । यत एव सामान्यस्य द्रव्यादिभ्यो भेद:, अत एव नित्यत्वम् । द्रव्याद्य-भेदे सामान्यस्य द्रव्यादिविनाशे विनाशस्तदुत्पादे चोत्पादः स्यात्, भेदे तु नायं विधिरवतिष्ठत इति । अत्र वदन्ति । भिन्नेष्वनुगता बुद्धिः सामान्यं व्यवस्थापयति । सा च प्रतिपिण्डं दण्डपुरुषाविव न स्वातन्त्र्येण सामान्यविशेषलक्षणे को दूसरी जाति के आश्रयीभूत पदार्थों से तो अलग करते ही हैं, केवल इतने ही सादृश्य के कारण द्रव्यत्वादि सामान्यों में भी ' विशेष ' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है । किसी सम्प्रदाय का मत है कि द्रव्यत्वादि जातियाँ आश्रयीभूत द्रव्यादि व्यक्तियों से भिन्न नहीं हैं, अतः उनका अलग से निरूपण करना उचित नहीं है । इसी आक्षेप का समाधान ' लक्षणभेदात् ' इत्यादि से किया गया है । अनुगत आकार की प्रतीति के द्वारा ही द्रव्यत्वादि सामान्य समझे जाते हैं । द्रव्यादि व्यक्तियों का बोध व्यावृत्तिबुद्धि से होता है । तस्मात् ' एषाम् ' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्यों के लक्षण ( द्रव्यादि व्यक्तियों के ) लक्षण से भिन्न हैं, अत एव द्रव्यत्वादि सामान्य द्रव्यादि व्यक्तियों से अलग स्वतन्त्र पदार्थ हैं । अत एव नित्यत्वम् ' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्य यदि द्रव्यादि व्यक्तियों से अभिन्न होते, तो फिर द्रव्यादि के विनाश से उनका भी विनाश होता, एवं उनको उत्पत्ति से उनकी भी उत्पत्ति होती । यदि द्रव्यत्वादि सामान्य और द्रव्यादि व्यक्ति इन दोनों को भिन्न पदार्थ मान लेते हैं, तो यह स्थिति नहीं उत्पन्न होती है, ( अतः उनको नित्य मानते हैं ) । इसी प्रसङ्ग में किसी सम्प्रदाय के लोगों का कहना है कि ( प्र ० ) विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की बुद्धि ( अनुवृत्तिप्रत्यय ) से ही सामान्य की सिद्धि की जाती है, किन्तु For Private And Personal

पृष्ठ 824

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली III द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोविशेषणविशेष्यभावः, गोत्वा ' गोत्ववा -नित्येवमनुदयात् । किं तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतितिरियम्, गौरयमित्येका-त्मतापरामर्शात्, उभयोरन्योन्यप्रहाणेन स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्येव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम्, व्यावृत्ततापि गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणा-मपि स्वभाव: । सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम्, व्यक्त्यन्तर-व्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परात्मतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् । जिस प्रकार ' दण्डी पुरुषः ' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है, उस प्रकार से ' अयं गोः, अयं गौः ' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष ( व्यक्ति ) रूप से प्रतिभासित नहीं होते । एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी प्रतिभासित नहीं होते, क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप ' गौ: गोत्ववान् ' इस आकार का होता ( ' अयं गौः इस आकार का नहीं ) । तस्मात् ' अयं गौः ' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है । क्योंकि ' अयम् ' पदार्थ और ' गौ ' पदार्थ दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है, एवं गोत्व को छोड़कर गो का भी कोई स्वरूप नहीं है । क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है, वैसे ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व ( अर्थात् स्वभिन्नभिन्नत्व ) जैसे गो व्यक्ति में है, वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है, अतः गोत्व का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे । एवं गोव्यक्ति १. मुद्रित न्यायकन्दली में ' गोत्वा गोत्ववान् ' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक ' ए ' का चिह्न छूट गया है । अतः ' गोत्वो गोत्ववान् ' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता, क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि ' अयं गौ: ' इस आकार को प्रतीति में गो का व्यक्ति-विधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं होता है । इसके बाद ' नापि तथेः ' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है, उसमें द्विवचनान्त ' तयोः ' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । ' किन्तु तादात्म्यग्राहिणी ' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि ' अयं गौः ' यह प्रतीति ' इदम् ' पदार्थ में गो के तादात्म्य विषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप होता है कि ' अयं गौः ' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । ऐसी यदि बात है तो फिर ' गोः गोत्ववान् ' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । For Private And Personal

पृष्ठ 825

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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७५० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्य निरूपण-न च तस्य स एव स्वभाव: स एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते, निःस्व-भावस्य सम्बन्धाभावात् । तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मतेव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय एव गौर्न बाहुलेय इति । किन्तु सर्वेषामेकमतित्वमेव ' स गौरयमपि गौरिति । तत्र प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत्? न, युक्तिज्ञस्य भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिविपर्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव प्रतीयते, तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् । अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत्? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनु-का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा, जब कि गोव्यक्ति और गोत्व जाति दोनों में तादात्म्य मान लें । अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही गोव्यक्ति का स्वभाव है, एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो, और वहीं उसका सम्बन्धी भी हो क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना स्वभाव के में वस्तु किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् ' जाति व्यक्तिस्वरूप है, और व्यक्ति भी जाति-स्वरूप ही है ' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि ( प्रतीतियों के भेद से ) हो सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में ' यह गो है ' इस आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाहुलेय नामके गो में भी ' यह गो है ' इस प्रकार की प्रतीति होती है । ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है, बाहुलेय नहीं किन्तु यही सबों का अनुभव है कि ' शाबलेय ' भी गो है, एवं ' बाहुलेय ' भी गो है । इस स्थिति में शाबलेय गो के स्त्ररूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है, उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती | ( गोत्व रूप ) सामान्य में पूर्व पिण्ड ( शाबलेय गो रूप पिण्ड का भेद इसी लिए है कि सामान्य ( गोत्र ) पिण्डान्तर ( बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड ) स्वरूप है । सामान्यरूपता इस लिए है कि वह उभयात्मक है । ( उ ० ) अभेद दोनों का रहना परस्पर ' विरुद्ध ' व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है, बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद और है? ( प्र ० ) युक्तियों से अभिज्ञ आप जैसे क्योंकि ' विरुद्ध ' वही कहलाता है जिसमें कि के द्वारा उसी प्रकार का प्रतात होता है, उसको विरुद्ध कहना ही ' विरुद्ध ' है । यदि यह For Private And Personal

पृष्ठ 826

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 826 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७५१ सरति? हतं तर्होदमनवस्थया । अथेदं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते? तदा यथा यद् वस्तु यद् दर्शयति तथैव तत्, न त्वेतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पाद-विनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थानान्नित्यमनित्यं च न पुनर्नित्यमेव । एवं प्राप्तेऽभिधीयते - कि जातिव्यक्त्योर विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः? उत तयोरभेदं गृह्णाति? आहोस्वित् परस्पर विलक्षणावाकारौ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु स्यात्, नोभयोरेकात्मकत्वम्, अविलक्षणाकार बुद्धि-वेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु कल्पे व्याहतिरेव विलक्षणाकार संवित्ति-रेव हि भेदसंवित्तिः । तस्याः सम्भवे सति तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति, कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते? कथं तर्हि तादात्म्यप्रतीति:? न कथञ्चिदिति वदामः । यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते, एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः । अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनगो रित्यय-कहें कि ( उ ० ) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है । अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है, ( प्र ० तो इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है? यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो जाएगा । यदि प्रत्यक्ष अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके ) केवल अपने बल से ही अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है, वह वस्तु उसी रूप का है । इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि ' अन्यत्र इस प्रकार से देखा नहीं जाता ' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से सभी वस्तुओं को सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य यतः अपने आश्रय रूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है, और उनके विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है, अतः ' अनित्य ' है । एवं उस व्यक्ति के नाश के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है, अतः वह ' नित्य ' भी है । तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है, केवल नित्य ही नहीं है । ( उ ० ) ऐसी स्थिति में हम ( तार्किक ) लोग पूछते हैं कि ( १ ) ' अयं गोः ' यह प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । ( २ ) अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है? ( ३ ) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है? इनमें यदि पहिला पक्ष मानें तो For Private And Personal

पृष्ठ 827

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 827 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७५२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्यनिरूपण-मविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः, समवायस्य पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयः पिण्डवह्निवत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव, दूरे गोत्वाग्रहणे s पि पिण्डस्य ग्रहणात् । पूर्व पिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति ताकिकाणां प्रक्रिया | द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम्, द्रव्यत्वा-फिर जाति या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा दूसरे का नहीं, जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी, क्योंकि अभि-न्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा । क्योंकि किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के भेद का ज्ञान है । भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है, तो फिर उन दोनों में तादात्म्य की प्रतीति कैसी? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती, क्योंकि यदि एक ही आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रनीति होगी, दो वस्तुनों की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है. तो फिर उस एक आकार की प्रतीति की सम्भावनाही मिट जाती है । ' गौरयम् ' इत्यादि प्रतीतियों में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं, वह तो दोनों के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि इसमें उसके दोनों सम्बन्धी ( प्रतियोगी और अनुयोगी ) परस्पर एक होकर ही प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं । सुतराम् ( व्यक्ति सम्बद्ध ) जाति की ही प्रतीति होती है, केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः भेद रहते हुए भी जैसे कि ( संयोग युक्त ) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया जा सकता है उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक दूसरे को छोड़कर भी होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड ( व्यक्ति ) की प्रतीति तो होती है, ( किन्तु ' यह गो हैं इस प्रकार से ) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती । एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकोंकी रीति के अनुसार जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । ( किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं है ) । द्रव्यत्वादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं, एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न भिन्न आकार की होती है, अतः समझते हैं कि द्रव्यत्व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्वादि सामान्यों For Private And Personal

पृष्ठ 828

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 828 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] ६५ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir भाषानुवादसहितम् ७५३ प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् । प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् | यद्यध्य-परिच्छिन्न देशानि सामान्यानि भवन्ति, तथाप्युपलक्षण नियमात द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप से रहते हैं, एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं, अतः ( द्रव्यत्वगुणत्वादि ) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है, एवं उसको अनेक मानने में कोई प्रमाण भी नहीं है, इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक एक ही है । यद्यपि सामान्य अनन्त ( प्रकार के ) आश्रयों में रहता है, फिर भी उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एक रूपता, और उसके आश्रयों की न्यायकन्दली दयः प्रत्येकं द्रव्यादिष्वेव नियताः । प्रत्यय भेदश्चैतेषु दृश्यते, तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्यय भेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः । अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं तस्य करोति -- प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् । प्रत्येकं प्रतिपिण्डम विशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह - यद्यपीति । यद्यपि सामान्यानि यत्र तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियत देशानि में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं इनमें इनकी प्रतीतियां भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं । ' प्रत्येकं स्वाश्रयेषु ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहिले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा प्रत्येकं स्वाश्रयेषु ' इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । लक्ष्यते अनेन ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत में ' लक्षण ' शब्द का अर्थ है अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका ' प्रत्येक में ' अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में ' अविशेष से ' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से एवं ' विशेष में ' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में ' लक्षण ' अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों में एक ही है, अर्थात् अभिन्नस्वभाव का है । पहिले जो यह कहा है कि ' सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है, गया नहीं ' उसी के हेतु का प्रतिपादन ' यद्यपि ' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया अन्यत्र है ।

पृष्ठ 829

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 829 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ७५४ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्यायकन्दलीसंवलित प्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण -प्रशस्तपादभाष्यम् कारण सामग्री नियमाच्च स्वविषय सर्वगतानि । अन्तराले च संयोग-समवायवृन्यभावादव्यपदेश्यानीति । इति प्रशस्तपादभाष्ये सामान्यपदार्थः समाप्तः । ---:: -नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना इन दोनों से समझते हैं कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । ( कार्योत्पत्ति के ) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध, अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं होता । अतः ( सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ) । प्रशस्तपाद भाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ । --:: -न्यायकन्दली तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमान्नियतत्वात् पिण्डो-त्पादक कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति । एतदुक्तं भवति - सास्नादिसंस्थानविशेषो केसरादिसंस्थानविशेषोऽश्वत्वस्य, गोत्वस्य व्यञ्जकः, घटत्वस्य, विशिष्टग्रीवादिसंस्थान विशेषो I प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः, अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव पिण्डान्तरेणापि सम्बद्ध क्षमते, तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण ' अपरिच्छिन्न देश ' में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके ' उपलक्षण ' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं, वे नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं । इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ता प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का संयोग ( संस्थान ) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु हैं । इसी प्रकार विशेष प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं, क्योंकि नियमित रूप से तत्तत् संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते, किन्तु अपने नियमित पिण्डों में ही रहते हैं । इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे. उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ १. यहाँ ' स्वविषयेणैव ' के स्थान में ' स्वविषयेणेव ' ऐसा इवकार ' घटित पाठ ही उचित जान पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । For Private And Personal

पृष्ठ 830

प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि, पृष्ठ 830 का मूल पृष्ठ
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७५५ पिण्डे सम्भवति तस्य तत्रैव समवायो नान्यत्र । एवं सामग्रया नियमादपि सामान्य सम्बन्धनियमः । एष हि तन्त्वादीनां कारणानां स्वभावो यदेतैरुत्पद्य-माने द्रव्ये पटत्वमेव समवैति नान्यत् । एष हि मृत्पिण्डादीनां महिमा यत् तैः क्रियमाणे द्रव्ये घटत्वमेव समवैति नान्यत् । न तावत् सामान्यमन्यतो गत्वान्यत्र सम्बध्यते निष्क्रियत्वात् । तत्रापि यदि पूर्वं नासीत्? तत्रोपजायमानेन पिण्डेनास्य सम्बन्धो न स्यात् । दृश्यते च सर्वत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बन्धः, तस्मात् सर्वं सर्वत्रास्तीति कस्यचिन्मतं तन्निराकुर्वन्नाह - अन्तराले संयोगसमवायवृत्त्यभावादव्य-पदेश्यानीति । अन्तरालमिति आकाशं वा दिग्द्रव्यं वा स्तिमितवेगमूर्त्तद्रव्या-भावो वा तेषु गोत्वादिसामान्यानां न संयोगो नापि समवायः । न चासम्बद्धानामेव तेषामवस्थाने प्रमाणमस्ति । अतोऽन्तराले न सामान्यानि व्यपदिश्यन्ते न सन्तोत्यर्थः । कथं तहि तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बध्यन्ते? भी जिन किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध हो सकते हैं । फिर भी जिस सामान्य का ज्ञापक जो संस्थान है, उस संस्थान से युक्त पिण्ड में ही उस सामान्य का समवाय है, अन्य पिण्डों में नहीं । इसी प्रकार आश्रयोभूत किसी व्यक्ति के उत्पादक कारणसमूह के नियमन से ही सामान्य के समवाय रूप सम्बन्ध का भी नियमन हो सकता है, जैसे कि ( पट के उत्पादक ) तन्तु प्रभृति कारणों का ही यह स्वभाव है कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में पटत्व समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता है, अन्य सामान्य नहीं । एवं मिट्टी प्रभृति कारणों की ही यह महिमा है । कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में घटत्व का ही समवाय हो, किसी दूसरे सामान्य का नहीं । ' सामान्य ' यतः क्रिया रहित है अतः एक जगह से दूसरी जगह जाकर अपने विषय के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता । ( व्यक्ति की उत्पत्ति के देश में उसके रहने पर भी उस व्यक्ति के साथ सम्बन्ध के प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता है कि ) सामान्य यदि उस देश में पहिले से नहीं था, तो फिर इस समय उत्पन्न हुए अश्वादि के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता । किन्तु सभी देशों में उत्पन्न व्यक्तियों के साथ उसका सम्बन्ध होता है । तस्मात् यह मानना पड़ेगा कि सामान्य सभी स्थानों में है । किसी सम्प्रदाय के इसी सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए ' अन्तराल ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । प्रकृत में ' अन्तराल ' शब्द आकाशादि का स्तिमितवायु का, अथवा अमूर्त द्रव्य प्रभृति का बोधक है । इनमें से किसी में भी गोत्यादि सामान्यों का न समवाय सम्बन्ध है, और न संयोग सम्बन्ध है । ' गोत्वादि जातियाँ बिना किसी सम्बन्ध के हो रहती हैं ' इस प्रसङ्ग में भी कोई प्रमाण नहीं है । अत: कथित ' अन्तराल ' में गोत्वादि सामान्य का व्यवहार नहीं होता है । फलतः वह अन्तराल में नहीं है । ( प्र ० ) तो फिर उन देशों में अपने गवादि विषयों ( व्यक्तियों ) के साथ वे किस प्रकार सम्बद्ध होते For Private And Personal