प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 131–140
प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 131–140
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प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण स तस्य श्रात्मा'- श्रात्मा का यही साधारण लक्षण है । इस लक्षण के अनुसार घड़े का आत्मा मिट्टी है । कटक का आत्मा सुवर्ण है । वस्त्र का आत्मा तन्तु है । जिससे वस्तु स्वरूप उठता है- उत्पन्न होता है - उसे ' यत उत्तिष्ठति तदुक्थम् ' इस व्युत्पत्ति से ' उक्थ ' कहा जाता है । उपादानकारण का नाम ही ' उक्थ ' है । घट, कटक, वस्त्र इन तीनों का उक्थ क्रमशः ' मृत् ', ' सुवर्ण ', ' तन्तु ' है । साम कहते हैं समानता को । वह उक्थ ही यावत् काय्यों में समानरूप से रहता हुआ ' साम ' कहलाता है । घट, शराव, उखा ( पातली ), झाल श्रादि यच्चयावत् मृत्पात्र परस्पर में सर्वथा भिन्न हैं, परन्तु मिट्टी सब में समान है । सर्वत्र मिट्टी अभिन्न है । अतएव इन मृण्मयपात्रों का मिट्टी - ' साम ' है । ऋचा समं-मेने ' - यह साम का लक्षण है । घट - शरावादि मृण्मयपात्र मूर्तिएँ हैं । ' ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहु: ' -के अनुसार मूर्त्तिएँ ऋक् हैं । एक - एक मूर्ति एक - एक ऋक् है । इन विभिन्न ऋचाओं से मिट्टी समान है । घट और मृत्ति - दोनों का समान सम्बन्ध है । जितनी ऋक् है उतनी मिट्टी है । मृण्मयपात्ररूप ऋक् का जो आकार है - वही उस मिट्टी का आकार है, श्रतएव ' ऋचा समं मेने ' - इस व्युत्पत्ति से हम मिट्टी को मृण्मय मूत्तियों का साम कहने के लिए तय्यार हैं । तीसरा है - ब्रह्म । प्रतिष्ठातत्त्व का नाम ही ब्रह्म है । यह प्रतिष्ठा - आत्म, लोक, विधृति भेद से तीन प्रकार की है । ' घटो s स्ति ' में जो ' है ' भाग है - वह आत्म - प्रतिष्ठा है । घड़ा मिट्टी में प्रतिष्ठित है । मिट्टी की प्रतिष्ठा भी इस घट में है । यही दूसरी लोकप्रतिष्ठा है एवं घड़ा पृथिवी पर रखा है । पार्थिवप्रतिष्ठा से यह विधृत है । यही तीसरी विधृतिप्रतिष्ठा है । इसी को परप्रतिष्ठा भी कह सकते हैं । इन तीनों में से प्रकृत में प्रभवरूपा लोकप्रतिष्ठा का ही ग्रहण है । मिट्टीरूप उक्थ में घट प्रतिष्ठित है । घट को मिट्टी ने धारण कर रखा है, अतएव ' बिर्भात ' - इस व्युत्पत्ति से मिट्टी उस घड़े का ब्रह्म है । बस, उक्थ - ब्रह्म - साम भावत्रयोपेत मिट्टी ही घट का आत्मा है । उक्थ प्रभव है, ब्रह्म प्रतिष्ठा है एवं अवसानरूप साम परायण है । उक्थ, ब्रह्म, साम कहो या प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण कहो - एक ही बात है । पार्थिव प्रजा का उक्थ - ब्रह्म - साम पृथिवी है । रूपप्रपञ्च का उक्थ - ब्रह्म - साम वाक् है । मन - प्राण - वाक् आत्मा के तीन विवर्त्त हैं । तीनों क्रमशः रूप, कम्मं, नाम से भी व्यवहृत हैं । यही आत्मा का एक स्वरूप है । पृथिवी उक्थ है । सूय्यं उक्थ है । चन्द्रमा उक्थ है । संसार के यावन्मात्र पदार्थ ' उक्थ ' हैं । उन उन लोक के पदार्थों के लिए वे वे लोकी उक्थ हैं - ब्रह्म हैं - साम हैं । इसी उक्थ-साम- ब्रह्मसबन्धी आत्मस्वरूप को लक्ष्य में रखकर ब्राह्मण - श्रुति कहती है-" त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म । तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थम् । अतो हि सर्वारिण नामान्युत्तिष्ठन्ति । एतदेतेषां साम एतद्धि सर्वैर्नामभिः समं । एतदेषां ब्रह्म । एतद्धि सर्वाणि नामानि बिर्भात " - इत्यादि । ' ' उक्थब्रह्मसामसमष्टि आत्मा है ' - पूर्व के सारे प्रपञ्च से हमें प्रकृत में यह मात्र बतलाना है । आत्मा विना प्राण के नहीं रहता । प्राण विना वाक् के नहीं रहता । मनभाग श्रात्मा है । प्राण-१- शत ० ब्रा ० १४ । ४ । ४ । १ । [ ११७ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिष द्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण भाग प्राण है । वाक्माग वाक् है । तीनों की समष्टि प्रजापति है । प्रजापति में तीन उक्थ हैं - तीन साम हैं, तीन ब्रह्म हैं । मन पहला उक्थ, ब्रह्म, साम है । यह रूपों का आत्मा है । प्राण दूसरा उक्थ, ब्रह्म, साम है । यह कम्मों का आत्मा है । वाक् तीसरा उक्थ, ब्रह्म, साम है- यह नामों का श्रात्मा है । जो उक्थ है - वही ब्रह्म है वही साम है, अतएव हम तीनों का केवल ' उक्थ ' शब्द से ही ग्रहण करेंगे । इस उक्थ में से प्राण निकलते हैं । उक्थ से निकलने वाले प्राण ही ' धकं ' कहलाते हैं । यह प्राण उस ' प्रात्मोक्थ ' से निकलकर किसी वस्तु को पकड़ते हैं- बस, प्राणगृहीत जो वस्तु है वही ' प्रशिति ' ( अन्न ) है । मन को सूर्य्यबिम्ब समझिए । मन स्वस्थान पर प्रतिष्ठित है । इसमें से रश्मिएँ निकलती हैं । ये मनोमय रश्मिएँ रूपविषय को पकड़ती हैं । बस, मन उक्थ है, रश्मि प्राण है, रूप श्रशिति है । एवमेव प्राण एक बिम्ब है । इससे निकलने वाली रश्मि अर्क हैं । इन रश्मियों से सम्बद्ध कर्म्म पश्च अशिति है । वाक् उक्थ है । रश्मिएँ अर्क हैं । नाम अशिति है । इस प्रकार मन प्राण वाक् तीनों उक्थों में उक्थ, अर्क, अशिति तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । यह उक्थार्काशितिभाव अपेक्षाभाव पर निर्भर है । मन स्वयं उक्थ है, प्राण अर्क है, वाक् प्रशिति है । प्रशिति अन्न है । अन्न भोग्य पदार्थं हैं । भोग्य पदार्थं स्वयं अनात्मीय आत्मपरिगृहीत होता है, अतएव ऋषि ने इसे ' पशु ' शब्द से व्यवहृत किया है । ' उक्थ, अर्क, अशिति श्रात्मा - प्राण- पशु ' एक ही बात है— १- मन - ज्ञानमय आत्मा उक्थ २- प्राण - क्रियामय प्राण - अर्क ३ - वाक् – प्रर्थमय पशु - अशिति १- मन -उक्थ २- मनरश्मिएँ - अर्क ३- रूप - प्रशिति १- प्राण -उक्थ २- प्राणरश्मिएँ -अर्क ३ - कर्म १- वाक् -अशिति -उक्थ २- वाक् रश्मिएँ -अर्क ३- नाम -अशिति [ ११८ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण हैं । तीनों के इन तीनों की समष्टि ही प्रजापति है । संसार के पदार्थमात्र नामरूपकम्मत्मिक ' प्रजा-समष्टि ही प्रजापति है । सुतरां सर्वत्र -उक्थ - ब्रह्म - साम मन - प्राण - वाक् हैं । मन, प्राण, वाक् की इत्यादि श्रुतियों की व्याप्ति सिद्ध हो जाती पतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किञ्च ' ' ' प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो ०२ -है । इससे निकलने वाली जो रश्मिएँ है । इस मनःप्राणवाङ्मय प्रजापति का उक्थभाग प्रात्मा कहलाता सा उत्तर है - आत्मा । आत्मा ही हैं - वे ही प्राण हैं । ' प्राण ' तत्त्व कहाँ से पैदा होता है? - इसका सीधा हो जाते हैं । षोडशी आत्मा प्राण का प्रभव है । इन आत्माओं के पुरुष ( १ ) और प्रकृति ( ५ ) भेद से ६ भेद, पृथिवी - ये पाँच प्राकृत पहला आत्मा है । यही आत्मा पुरुष आत्मा है एवं स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, चन्द्र - उक्थ हैं । इन ६ ओं में से ६ प्रकार प्राण निकलते हैं । ' प्रकृति पुरुषं आत्मा हैं । ये ६ आत्मा हैं चैव विद्धयनादी उभावपि 3 के अनुसार पाँचों प्राकृतात्मा और पुरुष अभिन्न हैं, अतएव है - षोडशी जैसा कि श्रात्मा दूसरे के प्राणभाग का प्राकृतात्माओं के स्वयम्भू नाम के प्राकृतात्मा में अन्तर्भाव । इससे हो निकलने जाता वाले प्राण का प्रश्न में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । स्वयम्भू एक पिण्ड है - उक्थ है - आत्मा है । नाम यजुः प्राण है - इसे ही ' परोरजा ' प्राण कहा जाता है । परमेष्ठी पिण्ड धिषणाप्राण है है । चन्द्रात्मा इससे निकलने वाला प्राण रयिप्राण है । सूर्य आत्मा से निकलने वाला प्राण है । बस, से निकलने वाला प्राण प्रज्ञाप्राण है एवं पृथिवी- आत्मा से निकलने वाला प्राण भी कुल भूतप्राण पाँच ही प्रकार का आत्मा चूँकि कुल पाँच हैं एवं प्राण आत्मा से उत्पन्न होता है, अतएव प्राण होता है - जैसा कि पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है-संसार में जितने वस्तुपिण्ड हैं - सब नामरूपकर्मात्मक होने से मनःप्राणवाङ्मय हैं । क्योंकि के अनुपपन्न है नाम विना वाक् के अनुपपन्न है, रूप विना मन के अनुपपन्न है एवं कर्म विना प्राण तत्त्व आत्मा है, एवं ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमय: - इसके अनुसार मनःप्राणवाङ्मय ' आत्मा ' शब्द का प्रयोग कर सकते । इसी आधार पर - ' आत्मैवेदं सर्वम् ' अतः हम वस्तुमात्र के लिए वा एष प्राणो जायते ' । -यह निगम चलता है । ऋषि - प्राण का प्रभव बतलाते हुए कहते हैं कि - ' श्रात्मनो कीजिए - सबमें से रश्मिएँ आत्मा से प्राण उत्पन्न होता है । श्राप जितने भी पिण्ड देख रहे हैं - विश्वास प्राणतत्त्व के--निकल रही हैं । स्वज्योतिर्मय परज्योतिर्मय आत्माओं में तो भूतज्योति के कारण उस है । दोनों की रश्मिभूत के सहारे प्रत्यक्ष हो जाता है । सूय्यं स्वज्योतिर्मय है । चन्द्रमा से परज्योतिर्मय निकलने वाली रश्मियों को रश्मियाँ तो हम देखते हैं । परन्तु रूपज्योतिर्मय पृथिवी आदि पदार्थों समझो । वस्तु-हम नहीं देखते । परन्तु विज्ञान कहता है कि तुम पिण्डमात्र के साथ प्राण का सम्बन्ध प्राणमण्डल में-मात्र में से प्राण निकलता है । उस प्राण का मण्डल बडी दूर तक बनता है । उस १ - शत ० ब्रा ० ६।१।२।११ । ३ - गीता १३।१६ । २ - यजुर्वेद २३।६५ । [ ११ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राण निरूपण अशिति बैठी रहती है । इसी अशिति को ' पशु ' कहा जाता है । सूर्य्य ' उक्थ है । रश्मिमण्डल धकं है । रश्मिमण्डलरूप बृहत्साम में प्रतिष्ठित पृथिवी, चन्द्र, मंगल, शनि, बुध, शुक्र आदि ग्रह, अस्मदादि चतुर्दशविध भूतसर्गं प्रशिति हैं । इन सबको सूर्य्यं अपनी रश्मियों द्वारा खाया करता है । सबका रस चूसा करता है । यह सारा प्रपञ्च उसी उक्थ सूर्य्य से पैदा होकर, उसी पर प्रतिष्ठित होकर उसी का अन्न बन रहा है । पृथिवी उक्थ है । पृथिवी की कृष्ण रश्मिएँ अर्क हैं । कृष्ण - रश्मिरूप रथन्तर साम में प्रतिष्ठित हम सब प्रशिति हैं । हम उक्थ हैं । हमारे शरीर से निकलकर चारों ओर व्याप्त होने वाली रश्मिएँ अकं हैं । शरीर, स्त्री, प्रजा, पशु, वित्त सब हमारी प्रशिति हैं । जहाँ तक हमारी संपत्ति हैं । रहती है, हमारी आत्मरश्मिएँ व्याप्त रहती हैं । सारी सम्पत्ति आत्मरश्मियों के भीतर प्रतिष्ठित इसी आधार पर - ' यावद् वित्तं तावदात्मा ' यह कहा जाता है । जो सूय्यं पृथिवी प्रादि हमारा अन्नाद है - वही हमारा अन्न भी है । हम सबके रसों को खाकर ही जीवित रहने में समर्थ होते हैं । निदर्शन-मात्र है । संसार के पदार्थमात्र में उक्थ, अर्क, अशिति- तीनों भाव हैं । सब एक दूसरे के प्रति अन्न हैं, अन्नाद हैं । इसी अशितिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है—
" ग्रहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य नाम ।
यो मा ददाति स इदेव मावदहमन्नमन्नमदन्तमद्मि " ॥ २
हैं । वस्तुमात्र आत्मा है । इस उक्थ आत्मा से चारों ओर निकलने वाली रश्मिएँ ही प्राण प्राण कहाँ से उत्पन्न हुआ इसका उत्तर है? - श्रात्मा उक्थ पिण्ड । आत्मभाग मन है । यही मन उक्थ १ - उक्थ अर्क - प्रशिति का विशद विवेचन ऐतरेय श्रारण्यक ( २।१।२ ) में देखना चाहिए । उक्थ अर्क अशिति पृथिवी -अग्नि -अन्न अन्तरिक्ष - वायु -अन्न द्यौ - प्रादित्य -अन्न पुरुष - रश्मि -अन्न मुख _ - वाक् -अन्न नासा -वायु -अन्न ललाट -चक्षु -अन्न २- सामवेद पू ० ६।१०।९ । [ १२० ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य 9 प्रज्ञाप्राणनिरूपण है । इससे निकलने वाली रश्मिएँ प्राण हैं । प्राण से बद्ध वाक्भाग पशु है । प्राण सर्वथा निराकार है-अघामच्छद है । वह जगह नहीं रोकता, अतएव प्राण का - रूपरसगन्धस्पर्शशब्दरहितः - उक्थात्मनो निर्गतः कश्चन तत्त्वविशेषः प्राणः ' यह लक्षण किया जाता है । वाक् भूतमय होने से घामच्छद है जगह रोकने वाली है । इसी अभिप्राय से- ' वाग् धामच्छत् १ - यह कहा जाता है । हम जो कुछ देखते हैं-सब वाक् है । आत्मप्रजापति इस भूतमय वाक्माग को ही देखने में समर्थ होता है, अतएव ' यदपश्यत्'-इस व्युत्पत्ति से हम इसे ' पशु ' कहने के लिए तय्यार हैं । प्रत्यक्ष दृष्ट वस्तुमात्र पशु है । इस वाक्रूप पशु की प्रतिष्ठा प्राण है । प्राण पर वाक् उपहित रहती है । इस प्राण ने ही उस वस्तु को पकड़ रखा है । जब तक प्राण है, तब तक वह वस्तु है । प्राण ( दम ) निकले बाद वस्तुपिण्ड विशीर्ण हो जाता है-जर्जरित होता हुआ नष्ट हो जाता है । हम वाक् को देखते हैं, प्राण को नहीं देखते, अतएव हम प्राण को अधामच्छद कहते हैं । इस प्रधामच्छद प्राण का पूर्ण विकास अधिदैवत में सूर्य में है, अध्यात्म में चक्षुरिन्द्रिय में है, अतएव प्रकाश प्रधामच्छद है । चक्षु मी अधामच्छद है । चक्षुप्राण में सारा विश्व ही एक ही बिन्दु पर समा जाता है । उधर एक ही मकान में एक ही स्थान पर १० दीपप्रकाश समा जाते हैं । सब परस्पर प्रसंग हैं । यह नीरूप असंग प्राणतत्त्व उस केन्द्रस्थ उक्थ मनरूप आत्मा पर हित है । आत्मरश्मिएँ ही तो प्राण हैं, अतः इनका उसी पर हित रहना न्यायसंगत है । बस, प्राण के इसी साधारण प्रभवविज्ञान को लक्ष्य में रखकर पिप्पलाद कहते हैं-" श्रात्मन एष प्राणो जायते " । आत्मा से उत्पन्न होकर प्राण किस तरह से उस आत्मा से युक्त रहता है? -इसका उत्तर देते हुए आगे जाकर ऋषि कहते हैं-" यथा एषा पुरुषे छाया - एतस्मिन्नेतदाततम् ” । अपने शरीर की आत्मा को आबालवृद्ध सभी पहचानते हैं । बस, छाया का और शरीर का जो सम्बन्ध है - करीब - करीब वही सम्बन्ध प्रात्मा और प्राण का है । करीब - करीब हमने इसलिए कहा है कि छायादृष्टान्त के साथ प्राण का एक देश से सम्बन्ध है । छाया शरीर से अविनाभूत है । जब तक शरीर है तब तक अवश्यमेव छाया है । छाया शरीर से बद्ध है, परन्तु शरीर से पृथक् तत्त्व है । साथ ही में इसका प्रभव शरीर ही है । तथैव जब तक प्राण है, तब तक अवश्यमेव आत्मा है । प्राण आत्मा से बद्ध है, परन्तु आत्मा से पृथक् तत्त्व है । साथ ही में इस प्राण का प्रभव वही आत्मा है । इस अंश में छाया - प्राण समान हैं, परन्तु छाया शरीर के एक भाग में रहती है - प्राण चारों ओर रहता है । ' तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषां प्रधः स्विदासीदुपरिस्विवासीत् ' २ - के अनुसार प्राण अपना वर्तुलमण्डल बनाता है । दीप - लौ प्रात्मा है । उससे निकलकर चारों ओर अपना गोलमण्डल बनाने वाला रश्मि-१- शत ० ब्रा ० १०।१।३-१० । २ - ऋग्वेद मं ० १०।१२६।५ । [ १२१ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण प्राण उसी प्रकार इस मण्डल प्राण है । बस, आत्मा से निकलकर चारों ओर अपनी व्याप्ति रखता । हुआ आत्मा में प्रातत रहता है - जैसे कि इस शरीर में छाया प्रातत रहती है बस, पहले प्रश्न का यही समाधान है । ( २ ) दूसरा प्रश्न है: " कथमायात्यस्मिञ्छरीरे "? ॥ १ ॥
हैं । सूर्य पात्मा है । हमने बतला दिया है कि जीवसृष्टिभेद से अनन्त प्रकार के प्राण हो जाते । नया प्रतिबिम्बरूप सूर्य उत्पन्न रश्मिएँ प्राण हैं । एक पानी के पात्र में रश्मि का सम्बन्ध भी स्वतन्त्र होता है प्राण निकलने लगते हैं । यद्यपि इस हो जाता है । पर्क उपय बन जाता है । अब इससे हो जाता केवल पाँच ही प्राणों में अन्तर्भाव प्रकार अनन्त प्राण हो जाते हैं, तथापि इन अनन्त प्राणों का पांच प्राकृतात्मा है । श्रात्मा पाँच है क्योंकि प्रकृतिमण्डल में स्वयम्भू परमेष्ठी, सूयं चन्द्र पृथिवी जाती पाँच प्राणों की सत्ता सिद्ध हो हैं । श्रात्मा से प्राण निकलता है । सुतरां श्रात्मपञ्चत्व के कारण सम्बन्ध होता है- ' कथमायात्यस्मिन् शरीरे '? -है । इन पांचों प्राणों का आत्मा के साथ किस आधार पर इस प्रश्न का यही निष्कर्ष है । बुद्धि ), शरीररूप - ये पाँच श्रात्मा हैं । हमारे अध्यात्म में अव्यक्त, महान्, प्रज्ञान ( मन ), विज्ञान कि अव्यक्त ( के द्वारा वाक्प्राण वाले परोरजा-इससे इस प्रश्न का साधारणमा यही उत्तर हो जाता है पारमेष्ठ्यप्राण का अधिकृत करके रविप्राणवाले प्राण का अध्यात्म में आगमन होता है । महान को का प्रागमन होता है । विज्ञानात्मा के भागमन होता है । प्रज्ञान के द्वारा प्रज्ञाप्राणवाले चान्द्रप्राण के द्वारा भूतप्राणवाले पार्थिव प्राण का द्वारा धिषणाप्राणवाले सौरप्राण का प्रागमन होता है एवं शरीर इस प्रश्न का ऋषि को-आगमन होता है । ऐसी अवस्था में - ' कथमायात्यस्मिञ्छरीरे १- अव्यक्ताधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे १२ महदपि कृतेनायात्यस्मिञ्चरी रे परोरजाप्राणः स्वायम्भुवः रमिप्राणः PIR पारमेष्ठ्यः सौरः ३ - विज्ञानात्माधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे धिषणाप्राणः ४- प्रज्ञानाधिकृतेनायात्यस्मिन् शरीरे प्रज्ञाप्राणः चान्द्रः ५ - शरीराधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरीरे भूतप्राणः पार्थिवः प्रज्ञान मन को सर्वाधार मानते हुए -- यह उत्तर देना चाहिए था परन्तु यह उत्तर न देकर केवल ऋषि कहते हैं कि-[ [ १२२ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण " मनोऽधिकृतेनायात्यस्मिञ्छरो रे " - इति ॥ इस उत्तर में कुछ रहस्य है । इससे मालूम होता है कि पाँचों श्रात्माओं से किसी अन्य ही श्रात्मा का ऋषि प्रकृत में ग्रहण कर रहे हैं । प्रधानदृष्टि किसी छठे आत्मा पर है, गौणदृष्टि से ६ म्रों आत्माओं पर है । कठोपनिषत् में बतलाए गए ब्रह्म सत्य - देवसत्यस्वरूप का स्मरण कीजिए । पूर्वोक्त अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर पांचों आत्मा ब्रह्मसत्य हैं एवं शरीरस्थानीय पृथिवी एवं चन्द्रमास्थानीय प्रज्ञान दोनों के मध्य में रहने वाला अर्काग्निरूप अग्निवायुइन्द्रात्मा भोक्तात्मा देव-सत्य है । पानी से पृथिवी बनती है । पृथिवी देवसत्य का अन्तिम भाग है । पानी रुद्राग्नि के प्रवेश से घन होता है । वही पानी शर ( मलाई ) है । वही उत्तरोत्तर की घनता से पिण्ड पृथिवीरूप में परिणत होता है । इसमें प्रतिष्ठित प्रजापति के तपः - श्रम से जो तेजरस निकलता है वही अग्नि है । इस अग्नि के अग्नि, वायु, प्रादित्य- तीन भेद हो जाते हैं । यह अग्नित्रय ब्रह्मसत्य से सर्वथा पृथक् वस्तु है । इसी देवसत्य का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है--" आपो वा श्रर्कः । तद्यदपां शर श्रासीत् तत् समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्यामश्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तत - श्रग्निः । स त्रेधात्मानं व्यकुरुत । श्रादित्यं तृतीयं, वायुं तृतीयम् " - इत्यादि । ' ये ही तीनों अध्यात्मजगत् के भोक्तात्मा हैं । यह आत्मा उन पांचों ब्रह्मसत्यों से पृथक् ६ ठा श्रात्मा है - जिसका कि विशद विवेचन पूर्व के उपनिषदों में किया जा चुका है । इस ६ ठे आत्मा के अग्नि, वायु, श्रादित्य- तीन भाग हैं । अग्नि श्रात्मा श्रपान है । यही विष्णुतन्त्र है । वायुरात्मा व्यान है - यही ब्रह्मतन्त्र है | आदित्यात्मा प्राणात्मा है यही शिवतन्त्र है । अपानात्मा आग्नेय है । व्यानात्मा वायव्य है । प्राणात्मा ग्रादित्य है - ऐन्द्र है । तीन आत्माओं की समष्टि ' भोक्तात्मा ' है । बस, प्रकृत में आत्मशब्द से ऋषि इस ६ ठे आत्मा का ही ग्रहण करते हैं । वस्तुतस्तु और भी सूक्ष्मविचार करने पर भोक्तात्मा का अपानात्मा, प्राणात्मा भी इस प्रकरण से अलग निकल जाता है । केवल मध्य का वायव्य व्यानात्मा ही रह जाता है । व्यानात्मा उक्थ है । इससे वायव्यप्राण निकलता है । प्राण कहाँ से पैदा होता है? इसका अर्थ है - वायव्यप्राण कहाँ से पैदा होता है? श्रात्मा से प्राण उत्पन्न होता है - इसका उत्तर है- ' व्यानात्मा ' से यह प्राण उत्पन्न होता है । यह व्यानप्राण मन के आधार पर ही शरीर में प्रविष्ट होता है- अतएव ऋषि को ' कथमायात्यस्मि शरीरे इस प्रश्न का - ' मनोऽधिकृतेनायात्यस्मि-ञ्छरीरे यही उत्तर देना पड़ा है । मन के द्वारा ही यह वायव्यप्राण शरीर में आता है । रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र -- ये सातों धातु प्रपानाग्नि से ( पार्थिवाग्नि से ) सम्बन्ध रखते हैं । श्रोज १- शत ० ब्रा ० १०।६।५।२-३ । [ १२३ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण व्यानाग्नि ( ग्रान्तरिक्ष्य वायुरूप अग्नि ) से सम्बन्ध रखता है एवं मन दिव्यप्राणाग्नि से सम्बन्ध रखता है । अन्न में सबसे ऊपर का स्तर पार्थिव है । यही वाक्भाग है । इसके भीतर प्रोज-। रूप प्राणभाग है । सर्वान्तरतम मन है । अन्न में पार्थिव, आन्तरिक्ष्य, दिव्य तीनों रस मौजूद हैं के दूसरे शब्दों में- अपानाग्नि, व्यानवायु, प्राणइन्द्र तीनों हैं । अन्न खाया जाता है । इसके रसमल क्रमिक विशकलन से यही भुक्त अन्न क्रमशः रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मंज्जा, शुक्र- इन सात से अवस्थाओं में परिणत हो जाता है - ये सातों पार्थिव हैं- वाक् हैं । पार्थिव भाग के निकल जाने दूसरा अन्नगर्भित प्राणभाग उल्बण हो जाता है वही प्रोज है । ओज आन्तरिक्ष्य मध्यस्थ है व्यानवायु । ओज है । इसके अलग निकल जाने पर शुद्ध सोम रह जाता है - यही मन है । शुक्र से भोज बनता होकर से मन बनता है । मन चान्द्ररस है - चन्द्रमा की वस्तु है । चान्द्रसोम श्रौषधिरूप में परिणत - यह कहा पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार तीसरी अवस्था में मन बनता है, अत एव ' अन्नमयं हि सोम्य मनः " है । जाता है । शुक्रपर्य्यन्त पार्थिवभाग वैश्वानर है । ओज प्रान्तरिक्ष्य तैजस है । मन दिव्यप्राज्ञ वैश्वानर अग्नि है, तेजस वायु है, मन इन्द्र है । इसीलिए तो - ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा - तं मामायुरमृत-मित्युपास्स्व ' - यह कहा जाता है— १ – रस, असृक्, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र, पार्थिव धातु वाक् ( अपानाग्नि ) ब्रह्म अन्नमयं २- ओज-१३- शुद्ध सोम--अन्तरिक्ष्य, --- दिव्य प्राण ( व्यानवायु ) मन ( प्राणादित्यः ) ( स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ) में-अन्नरस शुक्र बनता है । यह शुक्र ही प्रजोत्पत्ति का पहला उपादान है । यह शुक्र सर्वाङ्गशरीर शरीरस्वरूप में परिणत होकर प्रतिष्ठित होता है । प्रजननक्रिया द्वारा होने वाले घर्षण से अग्नि उत्पन्न होता है । इस अग्निताप से शरीराकार में परिणत सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त जमा हुआ शुक्र पिघलता है । रेतः पिघलकर वह अण्डकोषों में आता है । इसी अभिप्राय से - ' यदा वै स्त्रिये च पुंसश्च संतप्यते श्रथ ) सिच्यते ' 3 - कहा जाता है । यहाँ से उपस्थ द्वारा निकलकर योनिगत आग्नेय शोणित में सुत ( शरीर प्राहुत में होकर १० मास के अनन्तर सुत ( अपत्य ) रूप में परिणत होता है । रेत की हमने सर्वाङ्ग व्याप्ति बतलाई है एवं उसे शरीराकाराकारित बतलाया है, अतएव सिक्तरेत उसी रूप में परिणत होता है । शरीर के जिस भाग का रेत च्युत नहीं होता - सन्तान में उसी भाग की कमी हो जाती है । माता के गर्भ में स्थित गर्भ पहले रेतोरूप से पिता के गर्भ में ( सर्वाङ्गशरीर में गर्भित ) रहता है । वहाँ से सर्वाङ्ग शरीर से निकलकर माता की योनि मे सिक्त हो- दूसरा जन्म लेता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि ऐतरेय कहते हैं— " पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति यदेतद्रेतः ” । १- छान्दोग्योप ० ६।६।५ । २- कौषी ० उप ० ३।२ । ३- शत ० ब्रा ० ३।५।३।१६ । [ १२४ ]
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तृतीय प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः संभूतमात्मन्येवाऽऽत्मानं बिर्भात । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चति श्रथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म " ॥ ' इस प्रकार यद्यपि रेत का सर्वाङ्ग शरीर में संस्थान बतलाया जाता है, तथापि मन रेतोरूप इसका उक्थ है-हृदय ही समझना चाहिए । कारण इसका यही है कि हृदय में मन प्रतिष्ठित है । सोमरूप है । इसी के आधार पर रेत प्रतिष्ठित है । इसी अभिप्राय से ' रेतो हृदये श्रितम् ' २ - यह कहा जाता है । यह रेत साक्षात् सोम है । आपः, वायु, सोम तीनों भृगु हैं । इन तीनों के आधार पर क्रमश के: श्राग्नेय ( रौद्र ), वायव्य, सौरप्राण प्रतिष्ठित हैं- जैसा कि पूर्व की त्रिलोकीव्यूहन में विस्तार ' उ साथ बतलाया जा चुका है । सोम, वायु दोनों आन्तरिक्ष्य हैं - सजातीय हैं । ' त्वमाततन्थोर्वन्तरिक्षम् • चान्द्रसोम भी अन्तरिक्ष में ही रहता है । एवं- ' वायुर्वान्तरिक्षम् ' के अनुसार वायु भी अन्त-अनुसार रिक्ष में ही रहता है । तीसरा आपोभाग - पार्थिव निर्माण में उपयुक्त हो जाता है । वायु भोज है । सोम मन है । पार्थिव आपोमय अग्नि भूत है । यह अलग है - मन, वायु अविनाभूत हैं । जहाँ मन है वहाँ वायु ( प्राण ) अवश्य हैं । यह वायुप्राण व्यानात्मा से उत्पन्न होने वाला प्राण मन के आधार पर ही प्रतिष्ठित रहता है । जब तक मन है तब तक श्वास - प्रश्वास है । वाक् पृथिवी है । मन अन्तरिक्ष है । इसी अभिप्राय से-' इयं वं वाक् - अदो मनः ४ - यह कहा जाता है । मन के साथ ही आन्तरिक्ष्य वायु है । ' यन्मनः स इन्द्रः ५ के अनुसार मन इन्द्र है एवं- ' वायुर्वेन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः ६ - के अनुसार मनइन्द्र वायुमय है । वह वायुभाग ही इस ' प्रज्ञेन्द्र ' का आत्मा है । मन प्रज्ञा है । वायु प्राण है । प्रज्ञा ही उसकी आत्मा है । दोनों ऐसे मिले हुए हैं कि दोनों को पृथक् नहीं देखा जा सकता । इसी आधार पर - ' प्रारणोऽस्मि प्रज्ञात्मा । या वा प्रज्ञा ( मनः ) स प्राणः । यो नै प्राणः सा प्रज्ञा । सह ह्य ेतावस्मिन् शरीरे वसतः -सहोत्क्रामतः ' इत्यादि ॥ " अधिक कहना व्यर्थ है - निम्नलिखित श्रुतिवचन स्पष्ट ही दोनों का अविना-माव बतला रहे हैं । ऐसी अवस्था में यदि हमारे ऋषि ' मनोऽधिकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ' कहते हैं-तो क्या अत्युक्ति करते हैं— १- " मनोऽन्तरिक्षलोकः " 15 २ - " मनो ह वायुर्भूत्वा दक्षिणतस्तस्थौ " १- ऐत ० आ ० २।५।१ । ३ - ऋग्वेद मं ० ११६१।२२ । ५- गोपथ ० ब्रा ० उ ० ४।११ । ७- कौषी ० उप ० २।३ । ६ - शत ० ब्रा ० ८।१।१७ । २- तै ० ब्रा ० ३।१०।८।७ । ४ - ऐ ० ब्रा ० ५। ३३ । [ १२५ ] ६ - या ० नि ० दैवतकाण्ड ७।५ । ८- बृहदा ० उप ० १।५।४ ।
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तृतीय प्रश्न । ' ३ - " यन्मनः स इन्द्रः ' प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रज्ञाप्राणनिरूपण ४- " वातो वा मनो वा " । " ५- " मनसि हि सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिताः " । " ६- " मनो वै प्राणानामधिपतिः " । " ७- " मनसि ह्ययमात्मा ( व्यानात्मा ) प्रतिष्ठितः " ८- " प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा " । " ९- " या वा प्रज्ञा स प्राणः " । " १०- " यो वै प्राणः सा प्रज्ञा " । " यही है । मन के आधार पर ही प्राणवायु अध्यात्म में प्रविष्ट होता है । इसका प्रत्यक्षप्रमाण होता कि मन सोम है | चेतना का श्राभास इसी पर पड़ता है । विज्ञान चैतन्य मन पर प्रतिबिम्बित है । जहाँ चेतना! आई कि श्वास - प्रश्वास प्रारम्भ हुआ । जब तक चैतन्य है- मन है तब तक ही श्वास- जाता प्रश्वास है । इसीलिए तो मृत्युकाल में हृदय पर हाथ लगाकर जीवनसत्ता का अनुमान लगाया का है । जब तक हृदयगति है - मनोव्यापार है - तब तक जीवनप्राण ( व्यान ) है । व्यानप्राण को जीवन है । व्यान कारण बतलाया जाता है, वह इस मन के आधार पर ही अध्यात्म में प्रविष्ट है । मन सूर्य्यं अान्तरिक्ष्य है । प्रपान पार्थिवाग्नि है - वाक् है । वाक्प्राणरूप अग्नि - वायु दोनों ही सौर मन के आधार पर ही प्रतिष्ठित हैं । चेतना से ही शरीर में गर्मी है । इसीलिए- ' मनो वा श्रग्निः ' ' यह कहा जाता है । चेतनासत्ता से ही प्राणव्यापार है । बस, इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ' कथमायात्यस्मिन् शरीरे ' के उत्तर में ' मनोऽधिकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ' कहा है । आन्तरिक्ष्य पहले उपनिषत् में हमने कहा था कि इस तीसरे प्रश्न में चान्द्रप्रज्ञाप्राणवाले । असल व्यानरूप प्राण का निरूपण है । श्रध्यात्म मन चन्द्रमा है वह उक्थ है । चन्द्रमा सोममय है में रेत का उक्थ चन्द्रमा का प्रज्ञाभाग है । प्राण का उक्थ चन्द्रमा का प्राण ( व्यान ) भाग है । व्यान उत्पन्न होता है - प्राणात्मा में उत्पन्न होकर शरीर में आता है- प्रज्ञामन के द्वारा । १- गो ० ब्रा ० उ ० ४।११ । ३- शत ० ब्रा ० ७।५।२६ । ५ - शत ० ब्रा ० ६।७।१।२१ । ७- कौषी ० उप ० ३।२ । -शत ० ब्रा ० १०।१।२ / ३ । २- शत ० ब्रा ० ५।१।४८ । ४- शत ० ब्रा ० १४।३।२।३ । ६- कौषी ० उप ० ३।२ । ८- कौ ० उप ० ३।२ । [ १२६ ]