प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि — पृष्ठ 841–850
प्रशस्तपाद भाष्य - पदार्थधर्म सङ्ग्रह - न्यायकन्दली टीका - प्रशस्तपाद मुनि · पृष्ठ 841–850
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ७६६ पहिले ही दे चुका हूँ । www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir न्याय कन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण-प्रशस्तपादभाष्यम् For Private And Personal विनाशारम्भरहितेषु नित्यद्रव्येष्वण्वाकाशकाल देगात्ममनस्तु प्रतिद्रव्य-मेकैकशो वर्तमाना अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतवः । यथास्मदादीनां समझने के कारण इसे ' विशेष ' कहते हैं । सभी प्रकार के परमाणु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन ये सभी द्रव्य यतः उत्पत्ति और विनाश से रहित हैं, अतः इन सबों में ' विशेष ' की सत्ता माननी पड़ती है । क्योंकि इनमें से प्रत्येक को अपने सजातीयों और विजातीयों से भिन्न रूप में न्यायकन्दली विशेषव्याख्यानार्थमाह - अन्तेषु भवा अन्त्या इति । उत्पादविना-शयोरन्तेऽवस्थितत्वादन्तशब्दवाच्यानि नित्यद्रव्याणि तेषु भवाः स्थिता इत्यर्थः । स्वाश्रयस्य सर्वतो विशेषकत्वाद् भेदकत्वाद् विशेषाः । एतद् विवृणोति - विनाशा-रम्भरहितेष्वित्यादिना । विनाशारम्भर हितेष्वित्यन्त्यपदस्य विवरणम् । अत्यन्त-व्यावृत्तिबुद्धिहेतव इति च स्वाश्रयस्य विशेषकत्वादित्यस्य विवरणम् । प्रतिद्रव्य-मेकैकशो वर्तमाना इति । द्रव्यं द्रव्यं प्रत्येकैको विशेषो वर्तत इत्यर्थः । एकेनैव विशेषेण स्वाश्रयस्य व्यावृत्तिसिद्धेरनेकविशेषकल्पनावैयर्थ्यात् । यथा चेदं विशेषाणां लक्षणं भवति तथा पूर्वं व्याख्यातम् । सिद्धे विशेषसद्भावे तेषां लक्षणाभिधानं युक्तं नासिद्धे, इत्याशङ्कय विशेषाणां सद्भावं प्रतिपादयितुं ग्रन्थमवतारयति - यथेत्यादिना । यथा है । ( ' अन्त्येषु भवा अन्त्याः ' इस व्युत्पत्ति से निष्पन्न ' अन्त्य ' शब्द में जो ) ' अन्त ' शब्द है, उससे नित्यद्रव्य अभिप्रेत हैं, क्योंकि वे उत्पत्ति और विनाश के अन्त में रहते हैं । ' तेषु भवा अन्त्याः ' अर्थात् विशेष नित्य द्रव्यों में ही रहते ' विशेष ' इसका नाम इस अभिप्राय से रक्खा गया है कि यह अपने आश्रय को और सभी वस्तुओं से अलग करता है । ' विशेष ' पद का यही विवरण ' विनाशारम्भरहितेषु ' इत्यादि से किया गया है | उक्त वाक्य का ' विनाशारम्भ रहितेषु ' यह अंश ' अन्त्य ' पद का विवरण है, और ' अत्यन्तव्यावृत्तिहेतवः ' यह अंश ' स्वाश्रयस्य विशेषकत्वात् इस वाक्य का विवरण है । ' प्रतिद्रव्यमेकैकशो वर्त्तमानाः ' अर्थात् प्रत्येक ( नित्य ) द्रव्य में एक एक विशेष है । एक नित्य द्रव्य में एक ही विशेष पदार्थ की कल्पना करते हैं, क्योंकि एक ही विशेष को स्वीकार कर लेने से हो उसके आश्रय द्रव्य में और सभी पदार्थों की व्यावृत्ति बुद्धि उत्पन्न हो जाएगी । अतः एक द्रव्य में अनेक विशेषों की कल्पना व्यर्थ है । ' अन्त्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्त्तका विशेषाः ' विशेष का यह लक्षण जिस प्रकार उपपन्न होता है इसका विवरण पहिले विशेष पदार्थ की स्वतन्त्र सत्ता में प्रमाण दिखला कर बाद में उसका लक्षण कहना उचित है, उससे पहिले नहीं । अतः विशेष पदार्थ की सत्ता में प्रमाण दिखलाने के लिए ही ' यथा ' इत्यादि सन्दर्भ का अवतार हुआ है । अभिप्राय यह है कि
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७६७ गवादिष्वश्वादिभ्यस्तुल्या कृतिगुणक्रियावयवसंयोगनिमित्ता प्रत्ययव्या-वृत्तिर्दृष्टा, गौः शुक्लः शीघ्रगतिः पीनककुद्मान् महाघण्ट इति । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां नित्येषु तुल्याकृतिगुणक्रियेषु समझानेवाला ( अत्यन्त व्यावृत्ति - बुद्धि का ) कोई दूसरा कारण नहीं है । जिस प्रकार हम साधारण जनों को गो में अश्व से कुछ सादृश्य के रहते हुए भी विशेष आकृति, विशेष गुण, विशेष प्रकार की क्रिया, एवं अवयवों के विशेष प्रकार के संयोगों के कारण ( गो में अश्व से ) ये व्यावृत्ति-प्रत्यय होते हैं कि ' यह गो है, ( अश्व नहीं, क्योंकि यह ) विशेष प्रकार का शुक्ल है, यह विशेष प्रकार से दौड़ता है, या इसका ककुद् बहुत न्यायकन्दली गवादिष्वश्वाविभ्यस्तुल्याकृतिनिमित्ता गौरिति गुणनिमित्ता शुक्ल इति क्रिया-निमित्ता शीघ्रगतिरिति अवयवनिमित्ता पीनककुद्मानिति, संयोगनिमित्ता महाघण्ट इति, अस्मदादीनां प्रत्ययव्यावृत्तिर्दृष्टा । तथास्मद्विशिष्टानां योगिनां तुल्याकृतिगुणक्रियेषु तुल्याकृतिषु तुल्यगुणेषु तुल्यक्रियेषु परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः प्रत्याधारमयमस्माद् विलक्षण प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति तेऽन्त्या विशेषाः । ( योगियों से भिन्न ) साधारण पुरुषों को सभी गो व्यक्तियों में समान आकृति के कारण उनसे भिन्न अश्वादि सभी पदार्थों से भिन्नत्व ( व्यावृत्ति ) की प्रतीति होती है । एवं उसी गो में ' शुक्ल ' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि शुक्लवर्ण रूप गुण के कारण होती है । उसी गो में ' यह शीघ्र चलनेवाला है ' इस आकार की व्यावृत्तिबुद्धि ' शीघ्रचलन ' रूप क्रिया के कारण होती है । ' इसका ककुद् बहुत स्थूल है ' इस आकार की व्यावृत्ति-बुद्धि ककुद् रूप अवयव के कारण होती है, एवं ' यह बड़ा घण्टावाला है ' इस प्रकार की व्यावृत्तिबुद्धि घण्टा के संयोग के कारण होती है । इसी प्रकार अस्मदादि से विशेष सामर्थ्य वाले योगियों को मादृश साधारण जनों से अत्यन्त दिव्यदृष्टि रूप वैशिष्ट्य के कारण समान आकृतिवाले, समान गुणवाले एवं समान क्रियावाले परमाणुओं में, मुक्त आत्माओं में और उनके मनों में जो परस्पर व्यावृत्ति की बुद्धियाँ होती हैं, आकृति भेद ( गुणभेदादि ) उनके कारण नहीं हो सकते । अतः ( यह कल्पना करनी पड़ती है कि कथित परमाणु प्रभृति ) प्रत्येक आधार में ' यह इससे विभिन्न प्रकार का है इस आकार की व्यावृत्ति बुद्धि जिन कारणों से होती है वे ही ' विशेष ' हैं । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण-प्रशस्तपादभाष्यम् परमाणुषु मुक्तात्ममनस्सु चान्यनिमित्तासम्भवाद् येभ्यो निमित्तेभ्यः बड़ा है, या इसके गले में बहुत बड़ा घण्टा है । इसी प्रकार हम लोगों से सर्वथा उत्कृष्ट योगियों को सभी परमाणुओं में नित्य एवं समान आकृति के रहते हुए भी यह परमाणु उस परमाणु से भिन्न है ' इस प्रकार की व्यावृत्ति की प्रतीति जिस कारण से होती है, वही ' विशेष ' है । मुक्त आत्माओं में सर्वथा न्यायकन्दली यथास्मदादीनां गवादिव्यक्तिषु प्रत्ययभेदो भवति, तथा परमाण्वादिष्वपि शिनां परस्परापेक्षया प्रत्ययभेदेन भवितव्यम्, व्यक्तिभेदसम्भवात् । न चास्य व्यक्तिभेद एव निमित्तम् । तदुपलम्भेऽपि स्थाण्वादिषु संशयदर्शनात् । निमित्ता-न्तरं च नास्ति, आकृतेर्गुणस्य क्रियायाश्च तुल्यत्वात् । न च निनिमित्तः प्रत्ययभेदो दृष्टः, तस्माद् यदस्य निमित्तं स विशेष इति । देशविप्रकर्षेण काल-विप्रकर्षेण च दृष्टाः परमाणवः कस्यचित् प्रत्यभिज्ञाविषयाः सामान्यविशेषत्त्वाद् घटादिवत् । न च पूर्वदृष्टेऽर्थे प्रत्यभिज्ञानं विशेषावगतिमन्तरेण भवति, अतोऽस्ति तस्य निमित्तं विशेषः । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार हम जैसे साधारण जनों को गो प्रभृति व्यक्तियों विभिन्न प्रकार की प्रतीतियाँ होती हैं, क्योंकि वे व्यक्तियां परस्पर विभिन्न होती हैं । इसी प्रकार परमाणु प्रभृति व्यक्तियों में भी परस्पर भेद रहने के कारण उन्हें प्रत्यक्ष देखनेवाले योगियों को उनमें से प्रत्येक में परस्पर व्यावृत्ति - बुद्धि होनी ही चाहिए । परमाणु प्रभृति में योगियों के इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण उनका परस्पर भेद नहीं हो सकता । क्योंकि स्थाणु प्रभृति में पुरुषादि का भेद उपलब्ध होने पर इत्यादि संशय ही होते हैं । योगियों की उन व्यावृत्ति - बुद्धियों ' अयं स्थाणुः पुरुषो वा ' का कोई दूसरा कारण उपलब्ध नहीं होता है, क्योंकि परमाणु प्रभृति की आकृति और क्रिया प्रभृति समान है, ( अतः उनसे यहाँ व्यावृत्ति -बुद्धि उपपन्न नहीं हो सकती ) । बिना विशेष कारण के प्रतीतियों की विभिन्नता कहीं उपलब्ध नहीं होती । तस्मात् योगियों की उन व्यावृत्ति - बुद्धियों के जो कारण हैं वे ही ' विशेष ' हैं । ( इस प्रसङ्ग में यह अनुमान भी है कि ) जिस प्रकार परसामान्य और विशेष अपर सामान्य से युक्त होने के कारण किसी व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा घटादि ज्ञात होते हैं, उसी प्रकार एवं उन्हीं हेतुओं से विभिन्न स्थानों और विभिन्न समयों में देखे गये परमाणु भी किसी की प्रत्यभिज्ञा के द्वारा ही ज्ञात होते हैं । किसी ' विशेष ' ज्ञान के बिना पहिले देखी हुई वस्तु का प्रत्यभिज्ञान नहीं हो सकता, अतः परमाण्वादि विषयक प्रत्यभिज्ञानों का जो असाधारण कारण है, वही ' विशेष ' है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra प्रकरणम् ] 819 www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७६६ भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् पुनरन्त्यविशेषमन्तरेण प्रत्यभिज्ञानं च न्यायकन्दली For Private And Personal प्रत्याधारं विलक्षणोऽयं विलक्षणोऽयमिति प्रत्ययव्यावृत्तिः, देशकालविप्रकर्षे च परमाणौ स एवायमिति प्रत्यभिज्ञानं च भवति, विशेषाः । यदि योगिनां योगजाद धर्मात् धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः योगजाद् साम्य के रहते हुए भी ' यह आत्मा उस आत्मा से भिन्न है ' इस आकार की व्यावृत्ति प्रतीति जिस हेतु से होती है वही ' विशेष ' है । इसी प्रकार सभी मनों में परस्पर सादृश्य के रहते हुए भी योगियों को जिस कारण से ' यह मन उस मन से भिन्न है ' इस आकार की व्यावृत्ति - बुद्धि उत्पन्न होती है वही ' विशेष ' है । इसी प्रकार विभिन्न समयों में या विभिन्न देशों में रहनेवाले परमाणुओं में भी ' यह वही है ' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा योगियों को जिन हेतुओं से होती है, वे अन्त्यों में रहनेवाले विशेष ' ही हैं । योग से उत्पन्न केवल विशेष प्रकार धर्म से ही योगियों की व्यावृत्ति की उक्त प्रतीति अत्र चोदयति - यदि पुनरिति । यथा योगजधर्मसामर्थ्याद् योगिना-मतीन्द्रियार्थदर्शनं भवति, तथा विशेषमन्तरेणैव प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च भविष्यतीति चोदनार्थः । समाधत्ते - नैवमिति । यथा योगिनामशुक्ले शुक्लप्रत्ययो न भवति, अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानं न स्यात् । यदि स्यात्? मिथ्याप्रत्ययो भवेत् । यदि पुन: ' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । आक्षेप करनेवालों अभिप्राय है कि जिस प्रकार योग से उत्पन्न विशेष धर्म रूप विशेष सामर्थ्य के कारण योगियों को परमाण्वादि अतीन्द्रिय विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है, उसी विशेष सामर्थ्य के द्वारा योगियों को उक्त व्यावृत्तिबुद्धि और उक्त प्रत्यभिज्ञान दोनों ही हो सकते हैं, इसके लिए विशेष पदार्थ की कल्पना अनावश्यक है । ' नैवम् ' इत्यादि से इसी का समाधान करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार योगियों को भी अशुक्ल द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति नहीं होती है, उसी प्रकार पहिले बिना देखी हुई वस्तु की प्रत्यभिज्ञा योगियों को भी नहीं हो सकती । यदि होगी ( योगियों को शुक्ल में अशुक्ल की प्रतीति और अज्ञात वस्तु की प्रत्यभिज्ञा यदि होगी ) तो वह मिथ्या ही होगी । अतः योगियों को कथित परमाण्वादि में उक्त परस्पर यावृत्ति को प्रतीति ' विशेष ' पदार्थ को माने बिना केवल योगजनित विशेष धर्म से नही हो सकती । योगज धर्म से योगियों के अतीन्द्रिय अर्थों के ज्ञानों में भी योगजधर्म के अतिरिक्त विषयादि निमित्तों की अपेक्षा होती है ।
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७७० न्यायकन्दलीसंचलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ विशेषनिरूपण-स्यात्? ततः किं स्यात्? नैवं भवति । यथा न योगजादू धर्माशुक्ले शुक्लप्रत्ययः सञ्जायते, अत्यन्तादृष्टे च प्रत्यभिज्ञानम् । यदि स्यान्मिथ्या भवेत् । तथेहाप्यन्त्य विशेषमन्तरेण योगिनां न योग-जादू धर्मात् प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं वा भवितुमर्हति । अथान्त्य विशेषेष्विव परमाणुषु कस्मान्न स्वतः प्रत्ययव्यावृत्तिः कल्प्यत इति चेत्? न तादात्म्यात् । इहातदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो और प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार शुक्ल रूप से शून्य द्रव्य में शुक्ल की प्रतीति एवं पहिले से न देखे हुए वस्तुओं में प्रत्यभिज्ञा ये दोनों ही योगियों को भी नहीं होती हैं, यदि हों तो वे मिथ्या ही होंगी । इसी प्रकार कथित स्थलों में भी व्यावृत्ति प्रतीतियाँ और प्रत्यभिज्ञ! ये दोनों बिना अन्त्य - विशेष के केवल योगजनित उत्कृष्ट धर्म से योगियों को भी नहीं हो सकतीं । ( प्र ० ) यह कल्पना क्यों नहीं करते कि अन्त्य - विशेषों की तरह उक्त परमाणुओं में भी व्यावृत्ति प्रतीतियाँ स्वतः ( बिना और किसी न्यायकन्दली तथा अन्त्यविशेषमन्तरेण प्रत्ययव्यावृत्तिः प्रत्यभिज्ञानं च न भवितुमर्हति । योगजाद् धर्मादतीन्द्रियार्थदर्शनं न पुनरस्मानिनिमित्त एवं प्रत्ययो भविष्य-तीत्यभिप्रायः । पुनश्चोदयति - अथान्त्यविशेषेष्विति । न तावदन्त्यविशेषेष्वपि विशेषान्तरसम्भवोऽनवस्थानात् । यथा च तेषु विशेषान्तरमन्तरेण स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिर्भवति योगिनां तथा परमाणुष्वपि भविष्यति? कि विशेषकल्पन-येत्यत्रोत्तरमाह - नेति । यत्त्वयोक्तं तन्न, कुतस्तादात्म्यात् । एतदेव विवृणोति - इहेति । ' अथान्त्यविशेषेषु ' इत्यादि ग्रन्थ से इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् कथित ' अन्त्यविशेषों ' में दूसरे ' विशेष ' की कल्पना करने पर ) अनवस्थादोष होगा । यह जो सम्भावना नहीं है, क्योंकि ( ऐसी आक्षेप किया गया है कि विशेषों में दूसरे विशेषों के न रहने पर भी जैसे कि स्वतः उनमें परसर व्यावृत्ति - बुद्धि योगियों को होती है. वैसे ही परमाणु प्रभृति में स्वतः ही व्यावृत्ति बुद्धि होगी । इसके लिए ' विशेष ' नाम के स्वतन्त्र पदार्थ को मानने की क्या आवश्यकता हैं? उसी ( आक्षेप ) के समाधान के लिए ' न ' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् तुमने जो आक्षेप किया है वह ठीक नहीं है, क्योंकि परमाणु प्रभृति में ' परस्पर तादात्म्य ' है । इसी ' तादात्म्य ' हेतु का For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७७१ भवति यथा घटादिषु प्रदीपात्, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वं तद्योगादन्येषाम, तथेहापि तादात्म्यादन्त्य विशेषेषु स्वत एव प्रत्ययव्यावृत्तिः, तद्योगात् परमाण्वादिष्विति । इति प्रशस्तपादभाष्ये विशेषपदार्थः समाप्तः । --:: -कारण के ही ) होंगी । ( उ ० ) यह नहीं हो सकतीं, क्योंकि परमाणु में परमाणु का तादात्म्य है । जो वस्तु जिस स्वरूप का नहीं है, उस वस्तु में उक्त अन्य वस्तु की बुद्धि उस वस्तु से भिन्न वस्तु रूप कारण से ही उत्पन्न होती है, जैसे कि घटादि की प्रतीति प्रदीप से होती है, किन्तु प्रदीप की प्रतीति के लिए दूसरे प्रदीप की अपेक्षा नहीं होती । जिस प्रकार गो और अश्व के मांसों में अशुचित्व स्वतः ( बिना किसी और सम्बन्ध के ही ) है, किन्तु उनसे सम्बद्ध वस्तुओं में उसी के सम्बन्ध से अशुचित्व होता है । उसी प्रकार यहाँ भी अन्त्य - विशेषों में तादात्म्य से अर्थात् और किसी के सम्बन्ध के बिना ही व्यावृत्ति प्रतीति होती है, किन्तु परमाणुओं में अन्त्यविशेष के सम्बन्ध से ही व्यावृत्ति प्रतीति होती है । प्रशस्तपाद भाष्य में विशेष का निरूपण समाप्त हुआ । 10: 1 न्यायकन्दली अतदात्मकेष्वन्यनिमित्तः प्रत्ययो भवति, न तदात्मकेषु । यथा घटादिष्वप्रकाश-स्वभावेषु प्रदीपादेः प्रकाशस्वभावात् प्रकाशो भवति, न तु प्रदीपे प्रदीपान्तरात् प्रकाशः किन्तु स्वत एव । यथा गवाश्वमांसादीनां स्वत एवाशुचित्वम्, स्प्रष्टुः विवरण ' इह ' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अभिप्राय यह है कि जिन दो वस्तुओं में तादात्म्य नहीं है, उनमें से एक में अन्य दूसरे के सम्बन्ध के लिए अन्य कारण की अपेक्षा होती है । जो अभिन्न हैं उनमें से किसी में सम्बन्ध के लिए दूसरे की अपेक्षा नहीं होती है । जैसे कि घटादि प्रकाश - स्वभाव के नहीं हैं ( प्रकाश के साथ उनका तादात्म्य नहीं है ) अतः घट में प्रकाश के लिए प्रकाश स्वभाव के प्रदीप रूप अन्य पदार्थ की अपेक्षा होती है । किन्तु प्रदीप के प्रकाश के लिए किसी दूसरे प्रदीप की अपेक्षा For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् न्यायकन्दली [ विशेषनिरूपण-प्रत्यवायकरत्वं तद्योगात् । तत्सम्बन्धादन्येषामशुचित्वम् । तथेहापि तादात्म्या-दत्यन्तव्यावृत्तिस्वभावत्वादन्त्य विशेषेषु स्वत एव स्वरूपादेव प्रत्ययव्या-वृत्तिर्न विशेषान्तरसम्भवात् । अतदात्मकेषु तु परमाणुषु सामान्यधर्मकेषु विशेषयोगादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्युक्ता न स्वरूपमात्रादिति ।
नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु ।
प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥
इति श्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलोटीकायां विशेषपदार्थः समाप्तः ॥ ----:: -नहीं होती है, क्योंकि प्रदीप में स्वतः प्रकाश होता है । इसी प्रकार गो, अश्व प्रभृति के मॉस अपने तो वे स्वतः ‘ अशुचि ' हैं, किन्तु निषिद्ध मांसों को छूनेवाले पुरुष में प्रत्यवाय की कारणता उन ( मांसों ) के स्पर्श से आती है । एवं उस पुरुष से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं में जो अशुचिता होगी, उसका कारण उन वस्तुओं के साथ उस पुरुष का सम्बन्ध है । इसी प्रकार प्रकृत में भी अत्यन्तव्यावृत्ति स्वभाव के अन्त्य - विशेषों में व्यावृत्ति प्रत्यय ' स्वतः ' अर्थात् उनके अत्यन्तव्यावृत्ति स्वभाव के कारण ही होता है । इसके लिए दूसरे विशेष के सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं है । ' अतदात्मक ' अर्थात् एक सामान्य धर्मवाले परमाणुओं में जो व्यावृत्तिबुद्धि होगी उसके लिए उनमें विशेष पदार्थ का सम्बन्ध ही कारण है । उसको उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती । एक साधारण धर्म से युक्त सभी नित्य द्रव्यों में से प्रत्येक में परस्पर भेद ( व्यावृत्ति ) के लिए, उनमें से प्रत्येक में अलग विशेष का मानना आवश्यक है, क्योंकि वे ही उनमें व्यावृत्ति बुद्धि के कारण हैं । भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित एवं पदार्थों के सम्यक् ज्ञान में समर्थ न्याय-कन्दली नाम की टीका का विशेषनिरूपण समाप्त हुआ । 1: 0: 1 १. यहाँ ' न विशेषान्तरसम्भवात् ' इसके स्थान में ] ' न विशेषान्तरसम्बन्धात् ' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है, अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है । For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् अथ समवायपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः ७७३ सम्बन्ध इह-समवायः । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषाणां प्रत्यय हेतुः स कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानां वाऽयुतसिद्धानामाधार्याधार-एक आश्रय एवं दूसरा आश्रित इस प्रकार के दो अयुतसिद्धों का जो सम्बन्ध ' यह ( आश्रित ) यहाँ ( आश्रय में ) है ' इस प्रकार के प्रत्यय का कारण हो, वही सम्बन्ध ' समवाय ' है ( विशदार्थ यह है कि ) द्रव्य गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन सभी पदार्थों ( में से जो दो वस्तु यथा-सम्भव ) कार्यकारणभावापन्न हों अथवा स्वतन्त्र ही हों किन्तु अयुतसिद्ध न्याय कन्दली
अन्तर्ध्वान्तभिदे विश्वसंहारोत्पत्तिहेतवे ।
निर्मलज्ञानदेहाय नमः सोमाय शम्भवे ॥
समवायनिरूपणार्थमाह - अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां कार्यकारणभूता-नामकार्यकारणभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः । तदेतत्कृतव्याख्यान-मुद्देशावसरे । के ते अयुत सिद्धा येषां सम्बन्धः समवायो भवेत्? अत आह—- द्रव्यगुण-कर्मसामान्यविशेषाणामिति । कार्यकारणभूतानामकार्यकारणभूतानामिति नियम-कथनम् । अवयवावयविनामनित्यद्रव्यतद्गुणानां नित्यद्रव्यतत्समवेतानाम-नित्यगुणानां कर्मद्वतां कार्यकारणभूतानां समवायः, नित्यद्रव्यतद्गुणानां सामान्य-अन्तःकरण के मालिन्य को समूल नाश करनेवाले, एवं विश्वको उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु एवं विशुद्ध विज्ञान रूप शरीरवाले ( क्षित्यादि आठ मूर्तिक शिवों में से ) सोममूर्ति स्वरूप भगवान् शम्भु को मैं प्रणाम करता हूँ । ' अयुत सिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इहप्रत्ययहेतुः स समवायः ' यह गया है । इस पङ्क्ति की व्याख्या इसी ग्रन्थ सन्दर्भ समवाय के निरूपण के लिए लिखा के उद्देश प्रकरण में कर दी गयी है । ' अयुत सिद्ध ' कौन कौन से पदार्थ हैं? जिनका सम्बन्ध समवाय होगा? इसी प्रश्न का उत्तर ' द्रव्यगुणकर्मसामान्य-विशेषाणाम् ' इत्यादि से दिया गया है । इस वाक्य में ' किन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है ' इस प्रसङ्ग में ' नियम ' को दिखलाने के लिए ' कार्यकारणभूतानामकार्यकारण-भूतानाम् ' यह वाक्य लिखा गया है । उक्त वाक्य के ' कार्यकारणभूतानाम् ' इस पद के द्वारा यह नियम दिखलाया गया है कि कारणों में कार्य का समवाय होता है, अर्थात् कार्य-कारणभावापन्न वस्तुओं में से अवयव रूप कारणों में से अवयवी रूप कार्य का, एवं अनित्य द्रव्यरूप कारण और उनमें होनेवाले गुणों का एवं नित्य द्रव्य और उनमें उत्पन्न होनेवाले गुणों का एवं क्रियाश्रय और क्रिया का ही समवाय सम्बन्ध होता है । एक For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir ७७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् प्रशस्तपादभाष्यम् [ समवाय निरूपण-भावेनावस्थिताना मिहेदमिति बुद्धिर्यतो भवति यतश्चासर्वगताना-मधिगतान्यत्वानामविष्वग्भावः स समवायाख्यः सम्बन्धः । कथम् १ यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः सम्बन्धे सति दृष्टः, तथेह तन्तुषु हों, एवं आधार आधेय रूप हों उन दोनों में से एक ( आधेय ) का दूसरे ( आधार में ) ' यह यहाँ है ' इस आकार का प्रत्यय जिससे हो वही ( सम्बन्ध ) ' समवाय ' है । ( एवं ) नियमित देश में ही रहनेवाले एवं परस्पर भिन्न रूप में ज्ञात होनेवाले दो वस्तुओं की स्वतन्त्रता जिस सम्बन्ध से जाती रहे वही ( सम्बन्ध ) ' समवाय ' है । ( प्र ० ) इस सम्बन्ध की सत्ता में प्रमाण क्या है जिस ( उ ० ) ( यह अनुमान प्रमाण है कि ) न्यायकन्दलो तद्वतामन्त्यविशेषतद्वतां चाकार्यकारणभूतानां समवायोऽयुत सिद्धानामिति नियमः । एवमाधार्याधारभावेनावस्थितानामित्यपि नियम एव । इहेदमिति बुद्धिर्यतः कारणाद् भवति यतश्चासर्वगतानां नियतदेशावस्थितानामधिगतान्यत्वानामधिग-तस्वरूपभेदानामविष्वग्भावोऽपृथग्भावोऽस्वातन्त्र्यं स समवायः, भिन्नयोः परस्परो-पश्लेषस्य सम्बन्धकृतत्वोपलम्भात् । एतदेव कथमित्यादिना प्रश्नपूर्वकमुपपा. दयति - यथा इह कुण्डे दधीति प्रत्ययः कुण्डदघ्नोः सम्बन्धे सति दृष्टः, दूसरे का कार्य या कारण न होते हुए भी जिन वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध होता है वे हैं सामान्य ( जाति ) और उनके आश्रय एवं अन्त्यविशेष और उनके आश्रय । ( इनमें भी समवाय सम्बन्ध होता है ) । समवाय के ये कार्यकारणभूत और अकार्यकारण-भूत प्रतियोगी और अनुयोगी यतः ' अयुतसिद्ध ' हैं, अतः यह ' नियम ' उपपन्न होता है - समवाय अयुत सिद्धों का ही सम्बन्ध है । इसी प्रकार ' आधार्याधारभावेनावस्थितानाम् ' यह वाक्य भी नियमार्थक ही है । अर्थात् यतः विभिन्न दो वस्तुओं में विशेष्यविशेषण-भाव की प्रतीति किसी सम्बन्ध से ही होती है अतः ' इहेदम् ' यह प्रतीति जिस कारण के द्वारा होती है ( वही समवाय है ), एवं जिसके द्वारा अव्यापक अथवा नियत आश्रय में रहनेवाले उन वस्तुओं में जिनमें कि परस्पर भेद पहिले से ज्ञात है, अर्थात् जिनके अलग अलग स्वरूप ज्ञात हैं उन्हें ' अविष्वग्भाव ' अर्थात् अपृथगभाव फलतः अस्वा-तन्त्र्य जिसके द्वारा हो वही ' समवाय ' है । क्योंकि वस्तुओं का उक्त " अविष्वग्भाव ' किसी सम्बन्ध से ही देखा जाता है । यही बात ' कथम् ' इस वाक्य के द्वारा प्रश्न कर ' यथेह कुण्डे ' इत्यादि वाक्य से उत्तर रूप में कहते हैं । अर्थात् जिस प्रकार ' इस मटके में दही है ' इस आकार की प्रतीति मटका और दही के सम्बन्ध रहने पर ही देखी जाती हैं, उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है ' इस आकार की प्रतीति भी होती है । इससे समझते हैं कि तन्तु और पट ( प्रभृति अयुतसिद्धों ) में भी कोई सम्बन्ध For Private And Personal
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Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् प्रशस्तपादभाष्यम् ७७५ पटः, इह वीरणेषु कटः, इह द्रव्ये गुणकर्मणी, इह द्रव्यगुणकर्मसु सत्ता, इह द्रव्ये द्रव्यत्वम्, इह गुणे गुणत्वम्, इह कर्मणि कर्मत्वम्, इह नित्यद्रव्येऽन्त्या विशेषा इति प्रत्ययदर्शनादस्त्येषां सम्बन्ध इति ज्ञायते । न चासौ संयोगः, सम्बन्धिनामयुतसिद्धत्वात् अन्यतर-प्रकार इस ' मटके में दही है ' यह प्रतीति ( दधि और मटके में संयोग ) सम्बन्ध के रहते ही होती है, उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है, इन वीरणों ( तृणविशेषों ) में चटाई है, इस द्रव्य में गुण और कर्म हैं, द्रव्य गुण और कर्मों में सत्ता है द्रव्य में द्रव्यत्व है, गुण में गुणत्व है, कर्म में कर्मत्व है, इन नित्यद्रव्यों में विशेष है, इत्यादि प्रतीतियाँ भी होती हैं, अतः समझते हैं कि ( प्रतीति के विषय इन आधार और आधेय में भी ) कोई सम्बन्ध अवश्य है । कथित प्रतीतियों की उपपत्ति संयोग से नहीं हो सकती, क्योंकि उन प्रतीतियों में विशेष्य और विशेषण रूप से भासित होनेवाले प्रतियोगी और अनुयोगी अयुतसिद्ध हैं, एवं अन्यतर कर्म या उभयकर्म या विभाग उस सम्बन्ध के न्यायकन्दली तथेह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययानां दर्शनादस्त्येषां तन्तुपटादीनां सम्बन्ध इति ज्ञायते । इह तन्तुषु पट इत्यादिप्रत्ययाः सम्बन्धनिमित्तका अवधारित-प्रत्ययत्वात्, इह कुण्डे दधीतिप्रत्ययवत् । नन्वयं संयोगो भविष्यतीत्यत आह- न चासौ संयोग इति । असौ तन्तुपटादीनां सम्बन्धो न संयोगो भवति, कुतः? इत्यत्राह - सम्बन्धिनाम-अवश्य है । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार इस मटके में दही है ' यह निश्चयात्मक प्रतीति दही और कुण्ड में संयोग सम्बन्ध के रहने पर ही होती है, उसी प्रकार ' इन तन्तुओं में पट है ' इस प्रकार की निश्चयात्मक प्रतीति भी उन दोनों में किसी सम्बन्ध के कारण ही उत्पन्न होती है ( वही सम्बन्ध समवाय है ) । ( मटके और दही के संयोग की तरह ) ' तन्तुओं में पट है ' इत्यादि प्रतीतियों का नियामक सम्बन्ध भी संयोग ही होगा? इसी प्रश्न का उत्तर ' न चासौ संयोगः ' इत्यादि से दिया गया है । ' असो ' अर्थात् तन्तु और पट का सम्बन्ध, संयोग क्यों नहीं है? इसी प्रश्न का उत्तर ' सम्बन्धिनामयुत सिद्धत्वात् इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । अर्थात् संयोगसम्बन्ध युतसिद्ध वस्तुओं में ही होता है, और यह ( समवाय ) सम्बन्ध अयुतसिद्धों में होता है । क्योंकि संयोग अपने प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों में से एक के कर्म से होगा, या उक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों For Private And Personal