प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 121–130

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 121–130

पृष्ठ 121

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 121 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य विषणाप्राणनिरूपण अन्तर्यामी सत्य बन रहा है । अथर्वासोमरूप रयि और अंगिरारूप प्राण का जो चरित है - अर्थात् संसार में ( मैथुनी सृष्टि में ) जो रयिप्राण की व्याप्ति है वह भी इसी की महिमा है । वही प्राण रयिप्राण रूप में परिणत होकर संसृष्टिरूप सृष्टि में परिणत हो रहा है । इस मन्त्र में ' ऋषीणां चरितं सत्यम् ' से स्वयम्भूप्राण की ओर इशारा है । ' अथर्वाङ्गिरसामसि ' इससे पारमेष्ठ्य रयिप्राण प्रपेक्षित है || ८ ||

--अपि च-" इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।

त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः " ॥६ ॥

परमेष्ठी के नीचे सूर्य्य है । सूर्य्यं के नीचे धन्तरिक्ष है । अन्तरिक्षस्थ प्राण रूद्र कहलाता है । सीर अमृतप्राण इन्द्र कहलाता है । इस मन्त्र में क्रमप्राप्त इन्हीं दोनों स्वरूपों की स्तुति है । सूय्यं की रश्मियों में जो एक सन्ताप है - तेजी है - उग्रता है - वह साक्षात् रुद्र है । इस मान्तरिक्ष्य उग्रप्राण के लिए-' ये चैनं रुद्रा श्रभितो दिक्षु श्रिताः - इत्यादि कहा जाता है । इन्द्र प्राणात्मक है, अतएव श्रषामच्छद है । रुद्र तेजोमय है । वही प्राण प्राणरूप से इन्द्र बना हुआ है । अपने तेजोमय उग्रभाव से रुद्र बना हुआ है । यह रुद्र तेजोमय बनकर संसार का संहार करता है एवं यही सौम्य बनकर शिवरूप में परिणत होता हुआ संसार का पालन करता है । रुद्रात्मक, इन्द्रात्मक सूर्य्यरूप में परिणत होकर विशाल अन्तरिक्ष में प्रदीप्त होकर बड़ी प्राण ज्योतिरूप में

परिणत हो रहा है । सब ज्योतियों का पति बन रहा है ॥ २ ॥

--अपि च PIR " यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राणते प्रजाः । 1e श्रानन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायानं भविष्यति ' - इति ॥१० ॥

दृश्यमण्डल के अनुसार सूय्यं के नीचे चन्द्रमा है । चन्द्रमा सोमरूप अन्न है । यही बढा, सोम, वारि ( वृष्टि ) प्रादिरूप में परिणत होता हुआ अन्न बनता है । इस मन्त्र में प्राप्त प्राण के इसी अशरूप चन्द्रमा का निरूपण है । यह प्राण जब सोमादिरूप में परिणत होकर बरसता है - उस समय सुप्त प्रजा चेष्टा करने लगती है । वृष्टि होते ही औषध्यादि जड़ प्रजा, चेतन प्रजा सबके चित्त प्रफुल्लित हो जाते हैं । ‘ अहा! अब तो यथेच्छा अन्न होगा- यह कह कहकर सारी प्रजा मानन्द में निमग्न हो जाती है - अन्न हकर सारी प्र मी तुम्ही हो - यही तात्पय्यं है ॥१० ॥

[ १०७ ]

पृष्ठ 122

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 122 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय प्रश्न एक ह अपि च-प्रश्नोपनिषद्विज्ञान माध्य धिषणाप्राणनिरूपणं

कलि-" व्रात्यस्त्वं प्राणकऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ।

वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ” ॥११ ॥

प्राणों की कई जाति हैं । उनमें एक एकषि प्राण है । पूषाप्राण का नाम ही एकषि प्राण है-जैसा कि - ' पूषन्नकर्षे यम सूर्य प्राजापत्ये १ - इत्यादि मन्त्र में विस्तार से बतला दिया गया है । ' इयं वं पृथिवी पूषा ' २ - के अनुसार पृथिवी पूषारूप एकषिप्राणमयी है । चन्द्रमा के नीचे पृथिवी है, अतएव इस मन्त्र में ऋषि क्रमप्राप्त इस प्राण के इसी रूप का निरूपण करते हैं । विभिन्न जातीय अनन्त प्राणों की राशि को ' व्रात ' कहते हैं । लोकभाषा में जिसे समूह कहा जाता है, ग्राम्यभाषा में जो ' थोक - टोली ' आदि नाम से प्रसिद्ध है एवं यवनभाषा में जो ' काफिला ' नाम से प्रसिद्ध है - उसी के लिए वेद में ' व्रात ' शब्द आता है । इस व्रात का मुखिया ( मण्डलेश्वर ) ' व्रात्य ' कहलाता है । यह उक्थप्राण रश्मिरूप से अनन्त प्राणों को उत्पन्न कर उनमें अध्यक्षरूप से प्रतिष्ठित है, अतएव हम इसे ' एकषि व्रात्यप्राण ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसीलिए तो इस आत्मरूप एकर्षिप्राण के लिए- ' प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म ' - यह कहा जाता है । और प्राण इसके अन्न हैं । यह उन सबका भोग करने के कारण - ' अत्ता ' है । जिसमें प्राण रहता है वह बस्तु सत् कहलाती है । विश्व प्राणमय होने से सत् है । प्राण में प्राण नहीं रहता, अतएव वह स्वयं सत्रूप होता हुआ घसत् है । यह असत् प्राण- उस सत् विश्व का प्रभव, प्रतिष्ठा परायणरूप होने से सत्पति है- ' तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बोल हरन्ति ' के अनुसार सारे जीव सारे भूतप्रपञ्च उसे अन्न देने वाले हैं । अर्थात् - हम सब ( पदार्थ मात्र ) उस अत्ता के अन्न बन रहे हैं । मातरिश्वा वायु से परिच्छिन्न होकर ही वह ब्रह्मप्राण सुब्रह्मप्राण से युक्त को-बनकर शुक्ररूप में परिणत होकर जगत् का उपादान बनता है, अतएव हम इसके मातरिश्वरूप चराचर को रेतोधा - पिता कहने के लिए तय्यार हैं । ८ मन्त्र में स्वयम्भू - परमेष्ठी के प्राण का निरूपण है । 8 वें मन्त्र में सूर्य - अन्तरिक्ष के प्राण का निरूपण है । १० वें मन्त्र चन्द्रमा का निरूपण है । इस ११ वें में परोक्षरूप से पार्थिव प्राण का निरूपण है । इस प्रकार ( ८-६-१०-११ ) इन चार मन्त्रों से ऋषि ने उस ' ग्रह ' - रूप ग्रात्मप्राण के प्राधि-दैविक पाँचों रूपों का निरूपण कर दिया है । अब नीचे के एक मन्त्र से प्राध्यात्मिक पञ्चस्थान का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-" या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । याच मनसि संतता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः " ॥१२ ॥

१- ईशोप ० १६ । २- शत ० ब्रा ० २।५।४।७ । [ १०८ ]

पृष्ठ 123

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 123 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य धिषणाप्राणनिरूपण मन्त्रार्थं स्पष्ट ही है । -8-" प्राणस्येवं वशे सर्वं त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् । " वह मातेव पुत्रान्- रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥१३ ॥

( श्रियं प्रज्ञां च धेहि न इति वा ) ( श्रियं प्रज्ञां विधेहि न- इति बा ) बाह्य - सम्पतिरूप अभ्युदय ' श्री ' है । अन्तः सम्पत्तिरूप निःश्रेयस - ' प्रज्ञा ' है ।

ईश्वररूप प्राण हमें अभ्युदय और निःश्रेयस प्रदान करे " ।

॥ इति धिवरणाप्राणप्रधानो मुख्यप्राणनिरूपणात्मको द्वितीयप्रश्नः ॥

॥२ ॥

[ १०६ ]

पृष्ठ 124

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 124 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इस पृष्ठ पर कोई पाठ नहीं मिला — ऊपर मूल चित्र देखें।

पृष्ठ 125

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 125 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ प्रज्ञाप्राणनिरूपणात्मक स्तृतीयप्रश्नः III ३- चन्द्रमा- प्रज्ञानम्

" जाग्रत्स्वप्न सुषुप्त्यादिप्रपञ्चं यत् प्रकाशते ।

तद् ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते " ॥

( कैवल्योप ० १।१७ )

" भ्रुवोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः ।

जानीयादमृतं स्थानं तद् ब्रह्मायतनं महत् " ॥

( ध्यानबिन्दूप ० ११४० )

पृष्ठ 126

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 126 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

STO UPPSSPIRIER

पृष्ठ 127

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 127 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ प्रश्नोपनिषदि -तृतीयः प्रश्नः [ मूलपाठः ] अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ ॥ भगवन्कुत एव प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्छरीर श्रात्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥

॥२ ॥

तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि श्रात्मन एष प्राणो जायते ॥ यथैषा पुरुषे छायेतस्मिन्नेतदाततं ममोकृते-नायात्यस्मिञ्छरीरे ॥३ ॥

यथा सम्राडेवाधिकृतान्विनियुङ्क्ते एतान्ग्रामानेतान्ग्रामानधितिष्ठस्वैत्येव-मेवैष प्राण इतरान्प्राणान्पृथक्पृथगेव संविधत्ते ॥४ ॥

पायूपस्थेऽपानं चक्षुः श्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठते ॥५ मध्ये ॥ तु समानः ॥ एष ह्येतद्धृतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्ताचिषो भवन्ति हृदि ह्येष श्रात्मा ॥ अत्रेतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्ततिद्वसप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥६ ॥

श्रथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥७ ॥

श्रादित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः ॥ पृथिव्यां या देवता संषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायु-नः ॥८ ॥

[ ११३ ]

पृष्ठ 128

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 128 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः ॥ पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि संपद्य-मानैः ॥६ ॥

यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासंकल्पितं लोकं नयति ॥ १० ॥

॥११ ॥

य एवं विद्वान्प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष श्लोकः उत्पत्तिमार्यात स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ॥ श्रध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥१२ ॥

॥ इति तृतीयप्रश्नस्य मूलपाठः ॥ 11911 ॥ मा चार एकर एमा र या | उनका है bhee 11 एकी [ ११४ ]

पृष्ठ 129

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 129 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

30 अथ प्रज्ञाप्राणनिरूपणात्मकस्तृतीयप्रश्नः [ [ विज्ञानभाष्य ] भार्गव वैदर्भि के समाधान के अनन्तर परम बुद्धिमान् मेधावी कौसल्य प्राश्व-लायन ने आकर विनीतभाव से भगवान् पिप्पलाद से पूछा कि भगवन्! १. “ कुत एष प्राणो जायते "? २. " कथमायात्यस्मिञ्छरीरे ”? ३. " शरीर प्रात्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते ( प्रतितिष्ठते ) "? ४. “ केनोत्क्रमते "? ५. " कथं बाह्यमभिधत्ते "? ६. " कथमध्यात्ममिति? ” इस प्रकार आश्वलायन ने एक साथ ६ प्रश्न कर डाले । प्रथम मन्त्र है-" अथ हैनं कौसल्यश्चाश्वलायनः प्रपच्छ । x x x ॥ कथमध्यात्ममिति " ॥१ ॥

प्रकृतिमण्डल में यह प्राण कहाँ से, किससे, कैसे पैदा होता है? इसका प्रभवस्थान कौन आता है? यही पहला प्रश्न है । पैदा होकर किस मार्ग से, किस स्वरूप से, किसके आधार से यह शरीर है ' में? -दूसरे है - यही दूसरा प्रश्न है । ' व्यापक प्राण शरीर में आकर परिच्छिन्न किस कारण से बनता किस रूप से प्रति-प्रश्न का यही तात्पय्यं है । श्रध्यात्म में प्रविष्ट होकर आत्मसंस्थाओं का विभाब कर ष्ठित होता है एवं किस व्यापार से किसके आधार पर, कैसे यह बाहर निकलता है एवं अधिदेवतमण्डल को इसने कैसे विधृत कर रखा है एवं अध्यात्म को कैसे वेष्टित कर रखा है? --[ ११५ ]

पृष्ठ 130

प्रश्नोपनिषद्, पृष्ठ 130 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण १ - प्रकृति में कैसे उत्पन्न हुआ? २- पैदा होकर शरीर में कैसे आया?. ३ - आकर किस रूप से प्रतिष्ठित हुआ? ४ - श्राकर किस मार्ग से चला गया? ५ - किस रूप से प्रधिदैवत को पकड़े रखता है? ६- कैसे अध्यात्म पर अपना प्रभुत्व रखता है? प्रथम मन्त्र के ६ प्रश्नों का यही स्वरूप है । इन प्रश्नों के देखने से आपको मालूम हो गया होगा कि आश्वलायन कितने योग्य शिष्य थे? इसी योग्यता ने इनसे एक साथ परमरहस्यपूर्ण ६ प्रश्न करवा डाले ॥१ ॥

योग्य शिष्य की इस योग्यता से पिप्पलाद गद्गद हो गए । अपने इस प्रेमभाव को वे न रोक सके । उनके मुँह से निकल गया कि--" तस्मै स होवाचातिप्रश्नान्पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥२ ॥

श्राश्वलायन! तुम अतिप्रश्न कर रहे हो । एकदम ६ प्रश्नों का समाधान चाहते हो । सचमुच तुम ब्रह्मिष्ठ हो । प्राण ब्रह्म के ऊपर तुम्हारी पूर्णनिष्ठा है । पहले स्वयं प्राण ही दुरूह है । उस पर भी उसके जन्मादि का स्वरूप तो और भी दुस्तर है । परन्तु उन सबको तुम समझना चाहते हो । इससे मालूम होता है कि तुम्हारे में पहले से ही प्राणब्रह्म का स्वरूप संस्काररूप से खचित हो रहा है । तुम पहले से ही ब्रह्मिष्ठ ( प्राणवित् ) हो । इसीलिए यद्यपि इन ६ों प्रश्नों का समाधान करना कठिन है-साधारण मनुष्य इसके अधिकारी नहीं हैं उनको इनका स्वरूप नहीं बतलाया जा सकता, परन्तु तुम्हारी प्रश्नशैली से हमें मालूम हो गया है कि तुम इस विद्या के अधिकारी हो, अतएव हम तुमको इन ६ यों प्रश्नों का उत्तर देते हैं ॥ २ ॥

यह है - इस तीसरे प्रश्न का उपोद्घात । तीसरे मन्त्र से उपनिषत् - विषय प्रारम्भ होता है— " श्रात्मन एष प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृते-नायात्यस्मिञ्छरीरे ” ॥३ ॥

JI ( १ ) - पहला प्रश्न है--" कुत एष प्राणो जायते "? ' प्राण ' के लिए हम पहले भी - ' प्राणस्वरूप बडा ही दुर्ज्ञेय है- यह कह आए हैं एवं यहाँ भी हमें इसके लिए ये ही अक्षर कहने पड़ते हैं । ' प्राण ' कहाँ से पैदा होता है? इसका सीधा सा उत्तर है- ' श्रात्मा ' । आत्मा, प्राण, पशु - इन तीनों के लिए उक्थ, अर्क, अशिति- इन शब्दों का प्रयोग हुआ करता है । इन तीनों के स्वरूप- ज्ञान के अनन्तर ' कुत एष प्राणो जायते ' इसका समाधान हो जाता है । जो वस्तु जिसका उक्थ है, साम है, ब्रह्म है - वह वस्तु उसका आत्मा कहलाता है । ' यदुक्थं सत्, यत् साम सत्, यद् ब्रह्म स्यात्-[ ११६ ]