प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 831–840
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 831–840
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७५६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली { सामान्यनिरूपण -कारणसामर्थ्यात् । संयोगो ह्यन्यतः समागतस्य भवति, तत्रैवावस्थितस्य वा भवति । तस्माद् विलक्षणस्तु समवायो यत्र यत्रैव पिण्डोत्पत्तौ कारणानि व्याप्रियन्ते तत्र तत्रैव कारणानां सामर्थ्यात् पिण्डेऽन्यतोऽनागतस्य तत्र स्थितस्यापि सामान्यस्य भवति, वस्तुशक्तेरपर्यनुयोज्यत्वात् । अत्राहुः सौगता: - प्रतीयमानेषु भेदेषु मणिसूत्र देकस्याकारस्या-नुपलम्भात् सामान्यं नास्त्येवेति । तदयुक्तम्, अनेकासु गोव्यक्तिष्वनुभूय-मानास्वश्वादिव्यक्तिविलक्षणतया सामान्याकारप्रतीतिसम्भवात् । यदि शाब-लेयादिषु परस्परभिन्नेष्वेकमनुवृत्तं न किञ्चिदस्ति, यथा गवाश्वव्यक्तयः पर-स्परविलक्षणाः संवेद्यन्ते तथा गोव्यक्तयोऽपि संवेद्याः स्युः । यथा वा गोव्यक्तयः सरूपाः प्रतीयन्ते तथा गवाश्वव्यक्तयोऽपि प्रतीयेरन्, विशेषा भावात् । नियमेन तु गोव्यक्तयः प्रतीयमानाः सरूपाः स्ववर्ग साधारण-हैं? इसका यह उत्तर है कि व्यक्ति के उत्पादक कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा ही गोत्वादि सामान्य अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होते हैं । संयोग दूसरे देश से आये हुए व्यक्ति का, अथवा उसी स्थान में पहिले से विद्यमान वस्तु का होता है । किन्तु समवाय में संयोग से यह अन्तर है कि जिन जिन देशों में उनके विषयों के उत्पादक कारण अपने कार्य को करने के लिए क्रियाशील होते हैं, उन्हीं उन्हीं देशों में उन्हीं कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा उस सामान्य का सम्बन्ध हो जाता है, जो किसी दूसरी जगह से नहीं आता, उसी देश में विद्यमान रहता है | क्योंकि वस्तुओं की स्वाभाविक शक्तियाँ सभी अभियोगों के बाहर हैं । इस प्रसङ्ग में बौद्ध लोगों का कहना है कि ( प्र ० ) सामान्य नाम को कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मणियों के विभिन्न होते हुए भी उन सबों में एक माला का व्यवहार इसलिए होता है कि सबों को एक व्यवहार में लानेवाला सूत्र नाम का एक पदार्थ है, उस प्रकार विभिन्न गोव्यक्तिओं में एक प्रकार के व्यवहार के कारण गोम से भिन्न किसी वस्तु की उपलब्धि नहीं होती । ( उ ) किन्तु उन लोगों का यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि सभी गोव्यक्ति में ' ये गो हैं ' इस एक प्रकार की प्रतीति होती हैं, जो अश्वादि व्यक्तियों में नहीं होती है । यदि परस्पर विभिन्न शाबलेय ( बाहुलेय ) प्रभृति सभी गोव्यक्ति में समान रूप से रहनेवाली कोई वस्तु नहीं हैं, तो फिर जिस प्रकार गो और अश्व दोनों परस्पर विभिन्न रूप में प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार सभी गोव्यक्ति भी परस्पर विभिन्न रूप में ही प्रतीत होंगी । अथवा जिस प्रकार सभी गोव्यक्ति की प्रतीति एक रूप से होती है, उसी प्रकार गोव्यक्तियों और अश्वव्यक्तियों की प्रतीतियाँ भी एक रूप से होंगी, क्योंकि स्थितियों में अन्तर का कोई कारण नहीं है । किन्तु नियमतः सभी गोव्यक्ति एक ही आकार से प्रतीत होती हैं, अतः अश्वादि सभी व्यक्तियों में न रहनेवाले एवं सभी गोव्यक्तियों For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७५७ मश्वादिव्यावृत्तं किश्विदेकं रूपमाक्षिपति, १ एकार्थक्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च । गोव्यक्तीनामेकत्वमिति चेत्? नासति सामान्ये व्यक्तीनामिव व्यक्तिहेतुनां व्यक्तिकार्याणामपि परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात् २ । किश्व, यद्येक-हेतुत्वादेकत्वम्, भिन्नकारणप्रभवाणां व्यक्तीनामेकत्वं न स्यात् । दृश्यते चाभिन्नस्वभावानामपि कारणभेदो यथा वह्नेर्दारुनिर्मथनाद् विद्युत आदित्यगभस्ति-क्षोभितात् सूर्यकान्तादपि मणेरुत्पत्तिः । एककार्यत्वादेकत्वे च विजातीयाना-में रहनेवाले किसी एक धर्म की कल्पना आवश्यक हो जाती है । ( प्र ० ) सभी व्यक्ति यतः एक ही प्रकार के कार्यों के सम्पादक हैं. एवं एक ही प्रकार की सामग्रियों से उत्पन्न होती हैं, अतः सभी गोव्यक्ति एक ही हैं ( इसी एकत्व के कारण एकाकार की प्रतीतियाँ होती हैं ) | ( उ ० ) जिस प्रकार सामान्य के न रहने पर व्यक्तियों की एकता सम्भव नहीं है, उसी प्रकार व्यक्ति रूप कार्यों और व्यक्ति के कारणों की एकता भी सम्भव नहीं है, क्योंकि व्यक्तियों की तरह उनके कार्य और उनके कारण भी तो परस्पर विभिन्न हैं, उनमें रहनेवाले सामान्यों के बिना उनमें भी एकत्व का सम्पादक कौन होगा? दूसरी बात यह है कि यदि एक प्रकार की सामग्री से उत्पन्न होना ही व्यक्तियों में एकरूपता का कारण हो तो फिर भिन्न प्रकार की सामग्री से एक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति न हो सकेगी, किन्तु सभी अग्नियों का एक प्रकार का स्वभाव होते हुए भी उनके कारण भिन्न भिन्न हैं, यतः कभी काष्ठों के मन्थन से कभी विद्युत् किरणों से क्षुभित सूर्यकान्त मणि से वह्नि की उत्पत्ति होती से और कभी सूर्य की है । इसी प्रकार यदि एक प्रकार के कार्यों के उत्पादक होने से ही व्यक्तियों में एकता मानी जाय तो कुछ विजातीय वस्तुओं में भी एकता माननी पड़ेगी, क्योंकि दोहन, वाहनादि क्रियायें समान रूप से गोप्रभृति व्यक्तियों से और महिषादि व्यक्तियों से भी उत्पन्न होती हैं । ( एवं एककार्यकारित्व को यदि एकता का प्रयोजक मानें तो फिर ) जिन गोव्यक्तियों से दोहन भारवाहनादि क्रियायें सम्पादित ही नहीं होतीं, उनमें १. मुद्रित पुस्तक में ' रूपमाक्षिपति ' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम नहीं है । ' एकाथ क्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च ' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम है, जिससे सङ्गति ठीक नहीं बैठती है । अत: ' रूपमाक्षिपति ' इसी वाक्य के आगे पूर्णविराम देकर और आगे के वाक्य को पूर्वपक्षियों के साधक हेतुओं का बोधक मानकर अनुवाद किया गया है 1 २. इस सन्दर्भ में ' परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात् ' यह मुद्रित पाठ उचित नहीं जान पड़ता, इसे प्रथमान्त होना चाहिए । आगे के ' भिन्नकारणप्रभवाणामेकत्वम् ' इस प्रथमान्त पाठ से यह और स्पष्ट हो जाता है । अतः उक्त पाठ को प्रथमान्त मान कर ही अनुवाद किया गया है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्यनिरूपण -मप्येकत्वापत्तिः, दृष्टा हि वाहदोहनादिक्रिया गवादिव्यक्तीनामिव महिष्यादि-व्यक्तीनामपि । या च गौर्न दुह्यते न च वाह्यते सा गौर्न स्यात् । अपि च सामान्याभावे कोऽर्थः शब्दसंसर्गविषयः? न तावत् स्वलक्षणम्, तस्य क्षणिकस्य सर्वतो व्यावृत्तस्य सङ्केतविषयत्वाभावात् । नापि विकल्प: शब्दार्थः, तस्य क्षणिकत्वादसाधारणत्वाच्च । विकल्पाकारः शब्दार्थ इति चेत्? किं विकल्पाकारो विकल्पव्यतिरिक्तः? अव्यतिरिक्तो वा? यदि भिन्नः, स किं सर्वविकल्पसाधारणः, किं वा प्रतिविकल्पं भिद्यते? साधारणत्वे तावदेतस्य सामान्यादभेदः, यदि परम्? तव ज्ञानधर्माऽयमस्माकं चार्थधर्म: ( इति ) बहिर्मुखतया प्रतीयमानत्वादिति ( न ) कश्चिद् विशेषः । यदि व्यतिरिक्तोऽयमाकार: प्रतिज्ञानं भिद्यते, अथवा ज्ञानादव्यतिरिक्त एव, उभय-थापि न शब्दसंसर्गयोग्यता, ज्ञानवदशक्यसङ्केतत्वात् । विकल्पः पारम्पर्येण तदुत्पत्तिप्रतिबन्धाद् बाह्यात्मतया स्वाकारमारोप्य विकल्पयति, तत्रायं शब्दसंसर्ग एक आकार की कथित प्रतीति नहीं होगी । एवं जिस गाय से न दूध मिलता है और न माल ढोया जाता है वह गाय ही नहीं रह जाएगी । दूसरी बात यह है कि यदि सामान्य नाम की कोई वस्तु ही न हो तो शब्दों का ( सङ्केत रूप ) सम्बन्ध कहां मानेंगे? घटादि विषयों के ' स्वलक्षण ' में घटादि शब्दों का सम्बन्ध मान नहीं सकते, क्योंकि उक्त ' स्वलक्षण ' तो क्षणिक है, एवं और किसी भी वस्तु में वह नहीं रहता है, अत: उसमें किसी भी शब्द का ( सङ्केत या ) सम्बन्ध नहीं हो सकता । उसका विकल्प भी शब्दसङ्केत का विषय नहीं हो सकता,, क्योंकि ' विकल्प ' भी क्षणिक है, और साथ साथ असाधारण ( एकमात्र पुरुषवृत्ति ) भीहै । ( प्र ० ) एक विकल्पव्यक्ति क्षणिक और असाधारण है, किन्तु विकल्पों के आकार तो असाधारण हैं, ( क्योंकि एक आकार के अनेक विकल्प अनेक पुरुषों में देखे जाते हैं ), अतः विकल्प का आकार शब्दसङ्कत का विषय हो सकता है । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि विकल्प का यह आकार विकल्प से भिन्न कोई स्वतन्त्र वस्तु है? या यह विकल्प से अभिन्न ( वस्तुतः विकल्प हो ) है? यदि पहिला पक्ष मानें ( कि विकल्प का आकार विकल्प से भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है ) तो फिर इस प्रथम पक्ष के प्रसङ्ग में भी यह पूछता है कि यह ' आकार ' सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहने-वाली एक ही वस्तु है? या प्रत्येक विकल्प में रहनेवाला आकार अलग अलग है? यदि सभी विकल्पों में साधारण रूप से रहनेवाले एक ' आकार ' को स्वीकार कर लिया जाय, तो वह सामान्य से अभिन्न ही होगा । फलतः सामान्य स्वीकृत ही हो गया । थोड़ा अन्तर इतना रह जाता है कि उसे ( आकार को आप ज्ञानों का धर्म मानते हैं, और हम लोग उसे बहिर्मुखतया प्रतीत होने से ( सामान्य को ) विषयों का धर्म मानते हैं । यदि आकार को विकल्प से भिन्न मानें तो फिर वह ज्ञान से भिन्न हो होगा या ज्ञान स्वरूप ही होगा । दोनों ही स्थितियों में उनमें शब्दों के सम्बन्ध की सम्भावना नहीं रहेगी, क्योंकि ज्ञान की तरह ( उससे भिन्न या अभिन्न आकार भी क्षणिक होने के कारण ) शब्दसङ्केत For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७५ ९ इति चेत्? बाह्यत्वेनारोपितो विकल्पाकार एकाधीनस्वभावत्वाद् विकल्पे जायमाने जायमान इव, विनश्यति विनश्यन्निव प्रतीयमानः प्रतिविकल्पं भिन्न एवावतिष्ठते । न च भेदानुपातिनि सङ्केतप्रवृत्तिरित्युक्तम् । अथोच्यते - यादृशमेको गोविकल्पे बाह्यात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयति गोविकल्पान्तरमपि तादृशमेवारोपयति, विकल्पाश्च प्रत्येकं स्वाकारमात्रग्राहिणो न परस्परारोपितानामाकाराणां भेदग्रहणाय पर्याप्नुवन्ति, तस्योभयग्रहणा-धीनत्वात् । तदग्रहणाच्च विकल्पारोपितानामाकाराणामेकत्वमारोप्य विकल्पा-नामेको विषय इत्युच्यते । तदेव च सामान्यं बहिरारोपितेभ्यो विकल्पाकारेभ्यो-इत्यन्तभेदाभावेनाभावरूपं स्वलक्षणज्ञानतदाकारारोपितैश्चतुभिः सहोभिः समस्यार्द्धपञ्चमाकार इत्युच्यमानमारोपितबाह्यत्वं शब्दाभिधेयं शब्द-का विषय नहीं हो सकता । ( प्र ० ) वह परम्परया बाह्यविषयों के साथ भी है, अतः विकल्प स्वयं अपने में ही बाह्यस्व का आरोप कर अपने में बाह्यत्वाकार के विकल्प को भी उत्पन्न करता है । इसी बाह्यविषयक विकल्प में शब्दों का सङ्केत है । ( उ ० ) बाह्यत्व विषयक यह आरोप प्रत्येक बाह्य विषय में अलग अलग ही मानना पड़ेगा । क्योंकि इस बाह्यविषयक विकल्प की उत्पत्ति केरल कथित आन्तर विकल्पमात्र से होती है, अतः इसके उत्पन्न होने पर वह वस्तुविषयक विकल्प उत्पन्न सा और विनष्ट होने रविष्ट सा दीखता है । इस प्रकार वस्तुविषयक वह विकल्प असाधारण और क्षणिक भी होगा । पहिले ही कह चुके हैं कि सजातीय भिन्न व्यक्तियों में ही शब्द का सङ्केत हो सकता है, असाधारण किसी एक मात्र व्यक्ति में नहीं । ( प्र ० ) एक गोविषयक विकल्प बाह्यत्वविषयक अपने जिस आकार को उत्पन्न करता है, गोविषयक दूसरा विकल्प भी उसी तरह के बाह्यत्व विषयक अपने आकार के विकल्प को उत्पन्न करता है । विकल्पों का यह स्वभाव है कि वे केवल अपने आकारों का ही आरोप करें । समान आकारों में जो आरोपित परस्पर भेद हैं, उन भेदों को ग्रहण कराने का सामर्थ्य उनमें नहीं है । क्योंकि भेद को समझने के लिए उसके प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों को समझना आवश्यक है । भेद के इस अज्ञान के कारण ही एक आकार के विकल्प से कल्पित आकारों में एकत्व का आरोप होता है । एकत्व के इसी आरोप के कारण ' इयं गौः ' ' इस आकार के सभी विकल्पों का विषय एक ही है ' इस प्रकार का व्यवहार होता है । इसी को ( वैशेषिकादि ) ' सामान्य ' कहते हैं । किन्तु यह ' सामान्य ' अभाव रूप है ( भाव रूप नहीं ) क्योंकि बाह्य वस्तुओं में, एवं आरोपित विकरूपों में जो परस्पर भेद है, उनका अत्यन्ताभाव ही वह सामान्य है | ( १ ) स्वलक्षण कम्बु-ग्रीवादिमत्त्व प्रभृति ), ( २ ) उसका ज्ञान ( ३ ) ज्ञान के आकार, एवं ( ४ ) आकार का बाह्यत्वारोप इन चार सहायकों के साथ मिलकर ( इन चारों से कुछ ही भिन्न होने के कारण ) उसे अर्द्धपञ्चमाकार ' कहा जाता है । उसी अर्द्धपश्चमाकार वस्तु में शब्द For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्यनिरूपण-संसर्गविषयः । तदध्यवसाय एव स्वलक्षणाध्यवसायः, तदात्मतया तस्य समा-रोपात् । अन्यव्यावृत्तिस्वभावं भावाभावसाधारणं चेदम् गौरस्ति नास्तीति प्रयोगात् । भावात्मकत्वे ह्यस्य गौरस्तीति प्रयोगासम्भवः, पुनरुक्तत्वात् । नास्तीति च न प्रयुज्यते, विरोधात् । एवं तस्याभावात्मकत्वे नास्तीति पुनरुक्तम्, अस्तीति विरुध्यते । यथोक्तम्— घटो नास्तीति वक्तव्यं सन्नेव हि यतो घटः । नास्तीत्यपि न वक्तव्यं विरोधात् सदसत्त्वयोः ॥ इति । एतस्मादेव च भिन्नानामपि व्यक्तीनामेकतावभासः । इदं हि सर्वेषा -मेव विकल्पानां विषयोऽस्यैकत्वाद् विकल्पानामप्येकत्वम् । तेषामेकत्वाच्च तत्का-का ( सङ्केतरूप ) संसर्ग होता है । शब्द से उसी का व्यवहार होता है, एवं उसी का बाह्य अर्थ रूप में भी व्यवहार होता है, उसे ही ' स्वलक्षण ' भी कहते हैं । इसी ' स्वलक्षणाध्यवसाय ' रूप से उसका आरोप होता है । इस ( अर्द्धपश्चमाकार ) का अध्यवसाय ही स्वलक्षणा-ध्यवसाय ' कहा जाता है, क्योंकि विकल्प का इसी रूप से आरोप होता है । यह ( अपोह ) अन्यव्यावृत्ति स्वभाव का है, अर्थात् इसका स्वभाव है कि अपने विषय को अन्यों से भिन्न रूप में समझावे । एवं भाव और अभाव दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान रूप से रहना भी इसका स्वभाव है । क्योंकि ' गौरस्ति ' और ' गौर्नास्ति ' इन दोनों ही प्रकार के प्रयोग होते हैं । यदि यह केवल भाव रूप ही होता, तो फिर पुनरुक्ति के कारण ' गौरस्ति ' यह प्रयोग सम्भव न होता । ' गौर्नास्ति ' यह प्रयोग भी नहीं हो सकता, क्योंकि अस्तित्व और नास्तित्व दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । इसी प्रकार इसको केवल अभाव रूप ही मानें तो ' गोर्नास्ति ' यह प्रयोग पुनरुक्ति के कारण नहीं हो सकेगा और ' गौरस्ति ' यह प्रयोग विरोध के कारण असम्भव होगा । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-१ " यतः घट सत् है अतः ' घटोऽस्ति ' यह प्रयोग ठीक नहीं है, ( क्योंकि इससे पुन-रुक्ति होती है ) । ' घटो नास्ति ' यह प्रयोग भी ठीक नहीं है, क्योंकि ( घटशब्द से बोध्य ) सत्त्व और ( नास्तिशब्द से बोध्य ) असत्त्व दोनों परस्पर विरोधी हैं । " इसी ( अर्द्धपञ्चमाकार ) से विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । यही सभी विकल्पों का विषय है, और इसी की एकता से सभी विकल्पों में भी एकता की प्रतीति होती है । विकल्पों के एकत्व से ही उसके कारणीभूत एवं प्रत्येक पिण्ड १. यह श्लोक मुद्रित पुस्तक में ' घटो नास्तीति वक्तव्यम् ' इस प्रकार से मुद्रित है । किन्तु विषय विवेचन की दृष्टि से ' घटोऽस्तीति न वक्तव्यम् ' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है । यह पाठ पाठान्तरों की सूची में भी है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भावानुवादसहितम् न्यायकन्दली ७६१ रणानां प्रतिपिण्डभाविनां निर्विकल्पकानामप्येत्कवम् । तेषामेकत्वाच्च तत्कार-: णानां व्यक्तीनामेकत्वावगमः । यथोक्तम् -एकप्रत्यवमर्षस्य हेतुत्वाद् धीरभेदिनी । एकधहेतुभावेन व्यक्तीनामप्यभिन्नता ॥ इति । एतदप्ययुक्तम् विकल्पानुपपत्तेः । विकल्पाकाराणां भेदाग्रहणादारोपि-तमैक्यं सामान्यमाचक्षते भिक्षवः । अत्र ब्रमः । किमाकाराणां भेदाग्रहण-मेवाभेदसमारोपः? आहोस्विदभेदग्रहणमभेदारोपः? न तावदाद्यः कल्पः, भेद-समारोपितस्यापि प्रसङ्गात् । यथा विकल्पाकाराणां भेदो न गृह्यते, तद्व-दभेदोऽपि न गृह्यते । तत्र भेदाग्रहणादभेदारोपवदभेदाग्रहणाद् भेदारोपस्यापि प्रसक्तावभेदोचितव्यवहारप्रवृत्त्ययोगात् । अभेदग्रहणमभेदारोप इत्यपि न युक्तम्, आत्मवादे एको ह्यनेकदर्शी तेषां भेदाभेदौ प्रत्येति । नैरात्म्यवादे त्वेको-S नेकार्थद्रष्टा न कश्चिदस्ति, विकल्पानां प्रत्येकं स्वाकारमात्रनियतत्वात् । अस्तु में उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञानों में भी एकता की प्रतीति होती है । निर्विकल्पक ज्ञानों की इस एकता से ही उनके कारणीभूत विभिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-एकत्व ज्ञान के कारण ही परस्पर विभिन्न व्यक्तियों में अभेद बुद्धि उत्पन्न होती है, एवं उस एकत्वविषयक बुद्धि को हेतु होने से ही व्यक्तियों में अभिन्नता होती है । ( उ ० ) यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि इस पक्ष के सम्भावित सभी विकल्प अनुप पन ठहरते हैं । विकल्प के आकारों में जो परस्पर भेद है, उस भेद के अज्ञान से उनमें जिस एकत्व का आरोप होता है, उसे ही भिक्षुगण ' सामान्य ' कहते हैं । इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का पूछना है कि -- ( १ ) आकारों के भेद का जो अग्रह क्या वही अभेद ( एकत्व ) का आरोप है? या ( २ ) अभेद के ग्रहण को ही अभेद का आरोप कहते हैं? ( १ ) इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें तो जिन व्यक्तियों में परस्पर भेद निश्चित है, उन दोनों में भी अभेद व्यवहार की आपत्ति होगी । दूसरी बात यह है कि, जिस प्रकार विकल्प के आकारों में भेद का ज्ञान नहीं होता है, उसी प्रकार उन आकारों में जो अभेद है, उसका भी भान नहीं होता है । इस स्थिति में भेद के अज्ञान से अभेद के आरोप की तरह अभेद के अज्ञान से भेद का आरोप भी होगा । फिर विकल्प के आकारों में अभेद व्यवहार की कथित रीति अयुक्त हो जाएगी । ( २ ) ' अभेद का ग्रहण ही अभेद का आरोप है ' यह पक्ष भी ठीक नहीं है, क्योंकि ' आत्मवाद ' में अनेक विषयों का एक द्रष्टा स्वीकृत है, अतः उस पक्ष में एक ही पुरुष विकल्पों के भेद और अभेद दोनों ६६ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्यनिरूपण-वाऽनेकार्थदर्शी कश्चिदेकस्तथाप्येकं निमित्तमन्तरेण भिन्नेष्वाकारेषु नाभेदग्रह-णमस्ति । भवद्वा गवाश्वमहिषाद्याकारेष्वपि भवेदविशेषात् । गवाकारेष्वप्यगो-व्यावृत्तिरेकं निमित्तमस्तीति चेत्? के पुनरगावो यद्वद्यावृत्त्या गवाका रेष्वेकत्व-मारोप्यते? ये गावो न भवन्ति तेऽगाव इति चेत्? गावः के? ते येऽगावो न भवन्तीति चेत्? गवाश्वस्वरूपे निरूपिते तद्वद्यावृत्तत्वेनागवां स्वरूपं निरूप्यते, अगवां स्वरूपे निरूपिते तद्वयावृत्त्या गवां स्वरूपनिरूपणमित्येकाप्रतिपत्तावि-तराप्रतिपत्तेरुभयाप्रतिपत्तिः । यथाह तत्रभवान् -' सिद्धश्च गौरपोह्येत गोनिषेधात्मकश्च सः । को क्रमशः समझ सकता है । किन्तु ' नैरात्म्यवाद ' में अनेक वस्तुओं को देखनेवाला कोई एक पुरुष स्वीकृत नहीं है, क्योंकि विकल्प केवल अपने अपने आकार मात्र में पर्यवसित हैं । अनेक वस्तुओं के एक द्रष्टा को यदि स्वीकार भी कर लें, फिर भी अनेक वस्तुओं में अभेद की प्रतीति तब तक नहीं हो सकती, जब तक उन अनेक वस्तुओं में रहनेवाले किसी एक निमित्त को न मान लिया जाय । बिना एक किसी पदार्थ को माने भी यदि उक्त अभेद की प्रतीति मानें तो गो, महिष प्रभृति आकारों में भी उक्त एकत्व की प्रतीति होगी, क्योंकि दोनों में कोई अन्तर नहीं है । ( प्र ० ) गो के सभी आकारों में ' अगोव्यावृत्ति ' ( गोभिन्नभिन्नत्व ) रूप एक धर्म के रहने से सभी गोव्यक्तियों में एकत्व का आरोप होता है? ( उ ० ) ' अगो ' शब्द से कौन सब वस्तुएँ अभिप्रेत हैं, जिनकी व्यावृत्ति के कारण सभी गो व्यक्तियों में एकत्व का आरोप करते हैं? ( प्र ) गायों से भिन्न जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे ही प्रकृति में ' अगो ' शब्द से अभिप्रेत हैं? उ ०) ' गो ' कौन सी वस्तु है? यदि यह कहें कि ( प्र ० ) वे ही गो हैं, जो गोभिन्न वस्तुओं से भिन्न है? ( उ ० ) तो फिर गो, अश्व प्रभृति वस्तुओं का स्वरूप जब ज्ञात होगा, तब तद्भिन्नत्व रूप से ' गो ' के स्वरूप का निर्णय होगा । एवं ' अगो ' के स्वरूप का जब निर्णय होगा, तब उनकी व्यावृत्ति से गो के स्वरूप का निर्णय होगा । इस प्रकार इस ( अपोहवाद के ) पक्ष में एक के बिना दूसरे की प्रतिपत्ति न होने के कारण फलतः ' गो ' और ' अगो ' दोनों का ज्ञान ही असम्भव होगा । जैसा कि इस प्रसङ्ग में ' तत्रभवान् ' कुमारिलभट्ट ने कहा है कि-( किसी प्रमाण के द्वारा ) सिद्ध ' अगो ' से ही सभी गोव्यक्ति में व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो सकती है । किन्तु ' अगो ' वस्तुतः गो का निषेध रूप है । किन्तु यह निर्वचन करना पड़ेगा कि ' अगो ' शब्द में प्रयुक्त ' नन् ' के द्वारा जिसका निषेध किया जाता है, वह ' गो ' पदार्थ क्या है? १. यह पद्य श्लोकवार्त्तिक का है । मुद्रित न्यायकन्दली में इसका पाठ For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् न्यायकन्दली तत्र गौरेव वक्तव्यो नञा यः प्रतिषिध्यते । गव्यसिद्धे त्वगौर्नास्ति तदभावे तु गौः कुतः ॥ इति ७६३ अथान्यापोहः शब्दार्थोऽनारोपितबाह्यत्वम्? तत्राप्युच्यते, कोऽयमपोहो नाम? किमगोरपोहो भावोऽभावो वा? यदि भावः, स कि गोपिण्डस्वभावोऽथा-गोपिण्डात्मकः? गोपिण्डात्मकत्वे तावदस्यासाधारणता, न चासाधारणात्मकेऽथ शब्दप्रवृत्तिरित्युक्तम् । अगोपिण्डात्मकेऽप्ययमेव दोषो दूषणान्तरं चैतदधिकम् । यद् गोशब्दस्य गौरित्ययमर्थो न प्राप्नोति । यदि तु पिण्डव्यतिरिक्तमनेक-साधारणं वस्तुभूतमपोहतत्त्वमिष्यते? शब्दमात्रविषया विप्रतिपत्तिः । अथापोहो s-न्यव्यावृत्तिरूपत्वादभावस्वभाव इष्यते? तदास्य प्रत्ययत्वेन ग्रहणं न स्यात्, ज्ञानजनकस्यैव ग्राह्यलक्षणत्वात् । अभावस्य च समस्तार्थक्रियाविरहलक्षण-( फलतः ) गो की सिद्धि के बिना ' अगो ' को सत्ता सिद्ध नहीं की जा सकती । एवं ' अगो ' की सिद्धि के बिना ( तद्वयावृत्तिबुद्धि के विषय ) गो की सत्ता ही किस प्रकार सिद्ध की जा सकती है? ( प्र ० ) अपोह शब्द के द्वारा आरोपित बाह्यत्व से भिन्न किसी ऐसे अर्थं का बोध होता है जिसका बाह्यत्व रूप से आरोप न हो । ( उ ० ) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि ' अगो ' का यह ' अपोह ' कोन सी वस्तु है? भाव रूप है? अथवा अभाव रूप इस है? यदि भाव रूप है ' तो फिर प्रसङ्ग में पूछना है कि ( यह भाव रूप अपोह ) गो व्यक्तिस्वभाव का है? अथवा ' अगो ' व्यक्तियों के स्वभाव का है । यदि उसे ' गोव्यक्ति ' स्वरूप मानें, तो यह अपोह ' असाधारण ' ( एक मात्र पुरुषग्राह्य ) होगा । पहिले कह चुके हैं कि असाधारण अर्थ में शब्द की प्रवृत्ति नहीं होती है । यदि ' अगो ' पिण्ड स्वरूप माने तो फिर उक्त असाधारण्य रूप दोष तो है । ही, यह दोष और अधिक है कि ' गो ' शब्द से ' गो ' रूप अर्थ का ग्रहण नहीं होगा । यदि सभी गो पिण्डों में रहनेवाला अथ च गोपिण्डों से भिन्न कोई ' भाव ' पदार्थ ही ' अपोह ' हो तो फिर हम दोनों का विवाद ' सामान्य ' शब्द और ' अपोह ' शब्द के प्रसङ्ग में ही रह जाएगा । यदि अपोह को अन्यव्यावृत्ति रूप होने के कारण अभाव रूप मानें, तो फिर विज्ञानत्व रूप से उसका ग्रहण न हो सकेगा, क्योंकि विज्ञान वही है जो किसी ज्ञान का जनक हो । किसी भी अर्थक्रिया के सामर्थ्य से शुन्य को ही ' अभाव ' कहते हैं । इस प्रकार अभाव रूप अपोह में किसी शब्द की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । ( अपोह में शब्दों की प्रवृत्ति मान लेने पर भी ) श्रोता को उस शब्द ' सिद्धश्च गौरपोह्यत ' इस प्रकार है । किन्तु विषयविवेचन की पोह्येत ' ऐसा पाठ उचित है । चौखम्भा से मुद्रित श्लोकवात्तिक में तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । T दृष्टि से ' सिद्धश्चागौर-ऐसा ही पाठ है भी । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir II न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ सामान्यनिरूपण-त्वात् । न च प्रत्यक्षागृहीतेऽर्थे सङ्केतग्रहणमस्तीत्यभावे शब्दस्याप्रवृत्तिरेव । न च तस्मिन् प्रतीयमाने श्रोतुरर्थविषया प्रवृत्तिः स्यात् भावाभावयोर-न्यत्वादसम्बन्धाच्च । स्वलक्षणात्मकत्वेनाभावप्रतीताव विवेकेन स्वलक्षणे प्रवृत्तिरिति चेत्? ' दृश्य विकल्प्यावर्थावेकीकृत्यातत्सन्निवेशिभ्यो भ्रान्त्या प्रतिपत्तिः प्रतिपत्तॄणाम् इति । तदयुक्तम् । अप्रतीते तदात्मकतया अभाव समारोपानुपपत्तेः । न च श्रोतुस्तदानीमर्थप्रतिपत्तिरस्ति शब्दस्यातद्विषयत्वात् प्रमाणान्तरस्याभावात् । अस्ति च शब्दादर्थे प्रवृत्तिस्तस्मान्नाभावोऽपि शब्दार्थः । न चान्यदेकं निमित्तं किञ्चिदस्ति । सर्वमिदमर्थजातं परस्परव्यावृत्तं प्रतिक्षणमपूर्वमपूर्व-मनुभूयमानं न शब्दात् प्रतीयते । नापि प्रत्यक्षाप्रतीतमपि हानोपादानविषयो भवेत्, अपरिज्ञातसामर्थ्यत्वात् । अस्ति च शाब्दो व्यवहारः अस्ति च प्राण-से किसी भी भावार्थ में प्रवृत्ति नहीं होगी, क्योंकि ( घटादि ) भाव और उनमें रहनेवाला ( अपोह रूप ) अभाव दोनों भिन्न हैं । एवं परस्पर विरोधी होने से अपोह एवं घटादि पदार्थ दोनों का सम्बन्ध भी सम्भव नहीं है । ( प्र ० ) घटादि की स्वलक्षणा प्रतीति और अपोह की प्रतीति दोनों में भेद बुद्धि न रहने के कारण ( अपोह के वाचक घटादि शब्दों से घटादिविषयक ) प्रवृत्तियाँ होती हैं । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-' दृश्य अर्थ और समारोपित अर्थ जो वस्तुतः परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, उन दोनों को एक समझकर ही सुननेवाले की तद्विषयक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । ' ( उ ० ) किन्तु यह कहना भी अयुक्त है । अज्ञात वस्तु ( भाव ) में अभिन्न रूप से अभाव ( अपोह ) का आरोप भी नहीं किया जा सकता । उस समय ( शब्द को सुनने के बाद ) श्रोता को अर्थ का ज्ञान नहीं है, क्योंकि शब्द प्रामाणिक ( गवादि ) अर्थों का बोधक प्रमाण नहीं है | एवं उस समय शब्द को छोड़ दूसरा प्रमाण उपस्थित भी नहीं है । किन्तु शब्द से ( घटादि ) अर्थों में प्रवृत्ति होती है । अतः ( घटादि शब्दों के घटत्वादि रूप से घटादि भाव हो अर्थ हैं, अपोह रूप से ) अभाव नहीं । ( घटत्वादि ) सामग्रियों को छोड़कर शब्दों का कोई एक ( प्रवृत्ति ) निमित्त नहीं है । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि जितने भी अर्थ उत्पन्न होते हैं वे सभी परस्पर भिन्न हैं, और प्रतिक्षण नये नये ही उत्पन्न होते हैं, और उन्हीं अर्थों का शब्द से अनुभव होता है । एवं ( सामान्य के न मानने पर ) प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात व्यक्तियों में प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होगी, ( किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात व्यक्ति के सजातीय ) उन १. यहाँ मुद्रित पाठ को यथावत् मानना उचित नहीं जान पड़ता । अतः “ दृश्यविकल्प्यौ ” इसके पहिले ' यथोक्तम् ' इतना अधिक जोड़कर, एवं ' प्रतिपत्तिः ' इसके स्थान में ' प्रवृत्तिः ' ऐसा पाठ मानकर अनुवाद किया गया है । ये दोनों ही पाठभेद नीचे के पाठभेदों में भी मुद्रित हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] अन्तेषु भवा भाषानुवादसहितम् अथ विशेषपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७६५ अन्त्याः, स्वाश्रयविशेषकत्वाद् विशेषाः । अन्त ' ' में अर्थात् नित्य द्रव्यों में रहने के कारण इसको ' अन्त्य ' कहते हैं । एवं अपने आश्रय को अपने से भिन्न पदार्थों से अलग रूप में न्यायकन्दली प्रत्यक्ष पूर्विका हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था लोकयात्रा । सेव च भिन्नासु व्यक्तिषु सामान्यमेकं व्यवस्थापयति । यद्विषयाः शब्दात् प्रत्ययाः प्रवृत्तयश्चोपलभ्यन्ते, तज्जातीयत्वेन तदर्थक्रियोपयोग्यतां विनिश्चित्यापूर्वा-वगतेऽप्यर्थे लोकः प्रवर्तत इति । भिन्नेष्वनुगताकारा बुद्धिर्जातिनिबन्धना । अस्या अभावे नैवेयं लोकयात्रा प्रवर्तते ॥ इति । इति भट्टश्रीश्रीधरविरचितायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥ –:: अप्रत्यक्ष व्यक्तियों में भी प्रवृत्ति और निवृत्ति होती है । किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात अर्थ का शब्द से व्यवहार होता है, एवं सभी प्राणियों में प्रत्यक्ष से होनेवाली हित की प्राप्ति के लिए प्रवृत्ति और अहित की निवृत्ति से ही ' लोकयात्रा ' का निर्वाह देखा जाता है । यह ' लोकयात्रा ' ही भिन्न व्यक्तियों में एक जाति को सिद्ध करती है । ( लोकयात्रा के निर्वाह में सामान्य की उपयोगिता इस प्रकार है कि ) जिस शब्द से जिस विषय को समझकर प्रवृत्ति होती है, उस जाति के और व्यक्तियों में भी केवल उस जाति के होने के नाते ही उस कार्य की क्षमता का बोध हो जाता है । इससे प्रथमतः ज्ञात उस जाति के दूसरे विषयों में भी लोक प्रवृत्त होता है । तस्मात् — भिन्न व्यक्तियों में एक आकार की प्रतीति जाति से ही होती है । अतः इसके न मानने पर ' लोकयात्रा ' का निर्वाह न हो सकेगा । भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित पदार्थों के बोध को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका का सामान्य निरूपण समाप्त हुआ । -: 0: -न्यायकन्दली
चतुर्युगचतुविद्या चतुर्वर्णविधायिने ।
नमः पञ्चत्वशून्याय चतुर्मुखभृते सदा ॥
सत्यादि चारों युगों, आन्वीक्षिकी प्रभृति चारों विद्याओं, ब्राह्मणादि चारों वर्णों की रचना करनेवाले और स्वयं चार मुखवाले ब्रह्मा जी को प्रणाम करता हूँ, जो इस प्रकार चतुष्ट्व संख्याओं से युक्त होने के कारण पश्चत्व ' शून्य हैं ( ' अन्तेषु भवा अन्त्याः ' यह वाक्य विशेष पदार्थ की अर्थात् मृत्यु से रहित हैं ) । व्याख्या के लिए लिखा गया For Private And Personal