प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 1–10

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 1–10

पृष्ठ 1

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ॐ अथर्ववेदीय-प्रश्नोपनिषत् - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं. मोतीलाल शास्त्री वेदवीथीपथिक:

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ॐ अथर्ववेदीय -प्रश्नोपनिषत् - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं ० मोतीलाल शास्त्री वेद वीथीपथिकः राजस्थान पत्रिका प्रकाशन केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर -३०२००४

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अथर्ववेदीय-प्रश्नोपनिषत् - हिन्दीविज्ञानभाष्य पं. मोतीलाल शास्त्री वेदवीथीपथिकः ब्राह्मणो महान ब्रह्मवर्चसी राजस्तत्व शोध संस्थान मानवाश्रम विद्यापीठ जयपुर , मूल्य: १५० ) रुपये मात्र

पृष्ठ 4

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प्रकाशक-राजस्थान पत्रिका लिमिटेड, केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । © सर्वाधिकार - लेखकाधीन प्रथमावृत्ति -- अगस्त, १ ९९ ५ ग्रन्थ - प्राप्ति-पुस्तकालय, राजस्थान पत्रिका केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरू मार्ग, जयपुर । ने राजस्थान वैदिकतत्त्वशोध संस्थान " मानवाश्रम ", दुर्गापुरा रोड, जयपुर - ३०२०१८ मुद्रक-श्रीबालचन्द्र यन्त्रालय, ' मानवाश्रम ', दुर्गापुरा रोड़ जयपुर -१८

पृष्ठ 5

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पूज्यपाद विद्यावाचस्पति श्री मधुसूदन ओझा

पृष्ठ 6

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पृष्ठ 7

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प्रकाशकीय स्व ० पं ० मोतीलालजी शास्त्री के द्वारा निबद्ध वैदिक साहित्य के प्रकाशनक्रम में ' प्रश्नोपनिषत् हिन्दी विज्ञानभाष्य ' का प्रकाशन करते हुए मुझे अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है । इससे पूर्व स्व ० शास्त्रीजी के ईशोपनिषत्, केनोपनिषत्, मुण्डकोपनिषत्, माण्डूक्योपनिषत् पर हिन्दीभाष्य प्रकाशित हो चुके हैं । इनमें से ईश व केन पर तो हिन्दीभाष्य स्वयं शास्त्रीजी ने ही प्रकाशित करवा दिए थे । प्रश्नोपनिषत् प्रमुख उपनिषदों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपनिषत् है । स्व ० शास्त्रीजी ने इसे पिप्पलादोपनिषत् और प्राणोपनिषत् भी कहा है । इस उपनिषत् में कुल ६ प्रश्न हैं । जिनमें क्रमशः १- रयिप्राणात्मक परमेष्ठी महान् का, २- धिषणाप्राणात्मक सौर - विज्ञानात्मा का, ३ - प्रज्ञाप्राणात्मक चान्द्र प्रज्ञानात्मा का, ४- भूतप्राणात्मक पार्थिव प्राणात्मा का, ५ - श्रव्यक्तप्राणात्मक स्वायम्भुव अव्यक्तात्मा का तथा ६- षोडशकलावच्छिन्न पुरुषात्मा का बहुत विस्तार के साथ विवेचन किया गया हैं । प्राणविद्याप्रतिपादक यह उपनिषद्विज्ञानभाष्य स्व ० शास्त्रीजी के श्रेष्ठ भाष्यों में से एक कहा जा सकता है । स्व ० शास्त्रीजी द्वारा विरचित ग्रन्थों के प्रकाशन - कार्य्यं से जुड़े हुए प्रो ० मदनमोहन शर्मा ने प्रस्तुत ग्रन्थ के मूलपाठ -निर्धारण, भाषा - सम्पादन एवं मूल संस्कृत - श्रंशों के प्रामाणिक पाठ - निर्धारण में जो बहुमूल्य योगदान किया है, इसके लिए मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ । स्व ० शास्त्रीजी के सुपौत्र चि ० प्रद्युम्नकुमार शर्मा ने इस अत्यन्त दुरूह ग्रन्थ को व्यवस्थित करने, त्रुटित स्थानों को पूर्ण करने, अधूरे सन्दर्भों को ग्रन्थों से खोजकर यथास्थान लगाने, पाद-टिप्पणियों को देने आदि का जो कार्य निभाया है - उसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । श्री हीरालाल गहलोत मूलपाण्डुलिपि के सुपाठ्य पुनर्लेखन, प्रूफसंशोधन एवं सन्दर्भ - शोधन में सहायता प्रदान करने के लिए धन्यवाद के पात्र हैं । मैं आशा करता हूँ कि वेद - निष्ठ महानुभाव हमारे इस प्रयास से लाभान्वित होंगे । इसी आत्म-विश्वास के साथ-कृष्ण जन्माष्टमी वि ० सं ० २०५२ - कर्पूरचन्द्र ' कुलिश '

पृष्ठ 8

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पृष्ठ 9

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वेदवाचस्पति पं. मोतीलाल शास्त्री

पृष्ठ 10

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