प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 11–20

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 11 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रश्नोपनिषत् - हिन्दी विज्ञानभाष्य विषय - सूची विषय प्रथमप्रश्नः -१- रयिप्राणनिरूपणात्मक प्रथम प्रश्न ( रयिप्राणात्मको महानात्मा पारमेष्ठ्यः ) मूलपाठ विज्ञानभाष्य १ - मंगलाचरण रहस्य २ - अभिधानरहस्य ३ - अधिकारिस्वरूप रहस्य ४- उपनिषद्रहस्य द्वितीयप्रश्न: -२- धिषणाप्राणनिरूपणात्मक द्वितीय प्रश्न ( विषणाप्राणात्मको विज्ञानात्मा सौर:) मूलपाठ विज्ञानभाष्य १- प्राण स्तुति २ - अमृत प्राण का विकास [ * ] पृष्ठ संख्या ३ ५ m १५ १७ २४ ७३ ७५ ७७ १०२ १०४

पृष्ठ 12

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 12 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य तृतीयप्रश्नः -विषय ३ - प्रज्ञाप्राणनिरूपणात्मक तृतीय प्रश्न ज्ञाप्राणात्मक प्रज्ञानात्मा चाल ( प्रज्ञानात्मा चान्द्रः ) डी - का विषय - सूची पृष्ठ संख्या मूलपाठ विज्ञानभाष्य नाड़ी स्वरूप- परिचय चतुर्थ प्रश्न: -४ - भूतप्राणनिरूपणात्मक चतुर्थ प्रश्न -११३ ११५ १४५ ( भूतप्राणात्मकः प्राणात्मा पार्थिवः ) १६१ १६३ १६५ मूलपाठ विज्ञानभाष्य पञ्चमप्रश्नः -५ - श्रव्यक्तप्राणनिरूपणात्मक पश्चम प्रश्न ( अव्यक्त - प्राणात्मकोऽव्यक्तात्मा स्वायम्भुवः ) मूलपाठ विज्ञानभाष्य षष्ठप्रश्न: -१- प्रणवोंकारस्वरूपनिरूपणं - फलादेशश्च २ - अमृतोपक्रम स्थानीय उद्गीथोङ्कारोपदेशः १० ६ - षोडशी प्रजापतिनिरूपणात्मक षष्ठ प्रश्न ) 369 ( षोडशकलावच्छिन्नः पुरुषात्मा ) मूलपाठ विज्ञानभाष्य -२०७ २०६ २११ २३४ २३८ SIPPY २४१ २४३ कीकुमार-२४५ छक्क ( ६ )

पृष्ठ 13

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 13 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रश्नोपनिषत् के प्रतिपाद्य विषयों का सारसंक्षेप-' पिप्पलादोपनिषत् ' नाम से प्रसिद्ध षट् प्रश्नात्मिका इस उपनिषत् में प्राणविद्या प्रतिपादन के द्वारा ' अक्षरलक्ष्य ' की ओर सङ्कत हुआ है । आधिदैविक, आध्यात्मिक, आधिभौतिक, भेद से प्राण के मुख्य तीन विवत्तं हैं । प्रत्येक के असंख्य विवर्त्त हैं, जैसा कि को हि तद्वेद, यावन्त इमेऽन्तरात्मन् प्राणाः ' ( शत ० ब्रा ० ७।२।२।२० । ) निगम से स्पष्ट है । अनेकधा विभक्त इन प्राध्यात्मिक प्राणों के कोशभूत पाँच आध्यात्मिक प्राणों का ही इस प्राणोपनिषत् में विश्लेषरण हुआ है । ' यस्मिन् प्राणः पश्वधा संविवेश ' ( मुण्डकोपनिषत् ) के अनुसार आध्यात्मिक, अमृतात्मलक्षण ] षोडशीपुरुष में श्रव्यक्तप्राण, महत्प्रारण, विज्ञानप्राण, प्रज्ञानप्रारण, पशुप्रारण, भेद से पाँच प्राकृत प्राण प्रतिष्ठित हैं । इसी पञ्चप्राणसमष्टि का पूर्व के पारिभाषिक परिच्छेदों में ' विश्वसृट् ' नाम से विश्लेषण हुआ है एवं इन्हीं को ' प्राणः प्रापः - वाक्-अन्नं- अन्नादः ' कहते हुए इनकी समष्टि को ' ब्रह्मसत्य ' कहा गया है । इन पाँच मुख्य प्राणों के साथ एक एक भूतभाग प्रतिष्ठित रहता है । भूत ही प्राण की प्रतिष्ठा ( आलम्बन ) है । भूत - प्राण - भेद से दो कलामों में विभक्त पञ्चप्राणनिरूपण - पूर्वक पञ्चप्राणाधारभूत षोडशी पर विश्रान्ति ही उपनिषन्निकर्ष है । सुकेशा भारद्वाज, सत्यकाम शैब्य, सौर्य्यायण गार्ग्य, कौशल्य आश्वलायन, भार्गव वैदभि, कबन्धी कात्यायन, अछों बह्यसत्य ( प्राणपञ्चक ) जिज्ञासु समित्पाणि होकर प्राणविद्याचार्य्यं महर्षि पिप्पलाद के आश्रम में पहुँचते हैं और क्रमशः प्राणस्वरूप के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं । प्रश्नसम्बन्ध से यह उप-निषत् ' प्रश्नोपनिषत् ' पिप्पलादसम्बन्ध से ' पिप्लादोपनिषत् ' एवं प्राणप्रतिपादनसम्बन्ध से ' प्राणोपनिषत् ' कहलाई है । प्रथम प्रश्न में रयि - प्राणात्मक ' महत्प्रारण ' का दूसरे प्रश्न में धिषणाप्राणात्मक ' विज्ञानप्रारण ' का तीसरे प्रश्न में जाग्रत् - स्वप्न सुषुप्ति के अधिष्ठाता प्रज्ञा - प्राणात्मक ' प्रज्ञानप्राण ' का, चौथे प्रश्न में भूत-प्राणात्मक ' भूतप्रारण ' का, पाँचवें प्रश्न में अव्यक्त- प्राणात्मक ' श्रव्यक्तप्राण ' का निरूपण हुआ है । ये पाँचों प्राण ' अरा इव रथनामों के अनुसार नाभिस्थानीय षोडशकल पुरुष में ओत - प्रोत हैं । छठे प्रश्न में उसी पुरुषतत्त्व का विश्लेषण हुआ है । प्रथम प्रश्न में रयि - प्राणात्मक महत्प्राण के निरूपण के साथ - साथ अहोरात्र, पक्ष, मास, अयना-धिष्ठाता, उत्तरायण दक्षिणायनप्रवर्त्तक, पञ्चपाद, द्वादशाकृति, सप्तचक्रात्मक संम्वत्सरप्रजापति का तात्त्विक विश्लेषण हुआ है । द्वितीय प्रश्न में धिषणा - प्राणात्मक विज्ञानप्राणनिरूपण के साथ - साथ प्राणों के स्वाभाविक विघृति, प्रतिष्ठा, ज्योतिः- इन तीन धम्र्म्मो का विश्लेषण हुआ है । अनन्तर प्राण के अन्नादभाव का उपबृंहण करते हुए इसका सर्वाधिष्ठातृत्त्व सिद्ध किया गया । तीसरे प्रश्न में प्रधानरूप से प्रज्ञा - प्राणात्मक प्रज्ञानप्राण का निरूपण करते हुए सुप्रसिद्ध ' प्राण- उदान व्यान - समान- अपान ' इन पाँच वायव्य प्राणों की वैज्ञानिक मीमांसा हुई है । इसी में द्वासप्ततिसहस्र ( ७२००० ) नाड़ियों का [ ७ ]

पृष्ठ 14

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 14 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रतिपाद्य विषय स्वरूपपरिचय हुआ है । उद्गार, निमेष, उन्मेष, क्षुधा, पिपासा, जृम्भा, श्वयथु, कम्पन, गमन, रुदन, हसन आदि चेष्टाविशेषों की प्रतिष्ठारूप कृकल, घनञ्जय, देवदत्त, नाग आदि प्राण भी इसी प्रश्न के तात्त्विक विषय हैं । चतुर्थ प्रश्न में प्रधानरूप से भूत - प्राणात्मक मर्त्यप्राण ( भूतप्राण ) का विश्लेषण करते हुए एवं प्राणाग्निविवत्त की मीमांसा करते हुए कौन जागता है, कौन सोता है, कौन उभयधर्म्मा-वच्छिन्न है? - इत्यादि प्रश्नों का वैज्ञानिक समाधान किया है । पाँचवें प्रश्न में अव्यक्त प्राणात्मक ' अव्यक्तप्राण ' का प्रधानरूप से निरूपण करते हुए ' ओङ्कार ' की तात्त्विक व्याख्या हुई है । छठें प्रश्न में प्रधानतया षोडशकल पुरुष के निरूपण के साथ साथ पुरुष के क्षरभाग से उत्पन्न भूतसृष्टि का भी तात्विक विवेचन हुआ है । यही इसके प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त प्रदर्शन है । प्रश्न - १ - रवि - प्राणात्माधिकरणम् - रविप्राणात्मको महानात्मा पारमेष्ठ्यः प्रश्न- २ - धिवरणा- प्राणात्माधिकरणम् - धिषणाप्रारणात्मको विज्ञानात्मा सौरः प्रश्न- ३ – प्रज्ञा - प्राणात्माधिकरणम् – प्रज्ञाप्राणात्मकः प्रज्ञानात्मा चान्द्रः प्रश्न- ४ – भूत- प्रारणात्माधिकरणम् – भूतप्राणात्मकः प्राणात्मा पार्थिवः प्रश्न- ५ - अव्यक्त - प्रारणात्माधिकरणम् – श्रव्यक्त - प्रारणात्मकोऽव्यक्तात्मा स्वायम्भुवः प्रश्न- ६ - पुरुषात्माधिकरणम्- पुरुषात्मा - षोडशकलावच्छिन्नः -883-[ " ]

पृष्ठ 15

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 15 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथ अथर्ववेदीय-प्रश्नोपनिषत् ( पिप्पलादोपनिषत् - प्राणोपनिषत् ) हिन्दी विज्ञानभाष्य ( प्रारणविद्या- निरूपरणपरेयमुपनिषत् )

पृष्ठ 16

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 16 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 17

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 17 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ रयिप्राणनिरूपणात्मकः प्रथमः प्रश्नः १ १- परमेष्ठी - महान्

" यत् परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं ' महत् ' ।

सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरं नित्यं तत्त्वमेव त्वमेव तत् ” ॥

( कैवल्योप ० १।१६ ) “ प्राविः सन्निहितं गुहाचरं नाम महत् पदम् ” । ( मुण्डकोप ० २।२1१ )

पृष्ठ 18

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 18 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

D

पृष्ठ 19

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 19 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथ प्रश्नोपनिषदि -प्रथमः प्रश्नः “ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्ग स्तुष्टुवा सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ [ मूलपाठः ] ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौशल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदभिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥१ ॥

तान् ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं • संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥२ ॥

अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ भगवन्कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥

तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते ॥ रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥४ ॥

आदित्यो ह वै प्राणो रथिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्त चामृतं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥

[ ५ ]

पृष्ठ 20

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 20 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथम प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माष्य रयिप्राणनिरूपण प्रथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते यद्दक्षिणां यत्प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत्सर्वं प्रका-शयति तेन सर्वान्प्राणान् रश्मिषु संनिधत्ते ॥६ ॥

स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते ॥ तदेतदृचाभ्युक्तम् ॥७ ॥

विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ॥ सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥८ ॥

संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च ॥ तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते ॥ त एव पुनरा-वर्तन्ते तस्मादेते ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते ॥ एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ६ ॥

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभि-जयन्त एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव श्राहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ॥ श्रथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरपितमिति ॥ ११ ॥

मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥१३ ॥

अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४ ॥

[ ६ ]