प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 101–110
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 101–110
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण ब्रह्मा माना जाता है । वह हमारा यही याम्यप्राण है यही ब्रह्मा है । दूसरे तन्त्र का अध्यक्ष यही है । इसी से प्रजा निर्माण होता है । खून के संचार से सारे शरीर की पुष्टि होती है - मांसमेदादि का निर्माण होता है । उस रक्तशुद्धि का प्रधान केन्द्र हृदयस्थान है । इसी विज्ञान के आधार पर ' रक्त'-व ब्रह्माणं हृदि ध्यायेत् ' कहा जाता है । इसके बाद है - तीसरा तन्त्र । तीसरे तन्त्र के अध्यक्ष शिव हैं । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक तीसरा तन्त्र है । यहाँ पर सौम्यप्राणविशिष्ट आदित्यप्राण की सत्ता है । श्रादित्य सौरभाग होने से साक्षात् रुद्र है । ' असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गल: ' । ' अग्निर्वा रुद्र: ' - इत्यादि श्रुतिवचन आदित्यप्राणाग्नि को रुद्र बतलाते हैं । यह रुद्र उस सौम्यप्राण के सम्बन्ध से ' शिव ' बन जाता है । विना सोम के रुद्र-रुद्र है- विनाशक है । वही सोमसम्बन्ध से शिव है - रक्षक है । इस तीसरे मन्त्र के तन्त्रायी यही ज्ञानमूर्ति शिव हैं । यह ज्ञानप्रधान है, अतएव चेतना हृदय से ऊपर ही उल्बण है । ब्रह्मा क्रियाप्रधान है, अतः अन्नादि का परिपाकरूपा क्रिया हृदय के नीचे उदरस्थान में होती है । विष्णु अर्थप्रधान है, अतएव सारे अर्थ मूलाधार पर प्रतिष्ठित हैं । विष्णु पार्थिव है, ब्रह्मा भान्तरिक्ष्य है । शिव दिव्य है । तीन लोक हैं । तीन लोकी हैं । अग्नि, वायु, इन्द्र कहो; विष्णु, ब्रह्मा, शिव कहो एक ही बात है । कहीं - कहीं विष्णु की सत्ता नाभि में बतलाई जाती है एवं शिव की सत्ता ललाटप्रदेश में - भ्रू और घ्राण की सन्धि में बतलाई जाती है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । अर्थ, क्रिया, ज्ञान भेद से शरीर में तीन प्रजातन्त्र । तीनों के विष्णु, ब्रह्मा, शिव तीन प्रजापति हैं । ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ० ' के अनुसार प्रजापति प्रजातन्त्र के मध्य में रहता है । पहले तन्त्र में मूलाधार, नाभि, हृदय- तीन विभाग हैं । तीनों का केन्द्र नाभि है । प्रधानरूप से ( उक्थरूप से ) विष्णु यहीं रहते हैं । यहीं से नीला रस निकलकर सारे शरीर में जाता है । जिनमें यह नीला रस व्याप्त रहता है - वे शिराएँ कहलाती हैं । उनका निर्गम नामिद्वार से है । इसी श्रमिप्राय से- ' नीलवर्णं विष्णुं हृदि ध्यायेत् ' कहा जाता है एवं तीसरे तन्त्र में-हृदय, भ्रू सन्धि, ब्रह्मरन्ध्र - तीन विभाग हैं । इसमें भ्रू सन्धि केन्द्र है, अतएव शिव - सत्ता ललाटप्रदेश में बतलाई जाती है । इसी के पास ' भेजा ' है - यही प्राध्यात्मिक यज्ञ का पुरोडाश है । यह शुक्ल है । ज्ञान-ज्योति ज्योति होने से शुक्ल है, अतएव शिव के लिए ' श्वेतवर्णं शिवं ललाटे ध्यायेत् ' यह कहा जाता है । कहना यही है कि शरीर में पृथक् तीन तन्त्र हैं, तीनों के तीन तन्त्रायी हैं-१- अर्थतन्त्र २- क्रियातन्त्र - प्रपद से हृदय तक - ( अग्निः ) – विष्णुस्तन्त्रायी --- उदर से हृदय तक - ( वायुः ) -ब्रह्मा तन्त्रायी ३- ज्ञानतन्त्र -- हृदय सेब्रह्मरन्ध्र तक - ( इन्द्रः ) - शिवस्तन्त्रायी तीनों हैं- पृथक्, परन्तु तीनों का एकत्र समन्वय देखा जाता है । तीनों परस्पर बद्ध होकर काम कर रहे हैं । इन तीनों को परस्पर में बाँधने वाला कौन? वही परोरजा व्यापक प्राण । स्वयम्भूप्राण परोरजा है उसके सूत्र ने ( प्रारण से ) इसे एक सूत्र से बद्ध कर रक्खा है । यह प्राण भी [ ८७ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण प्राणवायु है । इसी सूत्र से वायुरूप ही है । आकाश - वायु, वाक् - प्राण एक ही बात है । परन्तु यह वायु सब बद्ध हैं । इसी अभिप्राय से तो- ' वायुर्वे गौतम तत्सूत्रम् ' इत्यादि कहा जाता है । विष्णु ब्रह्मा शिव ( मूल - हंस- शिव ) - ये तीनों आत्मप्रजापति हैं - अग्निरूप हैं । विष्णु अग्नि है । ब्रह्मा यम है । शिव आदित्य हैं । तीनों अग्नि सत्य हैं एवं तीनों की प्रजाभूत आप्य, वायव्य, सौम्य प्राण ऋत हैं । इस ऋत-भाग का वेष्टन स्वयम्भू के ऋतसूत्र ने कर रक्खा है, सत्यभाग का वेष्टन सत्यसूत्र ने कर रखा है । स्वयम्भूसत्य ने इन दोनों सूत्रों से शरीर, प्राण और आत्मा - तीनों को बद्ध कर रक्खा है । शरीर मूर्ति है । रयिरूप होने से यह ऋत है । तीनों देवता अग्निमय होने से सत्य हैं । दोनों उसके दोनों सूत्रों से बद्ध हैं । इसी ऋतसत्यविज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् व्यास कहते हैं ---" सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनि निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ” । ' पार्थिव प्राण को अपान कहा जाता है, आन्तरिक्ष्य प्राण को व्यान कहा जाता है । दिव्य प्राण को प्राण कहा जाता है । अपान, व्यान, प्राण- तीनों वे ही सुप्रसिद्ध आग्नेय, वायव्य, आदित्य प्राण हैं । तीनों का क्रमशः प्राप्य, वायव्य, सौम्यप्राण से सम्बन्ध है । पृथिवी पानी से बनी है, अतएव आप्यप्राण को हम पार्थिव अपान ( आग्नेय ) से बद्ध मानने के लिए तय्यार हैं । वायव्य प्राण अन्तरिक्ष्य है, अतएव अन्तरिक्ष्य वायव्यप्राण को हम प्रान्तरिक्ष्य व्यान ( याम्य ब्राह्म प्राणों ) से बद्ध मानने के लिए तय्यार हैं । ' विवि वै सोम श्रासीत् ' के अनुसार सौम्यप्राण दिव्यलोक की वस्तु है, अतएव हम इसे दिव्यस्थानीय प्राण ( आदित्यप्राण ) से बद्ध मानने के लिए तय्यार हैं । दूसरे शब्दों में सौम्यप्राण सौर आदित्यप्राण के अधीन है । वायव्यप्राण प्रान्तरिक्ष्य व्यान के अधीन है एवं प्राप्यप्राण पार्थिव प्राण के अधीन है । होना भी ऐसा ही चाहिए, क्योंकि अपान, व्यान, प्राण तीनों अग्नि हैं । श्राप्य, वायव्य, सोम्य तीनों सोम हैं । सोम अन्न है - अग्नि अन्नाद है । अन्न पर सदा अन्नाद की ही सत्ता रहती है । ' तद्यदा उभयं समागच्छति अत्तैवाख्यायते नाद्यम् ' इस सिद्धान्त के अनुसार अपान, व्यान, प्राण- तीनों के ग्रहण से ही - आप्य, वायव्य, सौम्य तीनों का ग्रहण कर लिया जाता है, श्रतएव श्रुति में इन तीनों का पृथक् उल्लेख कर केवल प्रपान व्यान प्राण को ही उद्धृत कर दिया जाता है । परन्तु तीनों के साथ इन तीनों का भी सम्बन्ध समझ लेना चाहिए-१ - अपान ( विष्णु ) २२- व्यान ( ब्रह्मा ) ३- प्राण ( शिव ) १ - श्रीमद्भागवतपुराण १०।२।२६ । ( आव्यप्राणयुक्त ) — अर्थशक्तिः - ( मूलात्मा ) - पृथिवी । ( वायव्य प्राणयुक्त – क्रियाशक्तिः -- ( हंसात्मा ) - अन्तरिक्षम् । ( ( सौम्यप्राणयुक्त ) – ज्ञानशक्तिः - ( शिवात्मा ) - द्यौः । [ ८ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषणाप्राणनिरूपण हमने बतलाया है कि अपानरूप आप्यप्राणयुक्त पार्थिव विष्णुरूप आत्मा प्रपद से घुसता है । इस विषय को विस्तारभय से अधिक नहीं बढाना चाहते । इसका विस्तृत विवेचन ऐतरेय आरण्यक में देखना चाहिए | अपान पार्थिव श्रग्निज्योति है । व्यान आन्तरिक्ष्य विद्युज्ज्योति है । प्राण दिव्य आदित्यज्योति है । इस पुरुष में ये ही तीन ज्योतिएँ हैं । इसी अभिप्राय से ऐतरेय कहते हैं— " पुरुषो ह वा अयं सर्व श्रान्दं द्वे विदले भवतः - इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणा-ss काशस्तस्मिन् ह श्रस्मिन्नाकाशे प्रारण ( व्यान ) श्रायत्तः - यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः । यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि एवमिमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि " ॥ ' यह है - पाँचों प्राणों की एक प्रकार की संस्था । अब दूसरी संस्था की ओर हम अपने वेदप्रेमी पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं— इन ६ ओं प्राणों का प्रजापति ' व्यूहन ' करते हैं । इस व्यूहन के कारण ही वे ६ ओं प्राण सर्वत्र व्याप्त हो जाते हैं । अब तक जिस संस्था का स्वरूप हमने बतलाया है उसे भूल जाइए एवं थोड़ी देर के लिए निम्नलिखित भिन्न संस्था के ऊपर दृष्टि डालिए-वही शरीर आपके सामने है । पैरों से कटिभाग तक का भाग अलग निकाल दीजिए । ऊपर के दोनों हाथ अलग निकाल दीजिए । नीचे के दोनों पैर और ऊपर के दोनों हाथ पक्ष हैं । मध्य का घड़-आत्मा है । मस्तक श्री है । पुच्छभाग प्रतिष्ठा है । दो पक्ष, धड़, चित्यप्रजापति है । अग्नि के ही क्रमिक चिनाव से यह शरीर बना है । घड़ में अग्नि के चार भाग हैं । दो भाग पक्षों में हैं । एक भाग पुच्छ में है | सातों चित्याग्नियों की समष्टि ही सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति है । इसका अमृतभाग शिर है । बस, धड़ - पुच्छ - शिर- इन तीन को छाँट लीजिए एवं पक्षरूप हाथ - पैरों को छोड दीजिए । शेष भाग में उन ६ नों प्राणों को बैठाइए । शरीर गायत्राग्नि से बना है । गायत्राग्नि के आठ अक्षर हैं । आठ अवान्तर प्राण हैं । ' प्रादेशमितः प्राणः ' - इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक प्राण प्रादेशमात्र ( १०३ अंगुल ) का है । इस प्रकार शरीर में कुल आठ प्रादेश हो जाते हैं । ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ तक एक प्रादेश है | कण्ठ से हृदय तक दूसरा प्रादेश है । हृदय से नाभि तक तीसरा प्रादेश है । नाभि से मूलद्वार तक चौथा प्रादेश है । शेष चार प्रादेश पैरों तक विभक्त हैं । इनमें से नीचे के चार प्रादेश छोड दीजिए एवं मूलद्वार से ब्रह्मरन्ध्र तक के चार प्रादेश ले लीजिए । इन चारों प्रादेशों में हमें ६ ओं प्राणों की सत्ता बतलानी है । मूलद्वार, नाभिद्वार, हृदयद्वार, कण्ठद्वार, ब्रह्मरन्ध्रद्वार भेद से इन चार प्रादेशों में प्रधानरूप से पांच द्वार हैं । इनमें मूलद्वार से हृदयद्वार तक तो वही हमारे सुप्रसिद्ध पूर्वपरिचित १- ऐ ० आ ० ३।१।२ । [ 5 ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण कण्ठद्वार तक बाप्यप्राण और प्रपानप्राण प्रतिष्ठित हैं । यह रविप्राण का पहला युग्म है । नाभि से और दिव्यप्राण वायव्यप्राण और व्यानप्राण प्रतिष्ठित हैं एवं हृदयद्वार से ब्रह्मरन्ध्र तक सौम्यप्राण विभिन्नयुग्म प्रतिष्ठित हैं । इस प्रकार दो दो प्रादेशों में ( २१ - २१ अंगुल में ) एक एक रविप्राण के इस प्रकार के की सत्ता सिद्ध हो जाती है । पहला- तीसरा, दूसरा- चौथा तीसरा पांचवा चोथा छठा में अन्धिबन्धन सम्बन्ध को ही ' ब्यून ' कहा जाता है । इस सम्बन्ध में एक दूसरे के सूत्र तक का रहने परस्पर वाले वायव्य - व्यान रहता है । इसी व्यूहन के कारण पार्थिव प्राप्य, प्रपान नाभि से कण्ठ से कण्ठ तक रहने वाले वायव्य से युक्त हैं एवं हृदय, से ब्रह्मरन्ध्र तक रहने वाले सौम्य, प्राण नाभि अनुग्राहक है । इसीलिए तो व्यानसे ' युक्त हैं । मध्य का व्यान, पार्थिव अपान, दिव्यप्राण दोनों का इसके लिए -'मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ' - यह कहा जाता है । रवि प्राण १ - मूलद्वार से हृदय तक -२- नाभि से कण्ठ तक आप्यत्राणयुक्त - वायव्यप्राणयुक्त पान ( पार्थिव प्राण ) — ज्यान ( प्रान्तरिक्ष्य प्राण ) आपः, अग्नि वायु, यम ३- हृदयसे -ब्रह्मरन्धतक सौम्यप्राणयुक्त - प्राण ( दिव्य प्राण ) - सोम धावित्य व्यवस्था में ब्रह्म-यह है इन ६ प्राणों की दूसरे प्रकार की त्रैलोक्य व्यवस्था इस दूसरी प्रादेश में अन्तरिक्षलोक है । हृदय रन्ध्र से हृदय तक दो प्रादेश में द्युलोक है । कण्ठ से नाभि तक त्रिलोकी दो के व्यूहन से इस दूसरी त्रिलोकी से मूलद्वार तक दो ही प्रादेश में पृथिवीलोक है । पहली व्यूहन होता है । इस व्यूहन से मूलद्वार से का स्वरूप बनता है । अब इस दूसरी त्रिलोकी का भी फिर अग्नि पृथिवी है, अन्तरिक्ष-ब्रह्मरन्ध्र तक पाँच प्रकार का त्रैलोक्य उत्पन्न हो जाता समष्टि है । पार्थिवभूतमय त्रैलोक्य है । अध्यात्म में इनकी समष्टि वायु अन्तरिक्ष है । दिव्य इन्द्रलोक है । इन तीनों की है । हम कह चुके हैं कि व्यूहन पञ्चमा विभक्त है, अतएव हम पांच त्रिलोकिऍ मानने के लिए तय्यार चाहिए । पहले मस्तक की ओर से में एक दूसरे की कड़ी मिली रहती है, वही क्रम यहाँ समझना प्रारम्भ कीजिए । द्वार यही है । यही मूर्द्धा १- मूर्द्धाभाग यो है इसमें इन्द्र रहता है । सौरप्राण का आगमन अभि अन्तरिक्ष है । ललाट से शिरोगुहा द्वार, नान्दनद्वार, विरति यादि नामों से प्रसिद्ध है ललाट स्थान अन्तरिक्ष है । यहीं साम्ब सदाशिव प्रेत है । मस्तक में तालु से नीचे खाली स्थान है । खाली है एवं कपटी ( कनपटी ) पृथिवी ( शिवप्राणात्मक वायु ) रहता है । यही इस त्रैलोक्य का अन्तरिक्ष है । शब्द वाग्जन्य है । वाह अग्नि है । करणं शब्दमय है । धोत्र के साथ ही शब्द का सम्बन्ध यही होता है कि ज्वरावस्था में कनपटियें अत्यन्त है । कर्णपटी पर इसकी सत्ता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मग्निस्थान है । अग्नि शरीर में गर्म हो जाती हैं, मड़कने लगती है; क्योंकि यह स्वाभाविक कहा जाता है । चूंकि कर्णपटी अग्निमय है; मूल वस्तु है, अतएव कर्णपटीस्थान को मम्मस्थान ' इस त्रैलोक्य को ' पृथिवीलोक ' कहने के अग्निस्थान पृथिवीलोक है, अतएव हम अवश्य ही इसे [. ] बाक्
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण लिए तय्यार हैं । कर्णपटी पृथिवी है - इसमें आप्यप्राणयुक्त पार्थिव भ्रपान ( अग्नि ) है । ललाटोपलक्षिता शिरोगुहा अन्तरिक्ष है । इनमें वायव्यप्राणयुक्त व्यान ( यमाग्नि ) है । मूर्खोपलक्षित ब्रह्मरन्ध्र द्यु है । इसमें सौम्य प्राणयुक्त प्राण ( आदित्येन्द्र ) है । यही प्राणापानव्यानात्मिका पहली त्रिलोकी है । ॥ १ ॥
२ - कर्णपटी से नीचे चक्षु है । ' यथाऽसौ दिवि श्रादित्यः, एवमिदं शिरसि चक्षुः " के अनुसार आदित्यप्राणरूप चक्षुरिन्द्रय द्युलोक है । यह सौम्यप्राणयुक्त श्रादित्यप्राण से युक्त है । इसीलिए तो इसमें रूपप्रत्यक्ष करने की शक्ति है । चक्षु के नीचे नासिका है । यही श्वास - प्रश्वासरूप वायुस्थान है, अतएव हम इसे अवश्य ही अन्तरिक्ष कहने के लिए तय्यार हैं । नासा के नीचे वाक् ( जिह्वा ) है | ' अग्निर्वाक् ( जिह्वा ) भूत्वा मुखं प्राविशत् ' के अनुसार जिल्ह्वा सचमुच अग्निरूपा है, अतएव हम इसे अवश्य ही पृथिवीलोक कहने के लिए तय्यार हैं । इसमें आप्यप्राणयुक्त श्रपानप्राण की सत्ता है- यही दूसरी त्रिलोकी है ॥। २ ॥ ३ - मुख द्युलोक है । इसमें सौम्यप्राणयुक्त प्रादित्यप्राण की सत्ता है । ग्रीवोपलक्षित कण्ठनलिका अन्तरिक्ष है । इसमें वायु का संचार होता है । इसमें वायव्यप्राणयुक्त व्यान की सत्ता है एव उरःस्थल ( वक्षःस्थल ) पृथिवी है । इसमें प्राप्यप्राणयुक्त प्रपान की सत्ता है - यही तीसरी त्रिलोकी है ॥। ३ ॥ ४ - कण्ठ द्युलोक है । जैसे मूलाधार में अपान है, हृदय में व्यान है तथैव कण्ठ में प्राण है । प्राण इन्द्र है | इन्द्रस्थान द्युलोक है, अतएव हम अवश्य ही कण्ठ को द्युलोक कहने के लिए तय्यार हैं । उर: स्थान अन्तरिक्ष है | हृदयस्थान वैश्वानराग्नि के सम्बन्ध से पृथिवी है - यही चौथी त्रिलोकी है ॥। ४ ॥ ५- ' प्रारणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' के अनुसार प्राणात्मक प्रज्ञान का नाम ' इन्द्र ' है । यह हृदयस्थान में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव हम हृदय को ' द्युलोक ' मानने के लिए तय्यार है एवं उदर - उदरगुहारूप होने से अन्तरिक्ष है ही । स्वयं मूलाधार के पृथिवी होने में सन्देह किया ही नहीं जा सकता । यही पाँचवीं व्यूढत्रिलोकी है ॥। ५ ॥ संभव है -विज्ञान से अपरिचित साधारण मनुष्य इन त्रिलोकी व्यवस्थानों को कोरी कल्पना समझें । भले ही वे समझा करें, परन्तु जिस दिन वे इस रहस्य को समझेंगे उस दिन उन्हें ये व्यवस्थाएँ १- ऐत ० प्रा ० ३।१।२ । [ ११ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य धिषणाप्राणनिरूपण अवश्य ही माननी पड़ेंगी । जैसे महादशा, दशा, अन्तरदशा, सूक्ष्मदशा, सूक्ष्मान्तरदशा आदिरूप से परमाणु तक दशाभोग होता है, एवमेव महात्रिलोकी, त्रिलोकी, भवान्तरविलोकी आदिरूप से एक परमाणु में भी त्रैलोक्यभोग होता है । जर्रे जर्रे से तीनों लोकों के प्राणों की ( कहीं उन्मुग्धरूप से कहीं उद्बुद्धरूप से ) सत्ता है । जहाँ तीनों प्राण हैं वहाँ अवश्य ही त्रैलोक्यस्यवस्था बतलाई जा सकती है । वह महा प्रजापति त्रैलोक्य - प्रजापति जिस प्रक्रिया से छोटे से छोटे पदार्थ में भी तीनों लोकों से युक्त होता हुआ घुस पड़ता है - वही प्रक्रिया ' व्यूहन ' नाम से प्रसिद्ध है । हमने तो पाँच ही व्यूहन बतलाए हैं । यदि इनका भी विचार किया जाय तो प्रत्येक व्यूहन में फिर अवान्तर अनेक व्यूहन हो सकते हैं जिनकी सत्ता मानने में किसी भी वैज्ञानिक को जरा भी आपत्ति नहीं हो सकती । प्रत्यक्ष है एक हाथ से लो-हाथ अर्थमात्रा है । उसमें क्रिया है ज्ञान है । कांटा चुभोने से पीड़ा का अनुभव होता है । हाथ में गर्मी है । रक्तादिसंचाररूपा किया है । हाथ स्वयं अर्थ है अर्थभाग अग्निमयी पृथिवी है, क्रियाभाग लो वायुमय अन्तरिक्ष है, ज्ञानभाग इन्द्रमय चुलोक है । हाथ ही का चाहे शरीर का एक परमाणु से उसमें भी आपको त्रैलोक्य व्यवस्था मिलेगी-यह ' यदेवेह लदमुन पदमुत्र तदविह इस हमारे श्रोत - सिद्धान्त से कौन अपरिचित होगा? पर प्राण अनेकरूप से अध्यात्म और अधिदैवत में प्रविष्ट है । इसकी अनन्त संस्था है । इसी आधार तो- ' बहुधा हा वैष निविष्टो यत् प्राणः - इत्यादि कहा जाता है । अब तक हमने सात त्रिलोकिएँ बतलाई हैं । पहली त्रिलोकी का सम्बन्ध प्रपद से ब्रह्मरन्ध्र तक एक त्रिलोकी था, दूसरी का मूलद्वार से ब्रह्मरन्ध तक था शेष पाँचों ऊपर बतला ही दी गई हैं । अब समाप्त करते हैं । ( जिसका कि प्रकृत उपनिषत् से सम्बन्ध है ) बतलाकर हम इस चैलोक्य - प्रकरण को मूलद्वार से ब्रह्मरन्ध्र तक निष्पन्न होने वाली दूसरी त्रिलोकी में हमने हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक है द्युलोक । हृदय बतलाया है । इस द्युलोक में सौम्यप्राण के आधार पर आदित्य सौरप्राण की सत्ता बतलाई ही त्रैलोक्य-से ब्रह्मरन्ध्र तक सोम परातल है । उस पर आदित्यप्राण प्रतिष्ठित है । इस केवल चुलोक में विभाग हो जाता है ॥ श्रोत्र, चक्षु, प्राण ( प्राण ), वाकू, मन - इन पांचों का यह क्रम है । सबसे नीचे हृदय में मन है ऊपर बा है । बाकू के ऊपर प्राण ( नासा- प्राण ) है प्राण के ऊपर चक्षु है । चक्षु के ऊपर श्रोत्र है । श्रोत्रेन्द्रिय का निर्माण दिसोम से होता है एवं मन भास्वरसोममय है । वाक् अग्निमय है । प्राण वायुमय है । चक्षु आदित्यमय है । इधर उधर ( श्राद्यन्त में ) मन श्रोत्ररूप सोम है । उपक्रम ( हृदय ) में मन है । उपसंहार में ( चक्षु के ऊपर ) श्रोत्रेन्द्रिय है । बीच में अग्नि, वायु है,, तरलावस्था आदित्यरूप वाक्, प्राण, चक्षु हैं । ये तीनों ही अग्नि हैं । अग्नि की ही घनावस्था का नाम अग्नि है, अतएव तीनों से निर्मित तीनों इन्द्रियों को हम का नाम वायु है, विरलावस्था का नाम प्रादित्य ' अग्नि ' कहने के लिए तय्यार हैं । हृदय से श्रोत्र तक सौम्य प्राण वितत है । इसके ऊपर वाक्, प्राण, चक्षुरूप तीनों इन्द्रिएँ प्रतिष्ठित हैं । दूसरे शब्दों में सौम्यप्राण धरातल पर अग्नित्रयी - प्रतिष्ठित ये ६ विभाग है । हमने बतलाया कि ईश्वरशरीर के स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, अन्तरिक्ष, पृथिवी, चन्द्रमा में हैं । अन्त में निधन चन्द्रमा है, आदि में स्वयम्भू है । स्वयम्भू सर्वव्यापक आत्मा है । यह अध्यात्म [ २ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण ऋतसत्यसूत्ररूप से सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त है । जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । स्वयम्भू के नीचे परमेष्ठी है । परमेष्ठि - सोम दिक् - सोम कहलाता है । यही अध्यात्म में ' दिशः धोत्रे ' के अनुसार श्रोत्रेन्द्रियरूप से परिणत होता है । परमेष्ठी के नीचे सूर्य्यं है । यही- ' आदित्यश्चक्षुः ' -के अनुसार श्रोत्र परमेष्ठिरूप श्रोत्रेन्द्रिय से नीचे चक्षुरिन्द्रियरूप में परिणत होता है । सूर्य्यं के नीचे अन्तरिक्ष है । यही ' वातः प्राणः - के अनुसार चक्षुरूप सूर्य्यं के नीचे आकर प्राणरूप से प्रतिष्ठित होता है । अन्तरिक्ष के नीचे पृथिवी है । वही पार्थिवाग्नि- ' अग्निर्वाक् ० ' - के अनुसार अन्तरिक्षरूप प्राण के नीचे आकर वाक्रूप में परिणत होता है । सर्वान्त में निधन चन्द्रमा है - वही- ' मनश्चन्द्र रेग लीयते ' के अनुसार वाक्रूप पृथिवी के नीचे हृदयस्थान में प्रतिष्ठित होकर मन नाम से प्रसिद्ध होता है । इस प्रकार अधिदैवत के पाँचों देवता अध्यात्म में उसी रूप से प्रतिष्ठित होते हैं-ऋतसत्यमय आत्मा १ - स्वयम्भू सर्वव्यापी २- परमेष्ठी श्रोत्र दिक्सोम ( सोमधरातल ) ३- सूर्य्य चक्षु आदित्य ४- अन्तरिक्ष प्राण वायु ५- पृथिवी वाक् अग्नि ६- चन्द्रमा मन भास्वरसोम ( सोमधरातल ) इस क्रम में वाक् - अग्नि पृथिवीलोक है । प्राणवायु अन्तरिक्ष है । चक्षुरादित्य द्युलोक है । यही इस प्रकरण की आठवीं त्रिलोकी है । एक बात और पार्थिव अपान, सौर प्राण- दोनों गतिशील हैं । मध्य का व्यान स्थिर है । इस स्थिर व्यान पर प्राणापान का उपांशुसवन होता है । प्रपान ऊपर जाता है । इससे धक्का खाकर प्राण भी ऊपर चला जाता है । प्राण परकाष्ठा पर से वापस लौटता है । इससे ऊपर आया हुआ अपान नीचे जाता है । परकाष्ठा पर पहुँचकर फिर अपान ऊपर जाता हुआ प्राण को धक्का देकर ऊपर फेंक देता है । इस प्रकार व्यान के आधार पर प्राणापान का गमन, आगमन हुआ करता है । इस श्रागति और गति के भेद से प्रपान और प्राण की दो - दो अवस्थाएँ हो जाती हैं । परन्तु ध्यान रहे-अपान - प्राण का नीचे - ऊपर जाना होता है - मध्यस्थित व्यान के आधार पर ही । इसी अभिप्राय से-" ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति, अपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते " ॥ ' १ - कठोप ० २।२।३ । [ ६३ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य धिषणाप्राणनिरूपण यह कहा जाता है । नीचे पाता हुआ वही ' अपान ' प्रपान कहलाने लगता है एवं ऊपर जाकर समान कहलाने लगता है । एवमेव वही प्राण ऊपर जाता हुआ उदान कहलाने लगता है एवं नीचे आकर यही ' प्राण ' नाम धारण कर लेता है । इस प्रकार इस गतिभेद से अपान एवं प्राण की ' अपान, समान, प्राण, उदान - ये चार अवस्थाएँ हो जाती हैं । पांचवां व्यान है । इस प्रकार प्रत्येक त्रिलोकी में समान उदान के भेद से प्रपान, व्यान, प्राण - इन तीन तीन तन्त्रायीनों की अपेक्षा अपान, समान, व्यान, प्राण, उदान पांच पांच तन्त्रायी हो जाती हैं । इन पाँच के भेद से साध्य, वायव्य, सौम्य भी पांच-पाँच भागों में विभक्त हो जाते हैं । इस प्रकार वह त्रिसत्यप्रजापति समानोदान के कारण ' पाङ्क्त ' हो जाता है । आगे आनेवाली आठ तालिकाओं से पूर्व का सारा वक्तव्य स्पष्ट हो जाता है-इन आठों जिलोकियों में पृथिवीस्थानीय सारे भाग को उन - उन त्रिलोकीरूप शरीरों का मूला-धार समझिये । अन्तरिक्षस्थानीय भागों को ' हृदय ' समझिये एवं ' द्यौ मूर्द्धा ' - इस परिभाषा के अनुसार स्थानीय सारे भागों को ' मस्तक ' समझिये । ऐसी अवस्था में यदि हम पार्थिव, आन्तरिक्ष्य, दिव्य-अपान, व्यान, प्राण - इन तीनों प्राणाग्नियों का ' मूलद्वार से आने वाला पार्थिव अग्नि अपान है, हृदय-स्थान में रहने वाला श्रान्तरिक्ष्य अग्नि व्यान है, मस्तकस्थान में प्रतिष्ठित रहने वाला प्राणाग्नि प्राण है - यह लक्षण करें तो कोई आपत्ति नहीं समझनी है । पूर्व के उपनिषदों में हमने तीनों का यही लक्षण किया है । यहां उनका विभिन्न संस्थान बतलाया है । इससे भ्रम होने की संभावना है, अतः यहाँ पर उस भ्रम को पूर्वकथन से दूर कर देना चाहिए । इसी पूर्व कथन का सारांश म्राठों त्रिलोकियों एवं पाँच प्रकार की व्यूढा त्रिलोकी की तालिकाओं के माध्यम से भी स्पष्ट करने का प्रयाश किया गया है देखिए पृष्ठ संख्या १५-१६ एवं १७ । [ ६४ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण १ -वरिष्ठ प्रकाशक निवारक २- १-द्वितीया प्रथमा ३ - २- १ -त्रिलोकी हृदय नाभि प्रपद त्रिलोकी-से से से — ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त- हृदयपर्यन्त हृदयपर्य्यन्त व्यूहनरूपा - श्रन्तरिक्षलोक - पृथिवीलोक -द्युलोक - सौम्यप्राणयुक्त - -वायव्यप्राणयुक्त श्राव्यप्राणयुक्त द्युस्थानीय -- आन्तरिक्ष्यव्यान पार्थिव प्राणोदान अपानसमानाग्नि आदित्य यम , (, , ब्रह्मा ( विष्णुस्तन्त्रायी ( शिवस्तन्त्रायी तन्त्रायी ) , क्रियातन्त्र ), ), ज्ञानतन्त्र अर्थतन्त्र ,, , ( ( हंसात्मा ( मूलात्मा शिवात्मा - वायुः - अग्निः -इन्द्रः ) ) ) २ प्रकाशक - विधारक वरिष्ठ ३ - २- १-हृदय नाभि मूलाधार से से ब्रह्मरन्ध्र कण्ठ से तक- हृदय तक अन्तरिक्षलोक तक द्युलोक - पृथिवीलोक -सौम्यप्राणयुक्त -वायव्यप्राणयुक्त - प्राप्यप्राणयुक्त स्थानीय श्रान्तरिक्ष्य पार्थिव प्राणोदानादित्य अपानसमानाग्नि व्यानाग्नि ( यम शिवस्तन्त्रायी ,, ( ब्रह्मा ( विष्णुस्तन्त्रायी तन्त्रायी ), ज्ञानतन्त्र ), ), क्रियातन्त्र अर्थतन्त्र , (शिवात्मा- ,, ( हंसात्मा ( मूलात्मा इन्द्रः - - अग्निः ) वायुः ) ) ३-तृतीया त्रिलोकी— पञ्चधा व्यूढत्रिलोकी की पहली त्रिलोकी-३ विधारक १ -कर्णपटी - पृथिवीलोक-आप्यप्राणयुक्त पार्थिव अपानसमानाग्नि ( विष्णुतन्त्रायी ), अर्थतन्त्र , ( मूलात्मा - अग्निः ) वरिष्ठ २ -ललाट ( शिरोगुहा ) -अन्तरिक्षलोक - वायव्यप्राणयुक्त आन्तरिक्षव्यान 8 . यम , ( ब्रह्मा तन्त्रायी ), क्रियातन्त्र , (हंसात्मा - वायुः ) प्रकाशक ३ -मूर्द्धा द्युलोक - सौम्यप्राणयुक्त द्युस्थानीय प्राणोदानादित्य , ( शिवस्तन्त्रायी ), ज्ञानतन्त्र , ( शिवात्मा - इन्द्रः ) ४-चतुर्थी त्रिलोकी - व्यूढत्रिलोकी की दूसरी त्रिलोकी--8-४ -विधारक १ -वाक् ( जिह्वा ) -पृथिवीलोक - प्राप्यप्राणयुक्त पार्थिव अपानसमानाग्नि , ( विष्णुस्तन्त्रायी ), अर्थतन्त्र , ( मूलात्मा - प्रग्निः ) वरिष्ठ २-नासा - अन्तरिक्षलोक - वायव्यप्राणयुक्त आन्तरिक्षव्यान यम , ( ब्रह्मा तन्त्रायी ), क्रियातन्त्र , ( हंसात्मा - वायुः ) प्रकाशक ३ – चक्षुः-द्युलोक - सौम्यप्राणयुक्त द्युस्थानीय प्राणोदानादित्य --, ( शिवस्तन्त्रायी ), ज्ञानतन्त्र , ( शिवात्मा - इन्द्रः ) क्रमशः त्रिलोकी त्रिलोकी त्रिलोकी [ ६५ ] त्रिलोकी
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धिषणाप्राणनिरूपण प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य द्वितीय प्रश्न ५-पश्चमी त्रिलोकी -व्यूढत्रिलोक की तीसरी त्रिलोकी-५ -प्रकाशक विधारक वरिष्ठ ३- २- १ -मुख- ग्रीवा उर द्युलोक -अन्तरिक्षलोक - पृथिवीलोक - सौम्यप्राणयुक्त - आप्यप्राणयुक्त - वायव्यप्राणयुक्त दिव्यप्राणोदानादित्य पार्थिव प्रान्तरिक्षव्यान अपानसमानाग्नि --, (शिवस्तन्त्रायी यम ,, ( ( ब्रह्मा विष्णुस्तन्त्रायी ), तन्त्रायी ज्ञानतन्त्र ), ), , क्रियातन्त्र अर्थतन्त्र ( शिवात्मा-, , ( ( मूलात्मा इन्द्रः हंसात्मा ) - - अग्निः वायुः ) ) ६-षष्ठी त्रिलोकी -व्यूढत्रिलोकी की चौथी त्रिलोकी-६-विधारक १ -हृदय - पृथिवीलोक-आप्यप्राणयुक्त पार्थिव अपानसमानाग्नि , ( विष्णुस्तन्त्रायी ), अर्थतन्त्र , ( मूलात्मा - अग्निः ) प्रकाशकवरिष्ठ ३ २ -- कण्ठ- उर - अन्तरिक्ष द्युलोक - सौम्यप्राणयुक्त लोक - वायव्यप्राणयुक्त द्युप्राणोदानादित्य अन्तरिक्षव्यान , ( शिवस्तन्त्रायी -- यम , ( ब्रह्मा ), ज्ञानतन्त्र तन्त्रायी ), , ( क्रियातन्त्र शिवात्मा , - इन्द्रः ( हंसात्मा ) - वायुः ) ७-सप्तमी त्रिलोकी – व्यूढत्रिलोकी की पाँचवीं त्रिलोकी-७-विधारक १ -योनि - पृथिवीलोक - श्राप्यप्राणयुक्त पार्थिव प्रपानसमानाग्नि , ( विष्णुस्तन्त्रायी ), अर्थतन्त्र , ( मूलात्मा - श्रग्निः ) वरिष्ठ २ -उदर ( गुहा ) -अन्तरिक्षलोक - वायव्य प्राणयुक्त अन्तरिक्षव्यान यम , ( ब्रह्मा तन्त्रायी ), क्रियातन्त्र , ( हंसात्मा - वायुः ) प्रकाशक ३ -हृदय-द्युलोक - सौम्य प्राणयुक्त दिव्यप्राणोदानादित्य --, ( शिवस्तन्त्रायी ), ज्ञानतन्त्र , ( शिवात्मा - इन्द्रः ) ८-अष्टमी त्रिलोकी— हृदय से ब्रह्मरन्ध्रवाले दूसरी त्रिलोकी के केवल द्युलोक में त्रैलोक्यविभाग-८-विधारक १ -वागिन्द्रिय - पृथिवीलोक - प्राप्यप्राणयुक्त पार्थिव अपानसमानाग्नि , ( विष्णुस्तन्त्रायी ) ( मूलात्मा - अग्निः ) वरिष्ठ २-नासेन्द्रिय - अन्तरिक्षलोक-वायव्यप्राणयुक्त आन्तरिक्षव्यान यम , ( ब्रह्मा तन्त्रायी ), ( हंसात्मा - वायुः ) प्रकाशक ३ -चक्षुरिन्द्रिय-द्युलोक - सौम्यप्राणयुक्त दिव्यप्राणोदानादित्य , (शिवस्तन्त्रायी ) ( शिवात्मा-इन्द्रः ) ·· त्रिलोकी त्रिलोकी त्रिलोकी त्रिलोकी ] 39 [ w