प्रश्नोपनिषद् — पृष्ठ 291–299

प्रश्नोपनिषद् · पृष्ठ 291–299

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञान भाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण श्री कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मत्यं च । हिरण्ययेन सविता रथेनादेवो याति भुवनानि पश्यन् ॥ ' चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । श्राप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च " ॥ " -इत्यादि मन्त्र इसी हिरण्यगर्भविद्या की प्रधानता बतलाते हैं । यही हमारे इस छठे प्रश्न का षोडशकल ' परिद्रष्टा ' प्रजापति है । इस परिद्रष्टा प्रजापति के ऊपर अव्यय की प्रधानता है, अतएव उसे हम ' आधिदैविक ' प्रपञ्च कहेंगे । इससे नीचे क्षर की प्रधानता है । ' क्षरः सर्वाणि भूतानि 3 - इस सिद्धान्त के अनुसार नीचे के प्रपञ्च को ' आधिभौतिक ' कहेंगे । सूय्यं स्वयं अक्षररूप है, अतएव उसे ' अक्षर ' कहेंगे । भगवान् ने भी इसी अक्षररूप पराप्रकृति को जगत् का प्राधार माना है | अक्षर जीवप्रपञ्च से सम्बन्ध रखता, अतएव इसे वह ' जीवभूता ' प्रकृति मानते हैं-" परेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् " ॥ * - से यही सिद्धान्त प्रकट होता है । इस प्रकार सूर्य्याक्षररूप परिद्रष्टा षोडशी प्रजापति ही प्राधिदैविकरूप प्रमृतप्रपञ्च का उपपादक है । यही आधिभौतिक मर्त्यप्रपञ्च का उपपादक है । यही अध्यात्मप्रपञ्च का उत्पादक है । पूर्व के निरूपण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है । ' तस्माद्यत् किचार्वाचीनमादित्यात् - सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् - इस सिद्धान्त के अनुसार नीचे का सारा मण्डल मत्यं, अतएव क्षररूप है । ऊपर का सारा प्रपञ्च अमृत अतएव अव्ययरूप है । अक्षररूप सूर्य्यं श्रमृताव्यय मत्यंक्षर दोनों का संचालक है । इसी अभिप्राय से-" एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् " । " -यह कहा जाता है । आध्यात्मिक - श्राधिदैविक अधिभौतिक भेद से यह अक्षरपुरुष षोडशकल हो जाता है । पूर्व के अर्थ में हमने केवल श्राध्यात्मिक जीवात्मा की षोडशकला बतलाई थी । परन्तु अब उस अध्यात्मप्रपञ्च के प्रभव प्रतिष्ठा - परायणरूप सूर्य्याक्षर की प्राधिभौतिक आध्यात्मिक - प्राधिदैविक-तीनों को को मिलाकर १६ कलाएँ बतलाते हैं— १- यजुर्वेद ३४।३१ । ३ - गीता १५।१६ । ५ - कठोप ० १।२।१६ । २- ऋग्वेद मं ० १।११५।१ । ४ - गीता ७।५ । [ २७७ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण उर्ध्वमूला स्वयम्भूमूला - शिरोमूला - ' अव्ययविद्या ' - ' श्राधिदैविकी ' १- अश्वत्थविद्या २- हिरण्यगर्भविद्या -मध्यमूला ३- प्रणवविद्या १- स्वयम्भूः २- परमेष्ठी अमृत सूर्य्यः ( मर्त्य सूर्य्यः ३- चन्द्रमाः ४- पृथिवी } } हृदयमूला- ' अक्षरविद्या ' -आध्यात्मिकी । पादमूला ' क्षरविद्या ' - आधिभौतिकी । → अमृतम् - - - ' अव्ययः ' - अधिदैवतम् — द्यौः ' उभयभावापन्नः - अक्षर ः ' - श्रध्यात्मम् — प्रन्तरिक्षम् + मर्त्यम्-- ' क्षरः ' – अधिभूतम् —— पृथिवी षोडशकलः-प्रजापतिः ' परिद्रष्टा ' अक्षर को पूर्व में हमने अव्यय का ' स्वभाव ' बतलाया है - अध्यात्म का सम्बन्ध इसी मध्यपतित अक्षर से है, अतएव इसके लिए - ' स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ' यह कहा जाता है । यह है - ब्राह्मी स्थिति । श्रव्ययात्मक्षरविशिष्ट मध्यस्थ अक्षर से ( क्षरभाग द्वारा ) सर्वप्रथम ' प्राण ' उत्पन्न होता है । प्राण से श्रद्धा उत्पन्न होती है । प्राण से स्वयम्भूमण्डल अभिप्रेत है । श्रद्धा से परमेष्ठिमण्डल अभिप्रेत है । स्वयम्भू वाक्प्राणमय है । प्राणगभित यह वाक् ही ' सोऽपोऽसृजत । वाच एव लोकात् वागेव साऽसृज्यत ' " यह कहा जाता है । असत्प्राण ऋषिप्राण है । वही सप्तपुरुषपुरुषात्मक बनकर सबसे पहले वाक्माग से पानी बनता | ' श्रद्धा वा आपः २ - के अनुसार पारमेष्ठ्य आपोमयमण्डल श्रद्धारूप है । ऋषि को आध्यात्मिक श्रद्धातत्त्व का भी निरूपण करना है - परमेष्ठी का भी निरूपण करना है । श्रद्धा शब्द दोनों काम कर देता है, अतएव परमेष्ठी के लिए आपः न कहकर श्रद्धा कहा है । बस, प्राणरूप स्वयम्भू, श्रद्धास्वरूप परमेष्ठी - दोनों इस अक्षर के अव्ययप्रधान श्रमृतभाग से उत्पन्न हुए हैं । यही अमृता सृष्टि है । इसके बाद वही अक्षर अपने मर्त्यं भूतोपादानभूत क्षरभाग से क्रमशः पृथिवी, जल, तेज, वायु, श्राकाश ( मर्त्याकाश ) -ये पाँच भूत उत्पन्न करता है । उत्पत्तिक्रम आकाश - वायु - तेज - जल - पृथिवी यह है । सौर इन्द्र आकाश है । इससे वायु उत्पन्न होता है । वायु से तेज का प्रादुर्भाव होता है । श्रग्निघर्षण द्वारा पानीबनता है । पानी ही रुद्रवायु के प्रवेश से क्रमशः आपः, फेन, उषा, सिकता, शर्करा, अश्मा, अयस्, हिरण्य- इन आठ व्याहृतियों में परिणत होता हुआ पृथिवी बन जाता है । यह पञ्चभूतसमष्टि अक्षर के मर्त्यक्षरभाग से उत्पन्न हुई है । यही आधिभौतिक प्रपञ्च है, एवं वही अक्षर अपने श्रव्ययक्षरगर्भित स्वभाव से ( अक्षरभाग से ) मन ( प्रज्ञान मन ), इन्द्रिएँ - अन्न, वीर्य की समष्टिरूप अध्यात्मप्रपञ्च को उत्पन्न करता है । बाकी १- शत ० ब्रा ० ६।१।१।६ | २- तैत्ति ० ब्रा ० ३।२।४।१ । [ २७८ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण बचते हैं- मन्त्र, तप, लोक, कम्मं, नाम । इन पाँच कलानों का तीनों प्रपञ्चों से सम्बन्ध है । मन्त्र वेद है । तप दीक्षासम्बन्धी स्व - स्व अधिकार पालन है । भूः भुवः आदि सात लोक हैं एवं तत्तत् पदार्थों का आदान विसर्गात्मक व्यापार ही ' विसर्गः कर्मसंज्ञितः ' के अनुसार कम्मं है । सबके स्वयम्भू - परमेष्ठी-सूर्य्यं आदि नाम हैं । अव्ययात्मक्षरगर्भित अक्षर षोडशी है । ' यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश ' के अनुसार उसमें प्राण - आपः - वाक् - अन्न अन्नाद पाँच कलाएँ हैं । प्राण से वेदसृष्टि होती है । आपः से लोकसृष्टि होती है । वाक् से नामसृष्टि होती है । अन्नाद से तप और कम्मं सृष्टि होती है । आदानविसर्ग ही कम्मं है । आदान जिसका होता है - वह अन्न है । जो लेता है - वह अन्नाद है । दोनों के समुच्चय से ही ' यज्ञ ' कर्म उत्पन्न होता है । इस यक्ष से श्रात्मरक्षा होती है, अतः यह बन्धन का कारण नही है । इसी अभिप्राय से ' यज्ञार्थात् कम्मंणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः १ - यह कहा जाता है । यहाँ के कर्म से यज्ञकर्म अभिप्रेत है । इसी के लिए ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म ' २ - यह कहा जाता है । तप एक प्रकार का आत्मबल है । वह अन्न अन्नाद के समन्वयरूप यज्ञकर्म से ही उत्पन्न होता है । ' एतद्वै तप इत्याहुर्यत् स्वं ददाति ' - तप का यही लक्षण है । किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए जो अपना प्राण खर्च किया जाता है ( जिसे कि परिश्रम शब्द से व्यवहृत किया जाता है ) वही व्यापार तप है । यह भी अन्न अन्नाद के समन्वय पर ही निर्भर है । पूर्वोक्त तीनों प्रपञ्च वेदमय हैं । तपोमय हैं । वषट्कारानुसार सब में भूः- आदि सात लोक हैं । सब में प्रादानविसर्गात्मक कम्मं है । सब के पृथक् पृथक् नाम हैं । इस प्रकार प्राणादि पांचों स्वरूपधम्म से उत्पन्न इन पाँच कलाओं का सर्वसाधारण के साथ सम्बन्ध हो जाता है— स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम् - वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी इन्द्रियं मनोऽन्नाद् वीर्य्यम् - ( आत्मक्षरगर्भिताव्ययप्रधानोऽक्षरः- स्वयम्भूमण्डलमसृजत ) - ( स एव प्राणगभितवाचा परमेष्ठिनमसृजत ) - ( इति पञ्चभूतं श्रव्ययगर्भितक्षरप्रधानोक्षरः - असृजत ) - ( इति श्रध्यात्मप्रपञ्चं अव्ययात्मक्षरगर्भिताक्षरः प्रसृजत ) तपो मन्त्राः कर्म्मलोकाः- नाम - ( इति साधारणप्रपञ्च पञ्चकलाभिः स षोडशी - असृजत ) ' षोडशकलः - प्रजापतिरक्षरः परिभ्रष्टा ' १- प्राणः प्राणमयः स्वयम्भू - प्राकृतप्राणादुत्पन्नः १-२- श्रद्धा - श्रद्धामयः परमेष्ठी - प्राकृतप्राणभितापोभागेन ' क्षरगभिताव्ययप्रधानोऽक्षरः ' ' आधिदैविकतन्त्रम् ' - १ १- गीता ३६ । २- शत ० ब्रा ० १।७।१।५ । [ २७६ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण ३ - खम् - निरावरणतत्त्वम् ४- वायुः - अन्तरिक्षसंचारी प्रसिद्धः २-५- ज्योतिः - सौर- चान्द्र श्रग्निप्रकाशः > काग्निषोमाभ्यां उत्पन्नानि ' ६ - आपः जलानि ७- पृथिवी - प्रसिद्धा ८- इन्द्रियम् - ज्ञानेन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि -१ - मनः -प्रज्ञानात्मा ३-१०- प्रन्नम् - भोक्तात्मा शरीरम् ११- वीर्य्यम् - ब्रह्मक्षत्रविट्वीर्य्यम् अन्नान्नादात्म--अन्नभागेनोत्पन्नानि ४-१२- तपः - पदार्थेषु विद्यमाना शक्तिः ३१ - मन्त्राः - पदार्थोपलब्धिभूतास्त्रयो वेदाः १४- कर्म - प्रादानविसर्गात्मकं यज्ञकर्म -अन्नान्नादभागेन - प्राणभागेन - अन्नान्नादभागेन १५ - लोकाः - महिमारूपा वषट्कारसम्बन्धिनः सप्त -अपोभागेन १६- नाम - पदार्थानां तत्तन्नामानि - वाग्भागेन भितोऽक्षरः श्रव्ययक्षरग ' ' ४' -साधारणतन्त्रम् ' अव्ययक्षरविशिष्टोऽक्षरः ' ' चतुष्टयं वा इदं सर्वमित्याहुः ' । अक्षर से ही सब कुछ पैदा हुआ है - पूर्व के निरूपण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है । इसी अक्षरसत्य की सर्वात्मकता बतलाती हुई मुण्डकश्रुति कहती है-[ २०० ] ' प्रधानोऽक्षरः गमितक्षर ' अव्यय २' -आधिभौतिकतन्त्रम् ' ३ ' -प्राध्यात्मिकतन्त्रम् '

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण “ तदेतत्सत्यम् -- यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गा सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति " ॥ ' इसी श्रौत विज्ञान को लक्ष्य में रखकर स्मार्ती उपनिषत् कहती है-" श्रव्यक्ताव्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके " - इत्यादि ॥ २ ' यही हमारे प्रकृतमन्त्र का द्वितीय अर्थ है ॥ २ ॥

जैसा कि ऋषि कहते हैं-" स प्रारणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं " मनोऽनाद्वीयं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च " ॥४ ॥

॥ ४ ॥

. --8 मध्य में अक्षर है । इसके एक तरफ अव्यय है- दूसरी तरफ क्षर है । क्षर मृत्यरूप होने से नाना-बतलाया जाता है, भावापन्न है । अव्यय अमृत रूप होने से एककल है । यद्यपि श्रव्यय को पञ्चकल चक्र में पड़कर परन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं है । अव्यय अपने स्वस्वरूप से निष्कल है । अक्षर ही क्षर के से पाठकों व्यय में अन्तश्चिति - बहिश्चिति करता हुथा उसे पञ्चकल बना डालता है । पूर्व के निरूपण को यह भी भली भाँति विदित हो गया होगा कि प्राण, आपः, वाक्, अन्न, अन्नादरूप क्षर ही इस अक्षर का स्वरूपधम्मं बनकर पूर्वोक्त १६ कलाओं का जनक बनता है । कला नाना हैं । नानाभाव मृत्युरूप । यदि क्षर यह से सम्बन्ध रखता है । बस, जब तक अक्षर क्षर की तरफ झुका हुआ है तो यह षोडशकल है " उस निष्कल - उपरिभागस्थ निष्कल श्रव्यय की ओर झुक जाता है तो पुरुष में जाकर इसकी वे १६ कलाएँ विलीन हो जाती हैं । उस समय केवल पुरुष ही रह जाता है । उस प्रकलअमृत को प्राप्तकर वह भोक्तात्मा मी अकलनमृत हो जाता है । पुरुष शब्द केवल अव्यय का वाचक है । यद्यपि गीता ने अक्षर - क्षर को भी पुरुष कहा है, परन्तु इन दोनों की पुरुषता अविनाभाव पर अवलम्बित है । वस्तुतः दोनों उस पुरुष की परा- अपरा प्रकृति तथैव हैं । पुरुष तो वही है । जैसे क्षर ' अवर ' नाम से प्रसिद्ध है । अक्षर ' परावर ' नाम से प्रसिद्ध है, १- मुण्डकोप ० २।१।१ । २- गीता ६।१८ । [ २८१ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण अव्यय के लिए ' पर ' शब्द नियत है । व्यक्त क्षर ' अवर ' ही कहलाता है । अव्यक्ताक्षर ' परावर ' ही कहलाता है । दोनों से प्रतीत उत्तमपुरुष ( अव्यय ) ' पर ' ही कहलाता है । इसी अभिप्राय से- ' परस्तमात्तु-भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः " - यह कहा जाता है । वह ' पुरुष ' भेदशून्य है । जो आत्मजिज्ञासु अक्षर को पहचानता हुआ तदविनाभूत पुरुष ( अव्यय ) को प्राप्त कर लेता है - उसकी क्षररूपा सोलहों कलाएँ ---44' गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रति देवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च श्रात्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति " || ± — के अनुसार पुरुष में विलीन हो जाती हैं । उस समय यह आत्मा शुद्ध विमुक्त होकर लीन हो जाता है | सोलह कलाएँ उसमें कैसे लीन हो जाती हैं? इसका विवेचन ' मुण्डकोपनिषत् ' में किया जाएगा जैसा कि ऋषि कहते हैं— " स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिद्येते चासां नामरूपे पुरुष

इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति । तदेष श्लोकः " ॥५ ॥

॥ ५ ॥

-883-यदि जीवकलाएँ पुरुष में चली गईं तो क्या होगा? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं-" अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्ठिताः । तं वेद्यं पुरुषं वेद यथा मा वो मृत्युः परिव्यथा इति " ॥६ ॥

" जिस अक्षरमय पुरुष में- रथनाभि में अर्पित आरों की तरह १६ कलाएँ प्रतिष्ठित हैं - वही ' वेद्य ' है । उसे जानो जिससे कि तुमको मृत्यु पीड़ा न पहुँचा सके ” । आत्मा दुःख से घबराता है । दुःख से. भागता है -- सुख चाहता है । बस, उसे प्राप्त कर लेने पर वही ऐकान्तिक सुख मिलता है । नित्य सुख प्राप्त करने वालों को उसी को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए यही निष्कर्ष है ॥। ६ ॥ -88-१ - गीता ८।२० । २- मण्डकोप ० ३।२।७ । [ [ २८२ ]

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षष्ठ प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानमाध्य षोडशी प्रजापतिनिरूपण षोडशकल पुरुष का स्वरूप बतलाकर ऋषि छत्रों को सम्बोधन कर कहते हैं कि हे आत्म-जिज्ञासु शिष्यो! मैं तो इसे ही ( अव्यय को ही ) परब्रह्म समझता हूँ । इससे परे जानने की कोई भी

वस्तु नहीं है । इस विषय का निरूपण -" महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।

पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः " ॥

-इत्यादि कठश्रुति में किया जा चुका है । षोडशी पुरुष का स्वरूप छत्रों में से केवल भारद्वाज ने पूछा था । पिप्पलाद ने उसका स्वरूप बतलाया एवं अन्त में- ' तान् होबाच ' - इस प्रकार छओं को सम्बोधन कर ' एतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद नातः परमस्ति ' - यह कहा । इससे ऋषि को बतलाना है कि हे शिष्यो! जिस षोडशी का स्वरूप भारद्वाज को हमने बतलाया है उसे तुम भी पहचानो । तुमको हमने उसमें रहने वाले एक एक प्राण का स्वरूप बतलाया है । उसी को समझकर विश्राम मत लो । अपि तु, जिसमें तुम्हारे समझे हुए पाँचों प्राण अर्पित हैं- उसे तुम पहचानो । तभी तुम्हें अमृत प्राप्त होगा । जैसा कि ऋषि कहते हैं । " तान्होवाचे तावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति ॥ . ॥७ ॥

इस प्रकार अपनी जिज्ञासा शान्त हो जाने पर परमश्रद्धा से महर्षि पिप्पलाद की पूजा करते हुए छत्रों- ' आप हमारे सच्चे पिता हैं जो कि आप हमें अविद्या - समुद्र से पार लगाने वाले हैं--" ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारय-सोति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः " ॥ ॥ ८ ॥

---निष्कर्ष --इस उपनिषत् में पाँच पाँच प्राणों का पञ्चप्राणाधारभूत षोडशकल विज्ञान प्रज्ञापति का निरूपण है । विज्ञानाक्षर अमृततत्त्व है । इसे प्राप्त करता हैं । अव्यक्त, महत्, विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मारूप पाँच प्राकृत प्राण हैं । पाँचों में से किसी एक को आधार मानलो । उस पर पहुँच जाओ, क्योंकि सबका १ - कठोप ० १।३।११ । [ [ २८३ ]

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T बैठे प्रश्न प्रश्नोपनिषद्विज्ञानभाष्य षोडशीप्रजापतिनिरूपण परायण वही है । यही कारण है कि प्रत्येक प्राण निरूपण के अन्त में ऋषि ने विज्ञानाक्षर पर ही उपसंहार किया है-१- ' तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोकः ' ( स वेदैतत् परमं ब्रह्मधाम ) के अनुसार अक्षर ही ब्रह्मलोक है । प्रथम प्रश्न का यही उपसंहार है । २ – ‘ प्राणस्येदं वशे सर्वम्’– इससे भी वह अक्षररूपविज्ञान प्राण ही अभिप्रेत है । ३- य एवं विद्वान् प्राणं वेद ' से भी वही अमृतप्राणरूप अक्षर श्रभिप्रेत है । ४- ' तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य ' के लिए तो कुछ कहना नहीं है । ५- ' तमोङ्कारेव ( अक्षरेव ) श्रायतनेनान्वेति ' से भी वही अव्यक्त प्रक्षर अभिप्रेत है । अन्त में छठे प्रश्न में उस अक्षरप्रजापति का निरूपण कर सबका उसी में समन्वय कर दिया - है । इस प्रकार यह उपनिषत् पञ्चप्राण द्वारा विज्ञानाक्षर ( जो कि षोडशकल है ) का ही निरूपण करता है ।

" ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।

स्थिरैरङ्गस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो श्ररिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु " ॥

ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! ॥ इति षोडशीप्रजाप्रति निरूपणात्मकः षष्ठप्रश्नः ॥ ॥ ६ ॥

॥ इति - अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषत् ( पिप्पलादोपनिषत् प्रारणोपनिषत् ) हिन्दी विज्ञानभाष्य सम्पूर्ण ॥ [ [ २८४ ]

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राजस्थान पत्रिका प्रकाशन केसरगढ़, जवाहरलाल नेहरु मार्ग,जयपुर - 302004