प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 91–100
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 91–100
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अथ धिषणाप्राणनिरूपणात्मको द्वितीयप्रश्नः [ विज्ञानभाष्य ] कम्बन्धी कात्यायन ने पिप्पलाद से जो प्रजासृष्टिविषयक प्रश्न किया था, सृष्टि-रहस्यवेत्ता पिप्पलाद ने रविप्राणरूप से रेत को उपसंहार बनाते हुए बड़े विस्तार के साथ उत्तर दे दिया । प्रथम प्रश्न में प्रधानरूप से रयिप्राण का निरूपण है । वाक्प्राण, रविप्राण, विषणाप्राण, प्रज्ञाप्राण, भूतप्राण भेद से प्राण पाँच प्रकार के हैं । ऋषि को इस प्राणोपनिषत् में इन पाँचों प्राणों का स्वरूप बतलाना है । इन पाँचों में पहले रयिप्राणवाले पारमेष्ठ्य प्राण का निरूपण किया है । इस दूसरे प्रश्न क्रमप्राप्त सूर्य के विषणाप्राण का निरूपण है । तीसरे प्रश्न में चन्द्रमा के प्रज्ञाप्रारण का निरूपण है । चौथे में पार्थिवभूतप्रारण का निरूपण है । पाँचवे प्रश्न में श्रोंकारात्मक स्वयम्भू के वाक्प्राण का निरूपण है । सर्वान्त में छठे प्रश्न में इन पाँच प्राणों से एवं छन्द, पोष, सलिल, अन्न, अग्नि नाम के पाँच पशुओं से एवं विश्वदानि यज्ञात्मा सर्वहुतयज्ञरूप परमात्मा, सत्य, श्रमृत, परात्पर - इन पाँच आत्माओं से युक्त षोडशी प्रजापति का निरूपण है । पाँचों प्राणों का व्यष्टिरूप से निरूपण, पाँचों का षोडशकल प्रजा-पति को लक्ष्य बनाकर समष्टिरूप से निरूपण - बस, इस उपनिषत् में यही परिमित विषय ।६ नों प्रश्नों के एक एक वाक्य हम आपके सामने रख देते हैं जिससे आपको पूर्वक्रम में पूर्ण विश्वास हो जायगा-१ - ' तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते रयि च प्रारणं च ' २ - ' वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ' ३- ' यथैषा पुरुष छायेतस्मिन्नेतदाततं मनोऽधिकृत्यायात्यस्मिञ्छरीरे ' ४- ' सर्वा एवैतस्मिन् तेजोमण्डले एकीभवन्ति ' ५- ' एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च यदोङ्कारः ' ६- ' इहैवान्तः शरीरे स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकला: प्रभवन्ति ' ( परमेष्ठिप्राणः ) ( सूयं प्राणः ) ( चन्द्रप्राणः ) ( पृथिवीप्राणः ) ( स्वयम्भूप्रारणः ) ( प्रजापतिः ) प्रथम वाक्य से तो स्पष्ट ही रयिप्राण का निरूपण सिद्ध हो जाता है । दूसरे वाक्य में वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र - चारों को प्राण की स्तुति करने वाला बतलाया है । चान्द्र प्रज्ञाप्राण की समष्टि मन है । मन ही सारी इन्द्रियें हैं । यह विज्ञान प्राण के आधार पर ही रहता है । विज्ञान ही प्रज्ञान का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण है, अतः इस प्राण को हम सौर धिषणाप्राण कहने के लिए तय्यार हैं । तीसरे वाक्य में - ' मन को निशाना बनाकर इतर प्राण अध्यात्म में प्रविष्ट होते हैं ' - यह कहा गया है । मन को प्रधानता दी गई है । यही मन प्रज्ञाप्राणात्मक है, अतएव तीसरे प्रश्न को हम चान्द्र प्रज्ञाप्राण का निरूपक मानने के लिए तय्यार हैं । चौथे वाक्य में - ' इसी तेजोमण्डल में सर्वथा विभिन्नतत्त्व एकीभाव को प्राप्त होते हैं ' - यह कहा गया है । पार्थिव भूतप्राण से भोक्तात्मा का स्वरूप निष्पन्न होता है । [ ७७ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण भोक्तात्मा में - वैश्वानराग्निज्योति, तेजस विद्युज्ज्योति, प्राजइन्द्रज्योति - ये तीन ज्योतिएँ हैं । तीनों ज्योतियों से युक्त भोक्तात्ना आध्यात्मिक जगत् का तेजोमण्डल है । यहीं गन्ता है, शरीर रथ है । विज्ञान सारथि है, मन लगाम है एवं इन्द्रिएँ घोड़े हैं । ग्रश्वरूप इन्द्रिएँ, प्रग्रहरूप मन, सारथिरूप विज्ञान, आकृति प्रकृति प्रकृतिरूप महान् ये शरीर में तभी तक हैं- जब तक कि वह तेजोमण्डल ( पार्थिवभूत प्राणरूप भोक्तात्मा ) अध्यात्म में प्रतिष्ठित है । बस, इन्हीं सब कारणों से इस चौथे प्रश्न को हम पार्थिव भूतप्राण का निरूपक मानने के लिए तय्यार हैं । छठे वाक्य में प्रोंकार को पर और अपर ब्रह्म बतलाया है । ब्रह्म स्वयम्भू हैं । स्वयम्भू परमेष्ठी ' पर ' हैं, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी ' अपर ' हैं । सब उस सत्य स्वयम्भू के उदर में हैं, अतएव हम उसे पर, अपर दोनों कह सकते हैं, अतएव हम इस पाँचवें प्रश्न को- ' वाक्प्रारण ' - का निरूपक कहने के लिए तय्यार हैं एवं छठे प्रश्न के विषय में तो कुछ कहना ही नहीं है । ये पाँचों प्राण हैं परस्पर सर्वा भिन्न पदार्थ, परन्तु पाँचों का घनिष्ठ सम्बन्ध है । एक दूसरे के विना अनुपपन्न हैं । सब परस्पर में एक दूसरे में ओतप्रोत हैं । इसी प्राकृतिक स्थिति को समझने के लिए ऋषि ने प्रत्येक प्राण के निरूपण में गौणरूप से सबका सम्बन्ध बतलाया है । सबमें सबका निरूपण है । परन्तु प्रधानता एक एक की है । इन पाँचों में से रयिप्राण का निरूपण हो चुका है । अब क्रमप्राप्त - धिषणाप्राण ' का निरूपण करते हैं-कबन्धी के समाधान हो जाने पर भार्गव वैदर्भि आए और उन्होंने पिप्पलाद से पूछा कि भगवन्! कितने देवता प्रजा का धारण करते हैं, उनमें से कौन से देवता प्रकाश करते हैं एवं उन देवताश्नों में कौन सर्वश्रेष्ठ ( ज्येष्ठ ) है? अथ हैनं भार्गवो वैदभिः पप्रच्छ, भगवन्कत्येव देवाः प्रजां विधारयन्ते, कतर एतत्प्रकाशयन्ते, कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥
प्रजानिर्माण हो चुका । माता की योनिगत अंगिराप्राणरूप रुधिराग्नि में रयिरूप पितृसोम आहुत होकर संवत्सर के अनन्तर ' प्रजा ' रूप में परिणत हो गया । इसलिए उचित है कि अब उत्पन्न प्रजा का स्वरूप जाना जाय । हम मनुष्य में ज्ञान, क्रिया दो भागों का, साथ ही में तीसरे अर्थ ( भूत ) का साक्षात् दर्शन कर रहे हैं । हम जानते हैं कि यह जानना भाग ज्ञान है । इसी ज्ञान से सर्वत्र प्रकाश हो रहा है । और तो और, त्रैलोक्य के अन्धकार को दूर करने का घमण्ड रखने वाला स्वयं सूय्यं भी हमारी ज्ञानज्योति से प्रकाशित है । जिस दिन यह ज्ञानज्योति तिरोहित हो जाती है, उस दिन हमारे लिए संसार अन्धकारमय हो जाता है । सूर्य्य, चन्द्रमा, अग्नि, विद्युत्, तारक आदि सारी भूतज्योतिएँ हमारे अन्तर्जगत् के लिए हमारी ज्ञानज्योति से प्रकाशित हैं । उसी ज्ञान से हमें घटपटादि-वस्तुजात का भान होता है । तो बस, जिस आध्यात्मिकतत्त्व से हम जगत् को प्रकाशित देख रहे हैं, जिसके बल पर - ' अहं जानामि - यह अक्षर बोलने का अभिमान करते हैं - वही सबसे पहली- ' ज्ञान-शक्ति ' है । दूसरी है - ' क्रियाशक्ति ' । हम निरन्तर कुछ न कुछ करते रहते हैं, एक क्षण भी चुप नहीं रह सकते हैं । खाते हैं, पीते हैं, चलते हैं, बैठते हैं, देखते हैं, सुनते हैं, हँसते हैं- आदि आदि व्यापारों से [ ७८ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण सदा युक्त रहते हैं । अङ्गप्रत्यङ्ग में क्रिया हो रही है । भुक्तान्न रस बन रहा है । रस प्रसृक् बन रहा है । प्रसृक्, मांस, मेदा, अस्थि मज्जा आदि स्वरूपों में परिणत होता हुआ शुक्र बन रहा है । शुक्र ओज में परिणत होता हुआ मन बन रहा है । मन ज्ञान द्वारा क्रिया द्वारा खर्च हो रहा है । फिर प्रश्न आता है । अन्न से ऊर्क, ऊर्क से प्राण, प्राण से मन यह यज्ञचक्र निरन्तर चल रहा है । इस चक्र का श्राधार वही ज्ञानशक्ति है । इस ज्ञानरूप स्थिर शान्त धरातल पर ये क्रियाएँ हो रही हैं । यही आध्यात्मिक जगत् की दूसरी क्रियाशक्ति है । क्रिया - शक्ति का काम भूतनिर्माण करना है । शरीर के धातु इसी व्यापार से उत्पन्न होते हैं । तीसरी हैं- ' अर्थशक्ति ' । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश- इन पाँचों की समष्टि ही ' अर्थ ' है । ये अर्थ गुणभूत और भौतिक भूत भेद से दो प्रकार के हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द - ये पाँचों अर्थ गुणभूत हैं । ये ही क्रमशः उत्तरोत्तर की चिति से अणु, रेणु, महारूप में परिणत होते हुए . भौतिक भूतस्वरूप में परिणत हो रहे हैं । इन्हें पृथिवी आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है एवं गुणभूतों को पृथिवीमात्रा आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है । इस विषय का विशद विवेचन हम चौथे प्रश्न में करने वाले हैं, श्रतएव उसे यहाँ नहीं बढाते । यहाँ पर केवल यही बतलाना है कि हमारे में भूत भी हैं । शरीर पञ्चमहाभूतों का पिण्ड है । मांस, अस्थि, केश, नाखून आदि जितने घनभाग हैं - सब पृथिवीभूत हैं । रुधिर, कफ, लाला, पित्त रस, मूत्र, रेत आदि जितने तरल पदार्थ हैं सब जलभूत हैं । शरीर में जो गर्मी है वही तेज है । श्वास - प्रश्वासरूप प्राणवायु धमनियों में व्याप्त होकर सर्वाङ्ग शरीर का संचालन करने वाला वायु वायुभूत है । शरीर की नाड़ी आदि के सुषिर आकाशभाग है । इस प्रकार हम इस शरीर में पाँचों भूतों को प्रत्यक्ष देख रहे हैं । इन पाँचों की समष्टि ही अर्थशक्ति है । बस, इन तीन के अलावा चौथी चीज नहीं है । ' हम ' ज्ञान, क्रिया, अर्थ तीनों के पुद्गल हैं । कठोपनिषत् में बतला दिया गया है कि हमारा निर्माण ईश्वरीय देवसत्य से हुआ है । वह ईश्वरीय देवसत्य - वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञात्मक है । वैश्वानर पार्थिव है, वही अर्थशक्ति है । हिरण्यगर्भ आन्तरिक्ष्य है वही क्रियाशक्ति है । सर्वज्ञ स्थानीय है - वही ज्ञानशक्ति है । सर्वज्ञ इन्द्र है । हिरण्यगर्भ वायु है वैश्वानर श्रग्नि है । तीनों स्तोम्य त्रिलोकी की वस्तु हैं । इन तीनों से अतिरिक्त पिण्ड पृथिवी है । पिण्डपृथिवी भूमि है । वैश्वानर सहस्रपात् है । हिरण्यगर्भ सहस्राक्ष है । सर्वज्ञ सहस्रशीर्ष है । यही ईश्वरविराट् है । जीव इसी का अंश है, अतएव जो स्थिति ईश्वरविराट् की है वही जीवविराट की है । ईश्वरविराट् के पृथिवीभाग से इसका शरीर बना है । वैश्वानरभाग से शरीर की गर्मी बनती है । दोनों अर्थशक्ति हैं । हिरण्यगर्भ भाग से तेजस आत्मा बनता है यह क्रियाशक्तिमय है । सर्वज्ञ से प्राज्ञ आत्मा बनता है- यह ज्ञानशक्ति-मय है । तीनों की समष्टि भोक्तात्मा है - यही जीवात्मा है । जीवप्रपञ्च का ज्ञानशक्तिस्वरूप प्राज्ञ-भाग प्रकाशक है । तैजसयुक्त भूतभाग विधारक है । इस भूतग्राम ने शरीरयष्टि को खड़ा कर रखा है । ' कठोपनिषत् ' में बतला दिया गया है कि प्राज्ञभाग चान्द्र प्रज्ञान से युक्त होता हुआ ' प्रज्ञानात्मा ' कहलाने लगता है । इस प्रज्ञानात्मा की रश्मिएँ ही इन्द्रिएँ हैं । वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन ( इन्द्रिय - मन ) - पाँचों प्रज्ञान की रश्मिएँ हैं, अतएव प्रज्ञानमन को सर्वेन्द्रियमन कहा जाता है । यही प्रज्ञारूप प्रज्ञान [ ७ ९ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राण निरूपण ज्ञानशक्तिमय है । यह पाँच इन्द्रियों के स्वरूप में परिणत होकर प्रकाशक बनता है । ज्ञानशक्तिप्रका-शिका है, परन्तु इन्द्रियों के द्वारा । चक्षु से रूप - ज्ञान होता है । श्रोत्र से शब्दज्ञान होता है । प्राण ( घाण ) से गन्धज्ञान होता है | रसना से रसज्ञान होता है । मन से सुखदुःख का अनुभव होता है । प्रज्ञान उक्थ है, इन्द्रिएँ अर्क हैं । सूर्य्य प्रकाश नहीं करता, अपि तु रश्मिएँ प्रकाश करती हैं । परन्तु इनका मूल है सूर्य्य- इसलिए उसे भी प्रकाशशक्ति से अलग नहीं किया जा सकता है । तथैव प्रज्ञामय इन्द्रियों को ही प्रकाश कहना उचित होगा । ये इन्द्रिएँ प्राणग्राम हैं - यही प्रकाशक है एवं पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश - पाँचों भूत भूतग्राम हैं - यही विधारक है । शरीररूप भूतग्राम के आधार पर ही इन्द्रिऍरूप प्राणग्राम स्थित है । सर्वज्ञादिरूप श्रात्मग्राम स्थित है । दोनों का विधारक भूतग्रामरूप शरीर है । इसी अभिप्राय से मंत्रीश्रुति कहती है--" भगवन् शरीरमिदं मैथुनादेवोद्भूतं, संविदपेतं, निरय एव मूत्र-द्वारेण निष्क्रान्तमस्थिभिश्चितं, मांसेनानुलिप्तं, चर्म्मणावबद्धं, विण्मूत्रवात-पित्तकफमज्जामेदोवसाभिरन्यैश्च मलैर्बहुभिः परिपूर्ण मेतादृशे शरीरे ( प्राण-ग्रामात्मक श्रात्मग्रामस्य ) वर्त्तमानस्य भगवंस्त्वं नो गतिः " - इति ॥ ' इसी आधारभाव के कारण कठ ने शरीर को रथ बतलाया है । यह हैं - प्राकृतिक स्थिति । भार्गव वैदर्भि ने प्रश्न किया था कि इस अध्यात्मप्रजा का कौन विधारक है? कौन प्रकाशक है? कौन इनमें श्रेष्ठ है? इनमें से दो प्रश्नों का उत्तर हो चुका । महर्षि पिप्पलाद कहते हैं कि ग्राकाश, देव, वायु, अग्नि, आपः पृथिवी - वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र- इतने देवता ( पाँच भूत, चार देवता ), प्रजा को प्रकाशित करते हुए परस्पर में अभिमान करते हुए कहते हैं कि हम ही इस बाण ( शरीरयष्टि ) का संयमन करके प्रजातन्त्र का विधारण कर रहे हैं । हम ही प्रकाशक हैं- हम ही विधारक हैं स्थूलदृष्टि से देखने पर मालूम भी ऐसा ही होता है । इन्द्रिएँ ही प्रकाशक हैं । भूतग्राम विधारक है । ऋषि ने ' प्राण ' को छोड दिया है । केवल - वाक्, मन, चक्षु, श्रोत्र - चार का ग्रहण किया है । आगे जाकर ऋषि को इस प्राण को वरिष्ठता बतलानी है । इसी को प्रकाशक और विधारक बतलाना है, इसलिए प्राण का पूर्वोत्तर में परित्याग है । चक्षु, श्रोत्र, मन - तीन की प्रकाशकता में तो किसी को संदेह है ही नहीं । बाकी बचते हैं- वाक् और प्राण । ' वाक् ' भी ज्योति है । पाँच ज्योतियों में वाक् को भी ज्योति माना गया है । वाक् का जो रसना भाग है- वह तो रसज्ञानरूप होने से प्रकाशक है ही, परन्तु शब्दभाग भी प्रकाशक है । शब्द से वस्तु का बोध होता है । एवमेव प्राण भी प्रकाशक है । प्राण का घाणभाग तो गन्धज्ञान के कारण प्रकाशक है ही, परन्तु क्रियाभाग भी प्रकाशक है । ' वातो १- मैत्रेय्युप ० १।३ । [ ८० ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण का उत्पादक बन जाता है । देवेभ्य आचष्टे यथा पुरुष ते मनः १ - इस सिद्धान्त के अनुसार प्राणवायु ज्ञान तो प्रत्यक्ष ही इस प्रकार पाँचों इन्द्रियों का प्रकाशकपना सिद्ध हो जाता है । भूतों का आपस विधारकपना में ' मैं बडा, में बड़ा ' - इस है । इन पाँचों इन्द्रियों को ' प्राणाः ' कहा जाता है । ये पाँचों प्राण । इसका स्पष्टीकरण हम प्रकार से स्पर्द्धा किया करते हैं । इसी को ' प्राणश्रेयस्त्व ' विद्या कहा जाता है मुख्य प्राण का ही विकास अनुपद में ही करने वाले हैं । इन पाँचों इन्द्रियप्राणों में प्राण नाम का प्राण -स्वरूप है, अतएव ऋषि ने इसे अलग निकाल दिया है । हैं । इन प्राणों की गुत्थी सुलझना बड़ा कठिन है । प्राण शब्द एक है- इसके कठिन स्वरूप और उस अनेक पर भी प्राणविद्या ' पशुविद्या और आत्मविद्या ' से भी कठिन है । पहले प्राणविद्या- विषयों का दो चार अक्षरों से ऋषियों की संक्षिप्त भाषा । ऋषि बहुत कम बोलते हैं । महा - महा से और न ही अध्ययनाध्यापन निरूपण करते हैं - यह दूसरी कठिनता है । इस कठिनता को न अनुवाद' यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः ० ' के से दूर किया जा सकता है । मनन - निदिध्यासन ने चिरकाल के बाद- हैं । हम अनुवाद नहीं करते अपने अनुसार स्वयं उपनिषत्पुरुष ही इस कठिनता को दूर करने में समर्थ - निदिध्यासन से कुछ मिल जाय । उद्गार निकालते हैं । संभव है - इनसे उपनिषत् - प्रेमियों को मनन ३ - वायव्य, ४- सौम्य, ५ भाप्य -उपनिषत् के प्रारम्भ में बतलाए गए - १ - परोरजा, २ आग्नेय आत्मप्राण है । यह अव्यय का प्राण-इन पाँचों प्राणों का स्मरण कीजिए । इन पाँचों में परोरजाप्राण यजुः प्राण बनता हुआ ' परोरजा ' भाग है । स्वयम्भू में आकर विकास को प्राप्त होकर वही श्रव्ययप्राण । पाँचवें प्रश्न में इसी अव्यक्त प्राण नाम से प्रसिद्ध होता है । इसी को ' अव्यक्त प्रारण ' कहा जाता है है, विस्तार के साथ वहाँ होने वाला का ओंकारस्वरूप से निरूपण किया गया है । इसका निरूपण से पशुप्राण कहे जा सकते हैं ) अतः प्रकृत में उसे छोड़ते हैं । शेष चारों प्राणों की ओर ( जो प्राण दो अपेक्षा विभाग समझिये । एक ऋतप्राण आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । इन चारों प्राणों के है । ऋतप्राण भृगु है, मत्यप्राण है, दूसरा सत्यप्राण है । ऋतप्राण रयि है, सत्यप्राण प्राण । अंगिरा की तीन अवस्थाएँ ही-अंगिरा है । भृगु की तीन अवस्थाएँ ही आपः, वायु, सोम में हैं ऋतरयि, सत्यप्राण के आप्य, वायव्य, अग्नि, यम, आदित्य हैं । इस प्रकार घन तरल - विरलावस्था से-प्रश्न में इन ६ ओं का रयिप्राणरूप सौम्य, आग्नेय, याम्य, आदित्य - ये ६ प्राण हो जाते हैं । प्रथम की उद्बुद्धावस्था का निरूपण है । इन उन्मुग्धरूप से निरूपण किया गया है । आगे के प्रश्नों में इन्हीं है । बस, स्नेह और तेज भेद से सृष्टि ६ ओं प्राणों में से- ' ऋतत्रयी ' स्नेहतत्त्व है । सत्यश्रयी ' तेजस्तत्त्व ' - शीततत्त्व है, तेज शुष्कतत्त्व है- ऊष्मा में कुल दो ही तत्त्व हैं । दो ही प्राण हैं । स्नेह आर्द्रतत्त्व है प्रार्द्र- कुछ भी कहो एक ही बात है । तत्त्व है | सर्दी - गर्मी, आग - पानी, स्नेह - तेज, आग्नेय - सौम्य, शुष्क । एक योषा है - एक वृषा है । दोनों ऋतत्रयी अन्न है, सत्यत्रयी अन्नाद है । एक पत्नी है एक पति है के मिथुन से सारा संसार बना है । निम्नलिखित बारहों युग्म एक वस्तु हैं-१- शत ० ब्रा ० ३।४।२।७ । [ १ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण ( १ ) - १ ऋत, २- सत्य ( ७ ) - १ - योषा, २ वृषा ( २ ) - १- रयि, २ - प्राण ( ८ ) - १ - शुक्र, २- शोणित ( ३ ) - १- सोम, २ श्रग्नि ( ९ ) - १ - अन्न, २ ग्रन्नाद ( ४ ) - १ - भृगु, २ - अंगिरा ( १० ) - १ - स्नेह, २ - तेज ( ५ ) - १ - आर्द्र, २ - शुष्क ( ११ ) - १ - सर्दी, २ - गर्मी ( ६ ) - १ -पत्नी, २ - पति ( १२ ) - १ - रात्रि, २ श्रहः दृष्टिभेद से वही ऋत - सत्यप्राण ब्राह्मणग्रन्थों में भिन्न - भिन्न स्थानों में इन भिन्न - भिन्न नामों से प्रयुक्त हुआ है । जैसा कि उदाहरण के लिए दो - तीन वचन बतला दिए जाते हैं-१ - " द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति । श्रार्द्र चैव शुष्कं च । यच्छुष्कं तदाग्नेयं, यदाद्वं तत् सौम्यम् ' - इति " । ' २- " द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति श्रत्ता चैवाद्यं च । स वै यः स अत्ता अग्निरेव सः । श्रादित्यो वा भत्ता । तस्य चन्द्रमा एव श्राहितयः । प्रारणो वा प्रत्ता तस्यान्नमेवाहितयः ” । ” ३- " योषा वं वेदिः । वृषाग्निः । वृषा योषामधिद्रवति तस्यां रेतः सिञ्चति । योषा वै पत्नी । " पश्चाद्वै परीत्य योषा हि वाक् । ७ वागिति हि स्त्री " । " ४- " द्रयं वा इदं सर्व - स्नेहश्चैव तेजश्च । तदु भुवमहोरात्राभ्यामाप्तम् " -इत्यादि । इस प्रकरण से बतलाना हमें यही है कि परोरजा प्राण के अतिरिक्त जितने भी अवान्तर प्राण हैं - उन सबका इन रयिप्राणरूप ऋतसत्यप्राणों में अन्तर्भाव है । सचमुच ऋषि ने अपने प्राणोपनिषत् में इन दो का निरूपण करते हुए सारे प्राणों का निरूपण कर उपनिषत् के नाम को चरितार्थ कर दिया है । ऋतसत्यप्राण की हमने छः अवस्थाएँ बतलाई हैं । उन छओं की निम्नलिखित क्रम से तत्त-ल्लोकों में प्रधान रूप से सत्ता समझनी चाहिए--१- शत ० ब्रा ० १।६।२।२३ । २- शत ० ब्रा ० १०।६।२।१-४ । ३- शत ० ब्रा ० १।३।३।८ । ४- शत ० ब्रा ० १।१।१।१८ । ५- शत ० ब्रा ० १।३।१।१८ । ७- शत ० ब्रा ० १।४।४।४ । ६- शत ० ब्रा ० २।४।४।२३ । ८- जै ० उप ० ४।२२।११ । [ ८२ ]
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' तेज ' प्राण सत्य ' ) -१ ' ऋतप्राण स्नेह रथि ( ( 2015 ) द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य धिषणाप्राणनिरूपण १- परोरजाप्राण स्वयम्भूमण्डल में ऋषिप्राण । २- श्राप्यप्राण परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में श्रासुरप्राण । ३- वायव्यप्राण परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में नाष्ट्राप्राण । ४- सौम्यप्राण परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में- चन्द्रमा में पितरप्राण । ५ - श्रादित्यप्राण सूर्य में देवप्राण | ६ - याम्यप्राण रोदसी के अन्तरिक्ष में नाष्ट्राप्राण । ७- आग्नेयप्राण पृथिवी में वैश्वानरप्राण । प्राणजगत् १- परोरजा प्राण -स्वयम्भूमें 1 ऋषिप्राण-१२ १ - आप्य प्राण परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में- श्रासुरप्राण && २- वायव्य प्राण -परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में- नाष्ट्राराक्षसप्राण -अनन्त ३ - सौम्य प्राण परमेष्ठी में अन्तरिक्ष में पितरप्राण ८ चन्द्रमा में- गन्धर्वप्राण २७ १- श्रादित्यप्राण -सूर्य में -देवप्राण -२ २- याम्यप्राण रोदसी के अन्तरिक्ष में -नाष्ट्रराक्षसप्राण ३- आग्नेयप्राण -पृथिवी में वैश्वा ० पुरुष - प्राण पञ्च पशुप्राण --३३ अनन्त १ ५ १८५ प्राण ऊपर की तालिका से पाठकों को यह भलीभाँति विदित होगा कि ऋतसत्यात्मक - रयिप्राण नाम से प्रसिद्ध - स्नेह, तेजोरूप दो प्राणों में वैदिक विज्ञान के अवान्तर सारे प्राणों का अन्तर्भाव हो जाता प्राणों है । ये सब ' प्राणा: ' हैं एवं वह परोरजाप्राण ' प्राण ' है । इन छओं में से आदित्यादि तीनों अंगिरा करेंगे । इस को हम इस उपनिषत् में श्राग्नेयप्राण कहेंगे एवं ऋतप्राणों का भिन्न - भिन्न रूप से उल्लेख प्रादित्य क्रम को प्रधान मानने के कारण ही हमने प्रारम्भ में प्राणों के - १- परोरजा, २ - आग्नेय ( आग्नेय, परोरजा को पांचवें याम्य ), ३- आप्य, ४- वायव्य, ५- सौम्य - ये पांच विभाग बतलाए हैं । इन पाँचों में से प्रश्न के लिए छोड़ दीजिए । शेष चार प्रश्न बचते हैं । चारों में प्रथम प्रश्न में इन चारों का उन्मुग्ध [ ५३ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण रूप से ( रयिप्राणरूप से ) निरूपण है एवं शेष तीन प्रश्नों में - दूसरे में श्राग्नेय प्राण का ( मुख्यरूप से सौर प्राण का ) निरूपण है । तीसरे प्रश्न में सौम्यप्राण का निरूपण है, चौथे में वायव्यप्राण का निरूपण है । आप्यप्राण को छोड दिया गया है । इसका कारण यही है कि आप्यप्राण से भूत उत्पन्न होते हैं । इस उपनिषत् में प्राण की प्रधानता है, अतएव यहाँ भूतप्रधान आप्यप्राण को छोड दिया गया है । सर्वभूतान्तरात्मा नाम से प्रसिद्ध साक्षी ईश्वर में पूर्वोक्त सारे प्राण रहते हैं जैसा कि ' कठोप-निषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । ईश्वर के स्वयम्भू - भाग में परोरजाप्राण रहता है । परमेष्ठी भाग में- आध्य, वायव्य, सौम्य प्राण रहते हैं । सूर्य्य में आदित्यप्राण रहता है । चन्द्रमा में गन्धर्वप्राण रहता है । अन्तरिक्ष में याम्यप्राण रहता है एवं पृथिवी में आग्नेय - वैश्वानर एवं पञ्चपशु - प्राण रहते हैं । ऐसे ईश्वर का उदक्तरूप यह जीव है । ' पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ' इस सिद्धान्त के अनुसार जीव पूर्णेश्वर का उदक्तरूप है । जो स्वरूप ईश्वर का है - वही जीव का है । जो आत्म, प्राण, पशु संस्था ईश्वर में है - वही जीव में है । आत्मा-भाग का विचार कठ में किया जा चुका है । ईश्वर के स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र, पृथिवी सर्वभूता-न्तरात्मा इस जीवशरीर में अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर ' भूतात्मा ' नाम से प्रसिद्ध हैं । बाकी बचती है - प्राण - संस्था और पशु - संस्था | इन दोनों में से पशु - संस्था को अप्राकृत समझकर छोड़ते हैं । इसका निरूपण ' कठोपनिषत् ' में हो देखना चाहिए । हमें यहाँ केवल प्राण - संस्था का विचार करना है । देखना यह है कि यह प्राण अध्यात्म में किस - किस रूप से प्रतिष्ठित होते हैं? यद्यपि इस प्रश्न का समाधान आगे आने वाले तीसरे प्रश्न में स्वयं पिप्पलाद ही करने वाले हैं तथापि प्रसंगात् यहाँ भी हम उसका संक्षिप्त निरूपण कर देना उचित समझते हैं— शरीर पर दृष्टि डालिए । सबसे नीचे पैर हैं, सबके ऊपर ब्रह्मरन्ध्र है । इतनी दूर में इन प्राणों को बैठाना है दक्षिण पैर का जो प्रपद ( फाबा ) स्थान है - वहाँ से हृदय तक एक विभाग समझिए । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक एक विभाग समझिए । इन दो विभागों में हृदय से नीचे का भाग पार्थिव है । ऊपर का भाग दिव्य है । हृदय स्वयं अन्तरिक्ष है । यही शारीर त्रिलोकी है । इस त्रिलोकी में प्रपद से में हृदय तक आप्यप्राण प्रतिष्ठित है, हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक सौम्यप्राण प्रतिष्ठित है । हृदय वायव्य-प्राण प्रतिष्ठित है । ये तीनों भाग ' रयि ' है, क्योंकि भृगुरूप रयि की ही आपः वायु, सोम - तीन अवस्था हैं । शरीर मूर्ति है । रयि ही मूर्ति निर्माण करती है । यह कहा जा चुका है । इस रयिमूर्ति के अधो-भाग में रयि का आप्यभाग प्रतिष्ठित हैं । ऊर्ध्वभाग में रयि का सौम्यभाग प्रतिष्ठित है एवं मध्य भाग में रयि का वायव्यभाग प्रतिष्ठित है एवं सर्वाङ्गशरीर ( प्रपद से ब्रह्मरन्ध्र तक ) में आग्नेयप्राण प्रतिष्ठित है । शरीर को जहाँ से छूते हैं वहीं से गरम पाते हैं । यह वही वैश्वानराग्निप्राण की गर्मी है । भृगुअंगिरा - दोनों परमेष्ठी की वस्तु हैं । दोनों ऋत हैं । इसीलिए दोनों को ' आप ' कहा जाता है । भृगुभाग भी ऋत होने से तीन भागों में विभक्त होकर सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त हो रहा है एवं अंगिराभाग भी तीन रूप में परिणत होकर सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त हो रहा है । दोनों की व्याप्ति [ ४ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषणाप्राणनिरूपण ' आलोमभ्यः - आनखाग्रेभ्यः ' - के • अनुसार नाखूनों के अग्रभाग और केशलोमों को छोडकर सर्वाङ्गशरीर में है । प्रपद से हृदय तक आग्नेयप्राण का आग्नेयभाग है । हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक आग्नेयप्राण का आदित्य भाग है । मध्य में आग्नेयप्राण का याम्यभाग है— १ - प्रपद से हृदय तक का २ - हृदय में -आप्यप्राण, आग्नेयप्राण- पार्थिवभाग --- वायव्यप्राण, याम्यप्राण- प्रान्तरिक्ष्यभाग त्रिलोकी शारीर ३- हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक - सौम्यप्राण, आदित्यप्राण - घुभाग रयिः प्राणः भृगुः अंगिरा स्नेहः तेज: प्रपद से हृदय तक आप्यप्राण है- इत्यादि का यह अर्थ नहीं है कि शरीर के और भाग में आप्य-प्राणादि ही नहीं हैं । सब स्थानों में सब प्राण हैं । जैसे- पारमेष्ठ्य - सौरादि प्राण प्रत्येक पदार्थ में हैं तथैव यहाँ भी सब सब जगह हैं । केवल संस्थाभेद है । योनि, आशय, प्रतिष्ठा प्रत्येक प्राण का तीन - तीन भावों से सम्बन्ध है । उत्पत्तिस्थान योनि है । स्थितिस्थान प्रतिष्ठा है एवं व्याप्तिस्थान प्राशय है । प्राप्यप्राण की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) प्रपद है । प्रतिष्ठा प्रपद से हृदय तक है । आशय सर्वाङ्गशरीर है । ये ही तीनों स्थान आग्नेयप्राण के हैं । सौम्यप्राण की योनि हृदय है । प्रतिष्ठा हृदय से ब्रह्मरन्ध्र तक है । आशय सर्वाङ्गशरीर है । ये ही तीनों स्थान प्रादित्यप्राण के हैं । वायव्यप्राण की योनि उदर ( अन्तरिक्षरूप खाली जगह - नाभि हृदय के बीच का स्थान ) है । प्रतिष्ठा - उदर और हृदय ( नाभि से हृदय तक का स्थान ) है एवं आशय सर्वाङ्गशरीर है ।ये ही तीनों स्थान याम्यप्राण के हैं— हैं-११- योनि - प्रपदस्थान १- २ - प्रतिष्ठा- प्रपद से हृदयपर्यन्त → १ - प्राप्यप्राण, २ - आग्नेयप्राण = १ पृथिवी ३- आशय - सर्वाङ्गशरीर १- योनि -उदरस्थान २- २ - प्रतिष्ठा - नाभि से हृदयपर्यन्त → १ - वायव्यप्राण, २ - याम्यप्राण – २ – अन्तरिक्षम् ३- आशय - - सर्वाङ्गशरीर [ ६५ ]
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द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपणं १ - योनि - हृदयस्थान ३- २ - प्रतिष्ठा – हृदय से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त ३- आशय – सर्वाङ्गशरीर → १ - सौम्यप्राण, २ - श्रादित्यप्राण ३ - द्यौः जिस स्थान पर प्राण उत्पन्न होता है - वही योनि है । जहाँ उत्पन्न होकर प्रतिष्ठित रहता है-वही प्रतिष्ठा है । जहाँ काम करता है वह भ्राशय है । इस परिभाषा के आने से ६ों प्राणों की सारे शरीर में व्याप्ति सिद्ध हो जाती है जिसका कि हमें प्रत्यक्ष अनुभव हो रहा है । इन ६ नों के कारण हम शरीर को पाट्कौशिक कह सकते हैं । ६ ओं में तीन रयिभाग होते हैं । तीन प्राणभाग हैं । श्राघा भाग पिता का G आधा भाग माता का है । दोनों के योग से यह शरीर खड़ा है । इन सबका मूल-आप्यप्राण और आग्नेयप्राण है । इस पर बायव्य और याम्यप्राण प्रतिष्ठित हैं । इनके ऊपर सौम्य प्राण, आदित्यप्राण प्रतिष्ठित हैं । सबके मूलभूत होने से ही पहला युग्म ' मूलाधार ' कहलाता है । यही मूलात्मा है । मध्य का भाग हंसात्मा है । ऊर्ध्वभाग शिवात्मा है । एक मूलात्मतन्त्र है, एक हंसा-मतन्त्र है एवं एक शिवात्मतन्त्र है । इन तीनों तन्त्रों के क्रमशः - विष्णु, ब्रह्मा, शिव - तीन तन्त्रायी हैं । तीन महकमे हैं । तीनों के तीन ऑफिसर हैं । तीनों का कर्म बिल्कुल पृथक् - पृथक् है । प्रपद से प्रविष्ट होने वाला अग्निगर्भित प्राप्यप्राण विष्णु है । विष्णु स्त्रयं अग्निरूप है । परन्तु यह श्रापोमण्डल में सुप्त है । वह प्रापोमय समुद्र यही आप्यप्राण है । यही प्रपद से घुसकर पहले यह मूलाधार में जाते हैं । यह इनकी पहली उछाल है । मूलाधार से नाभि में जाते हैं । यह दूसरा विक्रम है । यहाँ से हृदय पर जाते हैं, यह तीसरा विक्रम है । यही त्रिविक्रमावतारघारी आप्यप्राणगभित आग्नेयप्राणरूप विष्णु इस पहले तन्त्र के अध्यक्ष हैं । इस पृथिवीरूप प्रथमतन्त्र में ही विष्णु के तीन लोक हैं । प्रपद से मूलाधार तक पृथिवीलोक है । मूलाधार से नाभि तक अन्तरिक्षलोक है, नाभि से हृदय तक दिव्यलोक है । तीन विक्रम से तीनों लोकों को अपने अधिकार में कर रखा है— १ - प्रपद से मूलाधार तक २- मूलाधार से नाभि तक ३- नाभि से हृदय तक — पृथिवी - प्रथम विक्रम अन्तरिक्ष -द्वितीय विक्रम -- द्यौ - तृतीय विक्रम → त्रिविक्रमावतारधारी-विष्णुस्तत्राय उदर से हृदय तक दूसरा तन्त्र है । यहां पर वायव्यप्राणविशिष्ट याम्यप्रारण की सत्ता है । यम संयमन करने वाला स्थित प्राण है । स्थिति तत्त्व ही ब्रह्मा है । इस हृदयस्थित वायव्यप्राण का काम है - अर्वाक् - पराक्माग का संयमन करना । ' तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ' के अनुसार इसी केन्द्र प्रजापति के आधार पर नीचे ऊपर का भाग स्तम्ब है- स्थित है । हृदय नहीं तो कुछ नहीं । हृदय ही सारे शरीर की प्रधान प्रतिष्ठा है । इसी नियमन के कारण ' हृ - द - यम्'- तीनों में से ' यम् ' को [ ५६ ]